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19 जुलाई : अटल रूप से जुड़े हुए

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19 जुलाई : अटल रूप से जुड़े हुए
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“अतः यदि मसीह में कुछ शान्ति, और प्रेम से ढाढ़स, और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करुणा और दया है, तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो, और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो।” फिलिप्पियों 2:1-2

मसीही बनने का अनुभव कुछ हद तक विवाह करने जैसा होता है। दो अविवाहित व्यक्ति विवाह के बन्धन में एक हो जाते हैं और उनका जीवन अविच्छेदनीय रूप से आपस में जुड़ जाता है। इसी तरह, जब हम मसीह को उसके सम्पूर्ण प्रेम में स्वीकार करते हैं और उस उद्धार को स्वीकार करते हैं, जो उसने क्रूस पर हमारे लिए प्राप्त किया है, तो हम उसके साथ एक हो जाते हैं—और फिर कभी पहले जैसे नहीं रहते।

जैसा कि प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पियों को याद दिलाया था, आज हम भी उस प्रोत्साहन को पहचान सकते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ हमारे मिलन का परिणाम है। उसके साथ हमारा सम्बन्ध परमेश्वर के अनुग्रह का एक उपहार है और हम यह जानकर सुरक्षित महसूस कर सकते हैं कि हम जहाँ कहीं भी जाएँ वह अपने आत्मा की शक्ति से हमारे साथ होता है। यदि आप विश्वास द्वारा मसीह के साथ एक हो गए हैं, तो वह आपके अपने हाथों और पैरों से भी अधिक आपके निकट है। आपका जीवन हमेशा के लिए प्रभु के साथ जुड़ गया है।

21वीं सदी के जीवन की एक प्रमुख कठिनाई यह है कि हम में से कई लोग कभी-कभी अकेले, बिना किसी साथी के और बिछड़े हुए महसूस करते हैं, भले ही हम बहुत सारे लोगों के बीच में ही क्यों न हों। हम अपने इस अलगाव की भावना को सतही बातचीत या हल्की मुस्कान से छिपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कभी-कभी हम लोगों के बीच से आते हुए खुद को बुरी तरह खोया हुआ महसूस करते हैं।

वास्तव में, मसीहियों को इस निराशा का अनुभव करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम मसीह के साथ अपने मिलन का आश्वासन जानते हैं और अनुभव करते हैं। वह हमें पूरी तरह से जानता है और हमें अनन्त प्रेम करता है। इसे जानने से हमें बड़ी सान्त्वना मिलती है!

जिस “सान्त्वना” का उल्लेख पौलुस यहाँ पर करता है, वह केवल एक साधारण, आरामदायक भावना नहीं है; यह शब्द कुछ ऐसा वर्णित करता है, जिसमें शक्ति और आकर्षण शामिल होता है। यह एक क्रियाविशेषण है: सान्त्वना हमारे एक दूसरे के साथ सम्बन्ध में बहती है, क्योंकि आत्मा हमें न केवल अपने आप से बल्कि स्वर्ग पहुँचने से पहले हमें एक दूसरे से भी जोड़ता है। जितना अधिक हम मसीह के साथ अपने मिलन के लाभों का आनन्द लेते हैं—जिसमें सबसे अनमोल स्वयं मसीह है—उतना ही हम अपने विश्वासी भाई-बहनों के अधिक निकट आते हैं और अधिक प्रेमपूर्ण बनते जाते हैं।

फिर भी, जबकि ऐसी सान्त्वना हमें आशीषित करती है, यह हमें उत्तरदायी भी बनाती है। मसीह की दया और करुणा के हमारे ज्ञान से हमें एक दूसरे के प्रति स्नेह और सहानुभूति दिखाने की प्रेरणा मिलनी चाहिए, क्योंकि हम उसके साथ अपने मिलन में बढ़ते जाते हैं। यह सम्भव है कि जीवन के संघर्षों के कारण हम कठोर हो जाएँ, यह सम्भव है कि हम उस अनुग्रह की कमी महसूस करें जो कोमलता में प्रकट होता है, यह भी सम्भव है कि हम अपने आप में इतने व्यस्त हो जाएँ कि हम दूसरों से प्रेम करने में विफल हो जाएँ।

आज आपको किस प्रकार की सान्त्वना या प्रोत्साहन की आवश्यकता है? अपने मसीह के साथ मिलन पर विचार करें और उन्हें उसी में पाएँ। फिर आत्मा से पूछें कि वह आपको किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाए जिसे आज सान्त्वना या प्रोत्साहन की आवश्यकता है और मसीह की सान्त्वना को उनके पास लाने का माध्यम बनें।

कुलुस्सियों  3:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 23–25; प्रेरितों 14 ◊

19 July : त्याची वेळ अचूक आहे

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19 July : त्याची वेळ अचूक आहे
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तर मग आपल्यावर दया व्हावी आणि ऐन वेळी साहाय्यासाठीं कृपा मिळावी, म्हणून आपण धैर्याने कृपेच्या राजासनाजवळ जाऊ (इब्री 4:16)

ह्या मूल्यवान वचनाचे मराठीत असलेले भाषांतर अचूक आणि योग्यच आहे, मुख्यत ‘ऐन वेळी’  हे शब्द. हे शब्द संकेत देतांत कीं जेव्हा आपल्याला ‘ऐन वेळी’  देवाची गरज लागते, तेव्हा लगेच तो आमच्या साहाय्यासाठीं धावून येतो. या वचनाचा शब्दशः मुद्दा आहे ‘ऐन वेळी.’

सर्व सेवा ही भावी सेवा असते – एक क्षण दूर, किंवा एक महिना दूर, किंवा एक वर्ष, किंवा एक दशक दूर. त्या दृष्टिने, आपल्या अपुरेपणावर चिंतन करण्यासाठीं आपल्याकडें पुरेसा वेळ आहे. आणि त्या विचाराने जेव्हा आपल्या मनाचा थरकाप उडतो, आपण प्रार्थनेकडें वळले पाहिजे.

