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28 June : आज्ञापालनामुळें येणाऱ्या संकटांत धीर धरणें

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28 June : आज्ञापालनामुळें येणाऱ्या संकटांत धीर धरणें
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आपण आपल्यां विश्वासाचा उत्पादक व पूर्ण करणारा येशू ह्याच्याकडें पाहत असावे; जो आनंद त्याच्यापुढे होता त्याकरता त्यानें लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला. (इब्री 12:2).

विश्वास जे करतो ते कधी कधी अतिशय कठीण असते.

मिरेकल ऑन द रिव्हर क्वाई नावाच्या आपल्यां पुस्तकात अर्नेस्ट गॉर्डन द्वितीय विश्व युद्धादरम्यान बर्मा रेल्वेत काम करणाऱ्या पीओडब्लूच्या एका समूहाची खरी गोष्ट सांगतात.

प्रत्येक दिवसाच्या शेवटी काम करणार्यांकडून औजारे गोळा केली जात. एकदा एका जपानी पहारेकरूंनें एक फावडे गायब झाल्याचा आक्रोश केला आणि ते कोणत्या माणसानें घेतलें हे जाणून घेण्याची मागणी केली. तो आरडाओरड आणि शिवीगाळ करूं लागला, तो विक्षिप्त संतापानें ओरडू लागला आणि जो दोषी असेल त्यानें पुढे यावे असा आदेश त्यानें दिला. कोणीही हललें नाहीं. “सर्व मरतील! सर्व मरतील!” कैद्यांकडें आपली लहान बंदूकीं उंचावत आणि निशाणा साधत, तो किंचाळला. त्याच क्षणी एक माणूस पुढे आला आणि तो शांतपणें उभा असतांना पहारेकरूंनें त्याच्या रायफलनें त्याला ठार केलें. जेव्हां ते छावणीत परतलें, तेव्हां औजारे पुन्हा मोजली गेली आणि एकही फावडा गहाळ झालेंला नव्हता.

तुम्हीं निर्दोष असताना, इतरांसाठीं मरण्याची इच्छा कशामुळें टिकून राहू शकते? “जो आनंद त्याच्यापुढे होता” त्याद्वारें येशूनें आमच्यांवर प्रीती केली आणि त्या प्रेमात तो टिकून राहिला. तो भविष्यातील गौरवशाली आशीर्वाद आणि आनंदावर अवलंबून होता आणि त्यानें त्याला त्याच्या दुःखातूनही त्याच्या प्रेमात राखलें आणि टिकवून ठेवलें.

आम्हास धिक्कार असो जर आम्हीं असा विचार करतो कीं जो आनंद आमच्यांपुढें आहे त्यापेक्षा कुठल्यातरी उच्च हेतूनें आम्हीं मूलगामी, जीवघेण्या आज्ञापालनासाठीं प्रेरित झालें पाहिजे आणि बळ प्राप्त केलें पाहिजे. जेव्हां येशूनें मूल्यवान आज्ञापालनाची गरज व्यक्त केली ज्यासाठीं या जीवनात बलिदानाची आवश्यकता भासणार होती, तेव्हां त्यानें लूक 14:14 मध्यें असें म्हटलें, “म्हणजें तुम्हीं धन्य व्हाल, कारण तुमची फेड करण्यास त्यांच्याजवळ काहीं नाहीं; तरी नीतिमानांच्या पुनरुत्थानसमयी तुमची फेड होईल.” दुसऱ्या शब्दांत, जो आनंद तुमच्यांपुढे आहे, त्यासाठीं ख्रिस्तासाठीं तुम्हीं जें कांही गमावता त्यामध्यें आज दृढ व्हा.

पेत्रानें म्हटलें कीं, जेव्हां येशूनें सूड न घेता दुःख सोसलें, तेव्हां तो आपल्यांला अनुसरण करण्यासाठीं एक उदाहरण सोडून जात होता – आणि त्यात त्याच्यापुढे असलेंल्या आनंदात येशूचा भरवंसा समाविष्ट आहे. त्यानें त्याचे कार्य देवाच्या हाती सोपवलें (1 पेत्र 2:21) आणि सूडबुद्धीनें हिशेब चुकविण्याचा प्रयत्न केला नाहीं. त्यानें पुनरुत्थान आणि त्याच्या पित्यासोबत पुनर्मिलन आणि त्याच्या लोकांच्या मुक्तीच्या सर्व आनंदांवर आपली आशा आधारित केली. तसेच आपणही केलें पाहिजे.

