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16 नवम्बर : उद्देश्यपूर्ण काम का बुलावा

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16 नवम्बर : उद्देश्यपूर्ण काम का बुलावा
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“जो कुछ तुम करते हो, तन मन से करो, यह समझकर कि मनुष्यों के लिए नहीं परन्तु प्रभु के लिए करते हो; क्योंकि तुम जानते हो कि तुम्हें इस के बदले प्रभु से मीरास मिलेगी; तुम प्रभु मसीह की सेवा करते हो।” कुलुस्सियों 3:23-24

काम परमेश्वर की सृजनात्मक योजना का हिस्सा है, और इस कारण हमारे जीवन के उद्देश्य का भी एक अभिन्न अंग है।

काम पतन (पाप में गिरने) से पहले भी था—परमेश्वर ने आदम और हव्वा को अदन में इसलिए रखा था ताकि वे उसमें “काम करें और उसकी रक्षा करें” (उत्पत्ति 2:15)। हम ऐसे नहीं बनाए गए थे कि हम केवल बैठे रहें और कुछ न करें! बल्कि हम उस परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं, जिसे काम करना और सृजन करना पसन्द है।

नए नियम के लेखक विश्वासियों से अपेक्षा करते हैं कि वे काम करें—न केवल हमारे सृष्टिकर्ता का अनुकरण करने के लिए, बल्कि इसलिए भी कि हम “आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अच्छे कामों में लगे रहना सीखें ताकि निष्फल न रहें” (तीतुस 3:14)। “तन मन से” काम करने का यह बुलावा हमारी मानवीय क्षमता से परे की बात नहीं है। बल्कि यह एक निमन्त्रण है कि हम शान्तिपूर्वक जीवन बिताएँ, अपने कामों पर ध्यान दें, और अपने हाथों से परिश्रम करें (1 थिस्सलुनीकियों 4:11), ताकि हम न केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें, बल्कि उन लोगों की भी सहायता कर सकें जिन्हें विशेष रूप से सहायता की आवश्यकता है। हमारे जीवन की दैनिक गतिविधियाँ हमारे लिए ईश्वरीय प्रावधान हैं, जिनमें हम “तन मन से काम करते हैं, यह समझकर कि मनुष्यों के लिए नहीं परन्तु प्रभु के लिए करते हैं।” हमारे सभी दैनिक उत्तरदायित्वों और प्रतिबद्धताओं में—चाहे वे करोड़ों का निवेश करना हो या बच्चों की देखभाल करना, किसी फैक्ट्री की असेम्बली लाइन पर काम करना हो या खेत जोतना या बोर्डरूम में बैठना—हम उन्हें उन साधनों के रूप में देख सकते हैं जिनका उपयोग परमेश्वर अपने उद्देश्यों की पूर्ति और अपने नाम की महिमा के लिए करेगा।

परमेश्वर ने हमारे लिए जो सीमाएँ निर्धारित की हैं, उनके भीतर परिश्रम करने से हमारी यह चिन्ता समाप्त हो जाती है कि हमारे पास बैठा व्यक्ति क्या कर रहा है। आखिरकार, न तो हमें उनसे हिसाब लेना है और न ही उन्हें हमसे! परमेश्वर, जो उस काम में हमारी निष्ठा से प्रसन्न होता है जिसे उसने हमें सौंपा है, वही उस दिन पुरस्कार देगा जब हम उसके सामने खड़े होंगे। हमारे काम के बारे में हमारी सोच, हमारे काम के प्रति हमारा व्यवहार, और हमारे काम को लेकर परमेश्वर की स्वीकृति ही सबसे महत्त्वपूर्ण है, इसमें प्राथमिक रूप से हमारे बॉस, हमारे सहकर्मियों, या हमारी अपनी स्वीकृति मायने नहीं रखती।

पौलुस की शिक्षाओं में बचाव का कोई रास्ता नहीं है। यह सीधे-सीधे काम करने और मन लगाकर काम करने का आग्रह है। पवित्रशास्त्र में अन्य स्थान पर पौलुस तीमुथियुस को यह भी प्रोत्साहित करता है कि वह विश्वासियों को आदेश दे कि वे अपने परिवार वालों, विशेषकर अपने घर के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करें, “ताकि वे निर्दोष रहें” (1 तीमुथियुस 5:7)। इसका संकेत स्पष्ट है: जब परमेश्वर का अनुग्रह हमारे जीवन में कार्य कर रहा होता है, तो हम अपने आश्रितों और जरूरतमंदों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध रहते हैं।

आप परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं और अच्छे कामों के लिए सृजे गए हैं। चाहे जीवन में आपकी स्थिति या अवस्था कुछ भी हो, आज आपके पास परमेश्वर की सृष्टि में काम करने का अवसर है। इस काम को तन मन से और अपनी सर्वोत्तम क्षमता से करें। किसी मनुष्य के बजाय परमेश्वर की राय को सर्वोपरि मानते हुए अपने काम को भक्ति के साथ करें। आपका काम चाहे कितना भी सामान्य, दोहराव वाला, या कठिन क्यों न हो, इसे आनन्द के साथ करें, क्योंकि ऐसा करते हुए आप मसीह की सेवा कर रहे हैं और उसके नाम की महिमा कर रहे हैं। यही बात किसी भी काम को महिमामय बना सकती है!

