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29 April : दिवस जवळ आला आहे

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29 April : दिवस जवळ आला आहे
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“रात्र सरत येऊन दिवस जवळ आला आहे” (रोम 13:12)

दुःख भोगत असलेल्या ख्रिस्ती लोकांसाठीं ही आशा देणारी वचनें आहेंत. ज्या ख्रिस्ती लोकांना स्वतःच्या पापाचा तिटकारा वाटतो आणि पापापासून मुक्त होण्याची उत्कंठा बाळगत आहेत त्यांच्यासाठीं हे आशेचे अभिवचन आहे. जे इच्छा धरतात कीं अंतिम शत्रू, म्हणजें मृत्यूवर मात करून त्याला अग्नीच्या सरोवरात टाकले जावे त्या ख्रिस्ती लोकासाठीं हे आशेचे वचन आहे (प्रकटीकरण 20:14). वाह!

हें त्यां सर्वांसाठीं आशेचे अभिवचन कसे काय आहे?

“रात्र” अंधाराच्या या युगाचे आणि त्यातील सर्व पाप, दुःख आणि मरण यांचे प्रतीक आहे. आणि पौल याबद्दल काय म्हणतो? ”रात्र सरत आली आहे.” पापाचे आणि दुःखाचे आणि मृत्यूचे युग संपुष्टात येत आहे. नीतिमत्व आणि शांती आणि संपूर्ण आनंदाचा दिवस उदयास येत आहे.

तुम्हांला वाटेल कीं, “2,000 वर्षे दीर्घकालीक पहाटेसारखी वाटतात.” एका दृष्टिकोनातून हे तसेच आहे. आणि आम्हीं ओरडतो, हे परमेश्वरा, किती काळ हे असेच राहणार? परंतु पवित्र शास्त्राची विचारसरणी “किती काळ!” या विलापाच्या पलीकडें आहे. ती जगाच्या इतिहासाकडें वेगळ्या दृष्टीकोनाने पाहते.

मुख्य फरक हा आहे कीं “दिवस” – ख्रिस्ताचे नवीन युग – खरोखरच येशू ख्रिस्तामध्ये उदय पावले आहे. येशू हा या पतित युगाचा शेवट आहे. म्हणजें, या पतित युगाचा शेवट जसा त्यानें या जगात प्रवेश केला. येशू जेव्हां मेला आणि पुन्हा जिवंत झाला तेव्हां त्यानें पाप आणि वेदना आणि मृत्यू आणि सैतान यांचा पराभव केला. युगांची निर्णायक लढाई संपली आहे. राज्य आले आहे. सार्वकालिक जीवन आले आहे.

आणि जेव्हां दिवस उगवतो – जसे येशूच्या येण्याच्या वेळी होते – कोणीही दिवसाच्या येण्याबद्दल शंका करू नये. पहाटेने 2,000 वर्षे काढली तरीही नाहीं. 2 पेत्र 3:8 मध्ये पेत्राने म्हटल्याप्रमाणे, ”तरी प्रियजनहो, ही एक गोष्ट तुम्हीं विसरू नका कीं, प्रभूला एक दिवस हजार वर्षांसारखा आहे आणि ‘हजार वर्षे’ एका ‘दिवसासारखी’ आहेत.“ पहाट झालीं आहे. दिवस उगवला आहे.. सूर्य उगवून पूर्ण दिवस होण्याला कोणतीही गोष्ट रोखू शकत नाहीं.

28 अप्रैल : यीशु हमें उठाकर खड़ा करता है

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28 अप्रैल : यीशु हमें उठाकर खड़ा करता है
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“तब वह चिल्लाकर और उसे बहुत मरोड़ कर, निकल आई; और बालक मरा हुआ सा हो गया, यहाँ तक कि बहुत लोग कहने लगे कि वह मर गया। परन्तु यीशु ने उसका हाथ पकड़ के उसे उठाया, और वह खड़ा हो गया।” मरकुस 9:26-27ऐसा कोई भी नहीं है, जिसकी मदद यीशु न कर सकें।

मरकुस 9 में, हम यीशु की एक बच्चे के साथ बातचीत के बारे में पढ़ते हैं, जो लम्बे समय से एक अशुद्ध आत्मा द्वारा पीड़ित था। लड़के की यह स्थिति बचपन से बनी हुई थी। वह न तो बोल सकता था और न ही सुन सकता था। जब भी दुष्ट आत्मा उसे पकड़ता, तो उसे गिरा देता और उसके मुँह से झाग निकलती, वह दाँत पीसता, और अकड़ जाता था (मरकुस 9:18)। यह युवक एक भयंकर परिस्थिति में फँसा हुआ था, असल में वह अपने शरीर में कैद था और अपने पिता, परिवार या दोस्तों से सान्त्वना की कोई भी बात सुनने में असमर्थ था, और अपने दर्द तथा भय को व्यक्त भी नहीं कर सकता था। उसमें मौजूद परमेश्वर की छवि को विकृत और नष्ट किए जाने के प्रयासों के कारण उसका जीवन कष्टों से भर गया था।

ऐसी निराशाजनक स्थिति में यीशु ने हस्तक्षेप किया और उस दुष्ट आत्मा को एक दिव्य फटकार लगाई। मसीह की इस शक्तिशाली फटकार ने शत्रु के नाकाम गुस्से को भड़का दिया और दुष्ट आत्मा ने लड़के को बुरी तरह से मरोड़ने के बाद उसे छोड़ दिया। लड़का ऐसे हो गया जैसे मर गया हो। और फिर यीशु ने उसे उठाकर खड़ा किया।

