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29 जुलाई : हस्तक्षेप को स्वीकार करना

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29 जुलाई : हस्तक्षेप को स्वीकार करना
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“जब वह मन्दिर में टहल रहा था तो प्रधान याजक और शास्त्री और पुरनिए उसके पास आकर पूछने लगे, ‘तू ये काम किस अधिकार से करता है? और यह अधिकार तुझे किस ने दिया है कि तू ये काम करे?’” मरकुस 11:27-28

हम में से कोई भी नहीं चाहता कि कोई दूसरा हमारे काम में हस्तक्षेप करे।

जब कोई हमारे ध्यान की या हमारे द्वारा आज्ञापालन किए जाने की मांग करता है, तो हम स्वाभाविक तौर पर नकारात्मक रूप से प्रतिक्रिया करते हैं। सामान्य तौर पर, हम नहीं चाहते कि लोग हमें बताएँ कि हमें क्या करना चाहिए, और विशेष रूप से आध्यात्मिक मामलों में तो बिल्कुल भी नहीं। यह हमेशा लुभावना होता है कि हम इस विचार को स्वीकार कर लें, जो आजकल बहुत लोकप्रिय है, कि हमारी आध्यात्मिकता किसी और का मामला नहीं है—यह एक व्यक्तिगत मामला है जो केवल हमसे सम्बन्धित है।

इसीलिए जब हम सुसमाचार पढ़ते हैं, तो हम विशेष रूप से असहज महसूस कर सकते हैं क्योंकि यह स्पष्ट हो जाता है कि यीशु हमारे जीवनों में हस्तक्षेप करता है। हाँ, यह हमारे भले के लिए है—लेकिन फिर भी, वह हस्तक्षेप करता है। वास्तव में, अपनी आत्मकथा में, सी.एस. लुईस ने यीशु को “आध्यात्मिक हस्तक्षेपकर्ता” कहा है।

यीशु के सेवाकार्य की आरम्भ से ही लोगों ने महसूस किया कि वह अधिकार के साथ बोलता था (मरकुस 1:22, 27 देखें)। वह इस प्रकार से बातें बोलता था कि उन्हें न तो टाला जा सकता था और न ही उन्हें आसानी से नकारा जा सकता था। लेकिन लोग उसकी बातों का प्रतिरोध करने और उन्हें अस्वीकार करने के लिए मुक्त थे। उसकी अधिकारपूर्ण शिक्षाएँ धार्मिक शिक्षकों के लिए बगल में कांटे की तरह बन गईं, और उन्होंने यीशु का विरोध करना आरम्भ कर दिया। आखिरकार, वे उसे मारने की साजिश रचने लगे ताकि उन्हें अपने आध्यात्मिक जीवन को यीशु के सामने खोलने की आवश्यकता न पड़े (मरकुस 3:6)।

धार्मिक नेताओं की तरह हम भी अक्सर एक व्यक्तिगत आध्यात्मिकता पसन्द करते हैं, जो हमारे उद्देश्यों और जीवनशैली द्वारा ढाली जाती है: “मैं यह मानता हूँ। मैं इस पर दृढ़ हूँ। हमने हमेशा से यह किया है। हमारी परम्परा यह है।” यीशु आकर इन सब विचारों को उलट देता है, और मनुष्य द्वारा बनाई गई मान्यताओं को पलट देता है।

वास्तव में, यीशु ने पृथ्वी पर अपने सेवाकार्य के अन्त के समय घोषणा की कि सारा अधिकार उसे दिया गया है (मत्ती 28:18-19)। वह उस अधिकार को किसी के साथ साझा नहीं करता। वास्तव में, हमारे आध्यात्मिक जीवन का दायित्व उस पर है। अब हम उसके सामने सिर झुका कर उसे प्रभु और उद्धारक के रूप में स्वीकार करते हैं, या फिर एक दिन हम उसके सामने सिर झुका कर उसे केवल न्यायाधीश के रूप में मिलेंगे।

यीशु को हमारे अस्तित्व के एक छोटे से कोने में जोड़ लेना आसान और गैर-हस्तक्षेपकारी है; लेकिन यह पूरी तरह से अलग बात है कि हम “आध्यात्मिक हस्तक्षेपकर्ता” को हमारे जीवन के हर पहलू को उसके नियन्त्रण में लेने और हमसे पूर्ण आज्ञाकारिता की मांग करने की अनुमति दें। उसका पूर्ण अधिकार वह विषय है जिस पर हमें हर निर्णय में विचार करना चाहिए। इसलिए हमें यह असहज करने वाला प्रश्न पूछना पड़ता है: क्या मैं अपनी प्राकृतिक इच्छाओं के अनुसार और अपने द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार जी रहा हूँ? या क्या मैं हर दिन और हर तरीके से अपने उद्धारक के प्रति खुशी-खुशी समर्पण करने का प्रयास कर रहा हूँ?

यह तभी सम्भव है जब हम यीशु के अधिकार के सामने झुकते हैं, उसके प्रभुत्व को हमारे समय, हमारे कौशल, हमारे पैसे, हमारी हरेक चीज पर स्वीकार करते हैं, केवल तभी हम उसे प्रभु और उद्धारक के रूप में पूरी तरह से अपनाने और उसे एक मित्र और मार्गदर्शक के रूप में जानने का आनन्द ले सकते हैं। क्या आप किसी भी तरह से उसे दूर रखे हुए हैं? यही वह स्थान है जहाँ वह आपको उसे हस्तक्षेप करने की अनुमति देने के लिए कहता है; यही वह स्थान है जहाँ आपके पास उसे उस व्यक्ति के रूप में सच्चे तौर पर स्वीकार करने का अवसर है, जिसके पास सारा अधिकार है। वह निश्चित रूप से आपके जीवन में हस्तक्षेप करेगा—लेकिन इसका अधिकार केवल उसी के पास है, और केवल वही आपको स्वतन्त्र कर सकता है।

दानिय्येल 7:9-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 49–50; प्रेरितों 20:1-16 ◊

29 July : विश्वासासाठीं हुतात्मे झालेंल्यांसाठीं देवाची योजना

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29 July : विश्वासासाठीं हुतात्मे झालेंल्यांसाठीं देवाची योजना
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तेव्हा त्या प्रत्येकाला एकेक शुभ्र झगा देण्यात आला आणि त्यांना असे सांगण्यात आलें कीं, तुमच्या सोबतीचे दास व तुमचे बंधू तुमच्यासारखे जिवे मारले जाणार, त्यांची संख्या पूर्ण होईपर्यंत तुम्हीं आणखी थोडा वेळ विश्रांती घ्या. (प्रकटीकरण 6:11)

ख्रिस्ती धर्माची जवळजवळ तीनशे वर्षांची प्रारंभिक वाढ ही हुतात्म्यांच्या रक्ताने माखलेल्या मातीतून झाली.