27 जून: मसीह में निवास

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27 जून: मसीह में निवास
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“अभिमानी न हो, परन्तु दीनों के साथ संगति रखो।” रोमियों 12:16

घर एक अद्‌भुत स्थान हो सकता है। हममें से बहुतों के लिए घर वह स्थान है, जहाँ हम ईमानदार हो सकते हैं, जहाँ हम अपने परिवार के साथ होते हैं, और जहाँ सारी बातें—यहाँ तक कि हमारी कमियाँ भी—परिचित होती हैं। लेकिन शायद सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि असली घर वह है, जहाँ हम अपनी वास्तविकता में हो सकते हैं, वास्तविक विनम्रता में हो सकते हैं। ऐसा ही हमें परमेश्वर के लोगों की संगति में अनुभव करना चाहिए।

पौलुस द्वारा मसीहियों को दिया गया यह बुलावा कि “अभिमानी न हो, परन्तु दीनों के साथ संगति रखो,” हमें परमेश्वर के परिवार में एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध रखने का सही तरीका सिखाता है। “दीनों के साथ संगति” रखने के आदेश का अनुवाद इस तरह से भी किया जा सकता है, “साधारण काम करने को तैयार रहो।” दोनों अनुवाद उपयोगी हैं; हमें इतना अभिमानी नहीं होना चाहिए कि हम कुछ प्रकार के लोगों से मिलना न चाहें या कुछ प्रकार के काम करना न चाहें।

गैर-धार्मिक संसार में प्रतिष्ठा का माप सामाजिक स्थिति, महत्त्व, प्रभाव, धन, बुद्धिमत्ता आदि से किया जाता है। मसीही लोगों के बीच ऐसा नहीं होना चाहिए। वास्तव में, परमेश्वर के लोगों की एक पहचान यह होनी चाहिए कि भौतिकवाद, घमण्ड और अपमान, जो सामान्यतः गैर-धार्मिक समुदाय में पाए जाते हैं, वे अब मसीही समाज में प्रचलित नहीं होते।

हम कैसे अपने आस-पास की प्रचलित संस्कृति के प्रभाव में आ सकते हैं, जब हमारे प्रभु ने अपने बारे में कहा था कि “मनुष्य के पुत्र के लिए सिर धरने की भी जगह नहीं है” और वह “नम्र और मन में दीन” है (मत्ती 8:20; 11:29)? वह उन लोगों को बचाने नहीं आया जो स्वस्थ हैं, बल्कि उन्हें जो बीमार हैं (मरकुस 2:17)। वह संसार के निर्बलों को बुलाना जारी रखता है, ताकि वह बलवानों को लज्जित करता रहे (1 कुरिन्थियों 1:27)। यहाँ तक कि प्रेरित पौलुस ने भी, जो धर्मशास्त्र का योग्य शिक्षक था, अपनी सारी उपलब्धियों को कूड़ा-कर्कट माना, ताकि मसीह को प्राप्त करे (फिलिप्पियों 3:8)।

यीशु एक कलीसिया बना रहा है, और जो कलीसिया वह बना रहा है, वह परमेश्वर का परिवार है। हमारा पिता स्वर्ग में है, हमारा बड़ा भाई शासन कर रहा है, और हमारे भाई-बहन हमारे साथ मिलकर आराधना कर रहे हैं। अगली बार जब आप अपनी कलीसिया परिवार के साथ हों, तो अपने आराम क्षेत्र से बाहर कदम रखें और परिवार के ऐसे सदस्य को जानने का प्रयास करें जिसके साथ आप सामान्यतः बातचीत नहीं करते। अगली बार जब आपको कोई ऐसा काम करने के लिए कहा जाए या कोई भूमिका निभाने के लिए कहा जाए जो स्वाभाविक रूप से आपकी रुचि नहीं है, तो खुद से यह सवाल करें कि क्या यह विनम्र बनने और घमण्डी न बनने का एक अवसर है। आखिरकार, हमारे बड़े भाई ने क्रूस पर मरने को अपनी बदनामी नहीं समझा, और वह वहाँ इसलिए मरा ताकि वह हमारे जैसे नीच पापियों को उठाए। उसके क्रूस के नीचे की ज़मीन समतल है। और इस प्रकार, उसका परिवार विनम्र प्रेम से पहचाना जाए।

मरकुस 1:40 – 2:17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 1–3; प्रेरितों 1 ◊

27 June : लाचार व्यक्तीसाठींआश्रयाचे ठिकाण

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27 June : लाचार व्यक्तीसाठींआश्रयाचे ठिकाण
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तुझें चांगुलपण किती थोर आहे! तुझें भय धरणाऱ्यांकरता तू ते साठवून ठेवलें आहेस, तुझा आश्रय करणाऱ्यांसाठीं मनुष्यमात्रांदेखत तू ते सिद्ध केलें आहेस. (स्तोत्र 31:19).

भविष्यातील कृपेचा अनुभव अनेकदा या गोष्टीवर अवलंबून असतो कीं आपण परमेश्वरामध्यें आश्रय घेणार आहोत, कीं आपण त्याला आपल्यांविषयीं  असलेंल्या काळजीबद्दल शंका घेणार व आश्रय मिळविण्यासाठीं दुसऱ्यां कोणत्या ठिकाणी निवारा शोधणार.

जे देवाच्या पंखाखाली आश्रय घेतात त्यांच्यासाठीं, भविष्यातील कृपेची अभिवचनें अनेक आणि संपन्न आहेत.

