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3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य

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3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य
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“जो सिंहासन पर बैठा था, उसने कहा, ‘देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूँ!’” प्रकाशितवाक्य 21:5

हर कोई हमेशा जानना चाहता है कि कहानी का अन्त कैसे होता है। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक हमें अन्तिम पृष्ठ पर झाँकने का अवसर देती है, ताकि हम इतिहास के अन्त की ओर अधिक विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द के साथ बढ़ सकें।

पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट रूप से दिखाता है कि पूरा मानव इतिहास एक अन्तिम लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है; परमेश्वर ने मनुष्य को यह जानने के लिए बनाया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ अस्तित्व में है। वास्तव में, उसने हमारे मन में अनादि-अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है (सभोपदेशक 3:11)।

हर धर्म और विचारधारा इतिहास को समझने का प्रयास करती है। उदाहरण के लिए, हिन्दू धर्म सिखाता है कि हम जिस वास्तविकता में हैं, वह किसी गन्तव्य की ओर नहीं बढ़ रही है, बल्कि वास्तव में चक्रों में घूम रही है—अर्थात इतिहास चक्रीय है। नास्तिक प्रकृतिवाद तर्क देता है कि इतिहास की कोई पद्धति नहीं है, कोई उद्देश्य या अन्तिम लक्ष्य नहीं है; इतिहास केवल परमाणुओं के पुनः संयोजन की कहानी है (और हम भी उसी का हिस्सा हैं)। लेकिन मसीही लोग मानते हैं कि बाइबल इतिहास को रैखिक रूप में प्रस्तुत करती है: इसका एक प्रारम्भिक बिन्दु था, इसका एक समापन बिन्दु होगा, और यह एक उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। मसीह का जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और वापसी पूरे मानव इतिहास की केन्द्रीय विषयवस्तु है। इसलिए पूरी मानवजाति की कहानी को इसी ढांचे के भीतर देखा जाना चाहिए। यीशु वापिस आएगा; वह परमेश्वर की अनन्त उद्धार योजना को पूरा करेगा और उसके सिद्ध राज्य को स्थापित करेगा। वह सब कुछ नया और सिद्ध बना देगा।

यीशु जो सिद्ध राज्य लेकर आएगा, वह क्या है? यह एक ऐसा राज्य है, जिसका केन्द्र उसका क्रूस है। यह एक ऐसा राज्य है, जो हृदयों और जीवनों को बदलता है, और इसके नागरिक यीशु को राजा मानकर उसे दण्डवत करते हैं। यह प्रेम और न्याय, करुणा और शान्ति का राज्य है। यह राज्य बढ़ रहा है और पृथ्वी के छोर तक फैल रहा है—और निर्धारित समय पर, जो हमारे लिए अज्ञात है, परमेश्वर पिता अपने पुत्र को राष्ट्रों को उसकी विरासत के रूप में देगा (भजन 2:8)।

यहाँ तक कि अभी भी, परमेश्वर अपनी सम्प्रभु योजना और अपनी इच्छा के रहस्य को पूरा कर रहा है। जब यूहन्ना अन्त समय के बारे में लिखता है, तो वह हमें याद दिलाता है कि “उद्धार के लिए हमारे परमेश्वर का . . . जय–जयकार हो” (प्रकाशितवाक्य 7:10)। यदि उद्धार किसी और के हाथ में होता या इसे भाग्य पर छोड़ दिया जाता, तो परमेश्वर की योजना पूरी नहीं हो सकती थी। लेकिन वह इतिहास का रचयिता और भविष्य का शासक है। उसने अपनी प्रजा को बचाने का निश्चय किया है, और वह इसे पूरा करेगा। एक दिन हम उसे यह कहते हुए सुनेंगे, “ये बातें पूरी हो गई हैं” (प्रकाशितवाक्य 21:6)।

परमेश्वर ने यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा हमारे उद्धार का कार्य प्रारम्भ कर दिया है, और एक दिन वह सभी चीज़ों को एक ही प्रधान—यीशु—के अधीन कर देगा। इसलिए यदि हम मसीह के साथ जुड़े हुए हैं, तो हम “जयवन्त से भी बढ़कर हैं” (रोमियों 8:37) और पुत्र के साथ अनन्तकाल तक राज्य करने के लिए सक्षम हैं। हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द! क्योंकि भले ही हम नहीं जानते कि हमारे जीवन में आगे क्या होगा, लेकिन हम यह अवश्य जानते हैं कि कहानी का अन्त कैसा होगा—और हमारी अनन्तता कैसे प्रारम्भ होगी। इसलिए हम उत्सुकता से यह प्रार्थना करते हैं, “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है . . . तेरा राज्य आए” (मत्ती 6:9-10)।

यशायाह 60

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 63– 65; प्रेरितों 23:1-15

3 August : तुमच्या शरीराचा हेतू

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3 August : तुमच्या शरीराचा हेतू
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कारण तुम्हीं मोलाने विकत घेतलेले आहात; म्हणून तुम्हीं आपलें शरीर [व आत्मा] जी देवाची आहेत त्याद्वारे देवाचा गौरव करा. (1 करिंथ 6:20)

देवानें या भौतिक विश्वाची निर्मिती अविचाराने केलीं नाहीं. त्यामागे त्याचा उद्देश होता, तो म्हणजें, असे निरनिराळे निमित्त उदयांस आणणें जेणेंकरून त्याचा महिमा वाढावा आणि तो अधिक तेजस्वीपणें प्रकट केला जावा. “आकाश देवाचा महिमा वर्णिते; अंतरिक्ष त्याची हस्तकृती दर्शवते” (स्तोत्र 19:1).

