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26 May : धीराने वाट पाहण्यासाठीं बळ

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26 May : धीराने वाट पाहण्यासाठीं बळ
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“सर्व प्रकारचा धीर व सहनशक्ती ही तुम्हांला आनंदासह प्राप्त व्हावी म्हणून त्याच्या गौरवाच्या पराक्रमानुसार तुम्हीं सर्व प्रकारच्या सामर्थ्याने समर्थ व्हावे.” (कलस्सै 1:11).

“समर्थ व्हावे” हा योग्य शब्द आहे. प्रेषित पौलाने कलस्सै येथील मंडळीसाठीं प्रार्थना केलीं, कीं “सर्व प्रकारचा धीर व सहनशक्ती ही तुम्हांला आनंदासह प्राप्त व्हावी म्हणून त्याच्या गौरवाच्या पराक्रमानुसार तुम्हीं सर्व प्रकारच्या सामर्थ्याने समर्थ व्हावे. (कलस्सै 1:11). धीर हा आंतरिक सामर्थ्याचा पुरावा आहे.

उतावळे लोक दुर्बळ असतात, आणि म्हणून ते बाहेरील मदतीवर अवलंबून असतात – जसे कीं वेळापत्रके जी योग्य असतात पण त्यांच्या नाजूक हृदयाला आधार देणारी परिस्थिती. त्यांच्या शपथांचा आणि धोक्यांचा आणि त्यांच्या योजनांस आड येणाऱ्या गुन्हेगारांच्या कठोर टीकांचा भडीमार दुर्बळ वाटत नाहीं. पण तो गलबला हे सर्व दुर्बलतेचे आवरण आहे. धीरासाठीं अति विशाल आंतरिक बळाची गरज भासते.

खिस्ती व्यक्तीच्या बाबतींत, हे सामर्थ्य त्याला देवाकडून प्राप्त होते. म्हणूनच पौल कलस्सैकरांसाठीं प्रार्थना करत आहे. तो देवाकडे विनंती करत आहे कीं खिस्ती जीवनासाठीं आवश्यक असलेल्या धीर व सहनशीलतेसाठीं त्यानें त्यांना सामर्थ्य द्यावे. पण जेव्हां तो म्हणतो कीं धीराचे सामर्थ्य हे “(देवाच्या) गौरवाच्या पराक्रमानुसार” आहे, तेव्हां त्याच्या बोलण्याचा अर्थ केवळ हा नाहीं कीं ख्रिस्ती व्यक्तीला धीर देण्यासाठीं दैवीय सामर्थ्याची गरज लागते.  त्याच्या बोलण्याचा अर्थ असा कीं या “गौरवाच्या पराक्रमात” विश्वास ते माध्यम आहे ज्याद्वारें धीराचे सामर्थ्य येते.

धीर खरे तर पवित्र आत्म्याचे फळ होय (गलती 5:22), परंतु पवित्र आत्मा (त्याच्या सर्व फळांसह) “विश्वासाने ऐकण्याद्वारें” (गलती 3:5) सामर्थ्य देतो. म्हणून पौल प्रार्थना करत आहे कीं परमेश्वर देव आपल्याला धीरास सामर्थ्य देणाऱ्या “गौरवाच्या पराक्रमाशी” जोडेल. आणि तो जोड म्हणजें विश्वास.

25 मई : मृत्यु की तैयारी करना

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25 मई : मृत्यु की तैयारी करना
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“मार्था ने यीशु से कहा, ‘हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता। और अब भी मैं जानती हूँ कि जो कुछ तू परमेश्‍वर से माँगेगा, परमेश्‍वर तुझे देगा।’ यीशु ने उससे कहा, ‘तेरा भाई फिर जी उठेगा।’ मार्था ने उससे कहा, ‘मैं जानती हूँ कि अन्तिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा।’ यीशु ने उससे कहा, ‘पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझ पर विश्‍वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्‍वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा। क्या तू इस बात पर विश्‍वास करती है?’”  यूहन्ना 11:21-26

हममें से कोई नहीं जानता कि एक दिन हमें क्या मिलेगा। वास्तव में, हम सभी कुछ हद तक अनिश्चितता के साथ जीते हैं; हम अपने रास्ते में आने वाली हरेक परीक्षा के लिए तैयार नहीं हो सकते। वास्तव में, जैसा कि कई लोगों ने उल्लेख किया है, जीवन की एकमात्र निश्चितता यह है कि यह समाप्त होगा। हम एक पतित संसार में जी रहे हैं, और हम जानते हैं कि “पाप की मजदूरी मृत्यु है” (रोमियों 6:23)। इसलिए मरना एक ऐसा सत्य है, जिसके लिए हमें तैयारी करनी चाहिए।

मृत्यु और मरने पर होने वाला जो भी विचार यीशु के शब्दों पर गहराई से ध्यान नहीं देता, वह अधूरा होता है। इसलिए इसका आरम्भ करने का एक अच्छा स्थान वह ठोस शिक्षा है, जो यीशु ने अपने मित्र लाजर की मृत्यु के बाद दी थी।

स्वाभाविक रूप से, लाजर की शोकित बहनें अपने भाई के साथ हुई घटना को लेकर गहरी चिन्ता में थीं। इसके जवाब में, यीशु ने कहा कि लाजर फिर से जी उठेगा। मार्था इस उद्‌घोषणा को पूरी तरह से समझ न पाई और कहने लगी, “मैं जानती हूँ कि वह अन्तिम दिन पुनरुत्थान में जी उठेगा।” तब यीशु ने बात को एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कहा, “मैं  ही पुनरुत्थान और जीवन हूँ।”

और फिर मार्था के लिए चुनौती आई: “क्या तुम इस पर विश्वास करती हो?”

