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23 मार्च : हर एक अच्छा और उत्तम वरदान

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23 मार्च : हर एक अच्छा और उत्तम वरदान
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“क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।”  याकूब 1:17

क्या आप कभी उपहार खरीदने गए हैं और आपको पता ही नहीं था कि उस व्यक्ति को किस वस्तु की आवश्यकता है या उसे क्या चाहिए? आपको नहीं पता था कि कौन से नाप का या रंग का स्वेटर खरीदना है या बच्चे का खिलौना उसकी आयु के अनुसार उपयुक्त है या नहीं, इसलिए अन्ततः आपने हार मान ली हो और कहा, “मैं कुछ तो खरीद ही लेता हूँ! वे इसे वैसे भी वापस ले लेंगे। कौन इतनी चिन्ता करे?”

उपहार देना सदैव उतना सरल या आनन्ददायक नहीं होता जितना होना चाहिए। सच तो यह है कि हममें से सबसे उत्तम लोग भी हर बार उत्तम उपहार नहीं दे सकते क्योंकि हममें कमियाँ हैं। हमारे पास उचित उपहार देने के लिए ज्ञान और समझ की कमी होती है, और कभी-कभी संसाधनों या इच्छा-शक्ति की भी कमी होती है। इस बात में हम परमेश्वर से पूरी तरह से अलग हैं, क्योंकि परमेश्वर उत्तम वरदान देने वाला है, और केवल  उत्तम वरदान ही देता है। वह स्वभाव से ही भला है और उदारता से भरपूर है। वह बदले में कुछ भी उम्मीद किए बिना देता है और वह प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की योग्यता के आधार पर अपनी भलाई को सीमित नहीं करता। और उसके द्वारा दिए गए किसी भी वरदान को कभी भी वापस करने की आवश्यकता नहीं होती।

न केवल परमेश्वर उत्तम रीति से उदार है, अपितु उस उदारता में कभी बदलाव नहीं आता। यहाँ तक ​​कि संसार के सबसे भले माता-पिताओं के पास भी सही समय पर और सही तरीके से जाना पड़ता है, क्योंकि वे सदैव एक समान नहीं होते। बच्चे सीखते हैं कि वे अपने समय को कैसे चुनें। जब मेरे पिता बिजली कम्पनी के साथ बात करने के लिए फोन पर प्रतीक्षा कर रहे होते थे, तब एक किशोर के रूप में मुझे उनके हाव-भाव समझना सरल लगता था और सोचा करता था, “मुझे नहीं लगता कि मेरी कार के लिए दो नए टायर माँगने का अभी सही समय है।”

यद्यपि हमारे स्वर्गिक पिता के साथ हमें यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि उसके पास जाना ठीक है या नहीं। वह न तो अस्थिर स्वभाव का है और न ही जल्दी क्रोध करने वाला। हम हियाव रख सकते हैं कि वह सर्वदा उचित रीति से कार्य करेगा। हम उसे किसी भी बात में अनजान, असमर्थ, अनुपलब्ध या अनिच्छुक नहीं पाएँगे। मसीह के द्वारा वह हमारे हृदय की प्रार्थनाओं और हमारी प्रतिदिन की चिन्ताओं के लिए उपलब्ध और प्रतिक्रियाशील है।

हम परमेश्वर के बच्चे हैं, और हमारे लिए अपने प्रेम को व्यक्त करने के तरीकों में से एक है हमारे लिए उसके उत्तम वरदान। इसलिए उसके प्रत्येक बच्चे में पाया जाने वाला एक गुण कृतज्ञता होना चाहिए। यदि हम अपने पिता के चरित्र को जानते हैं तो हम आभारी होने के अतिरिक्त और क्या हो सकते हैं, तब भी जब उसके वरदान वे न हों जिन्हें हमने स्वयं चुना हो? इसलिए ध्यान से अपनी आशिषों को प्रतिदिन गिना करें। याद रखें कि सभी भली वस्तुएँ उसी की देन हैं। और उससे यह कहा करें:

महान है तेरी विश्वासयोग्यता, हे परमेश्वर मेरे पिता,

न किसी परिवर्तन के कारण तुझ पर छाया पड़ती है…

जो कुछ भी मुझे चाहिए था, तेरे हाथ ने दिया—

महान है तेरी विश्वासयोग्यता, प्रभु, मेरे लिए!  [1]       

भजन संहिता 103

22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण

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22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण
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“तब यहूदा सैनिकों के एक दल को और प्रधान याजकों और फरीसियों की ओर से प्यादों को लेकर, दीपकों और मशालों और हथियारों को लिए हुए वहाँ आया। तब यीशु, उन सब बातों को जो उस पर आने वाली थीं जानकर, निकला और उनसे कहा, ‘किसे ढूँढ़ते हो?’ उन्होंने उसको उत्तर दिया, ‘यीशु नासरी को।’ यीशु ने उनसे कहा, ‘मैं हूँ।’ उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उनके साथ खड़ा था। उसके यह कहते ही, ‘मैं हूँ,’ वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”  यूहन्ना 18:3-6

सुसमाचार के सभी लेखकों ने यीशु के जीवन की समान घटनाओं को वर्णित किया है, परन्तु उनमें से प्रत्येक घटनाक्रम यीशु की पहचान के विशेष विवरण और पहलुओं पर प्रकाश डालता है। यूहन्ना का एक उद्देश्य यह था कि वह यीशु की श्रेष्ठता को और उन सभी परिस्थितियों पर उसकी विजय प्राप्ति को स्थापित करे जो उसका अनादर करने और उसे अपमानित करने के लिए निर्धारित की गई थीं। गतसमनी के बगीचे में यीशु को बन्दी बना लिए जाने पर विचार करें। उसने अपनी इच्छा से किन्तु अधिकारपूर्वक आत्मसमर्पण किया और संसार के उद्धारकर्ता के रूप में अपनी महिमा को प्रकट किया। एक समय ऐसा था जब लोग यीशु पर एक राजा का मुकुट थोपना चाहते थे, परन्तु वह पीछे हट गया था क्योंकि वह जानता था कि सांसारिक राजपद उसके लिए नहीं था (यूहन्ना 6:15)। यहाँ जब सैनिक उस पर एक क्रूस थोपने आए, तो वह जानता था कि आगे क्या-क्या आने वाला था। वे निश्चित रूप से यह उम्मीद कर रहे थे कि इस कुख्यात गलीली बढ़ई को ढूँढने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ेगा। इसके विपरीत, यहाँ वह स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर रहा था, उसकी वाणी में ऐश्वर्य था, उसकी आँखों में एक भाव था और जिस प्रकार उसने अपने आप को प्रस्तुत किया था, उस उपस्थिति ने उस क्षण की गम्भीरता को बढ़ा दिया था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे “पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”

