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8 अगस्त : परमेश्वर की दया को याद रखना

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8 अगस्त : परमेश्वर की दया को याद रखना
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“यहोवा का यह वचन अमित्तै के पुत्र योना के पास पहुँचा : ‘उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और उसके विरुद्ध प्रचार कर; क्योंकि उसकी बुराई मेरी दृष्‍टि में बढ़ गई है।’ परन्तु योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिए उठा, और याफा नगर को जाकर तर्शीश जानेवाला एक जहाज़ पाया; और भाड़ा देकर उस पर चढ़ गया कि उनके साथ यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को चला जाए।” योना 1:1-3

परमेश्वर को लोगों को बचाने में आनन्द आता है।

जब परमेश्वर ने अपने सेवक योना को नीनवे जाने और वहाँ की बुराइयों के कारण उनके खिलाफ प्रचार करने का आदेश दिया, तो संकोच करने वाला यह भविष्यद्वक्ता जानता था कि लोग अपनी बुराइयों से पश्चाताप कर सकते हैं और परमेश्वर अपनी दया से प्रतिक्रिया दे सकता है (योना 4:2 देखें)। उसे पता था कि परमेश्वर “दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवान्त, और अति करुणामय और सत्य, हजारों पीढ़ियों तक निरन्तर करुणा करने वाला, अधर्म और अपराध और पाप का क्षमा करने वाला है, परन्तु दोषी को वह किसी प्रकार निर्दोष न ठहराएगा” (निर्गमन 34:6-7)। उसे यह सत्य पता था कि परमेश्वर एक दिन भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के द्वारा यह कहेगा: “जब मैं किसी जाति या राज्य के विषय कहूँ कि उसे उखाड़ूँगा या ढा दूँगा अथवा नष्ट करूँगा, तब यदि उस जाति के लोग जिसके विषय मैंने यह बात कही हो अपनी बुराई से फिरें, तो मैं उस विपत्ति के विषय जो मैंने उन पर डालने की ठानी हो पछताऊँगा” (यिर्मयाह 18:7-8)।

योना जानता था कि परमेश्वर का हृदय दया से भरा हुआ है—इसलिए योना ने परमेश्वर के आदेश का पालन करने से मना कर दिया। क्यों? स्पष्टतः, उसे नीनवे के लोग पसन्द नहीं थे और यह समझ में भी आता है, क्योंकि नीनवेवासी आक्रामक, क्रूर, और हिंसक मूर्तिपूजक थे और इस्राएल के लिए भयावह शत्रु थे। योना नहीं चाहता था कि प्रभु उन्हें बचाए—तो जब बाद में नीनवे के लोग अपनी बुराइयों से मुड़े, “यह बात योना को बहुत ही बुरी लगी, और उसका क्रोध भड़का” (योना 4:1)। योना महसूस करता था कि वे परमेश्वर के न्याय के पात्र थे। और वह सही था! लेकिन शुक्र है कि राष्ट्रों, नगरों और व्यक्तियों के साथ व्यवहार करने के परमेश्वर के तरीके हमारे तरीकों से अलग हैं। परमेश्वर की इच्छा दया दिखाने की है, न्याय लाने की नहीं।

नीनवे पर परमेश्वर की करुणा हमें याद दिलाती है कि वह नहीं चाहता कि कोई नाश हो, और वह लोगों को बचाने में आनन्दित होता है, खासकर उन लोगों को जो कम से कम योग्य दिखते हैं (2 पतरस 3:9)। योना केवल वहीं प्रचार करना चाहता था जहाँ वह चाहता था और जिन्हें वह चाहता था। लेकिन सुसमाचार का सन्देश सब स्थानों में सभी के लिए है। आज यीशु का शुभ समाचार “अच्छे” लोगों तक ही सीमित नहीं है, अर्थात उन लोगों तक जो हमारे जैसे दिखते, सोचते और कार्य करते हैं। वास्तव में, यीशु ने अपने अनुयायियों से कहा, “जाओ . . . सब  जातियों के लोगों को चेला बनाओ” (मत्ती 28:19, विशेष बल दिया गया है)।

क्या विशाल दया है! परमेश्वर गर्वीले, जिद्दी और विरोधी लोगों का उत्साह से पीछा करता है—जैसे मैं, जैसे आप। वह हमें उत्साही होने के लिए बुलाता है, ताकि हम “नाश होते हुओं को बचाएँ, मरते हुओं की देखभाल करें,” ताकि “हम उन्हें यीशु के बारे में बताएँ, जो उनका उद्धार करने में सक्षम है।”[1] त्रिएक परमेश्वर पापी लोगों को बचाना चाहता है—वह उनके उद्धार की इतनी चाहत रखता है कि उनके लिए मरने आ गए। क्या आपका दिल उसके जैसा है? यदि हाँ, तो आप अपने आस-पास के लोगों के उद्धार की चाहत करेंगे—फिर वे चाहे जो भी हों और उन्होंने कुछ भी किया हो—उन्हें यीशु के बारे में बताने के लिए आप अवश्य जाएँगे।

  1 कुरिन्थियों 9:19-23

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 74–76; प्रेरितों 27:1-26 ◊


[1] फैनी क्रोस्बी, “रेस्क्यू द पेरिशिंग” (1869).