इस प्रश्न का उत्तर न केवल आपके जीने के तरीके को, बल्कि मृत्यु का सामना करने के आपके तरीके को भी प्रभावित करता है। यीशु ने न केवल मृत्यु को पराजित किया, बल्कि उसने आपके लिए भी मृत्यु को पराजित करने का रास्ता बना दिया। हालाँकि आपका शारीरिक रूप विफल हो जाएगा, लेकिन जब आप विश्वास करते हैं कि यीशु ही पुनरुत्थान और जीवन है, तो मृत्यु बस एक द्वार बन जाती है जिसमें से होकर आप जीवन के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं।

मृत्यु को लेकर विश्वासियों के सामने एक चुनौती यह है कि न केवल हम इस बात के लिए तैयार रहें कि यह अवश्य आएगी, बल्कि यह भी सीखना है कि दूसरों को इसका सामना करने में कैसे मदद करें। हालाँकि हालात चाहे जैसे भी हों, यीशु के शब्द हमारे लिए प्रेमपूर्ण सलाह का आधार प्रदान करते हैं। हमें बाइबल के दृष्टिकोण से और ईमानदारी से बात करनी होगी और अनन्तता के सत्य तथा उस आशा को समझाना होगा, जो उसमें पाई जाती है। हमारे शब्द, जो स्वयं यीशु के शब्दों की गूंज हैं, कठोर और संवेदनाहीन नहीं होने चाहिएँ, बल्कि वे ज्ञान और अनुग्रह से भरे हुए होने चाहिएँ।

आप तब तक यह नहीं जान सकते कि कैसे जीना है, जब तक कि आपने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है कि कैसे मरना है। हम में से किसी को भी आने वाले कल की प्रतिज्ञा नहीं दी गई है, लेकिन अनन्तता हर उस अनुयायी के लिए सुनिश्चित है जो पुनरुत्थान और जीवन के स्रोत में विश्वास रखता है। आप अपने आप को—और अपने मित्रों और प्रियजनों को—मृत्यु के दिन का सामना डर और अनिश्चितता के बजाय शान्ति और आत्मविश्वास के साथ करने के लिए तैयार कर सकते हैं और इन शब्दों को थामे रह सकते हैं: “पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझ पर विश्‍वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्‍वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा।” हाँ, हम इस पर विश्वास करते हैं।

यूहन्ना 11:1-44

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 10–11; मत्ती 13:31-58

25 May : अडथळ्याच्या मार्गात देवाची योजना

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25 May : अडथळ्याच्या मार्गात देवाची योजना
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“आणि बोलणे किंवा करणे जे काही तुम्हीं कराल, ते सर्व प्रभू येशूच्या नावाने करा; आणि त्याच्या द्वारें देव जो पिता त्याची उपकारस्तुती करा.” (कलस्सै 3:17)

तुम्हीं कधी असा विचार केला आहे का कीं तुम्हीं जे गमावले आणि ज्याची तुम्हाला अतिशय गरज आहे ते तुम्हीं चुकींच्या जागी शोधत आहात? तो कोठे आहे हे त्याला नक्की माहित आहे, आणि तरीही तो तुम्हाला चुकींच्या जागी पाहू देत आहे.

एकदा मला माझ्या डिझायरिंग गॉड नावाच्या पुस्तकाच्या नवीन आवृत्तीसाठीं एक अवतरण हवे होते. मला माहित होते कीं मी ते रिचर्ड वर्मब्रँड यांच्या पुस्तकात वाचले होते. मला वाटले कीं ते त्यांच्या रीचिंग टूवर्ड्स द हाईट्स नावाच्या भक्ती पुस्तकात होते. मला ते समोरच्या पानांच्या उजव्या बाजूला दिसत होते. पण मला ते सापडले नाहीं.

मी पहातच होतो, कीं माझे लक्ष ३० नोव्हेंबरच्या त्याच्या भक्तीपाठावर खिळले. ते वाचत असतांना मी म्हटले, “म्हणूनच देवानें मला “चुकींच्या” ठिकाणी माझे अवतरण शोधू दिलें.” येथे एक गोष्ट होती जी उत्तमरित्या स्पष्ट करते कीं आपण येशूच्या नावात जे काही करतो ते कधीही वाया जात नाहीं – काहीही नाहीं, चुकींच्या ठिकाणी अवतरण शोधत नाहीं. मी जे वाचले ते असें आहे:

मंदबुद्धी मुलांच्या घरात, कॅथरीनचे वीस वर्षे पालनपोषण करण्यात आले. ती आरंभापासूनच मानसिकदृष्ट्या अपंग, होते, आणि ती कधीही एक शब्दही बोलली नव्हती, तर फक्त वनस्पतिवत् होती. ती एकतर शांतपणे भिंतींकडे पाहत असें किंवा गोंधळलेल्या हालचाली करीत असें. तिचे जीवन म्हणजें खाणे, पिणे, झोपणे. तिच्या सभोवताली जे काही घडत असें त्यात ती भाग घेत नसल्यासारखे दिसत होते. तिचा एक पाय कापावा लागला. कर्मचाऱ्यांनी कॅथरीनला  शुभेच्छा दिल्या आणि आशा केलीं कीं प्रभु लवकरच तिला स्वतःजवळ घेऊन जाईल.