  •  त्याचा आश्रय धरणाऱ्या कोणावरही दंडाज्ञा नाहीं. (स्तोत्र 34:22)
  • त्याचा आश्रय करणाऱ्या सर्वांची तो ढाल आहे. (2 शमुवेल 22:31)
  • त्याला शरण जाणारे सगळे धन्य होत. (स्तोत्र 2:12)
  • परमेश्वर चांगला आहे, विपत्काली तो शरणदुर्ग आहे; जे त्याच्यावर भाव ठेवतात त्यांना तो ओळखतो. (नहूम 1:7)

परमेश्वराठायी शरण घेण्याद्वारें आम्हीं काहींही कमावत नाहीं अथवा आम्हीं कुठल्याही गोष्टीसाठीं पात्र ठरत नाहीं. आम्हीं दुर्बळ आहोत आणि आम्हांला संरक्षणाची गरज आहे म्हणून, लपणें हे आमच्यां आत्मनिर्भरतेची प्रशंसा करणारे कार्य नाहीं. त्याद्वारें फक्त हे दिसून येते कीं आम्हीं स्वतःला लाचार समजतो आणि लपण्याच्या ठिकाणास बचावाचे ठिकाण समजतो.

मीं आताच वर जीं जीं अभिवचनें नमूद केलीं आहेंत त्यां सर्व अभिवचनांमध्यें, देवाकडून मोठ्या आशीर्वादाची अट ही आहे कीं आम्हीं त्याच्याठायी शरण घ्यावी. ही अट गुणसंपन्नतेची नाहीं; ही अट आतुरतेची आणि मान्य केलेंल्या दुर्बळतेची आणि गरजेची व भरवश्याची अभिव्यक्ती आहे.

आतुरता मागणी करीत नाहीं किंवा आम्हांस पात्र ठरवीत नाहीं. ती दयेची याचना करते आणि कृपा मिळविण्यासाठीं झटते.

26 जून : मेलजोल से रहो

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26 जून : मेलजोल से रहो
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आपस में एक सा मन रखो।” रोमियों 12:16

शालीनतापूर्वक असहमत होने के लिए कौशल और परमेश्वर-निष्ठा की आवश्यकता होती है। जिन लोगों के साथ हमारी हर बात में सहमति होती है, उनके साथ मेलजोल से रहना आसान होता है, क्योंकि वहाँ किसी प्रकार की असहमति का कोई डर नहीं होता। लेकिन जिन लोगों से हम अलग दिखते हैं और अलग तरीके से जीते हैं—उनके साथ मेलजोल से रहना एक सच्ची मसीही परिपक्वता का चिह्न है। इसलिए प्रेरित पौलुस की अपेक्षा यह है कि मसीहियों के रूप में हम ऐसा ही करने का प्रयास करेंगे।

मेलजोल से रहने के लिए पौलुस का बुलावा एक विशेष प्रकार की समरूपता में रहने का बुलावा नहीं है, जहाँ हम सभी एक जैसा कपड़े पहनें, एक जैसा व्यवहार करें, एक जैसा मतदान करें, और एक जैसा बोलें। वास्तव में, रोम की कलीसिया निश्चित रूप से विविध लोगों का समूह था, जिनकी पृष्ठभूमि और वरदान विविध थे। पौलुस ने इस बात पर जोर दिया कि ये विविधताएँ विभाजन या शर्म का कारण नहीं बननी चाहिएँ।

पौलुस चाहता था कि रोम के कलीसिया के लोग “आपस में एक सा मन रखें।” ठीक वैसे ही जैसे उसने कुरिन्थियों की कलीसिया से यह अपील की थी, “मैं तुमसे हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से विनती करता हूँ कि तुम सब एक ही बात कहो, और तुम में फूट न हो, परन्तु एक ही मन और एक ही मत होकर मिले रहो” (1 कुरिन्थियों 1:10)।

सुसमाचार हमारी विविधताओं या असहमति को मिटाता नहीं है। बल्कि परमेश्वर के लोगों के बीच एकता—अर्थात मसीह का सुसमाचार और उसके वचन का सत्य—हमें यह स्वीकार करने की स्वतन्त्रता देता है कि हम गौण मुद्दों पर भिन्न और असहमत हो सकते हैं। मसीही एकता अन्ततः हमारी राजनीति, हमारी सामाजिक स्थिति, या हमारे इस विचार से नहीं आती कि कालीन का रंग क्या होना चाहिए, बल्कि उस एक से आती है, जिसे हम “मार्ग, सत्य, और जीवन” मानते हैं (यूहन्ना 14:6)।

दुर्भाग्य से, कलीसिया अपनी असहमतियों से विचलित हो सकती हैं, और मसीही लोग अपनी व्यक्तिगत चिन्ताओं और प्राथमिकताओं को अत्यधिक महत्त्व दे सकते हैं। हममें से कुछ लोग हर मुद्दे को ऐसा मुद्दा बना देते हैं, जिससे विभाजन हो और इस प्रकार हम कर्मकाणडवादी बन जाते हैं, बाल की खाल उतारने में उलझ जाते हैं और तब तक सन्तुष्ट नहीं होते जब तक हम एक सदस्य वाली कलीसिया नहीं रह जाते। हममें से कुछ लोगों को कठिनाई होती है कि हम किसी मुद्दे पर खड़े हों और उस पर समझौता न करें, और इस प्रकार हम धर्मशास्त्र के सम्बन्ध में उदारवादी बन जाते हैं, और सुसमाचार के केन्द्रीय सत्य से समझौता कर बैठते हैं।