प्रार्थना विश्वासाचेच एक स्वरूप आहे जी आपल्याला आजच उद्याच्या सेवेसाठीं समर्थ बनविणाऱ्या कृपेशी जोडते. वेळ खरोखर महत्वाची आहे.

जर ती कृपा वेळेपूर्वी आली किंवा वेळ निघून गेल्यावर आली तर काय होईल? या संदर्भात अत्यंत मौल्यवान असलेल्या वचनाचे इब्री लोकांस 4:16 चे इंग्रजीचे भाषांतर स्पष्ट नाहीं. ते समजण्यासाठीं आम्हांला अधिक शाब्दिक अभिव्यक्ती आवश्यक आहे. आणि ते अभिवचन म्हणजें केवळ “गरजेच्या वेळी साहाय्यासाठीं ” कृपा मिळते असे नाहीं, तर असे कीं कृपा देवऐन वेळी  देतो.

मुद्दा असा आहे कीं प्रार्थना योग्य वेळी सहाय्यासाठीं भावी कृपेचा शोध घेण्याचा मार्ग आहे. देवाची ही कृपा सदैव “कृपेच्या राजासनाजवळ” ऐन वेळी मिळते. “कृपेचे राजासना” या वाक्यांशाचा अर्थ असा आहे कीं भविष्यातील कृपा विश्वाच्या त्या राजाकडून मिळते जो स्वतःच्या अधिकारयुक्त निर्णयाने ती वेळ ठरवतो (प्रेषितांची कृत्ये 1:7).

त्याची वेळ अचूक आणि पूर्ण आहे, परंतु आपल्या सीमित दृष्टीने ती ऐन वेळी प्रकट होणारी अशी कृपा आहे: “[त्याच्या] दृष्टीने सहस्र वर्षें कालच्या गेलेल्या दिवसासारखी, रात्रीच्या प्रहरासारखी आहेत” (स्तोत्र 90:4). जागतिक स्तरावर, तो राष्ट्रांचा उदय व त्यांच्या पतनाचे समय ठरवितो (प्रेषित 17:26). आणि वैयक्तिक दृष्टीने, “माझे दिवस [त्याच्या]  हाती आहेत” (स्तोत्र 31:15).

आपण भविष्यातील कृपेच्या वेळेबद्दल काळजी करतो तेव्हा आपण “कृपेच्या राजासनावर” जाऊन चिंतन केलेंले बरे. आपल्यासाठीं ती वेळ जर योग्य असेल तर कोणतीही गोष्ट कृपा पाठवण्याच्या देवाच्या योजनेत अडथळा आणू शकत नाहीं. भविष्यातील कृपा नेहमीच ऐन वेळी मिळणारी कृपा आहे.

18 जुलाई : परमेश्वर का राजा

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18 जुलाई : परमेश्वर का राजा
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“फिर परमेश्‍वर ने उससे (याकूब से) कहा, ‘मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ। तू फूले–फले और बढ़े; और तुझ से एक जाति वरन् जातियों की एक मण्डली भी उत्पन्न होगी, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।’” उत्पत्ति 35:11

न्यायियों की पुस्तक इस्राएलियों की कहानी बताती है, जब उनके नेता यहोशू के निधन के बाद वे प्रतिज्ञा के देश में निवास करने लगे। यह एक निराशाजनक कहानी है क्योंकि लोग बहुत जल्दी बगावत करने लगे, और एक ऐसा चक्र आरम्भ हुआ जो इस पुस्तक में बार-बार दोहराया जाता है। पहला, लोग पाप करते; दूसरा, परमेश्वर उन्हें पराजित और उत्पीड़ित होने देता; तीसरा, वे मदद के लिए रोते; और चौथा, परमेश्वर एक न्यायाधीश या नेता को उठाकर इस्राएल के शत्रुओं को हराता और देश में शान्ति स्थापित करता। लेकिन शान्ति कभी लम्बे समय तक नहीं रहती थी और यह चक्र फिर से दोहराया जाता था।

न्यायियों की अवधि के दौरान, इस्राएल धार्मिक, सामाजिक, नैतिक और आर्थिक दृष्टि से ढह रहा था। इसके परिणामस्वरूप, लोग सोचने लगे कि यदि एक राजा नियुक्त किया जाए तो जीवन बहुत बेहतर हो जाएगा, जैसा कि परमेश्वर ने याकूब से कहा था कि एक राजा का उदय होगा। फिर भी, अपने आस-पास के राष्ट्रों के समान बनने की इच्छा में उन्होंने परमेश्वर के राजत्व को नकार दिया और इस प्रकार उस अवस्था को त्याग दिया जो उन्हें अद्वितीय बनाती थी। उन्होंने परमेश्वर-तन्त्र के स्थान पर एक राज-तन्त्र की मांग की। और ऐसे राजा की तलाश करने के बजाय जो परमेश्वर की अधीनता में रहकर शासन करता और उन्हें परमेश्वर के नियमों के आज्ञापालन में स्थापित रखता, वे ऐसे राजा की तलाश करने लगे जो परमेश्वर के बजाय स्वयं उनपर शासन करे।

अद्‌भुत बात यह है कि इस्राएलियों की पापपूर्ण इच्छाओं के बावजूद परमेश्वर ने उनकी मांग को पूरा किया। इस्राएल के बहुत से राजा हुए, लेकिन कभी वह राजा नहीं आया जिसकी उन्हें सचमुच जरूरत थी। अभी एक और महान राजा आने वाला था।