एक दिवस डॉक्टरांनी संचालकास लवकर या म्हणून बोलावले. कॅथरीन मरणाच्या लागास होती. दोघांनी खोलीत प्रवेश केला, त्यांना त्यांच्या काना-डोळ्यांवर विश्वासच बसेना. कॅथरीन ख्रिस्ती गीते गात होती जी तिने ऐकली होती आणि शिकली होती, जे मृत्यूशय्येस लागू होते. तिने पुन्हा पुन्हा जर्मन गाणे म्हटले, “आत्म्याला त्याची पितृभूमी, विश्रांती कोठे लाभते?” रूपांतरित चेहऱ्याने तिने अर्धा तास गाणे गायले, मग ती शांतपणे निघून गेली. (बेस्ट इज स्टिल टू कम, वुपरटल: सोन अँड शिल्डमधून उद्धृत)

ख्रिस्ताच्या नावाने जे काही केलें जाते ते खरोखरच वाया जाते का?

मला ज्याची गरज आहे असा माझा हताश, व्यर्थ शोध वाया गेला नाहीं. या अपंग मुलीचे गाणे व्यर्थ गेले नाहीं. आणि तुमचा वेदनादायक, अनियोजित वळसा व्यर्थ जाणार नाहीं – जर तुम्हीं परमेश्वराकडे त्याच्या अनपेक्षित कामासाठीं पाहत असाल आणि सर्वकाही त्याच्या नावाने करत असाल तर (कलस्सै 3:17).

24 मई : अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो

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24 मई : अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो
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“इसलिए परमेश्‍वर के बलवन्त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिससे वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए। अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है।”  1 पतरस 5:6-7

कभी-कभी चिन्ता हमारे जीवन में ऐसी स्थिति में आकर हम पर हावी हो जाती है, जब हम इसकी अपेक्षा भी नहीं करते। या फिर यह हमारे जीवन में अवांछनीय और स्थाई रूप से स्थान बना सकती है। कुछ ही लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें चिन्ता का सामना कभी नहीं करना पड़ता; यह अलग-अलग रूपों में आ सकती है और विभिन्न परिस्थितियों से उत्पन्न हो सकती है, लेकिन यह समस्या बहुत सामान्य है।

जब हम चिन्ता का सामना करते हैं, तो अक्सर हम अपने दिमाग को किसी और दिशा में मोड़ने के द्वारा इसे अनदेखा करने की कोशिश करते हैं: “चलो, कुछ संगीत सुनते हैं। चलो, गाड़ी लेकर कहीं निकलते हैं। चलो, एक मील दौड़ते हैं। चलो, कुछ करते हैं . . . बस मुझे इससे भाग जाना है!”

लेकिन ध्यान दें कि इन पदों में पतरस यह नहीं कहता कि हमें चिन्ता को नकारना, अनदेखा करना या उससे भागना चाहिए। इसके बजाय, हमें “अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल” देनी चाहिए। यहाँ “डाल दो” के लिए प्रयुक्त हुआ यूनानी शब्द एक निर्णायक, ऊर्जावान क्रिया है। इसे हम किसी बैग को कूड़ेदान में फेंकने के रूप में समझ सकते हैं। इसमें हमें कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता; हम बस इसे उठाते हैं और कूड़ेदान में फेंक देते हैं। इसी तरह, चिन्ता के बोझ तले दबे रहकर दिन बिताने के बजाय, हमें इसे प्रभु के पास फेंक देना है, उस पर डाल देना है।

यह करने के लिए हमें अपने अहंकार को, हमारी इस इच्छा को छोड़ना होगा कि अपनी परिस्थितियों पर हम काबू पा सकते हैं और उन पर विजय प्राप्त कर सकें। विनम्रता ही हमें हमारी चिन्ताओं को परमेश्वर के पास सौंपने में सक्षम बनाती है: विनम्रता का होना चिन्ता के न होने का कारण बनता है। जब हम अत्यधिक चिन्ता करके परिस्थितियों को अपने नियन्त्रण में लेने का प्रयास करते हैं, तो हम विनम्रता की कमी को दर्शाते हैं; हम अपने स्वर्गिक पिता पर केन्द्रित होने के बजाय अपने आप पर केन्द्रित हो जाते हैं। हम अपनी यात्रा को परमेश्वर के हाथों में सौंपने के बजाय स्वयं चलाना चाहते हैं।

हमेशा कोई न कोई परिस्थिति ऐसी होगी जो हमें चिन्ता में डाल सकती है। हालाँकि, पतरस किसी विशेष परिस्थिति का उल्लेख नहीं करता; बल्कि वह उन परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाली चिन्ता को सम्बोधित करता है। हमारी चिन्ता ही वह है, जिसे हमें प्रभु पर डालना है, जैसे कि बाइबल में सिखाया गया है: हम खुद को परमेश्वर के हाथों में सौंपकर विनम्रता से यह कहते हैं, “मेरा पिता सब कुछ जानता है। वह मेरी देखभाल मुझसे बेहतर तरीके से करता है।” जब चिन्ताएँ हमें दबाती हैं, तो हम इसे परमेश्वर के सामने रखने के द्वारा इनसे छुटकारा पा सकते हैं, यह विश्वास करते हुए कि परमेश्वर हमारी मदद करने के लिए तैयार है।

