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7 मार्च : सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में यीशु

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7 मार्च : सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में यीशु
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“खोजे ने फिलिप्पुस से पूछा, ‘मैं तुझ से विनती करता हूँ, यह बता कि भविष्यद्वक्ता यह किसके विषय में कहता है, अपने या किसी दूसरे के विषय में?’ तब फिलिप्पुस ने अपना मुँह खोला, और इसी शास्त्र से आरम्भ करके उसे यीशु का सुसमाचार सुनाया।”  प्रेरितों के काम 8:34-35

बाइबल का गम्भीरता से अध्ययन करते समय हम जान जाते हैं कि यीशु किसी अप्रत्याशित रूप से अस्तित्व में नहीं आ गया। आरम्भ से लेकर अन्त तक बाइबल की पुस्तक उसी के बारे में बताती है। निस्सन्देह, पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं ने भी आत्मा की प्रेरणा से यीशु के बारे में लिखा। चाहे हम पवित्रशास्त्र को कितनी भी अच्छी तरह से जानते हों, फिर भी यदि हम मसीह से अपनी आँखें हटा लेते हैं तो हम इसके केन्द्र, इसकी कुंजी और इसके नायक को देखने से चूक जाएँगे।

सुसमाचारों में यीशु लोगों का ध्यान पुराने नियम की ओर लाता है, जिससे उन्हें यह समझने में सहायता मिल सके कि वह कौन था। अपने सेवाकार्य के आरम्भ में वह एक बार आराधनालय में यशायाह की पुस्तक से पढ़ रहा था। लूका हमें बताता है कि जब उसने समाप्त किया, तो वह अपने सुनने वालों से “कहने लगा, आज ही यह लेख तुम्हारे सामने पूरा हुआ है” (लूका 4:21)। आगे, पुराने नियम में विशेष रूप से रुचि रखने वाले और उसे अच्छी रीति से जानने वाले लोगों से बात करते हुए यीशु ने उन्हें चेतावनी दी, “तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है” (यूहन्ना 5:39)। अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के बाद जब इम्माऊस के मार्ग में यीशु का सामना अपने कुछ निराश अनुयायियों से हुआ, तो उसने “मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्रशास्त्र में से अपने विषय में लिखी बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया।” (लूका 24:27)।

दूसरे शब्दों में, यीशु ने स्पष्ट रूप से यह शिक्षा दी कि पुराने नियम का प्रत्येक भाग उसी में अपना केन्द्र और पूर्णता पाता है।

जब आप पवित्रशास्त्र पढ़ते हैं तो आपकी मुलाकात यीशु से होती है, क्योंकि यह पुस्तक उसी की गवाही देती है। भले ही पुराने नियम के खण्डों का हमारा अध्ययन और समझ हमें जीवन के बारे में अच्छे और महत्त्वपूर्ण नैतिक सत्य प्रदान करते हैं, फिर भी एक बहुत बड़ा संकट यह है कि हम उस परम सत्य, अर्थात् यीशु को उसमें न देख पाएँ। आपकी बाइबल के प्रत्येक पृष्ठ का उद्देश्य यह है कि आप यीशु से भेंट कर सकें, उसे जान सकें, और उसके महान नाम की उद्‌घोषणा कर सकें और यह सब उसकी महिमा के लिए हो।

उस प्रत्येक प्रवचन में जिसे आप सुनते हैं, उस प्रत्येक पाठ में जिसका आप अध्ययन करते हैं, और परमेश्वर के वचन के उस प्रत्येक खण्ड में जिसे आप पढ़ते हैं, आप अपने आप से पूछें कि “क्या यह मुझे मसीह तक लेकर आया? क्या मैंने इसमें यीशु को पाया?” और जब तक आप “हाँ” में उत्तर न दे सकें तब तक सुनना, अध्ययन करना और पढ़ना बन्द न करें क्योंकि उद्धार, सत्य, बुद्धि और आश्वासन के खजाने उसी में पाए जाते हैं।       

भजन संहिता 119:17-32

6 मार्च : तू कहाँ है?

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6 मार्च : तू कहाँ है?
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“आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्‍वर से छिप गए . . . तब यहोवा परमेश्‍वर ने पुकारकर आदम से पूछा, ‘तू कहाँ है?’”  उत्पत्ति 3:8-9

जातियों, भाषाओं और भौगोलिक सीमाओं से परे, प्रत्येक स्थान पर बच्चे लुका-छिपी खेलने का आनन्द लेते हैं। यह सारे जगत में खेला जाने वाला भोलेपन से भरा एक खेल है। किन्तु इस संसार में लुका-छिपी का पहला खेल न तो मनोरंजक था और न ही भोलेपन से भरा हुआ। वह बहुत ही चिन्ताजनक था।

बगीचे में आदम और हव्वा अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अंजीर के पत्तों के पीछे एक-दूसरे से और बगीचे के पेड़ों के पीछे अपने सृष्टिकर्ता से छिप गए। उन्होंने छिपे रहने का प्रयास किया, परन्तु परमेश्वर इस एक साधारण प्रश्न के साथ उन्हें खोजने आया, “तू कहाँ है?”

यह प्रश्न इस आम धारणा को उलट देता है कि मनुष्य उस परमेश्वर को ढूँढ रहा है, जो जगत में कहीं या उससे भी परे कहीं छिपा हुआ है। इसके विपरीत, हम इसके उलट पाते हैं कि हम ही छिपे हुए हैं और परमेश्वर हमें ढूँढता हुआ आता है।

परमेश्वर द्वारा इन पहले मनुष्यों से पूछा गया ये प्रश्न विचित्र लग सकता है। क्या परमेश्वर पहले से ही सब कुछ नहीं जानता? आदम और हव्वा कहाँ थे, यह प्रश्न परमेश्वर ने इसलिए नहीं पूछा था कि वह नई जानकारी प्राप्त कर सके, परन्तु इसलिए कि वह उन्हें उनकी परिस्थिति को समझने में सहायता करना चाहता था। परमेश्वर उन्हें बाहर निकालने  से अधिक उन्हें उजागर करने  के लिए आया था।