इसमें भी परमेश्वर ने अपनी योजना को पूरा किया। उसने लोगों की संकीर्ण दृष्टि और दूसरे राष्ट्रों के राजा जैसे राजा की मांग को अपने परम उद्देश्य को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया, जिसके माध्यम से ऐसा राजा आने पर था जो अन्ततः सब राष्ट्रों पर शासन करेगा। आग चलकर इस्राएल के राजवंश में यीशु का जन्म हुआ—वह आने वाला राजा जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की थी—वह जिसका “न तो यहूदा से राजदण्ड छूटेगा, न उसके वंश से व्यवस्था देने वाला अलग होगा; और राज्य-राज्य के लोग उसके अधीन हो जाएँगे।” (उत्पत्ति 49:10)। सच्चा राज्य मसीह द्वारा स्थापित किया जाएगा, जो परमेश्वर के अधिकार के तहत शासन करेगा और जो अयोग्य लोगों के लिए परमेश्वर का सर्वोत्तम उपहार होगा।

देखिए कितना महान है परमेश्वर, जो अपनी योजनाओं में मूर्खतापूर्ण मांगों और बुरी इच्छाओं को भी समेट लेता है! परमेश्वर हमारे चुनावों और गलतियों से बहुत बड़ा है। वह हर गलत कदम पर पूरी तरह से शासन करता है। चाहे हम इस्राएल की तरह कभी-कभी असफल हो जाते हैं, तौभी हम निश्चिन्त हो सकते हैं कि अपने उद्देश्यों को पूरा करते हुए परमेश्वर हमारी विफलताओं पर विजय प्राप्त करेगा। और आज हम किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति की सेवा करने के बजाय खुशी-खुशी उसके राजा की आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं।

2 शमूएल 7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 20–22; प्रेरितों 13:26-52

18 July : आध्यात्मिक कृपादानांत असलेली देवाची कृपा

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18 July : आध्यात्मिक कृपादानांत असलेली देवाची कृपा
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प्रत्येकाला जसे कृपादान मिळाले आहे तसे देवाच्या नानाविध कृपेच्या चांगल्या कारभार्‍यांप्रमाणें ते एकमेकांच्या कारणी लावा. (1 पेत्र 4:10)

जेव्हा आपण आपल्या आध्यात्मिक कृपादानांचा उपयोग करतो तेव्हा आपण कृपेचे कारभारी म्हणून भूमिका पार पाडत असतो – कालच्या कृपेचे कारभारी नव्हे, तर आजच्या कृपेचे, जी आमच्या गरजेच्या प्रत्येक क्षणी आम्हांला दिली जात असते. आणि ही भविष्यातील कृपा म्हणजें “नानाविध कृपा” आहे. ही कृपा नानाविध रंग आणि नानाविध आकार आणि नानाविध स्वरूपांत येत असते. याच एका कारणामुळें मंडळीत असलेली अध्यात्मिक कृपादाने इतकीं नानाविध आहेत. तुम्हांला देवानें जे कृपादान दिलें आहे त्याचे कार्यकारी गुणधर्म देवाच्या गौरवाच्या अशा छटा नानाविध दाखवेल ज्यां छटा देवानें मला दिलेंल्यां कृपादानांतून कधीही दिसून येणार नाहींत. 

ख्रिस्ताच्या मंडळीत जितक्या नानाविध गरजा आहेत तितक्या नानाविध भावी कृपा आहेत – आणि बरेच काहीं. अध्यात्मिक कृपादानांचा उद्देश त्या गरजा पूर्ण करण्यासाठीं देवाची कृपा प्राप्त करणें आणि ती एकमेकांच्या कारणी लावणें हा आहे.

आता एखाद्याला प्रश्न पडेल, “तुम्हीं भावी कृपेचा संदर्भ देण्यासाठीं पेत्राचेच वचन का घेतले? पुरुष एक कारभारी म्हणून आधीच हाताशी असलेला आपला घरगुती प्रपंच सांभाळत नसतो का?”

भावी कृपेचा संदर्भ देण्यासाठीं मी पेत्राचा उल्लेख केला याचे मुख्य कारण हे कीं हा कारभार कसा साध्य होतो यावर पुढील वचन प्रकाश टाकते, आणि त्या वचनाचा संदर्भ त्या भावी कृपेकडें संकेत देतो जी खंड न पडता पुरविली जाते. ते वचन असे म्हणते, “सेवा करणार्‍याने, ती आपण देवानें दिलेंल्या शक्तीने करत आहोत, अशी करावी; ह्यासाठीं कीं, सर्व गोष्टींत देवाचा गौरव येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे व्हावा; गौरव व पराक्रम हे युगानुयुग त्याचे आहेत. आमेन.” (1 पेत्र 4:11). मूळ भाषेंत हा शब्दांश “देव पुरवत असलेल्या” आहे, “देवानें पुरवलेल्या” नाहीं. तुम्हीं सेवा करत असताना, तुम्हांला जे करणें अगत्याचे असते ते साध्य करण्यासाठीं देवाच्या सतत पुरवल्या जाणाऱ्या कृपेच्या सामर्थ्याने सेवा करा.

उद्या जेव्हा तुम्हीं ख्रिस्तात असलेल्या एखाद्या बंधूची सेवा करण्यासाठीं तुमचे आध्यात्मिक कृपादान कारणी लावाल तेव्हा तुम्हीं ती सेवा “देव पुरवत असलेल्या सामर्थ्याने” कराल — आणि तो पुरवठा आज नाहीं, तर उद्या होईल. “जसे तुमचे दिवस असतील, तसे तुमचे सामर्थ्य असेल” (अनुवाद 33:25 : संपादकाचे भाषांतर).

आपण ज्या सामर्थ्याने सेवा करतो ते “सामर्थ्य” देव आपल्याला दिवसेंदिवस, क्षणाक्षणाला पुरवत असतो. तो असे करतो कारण जो त्या सामर्थ्याचा खंड न पडता पुरवठा करतो त्या अविनाशी देवाचाच त्यामुळें सर्व गौरव होतो. “सेवा करणार्‍याने, ती आपण देवानें दिलेंल्या शक्तीने करत आहोत, अशी करावी; ह्यासाठीं कीं, सर्व गोष्टींत देवाचा गौरव येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे व्हावा.”