पौलुस हमें जिस सामंजस्य के लिए संघर्ष करने का बुलावा देता है, वह सुसमाचार का सामंजस्य है। हमें खुद को इस तरह से जानने की आवश्यकता है कि हम यह पहचान सकें कि क्या हम कर्मकाणडवादी हैं या उदारवादी। हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें अपने भाई-बहनों के प्रति मन की स्पष्टता और हृदय की दया से भरे। और फिर हमें अपने दिलों की जाँच करनी चाहिए कि क्या कोई ऐसा है जिसके साथ हम सहमत नहीं हैं और फिर हमें उस सुसमाचार के सामंजस्य को नष्ट करने के बजाय उसे बढ़ावा देने के लिए कदम उठाने चाहिएँ, जो मसीह हमारे लिए लेकर आया है।

भजन 133

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: योएल; फिलिप्पियों 4

26 June : भीती जी आम्हास आत ओढून घेते

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26 June : भीती जी आम्हास आत ओढून घेते
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“भिऊ नका. कारण तुमची परीक्षा पाहावी आणि त्याचे भय तुमच्यां मनात राहून तुम्हीं पाप करूं नये ह्यासाठीं देव आला आहे.” (निर्गम 20:20)

एक अशी भीती आहे जी गुलाम बनविते आणि आम्हांला देवापासून दूर करते, आणि अशी भीती आहे जी गोड आहे आणि आम्हांला देवाकडें ओढते. मोशेनें एकाविरूद्ध ताकींद दिली आणि त्याच वचनात दुसरीची मागणी केली, निर्गम 20:20: “तेव्हां मोशे लोकांना म्हणाला, “भिऊ नका. कारण तुमची परीक्षा पाहावी आणि त्याचे भय तुमच्यां मनात राहून तुम्हीं पाप करूं नये ह्यासाठीं देव आला आहे.”

अशाप्रकारच्या चांगल्या भीतीचे सर्वात स्पष्ट उदाहरण जे मी कधी पाहिलें आहे ते ती वेळ होती जेव्हां माझ्या मुलांपैकीं एकानें जर्मन शेफर्डच्या डोळ्यात डोळे घालून पाहिलें. आमच्यां मंडळीतील एका कुटुंबास आम्हीं भेट देत होतो. माझा मुलगा कार्स्टेन सुमारे सात वर्षांचा होता. त्यांच्याजवळ एक मोठा कुत्रा होता जो सात वर्षाच्या मुलाच्या डोळ्यात डोळे घालून उभा होता.

तो मित्रभावी होता आणि कार्स्टेनला मित्र बनविण्यात काहीं समस्या नव्हती. पण जेव्हां आम्हीं कार्स्टेनला आम्हीं विसरलेंली काहीं वस्तू आणण्यासाठीं परत कारजवळ पाठविलें, तेव्हां तो धावू लागला, आणि कुत्रा त्याच्या मागे हळूहळू गुरगुरत धावत होता. आणि अर्थातच, यामुळें कार्स्टेन घाबरून गेला. पण मालकानें म्हटलें, “कार्स्टेन, तू चालत का जात नाहींस? लोक त्याच्यापासून पळावे  ही गोष्ट कुत्र्याला आवडत नाहीं.”

जर कार्स्टेननें कुत्र्याला मिठी मारली, तर तो मित्रभावी होईल आणि त्याच्या चेहऱ्याला चाटत असें. पण जर तो कुत्र्यापासून पळ काढायचा, तर कुत्रा गुरगुर करूं लागत असें आणि यामुळें कार्स्टेन घाबरून जात असें.

परमेश्वराचे भय धरण्याचा अर्थ काय आहे याचे हे चित्र आहे. देव त्याच्या सामर्थ्यासाठीं पावित्र्यासाठीं आमच्यांमध्यें भीती जागृत करतो, आम्हांला त्याच्यापासून दूर पळविण्यासाठीं नाहीं, पण आम्हांला त्याच्याजवळ ओढण्यासाठीं. देवाला भिण्याचा अर्थ, प्रथमतः, अशा विचाराची भीती कीं आमची सर्वात मोठी सुरक्षा व समाधान म्हणून त्याचा त्याग करून जाणें.

दुसऱ्या शब्दात म्हणायचे झाल्यास, आपण अविश्वासाची भीती बाळगली पाहिजे. देवाच्या चांगुलपणावर विश्वास ठेवण्यास भिऊ नका. रोम 11:20 चा हाच मुद्दा नाहीं का? “बरे, अविश्वासामुळें त्या तोडून टाकण्यात आल्या आणि विश्वासानें तुला स्थिरता आली, तर अहंकार बाळगू नकोस, भीती बाळग.” अर्थात, ज्याची भीती बाळगली पाहिजे ते आहे विश्वास न करणें, विश्वास न बाळगणें. देवापासून दूर पळून जाण्याची भीती. पण जर आपण त्याच्यासोबत चालत असू आणि त्याच्या गळ्याला मिठी मारत असू, तर तो सदैव आपला मित्र आणि संरक्षक ठरेल.