सम्राट ट्राजन (सन सुमारे 98), ह्याच्या कारकिर्दीचा आरंभ होईपर्यंत छळ जरी कायदेशीर नव्हता तरी त्याची मोकळीक होती. सम्राट ट्राजनच्या कारकिर्दीपासून ते सम्राट डेशियसच्या कारकिर्दीच्या आरंभापर्यन्त (सन सुमारे 250 AD), छळ कायदेशीर झालेंला होता. डेशियस, जो ख्रिस्ती लोकांचा द्वेष करत होता आणि ज्याला त्याच्याद्वारे करण्यांत येणाऱ्या बेकायदेशीर सुधारणांवर त्यांच्या प्रभावाची धास्ती होती, ह्याच्या कारकिर्दीच्या आरंभापासून ते सन 311 मध्यें धार्मिक सहिष्णुतेचा प्रथम कायदा येईपर्यंत, ख्रिस्ती लोकांचा छळ केवळ कायदेशीरच नव्हता, तर सर्वत्र व्यापक आणि सामान्य झालेंला होता. 

एका लेखकाने या तिसऱ्या कालखंडातील परिस्थितीचे वर्णन पुढील शब्दांत केलें :

मंडळ्यांमध्यें सर्वत्र दहशत पसरली होती; आणि लॅप्सीची संख्या [ज्यांनी आपला जीव वाचविण्यासाठीं विश्वासापासून माघार घेतली होती] . . . फार मोठी होती. तरी, जे विश्वासांत खंबीरपणें टिकून राहिले आणि ज्यांनी शरण जाण्याऐवजी हौतात्म्य पत्करले, अशांची संख्या पण कमी नव्हती; आणि, छळ जसजसा व्यापक आणि तीव्र होत गेला, तसतसा ख्रिस्ती लोकांचा उत्साह आणि त्यांची प्रतिकार-शक्ती अधिकाधिक बळकट होत गेली.

या प्रमाणें, त्यां तीनशे वर्षांच्या काळांत ख्रिस्ती असणें हा जीवन आणि संपत्ती व कुटुंब यांसाठीं प्रचंड धोकादायक विश्वास होता. आपण कोणत्या गोष्टींवर अधिक प्रीति करतो याची ही परीक्षा होती. आणि या परीक्षेचा टोकाचा बिंदू म्हणजें हौतात्म्य पत्करणें.

आणि त्या हौतात्म्यपणावर एक अशा सार्वभौम देवाचे वर्चस्व होते ज्याने म्हटलें कीं त्यां हुतात्म्यांची संख्या ठराविक आहे. मंडळीरोपण करणें आणि तिला सुदृढ करणें यांत त्यांची विशेष भूमिका आहे. सैतानाचे तोंड बंद करण्यात त्यांची विशेष भूमिका आहे, जो सतत म्हणतो कीं देवाचे लोक त्याची सेवा केवळ यामुळें करतांत कारण त्यांचे जीवन सोयीस्कर आहे. ईयोब 1:9-11 चा हाच मुद्दा आहे.

हौतात्म्य ही काहीं अपघाती गोष्ट नाहीं. ही एखादी अशी गोष्ट नाहीं जी घडून आल्यावर स्वतः देव चक्रावून जातो. ती अनपेक्षित घटना नाहीं. आणि नक्कीच ही गोष्ट ख्रिस्ताचा प्रचार करण्यासाठीं तयार करण्यांत आलेंल्यां धोरणाचा पराभवहि नाहीं.

हौतात्म्य कदाचित पराभव वाटू शकतो. परंतु हा स्वर्गात आखलेल्या योजनेचाच भाग आहे ज्याची कल्पना कोणत्याही मानवी रणनीतीकाराने कधीहि केलीं नाहीं किंवा ज्याची रचना तो कधीहि करू शकणार नाहीं. आणि जे देवाच्या त्या कृपेवर विश्वास ठेवून शेवटपर्यंत टिकून राहतांत जी त्यांच्यासाठीं सर्व बाबतींत पुरेशी आहे ते सर्व ह्या योजनेंत विजयी होतांत.

28 जुलाई : चलने वाले बनो

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28 जुलाई : चलने वाले बनो
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“वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं।” याकूब 1:22

विश्वासियों के रूप में, हमारे जीवन में परमेश्वर के वचन की सच्चाई के प्रति प्रशिक्षित और समर्पित मन होने चाहिए, और हमें अपनी परिस्थितियों को प्रार्थना से भरना चाहिए (फिलिप्पियों 4:6-8)। फिर भी, यदि हम हमारे भीतर काम कर रही परमेश्वर की शक्ति का अनुभव और आनन्द लेना चाहते हैं, तो हमें उसे अभ्यास में लाना होगा, जो हम पवित्र पवित्रशास्त्र में सुनते हैं। हमें हर दिन पवित्रशास्त्र पर ध्यान केन्द्रित करने में तत्पर रहना चाहिए, और जब परमेश्वर का वचन पढ़ा जा रहा हो तब उसमें उपस्थित रहना चाहिए, लेकिन हमें कभी यह नहीं सोचने की गलती करनी चाहिए कि सिर्फ उपस्थित होना, ध्यान देना और ध्यान से सुनना पर्याप्त है। पवित्रशास्त्र कहता है, “वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं . . .।” (याकूब 1:22)।