17 जुलाई : अविश्वास से बचकर रहना

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17 जुलाई : अविश्वास से बचकर रहना
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“अतः जैसा पवित्र आत्मा कहता है, ‘यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मन को कठोर न करो, जैसा कि क्रोध दिलाने के समय और परीक्षा के दिन जंगल में किया था। जहाँ तुम्हारे बापदादों ने मुझे जाँचकर परखा और चालीस वर्ष तक मेरे काम देखे।’” इब्रानियों 3:7-9

इस्राएलियों के प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश करने से पहले परमेश्वर ने उन्हें कनान में बारह जासूस भेजने का आदेश दिया था। उन जासूसों में से दो, यहोशू और कालेब, अपनी “अल्पसंख्यक रिपोर्ट” के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसमें उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि देश अधिकार में ले लिए जाने के लिए तैयार था। लेकिन लोगों ने उनकी बात नहीं मानी, और परमेश्वर पर अविश्वास दर्शाया। परमेश्वर पर विश्वास करने के सारे प्रमाण मौजूद होने के बावजूद उन्होंने अपनी समझ पर भरोसा करने का फैसला ले लिया।

सन्देह के उस पल में लोगों में यह डर आ गया कि यदि वे कालेब और यहोशू की बात मान कर परमेश्वर की शक्ति पर भरोसा करते हुए एक शक्तिशाली शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए कदम बढ़ाएँगे, तो वे मारे जाएँगे (गिनती 13:25-14:4)। परमेश्वर ने तुरन्त न्याय-दण्ड भेजा: परमेश्वर द्वारा दिए गए प्रतिज्ञा के देश का आनन्द लेने के बजाय एक पूरी पीढ़ी ने अपना जीवनभर मरुभूमि में बिता दिया और उस आनन्द का अनुभव नहीं कर पाए जो परमेश्वर ने उन्हें दिया था (गिनती 14:21-23)।

इस्राएलियों की तरह आप और मैं भी अविश्वास की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं। इब्रानियों का लेखक हमें चेतावनी देता है, “हे भाइयो, चौकस रहो कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो तुम्हें जीवते परमेश्‍वर से दूर हटा ले जाए” (इब्रानियों 3:12)। ऐसी चेतावनी नहीं दी जाती यदि हमारे हृदय पाप और अविश्वास के खतरे में न होते! हम पाप करना चाहते हैं। हम अपनी ही राह पर चलना चाहते हैं। हम विश्वास करना नहीं चाहते।

अविश्वास हमें इस प्रकार कठोर कर देता है कि जब बाइबल पढ़ी जाती है, तो परमेश्वर का वचन हमारे हृदय और मन में उस बीज की तरह नहीं आता जो तैयार भूमि में बोया जाता है, इसके बजाय हमारे हृदय और मन उस तिरछी छत की तरह हो जाते हैं, जिस पर वर्षा की बूँदें नहीं रुकतीं। जितना अधिक बाइबल सिखाई जाती है, हम पर उसका प्रभाव उतना ही अधिक उस कठोर सतह के जैसे हो जाता है, जिसके पार कुछ भी नहीं जा सकता।

इसलिए सावधान रहें, ताकि आपका हृदय पवित्रशास्त्र के सत्यों के प्रति अभेद्य न हो जाए। सावधानी बरतें कि आप ऐसे व्यक्ति न बन जाएँ जो बाइबल का बचाव करता है, दूसरों से इसके बारे में बात करता है, और उद्धरण देता है, लेकिन साथ ही अपने हृदय को परमेश्वर द्वारा कही गई बातों के खिलाफ कठोर करता रहता है।

हम ऐसे अविश्वास से अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं? दूसरों को यह याद रखने के लिए प्रेरित करें कि परमेश्वर ने मसीह के द्वारा क्या किया है, और उनसे यह भी कहें कि वे आपके लिए भी ऐसा ही करें (कुलुस्सियों 3:16)। और उसी आत्मा से, जिसने पवित्रशास्त्र को लिखा है, कहें कि वह आपके हृदय में काम करे जब आप उसकी आवाज़ सुनते हैं। जब आपको परमेश्वर की शक्ति और देखभाल की याद दिलाई जाती है, और आत्मा आपके अन्दर काम करता है, तो आपका हृदय परमेश्वर के वचन के बीजों को ग्रहण करने के लिए कोमल हो जाएगा।

लूका 13:18-35

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 18–19; प्रेरितों 13:1-25 ◊

17 July : ख्रिस्तावर विश्वास जाहीर करण्यासाठीं लागणारे सामर्थ्य

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17 July : ख्रिस्तावर विश्वास जाहीर करण्यासाठीं लागणारे सामर्थ्य
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प्रेषित मोठ्या सामर्थ्याने प्रभू येशूच्या पुनरुत्थानाविषयी साक्ष देत होते; आणि त्या सर्वांवर मोठी कृपा होती.. (प्रेषितांची कृत्ये 4:33)

जर उद्या आपल्यावर अशी वेळ आली कीं ज्यामध्यें आपल्याला ख्रिस्ताची साक्ष काहीं बिकट परिस्थितीत द्यावी लागेल, तर अशा स्थितींस हाताळण्यासाठीं आवश्यक गुरुकिल्ली आमची बुद्धिमत्ता नाहीं; गुरुकिल्ली असेल ती आम्हांवर केलीं जाणारी भावी विपुल कृपा.