जब यीशु ने उन लोगों के सामने आत्मसमर्पण किया जो उसे ईश-निन्दक और अपराधी मानते थे, तो उसने अपनी पहचान का इनकार नहीं किया। सच यह है कि उसने ऐसी भाषा का उपयोग किया जो उसकी दिव्य पहचान और अधिकार को व्यक्त करती थी। यीशु ने “मैं हूँ” वाक्यांश का प्रयोग न केवल सैनिकों को यह बताने के लिए किया कि वही नासरत का यीशु था, अपितु इस वाक्यांश से उसने अपनी पहचान उस परमेश्वर के रूप में भी दिखाई जो मूसा के सामने जलती झाड़ी में प्रकट हुआ था (निर्गमन 3:14)। यह वही वाक्यांश था जिसके कारण कुछ महीनों पहले उसको लगभग पथराव किए जाने की स्थिति पर पहुँचा दिया था (यूहन्ना 8:58-59), क्योंकि यह एक स्पष्ट दावा था कि वह स्वयं सर्व-विद्यमान, जीवित परमेश्वर था।

अब यहाँ यह परमेश्वर है, जो आगे बढ़कर अपने मित्रों को विरोध करने से रोक रहा है और अपने शत्रुओं को अपनी हत्या कर देने की अनुमति दे रहा है। क्यों? जब मसीह बगीचे में सामने आया तो वह न केवल अपने चेलों की रक्षा कर रहा था अपितु अपने लोगों के लिए प्रावधान भी कर रहा था। वह पापी मनुष्यों के बदले में सामने आया, उस सब की पूर्ति के रूप में जिसकी लम्बे समय से आशा की जा रही थी। वह जानता था कि वह किस ओर कदम बढ़ा रहा था, और वह यह था, “मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिए धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुख उठाया, ताकि हमें परमेश्‍वर के पास पहुँचाए” (1 पतरस 3:18)।

अपने आत्मसमर्पण और दिव्य अधिकार के संयोजन में मसीह ने क्रूस की ओर अगला कदम बढ़ाया, जहाँ उसके बलिदान ने हमारे उद्धार को जीत लिया। वह क्रूस से भागा नहीं, बल्कि दृढ़ता से उसकी ओर बढ़ा। और उसने यह आपके लिए किया।

यह बहुत ही अद्‌भुत बात है,

लगभग इतनी अद्‌भुत कि यह हो भी सके,

कि परमेश्वर का अपना पुत्र स्वर्ग से आए,

और मेरे जैसे बच्चे को बचाने के लिए मर जाए। [1]    
यूहन्ना 18:1-14

21 मार्च : ये देरी क्यों?

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21 मार्च : ये देरी क्यों?
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“पूर्व युग में परमेश्‍वर ने बापदादों से थोड़ा-थोड़ा करके और भाँति–भाँति से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें कर, इन अन्तिम दिनों में हमसे पुत्र के द्वारा बातें कीं, जिसे उसने सारी वस्तुओं का वारिस ठहराया और उसी के द्वारा उसने सारी सृष्टि की रचना की है।”  इब्रानियों 1:1-2

जिस समय में हम जी रहे हैं उसका वर्णन करने के कई तरीके हैं, जैसे कि 21वीं सदी, या आधुनिकता के बाद का समय, या वैश्वीकरण का युग, या फिर प्रौद्योगिकी युग। परन्तु मूल रूप से और बुनियादी रीति से हम “अन्तिम दिनों” में जी रहे हैं। इसके बारे में जानकारी के आधार पर यह वाक्यांश बहुत अनोखा या रोमांचक लग सकता है। सचमुच “अन्तिम दिनों” के विचार के बारे में बहुत भ्रान्ति हो सकती है।

नया नियम इस वाक्यांश का उपयोग केवल यीशु के प्रथम और द्वितीय आगमन के बीच के समय का वर्णन करने के लिए करता है। यीशु आ चुका है,  और यीशु आने वाला है,  और हम उद्धार के इतिहास में उन दो महान पड़ावों के मध्य में जी रहे हैं। उसका पहला आगमन उसके राज्य को पृथ्वी पर लाया और उसने “अन्तिम दिनों” को वर्तमान वास्तविकता के रूप में प्रारम्भ किया। उसका जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण सभी परमेश्वर के आत्मा के कार्य करने को दिखाते हैं और यदि परमेश्वर का आत्मा कार्य कर रहा है, तो यीशु यह सिखाता है, “परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुँचा है” (मत्ती 12:28)। इसलिए जब यीशु एक भीड़ को “परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने” (मरकुस 10:15; लूका 18:17) के लिए निमन्त्रण देता है, तो वह भविष्य के किसी राज्य में प्रवेश करने की बात नहीं कर रहा है बल्कि एक वर्तमान वास्तविकता की बात कर रहा है, अर्थात् यीशु के वर्तमान शासन और राज्य की बात कर रहा है।