देवानें याच कारणासाठीं निर्माण केलेंल्या इतर सर्व भौतिक गोष्टींच्या त्याच श्रेणीत आपली शरीरे देखील सुसंगतपणें बसतांत. मानव प्राणी व मानव शरीर यांद्वारे स्वतःचा गौरव करून घेण्याच्या मूळ आपल्या उद्देशापासून तो माघार घेणार नाहीं.

देव आपल्या कुजलेल्या, पापाने डागाळलेल्या शरीराला पुनरुत्थान पावलेले शरीर बनविण्यासाठीं, जेणेंकरून त्या शरीराने गौरव आणि अमरत्व धारण करावे, तो त्याचे हात घाण करणारे कष्ट का घेतो? उत्तर : कारण त्याच्या पुत्राने मृत्यूची खंडणी दिली जेणेंकरून या भौतिक विश्वासाठीं त्याच्या पित्याचा उद्देश पूर्णतेस जावा, तो म्हणजें, त्यां भौतिक वस्तूंमध्यें ज्यांत आपली शरीरेही आहेत, अनंतकाळासाठीं त्याचा महिमा व्हावा.

यास्तव आपला शास्त्रलेख असे म्हणतो : “कारण तुम्हीं मोलाने विकत घेतलेले आहात [म्हणजें, त्याच्या पुत्राच्या मरणाद्वारे]. म्हणून तुम्हीं आपलें शरीर [व आत्मा] जी देवाची आहेत त्याद्वारे देवाचा गौरव करा.” देव त्याच्या पुत्राने जें केलें त्याकडें दुर्लक्ष करणार नाहीं वा अनादर करणार नाहीं. आपली शरीरे मेलेल्यांतून उठवून देव त्याच्या पुत्राच्या कार्याचा गौरव करेल आणि आपण आपल्या शरीराचा उपयोग सर्वकाळ त्याचे गौरव करण्यासाठीं करू.

म्हणूनच आता तुम्हांला शरीर आहे. आणि म्हणूनच ते ख्रिस्ताच्या गौरवी शरीराचे स्वरूप धारण करण्यासाठीं पुन्हा उठविले जाईल.

2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना

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2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना
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“दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इससे लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ, और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने–अपने मन में प्रभु के सामने गाते और कीर्तन करते रहो।” इफिसियों 5:18-19

जीवन के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सब कुछ एक साथ होता हुआ प्रतीत होता है, जैसे किसी बच्चे का जन्म या किसी नए देश में स्थानान्तरण। मसीह में नया जीवन प्रारम्भ करना शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब हम यीशु पर विश्वास करते हैं, तो एक साथ कई परिवर्तन होते हैं: हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, हम परमेश्वर के परिवार में गोद लिए जाते हैं, हमें उसके पुत्र और पुत्रियों के रूप में एक नई पहचान दी जाती है, और—जैसा कि इस वचन में दर्शाया गया है—हमारे भीतर पवित्र आत्मा का वास होता है।

जब कोई यीशु पर विश्वास करता है, तो पवित्र आत्मा उसमें वास करने लगता है, उसे वह इच्छा और सामर्थ्य प्रदान करता है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए आवश्यक है। आत्मा की यह परिपूर्णता मसीही अनुभव का मूलभूत सत्य है। यह हर उस व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, जो मसीह पर विश्वास करता है। फिर भी, सच्चाई यह है कि विश्वासियों के रूप में हम हमेशा परमेश्वर के आत्मा की परिपूर्णता में नहीं जीते। यह सम्भव है कि हमारी अवज्ञा के कारण हम हमारे भीतर रहने वाले आत्मा को दुखी कर देते हैं (इफिसियों 4:30)। यह भी सम्भव है कि हम उससे अधिक किसी अन्य चीज़ के प्रभाव में अधिक आ जाएँ—यही कारण है कि पौलुस यहाँ यह स्पष्ट करता है कि हम एक साथ शराब और आत्मा दोनों के प्रभाव में नहीं रह सकते।

हमें यह समझना होगा कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो हम कभी भी उसके पितृत्व से बाहर नहीं आ सकते; लेकिन अवज्ञा में जीने से हम उसके पितृ-संरक्षण, उपस्थिति और आनन्द से वंचित हो सकते हैं। जो बच्चा अपने माता-पिता की पूरी तरह अवहेलना करता है, वह भले ही नाश्ते की मेज़ पर बैठा हो, तब भी वह जानता है कि वे अभी भी उसके माता-पिता हैं और वह अभी भी उनका बेटा है, लेकिन ऐसा होने पर भी उसके इस रिश्ते का आनन्द कम हो जाएगा। हमारे साथ भी यही होता है: हम अवज्ञा में नहीं जी सकते—ऐसा नहीं हो सकता कि एक ओर तो हम अपने जीवन में किसी अन्य प्राथमिकता, विचार या पदार्थ को अपना मार्गदर्शक बना लें और दूसरी ओर हम आत्मा की परिपूर्णता में भी जीएँ।

यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे हम स्वयं हल कर सकते हैं। हम खुद को पवित्र आत्मा से नहीं भर सकते। हम केवल परमेश्वर से पवित्र आत्मा की परिपूर्णता को ही प्राप्त नहीं करते, बल्कि उसका आनन्द भी उसी के द्वारा सम्भव होता है। हम स्वयं को नहीं भर सकते, लेकिन हमें स्वयं को भरे जाने के लिए तैयार और खुले अवश्य रखना चाहिए। हर मसीही जीवन की अपेक्षा यही है कि यह आत्मा से भरे होने का प्रमाण—जिसे पौलुस “आत्मा का फल” (गलातियों 5:22) कहता है—धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हो।

आपके जीवन की और हर एकत्रित कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम सब आत्मा से भरे जाएँ—कि हम किसी और चीज़ के बजाय उसके द्वारा निर्देशित हों। यही सच्चे रूपान्तरण, आनन्द, शान्ति और प्रेम को लाता है। यही हमें प्रेरित करता है कि हम न केवल अपने ओठों से, बल्कि अपने हृदय में भी मसीह की स्तुति के गीत गाएँ। इसलिए प्रार्थना करें कि वह आपको नए सिरे से भर दे:

हे पवित्र आत्मा, मेरे हृदय पर उतर,

इसे संसार से अलग कर, इसकी हर धड़कन में प्रवाहित हो;

मेरी निर्बलता के बावजूद, तू शक्तिशाली है,

मुझे वैसा प्रेम करना सिखा, जैसा मुझे करना चाहिए।[1]

  यहेजकेल 11:14-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 60– 62; प्रेरितों 22 ◊


[1] जॉर्ज क्रोली, “स्पिरिट ऑफ गॉड, डिसेण्ड अपोन माई हार्ट” (1854).

2 August : यापुढे मरणाचे भय नाहीं

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2 August : यापुढे मरणाचे भय नाहीं
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ज्या अर्थी ‘मुले’ एकाच रक्तमांसाची होती त्या अर्थी तोही त्यांच्यासारखा रक्तमांसाचा झाला, हेतू हा कीं, मरणावर सत्ता गाजवणारा म्हणजें सैतान, ह्याला मरणाने शून्यवत करावे, आणि जे मरणाच्या भयाने आयुष्यभर दास्याच्या बंधनात होते त्या सर्वांना मुक्त करावे. (इब्री 2:14-15)

ख्रिस्त आपल्याला मृत्यूच्या भीतीपासून बंधमुक्त करून “धन-वैभव नाहींसे हो, कीं सोडून जावोत सर्व आप्तजन, कीं नश्वर जीवनहि लयास जावो” अशा प्रीतियुक्त त्यागाच्या मानसिकतेचे जीवन जगण्यांस कसे स्वतंत्र करतो?

ज्या अर्थी ‘मुले’ एकाच रक्तमांसाची होती

“मुले” हा शब्द यापूर्वीच्या वचनातून घेतलेला आहे जो मुक्तिदाता ख्रिस्ताच्या आध्यात्मिक संततीचे सूचक आहे. ही “देवाची लेकरें” देखील आहेत. दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे झालें तर, देवानें ख्रिस्ताला पाठविले तेव्हां त्याचा मुख्य उद्देश्य आपल्या “मुलांचे” तारण करणें हाच होता. “ज्या अर्थी ‘मुले’ एकाच रक्तमांसाची होती. . . “

त्या अर्थी तोही त्यांच्यासारखा रक्तमांसाचा झाला.

देवाचा पुत्र, जो देही होण्यापूर्वी सनातन शब्द म्हणून होता (योहान 1:1), तो रक्तमांसाचा झाला व त्याच्या देवपणाने मानवरूप परिधान केलें. तो पूर्ण मनुष्य बनला, त्याचवेळी पूर्णतः देव म्हणूनही कायम होता.

कीं मरणाने. . .

ख्रिस्त मानव झाला तो मरण्यासाठीं. देही होण्यापूर्वी, देव म्हणून पापी लोकांसाठीं मरणें त्याला शक्य नव्हतें. पण रक्तमांसाचा झाल्यावर, त्याला ते शक्य झालें. मरण हेच त्याचे ध्येय होते. त्यामुळें त्याला नश्वर मानव रूपांत जन्म घ्यावा लागला.

हेतू हा कीं, मरणावर सत्ता गाजवणारा म्हणजें सैतान, ह्याला…..शून्यवत करावे. . .

ख्रिस्त मेला तेव्हां त्यानें सैतानाचा पराभव केला. तो कसा? आपली सर्व पापें दूर करून (इब्री 10:12). याचा अर्थ असा कीं देवासमोर आपल्यावर दोषारोप ठेवण्यासाठीं सैतानाकडें कोणतीही कायदेशीर तर्कबुद्धी नाहीं. “देवाच्या निवडलेल्या लोकांवर दोषारोप कोण ठेवील? देवच नीतिमान ठरवणारा आहे” (रोमकरांस 8:33). तो कोणत्या आधारावर आम्हांला नीतिमान ठरवतो? येशूच्या रक्ताद्वारे (इब्री 9:14; रोमकरांस 5:9).

