ArchivesAlethia4India

16 अक्तूबर : अपने मुँह की चौकसी करो

Alethia4India
Alethia4India
16 अक्तूबर : अपने मुँह की चौकसी करो
Loading
/

“जो अपने मुँह की चौकसी करता है, वह अपने प्राण की रक्षा करता है, परन्तु जो गाल बजाता है उसका विनाश हो जाता है।” नीतिवचन 13:3

प्युरिटन थॉमस ब्रूक्स ने एक बार लिखा था, “हम धातुओं को उनकी छनकार से पहचानते हैं, और लोगों को उनके बोलने से।”[1]

शब्द कभी तटस्थ नहीं होते। हमारे द्वारा बोले जाने वाले प्रत्येक शब्द को परमेश्वर सुनता है—हमारे जीवन उनके सामने उजागर हैं, और बाइबल में यह अद्वितीय क्षमता है कि वह हमारे दिलों के गहरे कोनों तक पहुँचकर उसे भी परख सकती है जिसे हम खुद से और दूसरों से छिपाना चाहते हैं।

जो शब्द लोगों द्वारा हमसे बोले जाते हैं, उनकी छाप हमारी स्मृति में छप जाती है। शायद हम एक बच्चे द्वारा बोले गए पहले शब्दों की खुशी पर विचार करते हैं या फिर एक दोस्त के दर्दनाक शब्दों की कड़वाहट को महसूस करते हैं। बचपन से ही हम यह सीख जाते हैं कि हानि पहुँचाने के लिए या खुशी दिलाने के लिए शब्दों का उपयोग कैसे किया जाता है। राजा सुलैमान ने सही कहा था: “जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं” (नीतिवचन 18:21)।

हम सभी पाप में पतन के शिकार हैं। इसलिए चोट पहुँचाने वाले शब्द बड़ी आसानी से हमारे मुँह से निकल आते हैं। वे एक तलवार के अनियन्त्रित प्रहार के समान बड़े घातक हो सकते हैं और जब हम सुनने से पहले उत्तर दे देते हैं, तो हमारे शब्द बड़े लापरवाही से भरे हो सकते हैं। कभी-कभी हम बस जरूरत से ज्यादा बोल जाते हैं; और परिणामस्वरूप हम ऐसी बातें कह देते हैं जो हमें अपने तक ही रखनी चाहिए थीं। शब्द किसी पड़ोसी को नष्ट कर सकते हैं, किसी मित्र की भावनाओं को आहत कर सकते हैं, और हमारे सम्बन्धों में आग लगा सकते हैं। एक गलत शब्द किसी के चरित्र को बिगाड़ सकता है, किसी की प्रतिष्ठा को धूमिल कर सकता है, या किसी और के जीवन की उपयोगिता को लम्बे समय तक नुकसान पहुँचा सकता है। हम यह सब जानते हैं, फिर भी अपने मुँह पर नियन्त्रण रखना हमारे लिए कितना कठिन होता है। कितनी बार हम तब मुँह बन्द करते हैं जब बहुत देर हो चुकी होती है—जब हम पहले ही उसे जरूरत से ज्यादा खोल चुके होते हैं और खुद को या दूसरों को नुकसान पहुँचा चुके होते हैं।

यदि हम सचमुच अपनी जीभ की असफलताओं के बारे में ईमानदार होते, तो हम एक-दूसरे के प्रति बहुत अधिक सहनशील होते। और परमेश्वर की मदद से हम अपने मुँह की रक्षा करने और विनाशकारी शब्दों को हटाने में और अधिक गम्भीर होते। यह हमारे दोस्तों, परिवार और पड़ोसियों के लिए अनुग्रह का कितना सुन्दर प्रदर्शन होता! यीशु ही एकमात्र सिद्ध व्यक्ति है; उसने अपने शब्दों से कभी पाप नहीं किया (याकूब 3:2)। यदि हम इस पहलू में उसके जैसे बनने का प्रयास करें, तो शायद लोग इस बात पर चकित होंगे कि उसके होंठों से कैसे करुणा, कोमलता और दयालुता से भरे शब्द निकलते थे (लूका 4:22)।