इतर सर्व सुवार्तीकांच्या तुलनेंत, प्रेषितांना मरणांतून उठलेल्या ख्रिस्ताविषयीं ठोस आणि विश्वासाकडें घेऊन जाणारी साक्ष देण्यासाठीं कोणाच्या मदतीची गरज वाटली नाहीं असे दिसते. ते तीन वर्षे त्याच्यासोबत होते. त्यांनी त्याला मरतांना पाहिले होते. त्यांनी त्याला वधस्तंभावर खिळल्यानंतर पुनरुत्थानाद्वारे जिवंत झालेंलें पाहिले होते. त्यांच्याकडें असलेल्या साक्षीच्या शस्त्र-सामग्रीत त्यांच्याकडें “पुष्कळ अचूक पुरावे” होते (प्रेषितांची कृत्ये 1:3). तुम्हांला असे वाटेल कीं, इतर सर्व सुवार्तीकांच्या तुलनेंत, मंडळी स्थापनेच्या त्या सुरुवातीच्या दिवसांत साक्षी देण्याचे त्यांचे कार्य त्यांनी भूतकाळात जे गौरव पहिले होते, ज्याची आठवण अद्यापही ताजीतवानी होती,  त्या बळावर टिकून राहिलेले असावे.

पण प्रेषितांची कृत्ये हे पुस्तक आपल्याला तसे सांगत नाहीं. विश्वासूपणाने आणि परिणामकारकपणें साक्ष देण्याचे जे सामर्थ्य त्यांना मिळाले ते मुख्यत्वे ह्यामुळें नाहीं कीं त्यांना त्यांच्यावर भूतकाळात झालेंल्या कृपेची आठवण होती; तर ते सामर्थ्य त्यांना त्यांच्यावर असलेल्या “मोठ्या कृपेच्या” नवीन आगमनातून मिळाले होते. “त्या सर्वांवर मोठी कृपा होती.” यामुळेंच प्रेषितांनी जें केलें तें ते करू शकलें, आणि आमच्या साक्षी देण्याच्या कार्यात देखील असेच होत असते.

आम्हीं ख्रिस्ताविषयीची साक्ष देत असतांना तिचे सामर्थ्य वाढवण्यासाठीं देवानें कितीही चिन्हे आणि चमत्कार दाखवले तरी ते जसें स्तेफनाच्या साक्षींच्या वेळी घडून आलें तसेच आमच्याही वेळी येतील. “स्तेफन कृपा1 व सामर्थ्य ह्यांनी पूर्ण होऊन लोकांत मोठी अद्भुते व चिन्हे करत असे” (प्रेषितांची कृत्ये 6:8). स्तेफनाला सर्व गोष्टींसाठीं आवश्यक असलेली कृपा ही देवाकडून येत होती – अगदी तो मरत असतांना त्याला जे सहन करावे लागणार होते त्यासाठीं देखील.

भावी काळांत आम्हांवर केलीं जाणारी अद्भुत कृपा आणि सामर्थ्य हेच आहे जे आपल्याला एखाद्या विशेष सेवेच्या वेळी ओढवलेल्या संकटात मदत करू शकेल. हे एक नव्याने प्राप्त झालेंल्या सामर्थ्याचे कार्य असते ज्याद्वारे देव “आपल्या कृपेच्या वचनाविषयी साक्ष” देतो (प्रेषित 14:3; इब्री 2:4 देखील पहा). सामर्थ्य देणारी ही अखंड कृपा सत्याच्या अखंड कृपेची साक्ष देते.

16 जुलाई : सेवा के लिए बुलाए गए

“यीशु ने उनसे कहा, ‘मेरे पीछे चले आओ, तो मैं तुम को मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाऊँगा।’ वे तुरन्त जालों को छोड़कर उसके पीछे हो लिए।” मत्ती 4:19-20

क्या आपने कभी ऐसा किया है कि आप कहीं गए, मान लीजिए किसी रेस्टोरेंट, डॉक्टर के ऑफिस, या किसी दुकान में गए और वहाँ किसी कर्मचारी से पूछा कि वे जो कुछ करते हैं, वह वे क्यों करते हैं? शायद वे अपने परिवार का पालन-पोषण करने की कोशिश कर रहे हैं। हो सकता है कि उन्हें इस क्षेत्र में बचपन से गहरी रुचि रही हो। कई उत्तरों के बीच शायद आप कभी किसी को यह कहते हुए सुनें, “यह मेरा बुलावा है।” एक वास्तविक अर्थ में वे नए नियम के दृष्टिकोण से सेवाकार्य को सटीक रूप से व्यक्त करते हैं।

जो लोग मसीह में हैं, वे सभी सेवा के जीवन के लिए बुलाए गए हैं। ऐसा नहीं है कि मसीह के पास तो हम सभी बुलाए गए हैं, लेकिन केवल कुछ ही आगे बढ़कर सेवा करते हैं; सेवा मसीही शिष्यत्व का एक अभिन्न हिस्सा है। जब यीशु ने अपने शिष्यों को “मनुष्यों के मछुआरे” बनने के लिए कहा, तो वास्तव में वह उन्हें यह कह रहा था, मेरे पास तुम्हारे लिए एक काम है। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे सेवाकार्य में भाग लो।

चाहे एक मसीही को परमेश्वर के वचन का प्रचारक या शिक्षक होने के लिए, युवाओं के लिए बाइबल अध्ययन के अगुवे के रूप में, कलीसिया के बच्चों की कक्षा में स्वयंसेवक के रूप में, या फिर अपनी फैक्ट्री या दफ्तर में गवाह के रूप में, घर में बच्चों की परवरिश करने वाले माता-पिता के रूप में, या एक बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने वाले बच्चों के रूप में, या किसी अन्य भूमिका में बुलाया गया हो, परमेश्वर का सेवा का बुलावा समान रूप से लागू होता है। “पूर्णकालिक सेवकों” और “अल्पकालिक सेवकों” के बीच का अन्तर उनके महत्त्व का नहीं बल्कि केवल कार्य का अन्तर है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात सेवा है।