नीतिवचन 24:30-34

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 16–18; लूका 2:1-21 ◊

15 नवम्बर : पिता की कोमल देखभाल

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15 नवम्बर : पिता की कोमल देखभाल
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“इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे। क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, पर तुम्हारा स्वर्गिक पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है। इसलिए पहले तुम परमेश्‍वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी।” मत्ती 6:31-33

परमेश्वर की सृष्टि में जीवों के रूप में, हम न तो भाग्य के भरोसे हैं और न ही संयोग की दया पर निर्भर हैं। हम किसी अंधी और निर्जीव शक्ति के बहाव में नहीं बहे जा रहे, और न ही हमें ज्योतिष, ग्रह-नक्षत्रों की चाल, या ऐसी अन्य भटकाने वाली बातों की चिन्ता करने की आवश्यकता है।

परन्तु जो लोग परमेश्वर को अपने स्वर्गिक पिता के रूप में नहीं जानते और उस पर विश्वास नहीं करते, उनके लिए यह संसार ऐसा ही प्रतीत होता है। इसलिए पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से बताता है कि “अन्यजाति”—अर्थात वे लोग जिन्हें सच्चे परमेश्वर में कोई रुचि नहीं है—“इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं।” ऐसे लोग निश्चित तौर पर नहीं जानते कि क्या कभी कोई सृष्टिकर्ता था, और यदि था भी, तो वह अब इस सृष्टि से नाता तोड़ चुका है। उनके विचारों में मानव इतिहास के सारे उतार-चढ़ाव केवल संयोग हैं—हम सभी एक विशाल, निर्जीव यन्त्र की पकड़ में फँसे हुए हैं।

यह एक अंधकारमय दृष्टिकोण है। परन्तु परमेश्वर का वचन हमें इससे भिन्न और आशाजनक सच्चाई बताता है। बाइबल के अनुसार, सब कुछ मसीह के द्वारा और मसीह के लिए रचा गया है, और वह अब भी अपनी सृष्टि में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है (कुलुस्सियों 1:16-17)। इस भाव से मत्ती 6:26–33 में परमेश्वर-पुत्र मानो हमसे यह कहता है: तुम भोजन, वस्त्र या अन्य किसी बात की चिन्ता क्यों करते हो? यह सब बातें अन्यजाति खोजते हैं। परन्तु तुम? तुम बस मुझ पर ध्यान लगाए रखो—मैं तुम्हारी देखभाल करूँगा। आकाश के पक्षी भी मेरी दृष्टि से छिपे नहीं हैं। खेत की घास तक को मैं अपने सामर्थ्य से वस्त्र देता हूँ। तो क्या मैं तुम्हारा ध्यान नहीं रखूँगा?

वास्तव में, मसीह और पिता की देखभाल की यह प्रतिज्ञा रोमियों 8:28 में अद्‌भुत रूप से प्रतिध्वनित होती है: “उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।” यदि हम मसीह में हैं, तो हमारे जीवन के हर दिन, हर इच्छा, हर आशा, हर पीड़ा, हर भय और हर असफलता—सब कुछ परमेश्वर की बुद्धिमान, अनुग्रहपूर्ण और प्रेमपूर्ण इच्छा के अनुसार कार्य में लाया जा रहा है।

यदि आप आज अकेले हैं, या बीती रात अकेले बिताई, या आप टूटे या कठिन सम्बन्धों की आशंका में आने वाले सप्ताह से भयभीत हैं—तो परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में प्रवेश करने दें। वह आपके हृदय को पिता के प्रेम और उपस्थिति की गर्माहट से भर देगा। यदि आप आर्थिक चिन्ताओं से दबे हुए हैं, तो यीशु को आपके भय को शान्त करने दें। वह कहता है कि वह आपको वह सब कुछ देगा जिसकी आपको वास्तव में आवश्यकता है। यदि आप शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य की कठिनाइयों से जूझ रहे हैं—तो निश्चिन्त रहें: वह जानता है, वह परवाह करता है, और वह आपको पार ले जाएगा। चाहे कुछ भी हो, जीवन कितना भी कठिन क्यों न लगे—परमेश्वर स्वयं आपकी देखभाल करेगा, क्योंकि उसे आपकी चिन्ता है।

मत्ती 6:19-34

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 13–15; लूका 1:57- 80

14 नवम्बर : परिवर्तन की वास्तविकता

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14 नवम्बर : परिवर्तन की वास्तविकता
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“न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्‍कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करनेवाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्‍वर के आत्मा से धोए गए और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।” 1 कुरिन्थियों 6:9-11

मसीही आस्था का प्रमाण उसके सामर्थ्य में है। केवल मसीह का सामर्थ्य ही खोए हुए, शर्म से डूबे हुए पुरुषों और महिलाओं को परमेश्वर के पुत्र-पुत्रियाँ बना सकता है। ऐसा कोई अपराध या लज्जा नहीं है जो किसी व्यक्ति को परमेश्वर के क्षमा करने वाले अनुग्रह से वंचित कर सके।

जब पौलुस एक लम्बी, कुरूप पापों की सूची को समाप्त करता है, तो वह कहता है, “तुम में से कितने ऐसे ही थे।” यह वाक्य पछतावे की नहीं, बल्कि विजय की पुकार है। यह भूतकाल है, वर्तमान नहीं। क्यों? यीशु के रूपान्तरित करने वाले सामर्थ्य के कारण! कोई पुरुष स्वयं को नहीं बदल सकता; कोई स्त्री स्वयं को नहीं बदल सकती—परन्तु यीशु उन्हें बदल सकता है!

क्या हम वास्तव में विश्वास करते हैं कि सम्पूर्ण व्यक्तिगत रूपान्तरण सम्भव है? हम अक्सर लोगों को सतही समाधान देने का प्रयास करते हुए उनसे कहते हैं कि वे अनुग्रह से उद्धार तो पा गए हैं, लेकिन अब उन्हें अपने पिछले पापों के कारण जीवनभर लड़खड़ाते हुए चलना होगा, या यह कि अब उन्हें स्वयं को बदलने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। यह सन्देश हमने कहाँ से सीखा?