यद्यपि आपके शब्द और कार्य स्वयं में स्वर्ग के द्वार पर आपके लिए कुछ प्राप्त नहीं कर सकते, फिर भी ये इस बात का प्रमाण हैं कि प्रभु यीशु मसीह में आपके विश्वास की घोषणा सच्ची है। अब ज़रा सोचिए, कैसा लगेगा जब आप इन शब्दों को गम्भीरता से लेना आरम्भ करेंगे: “हर एक मनुष्य सुनने के लिए तत्पर और बोलने में धीर और क्रोध में धीमा हो” (याकूब 1:19)?

  याकूब 3:2-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 10–12; इफिसियों 5:17-33


[1] द कम्पलीट वर्क्स ऑफ थॉमस ब्रूक्स  में “दि अनसर्चेबल रिचेस ऑफ क्राईस्ट,” सम्पादक ऐल्क्ज़ेण्डर बालोख़ ग्रोज़ार्ट (जेम्स निकोल, 1866), खण्ड 3, पृ. 178.

16 October : परमेश्वर ईर्ष्यावान आहे याची भीती बाळगून आशा ठेवणें

Alethia4India
Alethia4India
16 October : परमेश्वर ईर्ष्यावान आहे याची भीती बाळगून आशा ठेवणें
Loading
/

“ज्याचे नाव ईर्ष्यावान आहे, तो परमेश्वर ईर्ष्यावान देव आहे.” (निर्गम 34:14)

देव त्याच्या नावाच्या प्रतिष्ठेसाठीं अफाट ईर्ष्यावान आहे, आणि तो अशा लोकांविरुद्ध भयंकर क्रोधाविष्ठ होऊन त्यांचा न्याय करतो ज्यांचे अंतःकरण त्याच्याठायीं असायला पाहिजे परंतु ते इतर गोष्टींच्या मागे जातांत, जशी कीं एक पत्नी आपला नवरा सोडून दुसऱ्या प्रियकराच्या मागे जाते.

उदाहरणार्थ, यहेज्केल 16:38-40 मध्यें तो विश्वास न ठेवणाऱ्या इस्राएलला म्हणतो,

“जारिणी व रक्तपाती स्त्रिया ह्यांचा न्याय करावा तसा मी तुझा न्याय करीन आणि क्रोधाने व ईर्ष्येने मी तुझा रक्तपात करीन. मी तुला त्यांच्या हाती देईन, म्हणजें ते तुझी कमानदार घरे उद्ध्वस्त करतील, तुझी उच्च स्थाने पाडून टाकतील; तुझी वस्त्रे हिरावून घेऊन व तुझे उंची जवाहीर काढून घेऊन तुला उघडीनागडी करून सोडतील. ते तुझ्याविरुद्ध मंडळी जमवून आणून तुला दगडमार करतील व आपल्या तलवारींनी तुला भोसकतील.”

तुम्हीं ह्या सावधगिरीच्या इशाऱ्याकडे आपलें कान लावावे अशी मी तुम्हांला विनंती करतो. तुमची समर्पित प्रीति आणि भक्ती यांसाठीं देवाची ईर्ष्या ही सदैव अंतिम दावा ठरते. ज्यां काहीं गोष्टीं तुम्हांला भ्रामक आकर्षण देऊन देवावरील तुमची प्रीति हिरावून घेतांत त्यां सर्व तुमच्यावर उठून तुम्हांला उद्ध्वस्त करतील.

देवानें तुम्हांला जे जीवन दिलें त्याचा उपयोग तुम्हीं त्या सर्वसमर्थाच्याच विरुद्ध व्यभिचार करण्यासाठीं करावा ही एक भयानक गोष्ट आहे.