यीशु यही करता है। जिन लोगों के जीवन नष्ट हो चुके हैं और जो विनाश की ओर बढ़ रहे हैं, यीशु उन्हें थामता है और वही करता है, जो वह कर सकता है: वह उनके जीवन में प्रवेश करता है, उनका हाथ थामता है, उन्हें उठाकर खड़ा करता है . . . और वे खड़े हो जाते हैं।

केवल यीशु ही है जो सचमुच यह कह सकता है, “पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझ पर विश्‍वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्‍वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा” (यूहन्ना 11:25-26)। केवल वही है जो किसी ऐसे व्यक्ति को, जो पूरी तरह से असहाय और खुद में परिवर्तन लाने में सक्षम नहीं होता, नया जीवन दे सकता है।

तो आज, यीशु आपके पास आता है और कहते है, तुम अपने बोझ मेरे पास क्यों नहीं लाते? तुम शिक्षा का सहारा लेकर दर्द और दुख से बाहर नहीं निकल सकते। तुम्हारे सारे घावों और उलझनों का स्थाई उत्तर चिकित्सा नहीं है। सच में, यह अच्छा है कि तुम जानते हो कि तुम यह सब अकेले नहीं कर सकते। अपने बोझ मेरे पास लाओ।

केवल यही नहीं, बल्कि वह आपके माध्यम से दूसरों के पास भी आ सकता है। आपके सम्पर्क में आने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसे यीशु की मदद की जरूरत नहीं है और ऐसा कोई भी नहीं है जिसकी मदद यीशु न कर सके। चाहे किसी का जीवन कितना भी उज्ज्वल क्यों न लगे, आमतौर पर भीतर से वे पछतावे और चिन्ता से भरे होते हैं और फिर यदि यीशु हस्तक्षेप न करे, तो पाप हम सभी को धीरे-धीरे विनाश की ओर ले जा रहा है। जब आप अपने आस-पास के लोगों को इस दृष्टिकोण से देखना सीखते हैं, तब आप उनके साथ मसीह को साझा करने की इच्छा करते हैं; क्योंकि ऐसा कोई भी नहीं  है जिसकी मदद यीशु न कर सके।

लूका 19:1-10

28 April : मोठी अदलाबदल

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28 April : मोठी अदलाबदल
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“कारण मला ख्रिस्ताच्या सुवार्तेची लाज वाटत नाहीं; कारण विश्वास ठेवणाऱ्या प्रत्येकाला – प्रथम यहूद्याला मग हेल्लेण्याला – तारणासाठीं ती देवाचे सामर्थ्य आहे. कारण तिच्यात देवाचे नीतिमत्त्व विश्वासाने विश्वासासाठीं प्रकट झालेंले आहे; “नीतिमान विश्वासाने जगेल” ह्या शास्त्रलेखाप्रमाणे हे आहे” (रोम 1:16-17)

देवाला स्वीकारणीय ठरावे म्हणून आम्हांला नीतिमत्वाची गरज आहे. पण आमच्यांत ते नीतिमत्व नाहीं. आमच्यांत जे आहे ते म्हणजें पाप.

तर, देवाजवळ जाण्यासाठीं आपल्याला ज्याची गरज आहे आणि ज्यास आम्हीं पात्र नाहीं ते आहे  – नीतिमत्व; आणि आमच्यांत जे आहे, म्हणजें पाप, देव त्याचा तिरस्कार करतो, ते नाकारतो. देवानें या परिस्थितीचे कसे समाधान केलें?

त्याचे समाधान आहे येशू ख्रिस्त, देवाचा पुत्र जो आमच्यां बद्दल, म्हणजें आपल्या जागी मरण पावला आणि ज्याने ती दंडाज्ञा स्वतःवर घेतली जी भोगावायांस आम्हीं पात्र आहोंत. “देवानें आपल्या स्वतःच्या पुत्राला पापमय देहासारख्या देहाने व पापाबद्दल पाठवून देहामध्ये पापाला दंडाज्ञा ठरवली” (रोम 8:3). कोणाच्या देहाने दंडाज्ञा सहन केलीं? त्याच्या देहानें. कोणाच्या पापास दंडाज्ञा मिळत होती? आमच्यां. ही मोठी अदलाबदल आहे. येथे पुन्हा 2 करिंथ 5:21 मध्ये म्हटलें आहे, “ज्याला पाप ठाऊक नव्हते त्याला त्यानें तुमच्या-आमच्यांकरता पाप असे केलें; ह्यासाठीं कीं, आपण त्याच्या ठायीं देवाचे नीतिमत्त्व असे व्हावे.”

देव आमची पापें ख्रिस्तावर टाकतो आणि त्यांस त्याच्याठायीं दंडाज्ञा देतो. आणि ख्रिस्ताच्या आज्ञाधारक मृत्यूमध्ये, देव त्याचे नीतिमत्व पूर्ण करतो आणि प्रमाणित करतो, आणि ते आमच्यां लेखी जोडतो. ख्रिस्तावर आमचे पाप; त्याचे नीतिमत्व आमच्यांवर. अहाहा!

आमच्या सर्वात मोठ्या जीवनाच्या प्रश्नावर ख्रिस्त हा देवाचे उत्तर आहे, आपण याविषयी अधिक अतिशयोक्ती करूं शकत नाहीं. हे सर्व ख्रिस्तामुळे आहे.