शायद आज आप संघर्ष कर रहे हों, यह सोचते हुए कि आप कल का सामना कैसे करेंगे। शायद काफी समय हो गया है, जब आपने अपने बिस्तर के पास घुटने टेककर अपनी सारी चिन्ता उस एकमात्र पर डाली थी, जो इसे उठाने में सक्षम है, और कहा, “परमेश्वर, मैं इस बोझ को उठाकर अपना जीवन नहीं जी सकता। इसे ले लो, यह आपका है।”

यदि यह आप हैं, तो अब और देर न करें। अपनी सारी चिन्ताओं को अपने स्वर्गिक पिता की स्नेहपूर्ण बाँहों में डाल दें और उस स्वतन्त्रता और शान्ति का अनुभव करें, जो केवल वही दे सकता है।

लूका 12:22-34

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 7–9; मत्ती 13:1-30 ◊

24 May : तुमच्यांतारणाच्या खात्रीचा खडक

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24 May : तुमच्यांतारणाच्या खात्रीचा खडक
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“कारण आत्म्याच्या द्वारें होणाऱ्या पवित्रीकरणात व सत्यावरच्या विश्वासात देवानें तुम्हांला प्रथमफळ म्हणून तारणासाठीं निवडले आहे.” (2 थेस्सल 2:13)

पवित्र शास्त्र आपण काहीही बरे किंवा वाईट करण्यापूर्वी (रोम. 9:11) पृथ्वीच्या स्थापनेपूर्वी ख्रिस्ताठायी आपली निवड केलीं जाण्याविषयी बोलते – म्हणजें देवानें आम्हांला निवडले (इफिस 1:4). त्यामुळें, आमची निवड खऱ्या अर्थाने कोणत्याही अटीविरहित आहे. आमचा विश्वास किंवा आमची आज्ञाधारकता याचा आधार नाहीं. हि निवड मुक्त आणि आम्हीं पात्र नसतांना करण्यांत आलेली आहे.

दुसरीकडे, पवित्र शास्त्रातील डझनभर शास्त्रलेख आपल्या अंतिम तारणाविषयी बोलतात (सार्वकालिक जीवनासाठीं भूतकाळात झालेंल्या आपल्या निवडीच्या विपरीत) ज्याची अट आहे परिवर्तित हृदय आणि जीवन. म्हणून, प्रश्न उठतो, सार्वकालिक जीवन वतन म्हणून मिळण्यासाठीं आवश्यक असलेल्या विश्वासात आणि पावित्र्यात मी टिकून राहीन याची खात्री मला कशी प्राप्त होईल?

उत्तर हे आहे कीं ती खात्री आमची झालेंली निवड यांत मुळावलेली आहे. 2 पेत्र 1:10 यात म्हटले आहे, “ज्या संदेष्ट्यांनी तुमच्यांवर होणाऱ्या कृपेविषयी पूर्वी सांगितले, त्यांनी त्या तारणाविषयी बारकाईने शोध केला.” देवाची निवड हा मला तारण्याच्या देवाच्या वचनबद्धतेचा पाया आहे, आणि म्हणून त्याच्या निवडीच्या कृपेने जे सुरू झालें आहे ते पवित्र करणाऱ्या कृपेद्वारें तो मजमध्यें कार्य करील.

नव्या कराराचा हा अर्थ आहे. येशूवर विश्वास ठेवणारा प्रत्येकजण नव्या कराराचा सुरक्षित लाभार्थी आहे, कारण येशूनें लूक 22:20 मध्यें म्हटले आहे, ”हा प्याला माझ्या ‘रक्तात’ नवा ‘करार’ आहे. ते रक्त तुमच्यांसाठीं ओतले जात आहे.“ म्हणजें, माझ्या रक्ताद्वारें जे माझे आहेत त्या सर्वांसाठीं मी नवा करार प्राप्त करतो. 

नव्या करारात देव केवळ आज्ञापालनाची आज्ञा देत नाहीं, तर आज्ञापालन घडवून आणतो. “तुझा देव परमेश्वर तुझ्या हृदयाची व तुझ्या वंशजांच्या हृदयाची सुंता करील, आणि आपण जिवंत राहावे म्हणून तू आपला देव परमेश्वर ह्याच्यावर संपूर्ण मनाने व संपूर्ण जिवाने प्रेम करशील” (अनुवाद 30:6).  “मी तुमच्यां ठायी माझा आत्मा घालीन आणि तुम्हीं माझ्या नियमांनी चालाल, माझे निर्णय पाळून त्यांप्रमाणे आचरण कराल असें मी करीन” (यहेजकेल 36:27; तुलना 11:20). ही नवीन कराराची अभिवचने आहेत.

निवड ही त्याच्या लोकांसाठीं हे करण्याची परमेश्वराची सार्वकालिक वचनबद्धता होय. म्हणून, निवड ही हमी देते कीं ज्यांस परमेश्वर विश्वासाने नीतिमान ठरवितो, त्यांचे तो अवश्य गौरवहि करील” (रोम 8:30). याचा अर्थ हा कीं तो आपल्यामध्यें गौरवीकरणासाठीं घालून दिलेंल्या सर्व अटी पूर्ण करण्यासाठीं अचूकपणे कार्य करेल.

आमची झालेंली निवड तारणाच्या या खात्रीचा अंतिम पाया आहे कारण देव तारण देण्यासाठीं वचनबद्ध आहे म्हणून, तारणासाठीं जे काही उपलब्ध आहे ते सर्व सक्षम करण्यासाठीं देव वचनबद्ध आहे.