यूहन्ना 13 में, यीशु अपनी मृत्यु से पहले की रात कुछ समय तक अपने शिष्यों को शिक्षा देने के बाद उनसे कहता है, “तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो” (यूहन्ना 13:17)। यदि आप सोचते हैं कि आप परमेश्वर का आशीर्वाद क्यों अनुभव नहीं कर रहे हैं, तो इसका कारण यह हो सकता है कि आप उसके वचन को अपने जीवन में लागू नहीं कर रहे हैं। प्रभु ने हमें समृद्ध निर्देश दिए हैं और उसने हमें हमारे सहायक के रूप में अपना आत्मा दिया है। अब हमारा दायित्व है कि हम अपने मन को परमेश्वर के वचन की सच्चाई में प्रशिक्षित करें और फिर जो हमने सीखा है, प्राप्त किया है, और सुना है, उसे करें।

यह कितने दुख की बात है जब कलीसियाएँ पुराने धूल भरे पुस्तकालयों जैसी बन जाती हैं, जहाँ इतने सारे जीवन होते हैं जो सच्चाई के खण्डों की तरह तो होते हैं, लेकिन बस वहाँ बैठे रहते हैं और कभी उपयोग में नहीं आते। जब हम सत्य के प्रति अधिक जागरूक होते हैं, तो प्रलोभन यह होता है कि हम सिर्फ बैठकर उस पर विचार करें और कभी भी उसके अनुसार कार्य न करें। याकूब इस प्रकार के जीवन को बहुत स्पष्ट शब्दों में बताता है: यह अपने आप को धोखा देना है। नहीं—कलीसिया को तो जीवित अनुभवों का एक भवन होना चाहिए। विश्वासियों के भीतर एक जीवन्तता होनी चाहिए, ताकि जब हम संसार की समस्याओं का सामना करें—जिन समस्याओं से हम खुद भी अछूते नहीं हैं—तो हम उन्हें उनकी वास्तविकता में देख सकें और परमेश्वर के वचन के सत्य को अपने जीवन में जीते हुए इन समस्याओं का सामना कर सकें।

आज ही संकल्प लें कि आप केवल सुनने वाले नहीं होंगे और इस प्रकार खुद को यह धोखा नहीं देंगे कि आप एक प्रगतिशील मसीही हैं, जबकि वास्तव में आप एक सूखते हुए मसीही हैं। वचन पर चलने वाले बनने का संकल्प लें। अब अपने जीवन पर ईमानदारी से विचार करें और उन क्षेत्रों की पहचान करें जहाँ आपने मसीह के लिए जीने के बारे में सुना है, लेकिन कभी सच में आज्ञा नहीं मानी। वही आपके जीवन का वह हिस्सा होगा, जिस बारे में पवित्र आत्मा आपको अभी कह रहा है, केवल सुनने वाले मत बनो। करने वाले बनो—क्योंकि उसी से आशीर्वाद मिलता है।

याकूब 1:19-27

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 46–48; प्रेरितों 19:21-41

28 July : आम्हींधैर्य का सोडत नाहीं

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28 July : आम्हींधैर्य का सोडत नाहीं
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म्हणून आम्हीं धैर्य सोडत नाहीं; परंतु जरी आमचा बाह्य देह क्षय पावत आहे, तरी अंतरात्मा दिवसानुदिवस नवा होत आहे. कारण आमच्यावर येणारे तात्कालिक व हलके संकट हे आमच्यासाठीं अत्यंत मोठ्या प्रमाणात सार्वकालिक गौरवाचा भार उत्पन्न करते; आम्हीं दृश्य गोष्टींकडें नाहीं तर अदृश्य गोष्टींकडें लक्ष लावतो; कारण दृश्य गोष्टी क्षणिक आहेत, पण अदृश्य गोष्टी सार्वकालिक आहेत. (2 करिंथ 4:16-18)

पौलाला जसा पूर्वी रस्ता दिसत होता तसा तो आता पाहू शकत नाहीं (कारण त्या काळी चष्मा नव्हता). जसे त्याला पूर्वी ऐकू येत असे तसे त्याला आता ऐकू येऊ शकत नाहीं (कारण त्या काळी श्रवणयंत्र नव्हते). मारहाणीपासून जसा तो पूर्वी बरा व्हायचा तसा तो आता लवकर बरा होऊ शकत नाहीं (कारण त्या काळी आजच्याप्रमाणें कोणतीही एंटीबायोटिक औषधे नव्हती). एका नगरातून दुसऱ्या नगरांकडें चालत जात असतांना त्याची शक्ती आता पूर्वीसारखी टिकत नाहीं. त्याच्या चेहऱ्यावर आणि मानेवर सुरकुत्या स्पष्ट दिसू लागल्या आहेत. त्याची स्मरणशक्ती आता पूर्वीसारखी तीक्ष्ण राहिलेली नाहीं. आणि तो कबूलहि करतो कीं ह्या सर्व दुर्बळपणामुळें त्याच्या विश्वासाला आणि आनंदाला आणि धैर्याला मोठा धोका होता.

तरी तो धैर्य सोडत नाहीं. का?

तो धैर्य सोडत नाहीं कारण कीं त्याचा अंतरात्मा दिवसानुदिवस नवा होत आहे. कसा?

त्याच्या अंतरात्म्याचे नवीनीकरण एका अशा गोष्टीमुळें होत असे जी पूर्णपणें अद्भुत अशी होती : अंतरात्म्याचे ते नवीनीकरण अशा गोष्टींकडें लक्ष लावल्यामुळें होत असे ज्यांना तो पाहू शकत नव्हता, म्हणजें ज्यां अदृश्य अशा होत्यां.

आम्हीं दृश्य गोष्टींकडें नाहीं तर अदृश्य गोष्टींकडें लक्ष लावतो; कारण दृश्य गोष्टी क्षणिक आहेत, पण अदृश्य गोष्टी सार्वकालिक आहेत. (2 करिंथ 4:18)

ह्याच कारणामुळें पौल धैर्य सोडत नव्हता : म्हणजें जे तो पाहू शकत नव्हता त्यांकडें तो लक्ष लावत होता. तर मग, त्यानें ज्या अदृश्य गोष्टींकडें लक्ष लावलें, तेव्हां त्याला काय दिसलें?