सैतान आपल्याविरुद्ध जें शेवटचे शस्त्र उपयोगांत आणतो तें म्हणजें आमची स्वतःची पापें. येशूच्या मृत्यूने जर ते दूर केलें गेलें आहे तर सैतानाचे मुख्य शस्त्र त्याच्या हातातून हिसकावून त्याला निशस्त्र करण्यांत आलें आहे. त्या अर्थाने, तो शून्यवत झाला आहे.

आणि जे मरणाच्या भयाने आयुष्यभर दास्याच्या बंधनात होते त्या सर्वांना मुक्त करावे.

तर मग, आता आपण मरणाच्या भयापासून मुक्त झालेंलें असें आहोत. देवानें आपल्याला नीतिमान ठरवले आहे. आपल्यासमोर आहे ती फक्त भावी कृपा. सैतान देवाचा हा विधिलेख रद्द करू शकत नाहीं. ही सार्वकालिक सुरक्षा लगेच आपल्या जीवनावर कार्यकारी व्हावी अशी देवाची इच्छा आहे. हेतू हा कीं, त्यानें वर्तमान समयी आपल्याला दास्याच्या व भीतीच्या बंधनातून मुक्त करावे व शेवट पूर्णानंदाने  व्हावा.

1 अगस्त : सच्चा धन

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1 अगस्त : सच्चा धन
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“परमेश्‍वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है!” मरकुस 10:25

धनवानों का जीवन अक्सर आसान होता है। पैसा कई दरवाजे खोलता है। शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, यात्रा और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में हमें अक्सर यह देखने को मिलता है कि अधिक धन होने से चीज़ें अधिक सुगम हो जाती हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि धन को अक्सर “सार्वभौमिक पासपोर्ट” कहा जाता है!

लेकिन एक महत्त्वपूर्ण दरवाजा ऐसा भी है, जिसे धन अपने आप नहीं खोल सकता। धनवान युवा अगुवे ने पाया कि अनन्त जीवन की खोज में उसके धन ने कोई सहायता नहीं की बल्कि वह उसके लिए एक बाधा बन गया। अपनी सम्पत्ति को छोड़ने और यीशु का अनुसरण करने की अनिच्छा ने उद्धार के लिए उसके मार्ग को बन्द कर दिया, और इसलिए वह उदास हो गया तथा मसीह के साथ अपनी बातचीत को रोककर चला गया—उसके पास अब भी उसका धन था, लेकिन उसकी आत्मा खतरे में थी (मरकुस 10:22)।

इस युवक की उदासी से अधिक गहरी उदासी यीशु की थी। वह जानता था कि सांसारिक सम्पत्ति पर भरोसा करना कितना आसान है और वास्तव में महत्त्वपूर्ण चीजों से दृष्टि खो देना कितना खतरनाक है। और जिस दृष्टिकोण से यीशु ने धनवान युवा अगुवे को देखा, वह सुसमाचार में उसके अन्य उपदेशों के अनुरूप था। उदाहरण के लिए, एक बार उसने एक किसान की कहानी सुनाई जिसने अपने खलिहान तोड़कर और बड़े खलिहान बनाए (लूका 12:13-21)।

यह एक वैध निर्णय था, लेकिन वह मूर्ख था क्योंकि उसने अपने धन को अपनी आत्मा की सुरक्षा का मापदण्ड मान लिया। उसने अपने आप से कहा, “प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत सम्पत्ति रखी है; चैन कर, खा, पी, सुख से रह” (वचन 19)। लेकिन यीशु ने उसे मूर्ख कहा, क्योंकि वह मृत्यु के लिए तैयार नहीं था, और धन उसे मृत्यु से नहीं बचा सकता था (वचन 20)। आखिरकार, “यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?” (मत्ती 16:26)।

अक्सर हम भी सांसारिक सम्पत्ति में अपनी सुरक्षा खोजने की गलती करते हैं। हम या तो अधिक सम्पत्ति इकट्ठा करके या दूसरों को दान देकर अपने नाम और प्रतिष्ठा के लिए ऐसा करते हैं। लेकिन अन्ततः, यदि हम गलत चीजों को अधिक मूल्यवान समझते हैं और वास्तविक रूप से अनमोल चीजों को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो हम उसी मूर्खता में पड़ जाते हैं (“मिस्टर बिजनेसमैन” शीर्षक वाले गीत के शब्दों में)।[1]

हमारे पास जो कुछ भी है या हम जो कुछ भी करते हैं, वह हमें मृत्यु से बचाने और अनन्त जीवन में ले जाने के लिए हमारा मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकता। जब वह धनी युवक दुखी होकर चला गया, तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “मनुष्यों से यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से हो सकता है; क्योंकि परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है” (मरकुस 10:27)। धन का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह हमें गर्व और आत्मनिर्भरता में डाल सकता है, जिससे हम भूल सकते हैं कि केवल परमेश्वर ही हमारा उद्धारकर्ता है।

यदि यीशु आपसे कहे कि उसके सेवाकार्य के लिए आप अपने धन को छोड़ दें, तो क्या आप ऐसा करने के लिए तैयार होंगे? या फिर आप उदास होकर चले जाएँगे क्योंकि यह मांग आपके लिए बहुत बड़ी होगी और कीमत बहुत अधिक होगी? यदि आप अपने धन या संसाधनों पर भरोसा कर रहे हैं, तो उस सोच से पश्चाताप करें और परमेश्वर की दया से मिलने वाले उद्धार में आनन्दित हों। परमेश्वर जो कर सकता है, वह किसी रहस्य के समान छिपा नहीं है। जो कोई भी उसके पास आता है, उसे वह कभी अस्वीकार नहीं करेगा।

  लूका 12:13-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 57–59; प्रेरितों 21:18-40


[1] रेय स्टीवंस, “मिस्टर बिजनेसमैन” (1968).

