25 मई : मृत्यु की तैयारी करना

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25 मई : मृत्यु की तैयारी करना
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“मार्था ने यीशु से कहा, ‘हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता। और अब भी मैं जानती हूँ कि जो कुछ तू परमेश्‍वर से माँगेगा, परमेश्‍वर तुझे देगा।’ यीशु ने उससे कहा, ‘तेरा भाई फिर जी उठेगा।’ मार्था ने उससे कहा, ‘मैं जानती हूँ कि अन्तिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा।’ यीशु ने उससे कहा, ‘पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझ पर विश्‍वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्‍वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा। क्या तू इस बात पर विश्‍वास करती है?’”  यूहन्ना 11:21-26

हममें से कोई नहीं जानता कि एक दिन हमें क्या मिलेगा। वास्तव में, हम सभी कुछ हद तक अनिश्चितता के साथ जीते हैं; हम अपने रास्ते में आने वाली हरेक परीक्षा के लिए तैयार नहीं हो सकते। वास्तव में, जैसा कि कई लोगों ने उल्लेख किया है, जीवन की एकमात्र निश्चितता यह है कि यह समाप्त होगा। हम एक पतित संसार में जी रहे हैं, और हम जानते हैं कि “पाप की मजदूरी मृत्यु है” (रोमियों 6:23)। इसलिए मरना एक ऐसा सत्य है, जिसके लिए हमें तैयारी करनी चाहिए।

मृत्यु और मरने पर होने वाला जो भी विचार यीशु के शब्दों पर गहराई से ध्यान नहीं देता, वह अधूरा होता है। इसलिए इसका आरम्भ करने का एक अच्छा स्थान वह ठोस शिक्षा है, जो यीशु ने अपने मित्र लाजर की मृत्यु के बाद दी थी।

स्वाभाविक रूप से, लाजर की शोकित बहनें अपने भाई के साथ हुई घटना को लेकर गहरी चिन्ता में थीं। इसके जवाब में, यीशु ने कहा कि लाजर फिर से जी उठेगा। मार्था इस उद्‌घोषणा को पूरी तरह से समझ न पाई और कहने लगी, “मैं जानती हूँ कि वह अन्तिम दिन पुनरुत्थान में जी उठेगा।” तब यीशु ने बात को एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कहा, “मैं  ही पुनरुत्थान और जीवन हूँ।”

और फिर मार्था के लिए चुनौती आई: “क्या तुम इस पर विश्वास करती हो?”

इस प्रश्न का उत्तर न केवल आपके जीने के तरीके को, बल्कि मृत्यु का सामना करने के आपके तरीके को भी प्रभावित करता है। यीशु ने न केवल मृत्यु को पराजित किया, बल्कि उसने आपके लिए भी मृत्यु को पराजित करने का रास्ता बना दिया। हालाँकि आपका शारीरिक रूप विफल हो जाएगा, लेकिन जब आप विश्वास करते हैं कि यीशु ही पुनरुत्थान और जीवन है, तो मृत्यु बस एक द्वार बन जाती है जिसमें से होकर आप जीवन के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं।

मृत्यु को लेकर विश्वासियों के सामने एक चुनौती यह है कि न केवल हम इस बात के लिए तैयार रहें कि यह अवश्य आएगी, बल्कि यह भी सीखना है कि दूसरों को इसका सामना करने में कैसे मदद करें। हालाँकि हालात चाहे जैसे भी हों, यीशु के शब्द हमारे लिए प्रेमपूर्ण सलाह का आधार प्रदान करते हैं। हमें बाइबल के दृष्टिकोण से और ईमानदारी से बात करनी होगी और अनन्तता के सत्य तथा उस आशा को समझाना होगा, जो उसमें पाई जाती है। हमारे शब्द, जो स्वयं यीशु के शब्दों की गूंज हैं, कठोर और संवेदनाहीन नहीं होने चाहिएँ, बल्कि वे ज्ञान और अनुग्रह से भरे हुए होने चाहिएँ।

आप तब तक यह नहीं जान सकते कि कैसे जीना है, जब तक कि आपने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है कि कैसे मरना है। हम में से किसी को भी आने वाले कल की प्रतिज्ञा नहीं दी गई है, लेकिन अनन्तता हर उस अनुयायी के लिए सुनिश्चित है जो पुनरुत्थान और जीवन के स्रोत में विश्वास रखता है। आप अपने आप को—और अपने मित्रों और प्रियजनों को—मृत्यु के दिन का सामना डर और अनिश्चितता के बजाय शान्ति और आत्मविश्वास के साथ करने के लिए तैयार कर सकते हैं और इन शब्दों को थामे रह सकते हैं: “पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझ पर विश्‍वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्‍वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा।” हाँ, हम इस पर विश्वास करते हैं।

यूहन्ना 11:1-44

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 10–11; मत्ती 13:31-58

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