तुम्ही ख्रिस्तावर किती अधिक प्रीति कराल? तुम्हीं त्याच्याबद्दल किती अधिक विचार कराल? किंवा कुठल्या गोष्टीपलीकडें त्याचे अतिशय आभार मानू शकता? अथवा त्याच्यावर जास्त अवलंबून राहू शकता?. आमची सर्व क्षमा, आमचे सर्व नीतिमत्व, आमची सर्व धार्मिकता ख्रिस्ताठायीं आहे.

हेच शुभवर्तमान आहे – ही सुवार्ता आहे कीं आमची पापे ख्रिस्तावर टाकली गेली आहेत आणि त्याचे नीतिमत्व आम्हांला परिधान करण्यांत आले आहे आणि ही मोठी अदलाबदल आपल्या कृत्याद्वारे नव्हें तर केवळ विश्वासाने होते. “कारण कृपेनेच विश्वासाच्या द्वारे तुमचे तारण झालेंले आहे आणि हे तुमच्या हातून झालें असे नाहीं, तर हे देवाचे दान आहे; कोणी आढ्यता बाळगू नये म्हणून कर्मे केल्याने हे झालें नाहीं” (इफिस 2:8-9). ही ती सुवार्ता आहे जी आमचे ओझे उचलते आणि आनंद देते आणि दृढ करते.

27 अप्रैल : सही तरीके से माँगना

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27 अप्रैल : सही तरीके से माँगना
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“तुम्हें इसलिए नहीं मिलता कि माँगते नहीं। तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग–विलास में उड़ा दो।” याकूब 4:2-3

तुम एक राजा के पास आ रहे हो,

बड़ी याचिकाएँ अपने साथ लाओ;

क्योंकि उसका अनुग्रह और सामर्थ्य ऐसे हैं

कि कोई भी कभी भी उससे इतना नहीं माँग सकता,

जो परमेश्वर के लिए बहुत ज्यादा हो।[1]

जॉन न्यूटन द्वारा लिखा गया यह गीत हमें यीशु के शब्दों की याद दिलाता है: “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिए हो जाएगा” (मरकुस 11:24)। एक अन्य स्थान पर यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा!” (मत्ती 7:11)। हम परमेश्वर के पास जा सकते हैं और उससे अच्छे उपहार माँग सकते हैं। हम परमेश्वर से कभी भी इतना नहीं माँग सकते, जो परमेश्वर के लिए बहुत ज्यादा हो। फिर भी, जैसा कि याकूब कहता है, हममें से कई लोग इन उपहारों को इसलिए प्राप्त नहीं करते क्योंकि हम यीशु की शिक्षा पर कार्य करने की हिम्मत नहीं रखते और बस माँगते नहीं। या हम माँगते तो हैं, लेकिन हम ऐसी वस्तुएँ माँगते हैं जो उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं, बल्कि हम उससे इसलिए प्राप्त करना चाहते हैं ताकि हम “अपने भोग–विलास में उड़ा” दें—ताकि अपनी प्राथमिकताओं को पूरा करें, न कि उसकी सेवा करने के लिए।

जब हम ध्यान देते हैं कि परमेश्वर का वचन प्रार्थना के बारे में क्या सिखाता है, तो हम पाते हैं कि हमें उससे माँगना है—और विनम्रता, ईमानदारी, और प्रेम के साथ माँगना है, और इस समझ के साथ कि परमेश्वर सम्प्रभु है और उसकी इच्छा ही है, जिसे हम सबसे अधिक पूरा करना चाहते हैं। जब यीशु गतसमनी के बाग में था, तो उसने प्रार्थना की, “हे अब्बा, हे पिता, तुझसे सब कुछ हो सकता है; इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले : तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, पर जो तू चाहता है वही हो” (मरकुस 14:36)। यहाँ सन्तुलन को देखें। यीशु को परमेश्वर की शक्ति पर पूरा विश्वास था, उसके पास परमेश्वर से ऐसा कुछ करने के लिए कहने का साहस था, जो मानवता के लिए असम्भव था और फिर भी उसने पिता की इच्छा के प्रति पूरा समर्पण दिखाया। यह केवल परमेश्वर का सम्प्रभु उद्देश्य ही था, जिसने उस प्याले को हटने से रोका, जैसा कि मसीह ने प्रार्थना की थी। ऐसा नहीं था कि मसीह के पास ऐसा होता देखने के लिए “पर्याप्त विश्वास” नहीं था। उसी तरह, जब हम परमेश्वर से असम्भव कार्य करने को कहते हैं, तो हमारा साहस, बच्चों जैसा भरोसा और उत्साह उसकी सम्प्रभुता से कमजोर नहीं पड़ जाते; बल्कि ये दयालु रूप से इसके द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं।

परमेश्वर की सन्तान के रूप में आप साहसपूर्वक अपने पिता के पास आ सकते हैं, यह विश्वास रखते हुए कि वह आपकी आवश्यकता और आपकी माँगों को पूरा करेगा जो उसकी इच्छा के अनुरूप हैं। यीशु के उदाहरण का पालन करते हुए, आप अपनी इच्छाओं को अपने पिता की प्रेमपूर्ण सम्प्रभुता के प्रति समर्पित कर सकते हैं। जब आप परमेश्वर से सही तरीके से सही वस्तु पाने के लिए विश्वास करते हैं, तो आप आश्वस्त हो सकते हैं कि वह हमेशा सही प्रतिक्रिया देगा। आप कभी भी ऐसा कुछ नहीं माँग सकते जो परमेश्वर के लिए बहुत अधिक हो। तो बस माँगो!

लूका 18:1-8

27 April : गाणाऱ्या देवाची मुलें

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27 April : गाणाऱ्या देवाची मुलें
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“मग एक स्तोत्र गाऊन ते तेथून जैतुनांच्या डोंगराकडें निघून गेलें” (मार्क 14:26).