क्या यीशु ने कभी किसी से कहा, मैं तुम्हें छूऊँगा और थोड़ा-बहुत बदल दूँगा—बाकी अब तुम्हारे ऊपर है? नहीं! उसने कहा, मैं तुम्हें अन्दर से बाहर तक बिल्कुल नया बना दूँगा। मैं तुम्हारा रूपान्तरण करूँगा, तुम्हें मुक्त करूँगा, तुम्हें बदल दूँगा। यही यीशु का सुसमाचार है। और यही गवाही कुरिन्थुस के मसीहियों की भी थी—वे पहले एक प्रकार के लोग थे: पाप में डूबे हुए, न्याय के पात्र। लेकिन फिर वे बदल दिए गए। अब वे भिन्न थे। तो यह रूपान्तरण कहाँ से आरम्भ होता है? अपने पाप को स्पष्ट रूप से देखने से।

यदि मैं स्वयं को पापी नहीं समझता, तो मैं स्वयं को उद्धार पाने योग्य कैसे समझूँगा? हमें अपनी विकृति की गहराई का सामना करना होगा, ताकि जब परमेश्वर का वचन हमें बताए कि यीशु जीवन की हर उलझन और कठिनाई से लोगों को बचाने आया और उन्हें भीतर से बदलने के लिए अपना आत्मा देना चाहता है, तो हम पूरे मन और दोनों हाथों से उसकी ओर बढ़ें। यही उद्धार है! यही रूपान्तरण है!

हर मसीही विश्वासी इस सच्चाई का जीवित प्रमाण है कि परमेश्वर जीवनों को बदलता है। हर जगह ऐसे पुरुष और महिलाएँ हैं जो मसीह की सृजनात्मक और जीवन-परिवर्तक सामर्थ्य के जीवित प्रमाण हैं। तो क्या हम ऐसी कलीसिया के लिए तैयार हैं, जिसके सदस्य पहले व्यभिचारी, व्यसनी, शराबी, और छल करने वाले लोग थे—जो अब मसीह में बदल दिए गए हैं? क्या हम यह स्वीकार करने को तैयार हैं कि हम भी पहले ऐसे ही थे, परन्तु अब परमेश्वर के अनुग्रह से बदल गए हैं? या हम केवल ऐसी कलीसियाएँ चाहते हैं जो बाहर से अच्छी तरह सजे हुए, “स्वीकार्य” लोगों से भरी हों, जिन्हें यीशु की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती?

यीशु बचाता है और यीशु बदलता है। विश्वास के द्वारा, आप अब वह नहीं हैं जो पहले थे—और अगले महीने, अगले वर्ष, आप फिर कह सकेंगे: “मैं अब भी वैसा नहीं हूँ जैसा पहले था।” आपको कौन ऐसा लगता है जो पाप में इतना डूबा है कि वह मसीह के पास नहीं आ सकता? उसके लिए प्रार्थना करें कि परमेश्वर उसे रूपान्तरित करे। आपके जीवन का कौन सा भाग आपको ऐसा लगता है कि कभी नहीं बदलेगा? उसके लिए भी प्रार्थना करें कि परमेश्वर उसे रूपान्तरित करे। आप किसी को भी नहीं बदल सकते, यहाँ तक कि खुद को भी नहीं। लेकिन जो काम आप नहीं कर सकते, उसे करने के लिए मसीह सामर्थी है।

2 कुरिन्थियों 3:17 – 4:6

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 10–12; लूका 1:39-56 ◊

13 नवम्बर : प्रभु में सहमति

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13 नवम्बर : प्रभु में सहमति
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“मैं यूओदिया को भी समझाता हूँ और सुन्तुखे को भी, कि वे प्रभु में एक मन रहें। हे सच्चे सहकर्मी, मैं तुझ से भी विनती करता हूँ कि तू उन स्त्रियों की सहायता कर, क्योंकि उन्होंने मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में, क्लेमेंस और मेरे अन्य सहकर्मियों समेत परिश्रम किया, जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं।” फिलिप्पियों 4:2-3

विभाजन कलीसियाओं को भीतर से खोखला कर देता है।

इसी कारण पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया की दो स्त्रियों—युओदिया और सुन्तुखे—के आपसी मतभेद की खबर को गम्भीरता से लिया। उसने अपने पत्र में उन्हें समझाया कि “वे प्रभु में एक मन रहें।” और इस असहमति को सम्बोधित करते हुए प्रेरित पौलुस हमें मेल-मिलाप का एक उपयोगी आदर्श प्रस्तुत करता है। वह स्पष्ट करता है कि हमें यह याद रखना चाहिए कि हम “प्रभु में” अपने भाइयों और बहनों से जुड़े हुए हैं। यह वाक्यांश हमारी असली पहचान को दर्शाता है: हम अपने नहीं हैं; हम मसीह के हैं।

इसलिए पौलुस युओदिया और सुन्तुखे से आग्रह करता है कि वे “प्रभु में” अपनी एकता को याद करें और परमेश्वर की उस शिक्षा के अधीन हो जाएँ जो प्रेरितों के द्वारा आई थी—वैसे ही जैसे आज हम बाइबल के माध्यम से परमेश्वर के वचन के अधीन होते हैं। बाइबल यह स्पष्ट करती है कि मसीही जीवन में हमें पहले परमेश्वर से प्रेम करना है और उसकी सेवा करनी है। और जब हम उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, तो वह हमारे हृदयों में ऐसा कार्य करता है कि हम अपने पड़ोसियों की भलाई के लिए उनकी सेवा करने की लालसा रखते हैं, ताकि उन्हें उन्नति मिले (रोमियों 15:2)।

जब हम यह भूल जाते हैं कि हम पूरी तरह मसीह के हैं, तो हम जल्दी ही अपने स्वार्थों को बढ़ावा देने लगते हैं, अपने उद्देश्यों को स्थापित करने लगते हैं, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगते हैं, और अपने घमण्ड पर सवार होकर उनसे झगड़ने लगते हैं जो हमसे असहमत हैं। विश्वासियों के बीच कलह हमें अक्सर छोटी-छोटी बातों में उलझा देती है, जो केवल विवाद में पड़े लोगों की नहीं बल्कि पूरी कलीसिया की ऊर्जा को समाप्त कर देती हैं। परिणामस्वरूप, कलीसिया बाहर की ओर हाथ बढ़ाने की बजाय अन्दर की ओर केन्द्रित हो जाती है। यह अत्यन्त असंगत बात है कि हम जबरदस्ती अपनी बात मनवाने की कोशिश करें, जबकि हमारा उद्धारकर्ता कभी ऐसा नहीं करता था। यदि यीशु भी हमारी तरह स्वार्थी भाव से अपने बारे में सोचता, तो न तो वह देहधारण करता, न क्रूस पर मरता, न हमें क्षमा मिलती, और न ही स्वर्ग की कोई आशा होती।