2 करिंथकर 5:7 मध्यें काहीं वचनांनंतर, तो म्हणतो, “आम्हीं विश्वासाने चालतो, डोळ्यांनी दिसते त्याप्रमाणें चालत नाहीं.” याचा अर्थ असा नाहीं कीं तिथे काय आहे याचा काहीं पुरावा नसताना देखील तो जणू अंधारात झेप घेत होता. याचा अर्थ असा आहे कीं आपण वर्तमान समयी ह्या जगात राहत असतांना ज्यां गोष्टीं वास्तविकरीत्या अति मौल्यवान आणि महत्त्वपूर्ण आहेंत त्यांची समज आपल्या भौतिक इंद्रियांच्या पलीकडें आहे.

आपण या अदृश्य गोष्टींकडें सुवार्तेच्या भिंगातून “पाहतो.” आम्हीं आमच्या धैर्याचे नूतनीकरण करतो—म्हणजें ज्यांनी ख्रिस्ताला देहरूपी साक्षात पाहिले त्यांनी दिलेंल्यां साक्षीमध्यें आपण पाहत असलेल्या अदृश्य, वस्तुनिष्ठ सत्याकडें आपली दृष्टि लावून आम्हीं आपली अंतःकरणें बळकट करतो.

 “अंधारातून उजेड प्रकाशित होईल” असे जो देव बोलला तो येशू ख्रिस्ताच्या मुखावरील देवाच्या गौरवाच्या ज्ञानाचा प्रकाश पाडण्यासाठीं आमच्या अंतःकरणात प्रकाशला आहे” (2 करिंथ 4:6). “येशू ख्रिस्ताच्या मुखावरील देवाच्या गौरवाच्या ज्ञानाचा प्रकाश.” ज्या क्षणी सुवार्तेद्वारे आमच्या अंतःकरणात हा प्रकाश पडतो त्या क्षणी ते आमच्या दृष्टींस पडते. 

हा प्रसंग घडला त्या क्षणी आम्हीं ख्रिस्ती झालो – मग आम्हांला ते समजले असो वा नसो. आणि आपणही पौलाबरोबर आपल्या अंतःकरणाच्या डोळ्यांनी पाहणें गरजेचे आहे, जेणेंकरून आपणही धैर्य सोडून देऊं नये.

27 जुलाई : उस पर ध्यान करो

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27 जुलाई : उस पर ध्यान करो
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“इसलिए उस पर ध्यान करो, जिसने अपने विरोध में पापियों का इतना विरोध सह लिया कि तुम निराश होकर साहस न छोड़ दो।” इब्रानियों 12:3

क्या कभी आप अपने विश्वास को त्यागने के प्रलोभन में पड़े हैं? शायद किसी कठिन सप्ताह के दौरान आपने अपनी परिस्थितियों पर विचार किया और सोचा, “इनमें से कोई भी बात मेरे लाभ के लिए काम नहीं कर रही है। अब समय आ गया है कि मैं मसीहत को भूलकर वैसे जीऊँ जैसे दूसरे जीते हैं।” ऐसे समय में, हमारे लिए यह देखना आसान होता है कि हमारे अविश्वासी दोस्त, परिवार और सहकर्मी अलग तरह से और अधिक आसान जीवन जी रहे होते हैं, और ऐसा लगता है कि उनका जीवन शानदार चल रहा है। जलन से भरी नज़रें सन्देह और भ्रम पैदा करती हैं और हमारी दृढ़ता को चुराकर हमें सीधा और सकरा रास्ता छोड़ देने के लिए उकसाती हैं।

भजनकार आसाफ का भी यही अनुभव रहा था। उसके “डग तो उखड़” ही गए थे, क्योंकि जब वह “दुष्‍टों का कुशल देखता था, तब उन घमण्डियों के विषय डाह करता था” जो “सदा आराम से” रह रहे थे (भजन 73:2-3, 12)। ऐसा लगता है कि यही अनुभव उन मसीहियों का भी रहा था, जिन्हें इब्रानियों की पुस्तक के लेखक ने स्वयं सम्बोधित किया। उन्होंने अभी तक विश्वास में दृढ़ रहने के लिए अपना लहू नहीं बहाया था (इब्रानियों 12:4), लेकिन यह स्पष्ट था कि उनके भीतर के पाप से संघर्ष और बाहर से आ रहे विरोध का सामना करने के लिए संघर्ष उनके ऊपर भारी पड़ रहा था।

अब उन्हें क्या करना चाहिए था? यीशु पर ध्यान करें। हिम्मत हारने और थकावट का बाइबल के अनुसार इलाज यह है कि हम अपनी दृष्टि उस पर रखें जिसने विरोध सहा—जो क्रूस पर मर गया—ताकि उस आनन्द को प्राप्त कर सके जो उसके सामने रखा था (इब्रानियों 12:2)।

हमारे जीवन में एक समय ऐसा आएगा जब हमें शब्दों, कामों या परिस्थितियों में अन्यायपूर्ण रीति से दुखों का सामना करना पड़ेगा—और हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि हम अपनी पसलियों में भाला चुभाना और हाथों-पैरों में कीलें ठुकवाना नहीं चाहते। हम सभी को इस वास्तविकता का सामना करना पड़ेगा कि हमने उन पापों को अभी तक नहीं हराया है, जिनके साथ हम वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं।

हम सभी के सामने ऐसे दिन आएँगे जब हम दौड़ में नहीं रहना चाहते, जब दौड़ को छोड़ देने और उसमें से बाहर हो जाने का प्रलोभन हम पर आएगा। उन दिनों में आपको क्या करना चाहिए? परमेश्वर के वचन को सुनें जो कहता है, उस पर ध्यान करो। मसीह के जीवन पर ध्यान करो: वह कैसा था और उसका परिणाम क्या निकला। उसने महिमा का दरवाजा खोला; अब हम उसके पीछे उस रास्ते पर चल रहे हैं। यीशु पर ध्यान करो, जिसने अपनी दौड़ पूरी की और “परमेश्वर के सिंहासन की दाहिनी ओर जा बैठा” (इब्रानियों 12:2)। चाहे रास्ता कठिन चढ़ाई का हो या हवा हमारे खिलाफ हो, दिन-प्रतिदिन हम उसी पर ध्यान करते रहें और “वह दौड़ जिसमें हमें दौड़ना है धीरज से दौड़ें” (पद 1)।