1 August : आमचा  अशक्तपणाच त्याची योग्यता प्रकट करतो

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1 August : आमचा  अशक्तपणाच त्याची योग्यता प्रकट करतो
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“माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते.” (2 करिंथ 12:9)

आमच्या जीवनांत देव दुःख आणतो त्यामागे त्याची योजना ही कीं त्याद्वारे ख्रिस्ताची योग्यता आणि सामर्थ्य ही पूर्णतेस यावीं. ही कृपा आहे, कारण ख्रिस्ती लोकांचा सर्वात मोठा आनंद म्हणजें आपल्या जीवनात ख्रिस्त उंचविला जावा यांत आहे.

जेव्हा पौलाला प्रभु येशूनें सांगितले कीं त्याचा “शरीरात असलेला काटा” दूर केला जाणार नाहीं, तेव्हा त्यानें यामागचे कारण स्पष्ट करून पौलाच्या विश्वासाला बळकटी दिलीं. प्रभुनें म्हटलें, “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते” (2 करिंथ 12:9). पौलाने अशक्तच असावें हे देवानें नेमून ठेविलें यांत हेतू हा कीं पौलानें ख्रिस्तामध्येंच आपलें सामर्थ्य शोधावें.

जर आपण स्वतःला आत्मनिर्भर समजू लागलो आणि त्यां दृष्टिने आपण स्वतःकडें पाहू लागलो तर आपण फार चढून जाऊ, व ख्रिस्ताचे गौरव होणार नाहीं. म्हणून, ख्रिस्तानें जगातील जे हीनदीन, व जे शून्यवत अशांना निवडले “म्हणजें देवासमोर कोणाही मनुष्यानें अभिमान बाळगू नये” (1 करिंथ 1:29). आणि कधी कधी तो बाह्य रूपाने बलवान दिसणाऱ्या लोकांना अशक्त बनवतो जेणें करून देवाचे सामर्थ्य अधिक स्पष्टपणें प्रकट व्हावें.

आपल्याला ठाऊक आहे कीं पौलाने ही गोष्ट कृपा म्हणून अनुभवली, कारण तो आपल्या अशक्तपणाची प्रौढी फार आनंदाने मिरवीत असें : “म्हणून ख्रिस्ताच्या सामर्थ्याची छाया माझ्यावर राहावी म्हणून मी विशेषेकरून आपल्या अशक्तपणाची प्रौढी फार आनंदाने मिरवीन. ख्रिस्तासाठीं दुर्बलता, अपमान, अडचणी, पाठलाग, संकटे ह्यांत मला संतोष आहे; कारण जेव्हा मी अशक्त तेव्हाच मी सशक्त आहे” (2 करिंथ 12:9-10).

देवाच्या कृपेवर विश्वास ठेऊन जगणें म्हणजें येशूमध्यें देव आपल्यासाठीं जो काहीं आहे त्या सर्व गोष्टींत समाधानी असणें. म्हणून, देव येशूमध्यें आपल्यासाठीं जो काहीं आहे ते सर्व प्रकट होत असतांना आणि त्याद्वारे देवाचे गौरव होत असतांना विश्वास त्यापासून कधीच माघार घेणार नाहीं. आपला अशक्तपणा व आपलें दुःख यांचा हाच हेतू आहे.

31 जुलाई : विश्वास में कदम उठाना

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31 जुलाई : विश्वास में कदम उठाना
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“विश्‍वास ही से अब्राहम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेने वाला था; और यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ, तौभी निकल गया।” इब्रानियों 11:8

यदि हम यह समझने का प्रयास करना चाहते हैं कि विश्वास को क्रिया में कैसे बदलें और परमेश्वर के वचन को सत्य मानकर अपने जीवन में कैसे उतारें, तो हमें अब्राहम के जीवन से बेहतर उदाहरण और कहीं नहीं मिलेगा। रोमियों की पुस्तक में उसे सभी विश्वासियों का पिता कहा गया है (रोमियों 4:16)। उसने यह “निश्चय जाना कि जिस बात की उसने प्रतिज्ञा की है, वह उसे पूरा करने में भी समर्थ है” (पद 21), और यही विश्वास था जिसने उसे आज्ञाकारिता और क्रिया में प्रेरित किया।

परमेश्वर का अब्राहम को बुलावा महंगा और अटपटा था: “यहोवा ने अब्राम से कहा, ‘अपने देश, और अपने कुटुम्बियों, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा’” (उत्पत्ति 12:1)। अब्राहम से कहा गया था कि वह अपना देश, अपने मित्रों और अपने विस्तारित परिवार को छोड़ दे—अर्थात जो कुछ भी वह जानता था और जो उसे प्रिय था, वह सब छोड़ दे। लेकिन परमेश्वर ने केवल आज्ञा नहीं दी, बल्कि उसने अब्राहम को नए देश में आशीर्वाद देने का वादा किया कि वह उसे “एक बड़ी जाति” बनाएगा और उसका नाम महान करेगा (पद 2)।