हमें यह दिखावा नहीं करना चाहिए कि विश्वासियों के बीच असहमति नहीं होती—वह होती है। लेकिन छुड़ाए गए लोगों के समूह के रूप में हमें “प्रभु में” अपनी एकता की नींव पर खड़े होकर असहमतियों को हल करना है। हमारा ध्यान हमारे स्वयं पर केन्द्रित नहीं रह सकता। टूटे हुए सम्बन्धों को चंगा करने में हमें मसीह का अनुकरण करते हुए मेल-मिलाप की पहल करनी चाहिए।

यह हम सभी के लिए एक बुलाहट है। यदि आज आप युओदिया और सुन्तुखे की स्थिति में हैं, तो आपके लिए बुलावा स्पष्ट है, भले ही यह चुनौतीपूर्ण हो: “प्रभु में एक मन रहें।” चाहे और कुछ भी विभाजित करता हो, मसीह में आपकी एकता उससे कहीं अधिक गहरी है। और यदि आप ऐसी कलीसिया में हैं जहाँ युओदिया और सुन्तुखे हैं, तो आपसे भी वही भूमिका निभाने की अपेक्षा की गई है, जो पौलुस ने अपने “सच्चे साथी” से करने को कहा था: जो विभाजित हैं, उन्हें मेल कराने में सहायता करें। सच्चा प्रेम पहल करता है। सच्चा प्रेम हस्तक्षेप करता है। सच्चा प्रेम विभाजन को बढ़ने नहीं देता, बल्कि उस एकता के लिए प्रयास करता है जो कलीसिया को मजबूत करती है।

यूहन्ना 17:1-26

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 7–9; लूका 1:21-38

12 नवम्बर : हम क्षमा क्यों करते हैं

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12 नवम्बर : हम क्षमा क्यों करते हैं
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“एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्‍वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।” इफिसियों 4:32

परमेश्वर की क्षमा केवल उसके हृदय की अभिव्यक्ति नहीं है (हालाँकि यह निश्चित रूप से है), बल्कि यह उसके वचन से एक प्रतिज्ञा भी है। इसलिए परमेश्वर की क्षमा का हमारा अनुभव सीधे इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसके वचन पर कितना विश्वास करते हैं।

इब्रानियों का लेखक यह स्पष्ट करता है कि हमारे पापों की क्षमा का भरोसा केवल यीशु के प्रायश्चित करने वाले लहू पर आधारित है (इब्रानियों 10:19-22)। इसके अलावा, जब हम पश्चाताप के साथ परमेश्वर के पास आते हैं, तो वह प्रतिज्ञा करता है कि वह हमारे पापों को फिर कभी याद नहीं करेगा (पद 17)। परमेश्वर ने स्वयं यह प्रतिज्ञा की है कि वह हमारे अधर्मों का लेखा-जोखा नहीं रखेगा (यशायाह 43:25)। दूसरे शब्दों में, यदि हम उन बातों को लेकर फिर से परमेश्वर के पास जाते हैं जिन्हें वह पहले ही क्षमा कर चुका है, तो वह मानो यह कहता है: मेरे प्यारे बच्चे, मुझे याद नहीं कि तुम किस बारे में बात कर रहे हो। मैंने प्रतिज्ञा की है कि मैं उस बात को फिर कभी नहीं उठाऊँगा—और इसलिए, तुम्हें भी ऐसा नहीं करना चाहिए।

परमेश्वर का उदाहरण इस बात का आदर्श है कि हमें दूसरों को कैसे क्षमा करना चाहिए। दूसरों को क्षमा करना एक भावना का विषय नहीं है; यह एक प्रतिज्ञा और आज्ञाकारिता का विषय है। जब आप या मैं किसी को क्षमा करते हैं, तो हम मूल रूप से तीन बिन्दुओं वाली प्रतिज्ञा करते हैं: पहली, हम उस व्यक्ति के साथ उस बात को फिर कभी नहीं उठाएँगे; दूसरी, हम वह बात किसी और के सामने नहीं लाएँगे; और तीसरी, हम उसे अपने मन में भी दोबारा नहीं लाएँगे। सच्चे मन से क्षमा करने का अर्थ यह कहना है: “मैं तुम्हारे लिए वही करना चाहता हूँ जो परमेश्वर ने मसीह में मेरे लिए किया है।”

इसका यह अर्थ नहीं है कि क्षमा केवल हमारे मन की एक कल्पना है या सिर्फ इच्छा-शक्ति का एक कार्य है। बाइबल स्पष्ट रूप से कहती है कि हमें दिल से क्षमा करना चाहिए (मत्ती 18:35)। लेकिन इसका यह अर्थ अवश्य है कि जब हम मसीह में मिली अपनी क्षमा के प्रति जागरूकता और कृतज्ञता से प्रेरित होकर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए दूसरों को क्षमा करते हैं—तभी हमारी क्षमा सबसे अधिक सच्ची और प्रभावशाली होती है।

क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आपको क्षमा करने की आवश्यकता है? हो सकता है कि आज उस व्यक्ति को क्षमा करने का आपका मन न कर रहे हों—लेकिन यह आपकी भावना का विषय नहीं है। मसीह में परमेश्वर की क्षमा पाने वाले के रूप में आपको वैसी ही क्षमा करने के लिए बुलाया गया है, जैसी उसने आपको दी है। यह आसान नहीं है, लेकिन यह सम्भव है। परमेश्वर का आत्मा आपको वह प्रतिज्ञा करने और उसे निभाने की सामर्थ्य दे सकता है। जब आप परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए वह तीन बिन्दुओं वाली प्रतिज्ञा करके क्षमा करते हैं, तो वह न केवल आपके निर्णय को दृढ़ बनाएगा, बल्कि धीरे-धीरे आपके मन की भावनाओं को भी उसी के अनुसार ढाल देगा।