कल्पना कीजिए कि आदम और हव्वा के विद्रोह के उत्तर स्वरूप परमेश्वर कितने तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था। यदि उसने न्याय करते हुए कठोरता से उत्तर दिया होता, तो वह उसी क्षण मृत्यु-दण्ड ला सकता था जिसके बारे में उसने उन्हें चेतावनी भी दी थी (उत्पत्ति 2:16-17)। किन्तु सदैव दया करना परमेश्वर के स्वभाव में है, इसलिए वह ऐसा करने के विपरीत केवल एक प्रश्न लेकर आया। मानवजाति द्वारा परमेश्वर से मुँह मोड़ने के बाद यह परमेश्वर के अनुग्रह की पहली झलक है। परमेश्वर ने उन्हें उसी समय वह नहीं दिया जिसके वे योग्य थे; परन्तु अपनी असीम दया में से उसने वह दिया जिसके वे योग्य नहीं थे, अर्थात् प्रत्युत्तर देने और लौट आने का एक अवसर।

हम में से कोई भी सहज महसूस नहीं करेगा यदि हमारे सबसे निकटतम लोग हमारे सभी गुप्त विचारों और किए गए कार्यों को देख सकते। हम एक-दूसरे से और सम्भवतः अपने आप से भी सच्चाई छिपा सकते हैं। परन्तु परमेश्वर से छिपाना व्यर्थ है। न तो छिपाने का कोई तरीका है और न ही किसी और पर दोष मढ़ने का कोई तरीका है।

हमें इस झूठ पर विश्वास नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर उन “छोटे” पापों को नहीं देखेगा, जिन्हें हम दूसरों से छिपाते हैं। वह सब देखता है। वह तो हमारी आत्माओं के भीतर देखता है और जानता है कि हमने क्या किया है और हमारी परिस्थिति क्या है। यह बहुत बढ़िया है कि हमें यह दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है कि हम कुछ छिपा सकते हैं। वह हम पर दया करने आता है हमारा न्याय करने नहीं, क्योंकि “परमेश्‍वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए” (यूहन्ना 3:17)। क्या आप किसी सताने वाले पाप या छिपी हुई लज्जा के कारण बोझिल हैं? क्या आप परमेश्वर से भी वह बात छिपाना चाह रहे हैं, जो आप दूसरों से छिपाते रहे हैं? परमेश्वर से छिपाना बन्द करने का सबसे अच्छा समय अब है। ज्योति में आ जाएँ। जो उसके सामने छिपा नहीं रह सकता उसे उजागर करें, ताकि वह उसे अपने लहू से ढक सके और आप जान सकें कि आप को जान लिया गया है और क्षमा कर दिया गया है। वह एक दयालु और बचाने वाला परमेश्वर है, जो हमारे साथ सम्बन्ध स्थापित करने की अभिलाषा रखता है।       1 यूहन्ना 1:8-2:2

5 मार्च : परमेश्वर हमारी ओर है

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5 मार्च : परमेश्वर हमारी ओर है
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“जब किसी की परीक्षा हो, तो वह यह न कहे कि मेरी परीक्षा परमेश्‍वर की ओर से होती है; क्योंकि न तो बुरी बातों से परमेश्‍वर की परीक्षा हो सकती है, और न वह किसी की परीक्षा आप करता है।”  याकूब 1:13

जब हम यीशु मसीह में विश्वास करते हैं और पाप के बन्धन टूट जाते हैं, तो हमारे लिए कई बातें उसी समय से सच हो जाती हैं। हम मृत्यु से जीवन में स्थानान्तरित हो जाते हैं और परमेश्वर का आत्मा हमारे भीतर वास करने लगता है। हम उसके घराने के हो जाते हैं। हम छुटकारा पाए लोग बन जाते हैं, हम में बदलाव हो जाता है और हमारा नया जन्म हो जाता है। पाप अब हमारे जीवनों में प्रभुत्व नहीं करता। किन्तु वह बना  अवश्य रहता है।

मसीह पर भरोसा करने के द्वारा हम ऐसी सहजता का जीवन व्यतीत नहीं करने लग जाते, जिससे हम दुष्ट के हमलों से या अपने हृदय की कपटी इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, हृदय परिवर्तन से लेकर मसीह को देखने और उसके जैसा बनते जाने तक प्रत्येक मसीही व्यक्ति प्रलोभन के विरुद्ध “एक निरन्तर और अपरिवर्तनीय युद्ध”[1] में उलझा रहता है।

पवित्रशास्त्र प्रलोभन के बारे में चेतावनियों से भरा हुआ है, अर्थात् पाप और बुराई के प्रति वह आकर्षण जिसका हम सभी अनुभव करते हैं। प्रलोभन केवल उन वस्तुओं की लालसा का होना ही नहीं है जो निरंकुश और अकल्पनीय हों, परन्तु परमेश्वर ने जो भली वस्तुएँ हमें दी हैं उनका उपयोग (या दुरुपयोग) इस तरह से करना जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप है। स्क्र्यूटेप लेटर्स  में सी. एस. लुईस पाप की इस कुटिलता का उस स्थान पर उल्लेख करते हैं, जहाँ स्क्र्यूटेप अपने प्रशिक्षु दुष्टात्मा को भड़कता है कि “जिन सुखों को हमारे शत्रु [अर्थात्, परमेश्वर] ने उत्पन्न किया है, वह जाकर मनुष्यों को प्रोत्साहित करे कि वे कभी-कभार, ऐसे तरीकों से, या मात्राओं में लें जिन्हें उसने निषिद्ध किया है।”[2]

पवित्रशास्त्र स्पष्ट है कि परमेश्वर कभी भी प्रलोभन का स्रोत नहीं होता और न ही हो सकता है। जब याकूब कहता है कि “परमेश्वर . . . किसी को प्रलोभन में नहीं डालता,” तो वह अपना कथन परमेश्वर के चरित्र पर आधारित कर रहा है। परमेश्वर दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने में इसलिए असमर्थ है, क्योंकि वह स्वयं इससे प्रभावित नहीं होता। दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने के लिए बुराई में हर्षित होने की आवश्यकता पड़ेगी, और परमेश्वर बुराई से प्रसन्न नहीं होता।