23 मई : मैं देखना चाहता हूँ

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23 मई : मैं देखना चाहता हूँ
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“वह यह सुनकर कि यीशु नासरी है, पुकार-पुकार कर कहने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, यीशु मुझ पर दया कर!’ बहुतों ने उसे डाँटा कि चुप रहे, पर वह और भी पुकारने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, मुझ पर दया कर!’ तब यीशु ने ठहरकर कहा, ‘उसे बुलाओ।’” मरकुस 10:47-49

उस अन्धे आदमी के आस-पास फसह का पर्व नजदीक आ रहा था, और भीड़ जमा हो रही थी। एक बड़ी प्रत्याशा का माहौल था। इस भीड़ में अधिकांश लोग इतने व्यस्त थे कि उनके पास रुकने का भी समय नहीं था—निश्चित रूप से शहर के द्वारों पर पड़े रहने वाले भिखारियों के लिए रुकने का तो बिल्कुल भी नहीं। वे तो हमेशा वहाँ होते थे और यरीहो के बाहरी इलाकों के लोग इन्हें अच्छे से जानते थे। भीड़ में से कई लोगों ने शायद इस अन्धे बरतिमाई को इतनी बार देखा होगा कि अब वे उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते होंगे।

भीड़ मसीह में इतनी अधिक व्यस्त थी कि बरतिमाई को शायद एक खतरनाक बाधा के रूप में देखा जा रहा था। उसकी दया की पुकारों पर उनकी प्रतिक्रिया—उनका उसे डाँटना और उसे चुप कराने की कोशिश करना—यह दर्शाती है कि वे मानते थे कि समाज के हाशिए पर पड़ा यह व्यक्ति मसीह के काम में कोई मदद नहीं कर सकता था। लेकिन उसे चुप कराने की कोशिश में वे मसीह के मिशन में एक बाधा बन गए—उसके मिशन में जिसका वे अनुसरण करने का दावा कर रहे थे और जिस उद्देश्य को वे पूरा करने की कोशिश कर रहे थे।

लेकिन इस अन्धे आदमी की मसीह में केवल मामूली रुचि नहीं थी, इसलिए वह चिल्लाता ही रहा। मरकुस का वृतान्त मसीह की पूरी दया को एक साधारण वाक्य में व्यक्त करता है: “तब यीशु ने ठहरकर कहा”—अनुग्रह के कुछ शब्द। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि भीड़ की क्या प्रतिक्रिया रही होगी जब यीशु ने उन लोगों से कहा होगा, जो उस आदमी को डाँट रहे थे, “उसे बुलाओ”? यह निश्चित रूप से एक उचित शर्मिन्दगी लेकर आया होगा!

शायद आपके जीवन में कुछ लोग हैं, जिनके लिए आप प्रार्थना करने में संघर्ष करते हैं। शायद कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें आप बस डाँटना या अनदेखा करना चाहते हैं। शायद आप उनके कारण आने वाली बाधाओं का सामना नहीं करना चाहते। ऐसे किसी व्यक्ति को कलीसिया में बुलाना, उनके साथ बैठना, उनके साथ भोजन खाना और उनके जीवन में शामिल होना बहुत उलझन भरा और समय तथा प्रयास की माँग करने वाला लग सकता है। यह परेशान करने वाला और समय तथा मेहनत की माँग करने वाला है। हम चाहेंगे कि ऐसे लोग किसी और से सुसमाचार सुनें। हम बड़ी आसानी से ऐसी सोच का शिकार हो सकते हैं और हमें इसका पता भी नहीं चलेगा; लेकिन जब हम ऐसा करते हैं, तो हम भीड़ के जैसे बन जाते हैं: लोगों को उनके उद्धारक से मिलने में बाधा बन जाते हैं। यीशु हमसे कहता है, उन्हें डाँटो मत, उन्हें बुलाओ। मैं इसी कारण तो आया हूँ।

परमेश्वर हमें माफ कर दे जब हम, भीड़ की तरह, अपनी योजनाओं में बाधा और अपनी प्राथमिकताओं में परेशानी आने पर उनके लिए क्रोध और अवमानना से भर जाते हैं जो उसकी दया के लिए पुकार रहे हैं। केवल मसीह ही अन्धी आँखों को खोलने का कार्य करता है, लेकिन उसने इस कार्य की जिम्मेदारी और विशेषाधिकार हमें सौंपे हैं कि हम इन शब्दों की घोषणा करें: “ढाढ़स बाँध . . . वह तुझे बुलाता है।”

मरकुस 10:35-45

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 4– 6; मत्ती 12:22-50

23 May : येशू तितका मूल्यवान आहे का?

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23 May : येशू तितका मूल्यवान आहे का?
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“जर कोणी माझ्याकडे येईल पण आपला बाप, आई, बायको, मुले, भाऊ व बहिणी ह्यांचा आणि आपल्या जिवाचाही द्वेष करणार नाहीं तर त्याला माझा शिष्य होता येणार नाहीं. जो कोणी स्वतःचा वधस्तंभ घेऊन माझ्यामागे येत नाहीं त्याला माझा शिष्य होता येत नाहीं.” (लूक 14:26-27)

येशू निःसंकोचपणे आणि निर्भयपणे आम्हास स्पष्ट एक अशी गोष्ट सांगतो जी ऐकायला “सर्वात वाईट” जाणवते – खिस्ती होण्याची वेदनादायक किंमत: कुटुंबाचा द्वेष करणे (वचन 26), वधस्तंभ उचलणे (वचन 27), संपत्तीचा त्याग करणे (वचन 33). कृपेच्या करारात कुठलीही छोटी छाप नाहीं. त्यांत सर्वकाही मोठ्या अक्षरांत आणि साहसपूर्ण आहे. कृपा स्वस्त नाहीं! अतिशय महागडी! या, आणि माझे शिष्य व्हा.