मत्ती 18:21-35

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 4– 6; लूका 1:1-20 ◊

11 नवम्बर : प्रतिज्ञा और आशीष

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11 नवम्बर : प्रतिज्ञा और आशीष
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“मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम महान करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा। जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूँगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे।” उत्पत्ति 12:1-3

जब भोजन तैयार किया जा रहा होता है, तो बच्चों का इधर-उधर दौड़ना स्वाभाविक है। कभी-कभी माता-पिता को लगता है कि वे चिल्ला उठें, “सुनो, तुम लोग रसोई में बाहर क्यों नहीं जाते? चलो, बाहर जाओ!”

बेबीलोन की मीनार पर लोग सिर्फ इधर-उधर भाग नहीं रहे थे; उन्होंने परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया था। अपना स्वयं का राज्य स्थापित करने के इरादे से उन्होंने एक मीनार बनाई और स्वर्ग तक पहुँचने का प्रयास किया, ताकि वे देख सकें कि वे अपनी शक्ति से क्या कर सकते हैं। इस विद्रोह के परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने उनकी भाषा बदलकर उन्हें संसार भर में बिखेर दिया (उत्पत्ति 11:1-9)।

एक निराश माता-पिता से कहीं अधिक न्यायसंगत होने के बावजूद, परमेश्वर लोगों को दूर भेज सकता था और उनका अन्त कर सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

अपनी कृपा को प्रकट करने के लिए अगली ही पीढ़ी में परमेश्वर ने उसे सुधारना आरम्भ किया, जो टूट चुका था। उसने अब्राम नामक एक वृद्ध और निस्सन्तान मूर्तिपूजक व्यक्ति से बात की, जिसका नाम विडम्बनात्मक रूप से “उत्कृष्ट पिता” था, और उसने बेबीलोन के न्याय के प्रभाव को उलट देने की प्रतिज्ञा की। वहाँ लोग अपना नाम महान बनाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन परमेश्वर अब्राम का नाम महान बनाने जा रहा था। वे अपना स्वयं का राज्य स्थापित करना चाहते थे, लेकिन परमेश्वर अब्राम के लोगों को एक महान राष्ट्र बनाने जा रहा था। वे परमेश्वर से रहित संसार में आशीष खोजने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन परमेश्वर अब्राम के परिवार के माध्यम से पूरी पृथ्वी पर आशीष लाने जा रहा था। परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा पाप को उलट दिया जाएगा और उसके प्रभाव को मिटा दिया जाएगा।

इस वाचा में परमेश्वर ने अब्राम को लेकर उसे अब्राहम अर्थात “अनेकों का पिता” बनाया, जब उसने अपने चुने हुए सेवक पर अपनी कृपा करने और पृथ्वी पर बिखरी भविष्य की पीढ़ियों को आशीष देने की प्रतिज्ञा की।

परमेश्वर द्वारा अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा सुसमाचार की प्रतिज्ञा की एक प्रारम्भिक अभिव्यक्ति है। उसने अब्राहम से प्रतिज्ञा की और आगे चलकर अब्राहम के वंशजों को आशीष मिली। हालाँकि, वे अन्ततः यह जानेंगे कि प्रतिज्ञा और आशीष उन सभी के लिए भी है, जो यीशु पर विश्वास करते हैं: “क्योंकि तुम सब उस विश्वास के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की सन्तान हो . . . और यदि तुम मसीह के हो तो अब्राहम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो” (गलातियों 3:26, 29)। इसलिए जबकि परमेश्वर ने जो प्रतिज्ञाएँ अब्राहम से की थीं, वे पुराने नियम के इस्राएल राष्ट्र में आंशिक रूप से पूरी हुई थीं, तौभी वे अन्ततः यीशु मसीह के सुसमाचार और उसके लोगों में सम्पूर्ण रूप से पूरी हुईं।

इस पूर्णता की विशालता का केवल एक छोटा सा आभास पाकर आपका जीवन हमेशा के लिए बदल जाएगा। यदि आप आज मसीह में हैं, तो परमेश्वर द्वारा अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा में आपका नाम भी शामिल है। आप स्वर्ग के नागरिक हैं और एक ऐसे राजा की सेवा करते हैं जो अब्राहम के वंश से उत्पन्न हुआ है, जिसका नाम यीशु है। जो कुछ परमेश्वर ने अब्राम से कहा था, वह अब आपके लिए भी पूरा हुआ है क्योंकि परमेश्वर लोगों को अपने राज्य में वापस बुला रहा है, ताकि वे हमेशा के लिए उनकी साक्षात उपस्थिति का आनन्द उठाएँ। आज आप चाहे जो भी हैं, विश्वास के द्वारा आप परमेश्वर की सन्तान हैं, अब्राहम के लोगों के सदस्य हैं, और इन महान प्रतिज्ञाओं के उत्तराधिकारी हैं।

उत्पत्ति 11:1-9; 12:1-9

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 1–3; यहूदा

10 नवम्बर : बुराई की वास्तविकता

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10 नवम्बर : बुराई की वास्तविकता
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“मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है? ’मैं यहोवा मन की खोजता और हृदय को जाँचता हूँ ताकि प्रत्येक जन को उसकी चाल–चलन के अनुसार अर्थात् उसके कामों का फल दूँ।’” यिर्मयाह 17:9-10