8 August : सर्व सृष्टीचा अधिपती

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8 August : सर्व सृष्टीचा अधिपती
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पदरात चिठ्ठ्या टाकतांत, पण त्यांचा निर्णय सर्वस्वी परमेश्वराकडून होतो. (नीतिसूत्रे 16:33)

आधुनिक भाषेत आपण ते ह्या शब्दांत मांडू शकतो, “फासा तर टेबलावर टाकला जातो, पण प्रत्येक बाजी व तिचा शेवट सर्वस्वी परमेश्वराकडून होतो.”

दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे झाल्यांस, ह्या जगांत घडणारी अशी कोणतीही लहानांत लहान घटना नाहीं ज्यामागे देवाचा हेतूं नसावा वा जी तो स्वतः घडवून आणत नाहीं. “दोन चिमण्या दमडीला विकतांत कीं नाहीं? तथापि तुमच्या पित्याच्या आज्ञेवाचून त्यांतून एकही भूमीवर पडणार नाहीं. तुमच्या डोक्यावरील सर्व केसदेखील मोजलेलें आहेत” (मत्तय 10:29-30).

तुमच्या शहरातील प्रत्येक फास, हजारो जंगलात भूमीवर पडणारी प्रत्येक लहानात लहान चिमणी – हे सर्व देवाच्या आज्ञेनुसार आहेंत.

योनाच्या पुस्तकात आपण वाचतो कीं परमेश्वर एका प्रचंड माशाला आज्ञा देतो कीं त्यानें एका पुरुषाला गिळंकृत करावें (1:17), तो एका झाडाला सावली द्यावयांस उगविण्याची आज्ञा देतो (4:6), व मग तो एका किड्याला ते झाड सुकविण्याची आज्ञा देतो (4:7).

मासे व किडे यांची सृष्टीच काय, तर तो याहीपेक्षा मोठ-मोठी कृत्यें आज्ञा देऊन करतो, जसे कीं आकाशातील तारे हें देवाच्या आज्ञेनुसार बाहेर येतांत व ते सर्व आपापल्या ठिकाणी स्थिर राहतांत.

आपलें डोळे वर करून पाहा; ह्यांना कोणी उत्पन्न केलें? तो त्यांच्या सैन्याची मोजणी करून त्यांना बाहेर आणतो; तो त्या सर्वांना नावांनी हाक मारतो, तो महासमर्थ व प्रबळ सत्ताधीश आहे; म्हणून त्यांपैकीं कोणी उणा पडत नाहीं. (यशया 40:26)

तर मग, या जगात घडणाऱ्या नैसर्गिक घटना किती विशेषकरून त्याच्या आज्ञेप्रमाणें घडून येत असतील– मग ते हवामान असो, विपत्ती असोत वा रोगराई, मनुष्याचे अपंगत्व असो वा मरण.

आपली व्यवस्था तो अंमलात आणतो;

सर्व तारे त्याच्या आज्ञेने गतिमान

सूर्य आपल्या कक्षेत त्याची आज्ञा पाळून चमकतो;

टेकड्या व पर्वत,

नद्या व झरे,

महासागराच्या खोलीही

त्याचे परमेश्वरत्व जाहिर करतांत.

(“ज्यांत काहीं जीवन आहे, ते सर्व,” कॅथरीन डेव्हिस)

यास्तव, ज्याअर्थी आपल्याला हे ठाऊक आहे कीं कोणतीही नैसर्गिक घटना देवाचे ज्ञान व त्याच्या सत्संकल्पानुसार असून त्यां त्याच्या आज्ञेच्या बाहेर नाहींत,  तर आपण परम आदराने भयभीत होऊन शांत राहू या.

7 अगस्त : हमें एक चमत्कार की आवश्यकता है

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7 अगस्त : हमें एक चमत्कार की आवश्यकता है
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“क्योंकि तुम ने नाशवान नहीं पर अविनाशी बीज से, परमेश्‍वर के जीवते और सदा ठहरने वाले वचन के द्वारा नया जन्म पाया है। क्योंकि ‘हर एक प्राणी घास के समान है, और उसकी सारी शोभा घास के फूल के समान है। घास सूख जाती है, और फूल झड़ जाता है, परन्तु प्रभु का वचन युगानुयुग स्थिर रहता है।’” 1 पतरस 1:23-25

सुसमाचार केवल अच्छे इरादों वाले लोगों को अपने जीवन में थोड़ा सा धर्म जोड़ने के लिए प्रेरणा देने वाली बात नहीं है। परमेश्वर का वचन विद्रोही हृदय का सामना करता है और उसे आज्ञाकारिता का आदेश देता है। यह ऐसा सन्देश है जो मरे हुए को जीवित कर देता है।

यह परिवर्तन कैसे होता है? केवल परमेश्वर के आत्मा के द्वारा। परमेश्वर का आत्मा ही वह काम करता है, जो किसी और तरीके से या किसी और साधन से नहीं हो सकता: यह नया जीवन लाने का कार्य है।

स्वभाव से हम सभी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही हैं। कोई भी उसकी खोज नहीं करता (रोमियों 3:11)। भले ही मैं खुद को एक अनीश्वरवादी, एक खोजी या खुले विचारों वाला कहूँ, तो वास्तव में मैं विद्रोही ही हूँ। और परमेश्वर “अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है” (प्रेरितों 17:30)। परमेश्वर हम सभी को पूरी तरह से मुड़ जाने के लिए बुलाता है—पाप और विद्रोह से निर्णायक रूप से मुँह मोड़ने और उसके राज्य के अधीन आने के लिए बुलाता है।