और अब्राहम ने आज्ञा मानी और निकल पड़ा।

कोई ऐसा क्यों करेगा? अब्राहम के पास परमेश्वर की आज्ञा और उसके साथ दिए गए वादों के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। लेकिन यही उसके लिए पर्याप्त था! यही विश्वास है जो क्रिया में बदलता है। यही वह विश्वास है जो हर दिन और हर पीढ़ी में होना चाहिए: परमेश्वर के वचन को सत्य मानना और आज्ञाकारिता में कदम बढ़ाना।

एक बार मैंने स्कॉटलैंड के एक पासबान ग्राहम स्क्रॉगी को कहते सुना, “परमेश्वर का बुलावा कभी भी व्यक्ति को वहाँ नहीं छोड़ता जहाँ वह है। वास्तव में, यदि हम तब आगे नहीं बढ़ते जब परमेश्वर कहता है ‘जाओ,’ तो हम स्थिर नहीं रह सकते।” विश्वास में कदम न बढ़ाना हमें पीछे की ओर ले जाता है, भले ही हम एक भी कदम न उठाएँ।

लेकिन अब्राहम ने आगे बढ़ते हुए कदम उठाया। उसने आज्ञाकारिता में प्रस्थान किया, “यह नहीं जानते हुए कि वह कहाँ जा रहा था।” उसके लिए यह पर्याप्त था कि परमेश्वर ने उसे जाने के लिए कहा था, और इसलिए उसे यह जानने की आवश्यकता नहीं थी कि उसकी मंजिल क्या थी। और विश्वास में कदम बढ़ाकर अब्राहम ने परमेश्वर की योजना में कदम रख दिया, जो उसके लोगों को बचाने और अपनी संसार को आशीर्वाद देने की योजना थी। अब्राहम यह जानने वाला था कि वही जगह सबसे सही है जहाँ परमेश्वर आपको रखना चाहता है, और वही उद्देश्य सबसे महत्त्वपूर्ण है जिसे परमेश्वर आपसे पूरा करवाना चाहता है।

क्या परमेश्वर अपने वचन के माध्यम से आपसे कह रहा है कि आप विश्वास और आज्ञाकारिता में आगे बढ़ें? तो “यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मनों को कठोर न करो” (इब्रानियों 3:15)। परमेश्वर की आज्ञा शायद आपके द्वारा योजना बनाई गई और सोची गई सभी चीजों के विपरीत हो, और यह आपसे वह सब छोड़ने की मांग कर सकती है जो आपके लिए सुरक्षा का प्रतीक है—लेकिन यदि वह बुला रहा है, तो आपको जाना ही होगा।

रोमियों 4

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 54–56; प्रेरितों 21:1-17 ◊

31 July : संकटे जे विश्वासाला चिरडून टाकतांत

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31 July : संकटे जे विश्वासाला चिरडून टाकतांत
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“तथापि त्यांच्यामध्यें मूळ नसल्याकारणाने ते अल्पकाळ टिकाव धरतांत; मग वचनामुळें संकट आलें किंवा छळ झाला म्हणजें ते लगेच अडखळतांत.” (मार्क 4:17)

दु:खें येतांत तेव्हां काहींचा विश्वास टिकाव धरण्याऐवजी तो अडखळतो. येशू हे जाणून होता; त्यानें पेरणी करणार्‍याचा जो दाखला दिला त्यांत त्यानें हे समजावून सांगितलें. काहीं लोक वचन ऐकताच ते आनंदाने ग्रहण करतांत, परंतु संकटे येताच ते विश्वासापासून पतन पावतांत.

यास्तव, संकटे आणि दु:खें यांमुळें प्रत्येक प्रसंगी विश्वास मजबूतच होतो असें नाहीं. कधी कधी संकटे आणि दु:खें विश्वासाला चिरडून टाकतांत. आणि मग येशूचे गोंधळ उडवणारे हे शब्द खरे ठरतांत, “ज्या कोणाजवळ नाहीं त्याच्यापासून जे आहे तेही काढून घेतले जाईल” (मार्क 4:25).

आपण भावी कृपेवर दृढ विश्वास ठेवून दु:ख सहन करावें याचे हे आव्हान आहे, जेणेंकरून आपला विश्वास अधिक दृढ व्हावा व तो व्यर्थ ठरू नये (1 करिंथ 15:2). “ज्याच्याजवळ आहे त्यास आणखी दिलें जाईल” (मार्क 4:25). आपल्यावर संकटे आणण्यामागे असलेला देवाचा हेतू जाणून घेणें हे संकटांद्वारे विश्वासात वाढण्याचे एक मुख्य साधन आहे.

जर तुम्हांला असं वाटत असेल कीं तुमच्यावर येणारे संकट व दुःख निरर्थक आहेत, किंवा तें देवाच्या नियंत्रणात नाहींत, किंवा तो लहरी किंवा क्रूर आहे, तर तुमचे संकट व दुःख हे तुम्हांला इतर सर्व गोष्टींपासून दूर पळ काढून देवाकडें धाव घेण्यांस प्रवृत्त करण्याऐवजी -कारण असेच व्हायला पाहिजें- ते तुम्हांला देवापासून दूर नेतील. म्हणून, आपण देवाच्या कृपेवर विश्वास ठेवतो तेव्हां हा विश्वास ठेवणें देखील महत्वाचे असते कीं तो ह्या कृपेचा पुरवठा दु:खाद्वारे सुद्धा करतो.