बाइबल दुष्टता की वास्तविकता के बारे में बहुत स्पष्ट है—और यह उस शक्ति की प्रकृति के बारे में भी उतनी ही स्पष्ट है जो संसार में दुष्टता के पीछे कार्यरत है। शैतान, जो दुष्टता का प्रतीक है, अपने शिकार की आत्मिक भलाई का पूरी तरह से विरोधी है। वह एक भयंकर शेर है, और (हालाँकि परमेश्वर के सार्वभौमिक नियन्त्रण से बाहर नहीं है) वह इस संसार का शासक है। वह सभी पापों के पीछे की शक्ति है; और जब तक कोई व्यक्ति परमेश्वर के आत्मा द्वारा नया जन्म नहीं पाता, वह वास्तव में उसके अधीन होता है, और उसके बुरे कर्म उसके स्वामित्व का प्रमाण होते हैं।

बेशक, अधिकांश समकालीन लोग दुष्टता की एक वास्तविक शक्ति के अस्तित्व का मजाक उड़ाते हैं। वे कहते हैं, “ओह, आप किसी दुष्टता की आध्यात्मिक शक्ति के अस्तित्व में विश्वास नहीं कर सकते। क्या आप सचमुच विश्वास करते हैं?” लेकिन जब वे शैतान के व्यक्तिगत अस्तित्व के विचार को कम करके आँकते हैं, तो ऐसे लोग यह समझाने में विफल रहते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम इतनी बड़ी तकनीकी प्रगति करने के बावजूद भी हम अपने जीवन की पापी प्रवृत्तियों को पिछली पीढ़ियों से बेहतर नियन्त्रण में क्यों नहीं रख सकते। ऐसा क्यों है?

बाइबल सिखाती है कि जब आदम अपनी पत्नी का अनुसरण करते हुए स्वयं को उस धोखेबाज के प्रभाव में ले आया और पाप कर बैठा, तो वह पूरी मानवता को अपने साथ पतन में ले गया। दूसरे शब्दों में, जब आदम ने पाप किया, तो हम सभी ने पाप किया। हम में से प्रत्येक का जन्म पतित अवस्था में हुआ है। इसीलिए हमारे हृदय—हमारे अस्तित्व का केन्द्र, हमारी भावनाओं, हमारी इच्छाओं, हमारे निर्णयों का स्रोत—“सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है।” यीशु ने फरीसियों से जो कहा, यिर्मयाह ने उसका पूर्वानुमान लगा लिया था: “ऐसी कोई वस्तु नहीं जो मनुष्य में बाहर से समाकर उसे अशुद्ध करे; परन्तु जो वस्तुएँ मनुष्य के भीतर से निकलती हैं, वे ही उसे अशुद्ध करती हैं . . . क्योंकि भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से बुरे-बुरे विचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन,” और सभी प्रकार की बुराई निकलती है, जो स्पष्ट और गुप्त दोनों होती हैं (मरकुस 7:15, 21)।

जबकि ये सत्य इस संसार में हमें दिखने वाली सच्चाई का एक प्रेरक स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं, वे हमें अपने बारे में एक बहुत चुनौतीपूर्ण दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करते हैं। सच यह नहीं है कि हम अच्छे लोग हैं जो गलतियाँ कर बैठते हैं; बल्कि हम पापी लोग हैं, जिन्हें दया की आवश्यकता है। क्योंकि यह स्वीकार करने के लिए विनम्रता की आवश्यकता होती है कि हमारे हृदय वास्तव में कैसे हैं, वही हृदय स्वाभाविक रूप से स्वयं की प्रशंसा और आत्मविश्वास के प्रचारकों द्वारा धोखा खा जाते हैं, बजाय इसके कि वे यिर्मयाह जैसे भविष्यद्वक्ताओं की बात सुनें।

सच यह है कि हर कोई एक हृदय के परिवर्तन की आवश्यकता के साथ पैदा होता है—यह परिवर्तन शारीरिक या धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मिक परिवर्तन है। केवल परमेश्वर ही इस परिवर्तन को ला सकता है। जैसे परमेश्वर ने हमें आदम के दोष से दोषी ठहराया, वैसे ही वह अपनी कृपा से विश्वासियों को प्रभु यीशु मसीह की धार्मिकता से धर्मी ठहराता है। यीशु में विश्वास करने के कारण हम अन्दर से बाहर तक बदल चुके हैं। हमेशा की तरह आज भी आपके धोखेबाज हृदय के लिए एकमात्र उपचार यह है कि आप विनम्रता और ईमानदारी से प्रभु के पास आकर प्रार्थना करें, “हे परमेश्‍वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नए सिरे से उत्पन्न कर” (भजन 51:10)।

मरकुस 7:1-23

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एज्रा 9–10; 2 तीमुथियुस 4 ◊

9 नवम्बर : पहाड़ों को हिलाने वाला विश्वास

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9 नवम्बर : पहाड़ों को हिलाने वाला विश्वास
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“यीशु ने उस को उत्तर दिया, ‘परमेश्‍वर पर विश्‍वास रखो। मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई इस पहाड़ से कहे, “तू उखड़ जा, और समुद्र में जा पड़,” और अपने मन में सन्देह न करे, वरन् प्रतीति करे कि जो कहता हूँ वह हो जाएगा, तो उसके लिए वही होगा। इसलिए मैं तुम से कहता हूँ कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिए हो जाएगा।’” मरकुस 11:22-24

जब हम अपने बाइबल पढ़ते हैं, तो हमें कुछ पद ऐसे मिलते हैं जो सीधे और आसानी से समझ में आ जाते हैं। लेकिन दूसरी ओर, कुछ पद ऐसे भी होते हैं जिनके अर्थ को समझना हमारे लिए कठिन होता है।

यीशु कहता है, “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिए हो जाएगा।” हम अक्सर इस तरह के वचनों को नजरअंदाज करने या फिर इन्हें सैकड़ों शर्तों और व्याख्याओं में लपेटने के लिए प्रलोभित होते हैं। ऐसे पदों का गलत उपयोग हम में से कुछ को इतना डरा चुका है कि हम उनमें छिपे हुए प्रोत्साहन और चुनौती पर ध्यान ही नहीं देते।