बाइबल के दृष्टिकोण में सेवा महानता का रास्ता नहीं है; सेवा ही महानता है। “मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे” (मरकुस 10:45)। हम त्यागपूर्ण सेवा इस उम्मीद में नहीं करते कि हमारी “तरक्की” होगी, जैसे किसी नौकरी या शिक्षा के क्षेत्र में होती है, न ही हम सेवा इसलिए करते हैं ताकि एक दिन हम सेवा करना बन्द कर दें। यीशु कहता है, “यदि कोई बड़ा होना चाहे, तो सबसे छोटा और सबका सेवक बने” (मरकुस 9:35)। जब हमारे कार्य इस विरोधाभास को दर्शाते हैं, तब सारी महिमा परमेश्वर को मिलती है।

मसीही सेवा अन्ततः वह सेवाकार्य है, जो जी उठे प्रभु यीशु की सेवा है, जिसे उसके लोगों के बीच और उनके माध्यम से किया जाता है। प्रेरित पौलुस इसे स्पष्ट रूप से समझ गया था, इसीलिए उसने लिखा, “मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझमें जीवित है और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझसे प्रेम किया और मेरे लिए अपने आप को दे दिया।” (गलातियों 2:20)।

यीशु ने हमारे लिए अपना जीवन दे दिया ताकि वह हमारे जीवन को हमसे ले सके और उसे अपने जीवन के रूप में हमारे माध्यम से जी सके। यदि आप इसे समझते हैं, तो आप सचमुच उसी तरह सेवा कर पाएँगे जैसा यीशु ने की—और आपका जीवन अत्यन्त मूल्यवान हो जाएगा, जोकि आपकी अपनी सेवा करते हुए कभी नहीं हो सकता। इसलिए आज हम अपनी बुलाहट में जीएँ।

मरकुस 9:30-37

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 16–17; प्रेरितों 12

16 July : आजच्या कृतींसाठीं लागणारे सामर्थ्य

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16 July : आजच्या कृतींसाठीं लागणारे सामर्थ्य
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भीत व कापत आपलें तारण साधून घ्या; कारण इच्छा करणें व कृती करणें हे तुमच्या ठायीं आपल्या सत्संकल्पासाठीं साधून देणारा तो देव आहे (फिलिप्पैकरांस 2:12-13)

येथे इच्छा करणें व कृती करणें साधून देण्यांत निर्णायक भूमिका करणारा कर्ता स्वतः देव आहे. आपलें तारण साधून घ्या. . . कारण इच्छा करणें व कृती करणें हे तुमच्या ठायीं देव स्वतः साधून देतो. आपल्या सत्संकल्पासाठीं देव इच्छा करतो आणि तोच आहे जी ती इच्छेनुकूल कृतीहि साध्य करतो. पण यावर विश्वास करणें म्हणजें ख्रिस्ती विश्वासणारे निष्क्रीय होतांत असा त्याचा अर्थ नाहीं. तर उलट, हे सत्य त्यांना आशावादी आणि सक्रिय कष्टाळू आणि धैर्यवान बनवते.

आम्हीं आपापल्या पाचारणानुसार जी विशिष्ट सेवा करतो त्यांत दररोज आम्हांला कृती करावयाची असते. पौल आपल्याला तीच  कृती साधून घेण्यासाठीं काम करायची आज्ञा देतो. परंतु देवानें पुरवलेल्या सामर्थ्याने ती कशी करावी हे तो आपल्याला सांगतो: त्याच्यावर विश्वास ठेवा! आज इच्छा करणें व कृती करणें हे तुमच्याठायीं आपल्या सत्संकल्पासाठीं देवच साधून देईल या अभिवचनावर विश्वास ठेवा.

देव, जो क्षणोक्षणी आपल्या कृपेने काम करत असतो, भविष्यात आम्हांवर जी कृपा केलीं जाईल त्याविषयीच्या अभिवचनाचा अनुभव आपल्याला वर्तमान समयी चाखावयांस देतो. आपण आपलें तारण कसे साधून घ्यावे हे जेव्हा पौल आपल्याला स्पष्ट करून सांगतो तेव्हां पौलाचा जोर आम्हांवर भूतकाळात झालेंल्या कृपेविषयी आपण कृतज्ञ असावे यावर नाहीं. मी असे म्हणत आहे याचे शुद्ध कारण म्हणजें हे कीं अनेक ख्रिस्ती लोकांना जेव्हा विचारले जाते कीं आज्ञाधारकपणामागे हेतू काय असावा, तेव्हां आपण असे कृतज्ञतेमुळें करतो असे ते म्हणतील. परंतु पौल जेव्हा आमच्या कृती मागील हेतू आणि सामर्थ्य याबद्दल बोलतो तेव्हा तो यावर जोर देत नाहींये. देवानें जे अद्याप केलेंलें नाहीं ते तो साध्य करून देईल त्यावर विश्वास ठेवण्यावर तो जोर देत आहे, केवळ त्यानें जे केलें आहे त्यावर नाहीं. आपलें तारण साधून घ्या! का? आणि ते कसे? कारण देव प्रत्येक क्षणासाठीं नवी झालेंली कृपा पुरवितो. जेव्हां जेव्हां तुम्हीं इच्छा व कृती करता, तेव्हां तेव्हां ती इच्छा करणें व ती कृती करणें तुम्हांमध्यें तोच साध्य करून देत असतो. येणाऱ्या घटकेसाठीं आणि भावी काळांत येणाऱ्या हजारो वर्षांच्या आव्हानांना सामोरे जाण्यासाठीं ह्या सत्यावर विश्वास ठेवा.

भविष्यात जी कृपा केलीं जाईल तिचे सामर्थ्य जिवंत ख्रिस्ताचे सामर्थ्य आहे –आपल्या प्रत्येक भावी क्षणी आपल्याठायीं ती कृती साधून द्यावयांस तो सदासर्वदा आम्हांबरोबर असतो. म्हणून जेव्हा पौल त्याच्यावर झालेंल्या देवाच्या कृपेच्या परिणामाचे वर्णन करतो तेव्हा तो म्हणतो, “ख्रिस्तानें माझ्या हातून न घडवलेले काहीं सांगण्याचे धाडस मी करणार नाहीं; तर परराष्ट्रीयांनी आज्ञापालन करावे म्हणून त्यानें माझ्या शब्दांनी व कृतींनी, …. जे जे घडवले तेच मी सांगतो” (रोमकरांस 15:18).