यदि कोई चमत्कार न हो तो हम ऐसा नहीं कर सकते। यदि हमें खुद छोड़ दिया जाए, तो हम मरे हुए हैं और हमारे पास शाश्वत जीवन की कोई आशा नहीं है। शुक्र है कि परमेश्वर के आत्मा का कार्य ही यह है—हमारे लिए वह चमत्कार करना। नया जीवन कुछ ऐसा है जो परमेश्वर अपने द्वारा ही उत्पन्न करता है, न कि कुछ ऐसा जो हम खुद उत्पन्न करें। पवित्र आत्मा हमें पाप के प्रति दोषी ठहराता है और यह यकीन दिलाता है कि यीशु अपने क्रूस पर मृत्यु के द्वारा इससे निपट चुका है।

पवित्रशास्त्र इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट है: जब हम पापों में मरे हुए थे, तब हमें मसीह में जीवित किया गया (इफिसियों 2:1-5)। आत्मा हमें समझाता है कि हम अकेले इसका सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं—अर्थात, हमारे पास एक गहरी और अन्तर्निहित समस्या है, जिसे हम ठीक नहीं कर सकते। हमें एक चमत्कार की आवश्यकता है। और परमेश्वर यही करता है। वह नया जीवन लाता है। वह हमें अपनी कृपा से बचाता है।

हमारे बारे में जो कुछ भी है वह धुंधला हो जाता है; जैसे पतरस हमें याद दिलाता है, हम सभी एक दिन घास के समान मुरझा जाएँगे। लेकिन एक बीज है जो अमरता उत्पन्न करता है, जो पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे भीतर बोया जाता है और जो अनन्त काल तक खिलता और फलता रहेगा: वह जीवन जो सुसमाचार के द्वारा नया जन्म लेता है। परमेश्वर का वचन हमेशा के लिए बना रहता है, और वह व्यक्ति भी जो उसमें कार्य करने वाले आत्मा के द्वारा नया जीवन प्राप्त करता है।

एक बार जब यह हमारे साथ होता है, तो हम बाइबल को केवल एक इतिहास की किताब या प्रेरणादायक कहानी के रूप में नहीं देखते। आत्मा के कार्य से यह एक प्रकाश बन जाता है, जो सच्चे जीवन को प्रकाशित करता है और हमारी आँखें यह समझने के लिए खुल जाती हैं कि परमेश्वर कौन है। यही कारण है कि हम बाइबल का अध्ययन करते हैं: ताकि हम उस परमेश्वर को बेहतर तरीके से देख सकें और जान सकें, जिसने हमें बचाया और जिसके साथ हम अनन्तकाल तक रहेंगे।

सो, यीशु का प्रेम आपको उसकी ओर आकर्षित करे। यीशु का आनन्द आपको उसकी सेवा करने की शक्ति दे। जो शान्ति और सन्तोष यीशु को जानने में आता है, वह आपको स्थिरता और स्पष्टता प्रदान करे जब आप यह विचार करते हैं कि आप कहाँ थे, कहाँ हैं, और कहाँ जा रहे हैं। आपका भौतिक शरीर अमर नहीं है; लेकिन आप अमर हैं।

भजन 119:65-80

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 72–73; प्रेरितों 26

7 August : निर्मितीचा उद्देश्य

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7 August : निर्मितीचा उद्देश्य
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देवानें आपल्या प्रतिरूपाचा मनुष्य निर्माण केला; देवाचे प्रतिरूप असा तो निर्माण केला. नर व नारी अशी ती निर्माण केलीं. (उत्पत्ति 1:27)

देवानें मनुष्यांना यासाठीं आपल्या प्रतिरूपाचे निर्माण केलें कीं हे संपूर्ण जग देवाचे प्रतिबिंब दाखविणाऱ्या परिवर्तकांनी भरून जावें. म्हणजें देवाच्या प्रतिरूपांनी भरून जावें. देवाच्या सात अब्ज प्रतिरूपांनी भरून जावें. हेतू हा कीं कोणीही निर्मितीचा उद्देश्य पूर्ण करण्यांस चुकू नये.

कोणीही मनुष्य (जोपर्यंत काहींना पाषाणरूपी अंतकरणामुळें आंधळे करून सोडून दिलें जात नाहीं) मानव-अस्तित्वाचा उद्देश्य समजण्यांस चुकू शकत नाहीं, म्हणजें देव — त्याला ओळखणें, त्याजवर प्रीति करणें, व तो कसा आहे हे त्याच्या प्रतिरूपावरून दाखवून देणें. यशया 6:3 मध्यें देवाचे दूत जल्लोष करतांत, “पवित्र, पवित्र, पवित्र, सेनाधीश परमेश्वर! त्याच्या गौरवाने सर्व पृथ्वी भरून गेली आहे!” पृथ्वी अशा कोट्यवधी मनुष्यांनी भरलेली आहे ज्यांना देवाच्या प्रतिरूपाचा निर्माण करण्यांत आलें होते. गौरवाने सुशोभित.

पण फक्त मानवच नाहीं, तर निसर्गहि! आपल्या वास्तव्यासाठीं असे चित्तथरारक जग अस्तित्वांत का आहे? हे इतके अफाट विश्व कशासाठीं?

एकदा माझ्या असें वाचण्यांत आलें कीं मानवांनी जितके शब्द आजवर बोललें असतील त्यापेक्षा असंख्य तारे व ग्रह या विश्वात आहेत. इतके का आहेत? हे विश्व इतके अफाट का आहे? इतके तेजस्वी का आहे? आणि ते एकमेकांपासून इतक्या अकल्पनीय अंतरावर का आहेंत? बायबल याविषयी निर्विवादपणें स्पष्ट उत्तर देते: “आकाश देवाचा महिमा वर्णिते” (स्तोत्र 19:1).