जिस शब्द का अनुवाद “प्रलोभन” के रूप में किया गया है, उसका अनुवाद “परीक्षण” के रूप में भी किया जा सकता है। इस प्रकार जिसे हमारा पतित स्वभाव पाप के प्रलोभन में बदल सकता है, वह एक ऐसा परीक्षण भी है जो हमारे विश्वास को दृढ़ कर सकता है। जब हम परीक्षण के समय का सामना करते हैं, जिसकी अनुमति स्वयं परमेश्वर देता है, तो हमें याद रखना चाहिए कि उसका उद्देश्य हमारी विफलता नहीं, बल्कि हमारा लाभ है। शैतान चाहता है कि हम असफल हों, परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम सफल हों। परमेश्वर हमारी ओर है, और वह प्रत्येक बात को, यहाँ तक कि परीक्षण और प्रलोभन भी, हमारी भलाई के लिए कर रहा है।

आप नियमित रूप से किन प्रलोभनों से जूझ रहे हैं (या हार मान रहे हैं)? उन्हें प्रलोभन के रूप में तो देखें, किन्तु अपने चल रहे युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ऐसे अवसरों के रूप में भी देखना सीखें जो आज्ञाकारिता चुनने, अपने पिता को प्रसन्न करने, मसीह के समान बनने के क्षण हैं। “शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा” (याकूब 4:7)।       

1 पतरस 1:13-21

4 मार्च : क्षमा किया गया व्यक्ति और क्षमाशील व्यक्ति

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4 मार्च : क्षमा किया गया व्यक्ति और क्षमाशील व्यक्ति
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“इसलिए जैसे मैं ने तुझ पर दया की, वैसे ही क्या तुझे भी अपने संगी दास पर दया करना नहीं चाहिए था?  मत्ती 18:33

क्षमा किए गए व्यक्ति को क्षमाशील व्यक्ति होना चाहिए, और चूंकि क्षमा करना हमारे लिए स्वाभाविक नहीं है, इसलिए हमें इस बात को बार-बार सुनने की आवश्यकता है।

दूसरे शब्दों में हम क्षमा इसलिए करते हैं, क्योंकि यीशु के द्वारा परमेश्वर हमें क्षमा करता है। बाइबल इस बात को पूरी तरह से स्पष्ट कर देती है कि क्षमा करने का भाव किसी मानवीय गुण से उत्पन्न नहीं होता और यह दूसरों के प्रति दयालु और क्षमाशील होने के हमारे अपने प्रयासों का परिणाम नहीं है, परन्तु यह परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा आता है।

इस कारण, किसी व्यक्ति द्वारा अपने पापों का वास्तव में पश्चाताप करने का एक मुख्य प्रमाण उसमें क्षमा करने की भावना का होना है। इसके विपरीत, यदि हम लगातार अपने हृदयों में शत्रुता, द्वेष और कड़वाहट रखते हैं तो हम न केवल अपने जीवनों को हानि पहुँचाते हैं और अपने सम्बन्धों को संकट में डालते हैं, अपितु सच कहें तो हम यह प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या हमने सच में परमेश्वर की क्षमा की प्रकृति को समझा भी है।

वास्तविक रूप से क्षमा प्रदान करना तब तक असम्भव है, जब तक हमने इसका अनुभव स्वयं नहीं किया है, और यदि हमने इसका अनुभव किया है तो ऐसा न करना असम्भव बात है। यह हमारे हृदय से तभी प्रवाहित होगी, जब हम परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा बदले जा चुके होंगे और उसके विरुद्ध अपने अपराध की भयावहता पर विचार कर चुके होंगे। जब ऐसा परिवर्तन आ जाता है, तो लोगों ने जो हमारे विरुद्ध पाप किए हों उनका भार कम हो जाएगा क्योंकि, जिस प्रकार हमें क्षमा मिल चुकी है उसी प्रकार परमेश्वर हमें भी क्षमा करने में सक्षम बना देता है।

मत्ती 18 में सेवक के बारे में यीशु के दृष्टान्त के पीछे यही सिद्धान्त है। आज के समय के अनुसार देखा जाए, तो जिस सेवक का पहली सदी में आज के हिसाब से 70 हजार करोड़ रुपए का ऋण माफ कर दिया गया था, उसने 17 लाख रुपए का ऋण माफ करने से इनकार कर दिया। यीशु चाहता है कि हम उस सेवक की नासमझी को देखें जिसका इतना बड़ा ऋण माफ कर दिया गया था और फिर भी वह उस ऋण को माफ करने से इनकार कर रहा था जो उसका किसी दूसरे पर बकाया था। अपने आप में देखा जाए तो वह ऋण बहुत बड़ा था, किन्तु उस राशि की तुलना में जो उसके लिए माफ की गई थी, वह बहुत छोटा था। इसी प्रकार यह बात समझ से परे लगती है कि हम कभी भी दूसरों को क्षमा न करें, जबकि परमेश्वर के विरुद्ध हमारे अपराध के इतने बड़े ऋण को क्षमा कर दिया गया है।

 यदि हमने परमेश्वर की दया का अनुभव किया है, तो निश्चित रूप से हमें क्षमा करने को अनदेखा नहीं करनी चाहिए। दूसरों को क्षमा करने में हमें परमेश्वर की क्षमा की पूर्णता का आनन्द मिलता है। जिन पापों के अभिलेखों को थामे रहने के लिए आप प्रलोभित होते हैं, उन्हें त्याग दें। जब ऐसा करना कठिन लगे क्योंकि जिस गलती को आपको क्षमा करने के लिए कहा जा रहा है वह बड़ी है, तब उस ऋण को देखें जिसे परमेश्वर ने आपके लिए क्षमा किया है और देखें कि ऐसा करने के लिए उसने क्या त्याग किया है, तो ये बातें आपको अपनी ओर से दया दिखाने में सक्षम बना देंगी। यदि परमेश्वर ने आपको क्षमा किया है, तो वह दूसरों के साथ सद्‌भाव में चलने में आपकी सहायता करने के लिए अपनी दया और अनुग्रह अवश्य उण्डेलेगा।       
मरकुस 11:20-25