तुम्हीं येशूला स्तोत्र गातांना ऐकू शकता का?

तो खालच्या स्वरात गाऊ शकतो कीं उंच स्वरात? त्याच्या गाण्याची पद्धत ग्रामीण व्यक्ती सारखी दणकट होती का? कि तो एकदम सपष्ट सुरांत गात असें?

तो पित्याची स्तुति-गीतें गात असतांना आपले डोळे बंद करित असे का? किं तो आपल्या शिष्यांच्या डोळ्यांत पाहून आणि त्यांची खोल सौहार्द्राप्रत वाणी एकून स्मितहास्य करीत गात असे?

गीताची सुरूवात नेहमी तोंच करीत असे का? किं पेत्र वा याकोब, अथवा कदाचित मत्तय सुरूवात करीत असे?

ओह, येशूचे गाणे ऐकण्यासाठीं मी किती तळमळतोय! मला असे वाटते कीं जर त्यानें आमच्यां विश्वात त्याच्या मूळ आवाजात स्वर उंचविला असता तर ग्रह त्यांच्या कक्षेतून उसळी मारून बाहेर येतील. पण आपले एक राज्य आहे जे हलविता येत नाहीं; म्हणून, प्रभु, पुढे जा, आणि स्तोत्र गा!

ख्रिस्ती विश्वास हा स्तोत्रें गाणाराच विश्वास आहे. ख्रिस्ती विश्वासाच्या संस्थापकाने गायले. स्तोत्रें गाणे त्यानें आपल्या पित्याकडून शिकले. ते सनातन काळापासून एकत्र गात आहेत यांत शंका नाहीं. तुम्हांला असे वाटत नाहीं का? त्रिएक परमेश्वराची स्वतःमधील असलेली सहभागीता सार्वकालिक आनंदाचे स्तोत्र गाणार नाहीं का?

पवित्र शास्त्र म्हणते कीं जेव्हां आम्हीं स्तोत्रें गातो, आमचा उद्देश्य “आनंदाने उच्च स्वराने गायन करणे” हाच असतो (1 इतिहास 15:16). विश्वमंडळात परमेश्वरापेक्षा अधिक आनंद कोणालाही नाहीं. तो अतिशय आनंदित आहे. तो सनातन काळापासून त्याच्या स्वतःच्या परिपूर्णतेच्या विस्तीर्ण दृश्यात आनंदित आहे जी त्याच्या पुत्राच्या ईश्वरत्वात पूर्णपणे प्रतिबिंबित आहे.

देवाचा स्वतः मध्यें असलेला आनंद आमच्यां कल्पनेपलीकडें सामर्थ्यशाली आहे. तो परमेश्वर आहे. जेव्हां तो बोलतो, तेव्हां आकाशगंगा अस्तित्वात येतात. आणि जेव्हां तो आनंदाने गातो, तेव्हां विश्वाच्या सर्व पदार्थमात्रांत आणि गतीमध्ये अस्तित्वात असलेल्या ऊर्जेपेक्षा जास्त उर्जा मुक्त होते.

जर त्यानें आपल्यासाठीं त्याच्याठायीं आपल्या हृदयाचा आनंद व्यक्त करण्यासाठीं स्तोत्रें गाणे नेमून दिलें आहे, तर त्याचे कारण हे नाहीं का कीं तो त्याच्या आत्म्याद्वारे त्याच्या पुत्रामध्ये त्याच्या स्वतःच्या स्वरूपात त्याच्या स्वतःच्या अंतःकरणाचा आनंद गाण्याद्वारे व्यक्त करणे जाणतो? आपण स्तोत्रें गाणारे लोक आहोत कारण आपण स्तोत्रें गाणाऱ्या देवाची लेकरें आहोत.

26 अप्रैल : हमारे शरीरों में परमेश्वर की महिमा करना

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26 अप्रैल : हमारे शरीरों में परमेश्वर की महिमा करना
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“मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूँ कि मैं किसी बात में लज्जित न होऊँ, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसी ही अब भी हो, चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ।” फिलिप्पियों 1:20

आपका शरीर और आप इसके साथ जो करते हैं, मायने रखता है।

अपने लेखन में कई बार प्रेरित पौलुस लोगों के शरीरों के बारे में गहरी चिन्ता व्यक्त करता है। उदाहरण के लिए, वह कुरिन्थुस के विश्वासियों से पूछता है, “क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है, जो तुममें बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्‍वर की ओर से मिला है?” फिर वह कहता है, “तुम अपने नहीं हो, क्योंकि दाम देकर मोल लिए गए हो, इसलिए अपनी देह के द्वारा परमेश्‍वर की महिमा करो” (1 कुरिन्थियों 6:19-20)। दूसरे शब्दों में, हमारे शरीर उस परमेश्वर के हैं जिसने उन्हें बनाया है और जो उन्हें सम्भालता है। इस प्रकार की सोच पौलुस की थियोलॉजी का केन्द्र है।

पौलुस को यह जानकर बहुत खुशी होती थी कि उसके शरीर के द्वारा यीशु को सम्मान मिलेगा और उसकी महिमा होगी। यह उसका मुख्य उद्देश्य और प्रार्थना थी कि वह अपनी सेवा में साहस और विश्वास के साथ ऐसा करे। पौलुस के लिए, मसीह को ऊँचा करने का अर्थ था उसके महान नाम को ऊँचा उठाना: उसे महिमा देना। हम यह दृष्टिकोण बपतिस्मा देने वाले यूहन्ना में भी देखते हैं, जिसने यीशु के बारे में कहा, “अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ” (यूहन्ना 3:30)। इसी तरह, आप कभी भी पौलुस को खुद पर ध्यान आकर्षित करते हुए नहीं पाएँगे। उसने खुद को केवल एक मार्गदर्शक के रूप में देखा, जो मसीह की ओर ले जाता था।