फिलिप्पियों  3:3ब-16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 43–45; प्रेरितों 19:1-20 ◊

27 July : जर तुम्हीं वासनांशी युद्ध करत नाहीं

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27 July : जर तुम्हीं वासनांशी युद्ध करत नाहीं
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जिवात्म्याबरोबर लढणार्‍या दैहिक वासनांपासून दूर राहा. (1 पेत्र 2:11)

एकदा मी एका माणसाला त्याच्या व्यभिचाराच्या जीवनाविषयी हटकले; आधी मी त्याची परिस्थिती समजून घेण्याचा प्रयत्न केला; मी त्याला त्याच्या पत्नीकडें परत जाण्याची विनंती केलीं. मग मी म्हटलें, “कसं आहे, येशूनें म्हटलें कीं तुम्हीं या पापाशी जर इतक्या गंभीरपणें युद्ध करत नसाल कीं जणू ते जिंकण्यासाठीं तुम्हीं तुमचा स्वतःचा डोळाच उपटून टाकण्यास तयार आहांत, तर तुम्हीं नरकात जाल आणि तेथे सर्वकाळ यातना भोगाल.”

विश्वासाचा दावा करणारा एक ख्रिस्ती म्हणून, तो माझ्याकडें केविलवाण्या शंकेने असा पाहू लागला जणू त्यानें त्याच्या आयुष्यात असे पूर्वी काहींही ऐकलें नव्हते; त्यानें विचारलें, “म्हणजें तुम्हांला असं वाटतं कीं एखादी व्यक्ती आपलें तारण गमावू शकते?”

अशाप्रकारे, मी प्रत्यक्ष अनुभवातून वारंवार हें शिकलो कीं असेहि अनेक ख्रिस्ती लोक आहेत जें तारणाविषयीचा असा दृष्टिकोन घेऊन जगतांत जो त्यांना खऱ्या जीवनापासून अलिप्त ठेवतो, जो बायबलमध्यें देण्यांत आलेंल्या धमकावण्यांपासून त्यांचे लक्ष दूर घालवितो, व जो आपण ख्रिस्ती असल्याचा दावा करणाऱ्या पापी व्यक्तीला बायबलमध्यें पापाविरुद्ध दिलेंल्यां इशाऱ्यांच्या आवाक्याबाहेर नेऊन ठेवतो. माझ्या मतें, ख्रिस्ती जीवनाविषयीचा असा दृष्टिकोन त्यां हजारो लोकांना खोटा दिलासा देत आहे जे खरे पाहता त्यां रुंद व पसरट मार्गावर आहेत ज्याचा शेवट नाश आहे (मत्तय 7:13).

येशूनें म्हटलें, जर तुम्हीं वासनांशी लढा देत नाहीं तर स्वर्गात तुमचा प्रवेश होणार नाहीं. “तुझा उजवा डोळा तुला पापास प्रवृत्त करत असेल तर तो उपटून टाकून दे; कारण तुझे संपूर्ण शरीर नरकात टाकले जावे ह्यापेक्षा तुझ्या एका अवयवाचा नाश व्हावा हे तुझ्या हिताचे आहे” (मत्तय 5:29). मुद्दा हा नाहीं कीं खरे ख्रिस्ती लोक पापा विरुद्धच्या त्यांच्या युद्धांत प्रत्येक वेळी यशस्वी होतांतच. मुद्दा हा आहे कीं आपण लढण्याचा संकल्प करतो, आपण निष्कलंक असे यशस्वी होतो हा मुद्दा नाहीं. आम्हीं पापाबरोबर समेट करत नाहीं; आम्हीं त्याशी युद्ध पुकारतो.

या युद्धांत जे पणांस लागते ते या जागाला एक हजार क्षेपणास्त्रांनी जरी उडविले, किंवा दहशतवाद्यांनी तुमच्या शहरावर बॉम्ब जरी टाकला, किंवा ग्लोबल वॉर्मिंगमुळें बर्फाचे डोंगर जरी वितळले, किंवा एड्सने सर्व राष्ट्रांना ग्रासून टाकलें त्याहीपेक्षा कितीतरी जास्त आहे. ही सर्व संकटे केवळ शरीरालाच जिवें मारू शकतांत. पण जर आपण वासनेशी लढलो नाहीं तर आपण आपला जीव गमावतो तो कायमचा, सर्वकाळासाठीं.

पेत्र म्हणतो कीं दैहिक वासनां जिवात्म्याबरोबर लढतांत (1 पेत्र 2:11). महायुद्ध किंवा दहशतवाद यांत असलेल्या कोणत्याही धोक्यापेक्षा या युद्धात जे पणास लागते तें अमर्यादपणें खूप आहेत. प्रेषित पौलाने “जारकर्म, अमंगळपणा, कामवासना, कुवासना व लोभ” यांची सूची दिल्यानंतर असे म्हटलें कीं “त्यामुळें देवाचा कोप होतो” (कलस्सै 3:5-6). आणि देवाचा कोप हा जगातील सर्व राष्ट्रांच्या कोपापेक्षा अति भयंकर आहे.

देव आम्हांला ती कृपा देवो कीं ज्याद्वारे आपण स्वतःच्या व प्रियजनांच्या जिवात्म्यांना गांभीर्याने घेऊं व त्यां विरुद्ध लढणाऱ्या वासनांशी आपलें युद्ध चालू ठेऊ.