30 जुलाई : हमारी निर्बलता में उसकी शक्ति

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30 जुलाई : हमारी निर्बलता में उसकी शक्ति
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“तब यहोवा ने गिदोन से कहा, ‘जो लोग तेरे संग हैं वे इतने हैं कि मैं मिद्यानियों को उनके हाथ नहीं कर सकता, नहीं तो इस्राएली यह कहकर मेरे विरुद्ध अपनी बड़ाई मारने लगेंगे कि हम अपने ही भुजबल के द्वारा बचे हैं। इसलिए तू जाकर लोगों में यह प्रचार करके सुना दे, “जो कोई डर के मारे थरथराता हो, वह गिलाद पहाड़ से लौटकर चला जाए।”‘ तब बाइस हज़ार लोग लौट गए, और केवल दस हज़ार रह गए।” न्यायियों 7:2-3

परमेश्वर का उद्देश्य हर युग में अपने लोगों के लिए यह है कि हम पूरी तरह से उस पर निर्भर रहें। जब परमेश्वर ने गिदोन को इस्राएलियों को बचाने के लिए बुलाया, तो उसे एक अत्यधिक कठिन कार्य का सामना करना पड़ा: उसकी सेना को मिद्यानियों का सामना करना था। कहा जाता है कि उनकी सेना टिड्डी-दल की तरह विशाल थी, और “उनके ऊँट समुद्र तट की बालू के किनकों के समान गिनती से बाहर थे” (न्यायियों 7:12)। इसकी तुलना में गिदोन की 32,000 की सेना बहुत छोटी थी।

और फिर परमेश्वर ने उससे कहा, “जो लोग तेरे संग हैं वे इतने हैं कि मैं मिद्यानियों को उनके हाथ नहीं कर सकता।” और इस प्रकार 22,000 लोग सेना से चले गए। निस्सन्देह गिदोन गणना कर रहा था और सोच रहा था कि वह इतने कम सैनिकों के साथ इतनी बड़ी ताकत का मुकाबला कैसे कर सकता है। उसे यह नहीं पता था कि वह कमजोरी की आवश्यकता के बारे में एक सबक सीखने जा रहा था।

परमेश्वर हमारे हालात में हमेशा काम करता है, ताकि हम अपनी पूरी निर्भरता उस पर डाल सकें और उसके उद्धार के लिए अधिक गहरी स्तुति अर्पित कर सकें। जैसे आज हमारे जीवन में है, वैसे ही गिदोन के जीवन में भी परमेश्वर ने इस तथ्य को सुनिश्चित कर दिया कि वही एकमात्र परमेश्वर हैं। उसकी महिमा न तो किसी और के साथ साझा की जाएगी और न ही कोई और उसे चुराएगा। सीधे शब्दों में कहें, तो परमेश्वर पूरी तरह सक्षम हैं; हम नहीं हैं। तब भी और अब भी, वह हमें हमारी कमजोरी को विनम्रता से स्वीकारने की आवश्यकता दिखाता है, ताकि हम उसकी महानता को बढ़ा सकें।

सच तो यह है कि हमारा अहंकार अपनी सबसे अधिक कुरूपता तब दिखाता है जब वह आध्यात्मिक अहंकार के रूप में प्रकट होता है—जब हम अपने अनुभवों पर या परमेश्वर के लिए अपनी सफलताओं पर गर्व करने लगते हैं। यही प्रवृत्ति उन “बड़े से बड़े प्रेरितों” की थी, जिनका उल्लेख पौलुस ने 2 कुरिन्थियों 12:11 में किया था; वे बहुत शक्तिशाली लगते थे, उनके पास यह बताने के लिए ढेरों कहानियाँ थीं कि कैसे वे आत्मा की शक्ति से भरे हुए थे। लेकिन पौलुस ने बस इतना कहा, “यदि मैं घमण्ड करना चाहूँ भी तो मूर्ख न हूँगा, क्योंकि सच बोलूँगा; तौभी रुक जाता हूँ, ऐसा न हो कि जैसा कोई मुझे देखता है या मुझसे सुनता है, मुझे उससे बढ़कर समझे” (पद 6)। वह समझ गया था कि विनम्रता, कमजोरी, और अपर्याप्तता वे कुंजियाँ हैं, जो परमेश्वर के राज्य में उपयोगिता के लिए आवश्यक हैं।

इसीलिए परमेश्वर ने गिदोन की सेना को और भी घटाकर केवल 300 कर दिया (न्यायियों 7:7)। वह अपना उद्देश्य इतनी छोटी संख्या में लोगों से पूरा करने जा रहा था कि जब जीत प्राप्त होती, तो सभी को यह पता चलता कि जीत का स्रोत कौन था। और अपनी दया में होकर परमेश्वर आज भी हमारे लिए यही करता है। वह हमें याद दिलाता है कि जो लोग उसके उद्देश्य और योजना के लिए सबसे अधिक उपयोगी होते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं, जो संसार की नजर में कार्य को पूरा करने के लिए सक्षम नहीं होते—क्योंकि तब यह स्पष्ट हो जाता है कि यह उसका काम है, न कि उनका।