25 जून : दूसरों के साथ आनन्द मनाना

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25 जून : दूसरों के साथ आनन्द मनाना
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“आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो, और रोने वालों के साथ रोओ।” रोमियों 12:15

साझी खुशी सहानुभूति का एक महान अभिव्यक्ति है। हम आमतौर पर सहानुभूति शब्द का उपयोग साझा दुख को व्यक्त करने के लिए करते हैं—लेकिन यह खुशी पर भी लागू होता है।

हम सहानुभूति को तब समझ पाते हैं जब हम इसे वाक्य में उपयोग करते हैं, लेकिन स्वयं इस शब्द को परिभाषित करना मुश्किल हो सकता है। इसके विपरीत शब्द को देखें: उदासीनता। यदि उदासीनता यह कहने के समान है, “मुझे कोई परवाह नहीं है,” तो सहानुभूति यह कहने के समान है, “मुझे बहुत परवाह है।” सहानुभूति किसी अन्य व्यक्ति के अनुभव के साथ पहचान बनाने का नाम है।

हममें से कई लोगों के लिए “रोने वालों के साथ रोना” स्वाभाविक रूप से आसान होता है। यह हमारे लिए स्वाभाविक है कि हम जिनसे प्यार करते हैं, उनके दुख और निराशा में शामिल हों और उनके दुख को देखकर या सोचकर रोएँ। यह एक अच्छी बात है, क्योंकि “एक दूसरे का भार उठाना” वास्तव में “मसीह की व्यवस्था को पूरा करना” है (गलातियों 6:2)। लेकिन दूसरों की खुशी और सफलता में शामिल होना अक्सर एक बड़ी चुनौती होता है, क्योंकि इसके लिए हमें हमारे मानव स्वभाव के पतन के खिलाफ काम करना पड़ता है, जो कि नाराजगी और कड़वाहट की ओर प्रवृत्त होता है। किसी की सफलता हमारे लिए परमेश्वर की महिमा करने और उसका धन्यवाद करने का अवसर बनने के बजाय, आसानी से ईर्ष्या का कारण बन सकती है।

हममें से अधिकांश लोग यह जानते हैं कि ईर्ष्या व्यक्त करने से कैसे बचना है। लेकिन ईर्ष्या को व्यक्त न करने और ईर्ष्या को महसूस न करने में एक बड़ा अन्तर है। हम अपना व्यवहार इस हद तक संशोधित कर सकते हैं कि इसे दिखने से रोक सकें, लेकिन इसे महसूस न करने के लिए आत्मिक परिवर्तन की आवश्यकता होती है। यह परिवर्तन मसीह की देह के सदस्य के रूप में हमारी पहचान को सही ढंग से समझने से आरम्भ होता है। पौलुस कहते हैं कि “हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं” (रोमियों 12:5)। मसीह में होने का अर्थ है कि हम उसमें हैं और एक-दूसरे के अंग हैं।

दूसरे शब्दों में: यदि हम मसीह में हैं, तो हम सभी एक ही टीम हैं। जब हम इसे समझ जाते हैं, तो किसी और की खुशी में शामिल होना हमारे लिए उतना ही स्वाभाविक हो जाता है, जितना एक फुटबॉल खिलाड़ी के लिए अपने साथी के मैच को जिताने वाले गोल पर खुशी मनाना होता है, मानो वह गोल उसने खुद किया हो। परमेश्वर के लोगों के रूप में, हम एकसाथ मिलकर जीतते और हारते हैं—हम एकसाथ मिलकर आनन्दित होते हैं और शोक करते हैं।

परमेश्वर का वचन आपसे कहता है कि आपका “प्रेम निष्कपट हो” (रोमियों 12:9)—और वास्तविक, मसीह जैसा प्रेम आपकी भावनाओं को इस प्रकार से ढालता है कि ईर्ष्या खुशी में बदल जाती है और उदासीनता वास्तविक सहानुभूति में बदल जाती है। क्या कोई ऐसा है जिससे आप उसकी खुशी या गमी में किसी तरह से दूर खड़े हैं? क्या आपने सोचा है कि आज आप किसे प्रोत्साहित कर सकते हैं? लगभग निश्चित रूप से कोई ऐसा होगा जिसे आपको यह बताना चाहिए कि आप उनके साथ हैं, उनके लिए प्रार्थना कर रहे हैं और जब वे गहरे घाटी से गुजर रहे हैं, तो उनके साथ खड़े हैं। वैसे ही, कोई ऐसा होगा जिसकी खुशी आप साझा कर सकते हैं और उन्हें बता सकते हैं कि आप उनके जीवन पर परमेश्वर के अनुग्रह के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं। ऐसा व्यक्ति बनें जिसके बारे में यह कहा जा सके, “वह बहुत परवाह करता है।” आज परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह अपने आत्मा के द्वारा आप में काम करे और आपको ऐसा ही व्यक्ति बनाए।

2 कुरिन्थियों 1:2-7

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 51–52; फिलिप्पियों 3 ◊

25 June : लोभ म्हटलेला मृत्यूचा सापळा

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25 June : लोभ म्हटलेला मृत्यूचा सापळा
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परंतु जे धनवान होऊ पाहतात ते परीक्षेत, पाशात आणि माणसांना नाशात व विध्वंसात बुडवणाऱ्या अशा मूर्खपणाच्या व बाधक वासनांत सापडतात. (1 तीमथ्य 6:9).

लोभ मनुष्याला सर्वकाळासाठीं नरकात नाश करूं शकतो.