26 जुलाई : परमेश्वर-केन्द्रित एकाग्रता

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26 जुलाई : परमेश्वर-केन्द्रित एकाग्रता
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“मैं दाखलता हूँ : तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।” यूहन्ना 15:5

शौकिया फोटोग्राफर्स अक्सर यह नहीं जानते कि वे किस पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे जानते हैं कि वे किस पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं, लेकिन फिर तस्वीरों में धुंधले चेहरे और टेढ़ी-मेढ़ी इमारतें दिखाई देती हैं। फिर वे अपनी तस्वीरों को देखते हैं और प्रतिक्रिया देते हैं, “यह वह नहीं है जिस पर मैं ध्यान केन्द्रित कर रहा था!” लेकिन हकीकत यह है कि तस्वीरें बिल्कुल वही दिखाती हैं जिस पर उनके कैमरे का लेंस केन्द्रित था।

जिन्दगी के उतार-चढ़ाव में और हर एक पल में हम जिस तरह से हालातों पर प्रतिक्रिया करते हैं, वह हमारे दिल और दिमाग के ध्यान के केन्द्र को प्रकट कर देता है। इसलिए विश्वासियों के लिए चुनौती यह है कि वे परमेश्वर पर अपना ध्यान केन्द्रित करके जीएँ।

यीशु ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि हमें परमेश्वर पर अपना ध्यान केन्द्रित करना है, तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि हम उसके बिना कौन हैं। वास्तव में, यीशु ने अपने शिष्यों से कह दिया था कि उसके बिना वे कुछ भी नहीं कर सकते; आखिरकार, “सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं” (कुलुस्सियों 1:17)। हमें यीशु की ज़रूरत केवल आंशिक तौर पर नहीं है, बल्कि पूरी तरह से है। हम परमेश्वर की मदद के बिना तो एक सांस भी नहीं ले सकते। जो भी कार्य वह हमारे द्वारा कर रहा है, उसका कोई भी श्रेय हम कैसे ले सकते हैं? दिव्य सहायता के बिना हम पूरी तरह से अभाव में हैं।

यह सिद्धान्त पूरी बाइबल में पाया जाता है। मूसा ने, जिसे परमेश्वर ने इस्राएली लोगों को बन्धन और गुलामी से मुक्त करने के लिए चुना था, दृढ़ता से कहा कि वह यह कार्य तब तक नहीं कर सकता जब तक परमेश्वर उसके साथ नहीं होता—और वह सही था (निर्गमन 3:11-12)। आमोस अंजीर के पेड़ों का किसान और भेड़ों का चरवाहा था; जब परमेश्वर ने उसे भविष्यवक्ता के रूप में नियुक्त किया, तो उसके पास सेवाकार्य में योगदान देने के लिए कुछ नहीं था (आमोस 7:14-15)।

इसी प्रकार दानिय्येल, जिसने अद्‌भुत तरीके से सपनों का अर्थ बताया, सारा श्रेय परमेश्वर को देने में तत्पर था (दानिय्येल 2:26-28)। इन सभी पुरुषों ने परमेश्वर पर अपनी पूरी निर्भरता को पहचाना। वास्तव में, बाइबल में परमेश्वर के लिए महान कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से परमेश्वर पर निर्भर हुए बिना ऐसा कर ही नहीं सकता था। जिस कार्य को करने के लिए उन्हें बुलाया गया था, उसे पूरा करने की क्षमता के लिए उन्होंने अपने भीतर देखने के बजाय ऊपर परमेश्वर की ओर देखा।

एक मसीही के रूप में, हमें परमेश्वर पर ध्यान केन्द्रित करके जीने के लिए अपने आप पर या अपनी क्षमताओं पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से हम अपने जीवन में परमेश्वर के अनुग्रह और शक्ति को छिपा सकते हैं। मसीह में, हमें अपनी क्षमताओं पर घमण्ड नहीं करना है या अपने आप को आकर्षित करने का कोई अवसर नहीं ढूँढना है। बल्कि हमें केवल जीवित परमेश्वर के सेवक के रूप में पहचाने जाने की इच्छा रखनी है और उसकी सेवा में उपयोगी बनना है, जब वह हमारे अन्दर अपने अच्छे उद्देश्य के अनुसार कार्य करता है, और जो भी हम करते हैं या कहते हैं, उसमें हम ध्यान अपने ऊपर न लाकर उसके ऊपर लेकर आएँ।

आज आपका ध्यान कहाँ होगा? और जब सफलता या प्रशंसा आपकी ओर आएँगे, तो इसका श्रेय आप किसे देंगे?

लूका 17:7-19

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 40–42; प्रेरितों 18

26 July : द्रव्याचा लोभ धरणें म्हणजें काय

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26 July : द्रव्याचा लोभ धरणें म्हणजें काय
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कारण द्रव्याचा लोभ सर्व प्रकारच्या वाइटाचे एक मूळ आहे. (1 तीमथ्य 6:10)

पौलाने हे लिहिले तेव्हा त्याला काय म्हणायचे होते? तुम्हीं पाप करता तेव्हा पैसा तुमच्या मनात असतो असा त्याचा अर्थ असू शकत नाहीं. आपण अशावेळी देखील पुष्कळ पापें करीत असतो जेव्हा आपल्या डोक्यांत पैशांचा तिळमात्रहि विचार नसतो.

मी त्याचा असा अर्थ सुचवितो : त्याला असे म्हणायचे होते कीं जगात असलेल्यां सर्व वाईट गोष्टी एका विशिष्ट प्रकारच्या अंत:करणांतून येतांत, म्हणजें अशा अंत:करणांतून ज्याला द्रव्याचा लोभ असतो.

मग द्रव्याचा लोभ म्हणजें काय? हिरव्या कागदाची किंवा तांब्याची नाणी किंवा चांदीची नाणी यांची पूजा करणें असा त्याचा अर्थ होत नाहीं. द्रव्याचा लोभ म्हणजें काय हे जाणून घेण्यासाठीं तुम्हांला हा प्रश्न करावा लागेल, द्रव्य किंवा पैसा म्हणजें नेमके काय? मी या प्रश्नाचे उत्तर असे देईन : द्रव्य किंवा पैसा हे फक्त मानव तरतुदींचे एक साधन आहे. द्रव्य म्हणजें देवाकडून मिळविण्याऐवजी तुम्हीं माणसांकडून — इतर मानवांकडून — जे काहीं मिळवू शकता तें.