तो राज्य अभी इसी समय में  है। परन्तु राज्य उस आने वाले समय में  भी है, कुछ ऐसा जिसे हम भविष्य में पूर्ण रूप से देखेंगे, जब प्रभु यीशु का आगमन होगा। अपने द्वितीय आगमन पर यीशु अपने राज्य को पूरी तरह से स्थापित करेगा। उस समय वह अपने विश्वासियों को प्रसन्नता से ग्रहण करते हुए उनसे कहेगा, “उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिए तैयार किया गया है” (मत्ती 25:34) और “पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है” (यशायाह 11:9)। वह राज्य जो पहले अपने राजा के साथ आया था, वह भविष्य में अपनी सम्पूर्णता और महिमा में पूरी तरह से आ जाएगा।

अतः हम मसीही लोग इस बीच के समय में जी रहे हैं, जिसे “अन्तिम दिन” कहा जाता है। जो लोग मसीह में हैं वे अब नई सृष्टि हैं, किन्तु उन्हें अभी तक उस नई सृष्टि के सभी लाभ और आशिषें प्राप्त नहीं हुई हैं। तब तक के लिए विश्वासी लोग पाप से भरे इस पतित संसार में इस वर्तमान युग में रहते हैं और उस आने वाले युग की आकांक्षा करते हैं।

फिर क्यों ऐसा है कि मसीह के प्रथम और द्वितीय आगमन के बीच का समय इतना लम्बा लगता है? ये देरी क्यों? इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने सोच-समझकर यीशु के आगमन को विलम्बित कर रखा है, जिससे कि अधिक से अधिक लोगों को उसके द्वारा बोले गए वचनों को सुनने, मन फिराने और विश्वास करने का अवसर मिले (2 पतरस 3:9)। अन्तिम दिन वे दिन हैं जब राज्य में प्रवेश करने का अवसर उपलब्ध है, इससे पहले कि द्वार बन्द कर दिया जाएगा।

चूंकि हम यह जानते हैं कि हम किस युग में रह रहे हैं और किसके आगमन से इसका समापन हो जाएगा, तो फिर “[हमें] कैसे मनुष्य होना चाहिए?” (2 पतरस 3:11)। पवित्रशास्त्र हमें बताता है, “यत्न करो कि तुम शान्ति से उसके सामने निष्कलंक और निर्दोष ठहरो, और हमारे प्रभु के धीरज को उद्धार समझो” (2 पतरस 3:14-15)। दूसरे शब्दों में, यदि “अन्तिम दिन” आज समाप्त हो जाएँ और प्रभु यीशु अपनी महिमा में लौट आए, तो यह सुनिश्चित करें कि आप ऐसा जीवन जी रहे हों जो उसे प्रसन्न करता हो और ऐसे शब्दों को बोलने के तरीके खोज रहे हों जो उसकी उद्‌घोषणा करते हों।       लूका 17:20-37

20 मार्च : कृपापूर्वक आभार

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20 मार्च : कृपापूर्वक आभार
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“उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाओ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको, और पिता का धन्यवाद करते रहो, जिसने हमें इस योग्य बनाया कि ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में सहभागी हों।”  कुलुस्सियों 1:11-12

लगभग हर व्यक्ति एक अच्छा उपहार पसन्द करता है। परिवार, आज़ादी, छुट्टी, एक गर्म बिछौना और एक ताजगी से भरा पेय, ये सभी हृदय में आभार उत्पन्न कर देते हैं और हम सभी स्वाभाविक रूप से उनके लिए कम से कम कुछ मात्रा में आभार व्यक्त करने में सक्षम होते हैं। “धन्यवाद” ऐसा शब्द है, जिसे हम बचपन में ही सीख जाते हैं।

अमेरिका के प्रसिद्ध जागृति-प्रचारक जॉनथन एडवर्ड्स ने “स्वाभाविक आभार” और “कृपापूर्वक आभार” के बीच अन्तर स्पष्ट करने में सहायक रीति से काम किया।[1] जो वस्तुएँ हमको दी जाती हैं और उनके साथ जो लाभ मिलते हैं, उनके द्वारा स्वाभाविक आभार का आरम्भ होता है। स्वाभाविक आभार कोई भी व्यक्ति व्यक्त कर सकता है। परन्तु कृपापूर्वक आभार बहुत अलग होता है, और केवल परमेश्वर की सन्तानें ही इसका अनुभव कर सकती हैं और इसे व्यक्त कर सकती हैं। कृपापूर्वक आभार परमेश्वर के द्वारा दिए गए किसी भी उपहार या सुख पर ध्यान दिए बिना उसके चरित्र, भलाई, प्रेम, सामर्थ्य और उत्कृष्टता को पहचानता है। वह जानता है कि हमारे पास परमेश्वर के प्रति आभारी होने का कारण है, फिर चाहे हमारा दिन अच्छा हो या बुरा, चाहे हमारे पास काम हो या न हो, चाहे दैनिक समाचार उत्साहजनक हों या पूरी तरह से निराशाजनक, चाहे हम पूरी तरह स्वस्थ हों या किसी घातक बीमारी का सामना कर रहे हों। ऐसा आभार केवल अनुग्रह से ही पाया जाता है, और यह किसी व्यक्ति के जीवन में पवित्र आत्मा का सच्चा चिह्न होता है। कृपापूर्वक आभार हमें इस जागरूकता के साथ सभी बातों का सामना करने में सक्षम बनाता है कि परमेश्वर हमारे जीवन और परिस्थितियों में गहन रूप से जुड़ा हुआ है, क्योंकि उसने हमें अपने प्रेम के विशेष पात्र बनाया है।