इसी कारण, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जब पौलुस ने अपने आप को प्रेरित के रूप में प्रमाणित करना चाहा, तो उसने यह नहीं कहा, “कोई मुझे परेशान न करे,” केवल इसलिए कि वह एक महान प्रेरित था या क्योंकि वह परमेश्वर द्वारा सुसमाचार प्रचार करने के लिए उपयोग किया जाता था। नहीं—उसने कहा, “आगे को कोई मुझे दुख न दे, क्योंकि मैं यीशु के दागों को अपनी देह में लिए फिरता हूँ” (गलातियों 6:17, जोर दिया गया)। उसके शरीर के माध्यम से उसकी प्रतिबद्धता प्रकट होती थी। उसे मसीह के प्रति अपनी निष्ठा के लिए लगातार दुर्व्यवहार सहना पड़ा। अन्ततः वह अपने जीवन के अन्त में दाग, शारीरिक शोषण और विकृति के साथ मर गया—फिर भी अपनी परीक्षाओं के मध्य में वह कहता रहा, “मैं आनन्दित रहूँगा।”

परमेश्वर पौलुस के पूरे जीवन पर प्रभु था: उसके शरीर, उसके समय, उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर। केवल यही वह बात थी जो उसे इतनी खुशी दे सकती थी। केवल यही वह बात थी जो हमें भी इतनी खुशी दे सकती है।

सारांश यह है कि आप अपने नहीं हैं। जो कुछ भी आपके पास है, वह आपका नहीं है। चाहे परमेश्वर ने आपको अधिक दिया हो या कम, सब कुछ आपके प्रबन्ध के अधीन है। आप अपने परमेश्वर के हैं, जो आपका सृष्टिकर्ता और आपका उद्धारकर्ता है। एक दिन, वह हमें महिमापूर्ण, अमर शरीरों के साथ जीवित करेगा (1 कुरिन्थियों 15:42-44, 51-54)। इस समय, इस जीवन में वह हमें इस शरीर में उसकी सेवा करने के लिए बुलाता है। इसलिए जो कुछ भी आप अपने शरीर के साथ करते हैं, उसे परमेश्वर के सामने प्रसन्नता से चढ़ावे के रूप में अर्पित करें।

1 कुरिन्थियों 6:12-20

26 April : तुमची घडण ही देवासाठीं झालीं

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26 April : तुमची घडण ही देवासाठीं झालीं
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“परमेश्वर आपल्या थोर नामास्तव आपल्या लोकांचा त्याग करणार नाहीं, कारण परमेश्वराने कृपावंत होऊन तुम्हांला आपले प्रजाजन केलें आहे.” (1 शमूवेल 12:22).

देवाचे नाव कित्येकदा त्याच्या प्रतिष्ठेचा, त्याच्या ख्यातीचा, त्याच्या नावलौकिकाचा, उल्लेख करते. आपण जेव्हां असे म्हणतो कीं एखादी व्यक्ती स्वतःचे नाव कमावित आहे तेव्हां आपण अशाच प्रकारे “नाव” या शब्दाचा उपयोग करतो. किंवा आम्हीं कधी कधी म्हणतो, ती “नावाची” एक प्रत किंवा ब्रँड आहे. आमच्यां म्हणण्याचा अर्थ एक मोठी प्रतिष्ठा असलेली प्रत किंवा ब्रँड. मला असें वाटते कीं जेव्हां शमूवेल म्हणतो कीं परमेश्वराने इस्राएली लोकांस “आपले” प्रजाजन केलें आहे आणि तो “आपल्या थोर नामास्तव” त्यांचा त्याग करणार नाहीं, तेव्हां 1 शमुवेल 12:22 मध्ये शमुवेलाच्या बोलण्याचा हाच अर्थ असावा.

देवाच्या नामाप्रीत्यर्थ त्याच्या उत्साहाविषयी विचार करण्याच्या या पद्धतीची इतर अनेक शास्त्रलेखांत पुष्टी झालीं आहे.

उदाहरणार्थ, यिर्मया 13:11 मध्ये देव इस्राएलाचे वर्णन कंबरेस लटकलेला पट्टा किंवा कमरबंद असे करतो, ज्याला देवानें आपले नाम, स्तुती व भूषण ह्यांस कारण व्हावे म्हणून निवडले, जरी अशी वेळ होती जेव्हां इस्राएल काहीं काळसाठीं अयोग्य ठरला होता.”इस्राएलाचे सर्व घराणे व यहूदाचे सर्व घराणे ह्यांनी माझी प्रजा व्हावे, आणि माझे नाम, स्तुती व भूषण ह्यांना कारण व्हावे म्हणून, कमरबंद जसा मनुष्याच्या कंबरेस लगटलेला असतो तसे त्यांनी मला लगटून राहावे असे मी केलें, तरी त्यांनी मानले नाहीं, असे परमेश्वर म्हणतो.“ इस्राएलास का निवडण्यात आले होते आणि देवाचे वस्त्र का ठरविण्यात आले होते? यासाठीं कीं त्यानें देवाचे “नाम, स्तुती व भूषण ह्यांना कारण व्हावे.”