इस साहसी आज्ञा में यीशु ने अपने अनुयायियों को याद दिलाया कि वे परमेश्वर पर भरोसा करें, क्योंकि वास्तव में विश्वास का महत्व इसी में है कि वह परमेश्वर में स्थापित हो। हमें न तो अपने विश्वास पर, और न ही अपने आप पर भरोसा करना चाहिए—हमें तो केवल परमेश्वर पर ही विश्वास होना चाहिए।

यीशु द्वारा प्रयुक्त रूपक—एक पहाड़ को समुद्र में फेंकने का आदेश देना—शायद शिष्यों के लिए परिचित था; यह रब्बियों द्वारा दिया जाने वाला एक सामान्य रूपक था, जिसका अर्थ ऐसे किसी काम को पूरा करना था, जो पहले असम्भव प्रतीत होता था।[1] शिष्य यीशु की बातों को इस प्रकार से नहीं समझे थे कि वह सचमुच उन्हें जैतून पहाड़ को मृत सागर में फेंकने का आदेश दे रहा है, जो उनसे 4,000 फीट नीचे था। वे यीशु के शब्दों को एक पारम्परिक कथन के रूप में समझे थे, जो यह दर्शाता था कि परमेश्वर अपने बच्चों के लिए असाधारण काम करना चाहता है।

हम प्रेरितों के काम की पुस्तक में विश्वास और प्रार्थना पर यीशु की शिक्षा के इस सत्य को जीवन्त रूप में देखते हैं। जब एक लंगड़ा भिखारी पतरस और यूहन्ना से पैसे माँगता है, तो पतरस उससे कहता है कि वह उठकर चले (प्रेरितों 3:6)। शायद उस क्षण पतरस यीशु के वचनों को याद कर रहा था और सोच रहा था, “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो।”

जब हमारा विश्वास परमेश्वर पर केन्द्रित होता है, तो हम एक साहसी और अद्वितीय विश्वास रख सकते हैं—ऐसा विश्वास जो परमेश्वर के साथ असम्भव को भी सम्भव मानता है। हम जानते हैं कि हम उस परमेश्वर से बात कर रहे हैं जो हमारी सोच और कल्पना से भी कहीं अधिक कार्य करने में सक्षम है (इफिसियों 3:20-21)। यीशु हमसे यही कहते हैं कि मैं चाहता हूँ कि तुम इस तरह प्रार्थना करो, मानो तुम सचमुच एक ऐसे परमेश्वर पर विश्वास करते हो जो न तो कभी गलती करता है, न ही निर्दयी होता है, और न ही इस सृष्टि की शक्तियाँ उसे पराजित कर सकती हैं।

इन वचनों को सैकड़ों शर्तों में मत उलझाएँ। बस उन्हें वहीं रहने दें और उन पर मनन करें। इस सच्चाई का आनन्द लें कि परमेश्वर वह कर सकता है जो आपकी कल्पना से भी परे है। इस वास्तविकता में विश्राम करें कि उसके लिए कोई भी काम असम्भव नहीं है। और फिर . . . प्रार्थना करें!

  इफिसियों 3:14-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एज्रा 6– 8; 2 तीमुथियुस 3


[1] एल्फ्रेड एदेरशेईम, द लाईफ ऐण्ड टाईम्स ऑफ जीज़स द मसायाह (लौंगमैंस, ग्रीन, ऐण्ड कं., 1898), खण्ड. 2, पृ. 376 (पाद टिप्पणी).

8 नवम्बर : प्रलोभन के विरुद्ध युद्ध

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8 नवम्बर : प्रलोभन के विरुद्ध युद्ध
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“तब तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के अधीन नहीं वरन् अनुग्रह के अधीन हो।” रोमियों 6:14

इस जीवन में हम कभी भी प्रलोभन से मुक्त नहीं होंगे। वास्तव में, जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमें यह एहसास होता है कि वही पुराने प्रलोभन—अक्सर नए रूप में—हमारे पीछे लगे रहते हैं, हमें उलझाने का और हमें गिराने का प्रयास करते रहते हैं। और यदि इतना ही पर्याप्त नहीं था, तो इनके साथ कई नए प्रलोभन भी आ जाते हैं!

हाँ, प्रलोभन एक वास्तविकता है, और इससे बचा नहीं जा सकता। लेकिन ऐसा क्यों होता है?

पहला कारण यह है कि वही अनुग्रह जो हमें परमेश्वर से मेल-मिलाप कराता है, हमें शैतान के विरोध में भी खड़ा कर देता है। पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि जब तक हमने मसीह में विश्वास नहीं किया था, तब तक शैतान हमें अपना मित्र होने का भ्रम देता रहा था। लेकिन जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें परमेश्वर का मित्र बना दिया, तब उसने हमें परमेश्वर के पुरातन शत्रु का भी शत्रु बना दिया। यद्यपि शैतान परमेश्वर को उसके लोगों का उद्धार करने से रोक नहीं सकता, तौभी हमारा उद्धार होने के बाद वह अपनी पूरी शक्ति—अर्थात् प्रलोभन—हम पर डाल सकता है ताकि हमें गिराए।

दूसरी बात यह है कि जब हम नया जन्म प्राप्त कर लेते हैं, तब पाप हम पर शासन नहीं करता, लेकिन यह फिर भी हमारे प्राणों से युद्ध करता रहता है—और प्रलोभन उसका सबसे बड़ा हथियार है। हमें संसार से प्रलोभन मिलता है और सांसारिक वस्तुओं के बारे में हमसे कहता है, यदि तुम इसे प्राप्त कर लो, तो तुम सच में सुखी और आनन्दित हो जाओगे।” हमें अपने शरीर से भी प्रलोभन मिलता है। हमारा पुराना पापमय स्वभाव—जो इस वर्तमान जीवन में मसीह में विश्वास करने के बाद भी हमारे अन्दर रहता है—हमारे नए जीवन के विरुद्ध एक कठोर युद्ध लड़ता रहता है।