देव पैशाच्या नव्हे तर कृपेच्या चलनात व्यवहार करतो: “हो तान्हेल्यांनो, तुम्हीं सर्व जलाशयाकडें या, जवळ पैसा नसलेले तुम्हीं या; सौदा करा, खा!” (यशया 55:1). पैसा हे मानवी संसाधनांचे चलन आहे. म्हणून, जें अंत:करण पैशावर प्रीति करते ते असे अंत:करण आहे जे मानवी संसाधने आपल्याला काय देऊ शकतांत यांवर आपली सर्व आशा अडकवून ठेवते, आपल्या सर्व सुखांचा शोध त्यांत घेते व त्यावर भरवसा ठेवते.

अशाप्रकारे, द्रव्याचा लोभ हे अक्षरशः पैशावर असा विश्वास– भरवसा (विश्वास, खात्री) ठेवण्यासारखेच आहे कीं तुमच्या सर्व गरजा पैशानेच पूर्ण होतील आणि त्यातंच तुमचे सर्व सुख व समाधान आहे.

द्रव्याचा लोभ (किंवा पैशावर प्रीति करणें) हा देवाच्या भावी कृपेवरील विश्वासाची जागा घेतो. हे भविष्यासाठीं मानवी संसाधनांवर विश्वास ठेवणें आहे – म्हणजें अशी गोष्ट जी तुम्हीं पैशाने मिळवू शकता किंवा जी तुम्हीं राखून ठेऊ शकता. म्हणून पैशावर प्रेम करणें किंवा पैशावर विश्वास ठेवणें, हे देवाच्या वचनांवर अविश्वासाची खोली आहे. येशूनें मत्तय 6:24 मध्यें म्हटलें, “कोणीही दोन धन्यांची चाकरी करू शकत नाहीं……तुम्हीं देवाची आणि धनाची चाकरी करू शकत नाहीं.”

तुम्हीं एकाच वेळी देवावर आणि पैशावर भरवसा ठेवू शकत नाहीं. एकावर विश्वास म्हणजें दुसऱ्यावर अविश्वास. जे अंत:करण पैशावर प्रीति करते – जे आनंदासाठीं पैशावर अवलंबून राहते – ते अंत:करण आपल्या आत्म्याची तृप्ती म्हणून येशूमध्यें देव आपल्यासाठीं जो कांही आहे त्यावर अवलंबून राहत नाहीं.

25 जुलाई : अनुग्रह, दया, और शान्ति

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25 जुलाई : अनुग्रह, दया, और शान्ति
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“प्रिय पुत्र तीमुथियुस के नाम : परमेश्‍वर पिता और हमारे प्रभु मसीह यीशु की ओर से तुझे अनुग्रह और दया और शान्ति मिलती रहे।” 2 तीमुथियुस 1:2

पौलुस अपने पत्रों में जिस तरह से तीमुथियुस को सम्बोधित करता है, वह बहुत ही प्रभावशाली है। वह इस युवक से किसी प्रकार की दूरी बनाकर नहीं रखता, बल्कि पौलुस उसे अपने “प्रिय पुत्र,” “प्रिय बालक,” और सुसमाचार की घोषणा में एक “सहकर्मी” के रूप में सम्बोधित करता है (2 तीमुथियुस 1:2; 1 कुरिन्थियों 4:17; रोमियों 16:21)।

आरम्भ में, हमें यह शायद नहीं लगेगा कि तीमुथियुस पौलुस के शब्दों या पत्रों को प्राप्त करने के लिए एक स्पष्ट विकल्प था, कम से कम मानवीय दृष्टिकोण से तो बिल्कुल भी नहीं। वह एक मजबूत या परिपक्व व्यक्ति नहीं था, बल्कि अपेक्षाकृत युवा, शारीरिक रूप से कमजोर और स्वभाव से संकोची था—एक ऐसा व्यक्ति जो शायद अपने कार्य के लिए अपर्याप्त अनुभव वाला लगता था। जब वह चिन्तित होता, तो यह उसके पेट को प्रभावित करता था (1 तीमुथियुस 5:23)। वह एक उच्च गुणवत्ता वाला उम्मीदवार नहीं था। वास्तव में, यह कोई असामान्य बात नहीं है। अधिकांश विश्वासियों का हाल यही है। आप और मैं भी ऐसे ही हैं।

फिर भी, तीमुथियुस परमेश्वर का जन था।

वह परमेश्वर का जन था क्योंकि परमेश्वर ने उसे चुना था। परमेश्वर उन पुरुषों और महिलाओं को चुनने में आनन्दित होता है, जो अपेक्षाकृत युवा, स्वाभाविक रूप से कमजोर, शारीरिक रूप से कमजोर या स्वाभाविक रूप से संकोची होते हैं, और कहता है, मैंने तुम लोगों को इस काम के लिए चुना है। तुम मेरे चुने हुए सेवक हो और मैंने तुम्हें इस कार्य के लिए चुना है।

18वीं सदी के प्रचारक जॉर्ज व्हाइटफील्ड को परमेश्वर ने हजारों लोगों को उद्धार की ओर लाने के लिए उपयोग किया। फिर भी, वह अक्सर अपने सेवाकार्य के विचार से अभिभूत हो जाता था। एक बार, टॉवर ऑफ लंदन के चैपल में प्रचार के लिए जाते समय व्हाइटफील्ड ने लिखा, “जब मैं सीढ़ियों पर चढ़ रहा था, तो लगभग सभी लोगों ने मेरी युवावस्था के कारण मुझे ताना मारा; लेकिन वे जल्दी ही गम्भीर हो गए और बहुत ध्यान से सुनने लगे।”[1] उनके श्रोताओं की प्रतिक्रिया क्यों बदल गई? इसका उत्तर सरल है— तीमुथियुस के समान व्हाइटफील्ड भी परमेश्वर का चुना हुआ जन था।

तीमुथियुस को पौलुस का अभिवादन कितना सुकून देता होगा, जो उसे उसके संसाधनों की याद दिलाता था! परमेश्वर ने तीमुथियुस को उद्धार दिया थी और नियुक्त किया था, और परमेश्वर परीक्षणों के लिए अनुग्रह, विफलताओं के लिए दया, और खतरों तथा शंकाओं के सामने शान्ति प्रदान करने वाला था।

आज आपको और मुझे किसकी आवश्यकता है? ठीक वही जिसकी आवश्यकता तीमुथियुस को थी: अनुग्रह, दया, और शान्ति। जो कुछ भी तीमुथियुस के लिए उपलब्ध था, वही हमारे लिए भी उपलब्ध है। इसलिए आप परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं और जो प्रावधान उसने आपके लिए मसीह में तैयार किए हैं, उन पर निर्भर हो सकते हैं। उनके संसाधन आपकी हर एक आवश्यकता को पूरा करने के लिए और उस हर एक कार्य को सम्पूर्ण करने के लिए पर्याप्त हैं, जिसे करने के लिए उसने आपको बुलाया है।

  2 तीमुथियुस 1:1-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 37–39; प्रेरितों 17:16-34 ◊


[1] जॉर्ज व्हाइटफील्डज़ जरनल्स (1737-1741), सम्पादक विलियम वी. डेविस (स्कॉलर्स फैक्सिमलीज़ ऐण्ड रिप्रिण्ट्स, 1969), पृ. 57.