पण सैतान त्याचे सर्वात वाईट ते लपवितो आणि केवळ आपले सर्वोत्तम ते दाखवितो. सैतानासोबतच्या व्यवहारात जे खरोखर महत्वाचे आहे ते मागच्या पृष्ठावर लहान अक्षरांनी छापलेले आहे.

पुढच्या पानावर मोठ्या, ठळक अक्षरांत शब्द आहेत, “तुम्हीं खरोखर मरणार नाहीं” (उत्पत्ति 3:4) आणि ”तू पाया पडून मला नमन करशील तर मी हे सर्वकाही तुला देईन” (मत्तय 4:9). पण मागच्या पानावर लहान छापील अक्षरात – इतके लहान कीं तुम्हीं ते केवळ पवित्र शास्त्राच्या भिंगाच्या मदतीने वाचू शकता – त्यात म्हटले आहे, “आणि क्षणिक सुखानंतर, तुम्हीं माझ्यासोबत सदाकाळ अधोलोकात दुःख सोसणार.”

जेथें सैतान आम्हाला केवळ त्याचे सर्वोत्तम दाखवितो, तेव्हां येशू आम्हाला त्याचे “सर्वात वाईट” तसेंच त्याचे सर्वोत्तम का दाखवू इच्छितो? मॅथ्यू हेनरी उत्तर देतात, “सैतान जे सर्वोत्तम ते दाखवतो, पण जे सर्वात वाईट ते लपवितो, कारण त्याचे सर्वोत्तम त्याचे सर्वात वाईट (प्रतिसंतुलित) करणार नाहीं; पण ख्रिस्ताचे सर्वोत्तम विपुलपणे करेल.”

ख्रिस्ताचे पाचारण केवळ दुःख सोसण्याचे आणि स्वतःचा नाकार करण्याचे पाचारण नाहीं; सर्वप्रथम ते पाचारण मेजवानीचे आहे. लूक 14:16-24 मधील दृष्टांताचा मुद्दा हाच आहे. येशू एक गौरवशाली पुनरुत्थानाचे अभिवचन देखील देतो जेथे या जीवनातील सर्व हानींची भरपाई केलीं जाईल (लूक 14:14). तो आम्हास हे देखील सांगतो कीं तो आम्हाला कष्ट सहन करण्यात मदत करील (लूक 22:32). तो आम्हास हे सुद्धा सांगतो कीं आमचा पिता आम्हाला पवित्र आत्मा देईल (लूक 11:13). तो असें अभिवचन देतो कीं आम्हीं जरी राज्यासाठीं मारले गेलो तरीही, “तुमच्यां डोक्याच्या एका केसाचाही नाश होणार नाहीं” (लूक 21:18).

याचा अर्थ हा कीं जेव्हां आपण येशूचे अनुसरण करण्याची किंमत मोजण्यासाठीं बसतो – जेव्हां आपण “सर्वात वाईट” आणि “सर्वोत्तम” यांचे मोजमाप करतो – तेव्हां तो योग्य ठरतो. तो तितका मूल्यवान ठरतो (रोम 8:18; 2 करिंथ 4:17).

असें सैतानासोबत नाहीं. लबाडीची भाकर मनुष्याला गोड लागते, पण मग त्याच्या तोंडात माती पडते

22 मई : अलगाव को क्रूसित किया गया

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22 मई : अलगाव को क्रूसित किया गया
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“उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे जिनमें तुम पहले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात् उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है।”  इफिसियों 2:1-2

यह चाहे जितना भी विरोधाभासी लगे, चाहे यह कितना ही टकरावपूर्ण लगे, बाइबल छुटकारा न पाए लोगों को चलते-फिरते मृतक बताती करती है। यीशु मसीह के बिना लोग “अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए” हैं।

बाइबल का यह चित्र परमेश्वर के राज्य के बाहर के जीवन के बारे में हमारी अपेक्षाओं को सन्तुलित करने में मदद करता है। शिक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कानूनी व्यवस्था स्पष्ट रूप से आवश्यक है। लेकिन इनमें से कोई भी, या दोनों मिलकर, मानव हृदय के मूल मुद्दों का समाधान नहीं कर सकते। सांसारिक उपचार केवल कुछ हद तक ही हमारी मदद कर सकते हैं, क्योंकि वे हमारी सबसे बड़ी समस्या को सम्बोधित नहीं कर सकते: कि हम “अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे जिनमें [हम] पहले . . . चलते थे . . . और अन्य लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे” (इफिसियों 2:1, 3)।

मसीह के बाहर जो अलगाव है, वह मुख्य रूप से ऊर्ध्वाधर है: अर्थात परमेश्वर से अलगाव। फिर भी, इसके प्रभाव अन्य दिशाओं में भी फैलते हैं। पौलुस इफिसियों को लिखे अपने पत्र में बताता है कि इस ऊर्ध्वाधर अलगाव ने कैसे यहूदियों और गैर-यहूदियों के बीच के क्षैतिज रिश्तों को प्रभावित किया था (इफिसियों 2:11-12)। प्राचीन संसार में यहूदियों और गैर-यहूदियों के बीच की गहरी शत्रुता का कारण कुछ और नहीं बल्कि मानव पाप था। दोनों परमेश्वर से अलग थे, जैसा कि मन्दिर में लटका हुआ पर्दा दर्शाता था, और दोनों एक दूसरे से अलग थे, जैसे कि उनके बीच एक रूपक दीवार थी (पद 14)।