फिर भी, शैतान का प्रलोभन चाहे जितना भी प्रबल हो—और यह सचमुच प्रबल है—इसमें स्वयं हमें प्रलोभन में गिराने की शक्ति नहीं है। शैतान हमें संसार की चीज़ें दिखा सकता है, लेकिन वह हमें पाप करने के लिए विवश नहीं कर सकता।

इसलिए उन प्रलोभनों से भयभीत या निष्क्रिय मत बनें, जिनका आप सामना कर रहे हैं। अपने प्रलोभनों के विरुद्ध युद्ध में आपको यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आप जीतेंगे या हारेंगे। परमेश्वर ने पहले ही विजय घोषित कर दी है, जैसा कि यूहन्ना लिखता है: “जो तुम में है, वह उस से जो संसार में है, बड़ा है” (1 यूहन्ना 4:4)। युद्ध समाप्त हो चुका है और विजय सुनिश्चित हो चुकी है। संघर्ष अभी भी जारी रह सकते हैं, लेकिन वे युद्ध के अन्तिम परिणाम को बदल नहीं सकते।

आप इस समय किन प्रलोभनों से संघर्ष कर रहे हैं या उनके आगे झुक गए हैं? एक पल लेकर उन्हें नाम से पहचानें। फिर इस सत्य में सान्त्वना प्राप्त करें: वे प्रलोभन जितने भी शक्तिशाली हों, शैतान एक पराजित शत्रु है, और यीशु मसीह विजयी होकर राज्य करता है! आप में निवास करने वाली उसकी शक्ति आपको प्रलोभनों से लड़ने में समर्थ बनाती है, और उसकी मृत्यु आपके लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर आपको क्षमा करे!

रोमियों 6:1-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एज्रा 3–5; 2 तीमुथियुस 2 ◊

7 नवम्बर : पवित्र नगर

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7 नवम्बर : पवित्र नगर
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“फिर मैंने पवित्र नगर नए यरूशलेम को स्वर्ग से परमेश्‍वर के पास से उतरते देखा।” प्रकाशितवाक्य 21:2

यीशु के रूप में परमेश्वर स्वर्ग से नीचे आया और हम तक पहुँचा—और अन्त में, जब सब कुछ पूरा हो जाएगा, तो पवित्र नगर, नया यरूशलेम भी स्वर्ग से परमेश्वर के पास से उतर आएगा।

परमेश्वर एक नए यरूशलेम का निर्माण कर रहा है, जिसमें सभी युगों और सभी स्थानों के विश्वासी होंगे—आपके और मेरे जैसे लोग। हम उस नगर में वास करेंगे, जहाँ हम पूर्ण सामंजस्य में एक साथ रहेंगे; परमेश्वर का मुख हमारे सामने होगा, और हम उसकी पहचान के साथ चिह्नित होंगे (प्रकाशितवाक्य 22:4)। यह समुदाय इतनी विशाल और गौरवशाली भीड़ से बना होगा कि कोई इसे गिन नहीं सकता, क्योंकि इसमें हर जाति, हर जनजाति, हर राष्ट्र और हर भाषा के लोग शामिल होंगे (7:9)।

इस विशाल भीड़ का वर्णन प्रेरित यूहन्ना के समय में कलीसिया के लिए आशा और उत्साह का स्रोत था, और यह हमारे लिए भी ऐसा ही होना चाहिए। आरम्भिक कलीसिया संख्या में बहुत छोटी थी—मानवीय दृष्टि से बिल्कुल नगण्य, जैसा कि यह इतिहास के कई कालखण्डों में रही है। लेकिन यूहन्ना हमें बताता है कि वास्तव में कलीसिया कहीं अधिक विशाल, विस्तृत और महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसके सदस्य नए यरूशलेम के नागरिक हैं, जो तीर्थ-यात्रियों की भाँति आगे बढ़ते जा रहे हैं, जब तक कि वे उसके स्वर्णिम मार्गों पर खड़े न हो जाएँ।

एक दिन, उस नगर में, असंख्य विश्वासियों की भीड़ परमेश्वर की आराधना करेगी, और हम अब्राहम से किए गए परमेश्वर के अन्तिम वचन की पूर्ति देखेंगे: “उसने उसको बाहर ले जा के कहा, ‘आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन, क्या तू उनको गिन सकता है? . . . तेरा वंश ऐसा ही होगा।’” (उत्पत्ति 15:5)

इस समय, यह सृष्टि विभाजन और अशान्ति से भरी हुई है। हम भाषा, राष्ट्रीयता और संस्कृति से बँटे हुए हैं—प्राचीन शत्रुता और आधुनिक सन्देहों से अलग-थलग हैं। लेकिन एक दिन, यह सब उलट दिया जाएगा। परमेश्वर एक नया समुदाय बना रहा है—एक बहु-जातीय, बहु-सांस्कृतिक नगर जो उसके राज्य और शासन के अधीन होगा। जब अन्ततः हम सब एक साथ लाए जाएँगे, जब स्वर्ग पृथ्वी पर आ जाएगा और मसीह के लोग जीवित होकर उसमें वास करेंगे, तब हम प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार के द्वारा एकसाथ जोड़े जाएँगे, क्योंकि यह सुसमाचार सब जातियों के लिए है।

क्या आप उस दिन की कल्पना कर सकते हैं? पूरी तरह से नहीं—परन्तु हाँ, इतने पर्याप्त रूप से कि यह आपको इस जीवन की परीक्षाओं और दबावों से आगे बढ़ने के लिए और उन सभी चीज़ों को त्यागने के लिए प्रेरित करे जो आपको पीछे खींचती हैं (इब्रानियों 12:1-2)। यह संसार आपका घर नहीं है; लेकिन एक दिन स्वर्गिक नगर नीचे आएगा, और वह आपका घर होगा। एक दिन, आप वही देखेंगे जो यूहन्ना ने अपने दर्शन में देखा था—और आप घर पहुँच चुके होंगे।

प्रकाशितवाक्य 22

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एज्रा 1–2; 2 तीमुथियुस 1