मला खात्री आहे कीं हा नाश अस्थायी आर्थिक संकट नसून, नरकात होणारा अंतिम विनाश आहे याचे कारण तीन वचनांनंतर 1 तीमथ्य 6:12 मध्यें पौल जे काहीं म्हणतो ते आहे. तो म्हणतो कीं लोभाचा प्रतिकार विश्वासाद्वारें लढा देऊन केला गेला पाहिजे. मग तो पुढे म्हणतो, “युगानुयुगाच्या जीवनाला बळकट धर; त्यासाठींच तुला पाचारण झालें आहे, आणि तू पुष्कळ साक्षीदारांदेखत तो चांगला पत्कर केला आहेस.” लोभापासून पळ काढण्यात आणि भविष्यातील कृपेवर विश्वास ठेवून समाधानासाठीं लढण्यात जे पणास लागत असेल ते म्हणजें सार्वकालिक जीवन.

म्हणून, जेव्हां पौल 1 तीमथ्य 6:9 मध्यें म्हणतो कीं धनवान होण्याची परीक्षा लोकांचा नाश करते, तो असें म्हणत नाहीं कीं लोभ तुमच्यां वैवाहिक जीवनाचा अथवा उद्योगाचा (जे तो नक्कीच करूं शकतो!) नाश करतो. तो म्हणत आहे कीं लोभ तुमच्यां सार्वकालिक जीवनाचा नाश करूं शकतो. किंवा, जसे 1 तीमथ्य 6:10 मध्यें शेवटी म्हटलें आहे, “कारण द्रव्याचा लोभ सर्व प्रकारच्या वाइटाचे एक मूळ आहे; त्याच्या पाठीस लागून कित्येक विश्वासापासून बहकलें आहेत; आणि त्यांनी स्वतांस पुष्कळशा खेदांनी भोसकून घेतलें आहे” (अक्षरशः “स्वतःला अनेक दुःखांनी क्रुसावर चढविलें आहे”).

बायबलमध्यें देवानें अतिरिक्त मैल पुढे जाऊन आम्हास अत्यंत दयाळूपणें ताकींद दिली आहे कीं लोभाची मूर्तिपूजा प्रतिकूल परिस्थिती आहे. शब्दाच्या दुसऱ्या अर्थानें सांगितलें झाल्यास तेथून पुढे जाण्याचा मार्ग नाहीं. ती एक युक्ती आणि प्राणघातक सापळा आहे.

म्हणून, तुम्हास माझा शब्द आहे 1 तीमथ्य 6:11 चे हे वचन: “तू ह्यांपासून पळ काढ.” जेव्हां तुम्हीं ते येतांना पाहता (टेलीविजनच्या जाहिरातीत अथवा ख्रिसमसच्या कॅटलॉगमध्यें अथवा इंटरनेंट पॉप-अप अथवा शेजाऱ्याच्या खरेदीमध्यें), तेव्हां त्यापासून असा पळ काढा जसे तुम्हीं प्राणी संग्रहालयातून सुटलेंल्या गरजणाऱ्या, भूकेल्यां सिंहापासून पळ काढाल. “युगानुयुगाच्या जीवनाला बळकट धर.”

24 जून : आत्मिक उन्माद

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24 जून : आत्मिक उन्माद
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“प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरे रहो; प्रभु की सेवा करते रहो।” रोमियों 12:11

कल्पना कीजिए एक पुराने ब्रिटिश फार्म हाउस के रसोईघर की, जिसमें चूल्हे पर एक बर्तन रखा है, जिसमें पानी उबाल रहा है। यहाँ पर हमें आत्मिक प्रतिबद्धता के बारे में बताते हुए पौलुस इसी चित्र को प्रस्तुत करता है। वह हमें यह बताता है कि मसीह में हमें अपने आत्मिक “बर्तन” को उबलता हुआ रखना है। हमें एक पल गर्म और दूसरे पल ठण्डा नहीं होना है, अर्थात हमें एक पल उत्साही और फिर दूसरे पल उत्साह खो देना नहीं है।

एक बार जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें पकड़ लिया है और मसीह ने हमें बदल दिया है और हमने विश्वास के द्वारा उसकी धार्मिकता प्राप्त कर ली है, तो यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि हम उस धार्मिकता को अपनी दैनिक जीवन में लागू करें। इसका एक हिस्सा यह है कि हम मसीह के कार्य को एक दिव्य उत्साह के साथ करें, जिससे वह हमें प्रेरित करता है।

हालाँकि, आलस्य में पड़ना और आध्यात्मिक रूप से आधे दिल से जीना बहुत आसान है। नीतिवचन में बार-बार, कभी-कभी हँसी के साथ, आलस्य के खतरों और इसके परिणामों के बारे में हमें चेतावनी दी गई है। एक नीतिवचन में एक आदमी का चित्रण किया गया है, जो इतना आलसी है कि उसने जो चम्मच कटोरी में डाला है, उसे बाहर निकालने का प्रयास भी नहीं करता (नीतिवचन 19:24; 26:15)। एक और नीतिवचन आलस्य को इस तरह से दर्शाता है जैसे एक आदमी अपने बिस्तर में खुद को छिपाकर पड़ा रहे और वहाँ से न उठे: “जैसे किवाड़ अपनी चूल पर घूमता है, वैसे ही आलसी अपनी खाट पर करवटें लेता है।” (नीतिवचन 26:14)।