3 मार्च : आत्मा में विश्राम

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3 मार्च : आत्मा में विश्राम
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“इसलिए जब कि उसके विश्राम में प्रवेश करने की प्रतिज्ञा अब तक है, तो हमें डरना चाहिए ऐसा न हो कि तुम में से कोई जन उससे वंचित रह जाए। क्योंकि हमें उन्हीं की तरह सुसमाचार सुनाया गया है, पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुनने वालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा।”  इब्रानियों 4:1-2

प्रायः मसीही लोग छुट्टी मनाने में तो बहुत कुशल होते हैं, किन्तु वे विश्राम करने में उतने ही खराब होते हैं। ऐसा क्यों है? एक कारण यह हो सकता है कि पश्चिमी संस्कृति सफलता और समृद्धि के उच्चतर स्तरों को लगातार खोजते रहने को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है। यहाँ तक कि हमारा छुट्टी का समय भी “गतिविधियों में व्यस्त रहने” और कुछ न कुछ सुधार करने तथा सफल होने की अभिलाषा से भरा होता है। और इसके पीछे प्रत्येक संस्कृति का रोग छिपा होता है, अर्थात् उस परमेश्वर से हमारा अलगाव जिसने हमें सृजा और हमें काम करने तथा विश्राम करने के लिए बनाया है।

जब से संसार में पाप आया है, तब से विश्राम मानवजाति से लुप्त होता गया है। मानवजाति के बारे में आप चाहे कोई भी अन्य बात क्यों न कहें, फिर भी यह तथ्य निर्विवाद है कि हममें शान्ति या विश्राम दिखाई नहीं देता। यदि शान्ति के कुछ क्षण पाने के लिए आपने अथक परिश्रम किया हो या फिर आप अपने छुट्टी के समय को गतिविधियों से भर देते हैं, तो वह छुट्टी का समय विश्राम करना नहीं है। निश्चित रूप से परमेश्वर कुछ और चाहता है।

परमेश्वर एक ऐसा विश्राम प्रदान करता है, जो हमारी आत्माओं को शान्त करता है। आत्मा में विश्राम उस जीवन से प्रवाहित होता है, जो विश्वास में उसके प्रति समर्पित होता है। जब पाप के कारण आई मृत्यु की धूल मानवजाति पर जम गई, तब से हम उस गहन विश्राम का आनन्द लेने में असमर्थ हो गए जो परमेश्वर ने चाहा था। हमें आवश्यकता है एक नई उत्पत्ति की, और परमेश्वर ने ठीक वही हमें प्रदान कर दिया है! “यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है” (2 कुरिन्थियों 5:17)। सृष्टि के सृजन में परमेश्वर ने शारीरिक विश्राम के सिद्धान्त की स्थापना की और छुटकारे में उसने पूर्ण आत्मिक विश्राम की सम्भावना स्थापित की। फिर भी सभी प्रकार के लोग, जिनमें कुछ मसीही होने का दावा करने वाले लोग भी सम्मिलित हैं, परमेश्वर के प्रति अनादर के साथ अपना जीवन जीने पर अड़े रहते हैं। वे अपनी आत्माओं को विश्राम देने के उसके निमन्त्रण को ठुकरा देते हैं और इस प्रकार केवल वचन के सुनने वाले बने रहते हैं, उस पर चलने वाले नहीं (याकूब 1:22)। और फिर वे मरने पर विश्राम में अपने प्रवेश कर लेने की आशा करते हैं। बाइबल जीवन के प्रति ऐसे दृष्टिकोण को कोई आशा प्रदान नहीं करती है। जिस तरह मरुभूमि में इस्राएलियों के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ ठहरीं क्योंकि वे उन पर विश्वास करने में विफल रहे, उसी तरह यदि हम भी अपने विश्वास रहित प्रयासों में लगे रहेंगे तो इस जीवन में या आने वाले जीवन में आत्मा में विश्राम प्राप्त करने के परमेश्वर के वरदान को जानने की आशा नहीं कर सकते।

धन्यवाद है कि यीशु में सब कुछ निश्चित हो जाता है। वह खोखले धार्मिक दिखावे और निराशाजनक सांसारिक प्रयासों के मुखौटे को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़कर हमें यह अनुग्रहकारी निमन्त्रण देता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। यह एक ऐसा विश्राम है जिसका हम काम करते हुए भी आनन्द उठाते हैं, एक ऐसा विश्राम जो वास्तव में हमें हमारे काम से विश्राम पाने में सक्षम बनाता है, और एक ऐसा विश्राम जिसका हम अन्ततः एक दिन पूरी तरह से और अनन्त काल तक उसकी उपस्थिति में आनन्द लेंगे। क्या आपकी आत्मा में आज विश्राम है? या आप इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि कल क्या होगा या फिर आपके अनुसार जो आज आपको पा लेना चाहिए था, उसके बारे में सोचते हुए थक गए हैं? वह कार्य जो आपकी सबसे बड़ी अभिलाषा को तृप्ति प्रदान करता है और आपकी सबसे बड़ी आवश्यकता का समाधान करता है, वह उद्धार का कार्य यीशु ने कलवरी में आपकी ओर से पूरा कर दिया था। वह आपको यह जानने के लिए अपने पास आने का निमन्त्रण देता है कि उसने आपके अनन्त भविष्य का समाधान कर दिया है और वे कार्य जो उसने आज आपके लिए निर्धारित किए हैं वे सभी पूरे होकर रहेंगे, न उससे अधिक और न उससे कम। इसलिए उस पर विश्वास  करें और अपनी आत्मा को वास्तव में विश्राम करने दें.  इब्रानियों 4:1-10

2 मार्च : मेरे हाथ में कुछ भी नहीं

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2 मार्च : मेरे हाथ में कुछ भी नहीं
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“मसीह ने जो हमारे लिए शापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के शाप से छुड़ाया, क्योंकि लिखा है, ‘जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह शापित है।’ यह इसलिए हुआ कि अब्राहम की आशीष मसीह यीशु में अन्यजातियों तक पहुँचे, और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें जिसकी प्रतिज्ञा हुई है।”  गलातियों 3:13-14

यीशु में विश्वास करने वाले लोगों के रूप में हमें पाप के बड़े अभिशाप से छुटकारा मिल चुका है। इस छुटकारे का आश्चर्य हमें उसी क्षण मोह लेता है जब हम इस बात को समझ जाते हैं कि यह अभिशाप, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के समक्ष हम दोषी हैं और मृत्यु के योग्य हैं, मसीह के द्वारा हमसे हटा लिया गया है।