जर कोणी असा प्रश्न विचारला कीं, “पृथ्वी हाच जर एकमेव लोकवस्ती असलेला ग्रह आहे आणि ताऱ्यांमध्यें केवळ मनुष्य हाच एकमेव बुद्धिमान प्राणी आहे, तर एवढे मोठे आणि रिकामे विश्व का?” उत्तर आहे: विषयवस्तु आपण स्वतः नाहीं. देव मुख्य विषयवस्तु आहे. यावर अधिक जोर देऊन भाष्य केलें जाऊ शकत नाहीं. तो सर्वांत गौरवी आहे. महापराक्रमी आहे. तो सर्वत्र आहे. सर्व आकाशगंगा एकत्रित करण्यांत आल्या तरी त्याचे तेज अद्वितीय आहे. कोणी एका ज्ञानी मनुष्यानें असे म्हटलें, कीं विश्व हे शेंगदाणासारखे आहे जे देव खिशात घेऊन फिरतो.

देवानें आपल्याला यासाठीं निर्माण केलें कीं आपण त्याला ओळखावें, त्याच्यावर प्रीति करावीं व त्याचे वैभव दाखवून द्यावें. मग त्यानें आपल्याला तो कसा आहे याविषयीचा संकेत दिला : म्हणजें हे विश्व.

6 अगस्त : महान विभाजन

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6 अगस्त : महान विभाजन
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“क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ; नहीं, वरन् अलग कराने आया हूँ।” लूका 12:51

क्या यीशु पृथ्वी पर शान्ति लाने आया था, जैसा कि स्वर्गदूतों ने पहले क्रिसमस पर गाया था (लूका 2:14)? या फिर वह विभाजन लाने आया था, जैसा कि वह स्वयं यहाँ घोषित करता है?

हाँ।

सबसे पहले, हमें इस स्पष्ट विरोधाभास को स्वीकार करना चाहिए। यीशु अपने ही प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है, “क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ; नहीं . . .” यह कथन न केवल स्वर्गदूतों की घोषणा से असंगत लगता है, बल्कि उसके अपने शिष्यों को शान्तिदूत बनने की दी गई शिक्षा (मत्ती 5:9) से भी टकराता प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि यीशु अपने पूरे सांसारिक सेवाकाल के बल देने वाले उद्देश्य का खण्डन कर रहा है, क्योंकि वह स्वयं को विभाजन और असहमति से जोड़ता है। तो फिर, हम यीशु के इन दोनों दावों—कि वे शान्ति भी लाएगा और विभाजन भी—को कैसे समझें?

जब यीशु ने कहा कि वह विभाजन लाने आया है, तो इसका सीधा सम्बन्ध उस कार्य से है जो उसने शान्ति स्थापित करने के लिए किया। दूसरे शब्दों में, जब हम इस शुभ सन्देश को समझते हैं कि “[परमेश्वर] ने उसे, जो पाप से अज्ञात था, हमारे लिए पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ” (2 कुरिन्थियों 5:21), तो हम फिर कभी पहले जैसे नहीं रह सकते। यह इतना महान कार्य है कि यह उदासीनता का कारण नहीं बन सकता।

जब हमारे हृदय का नवीनीकरण होता है, तो हमारे बारे में सब कुछ बदल जाता है—हमारे मूल्य, हमारा ध्यान, हमारा उद्देश्य, हमारे सपने सब बदल जाते हैं। अब हम अपने सृष्टिकर्ता के साथ मेल में हैं, और हम अपने आप से भी शान्ति में रह सकते हैं। लेकिन एक न एक दिन यह रूपान्तरण विभाजनकारी साबित होगा। जब हम परमेश्वर के साथ अपनी शान्ति के इस अद्‌भुत कार्य को साझा करते हैं, इसके बारे में बोलते हैं, और इसे अपने जीवन में जीते हैं, तो हमें उपेक्षा, विरोध, और न्याय का सामना करना पड़ेगा—कभी-कभी अपने ही घर के लोगों से, जैसा कि यीशु ने चेतावनी दी थी (लूका 12:52-53)।

यीशु का पृथ्वी पर शान्ति लाना वास्तव में उस गहरे विभाजन और संघर्ष को उजागर करता है, जो आदम और हव्वा के विद्रोह के बाद से सृष्टिकर्ता और उसके स्वरूपधारी प्राणियों के बीच मौजूद रहा है। आपके वचन और कार्य, जो इस संसार के तरीकों से नहीं बल्कि स्वर्गिक आज्ञाओं से निर्देशित होते हैं, उसी विभाजन को प्रकट करेंगे। हममें से कई लोगों के लिए मसीह में विश्वास करने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ यह विभाजन जीवन का एक कठिन और पीड़ादायक सत्य है।

फिर भी, हम सबके लिए एक महान आशा है: यीशु का अन्तिम उद्देश्य विभाजन नहीं बल्कि शान्ति है। बाइबल पूरी तरह स्पष्ट करती है कि “शान्ति का राजकुमार” (यशायाह 9:6) एक दिन अनन्त काल में राज्य करेगा। इस बीच किसी भ्रम में न रहें: यीशु का अनुसरण करने की एक कीमत है—एक ऐसी कीमत जिसे आप उसके आत्मा की शक्ति से आनन्दपूर्वक चुका सकते हैं, जब आप विभाजन का जोखिम उठाते हुए परमेश्वर की शान्ति के इस दिव्य प्रस्ताव को दूसरों तक पहुँचाते हैं।