25 July : सैतानाची रणनीती आणि तुमचा बचाव

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25 July : सैतानाची रणनीती आणि तुमचा बचाव
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सावध असा, जागे राहा; तुमचा शत्रू सैतान हा गर्जणार्‍या सिंहासारखा कोणाला गिळावे हे शोधत फिरतो. त्याच्याविरुद्ध विश्वासात दृढ असे उभे राहा. (1 पेत्र 5:8-9)

आपल्या जिवाचे दोन मोठे शत्रू पाप व सैतान हें आहेत. यांत सर्वात वाईट शत्रू पाप हा आहे, कारण सैतान ज्यां एकमेव रणनीतीने आपला नाश करू शकतो तो म्हणजें आपल्याला पाप करायला लावणें आणि आपल्याला पश्चात्ताप करण्यापासून रोखून ठेवणें. केवळ एकच गोष्ट जिचा परिणाम मरण आहे ती म्हणजें अक्षम्य पाप. सैतान नाहीं.

त्यानें आपल्याला पीडावे, कीं बहुंना आपल्याला जिवें देखील मारावें अशी देव स्वतः त्याला काहीं काळासाठीं परवानगी देऊं शकतो, जसे त्यानें इयोबाच्या बाबतींत केलें, किंवा जसें त्यानें स्मुर्णा येथील पवित्र जनांच्या बाबतींत केलें (प्रकटीकरण 2:10); पण सैतान आपला सार्वकालिक नाश करू शकणार  नाहीं वा आपलें सार्वकालिक जीवन हिरावून घेऊ शकत नाहीं. त्याची एकमेव रणनीती ज्याद्वारे तो आपल्याला अंतिम हानी पोहोचवू शकतो ती म्हणजें आपल्याला पापांत पाडणें आणि मग पश्चात्ताप करण्यापासून दूर ठेवणें; तोच त्याचा मुख्य हेतू आहे.

तर मग, आपल्याला पापांत पाडणें, त्याचे समर्थन करणें, त्यासाठीं उत्तेजन देणें, त्यांत सहाय्य करणें, त्यांत असलेल्या आनंदाकडें आकर्षित करणें आणि आपला कल पापाकडेंच असावा याची खात्री करून घेणें, आणि एवढेच काय तर आम्हांला विश्वास आणि पश्चात्ताप यांपासून दूर ठेवणें, हाच सैतानाचा मुख्य नित्यक्रम आहे.

आपण हे इफिसकरांस पत्र 2:1-2 मध्यें पाहू शकतो: “तुम्हीं आपलें अपराध व आपली पातके ह्यांमुळें मृत झालेंले होता; त्या पातकांमध्यें तुम्हीं पूर्वी चालत होता. . . अंतरिक्षातील राज्याचा अधिपती… ह्याच्या धोरणाप्रमाणें चालत होता.” ह्या जगात पाप करणें हे सैतानाच्या “धोरणाप्रमाणें” चालणें होय. जेव्हा तो नैतिकदृष्ट्या एखादी वाईट गोष्ठ घडवून आणत असतो, ती तो पापाद्वारे घडवून आणत असतो. आपण पाप करतो तेव्हा आपण त्याच्या क्षेत्रात वावरत असतो. आपण त्याच्या धोरणाशी सहमत होतो. आपण पाप करतो तेव्हा आपण सैतानाला वाव देतो (इफिस 4:27).

न्यायाच्या दिवशी आपल्याला दोषी ठरवणारी एकमेव गोष्ट म्हणजें क्षमा न झालेंलें पाप – आजारपण किंवा त्रास किंवा छळ किंवा भीती किंवा भयप्रद स्वप्ने ह्या गोष्टीं नव्हे. सैतानाला हे माहीत आहे. म्हणूनच, त्याचा प्राथमिक जोर ख्रिस्ती लोकांना विचित्र घटनांनी कसे घाबरवायचे यावर नसतो (जरी अशा घटना पुष्कळ होतांत ), तर ख्रिस्ती लोकांना व्यर्थ गोष्टींची मोहिनी घालून त्यांना वाईट विचारांनी कसे भ्रष्ट करावे यावर आहे.

सैतान अशा वेळी आपल्याला गिळून टाकण्याच्या शोधांत असतो ज्यावेळी आपला विश्वास दृढ नसतो, जेव्हा तो भेद्य असतो. ही गोष्ट समजण्यास सोपी आहे कीं सैतानाला ज्या गोष्टीचा नाश करायचा असतो नेमकीं तिच त्याच्या प्रयत्नांचा प्रतिकार करण्याचे शस्त्र आहे. म्हणूनच पेत्र म्हणतो, “त्याच्याविरुद्ध विश्वासात दृढ असे उभे राहा” (1 पेत्र 5:9). म्हणूनच पौल सुद्धा म्हणतो कीं “विश्वासाची ढाल” “त्या दुष्टाचे सगळे जळते बाण विझवते” (इफिस 6:16).

सैतानाचा जर पराभव करायचा असेल तर त्यासाठीं एकमेव रणनीती म्हणजें ही कीं तो ज्या गोष्टीचा नाश करण्याचा सर्वात जास्त प्रयत्न करीत असतो – तो म्हणजें तुमचा विश्वास- त्यांत दृढ असे उभे राहणें.