यास्तव, ज्याअर्थी ख्रिस्तानें त्याच्या सेवाकार्याद्वारे जे काहीं साध्य केलें ते सोडून इतर काहींही बोलण्याचे त्यानें धाडस केलें नाहीं, आणि तरीही खरेतर ती कर्मे त्यानें केलीं, त्याअर्थी कृपने त्याच्या सेवेद्वारे जे जे साध्य केलें तो केवळ त्याबद्दल सांगतो (1 करिंथकरांस 15:10), म्हणजें याचा अर्थ असा कीं, कृपा जे सामर्थ्य साध्य करते ते ख्रिस्ताचे सामर्थ्य आहे.

याचा अर्थ असा कीं पुढील पाच मिनिटांसाठीं आणि पुढील पाच दशकांच्या सेवेसाठीं आपल्याला ज्या सामर्थ्याची गरज आहे ते सामर्थ्य सर्वशक्तिमान ख्रिस्ताची भावी कृपा होय, जो युगानुयुग आम्हांबरोबर आहे – आपल्या सत्संकल्पासाठीं इच्छा करणें व कृती करणें हे साधून देण्यासाठीं सदैव तत्पर.

15 जुलाई : परमेश्वर की इच्छा का रहस्य

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15 जुलाई : परमेश्वर की इच्छा का रहस्य
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“क्योंकि उसने अपनी इच्छा का भेद उस भले अभिप्राय के अनुसार हमें बताया, जिसे उसने अपने आप में ठान लिया था कि समयों के पूरे होने का ऐसा प्रबन्ध हो कि जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।” इफिसियों 1:9-10

जब आप एक नई इमारत के निर्माण को बाहर से देखते हैं, तो बाहर लगे चबूतरों और बोरियों के पीछे जो कुछ हो रहा होता है, वह एक रहस्य जैसा प्रतीत हो सकता है। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि कुछ न कुछ अवश्य आकार ले रहा है, लेकिन आर्किटेक्ट के अलावा किसी और के लिए इसका अन्तिम परिणाम पूरी तरह से कल्पना कर पाना कठिन हो सकता है।

पुराने नियम की पटकथा के आगे बढ़ते हुए परमेश्वर की इच्छा का रहस्य इन्हीं चबूतरों और बोरियों के समान है, जो बाइबल की पटकथा के कुछ हिस्सों को ढक देता है। लेकिन फिर पौलुस कहता, “समय पूरा हुआ” (गलातियों 4:4)। यहाँ तक कि जब भविष्यद्वक्ताओं ने भी उस आने वाले के बारे में भविष्यद्वाणी की, तो वे अपने लेखन में दिए गए संकेतों और सुरागों के पीछे के पूरे अर्थ का केवल अनुमान ही लगा सकते थे (1 पतरस 1:10-11)।

बाइबल की भाषा में “रहस्य” कोई ऐसी पहेली नहीं है, जिसे मनुष्य की बुद्धि से हल किया जा सके। बल्कि यह एक गुप्त बात है, जिसे स्वयं परमेश्वर अपने समय पर प्रकट करेगा। परमेश्वर के आत्मा के काम के माध्यम से परमेश्वर के कई रहस्य हमारी समझ में स्पष्ट होते जाते हैं। उसके काम के बिना हम इन्हें समझ नहीं सकते।

अपने पुनरुत्थान के बाद, जब यीशु को इम्माऊस के मार्ग में दुखी यात्रियों से बात करने का मौका मिला, तो उसने उन्हें एक प्रेमपूर्ण लेकिन रणनीतिक तरीके से उत्तर दिया (लूका 24:18-27)। पहले, वे उसे पहचान नहीं पाए और पूछा, “क्या तू यरूशलेम में अकेला परदेशी है, जो नहीं जानता कि इन दिनों में उसमें क्या-क्या हुआ है?” (कितना विडम्बनापूर्ण है!) यीशु ने केवल इतना उत्तर दिया, “कौन सी बातें?” वह इन बातों को उनके मुख से सुनना चाहता था।

फिर, जब उन्होंने उसकी क्रूसीकरण और पुनरुत्थान का घटनाक्रम साझा किया, तो उसने उनसे कहा, “हे निर्बुद्धियो, और भविष्यद्वक्ताओं की सब बातों पर विश्वास करने में मन्दमतियो!” वे अब भी रहस्य को समझ नहीं पाए थे—और इसलिए लूका हमें बताता है, प्रभु ने इसे उनके लिए स्पष्ट किया: “‘क्या यह अवश्य न था कि मसीह ये दुख उठाकर अपनी महिमा में प्रवेश करे?’ तब उसने मूसा से और सभी भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्रशास्त्र में से अपने विषय में लिखी बातों का अर्थ उन्हें समझा दिया।”

“उसकी इच्छा का रहस्य” परमेश्वर के लोगों पर प्रकट किया गया है और वास्तव में प्रकट किया जा रहा है, ताकि “सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।” एक दिन जब पिता द्वारा अपने अधिकार से ठहराया गया समय पूरा होगा, तब यह एकता पूरी तरह से सम्पूर्ण हो जाएगी।

अन्ततः सारे चबूतरे और बोरे हटा दिए जाएँगे, और हम इमारत को उसकी पूर्णता में देखेंगे। उस दिन तक हम इस बात के लिए आभारी रह सकते हैं कि प्रभु ने उद्धार का रहस्य हम पर प्रकट कर दिया है, और हम उसकी स्तुति करते हुए उसकी सेवा कर सकते हैं, यह विश्वास करते हुए कि चाहे हम उसकी योजनाओं या उनकी पूर्णता को पूरी तरह से न समझ पाएँ, तो भी वह दिव्य आर्किटेक्ट अपने लोगों की भलाई और अपने पुत्र की महिमा के लिए सब कुछ सही तरीके से पूरा कर रहा है।

प्रकाशितवाक्य  5:1-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 13–15; प्रेरितों 11 ◊

14 जुलाई : प्राणों का एकमात्र उपचार

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14 जुलाई : प्राणों का एकमात्र उपचार
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“अराम के राजा का नामान नामक सेनापति अपने स्वामी की दृष्‍टि में बड़ा और प्रतिष्ठित पुरुष था, क्योंकि यहोवा ने उसके द्वारा अरामियों को विजयी किया था। वह शूरवीर था, परन्तु कोढ़ी था।” 2 राजाओं 5:1.