प्रेरितों 17:1-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 70–71; प्रेरितों 25 ◊

6 August : येशूनें तुमची विश्वासाची चिकाटी विकत घेतलीं

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6 August : येशूनें तुमची विश्वासाची चिकाटी विकत घेतलीं
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“हा प्याला माझ्या रक्तात नवा करार आहे, जो तुमच्यासाठीं ओतला जात आहे.” (लूक 22:20)

या शास्त्रपाठाचा अर्थ असा कीं, नवा करार, ज्याचे अभिवचन यिर्मया 31 आणि 32 मध्यें अगदी स्पष्टपणें देण्यांत आलेंलें आहे, हा येशूच्या रक्ताने साध्य केला गेला व शिक्कामोर्तब केला गेला. नवा करार देवाच्या त्यां लोकांसाठीं खरा ठरतो जे मशीहा, म्हणजें ख्रिस्त येशूवर विश्वास ठेवतांत, कारण तो करार स्थापित करण्यासाठीं येशू मरण पावला.

आणि जें ख्रिस्ताचे आहेत त्यां सर्वांसाठीं हा नवा करार काय साध्य करतो? शेवटपर्यंत विश्वासात टिकून ठेवणारी चिकाटी.

यिर्मया 32:40 मध्यें काय म्हणतों, ऐका,

“आणि मी त्यांच्याशी सर्वकाळचा करार करीन; तो असा कीं मी त्यांचे हित करण्यापासून माघार घेणार नाहीं; मी आपलें भय त्यांच्या मनात उत्पन्न करीन, म्हणजें ते माझ्यापासून माघार घेणार नाहींत.”

सार्वकालिक करार — नवा करार — ह्यामध्यें हे अनुल्लंघनीय व अविनाशी अभिवचन समाविष्ट आहे, “मी आपलें भय त्यांच्या मनात उत्पन्न करीन, म्हणजें ते माझ्यापासून माघार घेणार नाहींत.” ते माघार घेऊं शकणार नाहींत. ते माघार घेणारहि नाहींत. ख्रिस्तानें आपल्या रक्ताने या करारावर शिक्कामोर्तब केलें. जर तुम्हीं विश्वासाद्वारे येशू ख्रिस्तामध्यें आहांत तर त्यानें तुमची विश्वासाची चिकाटी विकत घेतली आहे.

जर तुम्हीं आज विश्वासात टिकून आहांत तर त्याचे संपूर्ण श्रेय येशूच्या रक्ताला जाते. तुमचा विश्वास टिकवून ठेवण्यासाठीं तुमच्यामध्यें कार्यरत असलेला पवित्र आत्मा, येशूनें जे विकत घेतलें आहे त्याचा सर्वदा सन्मान करतो. देव जो पुत्र ह्याने आपल्यासाठीं जे साध्य केलें ते देव जो आत्मा हा आपल्यामध्यें तें घडवून आणतो. देव-पित्यानें ते योजिलें. येशूनें ते विकत घेतले. आत्मा ते लागू करतो – त्यांपैकीं प्रत्येक न चुकता.

देव रक्ताने विकत घेतलेल्या त्याच्या सर्व लेकरांची चिकाटी आणि सार्वकालिक सुरक्षा यांसाठीं पूर्णपणें वचनबद्ध आहे.

5 अगस्त : नष्ट और पुनः स्थापित

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5 अगस्त : नष्ट और पुनः स्थापित
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“तू ने यह क्या किया है?” उत्पत्ति 3:13

स्कॉटलैंड के हाइलैण्ड्स में कई ऐसे किले हैं, जो अब निर्जन और खण्डहर हो चुके हैं। शाम की सुनहरी रोशनी में यह पहचानना कठिन नहीं है कि कभी ये स्थान कितने भव्य महल रहे होंगे। भले ही अब उनमें न खिड़कियाँ बची हैं, न भव्य गलीचे, और न ही उनमें रहने वाले लोग, फिर भी इन प्राचीन संरचनाओं की भव्यता उनके पूर्व वैभव की गवाही देती है, भले ही अब वे नष्ट हो चुके हों।

यह संसार भी ऐसे ही नष्ट हुए वैभव से भरा है, क्योंकि यह संसार मनुष्यों से भरा है। आदम और हव्वा परमेश्वर की रचनात्मक कलाकृति की पराकाष्ठा थे, और परमेश्वर उनके साथ पूरी तरह सन्तुष्ट था। वे भलाई करने की प्रवृत्ति के साथ बनाए गए थे। लेकिन जब उन्होंने उस सिंहासन की लालसा की, जिस पर वे कभी बैठ ही नहीं सकते थे—परमेश्वर का सिंहासन—तो वे अपने स्थान और उन विशेषाधिकारों को खो बैठे जिनका आनन्द लेने के लिए वे सृजे गए थे।

सर्प ने हव्वा को बहकाने के लिए सबसे पहले परमेश्वर के वचन पर सन्देह उत्पन्न किया, बड़ी ही चतुराई से उसकी सत्यता को चुनौती दी—और वह फँस गई। उसने उस झूठ पर विश्वास कर लिया कि परमेश्वर भलाई करने के लिए भरोसेमन्द नहीं है। जब सन्देह का बीज बो दिया गया, तो सर्प ने उसे महत्वाकांक्षा से सींचा। एक बार जब हव्वा के मन में अनिश्चितता का सन्देह उत्पन्न हुआ, तो गर्व का आकर्षण उसके लिए असहनीय हो गया।