बचाए जाने के बाद भी इस आश्चर्य का खत्म हो जाना और इस बात की मनोहरता का कम हो जाना एक सरल बात है। हम इतनी सरलता से सुखद और आरामदायक जीवन जीना आरम्भ कर सकते हैं कि हम पर जो पाप की पकड़ है, उसे देखना कठिन हो जाता है। इतनी सरलता से हम यह मानने लग जाते हैं कि यदि हम अपने वैवाहिक सम्बन्धों, अपनी नौकरी, अपने सम्बन्धों में और अपनी सफलता पर थोड़ा और प्रयास करें तो हम भले लोग बन सकते हैं तथा आशीष के पात्र बन सकते हैं। हम विश्वासी लोग नहीं बनना चाहते, बल्कि सफल व्यक्ति बनना चाहते हैं। निरन्तर हम अपने स्वयं के प्रयासों पर आधारित झूठे धर्म की ओर प्रलोभित होते रहते हैं।

गलातियों की कलीसिया के सामने भी यही प्रलोभन था। इसीलिए पौलुस ने उन्हें लिखा और अनिवार्य रूप से कहा कि मसीही सन्देश यह है ही नहीं।  वास्तविकता तो यह है कि यह इसके पूरी तरह उलट है! यदि सुसमाचार यह है कि यीशु केवल हमारे जीवन में व्याप्त किसी कमी को पूरा करने के लिए आया था, तो फिर या तो व्यवस्था का अभिशाप कोई चिन्ता की बात नहीं है या फिर उपचार हो सकने से परे है। किन्तु अभिशाप तो वास्तविक है और इसका समाधान होना भी आवश्यक है। जब तक हम पहले यह नहीं समझ लेते कि हम उस अभिशाप के पात्र हैं, जिसे उसने अपने ऊपर ले लिया तब तक हम किसी ऐसे व्यक्ति में क्यों रुचि लेंगे जो हमारे स्थान पर मर गया?

इस अभिशाप का प्रभाव देखने के लिए हमें केवल मूसा की व्यवस्था को देखने की आवश्यकता है (उदाहरण के लिए, निर्गमन 20:1-17 देखें)। व्यवस्था बताती है कि किस तरह से हमने अपने सम्पूर्ण हृदय से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है। हमने उसकी आज्ञा नहीं मानी है। हमने दूसरों से अपने जैसा प्रेम नहीं किया है। हमने हर बात में सच नहीं बोला है। हम लालच करने के दोषी हैं। यह सूची बहुत लम्बी है। यद्यपि जब परमेश्वर का आत्मा हमें दोषी ठहराता है और हम अपनी कमियों को देखने लगते हैं, तो हम इस भजन के लिखने वाले के साथ गाने लग जाते हैं कि “मेरे हाथों के काम तेरी व्यवस्था की मांगों को पूरा नहीं कर सकते।”[1] हम उस अभिशाप के बोझ को देखते हैं, जो कभी हम पर था और अभी भी हम पर होना चाहिए था, और तब हम मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में उसकी सारी महिमा में देखते हैं, जो उस बोझ को ले लेने के लिए आया था।

यह हमारे विश्वास का मूल है। जब हम क्रूस पर दृष्टि करते हैं और देखते हैं कि किस प्रकार से यीशु वहाँ लटका हुआ था, तब हम देख पाते हैं कि उसने जो किया वह आवश्यक था और उसकी अपनी इच्छा से किया गया कार्य था। उसने वह स्थान ले लिया, जहाँ हमें होना चाहिए था। यही अनुग्रह है।

यदि हम अपने प्रयासों से परमेश्वर के साथ अपने आप को सही स्थिति में रखने में सक्षम होते, तो न ही छुटकारे में कोई आश्चर्य होता और न ही लेपालक पुत्र/पुत्रियाँ बनाए जाने के भरोसे में कोई सुन्दरता होती। जब हम अपने आप को और अपने कार्यों को देखने के लिए प्रलोभित होते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि मसीह ने उस अभिशाप को तोड़ दिया है। और उस आश्चर्य में होकर हम महिमा कर सकते हैं। भले ही आपको अनुग्रह की पहली झलक मिले कितना ही समय क्यों न बीत गया हो, आप अभी भी अपने लिए नए सिरे से गा सकते हैं:

मेरे हाथ में कुछ भी नहीं जो मैं लेकर आता हूँ, मैं केवल तेरे क्रूस से लिपटा हुआ हूँ।  गलातियों 2:15-3:9

31 जनवरी : लज्जित न हो

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31 जनवरी : लज्जित न हो
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“हमारे प्रभु की गवाही से, और मुझसे जो उसका कैदी हूँ, लज्जित न हो, पर उस परमेश्‍वर की सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा जिसने हमारा उद्धार किया और पवित्र बुलाहट से बुलाया, और यह हमारे कामों के अनुसार नहीं; पर उसके उद्देश्य और उस अनुग्रह के अनुसार है जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ है।”  2 तीमुथियुस 1:8-9

स्वामी के कारण, स्वामी के सेवकों के कारण और स्वामी के सन्देश के कारण लज्जित होना एक बहुत ही सहज बात है। इसलिए यह सुनना एक बड़ी चुनौती है कि पौलुस कैसे तीमुथियुस को और हमें “लज्जित न होने” के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

पश्चिमी संस्कृति में धर्म, परमेश्वर और आत्मिकता के बारे में अस्पष्ट बातचीत व्यापक रूप से सहनीय मानी जाती है; हम कई बार कई तरह के अस्पष्ट कथनों को सुनते या पढ़ते हैं, जो सुसमाचार के साथ शिथिल रूप से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। तथापि समाज के मानकों के अनुसार यह पूर्ण रूप से अस्वीकार्य है कि यीशु मसीह के अतिरिक्त किसी और के द्वारा उद्धार नहीं है। यदि हम पतरस के साथ यह दावा करने के लिए तैयार हैं कि “स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों के काम 4:12), तो यहाँ पौलुस के तीमुथियुस को लिखे शब्द हमारे लिए भी उपयुक्त होंगे कि “सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा।”