जब चेचक के टीके के कारण जॉनथन एडवर्ड्स की मृत्यु हो गई, तो उनकी पत्नी साराह ने अपनी बेटी को लिखा, “मैं क्या कहूँ? एक पवित्र और भले परमेश्वर ने हमें एक काले बादल से ढक दिया है।” इसमें जो सच्चाई है, उसको देखिए। इसमें खुशी या सन्तुष्टि का कोई ऊपरी अप्रिय दिखावा नहीं है। उनके पति की मृत्यु संयोगवश नहीं हुई थी, बल्कि यह उनके परिवार के विरुद्ध निर्णय लेने की परमेश्वर की सम्प्रभुता थी, जिसने जॉनथन को उसके अनन्त पुरस्कार के लिए घर लाने का सही समय निर्धारित किया था। और इसलिए साराह ने आगे लिखा, “किन्तु मेरा परमेश्वर जीवित है; और मेरा हृदय उसके पास है . . . हम सभी परमेश्वर को सौंप दिए गए हैं: और मैं वहीं हूँ, और वहीं रहना पसन्द करती हूँ।”[2]

दुख के समय में हम कभी भी स्वाभाविक आभार के द्वारा ऐसे शब्द नहीं बोल पाएँगे, जो हमें किसी को खो देने के समय सहायता नहीं कर सकते। ऐसी सोच केवल कृपापूर्वक आभार से ही प्रवाहित हो सकती है। हो सकता है कि आप इस समय कठिन या दिल तोड़ देने वाली परिस्थितियों का सामना कर रहे हों; और यदि आप अभी ऐसी परिस्थिति में नहीं हैं, तो कभी न कभी वह दिन अवश्य आएगा क्योंकि हम एक पतित संसार में जी रहे हैं। किन्तु उन क्षणों में आप परमेश्वर के प्रेम से लिपटे रह सकते हैं और परमेश्वर की भलाई पर भरोसा करने को चुन सकते हैं, जो सबसे स्पष्ट रीति से क्रूस पर व्यक्त हुई है। तब सबसे बुरे समय में भी आप उसकी उपस्थिति के आनन्द को जान पाएँगे और आपके पास सदैव उसे धन्यवाद देने का कारण होगा। यह कह सकने में बल, गरिमा और आराधना है, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)।       

रोमियों 11:33-36

19 मार्च : एक सच्ची नबूवती आवाज

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19 मार्च : एक सच्ची नबूवती आवाज
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“उन्होंने, ‘शान्ति है, शान्ति’ ऐसा कह कहकर मेरी प्रजा के घाव को ऊपर ही ऊपर चंगा किया, परन्तु शान्ति कुछ भी नहीं है।”  यिर्मयाह 8:11

जब हमारा सामना किसी गम्भीर रोग होता है, तो हममें से कोई भी नौसिखिए डॉक्टर से इलाज नहीं कराना चाहता। कल्पना करें कि आप ऐसे डॉक्टर के पास जाते हैं, जो माँस के सड़ जाने का इलाज केवल एक अच्छी सी पट्टी बाँधकर कर देता है, आपको आपकी परेशानी के बदले में कुछ अच्छे शब्द लिखकर देता है और आपको एक सुखद शाम की शुभकामनाएँ देता है। इससे आपको पहले से अच्छा महसूस हो सकता है, किन्तु इससे समस्या का समाधान नहीं होगा और जल्द ही आपकी हालत पहले से भी खराब हो जाएगी!

पुराने नियम के समय में, भविष्यद्वाक्ताओं का कार्य परमेश्वर के वचन को बोलना और परमेश्वर के लोगों को उसकी वाचा का पालन करने के लिए प्रेरित करना होता था। परमेश्वर अपना वचन भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में डालता था, और वे वही घोषणा करते थे जो परमेश्वर कहता था, न कि जो उनके अपने मन में आता था। और प्रायः उनका सन्देश होता था, सावधान हो जाओ! न्याय आने वाला है।  यह बिल्कुल भी सुखद घोषणा नहीं थी!

क्योंकि परमेश्वर का सन्देश इतना चुनौतीपूर्ण था, इस कारण झूठे भविष्यद्वक्ता बहुत हो गए थे और एक तरह से जो कुछ वे चाहते थे, वह सब उनको प्राप्त हो जाता था। उन्हें भविष्यद्वक्ता के रूप में जाना जाता था और वे बड़ी-बड़ी बातें बोल सकते थे और साथ ही वे लोगों को वे बातें भी कह सकते थे, जो वे सुनना चाहते थे। झूठा भविष्यद्वक्ता उस नौसिखिए डॉक्टर के समान होता था, जो लोगों से कहता था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, जबकि वास्तव में स्थिति निराशाजनक होती थी। यह सुनना अच्छा लगता है कि सब कुछ ठीक है और आपके देश में शान्ति का वास है, जब तक कि शत्रु दरवाज़े पर न दिखाई दे। तब यह आवश्यक हो जाता है कि आप तैयार रहें।

जबकि सच्चे भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के आने वाले न्याय के बारे में बात करते थे, तौभी उनका सन्देश लोगों को अपने आप में सन्तुष्ट रहने के विरुद्ध चेतावनी भी देता था और उन्हें निराशा के विरुद्ध प्रोत्साहित भी करता था। परमेश्वर ने सर्वदा अपने लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का आश्वासन दिया है, उनके लिए एक अति-उत्तम भविष्य की प्रतिज्ञा की है। न्याय से सामना होने पर उनकी एकमात्र आशा परमेश्वर से अलग  शरण मिलने में नहीं, बल्कि परमेश्वर में  शरण मिलने में होती थी।

हमारे समय में भी झूठे भविष्यद्वक्ता भरे पड़े हैं। उनके शब्द किसी समारोह के सामान्य प्रारम्भिक वक्ता की झूठी प्रशंसा में सुनाई दे जाते हैं, जैसे कि “आप इस समाज के अब तक के सबसे बढ़िया युवा लोग हैं। भविष्य आपके हाथों में है। आप उड़ान भरने के लिए तैयार हैं!” परन्तु इसी तरह की उथली बातें बहुत सी कलीसियाओं में भी बोली जाती हैं, जिनकी शिक्षा में अस्पष्ट सामान्य बातें और श्रोताओं के लिए कथित रूप से प्रेरणादायक आधे-अधूरे सत्य शामिल होते हैं; और आधा-सत्य, आधा-झूठ भी होता है।