इसके विपरीत, आत्मा द्वारा प्रेरित जो उत्साह है, उसका मुख्य उद्देश्य परमेश्वर की सेवा करना है। यह हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हम इस उद्देश्य को याद रखें! जब हम ऐसा करते हैं, तो हम महसूस करते हैं कि हमारा छोटे से छोटा काम भी—चाहे वह किसी ग्राहक से मिलना हो, घर की सफाई करना हो, बर्तन धोना हो, दूसरों को सिखाना हो, नोट्स लेना हो, टीक लगाना हो, या अपने बच्चों से बात करना हो—सब कुछ आत्मिक आराधना का हिस्सा बन सकता है। हमारे दिन का हर हिस्सा, चाहे वह कितना भी सामान्य क्यों न हो, हमारे दिव्य उत्साह को दर्शा सकता है।

इन दिनों आपके आत्मिक उत्साह को क्या प्रेरित करता है? क्या यह आराधना में मसीह की सेवा है? किसी सहकर्मी या अजनबी से अपना विश्वास साझा करना है? अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना है? विश्व भर में मसीह के काम को समर्थन देना है? यह जो भी हो, अपना उत्साह कम न होने दें। प्रत्येक दिन के प्रत्येक पल में उण्डेले जाने वाले उसके अनुग्रह के प्रत्युत्तर में प्रभु की सेवा करते हुए पानी को उबलता रहने दें। हर सुबह, परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको थकने से बचाए। फिर, सब बातों में उसके नाम का प्रचार होगा और वह महिमा प्राप्त करेगा।

गलातियों  6:1-10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 50; फिलिप्पियों 2

24 June : मी सर्व परिस्थितीत समाधानी राहू शकतो

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24 June : मी सर्व परिस्थितीत समाधानी राहू शकतो
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मला काहीं कमी पडल्यामुळें मी बोलतो असें नाहीं; कारण ज्या स्थितीत मी आहे तिच्यात मी स्वावलंबी राहण्यास शिकलो आहे. दैन्यावस्थेत राहणें मला समजते, संपन्नतेतही राहणें समजते; हरएक प्रसंगी अन्नतृप्त असणें व क्षुधित असणें, संपन्न असणें व विपन्न असणें, ह्याचे रहस्य मला शिकवण्यात आलें आहे. मला जो सामर्थ्य देतो त्या ख्रिस्ताकडून मी सर्वकाहीं करण्यास शक्तिमान आहे. (फिलिप्पै 4:11-13)

भविष्यातील कृपेची देवाची रोजची तरतूद पौलास अन्नतृप्त असण्यास किंवा क्षुधित असण्यास, संपन्न असण्यास किंवा दुःख सोसण्यास, विपुलता मिळविण्यास किंवा विपन्नावस्थेत जगण्यास सामर्थ्य पुरविते.

“मी सर्वकाहीं करण्यास शक्तीमान आहे” याचा अर्थ खरोखर “सर्वकाहीं” असा होतो, केवळ सोप्या गोष्टी नव्हे. “सर्वकाहीं” चा अर्थ आहे, ख्रिस्ताद्वारें मी उपासमार सहन करूं शकतो, दुःख सोसू शकतो आणि दैन्यावस्थेत राहू शकतो.” हे फिलिप्पै 4:19 मधील प्रभावशाली वचनास त्याच्या योग्य प्रकाशात मांडते: “माझा देव आपल्यां संपत्त्यनुरूप तुमची सर्व गरज ख्रिस्त येशूच्या ठायी गौरवाच्या द्वारें पुरवील.”

फिलिप्पै 4:11-12च्या दृष्टिकोनात “तुमची सर्व गरज” चा अर्थ काय आहे? त्याचा अर्थ “त्या सर्व गोष्टी ज्याची गरज तुम्हांला देवाला गौरविणाऱ्या समाधानासाठीं भासते.” ज्यात भूक आणि गरजेच्या वेळांचा समावेश आहे. फिलिप्पैकरांसाठीं पौलाची प्रीती देवामधील त्याच्या समाधानापासून प्रवाहित होत असें, आणि त्याचे समाधान विपुलतेच्या आणि अभावाच्या वेळेत त्याला ज्या सर्व गोष्टींची गरज असें ती पुरविणाऱ्या देवाच्या खात्रीपूर्ण तरतुदीच्या भविष्यातील कृपेवरील त्याच्या विश्वासातून प्रवाहित होत असें.

तर हे स्पष्ट आहे कीं लोभ हा विश्वासाच्या अगदी विरुद्ध आहे. ही ख्रिस्तामधील समाधानाची हानी आहे यासाठीं कीं आपण आपल्यां हृदयाच्या अभिलाषा पूर्ण करण्यासाठीं इतर गोष्टींची इच्छा धरू लागतो ज्याचे समाधान केवळ देवाचे सान्निध्य करूं शकते. आणि यात काहीं चूक नाहीं कीं लोभाविरुद्धची लढाई ही देवाचे अभिवचन प्रत्येक परिस्थितीत आम्हास आवश्यक असलेंल्या गोष्टींत सर्वप्रकारे तरतूद करूं शकते याविषयीं अविश्वास करण्याविरुद्धची लढाई आहे.