यदि आप अपने घमण्ड और आत्मनिर्भरता को पकड़े रखना चाहते हैं, तो यह आपके लिए बुरी खबर है। यदि आप प्रशंसा प्राप्त करना चाहते हैं, तो यह आपके लिए बुरी खबर है। लेकिन यह आपके लिए अद्‌भुत खबर है यदि आप जानते हैं कि आप उन कार्यों के लिए अपर्याप्त हैं जो परमेश्वर ने आपके सामने रखे हैं। आज आप जिन भी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनमें से कौन सी समस्याओं का समाधान करने में आप अपने आप को पूरी तरह से अयोग्य मानते हैं? उस पर निर्भर रहें और आज्ञाकारिता में आगे बढ़ें, और आप पाएँगे कि उसकी शक्ति आपकी कमजोरी में प्रकट होती है (2 कुरिन्थियों 12:9-10)—और आप उसकी अधिक प्रशंसा करेंगे।

न्यायियों 7:1-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 51–53; प्रेरितों 20:17-38

30 July : विश्वास बळकट करणारे दुःख

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30 July : विश्वास बळकट करणारे दुःख
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माझ्या बंधूंनो, नाना प्रकारच्या परीक्षांना तुम्हांला तोंड द्यावे लागते तेव्हा तुम्हीं आनंदच माना. तुम्हांला ठाऊक आहे कीं, तुमच्या विश्वासाच्या परीक्षेने धीर उत्पन्न होतो. (याकोब 1:2-3)

हे विचित्र वाटेल, पण आपण निरनिराळ्या दु:खांनी डळमळलें जातो यामागील मुख्य हेतू हा कीं त्याद्वारे आपला विश्वास अधिक खंबीर व्हावा.

विश्वास हा स्नायूंच्या ऊतीसारखा असतो : जर तुम्हीं त्यावर पुरेसा ताण दिला तर तो दुर्बळ होण्याऐवजी अधिक बळकट होतो. याकोबाला हेंच म्हणायचे आहे. तुमच्या विश्वासाला धमकाविण्यांत येते व त्याला नाना प्रकारच्या परीक्षांना तोंड द्यावे लागते आणि तो तोडून टाकण्याच्या पराकाष्ठेपर्यंत ताणला जातो, तेव्हा परिणामी त्यांत खंबीरपणें टिकून राहणारे बळ उत्पन्न होते. याकोब ह्याला धीर म्हणतो.

देवाला विश्वासांत इतका संतोष वाटतो कीं त्यांस तो शुद्ध आणि मजबूत ठेवण्यासाठीं तोडून टाकण्याच्या पराकाष्ठेपर्यंत त्याची परीक्षा घेतो. उदाहरणार्थ, 2 करिंथ 1:8-9 नुसार त्यानें पौलाबरोबर असेच केलें.

बंधुजनहो, आशियात आमच्यावर आलेंल्या संकटांविषयी तुम्हांला ठाऊक नसावे अशी आमची इच्छा नाहीं; ते असे कीं, आम्हीं आमच्या शक्तीपलीकडें अतिशयच दडपले गेलो; इतके कीं आम्हीं जगतो कीं मरतो असे आम्हांला झालें. फार तर काय, आम्हीं मरणारच असे आमचे मन आम्हांला सांगत होते; आम्हीं स्वत:वर नव्हे तर मृतांना सजीव करणार्‍या देवावर भरवसा ठेवावा, म्हणून हे झालें.

“म्हणून हे झालें” हे शब्द प्रकट करतांत कीं शक्तीपलीकडें असलेल्या या अतिशयच दुःखामागे देवाचा एक हेतू होता : तो हेतू हा कीं पौलाने स्वतःवर आणि त्याच्याकडें असलेल्या संसाधनांवर नव्हे तर देवावर भरवसा ठेवावा – विशेषतः मृतांना सजीव करणार्‍या देवाच्या वचनदत्त कृपेवर.

देव पूर्ण मनापासून ठेवलेल्या विश्वासाला इतके महत्त्व देतो कीं तो आवश्यक असल्यास आपल्यावर कृपा करून जगात असलेल्या त्या सर्व गोष्टीं आमच्यापासून दूर करू शकतो ज्यांवर आपण भरवसा ठेवण्याच्या परीक्षेंत पडू शकतो- अगदी जीवन देखील. यामागे त्याचा उद्देश्य हांच आहे कीं आपण आपल्या ह्या विश्वासात अधिक प्रगती करावी आणि त्यांत बळकट व्हावें कीं आपल्याला आवश्यक असलेल्या सर्व गोष्टींत तो स्वतः सर्व काहीं असेल.

आपल्याविषयी त्याची इच्छा ही आहे कीं स्तोत्रकर्त्यासोबत आपणही असे म्हणावे, “स्वर्गात तुझ्याशिवाय मला कोण आहे? पृथ्वीवर मला तुझ्याशिवाय दुसरा कोणीही प्रिय नाहीं. माझा देह व माझे हृदय ही खचली; तरी देव सर्वकाळ माझ्या जिवाचा आधार व माझा वाटा आहे (स्तोत्र 73:25-26).