हमें अपने समय में भी सच्ची भविष्यद्वाणी की आवाज की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी यिर्मयाह के समय में परमेश्वर के लोगों को थी। हमारी कलीसियाओं, हमारे राष्ट्र और पूरे संसार को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो सच बोलने का साहस रखते हैं, भले ही इससे उपहास और अस्वीकृति मिले, जैसे कि पाप के बारे में बोलना, इस बात पर जोर देना कि परमेश्वर के कुछ नैतिक मानक हैं, न्याय की चेतावनी देना, यीशु के भविष्य में पुनः आगमन की घोषणा करना और इस प्रकार केवल उसकी ओर संकेत करने में सक्षम होना, जो बचा सकता है।

परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह ऐसे व्यक्तियों को खड़ा करे जो परमेश्वर के वचन से और परमेश्वर के आत्मा की अधीनता में अपने श्रोताओं को चुनौती देने के लिए तैयार हों। प्रार्थना करें कि जब आप ऐसी आवाज के माध्यम से परमेश्वर के वचन का सच में प्रचार होते हुए सुनें, तो आप आत्म-सन्तुष्टि से अपने आप को बचा सकें, सुनने के लिए तैयार हों, और परमेश्वर में अर्थात् अपनी एकमात्र आशा में शरण लेने के लिए तैयार रहें। और प्रार्थना करें कि आपके आस-पड़ोस में और आपके कार्यस्थल में आप वही आवाज बन सकें।       

1 थिस्सलुनीकियों 5:1-11

18 मार्च : विजयी सिंह

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18 मार्च : विजयी सिंह
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“तब मैं फूट फूटकर रोने लगा, क्योंकि उस पुस्तक के खोलने या उस पर दृष्टि डालने के योग्य कोई न मिला। इस पर उन प्राचीनों में से एक ने मुझ से कहा, ‘मत रो; देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिए जयवन्त हुआ है।’ तब मैं ने उस सिंहासन और चारों प्राणियों और उन प्राचीनों के बीच में, मानो एक वध किया हुआ मेमना खड़ा देखा।”  प्रकाशितवाक्य 5:4-6

हममें से कई लोगों ने बचपन में अपने माता-पिता से यह सुना होगा, “क्या तुम्हें . . . याद रहा?” इसका एक उदाहरण इस प्रकार है; जब भी मैं किसी के घर से लौटता था, तो मुझे प्रायः यह सुनने को मिलता था, “क्या तुम्हें धन्यवाद कहना याद रहा?” मुझे कोई नई बात बताए जाने की आवश्यकता नहीं होती थी; मुझे केवल याद रखना होता था। जब यीशु द्वारा उस स्वर्गिक वास्तविकता का दर्शन प्रेरित यूहन्ना ने देखा, तो वह आँसुओं में डूब गया क्योंकि वह डर गया कि कोई भी ऐसा नहीं है जो संसार के रहस्यों को देख सके और उसके पहली सदी के अनुभव की परेशानियों का अर्थ बता सके। किन्तु यूहन्ना को कोई नई जानकारी दिए जाने की आवश्यकता नहीं थी। उसे केवल वह याद दिलाए जाने की आवश्यकता थी, जो वह पहले से जानता था। उसने मूलभूत बातों को भूलकर गलती की थी।

यूहन्ना से कहा गया कि वह रोए नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की ओर देखे जो पुस्तक को खोल सकता है। जब वह मुड़ा तो उसने “मानो एक वध किया हुआ मेमना खड़ा देखा।” मेमने के घाव मसीह की मृत्यु की याद दिलाते थे, जिनके द्वारा उसने उद्धार को जीता था। किन्तु यह मेमना खड़ा था, जो उसके पुनरुत्थान की विजय का प्रतीक था। यहाँ इस दर्शन में हम यीशु को देखते हैं, जो परम-दयालु और सर्वशक्तिमान है। वह मेमना है, और वह सिंह है। वह पूरे संसार की आराधना और आज्ञाकारिता के योग्य है और उसकी मांग करता है और उसे वह अवश्य मिलेगी।

यूहन्ना के आँसुओं का समाधान यीशु था, ठीक वैसे ही जैसे हमारे अपने भय के आँसुओं का समाधान भी वही है, विशेषकर तब जब हम महसूस करते हैं कि सारा संसार हमारे विरुद्ध हो गया है, हम थक चुके हैं, छोटे, निर्बल और अधिकारहीन हैं, और जब यह मान लेने का प्रलोभन हमारे सामने आता हैं कि यह संसार किसी के नियन्त्रण में नहीं है और इसमें केवल अराजकता का बोलबाला है।

हममें से कोई नहीं जानता कि कोई दिन क्या लेकर आएगा या किसी रात में क्या घटित हो जाएगा। ये रहस्य केवल परमेश्वर के अधिकार में हैं। परन्तु हम कितने महान अनुग्रह का अनुभव करते हैं, जब परमेश्वर हमारे कन्धे पर थपथपाकर हमें हमारी बाइबल की ओर मोड़ते हुए कहता है कि क्या तुम भूल रहे हो कि यहूदा के गोत्र का सिंह वास्तव में विजय प्राप्त कर चुका है, कि नियन्त्रण उसके हाथ में है, कि भविष्य उसके अधिकार में है, कि वह राजा है?  यीशु ने पहले ही यूहन्ना से कह दिया था, “मत डर; मैं प्रथम और अन्तिम और जीवता हूँ; मैं मर गया था, और अब देख मैं युगानुयुग जीवता हूँ; और मृत्यु और अधोलोक की कुंजियाँ मेरे ही पास हैं” (प्रकाशितवाक्य 1:17-18)।

इसलिए जब आप वर्तमान या भविष्य से निराश या पराजित या परेशान महसूस करें, तो माँग केवल यही है कि जो आप पहले से जानते हैं उसे याद रखें। यहूदा के सिंह की ओर देखें, जो हमारे लिए वध किया गया मेमना है। वह योग्य है और सक्षम है कि वह पुस्तकों को खोल सके और इस संसार के इतिहास को उसके अन्त की ओर, अर्थात् उसके पुनः आगमन और महिमा में हमारे प्रवेश की ओर ले जा सके।       

