5 जुलाई : भिन्न होने का बुलावा

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5 जुलाई : भिन्न होने का बुलावा
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“हे प्रियो, मैं तुम से विनती करता हूँ कि तुम अपने आप को परदेशी और यात्री जानकर उन सांसारिक अभिलाषाओं से जो आत्मा से युद्ध करती हैं, बचे रहो। अन्यजातियों में तुम्हारा चालचलन भला हो; ताकि जिन–जिन बातों में वे तुम्हें कुकर्मी जानकर बदनाम करते हैं, वे तुम्हारे भले कामों को देखकर उन्हीं के कारण कृपा–दृष्‍टि के दिन परमेश्‍वर की महिमा करें।” 1 पतरस 2:11-12

यीशु के अनुयायियों को किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए? यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। इसका उत्तर सरल भी है और चुनौतीपूर्ण भी: हमें भिन्न होने के लिए बुलाया गया है—उन लोगों से भिन्न जो यीशु का अनुसरण नहीं करते।

सम्पूर्ण अनन्तकाल से परमेश्वर ने अपनी एक विशेष प्रजा रखने की योजना बनाई है। परमेश्वर की प्रजा को एक पवित्र प्रजा होने के लिए बुलाया गया है, जो पाप से अलग और परमेश्वर के लिए समर्पित हो, क्योंकि परमेश्वर स्वयं “पवित्र, पवित्र, पवित्र” है (यशायाह 6:3; प्रकाशितवाक्य 4:8)। हमें सम्पूर्ण बाइबल में यह सिद्धान्त देखने को मिलता है कि परमेश्वर ने अपनी प्रजा को अन्य लोगों से अलग रखा है। उदाहरण के लिए, लैव्यव्यवस्था की पुस्तक में यहोवा इस्राएलियों को आज्ञा देता है कि वे मिस्रियों और कनानियों की मूर्तिपूजक प्रथाओं का अनुसरण न करें। इसके बजाय, उन्हें परमेश्वर की व्यवस्थाओं और विधियों का पालन करना है (लैव्यव्यवस्था 18:1-5)।

लेकिन परमेश्वर ने अपना व्यवस्था-विधान केवल इसलिए नहीं दिया था कि उसकी प्रजा बाहरी रूप से आज्ञाकारी दिखाई दे। नहीं, परमेश्वर की आज्ञाओं का सच्चा पालन एक परिवर्तित हृदय की अभिव्यक्ति है—एक ऐसा हृदय जो पवित्रता में आनन्दित होता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर कहता है, तुम मेरी प्रजा हो। तुम मेरे हो। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम इस तरह अलग किए जाने के बुलावे में आनन्दित हो। हमारे बाहरी कार्य केवल तभी टिक सकते हैं और परमेश्वर को केवल तभी प्रसन्न कर सकते हैं, जब पहले हमारे भीतर आन्तरिक रूप से परिवर्तन हो चुका हो।

इसीलिए नए नियम में पतरस विश्वासियों को याद दिलाता है कि वे “एक चुना हुआ वंश, और राज–पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और (परमेश्‍वर की) निज प्रजा हैं” (1 पतरस 2:9)। आज हम भी परमेश्वर की प्रजा के रूप में अलग जीने के लिए बुलाए गए हैं: हमें अपने व्यवहार को सम्मानजनक बनाए रखना है और अपने मनोरंजन, धन, सम्बन्धों—अर्थात् अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में—ऐसे निर्णय लेने हैं, जो परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुरूप हों कि “पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ” (1 पतरस 1:16)।

विश्वासियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम संसार की आवश्यकता में तो साझी हों, लेकिन उसके पापों में सहभागी न हों। हमारे संसार के लोगों को हमें यह महसूस कराने की आवश्यकता नहीं है कि उनका अनैतिक आचरण और अपने सृष्टिकर्ता को ठुकराना सही है। इसके बजाय, जैसा कि पतरस समझाता है, हमें ऐसा जीवन जीना चाहिए कि “जिसने तुम्हें अन्धकार में से अपनी अद्‌भुत ज्योति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो,” ताकि लोग हमारे अच्छे कामों को देखकर परमेश्वर को महिमा दें (1 पतरस 2:9)। इसलिए पतरस के ये वचन हमें यह आत्म-जांच करने के लिए प्रेरित करें: क्या मैं सच में अलग होने की अपेक्षा रखता हूँ? क्या मैं इतना साहसी हूँ कि दूसरों की आलोचना सहकर भी परमेश्वर के अनुसार जी सकूँ? क्या मैं इस संसार से इतना प्रेम करता हूँ कि मैं इस संसार के जैसा न बनूँ, ताकि मैं इस संसार के लोगों को एक उत्तम संसार की ओर इंगित कर सकूँ?

व्यवस्थाविवरण 4:1-8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 25–27; प्रेरितों 6 ◊

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