सुसमाचार के लिए दुख उठाने के विशेषाधिकार में सम्मिलित होने के लिए पौलुस का निमन्त्रण, एक अर्थ में, हमें परेशान करने वाला है। यह हमारे समय के मसीही जयवन्तवाद के बिल्कुल विपरीत है, जो सदैव मसीही जीवन को भव्य तरीके से प्रस्तुत करना चाहता है। इस कारण बहुत से लोग केवल चंगा करने, चमत्कार करने और अपने लोगों को जीत की ओर ले जाने वाले परमेश्वर के सामर्थ्य की पुष्टि करना और स्वीकार करना चाहते हैं। तथापि, बाइबल और मानवीय अनुभव हमें बताते हैं कि—मृत्यु को परम चंगाई के रूप में अलग करके—जिन लोगों के लिए हमने प्रार्थना की है, उनमें से अधिकांश लोग पीड़ा में बने रहेंगे और कठिन दिनों में जीवन बिताएँगे। हमें सच बताना चाहिए। जॉन न्यूटन के शब्दों में, मसीही व्यक्ति को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों से होकर जाना होगा”[1] निकट भविष्य में हमारे लिए और भी परीक्षाएँ प्रतीक्षा कर रही हैं, विशेषकर यदि हमें पृथ्वी के अन्त तक सुसमाचार प्रचार करने के बुलावे के प्रति विश्वासयोग्य रहना है (प्रेरितों के काम 1:8)।

तो फिर हम सुसमाचार के लिए पीड़ा में कैसे स्थिर बने रहें? परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा मिलने वाला परमेश्वर का सामर्थ्य ही हमें अन्त तक स्थिर बनाए रखता है। न्यूटन के गीत के बोल इस वास्तविकता को बतलाते हैं, “अनुग्रह ही है जो मुझे अब तक सुरक्षित लाया है, और अनुग्रह ही मुझे घर ले जाएगा।” यह एक अद्‌भुत सत्य है!

परमेश्वर ने आपको बचाया है और वही आपको पीड़ा के समय में दृढ़ता से थामे रख सकता है। परमेश्वर ने आपको नियुक्त किया है और जब आपको उसके बारे में सच्चाई की साक्षी देने के लिए बुलाया जाए, तो वही आपको हियाव दे सकता है। उसके सम्भालने वाले सामर्थ्य की सच्चाई आपके हृदय में हलचल उत्पन्न कर सकती है और आपके जीवन को बदल सकती है। कठिन और सन्देह से भरे दिनों में आप अपनी आत्मा के लिए एक गढ़ के रूप में इस वास्तविकता को थामे रह सकते हैं। और जब आप उस स्वामी, उसके सेवकों या उसके सन्देश के लिए खड़े होने से पीछे हटने के लिए प्रलोभित हो रहे हों, तो जैसे ही आप बोलने के लिए अपना मुँह खोलें, आप उसके सामर्थ्य की ओर देखते हुए अपनी साक्षी के प्रभावी होने के लिए एक मौन प्रार्थना कर सकते हैं। “लज्जित न हों।”

रोमियों 1:8-17

30 जनवरी : उसकी उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित

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30 जनवरी : उसकी उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित
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“यहोवा उस [यूसुफ] के संग था इसलिए वह भाग्यवान् पुरुष हो गया”  उत्पत्ति 39:2

परमेश्वर की सेवा करने के लिए उस स्थान से अच्छा कोई और स्थान नहीं है, जहाँ वह आपको रखता है।

कोई भी नौकरी दोषरहित नहीं होती, कोई भी परिवार दोषरहित नहीं होता, कोई भी परिस्थितियाँ परेशानियों से मुक्त नहीं होतीं। हममें से जो लोग लगातार आदर्श जीवन की खोज करते रहते हैं, जो यह भूल जाते हैं कि सिद्धता को स्वर्ग के लिए सुरक्षित रखा गया है, वे अपने आप को एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं, जिसमें बार-बार निराशा ही हाथ लगती है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यूसुफ ने जिन परिस्थितियों का अनुभव किया, वे बिल्कुल भी आदर्श परिस्थितियाँ नहीं थीं। अपने पिता से विशेष प्रेम पाने वाले व्यक्ति के रूप में अपना जीवन आरम्भ करने के बाद उसने अपने आप को गुलामों के व्यापारियों के व्यापार की वस्तु के रूप में पाया। उसके परिवार के घर की सुरक्षा का स्थान दासत्व की बेड़ियों ने ले लिया।

यूसुफ के समान हम सभी समय के साथ अपनी परिस्थितियों को बदलते हुए देखते हैं। हो सकता है कि हम लम्बे समय तक जिस घर में रहे हैं, उससे हमें दूर जाना पड़े, या हमारे प्रियजनों को कष्टों का सामना करना पड़े, या वित्तीय कठिनाइयाँ या स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएँ अप्रत्याशित रूप से आ जाएँ। तथापि, हममें से बहुत कम लोगों ने यूसुफ की तरह इस प्रकार के त्वरित विनाश का अनुभव किया होगा। (और यदि आपने ऐसा किया है, तो यह जानना कितना उत्साहजनक है कि पवित्रशास्त्र में आपके जैसे लोगों के जीवन में परमेश्वर के हस्तक्षेप की कहानियाँ सम्मिलित हैं!) हम सोच सकते हैं कि यूसुफ के पास कहीं भाग जाने, छिप जाने, हार मान लेने, या प्रतिरोधी बन जाने के सभी कारण मौजूद थे। और फिर भी परमेश्वर की उपस्थिति ने उसे प्रत्येक तराई के स्थान से बाहर निकाला।