प्रकाशितवाक्य 5

17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा

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17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा
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“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी विनती के द्वारा, और यीशु मसीह की आत्मा के दान के द्वारा, इसका प्रतिफल मेरा उद्धार होगा।”  फिलिप्पियों 1:19

क्या आपके जीवन में ऐसे लोग हैं, जिनके लिए आप इसलिए प्रार्थना नहीं करते क्योंकि आपको लगता है कि उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं है? हमारे सीमित मानवीय दृष्टिकोण में यह सहज बात हो सकती है कि हम उन लोगों को अनदेखा कर दें, जो बाहर से पूरी तरह व्यवस्थित दिखते हैं। किन्तु सच्चाई यह है कि हम सभी को दूसरों की प्रार्थनाओं की आवश्यकता होती है और हमें उन प्रार्थनाओं से लाभ भी होता है।

जब प्रेरित पौलुस जेल में था, तो उसने फिलिप्पियों की कलीसिया को लिखा और कहा कि वह जानता है कि उसका छुटकारा न केवल पवित्र आत्मा की सहायता से होगा, परन्तु परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाओं के द्वारा भी होगा। चाहे उसका तात्पर्य अपनी तात्कालिक कठिनाइयों से छुटकारा हो या उसे मसीह की उपस्थिति में ले जाने वाला अन्तिम उद्धार, पौलुस चाहता था कि फिलिप्पी में उसके मसीही मित्र यह जानें कि सेवाकार्य में बने रहने के लिए वह दूसरों की प्रार्थनाओं पर निर्भर था।

ऐसा उसने केवल इस मण्डली को ही नहीं कहा था। जब पौलुस ने रोम के मसीहियों को लिखा तब भी उसने यही बात कही थी, “हे भाइयो, हमारे प्रभु यीशु मसीह के और पवित्र आत्मा के प्रेम का स्मरण दिला कर मैं तुम से विनती करता हूँ कि मेरे लिए परमेश्‍वर से प्रार्थना करने में मेरे साथ मिलकर लौलीन रहो कि मैं . . . बचा रहूँ” (रोमियों 15:30-31)। वह चाहता था कि वे साथ मिलकर संघर्ष करें और ताजगी से भरे रहें। वह चाहता था कि उसकी सेवा संतों के लिए सहायक हो। वह चाहता था कि उसे उद्धार मिले। और उसने उनसे कहा कि यह सब उनकी प्रार्थनाओं के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है! जैसा कि प्रसिद्ध अंग्रेज प्रचारक सी.एच. स्पर्जन ने कहा था कि प्रार्थना वह रस्सी है जो परमेश्वर की उपस्थिति में लगी घंटियाँ बजाती है।[1] परमेश्वर के प्रावधान में यह उसकी पद्धति, उसकी योजना और उसकी शक्ति को खोल देती है।

परमेश्वर को पुकारो, यही वह बात है जो पौलुस हमें करने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि हम परमेश्वर के आत्मा को एक ऐसे तरीके से कार्य करते देखना चाहते हैं जिसे केवल अलौकिक कहा जा सकता है, तो हमें पहले गम्भीरता से, दीनता से और निरन्तर प्रार्थना करने के लिए तैयार होना होगा। पौलुस के शब्द हमें बताते हैं कि जब हम अन्य संतों के साथ मिलकर काम करते हैं, तो हम उनकी निर्बलताओं में उनकी सहायता कर सकते हैं। हम उनको साहस प्रदान किए जाने की प्रार्थना कर सकते हैं। हम उनके उद्धार में एक भूमिका निभा सकते हैं।

आप किसे जानते हैं, जिसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? क्या आप लगन के साथ, साहसिक रूप से और हठ के साथ उनके लिए प्रार्थना करेंगे? और आप किसे जानते हैं जो बाहर से ऐसा नहीं दिखता कि उसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? वास्तविकता यह है कि उन्हें भी इसकी आवश्यकता है! क्या आप उनके लिए भी इसी प्रकार प्रार्थना करेंगे?      

 फिलिप्पियों 1:3-11

16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति

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“जिनकी [तुम्हारी] रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिए, जो आने वाले समय में प्रगट होने वाली है, की जाती है। इस कारण तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अभी कुछ दिन के लिए नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुख में हो।”  1 पतरस 1:5-6

दुख के बारे में हमें दो बातें स्वीकार करने की आवश्यकता है, पहली कि दुख वास्तव में होता है,  और दूसरी कि यह कष्ट देता है।  कष्ट हर किसी के जीवन की वह वास्तविकता है, जो कभी न कभी अवश्य ही आता है। ऐसा कष्ट कई रूपों में आता है, जिसमें मानसिक कष्ट सबसे बड़ा है।

संगी विश्वासियों को दुख के बारे में लिखते समय पतरस ने कहा कि दुख अनेक और विभिन्न तरीके से आ सकता है। पतरस के पहले पाठकों को जो विशिष्ट दुख था, वह मानसिक पीड़ा थी जो कठिनाइयों को सहते रहने से आती है, किन्तु पतरस भली-भाँति जानता था कि ऐसी कई प्रकार की परीक्षाएँ होती हैं, जो हमारे मनों को परेशान करती हैं और हमारी आत्माओं को कुचल देती हैं।

सुसमाचार के कारण पतरस अपने लेख का समापन निराशा और हताशा की स्थिति में नहीं करता। इसके विपरीत, वह हमें ऐसी प्रतिज्ञाएँ देता है, जिन पर हम विश्वास कर सकते हैं।