या संदर्भात “स्तुती” व “भूषण” हे शब्द आम्हांला सांगतात कीं “नावाचा” अर्थ “ख्याती” अथवा “नावलौकिकता” किंवा “प्रतिष्ठा” असा आहे. देवानें इस्राएलास निवडले यासाठीं कीं त्यांनी त्याचे गौरव (प्रतिष्ठा) प्रगट करावे. देव यशया 43:21 मध्ये म्हणतो कीं इस्राएल “मी आपल्यासाठीं निर्माण केलेंले लोक आहेत जे माझे स्तवन करतील.”

आणि जेव्हां नव्या करारात मंडळी स्वतःला खरे इस्राएल म्हणून पाहू लागली, तेव्हां पेत्राने आमच्यांसाठीं देवाच्या हेतूचे असे वर्णन केलें: “पण तुम्हीं तर ‘निवडलेला वंश… असे आहात; ह्यासाठीं कीं, ज्याने तुम्हांला अंधकारातून काढून आपल्या अद्भुत प्रकाशात पाचारण केलें ‘त्याचे गुण तुम्हीं प्रसिद्ध करावेत’” (1 पेत्र 2:9).

दुसऱ्या शब्दात, इस्राएल आणि मंडळी देवानें यासाठीं निवडले कीं त्यांने जगात त्याचा नावलौकिक अथवा गौरव करावा. म्हणूनच आम्हीं सर्वप्रथम अशी प्रार्थना करतो, “तुझे नाव पवित्र मानले जावो” (मत्तय 6:9). याच कारणास्तव आम्हीं प्रार्थना करतो, “तो माझा जीव ताजातवाना करतो; तो आपल्या नावासाठीं मला नीतिमार्गांनी चालवतो” (स्तोत्र 23:3).

जेव्हां आम्हीं परमेश्वर-केंद्रिंत लोक असण्याविषयी बोलतो, तेव्हां लक्षात ठेवा, हे या कारणास्तव आहे कीं आम्हीं देवाच्या सहभागीतेत त्याच्या ‘परमेश्वर-केंद्रिंत’ उद्देशाने सहभागी होत आहोत. आणि वधस्तंभाच्या या बाजूला, याचा अर्थ आहे ख्रिस्तावर अवलंबिलेले, ख्रिस्ताला गौरव देणारे लोक असावे. “मुलांनो, मी तुम्हांला लिहितो, कारण त्याच्या नावामुळे तुमच्या पापांची तुम्हांला क्षमा झालीं आहे” (1 योहान 2:12). “आणि बोलणे किंवा करणे जे काहीं तुम्हीं कराल, ते सर्व प्रभू येशूच्या नावाने करा; आणि त्याच्या द्वारे देव जो पिता त्याची उपकारस्तुती करा” (कलस्सै 3:17)

25 अप्रैल : अंधे के लिए दया

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25 अप्रैल : अंधे के लिए दया
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“वह यह सुनकर कि यीशु नासरी है, पुकार-पुकार कर कहने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, यीशु मुझ पर दया कर!’” मरकुस 10:47

अंधा बरतिमाई पूरी तरह अंधकार में बैठा था। वह चलने-फिरने की आहट, भीड़ की आवाज़ें और लोगों की बातों का शोर सुन सकता था। वह उस हंगामे को सुन सकता था जो यह संकेत दे रहा था कि नासरत का यीशु अंधेरे में कहीं पर है, लेकिन वह उसे देख नहीं सकता था।

यह महसूस करते हुए कि उसके पास यीशु का ध्यान खींचने का केवल यही एक मौका हो सकता है, उसने व्याकुल होकर शोर मचाया, “हे दाऊद की सन्तान, यीशु मुझ पर दया कर!”

बरतिमाई  की प्रार्थना की सादगी और स्पष्टता उसके विश्वास की गवाही थी; यह इस बात का संकेत था कि वह सचमुच विश्वास करता था कि यीशु वह कर सकता है, जो वह उससे माँग रहा था। परमेश्वर की कृपा से अंधे बरतिमाई  ने वह देखा जो अनगिनत लोग नहीं देख पाए थे: उसने देखा कि यीशु में वह परमेश्वर की दया पा सकता है। और जब यीशु ने उसकी ज़रूरत का समाधान किया, तो बरतिमाई और इस आश्चर्यकर्म को देखने वाले लोग समझ गए कि उसका विश्वास ही उसकी चंगाई का कारण था। लेकिन बरतिमाई ने यह गलती नहीं की कि केवल उसकी शारीरिक दृष्टि ही उसकी असली जरूरत थी। यही कारण था कि जैसे ही उसे यीशु से दृष्टि मिली, वह “मार्ग में उसके पीछे हो लिया” (मरकुस 10:52)।

इस आश्चर्यकर्म में हम पूरे सुसमाचार का एक सूक्ष्म रूप देखते हैं। बाइबल मनुष्यों की वास्तविक स्थिति का वर्णन करने के लिए अक्सर अंधेपन का उपयोग करती है। उदाहरण के लिए, प्रेरित पौलुस कहता है, “उन अविश्वासियों के लिए, जिनकी बुद्धि इस संसार के ईश्वर ने अंधी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्‍वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके” (2 कुरिन्थियों 4:4); और यीशु ने स्वयं कहा, “मैं इस जगत में न्याय के लिए आया हूँ, ताकि जो नहीं देखते वे देखें” (यूहन्ना 9:39)। और मरकुस के सुसमाचार में हम पढ़ते हैं कि हालाँकि शिष्य यीशु का अनुसरण कर रहे थे, फिर भी वह जो कुछ भी उन्हें सिखा रहा था, उसे वे पूरी तरह से समझ नहीं पाए थे, इसलिए उसने पूछा, “क्या आँखें रखते हुए भी नहीं देखते, और कान रखते हुए भी नहीं सुनते?” (मरकुस 8:18)।