यूसुफ को उसकी परिस्थितियों से  सुरक्षा नहीं दी गई; उसे अपनी परिस्थितियों में  सुरक्षित रखा गया। वह परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित किया गया था। इसमें हमारे लिए एक सीख है। किसी विश्वासी की कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता, ज्ञान या बुद्धि वह वस्तु नहीं है, जो उसकी रक्षा करती है। परन्तु परमेश्वर का सेवक परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा ही सुरक्षित किया जाता है। यह स्वाभाविक बात है कि हम परमेश्वर से अपनी परिस्थितियों को बदलने, बड़ी कठिनाइयों को दूर कर देने या हमें परीक्षाओं से दूर कर देने के लिए कहते हों। हो सकता है कि हम अपने आस-पास देखें और सोचें कि “मैंने कभी इसकी अपेक्षा तो नहीं की थी!” हम इस झूठ पर विश्वास करना आरम्भ कर देते हैं कि यदि हम केवल बच कर भाग निकलें या यदि हमारी समस्याएँ दूर हो जाएँ, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। किन्तु वास्तविक सच्चाई यह है कि हम चाहे कहीं भी चले जाएँ, समस्याएँ आएँगी और स्वर्ग के इस ओर सिद्धता हाथ नहीं आएगी। जैसा कि भजनकार कहता है कि मेरा भरोसा परमेश्वर पर है (भजन संहिता 11:1)।

परमेश्वर यूसुफ के जीवन को अलग तरीके से व्यवस्थित कर सकता था। इसके विपरीत उसने घटनाओं को वैसे ही घटित होने दिया जिस प्रकार वे घटित हुईं। उसकी योजना थी कि वह अपने सेवक को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों”[1] से होकर निकालेगा। ऐसा नहीं है कि जब वह दासों की पंक्ति में चल रहा था और दासों के बाजार में बैठा था, तब परमेश्वर उसके संग नहीं था और जब वह अपने स्वामी के घराने में सम्मान और प्रमुखता के पद तक ऊपर उठ गया, तब परमेश्वर उसके संग था। प्रभु की उपस्थिति हमारे साथ भी होती है। निस्सन्देह, उसने हमसे प्रतिज्ञा की है कि चाहे तुम तराइयों में हो या पर्वतों के शिखरों पर, “मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20)। आज परमेश्वर ने आपको किस परिस्थिति में रखा है? और यह जानना कि वह आपके साथ उस परिस्थिति में है और उसी परिस्थिति में उसके पास आपके करने के लिए एक भला काम है, किस प्रकार से उन परिस्थितियों के बारे में आपके दृष्टिकोण को बदलेगा, जिन्हें आप चुन सकते थे और जिन्हें आप नहीं चुनते?

फिलिप्पियों 4:4-13

29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी

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29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी
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“क्योंकि बैरी होने की दशा में उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ, तो फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएँगे?”  रोमियों 5:10

परमेश्वर कोई दयालु दादा जी या जगत के सांता क्लॉज़ नहीं है, जो केवल उपहार देता है और जिसे किसी अन्य बात से कोई लेना-देना नहीं है। कदापि नहीं, वह पवित्र है और वह धर्मी है। इसलिए मनुष्य अपने पाप के कारण परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले हुए लोग हैं। मानवता और हमारे सृष्टिकर्ता के बीच शत्रुता व्याप्त है। यह ऐसा सन्देश नहीं है, जिसे आप आमतौर पर सुनते हों और यह निश्चित रूप से बहुत सुहावना सन्देश भी नहीं है। किन्तु परमेश्वर उस शत्रुता को अनदेखा नहीं करता। न उसने कभी ऐसा किया है, और न ही वह कभी ऐसा करेगा। पाप के प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण के बारे में पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट है। निस्सन्देह यह स्पष्ट करते हुए कि पाप हमें परमेश्वर से अलग कर देता है, पौलुस मनुष्यों को परमेश्वर के शत्रुओं के रूप में वर्णित करता है। पौलुस की भाषा भी भजनकार के शब्दों को प्रतिध्वनित करती है, जो परमेश्वर के बारे में कहता है कि “तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है” (भजन 5:5)। यह एक ऐसा सन्देश है, जो न तो पढ़ने में सुखद है और न ही पहली बार देखने पर समझने में सरल है।

तो फिर हमारी आशा कहाँ रही? हम परमेश्वर से मेल-मिलाप कैसे कर सकेंगे? ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर पाप को तो उसके योग्य दण्ड दे और फिर भी पापियों को क्षमा कर दे?

हे हमारे परमेश्वर की प्रेमपूर्ण बुद्धि! जब सब कुछ पाप और शर्म से भरा था,

तब दूसरा आदम लड़ने और बचाने के लिए आ गया। [1]

यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा परमेश्वर के न्याय की तृप्ति कर दी है। पहले उसने परमेश्वर की व्यवस्था का पूरी तरह से पालन करने के हमारे दायित्व को और फिर इसमें विफल होने पर हमारे ऊपर पड़ने वाले बोझ को स्वयं अपने ऊपर धारण करने का निर्णय लिया। फिर उसने अपने पापरहित जीवन के द्वारा हमारे दायित्व को पूरा किया और क्रूस पर अपनी बलिदानी मृत्यु के द्वारा हमारे बोझ को निरस्त कर दिया। हमारे पापी अस्तित्व के प्रति परमेश्वर की घृणा के कारण जब परमेश्वर से हमारा अलगाव हुआ, तो उसने हमें त्यागा नहीं। इसके विपरीत, परमेश्वर आया और अपने पुत्र के माध्यम से हमारे साथ मेल-मिलाप किया। यदि यह सबसे अविश्वसनीय समाचार की तरह नहीं लगता है, तो हमने अपने पाप की गम्भीरता, या उसके न्याय की वास्तविकता, या हमारे उद्धार की परिमाण में से किसी एक बात को ठीक से नहीं समझा है।

हममें से वे लोग, जिन्हें मसीही बने हुए कुछ समय बीत चुका है, इसे अच्छी तरह जाने लेने के बाद चाहे इसका तिरस्कार न करें, तौभी आत्म-सन्तुष्टि के शिकार अवश्य हो सकते हैं। परन्तु मसीह की मृत्यु हमारे विश्वास का केवल प्रवेश बिन्दु ही नहीं है; यही हमारा विश्वास है। इसलिए आज उस दूसरे आदम, अर्थात सिद्ध मनुष्य को देखने के लिए ठहरें, जो वहाँ सफल हुआ जहाँ पहला आदम असफल हुआ था और जिसने शैतान को हराकर पतन के प्रभावों को उलट दिया है। यही सुसमाचार है। आपके पापों को क्षमा कर दिया गया है। आपको बचा लिया गया है। जहाँ आप पहले शत्रु थे, अब वहीं आप एक मित्र हैं। मसीह अब आपका भरोसा, आपकी शान्ति और आपका जीवन है।