सबसे पहले, पतरस हमें याद दिलाता है कि हमारी परीक्षाएँ केवल “कुछ दिन” के लिए हैं। अब, “कुछ दिन” को अनन्त काल के प्रकाश में समझने की आवश्यकता है। यहाँ तक कि जीवन भर का समय भी सदा काल की तुलना में “कुछ दिन” ही है! इस प्रकार, इस जीवन में कष्ट का एक लम्बा समय भी परमेश्वर की व्यवस्था में और उसकी सन्तानों के लिए उसकी योजना और उद्देश्य के सन्दर्भ में “कुछ दिन” है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस तरह के कष्ट का समय थोड़ा महसूस होगा,  विशेषकर जब हम कष्ट के मध्य में हों। कई लोगों के लिए कष्ट का अर्थ यह होता है कि एक मिनट भी एक दिन जैसा लगता है, एक दिन एक साल जैसा लगता है, और एक साल कभी न समाप्त होने वाला समय लगता है। किन्तु हम इस प्रतिज्ञा से लिपटे रह सकते हैं और हमें रहना भी चाहिए कि हमारी वर्तमान विपत्ति अनन्त काल के लिए हमारा अन्त नहीं है। हो सकता है कि आज आपका जीवन दुख से भरा हो, परन्तु एक दिन, “उस अन्तिम समय में,” आप उद्धार से भर जाएँगे।

दूसरी बात, हम हियाव के साथ कह सकते हैं कि दुख के प्रत्येक क्षण में परमेश्वर उपस्थित होता है। तरसुस के शाऊल के हृदय परिवर्तन के वृतान्त में हम पाते हैं कि यीशु अपने लोगों के दुख के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है। वह कहता है, “हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे  क्यों सताता है?” (प्रेरितों 9:4, अतिरिक्त महत्त्व जोड़ा गया)। जब यीशु स्वर्ग में था तो वह “मुझे” कैसे कह सकता था? इसका कारण यह था कि आत्मा के माध्यम से मसीह अपने लोगों के साथ उपस्थित था। वह उनके साथ पूर्ण एकता में खड़ा था। जब वे घाटियों से होते हुए अपने अन्तिम उद्धार के दिन की ओर बढ़ रहे थे, उस समय उसका आत्मा उनकी रक्षा करते हुए उनके साथ था। वह हमारे लिए भी ऐसा ही करता है।

आपके पास प्रभु यीशु के रूप में एक महान महायाजक है, जो आपकी निर्बलताओं में आपके साथ दुखी होने में पूरी तरह सक्षम है (इब्रानियों 4:15)। जब इस झूठ पर विश्वास करने का प्रलोभन आपके सामने आए कि परमेश्वर ने आपको छोड़ दिया है या फिर यह कि कोई नहीं समझ सकता कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं या आप क्या झेल रहे हैं, तो आप इस बात में हियाव रख सकते हैं कि “हमारे दिल की कोई धड़कन या कोई पीड़ा ऐसी नहीं है, जिसे वह ऊपर बैठा महसूस नहीं कर सकता।”[1] और आप इस बात में भी हियाव रख सकते हैं कि एक दिन सारा दुख पीछे रह जाएगा और आगे केवल महिमा होगी। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसमें आप आज आनन्दित हो सकते हैं, चाहे आज कुछ भी हो।       

1 पतरस 1:3-9

15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना

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15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों।”  इफिसियों 1:3-4

बाइबल इस बात का कोई सीधा उत्तर नहीं देती कि परमेश्वर ने अदन की वाटिका में पतन क्यों होने दिया। वह केवल इतना बताती है कि परमेश्वर सब कुछ पर नियन्त्रण रखता है, यहाँ तक कि उस घटना पर भी।

तथापि इफिसियों को लिखे पौलुस के पत्र में हमें परमेश्वर की अनन्त योजना की एक झलक दी गई है। हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे संसार के अस्तित्व में आने से पहले ही काम कर रहा था और पतन की घटना ने उसे चौंका नहीं दिया था। जब आदम और हव्वा के विद्रोह के परिणामस्वरूप राज्य भ्रष्ट हो गया, तो परमेश्वर पहले से जानता था कि ऐसा होगा। आदम और हव्वा के बनाए जाने से पहले, उनकी अनाज्ञाकारिता से पहले, परमेश्वर उद्धार की योजना बना चुका था।

जब हम परमेश्वर के उद्धार के कार्य के बारे में सोचते हैं जो अन्ततः क्रूस पर पूर्ण हुआ, तो हमें इसे केवल एक संकट के समय में प्रदान किए गए समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके विपरीत, हमें क्रूस को परमेश्वर की अनन्त मंशा से जुड़ा हुआ देखना चाहिए, जिसने अनन्त काल से निश्चय किया हुआ था कि वह यीशु के माध्यम से अपने लिए एक प्रजा को बुलावा देगा और पतन के कारण जो कुछ भ्रष्ट हो चुका है उसे पुनः स्थापित करेगा।

इस योजना में परमेश्वर का उद्देश्य “उसकी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार” था और है तथा यह “उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति” के लिए है (इफिसियों 1:5-6)। परमेश्वर की अनन्त योजना में प्रेरणा केवल मनुष्यों को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं थी—यद्यपि मनुष्य इस कारण से अन्ततः प्रसन्न हो जाते हैं—परन्तु यह प्रेरणा उसके नाम के लिए उसकी चिन्ता थी। उसने निश्चय किया था कि सब कुछ उसके पुत्र प्रभु यीशु के चरणों के अधीन और नियन्त्रण में लाया जाए, जैसा कि होना भी चाहिए। इस प्रकार, छुटकारे की परमेश्वर की अनन्त योजना हमारे बारे में नहीं परन्तु उसके बारे में है। यह हमें प्रभावित अवश्य करती है। यह हमें बदल अवश्य देती है। किन्तु यह सब परमेश्वर के बारे में है। जब तक सुसमाचार हमें उसकी स्तुति करने और उसके लिए जीने के लिए प्रेरित नहीं करता, तब तक हमने इसे ठीक से नहीं समझा है।