तो फिर, अंधों को दृष्टि कैसे मिलती है? वैसे ही जैसे बरतिमाई को मिली: यीशु के पास जाकर और उससे दया की पुकार करके, और वह प्रेमपूर्ण क्षमा और नया जीवन माँगकर जो केवल वही प्रदान कर सकता है। आप कभी भी यीशु मसीह को अपने जीवन में एक वास्तविकता के रूप में नहीं जान पाएँगे, जब तक कि आप उसे एक आवश्यकता के रूप में न जान लें। यह वह सत्य है जिसे हमें उसके पीछे चलने के पहले दिन का आनन्द लेने के लिए समझना जरूरी है; लेकिन यह ऐसा सत्य भी है जिसे हमें हमेशा याद रखना है ताकि हम अपने जीवन में उसके पीछे चलना जारी रख सकें। जिस भी तरह से आपको इस समय दया की आवश्यकता है, उसे विश्वास की आँखों से देखिए और बस माँगिए। खुशखबरी यह है कि यीशु अभी भी सुनता है, यीशु अभी भी परवाह करता है, यीशु अभी भी रुकता है, यीशु अभी भी उत्तर देता है, और यीशु अभी भी उद्धार देता है।

मरकुस 10:46-52

25 April : पौलाचे तारण तुमच्यासाठीं होते

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25 April : पौलाचे तारण तुमच्यासाठीं होते
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कारण मी जो पूर्वी निंदक, छळ करणारा व जुलमी होतो त्या मला त्यानें विश्वासू मानून आपल्या सेवेकरता ठेवले; मी असा होतो तरी मी जे केलें ते न समजून अविश्वासामुळे केलें, म्हणून माझ्यावर दया झालीं; आणि ख्रिस्त येशूमधील विश्वास व प्रीति ह्यांसह आपल्या प्रभूची कृपा विपुल झालीं. तरी जे युगानुयुगाच्या जीवनासाठीं त्याच्यावर विश्वास ठेवणार आहेत, त्यांना उदाहरण व्हावे म्हणून येशू ख्रिस्ताने, मी जो मुख्य त्या माझ्याविषयी आपली सर्व सहनशीलता दाखवावी म्हणून माझ्यावर दया झालीं“ (1 तीमथ्य 1:13-14,16).

पौलाचे परिवर्तन हे तुमच्यासाठीं होते. तुम्हीं ते ऐकले का? पुन्हा पहा: “जे युगानुयुगाच्या जीवनासाठीं त्याच्यावर विश्वास ठेवणारे आहेत, त्यांना उदाहरण व्हावे म्हणून येशू ख्रिस्ताने, मी जो मुख्य त्या माझ्याविषयी आपली सर्व सहनशीलता दाखवावी म्हणून माझ्यावर दया झालीं.” ते आम्हीं आहोत – म्हणजें, तुम्हीं आणि मी.

मला आशा आहे कीं तुम्हीं हे अगदी वैय्यक्तिकरित्या घ्याल. देवानें जेव्हां पौलाला निवडले आणि ज्याप्रकारे त्यानें आपल्या सार्वभौम कृपेद्वारे त्याला तारले तेव्हां हे सर्व त्यानें तुम्हांला लक्षात ठेऊन केलें.

जर तुम्हीं सार्वकालिक जीवनासाठीं येशूवर विश्वास ठेवता – अथवा जर तुम्हीं सार्वकालिक जीवनासाठीं त्याच्यावर आजही विश्वास ठेऊ शकता – तर पौलाचे परिवर्तन तुमच्यासाठीं आहे. ज्याप्रकारे त्याचे परिवर्तन घडून आले त्याचा मुद्दा तुम्हांला ख्रिस्ताचे अविश्वसनीय धैर्य हूबेहूब प्रगट करावे हा आहे.

लक्षात ठेवा कीं परिवर्तनापूर्वी पौलाचे जीवन येशूसाठीं एक दीर्घकालीक परीक्षा होती. “माझा छळ का करतोस?” दमिश्काच्या मार्गावर येशूनें विचारले (प्रेषितांची कृत्ये 9:4). “तुझे अविश्वासाचे आणि बंडखोरीचे जीवन हा माझा छळ आहे!” आणि तरीही पौल आम्हांला गलतीकरांस 1:15 मध्ये सांगतो कीं देवानें त्याला त्याच्या मातेच्या उदरातून जन्मल्यापासून त्याचा प्रेषित होण्यासाठीं वेगळे केलें. हे अद्भुत आहे. याचा अर्थ हा कीं त्याच्या परिवर्तनाच्या क्षणापर्यंत त्याचे संपूर्ण जीवन देवाशी एक दीर्घकालीक गैरवर्तन होते, येशूचा एक दीर्घकालीक अव्हेर आणि उपहास होता – ज्याने त्याला जन्मास येण्यापूर्वी प्रेषित होण्यासाठीं निवडले होते.

म्हणून पौल म्हणतो कीं त्याचे परिवर्तन येशूच्या धैर्याचे दैदित्यमान प्रदर्शन आहे. आणि तेच तो आज आम्हास देतो.