सच्चाई यह है कि मसीह के बिना ऐसी शत्रुता जारी रहेगी। हालाँकि हमारे समुदायों में निवेश करने और हमारे समाज में वास्तविक बदलाव लाने के लिए श्रम करना अच्छा है (और वास्तव में, परमेश्वर अपने लोगों को ऐसा करने के लिए निर्देशित करता है—उदाहरण के लिए, यिर्मयाह 29:7 देखें), तौभी यह वह स्थान नहीं है जहाँ एक मसीही सेवाकार्य में अपनी प्राथमिक ऊर्जा लगाता है या नवीकरण के लिए अपनी आशा रखता है। यीशु में, और केवल यीशु में, परमेश्वर ने एक नया समाज बनाया है और बना रहा है, जहाँ विभाजनकारी बाधाएँ अनुग्रह के द्वारा तोड़ी जाती हैं। परमेश्वर ने वास्तविक स्थानीय कलीसिया में “टूटे हुए संसार को फिर से बनाने” के लिए “आनुवंशिक खाका” प्रदान किया है।[1] जब लोग कलीसियाओं में इस खाके को देखते हैं, तो वे उसका स्वाद चखेंगे जो परमेश्वर तब करने वाला है, जब पाप और आँसू और शोक अब नहीं होंगे, जब एक नए आकाश और एक नई पृथ्वी में, वह सब पूरा होगा जो उसने ठाना है।

मसीह के बाहर अलगाव—ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज—का कोई उपचार नहीं है। लेकिन मसीह में, और उस समाज में जो वह बना रहा है और जिसका वह सिर है, ऐसे अलगाव को क्रूस पर चढ़ाया गया है। पाप की वास्तविकता को गम्भीरता से लेना यह दर्शाता है कि आप और मैं किसी-न-किसी तरह से अपनी स्थानीय कलीसिया में निवेश करेंगे, ताकि यह एक ऐसा स्थान बन सके जहाँ अनुग्रह ने दीवारों को तोड़ा है और परमेश्वर के भविष्य के राज्य का खाका स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। जब तक हम वहाँ नहीं पहुँचते, तब तक हमारे पास इसका अग्रिम स्वाद चखने और इसके लिए काम करने का अवसर उपलब्ध है।

2 यूहन्ना 1-13

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 1–3; मत्ती 12:1-21 ◊

21 मई : परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना

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21 मई : परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना
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“मैं तुझ से सच-सच कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्‍वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।” यूहन्ना 3:5

जब हम चारों सुसमाचार पढ़ते हैं, तो हमें यह पता चलता है कि यीशु की सेवा का एक बड़ा हिस्सा परमेश्वर के राज्य के शुभ समाचार का प्रचार करना था। वह मूलतः नगरों और गाँवों में यात्रा करते हुए लोगों से यह कहता था, एक राज्य है और उसका राजा मैं हूँ। तुम अब तक उस राज्य में नहीं हो—लेकिन यदि तुम मेरे पीछे आओगे, तो तुम राजा की प्रजा बन जाओगे और उसके राज्य के नागरिक बन जाओगे।

इसलिए जब हम प्रार्थना करते हैं, “तेरा राज्य आए” (लूका 11:2), तो हमारी यह अभिलाषा होनी चाहिए कि लोग मसीह के राज्य में नए जन्म के द्वारा प्रवेश करें—कि वे यीशु के समर्पित अनुयायी बन जाएँ। हम प्रार्थना करते हैं कि जो लोग परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह में जी रहे हैं, “अन्धकार के वश से छूटकर उसके प्रिय पुत्र के राज्य में प्रवेश” कर जाएँ (कुलुस्सियों 1:13)। यीशु ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि उसके राज्य में प्रवेश करने का एकमात्र तरीका यह नया जन्म है।

यीशु का नीकुदेमुस से हुआ संवाद, जो यूहन्ना 3 में दर्ज है, इस सत्य को स्पष्ट करता है। नीकुदेमुस एक धार्मिक व्यक्ति था, जो अधिकार और प्रभाव वाला व्यक्ति था—और फिर भी वह बेचैन था और अभी भी खोज रहा था। जब यीशु से उसकी बातचीत हुई, यीशु ने उसके सामने उसके राज्य को देख पाने और उसमें प्रवेश करने की आवश्यक शर्त को रेखांकित किया: और वह था आत्मा द्वारा नया जन्म लेना। यीशु ने कहा कि यह नया जन्म प्रकृति द्वारा नहीं, बल्कि परमेश्वर के आत्मा द्वारा मानव हृदय में चमत्कार के रूप में लाया जाता है। कोई भी आत्मा के कार्य के बिना उसके राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता; कोई भी उसके राज्य से इतना दूर नहीं है कि परमेश्वर का आत्मा उसमें कार्य न कर सके।

जब हम परमेश्वर के राज्य के आने के लिए प्रार्थना करते हैं, तो हम यह प्रार्थना कर रहे होते हैं कि लोगों की आँखें और कान खुल जाएँ, ताकि लोग नया जन्म ले सकें। राजा अपने शाश्वत राज्य को स्थापित करने के लिए आने वाला है और राजा आज भी अपने आत्मा के द्वारा कार्य कर रहा है, ताकि लोग उसके राज्य में प्रवेश करें। जब तक हमारे राजा की वापसी नहीं होती, तब तक यह सोच कि लोग मसीह के राज्य में कैसे प्रवेश करते हैं, हमें हमारे अपने उद्धार पर आश्चर्य और खुली हुई आँखों के साथ प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करे, ताकि आत्मा वह काम कर सके जो केवल वही कर सकता है।