प्रत्येक दृष्टिकोण से यह प्रतीत होता था कि नामान ने सब कुछ हासिल कर लिया था।

नामान सीरिया के प्रसिद्ध शहर दमिश्क का रहने वाला एक व्यक्ति था। लेबनान के पहाड़ों से निकलने वाली दो नदियाँ, जो अत्यन्त सुन्दरता से भरे एक उपजाऊ नखलिस्तान में बहती थीं, जहाँ यह शहर स्थित था। यह समृद्धि और सुख-विलास का स्थान था, और कला, संगीत, और मनोरंजन के सांस्कृतिक आकर्षण प्रदान करता था। सीरियाई सेना के सफल सेनापति के रूप में नामान के पास शक्ति और प्रतिष्ठा की एक ईर्ष्यालु स्थिति थी और उसे उसके राजा सहित हर व्यक्ति उच्च सम्मान देता था। और निस्सन्देह, शक्ति और प्रतिष्ठा के साथ उसने बहुत सारी सम्पत्ति भी अर्जित की थी।

अर्थात, वह ऐसा व्यक्ति था जिसके पास सब कुछ था। बस एक चीज को छोड़कर। नामान के जीवन में एक ऐसा आयाम था, जो बाकी सारी चीजों पर काले बादल की तरह छाया डालता था। उसकी कई गर्वित उपलब्धियों को इस एक वाक्यांश ने धुंधला कर दिया था: “परन्तु वह कोढ़ी था।” जो कुछ भी उसने हासिल किया था—उसकी कई उपलब्धियाँ और अपार सम्पत्ति—उसकी समस्या से निपटने के लिए कुछ भी नहीं कर सका। वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था . . . और उसकी कोढ़ी अवस्था उसका जीवन बर्बाद कर रही थी।

जो शारीरिक स्थिति नामान को कष्ट दे रही थी, वह उस आध्यात्मिक स्थिति का चित्र है जिसमें हम सभी फँसे हुए हैं। उसकी कोढ़ी अवस्था घावों और कुरूपता से भरी संक्रामक स्थिति थी। बाइबल में यह पाप से संक्रमित मानव-प्रकृति का एक आदर्श चित्र है।

जब हम स्वयं और अपने सन्दर्भ के बारे में दूसरों से बताते हैं, तो हम यह सूचीबद्ध कर सकते हैं कि हम किसे जानते हैं, हम कहाँ-कहाँ गए हैं, और हमने क्या-क्या हासिल किया है। फिर भी इन सबके अन्त में, मसीह के बिना, हम निस्सन्देह उसी छोटे शब्द की ओर बढ़ रहे हैं, जैसा नामान के साथ हुआ था: परन्तु . . .

कोढ़ ने नामान की उच्च पदवी की कोई परवाह नहीं की और पाप भी हमारी किसी स्थिति की कोई परवाह नहीं करता। “सभी ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हो गए हैं” (रोमियों 3:23), और “सभी” का अर्थ सचमुच में “सभी” है। कोई भी पुरुष या महिला इस समावेशी कथन से बाहर नहीं है। कोई भी सम्पत्ति हमें पाप से नहीं छुटकारा दिला सकती और कोई भी अच्छाई उसे ढक नहीं सकती। हम सभी अपनी आत्माओं के कोढ़ से पीड़ित हैं, जिसका मसीह के अलावा और कोई इलाज नहीं है।

जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारी पदवी और सम्पत्ति हमारी सबसे बड़ी समस्या से नहीं निपट सकती, केवल तब ही हम यीशु की ओर मुड़ सकते हैं, जो हमारा महान चिकित्सक है, जिसने हमारी स्थिति को अपने ऊपर ले लिया ताकि हम स्वस्थ हो सकें। यीशु एक कोढ़ी से सम्पर्क करने और उसे छूने के लिए तैयार था, लेकिन ऐसा करके चाहे उसने लोगों की दृष्टि में स्वयं को अपवित्र कर लिया तौभी उसने उस व्यक्ति को पूरी तरह से स्वस्थ कर दिया। ठीक इसी प्रकार, क्रूस पर उसने पाप को अपने ऊपर ले लिया ताकि हम परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी हो सकें (2 कुरिन्थियों 5:21)।

आज, आपके चारों ओर बहुत सारे नामान हैं: ऐसे लोग जो प्रतिष्ठा, शक्ति और सम्पत्ति का आनन्द लेते हैं—ऐसे लोग जिन्होंने सब कुछ हासिल तो कर लिया है, लेकिन फिर भी पाप के कारण बर्बाद हो चुके हैं और न्याय का सामना कर रहे हैं। यह सत्य दूसरों से ईर्ष्या करने की हमारी भावना को कमजोर करता है और इसके बजाय दया को प्रेरित करता है। जैसा कि नामान को अपनी कोढ़ी अवस्था के लिए इलाज की आवश्यकता थी, वैसे ही हर पुरुष और महिला को पाप के लिए समाधान की आवश्यकता है—और आप उस इलाज को जानते हैं।

लूका 5:12-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 10–12; प्रेरितों 10:24-48