हे इब्री 13:5 मध्यें पूर्णपणें स्पष्ट आहे. द्रव्यलोभापासून आमच्यां सुटकेबद्दल  – लोभापासून सुटकेबद्दल – देवामध्यें असलेंल्या समाधानाच्या स्वातंत्र्याबद्दल लेंखक कसा युक्तिवाद मांडतो ते पहा : “तुमची वागणूक द्रव्यलोभावाचून असावी; जवळ आहे तेवढ्यात तुम्हीं तृप्त असावे; कारण त्यानें स्वतः म्हटलें आहे, “मी तुला सोडून जाणार नाहीं व तुला टाकणार नाहीं” या अभिवचनावरील विश्वास – “मी तुला सोडून जाणार नाहीं व तुला टाकणार नाहीं” देवाचा अनादर करणाऱ्या सर्व इच्छेचे – सर्व लोभाचे – सामर्थ्य तोडते

जेव्हां जेव्हां आपल्यांला आपल्यां अंतःकरणात लोभाचा थोडा देखील उदय झाल्याचे जाणवते तेव्हां तेव्हां आपण त्याकडें वळून या विश्वासाच्या शस्त्रास्त्रांचा उपयोग करून आपली सर्व शक्ती पणास लावून त्याच्याशी लढा दिला पाहिजे.

23 जून : भाईचारे का प्रेम

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23 जून : भाईचारे का प्रेम
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“भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो। रोमियों 12:10

युवा भाई-बहन अक्सर एक-दूसरे को धक्का देते हैं और एक-दूसरे की शिकायत करते हैं। यदि हम ईमानदार हों, तो कभी-कभी कलीसिया में हमारा “भाईचारे का स्नेह” इस तरह की सोच और व्यवहार से अधिक प्रभावित होता है, बजाय इसके कि यह प्रेम और आभार से भरपूर हो। जब हम एक-दूसरे की ओर देखते हैं, तो हम यह गाने के बजाय कि “हमें खुशी है कि हम परमेश्वर के परिवार का हिस्सा हैं,”[1] हम अक्सर गहरी सोच में डूबकर यह गाते हैं, “मुझे हैरानी है कि तुम परमेश्वर के परिवार का हिस्सा हो।”

पौलुस हमें एक बेहतर मार्ग की ओर बुलाता है।

इस वाक्य में प्रेम को पारिवारिक शब्दों के माध्यम से वर्णित किया गया है। फिलोस्टोर्गोई, जिसका अनुवाद यहाँ “प्रेम” किया गया है, यूनानी शब्द स्टोर्गे से आया है, जो माता-पिता के लिए अपने बच्चों के प्रति समर्पित प्रेम को दर्शाता है। फिलाडेल्फिया, जिसका अनुवाद यहाँ “भाईचारे का प्रेम” किया गया है, वह शब्द है जो भाई-बहनों के बीच के प्रेम के लिए प्रयोग होता है (जैसे फिलाडेल्फिया शहर का नाम, “भाईचारे के प्रेम का शहर”)। रोमियों 8 में पौलुस अपने पाठकों को यह याद दिला चुका है कि वे परमेश्वर के अनुग्रह से एक ही परिवार का हिस्सा हैं (रोमियों 8:12-17)। अब चूंकि वे सभी एक ही आधार पर—अर्थात यीशु में—परमेश्वर के परिवार में लाए गए हैं, इसलिए अनिवार्य है कि वे एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहें।

इस प्रकार के प्रेम के लिए केवल वास्तविक स्नेह ही नहीं बल्कि विनम्रता भी आवश्यक है। हिन्दी की बाइबल में इस पद के दूसरे वाक्य का अनुवाद इस प्रकार किया गया है, “परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो।” यह हमें फिलिप्पियों 2 की याद दिलाता है, जहाँ पौलुस लिखता है, “दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो” (फिलिप्पियों 2:3)। पवित्रशास्त्र हमें दूसरों को पहले स्थान पर रखने का बुलावा देता है। हमें दूसरे स्थान पर खड़ा होना सीखना होगा, और वह भी बिना शिकायत किए या इस तरह से प्रशंसा पाने की उलटी कोशिश किए। कलीसिया के परिवार में केवल एक ही प्रतिस्पर्धात्मक तत्व होना चाहिए, और वह यह कि कौन सबसे अधिक दूसरों की मदद कर सकता है।

इस प्रकार के भाईचारे के प्रेम के बारे में सोचना हमें वापिस यीशु की ओर ले आता है, जो हमें अपने भाई-बहन कहकर पुकारना पसन्द करता है (इब्रानियों 2:11-15)। क्योंकि यीशु, “जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा, वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया” (फिलिप्पियों 2:6-7)। यीशु ही दिखा सकता है कि सच्चे भाईचारे का प्रेम क्या होता है; यीशु ही अपने परिवार से इस प्रकार का प्रेम करता है, जो सम्मान दिखाने में सबसे आगे है; यीशु ही है जिसके जैसे बनने का बुलावा हमें दिया गया है, और जब भी हम मसीह के जैसा भाईचारे का प्रेम दिखाने का चुनाव करते हैं, तो हम उसके जैसा ही जी रहे होते हैं। इसलिए आज उसके जैसा प्रेम करें।

1 शमूएल 20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 48–49; फिलिप्पियों 1 ◊


[1] ग्लोरिया गेदर ऐण्ड विलियम जे. गेदर, “द फैमिली ऑफ गॉड” (1970).