येशूनें पौलाला तारिले, व जेव्हां आणि ज्याप्रकारे त्यानें ते केलें, ते सर्व आम्हांला उदाहरण ठरावे यासाठींच. आम्हास “आपली सर्व सहनशीलता दाखवावी म्हणून” (1 तीमथ्य 1:16). अन्यथा आमचे धैर्य खचेल. अन्यथा आम्हीं असा विचार करू कीं तो खरोखर आम्हास तारू शकला नसता. कदाचित आम्हीं विचार करू कीं तो रागावू शकतो. कदाचित आम्हीं विचार करू कीं आम्हीं दूर निघून गेलो आहोत. कदाचित आम्हीं विचार करू कीं आमच्यां अतिप्रिय जणांचे परिवर्तन होऊ शकत नाहीं – येशूच्या सार्वभौम, ओसंडून वाहणाऱ्या कृपेद्वारे – अचानक, अनपेक्षितपणे.

24 अप्रैल : दुख से आनन्द की ओर

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24 अप्रैल : दुख से आनन्द की ओर
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“यह कहकर उसने अपना हाथ और अपना पंजर उनको दिखाए। तब चेले प्रभु को देखकर आनन्दित हुए।” यूहन्ना 20:20

पहला ईस्टर एक सामान्य ईस्टर उत्सव जैसा नहीं दिखा।

यीशु के पुनरुत्थान का समाचार आने से पहले वह दिन आँसुओं, तबाही और उलझन से भरा हुआ था—उसमें आनन्द, आशा और स्तुति बिल्कुल नहीं थे। शिष्य डर के मारे एक साथ इकट्ठा थे, एक-दूसरे को बचाने के लिए, यह गाने के लिए नहीं, “मसीह प्रभु आज जी उठा है, हालेलुयाह!”[1] वे दुखी बैठे थे; उनकी कहानी अचानक थम गई थी और अगला पन्ना खाली था।

या यह उनकी अपनी सोच थी।

बाइबल यीशु की क्रूस पर मृत्यु के बाद उसके अनुयायियों द्वारा महसूस किए गए दुख को नकारने या कम करने का प्रयास नहीं करती। वे नहीं समझ पाए थे कि क्या हुआ था और निश्चित रूप से उन्हें यह नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला था। उनका दुख मनुष्यजाति की सीमाओं को दर्शाता है कि हम बड़ी तस्वीर को पूरी तरह से नहीं समझ सकते। पुराने नियम की भविष्यवाणियों और यीशु द्वारा अपनी मृत्यु की नबूवत के बावजूद (मरकुस 8:31; 9:31; 10:33-34) यूहन्ना का सुसमाचार हमें बताता है कि “वे तो अब तक पवित्रशास्त्र की वह बात न समझे थे कि उसे मरे हुओं में से जी उठना होगा” (यूहन्ना 20:9)। वे यह नहीं समझे थे कि जब यीशु ने क्रूस से कहा, “पूरा हुआ” (19:30), तो वह पराजय की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि विजय की घोषणा थी।

इस विजय का अर्थ पुनरुत्थान था। और जब मृतकों में से जी उठा उद्धारकर्ता अपने शिष्यों के अंधकार, भय और दुख में आया, तो उनके लिए एक परिवर्तन ले आया। उनका अविश्वास विश्वास में और उनका दुख आनन्द में बदल गया। वह आनन्द इस तथ्य में निहित था कि वे समझ गए थे कि यीशु मृतकों में से जी उठा था। उनका विश्वास और भविष्य लौट आए थे, और इस अद्‌भुत वास्तविकता में जड़ें जमा ली थीं। उनकी निराशा के अंधकार ने पुनरुत्थान के प्रकाश को और भी महिमामय बना दिया था।

यदि आप किसी ऐसे देवता की तलाश में हैं जो आपको केवल आनन्द दे, तो आपको बाइबल के परमेश्वर की तलाश नहीं करनी चाहिए। वह हमें आनन्दित करता है—किसी भी अन्य व्यक्ति या वस्तु से अधिक—परन्तु वह अक्सर हमें दुख देकर आरम्भ करता है। हम इस टूटे हुए संसार से दुखी होते हैं, अपने पाप से दुखी होते हैं, इस बात से दुखी होते हैं कि यीशु ने हमारे पापों, अवज्ञा और उदासीनता के लिए क्रूस पर अपने प्राण दे दिए। केवल ऐसे सच्चे दुख की भावना से ही हम उस आनन्द को पूरी तरह समझ सकते हैं, जो हमारे हिसाब को चुकता करने, हमारे कर्ज को चुकाने और हमारे अपराधों को माफ करने के साथ आता है।

हम उस प्रेम का आनन्द ले सकते हैं जो हमें उस स्थिति में भी प्रेम करता है, जब हम इसके लायक नहीं होते—जो हमें तब भी प्रेम करता है जब हम सुनना नहीं चाहते। यह कैसा प्रेम है? यही है मनुष्यों के लिए, आपके और मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम! आज, अपने आप से आँखें हटाकर उसे देखिए। यही प्रेम है, और जब हम जान जाते हैं कि हमें इस तरह से प्रेम किया गया है, तो हम कष्टों में भी चंगाई देख सकते हैं और यह समझ सकते हैं कि दुख वह भूमि हो सकता है जिसमें अनन्त आनन्द पनपता है। आपके जीवन के किस भाग के बारे में—जो भाग शायद दर्द, पछतावे, या चिन्ता से भरा हुआ है—आपको आज यह सुनने की आवश्यकता है? याद रखें कि आप जिस भी परिस्थिति में से गुजर रहे हैं, यह सत्य कायम रहता है कि मसीह प्रभु जी उठा है। हालेलुयाह!

 यूहन्ना 20:19-23