मसीह में होने की वास्तविकता कोई सहज बात नहीं है; यह एक अद्‌भुत आश्वस्ति है। जब हम पाप के सामने शक्तिहीन थे, तब मसीह के सामर्थ्य ने हमें स्वतन्त्र किया। जब हम इतना बड़ा ऋण नहीं चुका सके, तब वह आप ही उसे लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया (1 पतरस 2:24)। अब आप स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठे हैं। आज आपकी सबसे बड़ी सफलता भी आपको उससे ऊपर नहीं उठा सकेगी, जितना उसने आपको पहले ही उठा दिया है; न ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष या असफलता आपको वहाँ से नीचे गिरा सकती है।

 कुलुस्सियों 1:15-23

28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक

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28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक
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“परमेश्वर ने मूसा से कहा, ‘मैं जो हूँ सो हूँ।’ फिर उसने कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह कहना, “जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।”’”  निर्गमन 3:14

कुछ संस्कृतियों में नामों के पीछे के अर्थ बहुत मायने नहीं रखते। कोई नाम हम इसलिए चुन लेते हैं, क्योंकि हमें उसका उच्चारण अच्छा लगता है, या क्योंकि वह हमारे परिवार के लिए अनमोल होता है। तथापि अन्य संस्कृतियों में नाम अपने आप में बहुत महत्त्व रखता है। उस नाम का अर्थ उस व्यक्ति के बारे में, जिसे वह नाम दिया गया है या उसे वह नाम देने वाले लोगों की आशा के बारे में कुछ स्थापित कर सकता है।

जब मूसा का जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर से सामना हुआ, तो उसने पूछा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे कहूँ, ‘तुम्हारे पितरों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझ से पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?”” (निर्गमन 3:13)। तब परमेश्वर ने मूसा को जो नाम बताया, वह है यहोवा (जिसका अनुवाद है “मैं जो हूँ सो हूँ”)। इसमें चार अक्षर हैं जो व्यंजन हैं और इसमें कोई स्वर नहीं है। यदि हम इसका सही उच्चारण करने का प्रयास करें, तो हम पाएँगे कि यह लगभग असम्भव है। यदि आप चाहें तो यह कह सकते हैं कि यह एक अवर्णनीय नाम है।

इस तरह उत्तर देने के द्वारा परमेश्वर क्या कर रहा था? मूसा इस्राएल के लोगों को और फिरौन को एक अधिकार वाला नाम देने का अनुरोध कर रहा था और परमेश्वर ने उसे वह नाम दिया जिसका उच्चारण ही नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता है कि मानो परमेश्वर कह रहा था कि ऐसा कोई नाम नहीं है जो मेरे अस्तित्व को पूरी तरह से व्यक्त कर सके। इसलिए उनसे कहो कि मैं जो हूँ सो हूँने तुम्हें भेजा है। फिरौन से कहो कि वह देखे कि मैं अपने लोगों के लिए क्या करता हूँ। तब वह जान जाएगा कि मैं कौन हूँ।

बाइबल न केवल परमेश्वर के उद्धार के कार्य की कहानी है, परन्तु इससे बढ़कर वह परमेश्वर के चरित्र के अनावरण की भी कहानी है। हममें से बहुत से लोग अपनी बाइबल पढ़ने के बाद प्रयुक्ति से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछने में निपुण हो चुके हैं, जैसे “यह कैसे सम्बन्धित है और कैसे लागू होता है? मेरे लिए इसका क्या अर्थ है?” ये बातें व्यर्थ या गलत नहीं हैं, किन्तु ये वे प्रमुख प्रश्न नहीं हैं जो पूछे जाने चाहिए। परमेश्वर कहानी का नायक और पुस्तक का प्रसंग है, और इसलिए प्रत्येक खण्ड से हमारा पहला प्रश्न यह होना चाहिए, “यह मुझे परमेश्वर के बारे में क्या बताता है?” बाइबल परमेश्वर के व्यवहार, चरित्र और महिमा को स्थापित करने के लिए लिखी गई थी।

हममें से बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि हमें प्रत्येक रविवार को कलीसिया से जो कुछ चाहिए वह है आमदनी, सम्बन्धों तथा किसी भी अन्य समस्याओं को हल करने के लिए कुछ किस्से या प्रेरणादायक सूचियाँ। मसीहियत के इतिहास में आज का युग ऐसा समय है, जिसमें विश्वासियों के लिए “कैसे करें” शीर्षक वाली इतनी अधिक पुस्तकें लिखी गई हैं। फिर भी, क्या हम वास्तव में अच्छा जीवन जी पा रहे हैं? ऐसा लगता है जैसे हम सब कुछ करना जानते हैं, परन्तु हम यह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है!

परमेश्वर ने मूसा को जो करने का बुलावा दिया था, उसे पूरा करने के लिए मूसा को यह समझना आवश्यक था कि परमेश्वर कौन था (और है)। उसे हमारे समान यह जानने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर केवल एक नाम से कहीं अधिक है।

जब हम बाइबल को पढ़ते हैं और पूछते हैं कि “मैं परमेश्वर के बारे में क्या जान सकता हूँ?” तब हमारा जीवन बदल जाता है। जैसे-जैसे हम यह देखते जाते हैं कि परमेश्वर ने क्या किया है और अधिकता से समझने लगते हैं कि वह कौन है, तो हम उसके प्रति भय-युक्त प्रेम में और उसके लिए प्रेम में बढ़ने लगते हैं। और तभी हम अपने जीवन में उसके बुलावे को पूरा करते हुए उसकी इच्छा के अनुसार जीने में सक्षम होने पाएँगे। हम अपने अवर्णनीय रूप से विस्मयकारी परमेश्वर की महिमा की गहराई को पूर्ण रूप से कभी नहीं समझ पाएँगे, परन्तु हम अवश्य  अनन्त काल तक उसे अधिकाधिक देखते जाएँगे। और जबकि हम उसका वचन पढ़ ही रहे हैं, तो उसका आरम्भ आज से ही हो सकता है।

निर्गमन 3:1-22