फल खाना केवल इस कारण गलत था, क्योंकि परमेश्वर ने उसे खाने से मना किया था। फिर भी, तत्काल सन्तुष्टि के अवसर ने आदम और हव्वा को ऐसा अंधा कर दिया कि वे अपने भविष्य के कार्यों के दर्दनाक परिणामों और उनके परिचित वैभव की बर्बादी को देख न सके। और, जैसे कि उनकी अवज्ञा ही पर्याप्त न थी, उन्होंने धोखे और अवज्ञा के बीच अपनी जिम्मेदारी को भी अस्वीकार कर दिया।

आदम और हव्वा की तरह हम भी यह मानने के लिए प्रवृत्त होते हैं कि अन्तिम सत्य का निर्णय करने वाले हम स्वयं हैं, न कि परमेश्वर। जब हम अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर को रास्ते से हटाने का निर्णय कर लेते हैं, जो एक सच्चा और अधिकारपूर्ण वचन बोलता है, तो हम उसे हमारी आज्ञाकारिता की माँग करने के अधिकार से वंचित कर देते हैं। लेकिन जब हम परमेश्वर के शासन को अस्वीकार कर देते हैं, तो हम अपने स्वयं के स्वामी नहीं बन जाते; बल्कि हम धोखे, अंधकार, निराशा और मृत्यु जैसे कई छोटे स्वामियों के अधीन हो जाते हैं।

“तू ने यह क्या किया?” (उत्पत्ति 3:13) हम सभी ने इस झूठ पर विश्वास किया है कि हमारी राह परमेश्वर की राह से बेहतर है। लेकिन परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजने की हद तक जाकर यह दिखाया कि हमारी कठोर विद्रोही प्रकृति उसकी उस करुणा से अभिभूत हो सकती है, जो “जीवन से भी उत्तम” है (भजन 63:3)। उसने अपने वचन का प्रकाश हमारे हृदयों में प्रकट किया है, जिससे हम उसकी महिमा को अब और अनन्त काल तक देख सकें और पुनः उसकी छवि में ढाले जाएँ तथा उस वैभव में पुनः स्थापित किए जाएँ, जिसे परमेश्वर ने सदा अपने स्वरूपधारी प्राणियों के लिए चाहा था। उसकी भलाई को देखना और उसके शासन के अधीन आना ही हमें धोखे, अंधकार, निराशा और यहाँ तक कि मृत्यु से भी स्वतन्त्र करता है।

उत्पत्ति 3

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 68– 69; प्रेरितों 24

5 August : “याव्हे” ला परिभाषित करणाऱ्या 10 गोष्टी

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5 August : “याव्हे” ला परिभाषित करणाऱ्या 10 गोष्टी
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आणखी देवानें मोशेला सांगितले, “तू इस्राएल लोकांना सांग, तुमच्या पूर्वजांचा देव, अब्राहामाचा देव, इसहाकाचा देव व याकोबाचा देव परमेश्वर ह्याने मला तुमच्याकडें पाठवले आहे; हेच माझे सनातन नाव आहे व ह्याच नावाने पिढ्यानपिढ्या माझे स्मरण होईल..” (निर्गम 3:15)

इंग्रजी बायबलमध्यें देवाचे हिब्रू मधील नाव जवळजवळ नेहमीच लॉर्ड (LORD) असे भाषांतरित केलें जाते. पण हिब्रूचा उच्चार “याव्हे” असा आहे आणि त्याचे मूळ “मी आहे” ही अभिव्यक्ती आहे.

म्हणून जेव्हां जेव्हां आपण यहोवा किंवा याव्हे हा शब्द ऐकतो किंवा इंग्रजी बायबलमध्यें जेव्हां जेव्हां आपण LORD हा शब्द पाहतो त्यां प्रत्येक वेळी आपण हे लक्षांत ठेवावें : हे एक विशेषनाम आहे (जसे कीं पेत्रस किंवा योहान) जो “मी आहे” या अभिव्यक्तीपासून बनलेला आहे आणि हे विशेषनाम (संज्ञा) प्रत्येक वेळी आपल्याला याची आठवण करून देते कीं देव हांच अंतीम व परम आहे.

“मी आहे” हे विशेषनाम (संज्ञा) देवाविषयी किमान 10 गोष्टींची अभिव्यक्ती करते :

1. त्याला कधीही प्रारंभ नव्हता. जवळजवळ सर्वच मुले आपल्या आई-वडिलांना हा प्रश्न विचारतांत, “देवाला कोणी बनवले?” आणि प्रत्येक सुजाण आई-वडील उत्तर देतांत, “देवाला कोणीहि बनवले नाहीं. देव फक्त आहे, तो सर्वदा होता, त्याचा कधीही आरंभ झाला नव्हता.”

2. देवाचा कधीही अंत होणार नाहीं. त्याला जर आरंभ नव्हताच तर त्याला अंत देखील नसणार, कारण तो आहे.

3. देव हे अद्वितीय वास्तव आहे. त्याच्याबरोबरीचा दुसरा असा वास्तव कोणी नाहीं. त्याच्या बाहेर कोणतेही वास्तव अस्तित्वात नाहीं जोपर्यंत तो स्वतः ते अस्तित्वांत आणू इच्छित नाहीं व त्याची निर्मिती करित नाहीं. सनातन काळापासून तोच आहे. अंतरीक्ष नव्हते, विश्व नव्हते, शून्यता नव्हती. फक्त देव.