यूहन्ना 3:1-15

20 मई : अकल्पनीय अनुग्रह

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20 मई : अकल्पनीय अनुग्रह
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“हमको उसमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् अपराधों की क्षमा, उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिला है, जिसे उसने सारे ज्ञान और समझ सहित हम पर बहुतायत से किया।” इफिसियों 1:7-8

परमेश्वर की कृपा अपने लोगों के लिए कोई सीमा नहीं जानती और न ही किसी सीमा में बँधी रहती है। इस सत्य को जानने के लिए हमें कहीं और नहीं, बल्कि मसीह के क्रूस की ओर देखना होगा, जहाँ “हमको उसमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा मिला है।”

निर्गमन की पुस्तक में, परमेश्वर ने फसह का नियम दिया, जिसने एक कीमत पर खरीदी गई स्वतन्त्रता का चित्र प्रस्तुत किया। उसने इस्राएलियों से कहा कि वे एक परिवार के लिए एक मेमना बलि करें और उसके लहू को अपने दरवाजे की चौखटों पर पोतें, ताकि मृत्यु का दूत उनके घर में न आने पाए जब वह मिस्र से गुज़रे। उन विश्वासियों के घरों के निवासी केवल इसलिए परमेश्वर के न्याय, अर्थात पहले पुत्र की मृत्यु होने से बच गए, क्योंकि उनके स्थान पर एक मेमने की मृत्यु हुई थी (निर्गमन 12:3-13)।

इस्राएली फिरौन के दास थे। इसी तरह, हम सभी इस संसार में पाप और मृत्यु के दास के रूप में आते हैं। हमारे उद्धार की कीमत मसीह का लहू था, जिसने विश्वास करने वाले सभी लोगों के लिए महान फसह के मेमने के रूप में उद्धार के कार्य को पूरा किया। उसका लहू हमें शाश्वत रूप से मृत्यु से निकाल कर जीवन में ले आता है। मसीह पृथ्वी पर यह बताने के लिए नहीं आया था कि हम अपने आप को मसीही कैसे बनाएँ। वह यह बताने के लिए भी नहीं आया था कि हमें अपने आप को बचाने के लिए क्या करना होगा। वह इसलिए आया था ताकि वह उस काम को करे, जो हम अपने आप को बचाने के लिए नहीं कर सकते थे। उसने हमारे बदले में कुछ किया और हमें वह क्षमा प्रदान की जो हमें तो मुफ्त में मिलती है, लेकिन जिसके लिए परमेश्वर ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि परमेश्वर ने हमारे पापों को बस नजरअंदाज कर दिया; बल्कि क्रूस पर मसीह की मृत्यु ने उस न्याय को सोख लिया जो आपको और मुझे प्राप्त होना चाहिए था। परमेश्वर की पवित्रता माँगती है कि पाप का दण्ड चुकाया जाए और उसके पुत्र ने वह भुगतान किया।

जब पौलुस इस पर विचार करता है, तो वह यह कहने के लिए अभिप्रेरित होता है, “हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो!” (इफिसियों 1:3)। परमेश्वर की कृपा पर विचार करते हुए हमें हमेशा हमें स्तुति की ओर प्रेरित होना चाहिए। लेकिन ध्यान दें कि 7-8 पद में पौलुस किस वाक्यांश का प्रयोग करता है, “उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार . . . जिसे उसने . . . हम पर बहुतायत से किया ।” परमेश्वर की कृपा प्रचण्ड है। यह अत्यधिक है। उसने इसे अपने प्रत्येक सन्तान पर उण्डेला है, और कुछ भी पीछे नहीं रख छोड़ा है। और वह इसे शाश्वत रूप से जारी रखेगा।

कल्पना करें कि आपने एक उच्चतम दर्जे के रेस्तरां में अपना भोजन समाप्त कर लिया है और कोई व्यक्ति आपका बिल उठाता है, और कहता है, “तुम्हारा बिल मैं अदा करूँगा—मैं भुगतान करूँगा।” यही वह है जो परमेश्वर ने आपके लिए सबसे बड़े स्तर पर कहा है। वह यह नहीं कह रहा है कि कोई भुगतान नहीं किया जाना है। वह यह कह रहा है कि उसने पहले ही भुगतान कर दिया है। परमेश्वर की कृपा सभी सीमाओं से परे है, ये सीमाएँ हमारी आँखों की दृष्टि से और हमारे दिलों की कल्पना से बहुत परे हैं। इसलिए, हालाँकि आप पिछले दिन या सप्ताह को देखेंगे, आप पाएँगे कि आप पापी हैं, फिर भी आप यह भी जान सकते हैं: आप उतना पाप नहीं कर सकते जितना परमेश्वर क्षमा कर सकता है, और आप आश्वस्त हो सकते हैं कि जिसने आप में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा (फिलिप्पियों 1:6)। आप अनुग्रह पर अनुग्रह पर अनुग्रह का अनुभव शाश्वत रूप से करेंगे।

यह अनुग्रह ही था जिसने मुझे अब तक सुरक्षित रखा,

और वही अनुग्रह मुझे घर तक ले जाएगा।”[1]

होशे 3