परमेश्वर इस संसार का केन्द्र है। पतन के बाद से मनुष्यों ने परमेश्वर के अधिकार को स्वीकार करने से इनकार किया है और साथ ही उसे उसके उपयुक्त स्थान से हटाने का भरसक प्रयास किया है, जिसके परिणाम विनाशकारी हुए हैं। इस वर्तमान जीवन का कोई भी भाग ऐसा नहीं है जो मृत्यु की धूल से ढका न हो, क्योंकि मनुष्य ने यह निर्धारित कर लिया है कि वह इस तथ्य को पसन्द नहीं करता कि परमेश्वर केन्द्र में है।

क्या आप अपने जीवन को पुनः व्यवस्थित करेंगे और इसके प्रत्येक पहलू की देखरेख करने के परमेश्वर के अधिकार को मान्यता देंगे? क्या आप अपनी बढ़ाई के लिए नहीं, परन्तु उसकी स्तुति के लिए और अपने उद्देश्यों के लिए नहीं, परन्तु उसके उद्देश्य के लिए जीने का चुनाव करेंगे? विरोधाभास यह है कि जब आप अपनी नहीं परन्तु उसकी महिमा खोजेंगे, तब आप उस आनन्द का अनुभव करेंगे जो उसके पुत्र को अपने जीवन का केन्द्र मानकर जीने से आता है, जिसकी योजना परमेश्वर ने आपके लिए और समस्त सृष्टि के लिए अनन्त काल से बनाई थी।      

इफिसियों 1:3-14

14 मार्च : आदर्श प्रतिबद्धता

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14 मार्च : आदर्श प्रतिबद्धता
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“नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालेब, जो देश के भेद लेने वालों में से थे, अपने-अपने वस्त्र फाड़कर, इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे, “जिस देश का भेद लेने को हम इधर-उधर घूम कर आए हैं, वह अत्यन्त उत्तम देश है। यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, पहुँचाकर उसे हमें दे देगा।”  गिनती 14:6-8

3 मई 1953 को सिंगापुर से लन्दन जा रहा एक विमान भारत के कोलकाता से 22 मील उत्तर-पश्चिम में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें कोई भी जीवित नहीं बचा। फ्रेड मिशेल, जो दस साल पहले चाइना इनलैंड मिशन के निदेशक बने थे, उस विमान में यात्रा कर रहे थे। उनकी जीवनी में फ्रेड को “एक साधारण व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया था, जो एक गाँव से थे और उनके माता-पिता श्रमिक वर्ग के थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन प्रान्तों में रहते हुए एक रसायनज्ञ के रूप में बिताया और वे परमेश्वर के साथ चलते थे।”[1]

जब तक यपुन्ने का पुत्र कालेब एक भेदी न बना था, जिसे मूसा ने उस देश का भेद लेने के लिए नियुक्त किया था, जिसे देने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अपने लोगों से की थी, तब तक ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह संकेत दे कि वह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण या प्रतिष्ठित था। परन्तु ऐसा लगता है कि निश्चित रूप से उन साधारण अनुभवों में उसकी नीरस जीवन-यात्रा में परमेश्वर ने उस चरित्र को गढ़ा और विकसित किया जो गिनती 14 में प्रकट होता है।

संकट हमारे चरित्र को उजागर कर देता है। जब इस्राएली भेदिए कनान देश का भेद लेकर वापस आए तो उन्होंने वर्णन करते हुए कहा कि उसके नगर गढ़ वाले हैं, और “उन लोगों पर चढ़ने की शक्ति हममें नहीं है; क्योंकि वे हमसे बलवान हैं . . . हम अपनी दृष्टि में उनके सामने टिड्डे के समान दिखाई पड़ते थे” (गिनती 13:31, 33)। और लोग परमेश्वर पर आरोप लगाने लगे कि उसने उन्हें ऐसे देश में भेजा है, जहाँ वे मर जाएँगे (गिनती 14:3)।

कालेब की परमेश्वर के लिए प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वह इतने लोगों की सामान्य राय के विरुद्ध खड़ा होने के लिए तैयार था। जब अन्य भेदियों ने प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश न करने का सुझाव दिया तो उसने उनका विरोध किया। जब सभी लोग परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर रहे थे तो उसने उनका साथ नहीं दिया। वह और उसका विश्वासयोग्य मित्र यहोशू ही थे, जिन्होंने परमेश्वर के प्रति साहसी आज्ञाकारिता का सुझाव दिया।

कालेब को निश्चय था कि परमेश्वर के सामर्थ्य से सब कुछ सम्भव है। उसने दूसरे भेदियों की कही गई बातों की सच्चाई को नकारा नहीं, परन्तु उसने केवल इसे एक अलग दृष्टिकोण से देखा। वह न तो अपनी क्षमता पर और न ही इस्राएलियों की क्षमता पर, किन्तु परमेश्वर के सामर्थ्य और उसके चरित्र की विश्वसनीयता पर भरोसा कर रहा था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जो भय के मध्य में भी विश्वास कर रहा था। वह जानता था कि जिस टिड्डे को परमेश्वर से सहायता प्राप्त हो, वह टिड्डा भी बड़े काम कर सकता है।

यद्यपि हमें लग सकता है कि हमारा जीवन नीरस है, फिर भी हम नीरसता में भी सदैव परमेश्वर को खोज सकते हैं। दैनिक जीवन के साधारण क्षणों में वह हमारे चरित्र को गढ़ेगा कि हम भी प्रत्येक परिस्थिति में साहसी व्यक्ति बन सकें। परमेश्वर अपनी योजनाओं को पूरी करने के लिए बहुत महान लोगों को नहीं ढूँढ रहा है। वह ऐसे साधारण लोगों को ढूँढ रहा है जो उस पर भरोसा करें, विश्वास में आगे कदम बढ़ाएँ और साहसपूर्वक आज्ञा मानने के लिए तैयार हों। आज आपको वैसा व्यक्ति बनने से कोई नहीं सकता।       

गिनती 13:25 – 14:25