4. देव पूर्णपणें स्वतंत्र आहे. त्याला अस्तित्वात आणण्यासाठीं किंवा त्याला पाठिंबा देण्यासाठीं किंवा त्याला सल्ला-मसलत देण्यासाठीं किंवा तो जो आहे असे त्याला बनवण्यासाठीं तो कशावरही अवलंबून नाहीं.

5. जे काहीं देव नाहीं ते सर्व पूर्णपणें देवावर अवलंबून आहे. संपूर्ण विश्व हे पूर्णपणें निर्माण केलेंलें असे दुय्यम दर्जाचे अस्तित्व आहे. ते देवानें अस्तित्वात आणलें व आपलें अस्तित्व कायम ठेवण्यासाठीं ते क्षणोक्षणी देवाच्या निर्णयावर अवलंबून राहते.

6. देवाबरोबर जर तुलना केलीं तर संपूर्ण विश्व हे काहींच नाहीं. ज्याप्रमाणें सावली ही वस्तूमुळें अस्तित्वात येते त्याप्रमाणें प्रत्येक संभाव्य व अवलंबून असलेलें वास्तव हे परम व स्वतंत्र वास्तवामुळें अस्तित्वांत येते. ज्याप्रमाणें प्रतिध्वनी ही गडगडाटामुळें आहे अगदी त्याप्रमाणें. जगात आणि आकाशगंगांमध्यें जे काहीं आहे व जें पाहून आपण आश्चर्यचकित होतो, ते सर्व देवाच्या तुलनेत काहींच नाहीं.

7. देव स्थिर आहे. तो काल, आज आणि सर्वकाळ सारखाच आहे. त्याचा विकास होत नाहीं. तो पुढे वाढत जाऊन वेगळं काहीं बनत नाहीं. तो जो आहे तो आहे.

8. देव सत्य आणि चांगुलपणा आणि सौंदर्य यांचा परिपूर्ण मानक व परिभाषक आहे. असे कोणतेही कायद्याचे पुस्तक नाहीं जें वाचून तो योग्य काय आहे हे जाणून घेतो. सत्याची स्थापना करण्यासाठीं त्याजकडें कोणतीही गुरुकिल्ली नाहीं. उत्तम काय होईल किंवा योग्य काय होईल हे ठरवण्यासाठीं त्याच्याकडें कोणतीही समिती नाहीं. काय बरोबर आहे, काय सत्य आहे, काय सुंदर आहे हे सर्व तो स्वतः ठरवतो, आणि तोच त्यां सर्वांचा परिभाषक आहे.

9. देवाच्या इच्छेस जे येते तेच तो करतो आणि ते नेहमीच बरोबर, नेहमीच सुंदर व नेहमी सत्यनुरूप असते. त्याच्या बाहेर असलेली सर्व वास्तविकता त्यानें तयार केलीं आणि घडवली, आणि परम व अंतीम सत्य म्हणून तोच त्यावर सार्वभौम आहे. म्हणून तो आपल्या सुइच्छेच्या संकल्पानुसार नसलेली कोणतीही गोष्ट अस्तित्वांत आणण्याच्या प्रत्येक बंधनांपासून पूर्णपणें मुक्त आहे.

10. देव हा विश्वातील सर्वात महत्वाचे आणि सर्वात मौल्यवान सत्य आणि व्यक्ती आहे. तो इतर सर्व वास्तविकतेच्या तुलनेंत आपल्या स्वारस्य आणि केंद्र आणि प्रशंसा आणि आनंद यांस अधिक पात्र आहे, संपूर्ण विश्वाच्या तुलनेंत देखील.

4 अगस्त : कोई आदर्श स्थान नहीं

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“मैं मकिदुनिया होकर तुम्हारे पास आऊँगा, क्योंकि मुझे मकिदुनिया होकर जाना ही है। परन्तु सम्भव है कि तुम्हारे यहाँ ही ठहर जाऊँ और शरद ऋतु तुम्हारे यहाँ काटूँ, तब जिस ओर मेरा जाना हो उस ओर तुम मुझे पहुँचा देना . . . परन्तु मैं पिन्तेकुस्त तक इफिसुस में रहूँगा, क्योंकि मेरे लिए वहाँ एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है, और विरोधी बहुत से हैं।” 1 कुरिन्थियों 16:5-6, 8-9

प्रेरित पौलुस की प्रशंसा करने के कई कारण हैं, लेकिन यहाँ एक ऐसा कारण है जिसे कम ही उल्लेख किया जाता है: वह हमेशा आगे की योजना बनाता था। वह किसी भी क्षेत्र में निष्क्रिय नहीं रहता था। वह एक सेनापति की तरह था, जो युद्ध मुख्यालय में मानचित्र का अध्ययन करते हुए कहता, “अब हम आगे कहाँ बढ़ सकते हैं? अगली टुकड़ी को कहाँ भेजा जा सकता है? शत्रु को कहाँ खोजा जा सकता है?” अपने धर्मी उद्देश्य के कारण वह कहीं भी अधिक समय तक आराम से नहीं रहा।

पौलुस से हम यह सीख सकते हैं कि परमेश्वर की सेवा के लिए कोई आदर्श स्थान नहीं है, लेकिन हम जहाँ भी हों, वहीं उसकी सेवा कर सकते हैं। उसने अपने पत्रों में इफिसुस, मकिदुनिया और कुरिन्थुस जैसे विभिन्न स्थानों में सेवा करने का उल्लेख किया है—लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति चाहे जो भी रही हो, उसने यह समझ लिया था कि उसे बस अविश्वासियों को सुसमाचार सुनाना था और विश्वासियों को प्रोत्साहित करना था। वह अपने बुलावे को जानता था कि जब एक स्थान पर उसकी सेवा पूरी हो जाती, तो उसे अगले स्थान पर आगे बढ़ जाना था।

पौलुस आराम या सुविधा की चिन्ता नहीं करता था। उसने कभी नहीं चाहा की कि व एड्रियाटिक सागर के किनारे एक छोटे से कुटीर में शान्तिपूर्वक सेवानिवृत्त हो जाए। यहाँ तक कि जब वह कह सकता था कि “मेरे लिए वहाँ एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है,” तब भी उसने स्वीकार किया कि उसके “विरोधी बहुत से हैं।” उसने चुनौतियों को स्वीकार किया और विरोध को एक बाधा के बजाय एक महान विशेषाधिकार माना।

हम में से बहुत से लोग यह मानने के लिए प्रेरित किए गए हैं कि यदि हम परमेश्वर के साथ संगति में हैं और यदि हम वास्तव में वहीं हैं जहाँ हमें होना चाहिए, तो जीवन सुचारू रूप से चलेगा। यह विचार भले ही लोकप्रिय हो, लेकिन बाइबल के अनुसार यह सही नहीं है। क्या हम वास्तव में सोचते हैं कि हम शैतान का सामना कर पाएँगे और उसके जलते हुए तीर हम तक नहीं पहुँचेंगे? क्या हम सोचते हैं कि हम शत्रु के क्षेत्र में प्रवेश करेंगे और हमारा कोई विरोध नहीं होगा? हमें ऐसे लोग बनने के लिए नहीं बुलाया गया है, जो आरामदायक और सुविधाजनक मसीही समुदायों में सन्तोषपूर्वक रहते हैं, जहाँ कोई विरोध न हो। यह सम्भव है कि हमारी गवाही इतनी कमजोर हो जाए कि हम मसीह के लिए प्रभावहीन हो जाएँ, लेकिन ऐसा होना आवश्यक नहीं है, और न ही ऐसा होना चाहिए।

आज भी हमारे चारों ओर वही परिस्थितियाँ हैं, जिनका सामना पौलुस ने किया था: मूर्तिपूजा, यौन अनैतिकता, नस्लवाद, धार्मिक कट्टरता, और अन्य अनेक बुराइयाँ। परमेश्वर ने चाहे आपको जहाँ भी रखा हो, वहीं आपके पास उसके राज्य की सेवा करने का अवसर है, भले ही आपको विरोध का सामना क्यों न करना पड़े। मेरे प्रिय मित्र एरिक अलेक्ज़ेण्डर ने एक बार मुझसे कहा था, “परमेश्वर की सेवा करने के लिए कोई आदर्श स्थान नहीं है—सिवाय वहाँ के जहाँ उसने तुम्हें रखा है!”

रोमियों 15:17-33

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 66– 67; प्रेरितों 23:16-35 ◊

4 August : देवाच्या विश्वासूपणा इतकेंच सुरक्षित

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4 August : देवाच्या विश्वासूपणा इतकेंच सुरक्षित
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ज्यांना त्यानें आगाऊ नेमून ठेवले त्यांना त्यानें पाचारणही केलें. ज्यांना त्यानें पाचारण केलें त्यांना त्यानें नीतिमानही ठरवले; आणि ज्यांना त्यानें नीतिमान ठरवले त्यांचा त्यानें गौरवही केला. (रोमकरांस 8:30)

देवानें ज्यांना सनातनकाळांत आगाऊ नेमून ठेवले आणि जेव्हां देव येणाऱ्या अनंतकाळांत ज्यांचे गौरव करील या दरम्यान कोणीही गमावला जाणार नाहीं.

जो कोणी देवाची संतती होण्यासाठीं आगाऊ नेमून ठेवण्यांत आलेंला आहे तो त्यासाठींच्या पाचारणांस मुकणार नाहीं. आणि ज्या कोणाला पाचारण केलें जाते तो नीतिमान ठरविल्यावांचून राहणार नाहीं, आणि जो कोणी नीतिमान ठरविला जातो त्याचे गौरव झाल्यावांचून राहणार नाहीं. ही देवाचा आपल्या कराराशी असलेल्या विश्वासूपणाची अतूट पोलादी साखळी आहे.

यास्तव पौल म्हणतो,

ज्याने तुमच्या ठायीं चांगले काम आरंभले तो ते येशू ख्रिस्ताच्या दिवसापर्यंत सिद्धीस नेईल हा मला भरवसा आहे. (फिलिप्पै 1:6)

आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या दिवशी तुम्हीं निर्दोष ठरावे म्हणून तोच शेवटपर्यंत तुम्हांला दृढ राखील. ज्याने स्वपुत्र येशू ख्रिस्त आपला प्रभू ह्याच्या सहभागीपणात तुम्हांला बोलावले तो देव विश्वसनीय आहे. (1 करिंथ 1:8-9)

ही आपल्या देवाची अभिवचने आहेत ज्याला खोटे बोलणें अशक्य आहे. ज्यांचा नव्याने जन्म होतो ते सर्व तितकेंच सुरक्षित आहेंत जितका कीं देवाचा विश्वासूपणा.