परंतु तुमच्यांपैकीं जे खरोखर ख्रिस्ताशी एकरूप झालें आहेत ते तुम्हीं बाकीं सर्व गोष्टींचा त्याग करून केवळ त्याच्याशीच जडून राहण्याचे आणि त्याच्या प्रतिष्ठेसाठीं जीवन जगण्याचे आपलें वचन पाळतां त्यां तुम्हांसाठीं देवाची ईर्ष्या मोठे समाधान आणि मोठी आशा आहे.

कारण कीं देव त्याच्या नावाच्या प्रतिष्ठेसाठीं अफाट ईर्ष्यावान आहे म्हणून जे काहीं किंवा जो कोणी त्याच्या विश्वासू पत्नीच्या कल्याणासाठीं धोका निर्माण करतो ते सर्व ह्या सर्वसमर्थ देवाचा वैरी ठरते. देवाच्या विश्वासू पत्नीसाठीं, म्हणजें त्याच्या विश्वासू लोकांसाठीं हे शुभवृत्त आहे.

जारकर्म करणाऱ्या आणि आपलीं अं:तकरणने जगाला विकणाऱ्या व देवाबरोबर वैर ठेवणाऱ्या लोकांसाठीं देवाची ईर्ष्या विनाशकारी आहे (याकोब 4:3-4). परंतु जे लोक आपल्या कराराची शपथ पाळतात आणि आपण ह्या जगांत परके आणि प्रवासी आहों असे मान्य करतांत त्यांच्यासाठीं त्याची ईर्ष्या मोठे समाधान आहे.

15 अक्तूबर : चिरस्थाई शान्ति

Alethia4India
Alethia4India
15 अक्तूबर : चिरस्थाई शान्ति
Loading
/

“इसलिए हे भाइयो, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात् जो भी सद्‌गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन पर ध्यान लगाया करो।” फिलिप्पियों 4:8

हम सभी परमेश्वर की शान्ति को जानने और उसकी उपस्थिति को महसूस करने के लिए लालायित रहते हैं। लेकिन परमेश्वर की शान्ति, जो हमारे हृदय और मन की रक्षा करती है (फिलिप्पियों 4:7), अपने आप नहीं आती।

यह स्वाभाविक रूप से नहीं आती। परमेश्वर की स्थाई शान्ति का अनुभव तभी होता है, जब हम अपने मनों को उन बातों पर केन्द्रित करते हैं जो उसे प्रसन्न करती हैं। इसलिए को शान्ति जानने के लिए सबसे पहले यह सवाल करें, “मुझे किस प्रकार से सोचना चाहिए?”

इस पद में पौलुस का उत्तर दिया गया है। वह हमें प्रोत्साहित करता है कि हम अपने विचारों के ढांचे को उन बातों पर आधारित करें जो श्रेष्ठ और सराहनीय हैं। इसी उद्देश्य से, वह हमें मसीही जीवन में विचारों के छः मूलभूत सद्‌गुणों की एक सूची प्रदान करता है।

पहला है सत्य। सबसे पहले हमें सत्य का कमरबन्द कसना है, ताकि हम परमेश्वर के अन्य अस्त्रों-शस्त्रों से लाभ उठा सकें (इफिसियों 6:14)। इसलिए यहाँ सत्य को प्रथम स्थान दिया गया है, जो मसीह में वस्तुनिष्ठ रूप से पाया जाता है और जिसे तब अनुभव किया जाता है, जब हम स्वयं को और दूसरों को सुसमाचार का प्रचार करते हैं।

दूसरा, पौलुस हमें “जो जो बातें आदरणीय हैं” की ओर निर्देशित करता है—या “उत्तम,” जैसा कि कुछ अनुवादों में है। हमें अपने विचारों को वैभव से भरपूर या प्रेरणादायक बातों पर केन्द्रित करना है, जो अनैतिक और सांसारिक बातों के उलट है। विश्वासियों के रूप में, हमें अपने मनों को तुच्छ मनोरंजन या उसके समान महत्त्वहीन बातों से नहीं भरना है, जिनके पीछे हमारा गैर-धार्मिक संसार पड़ा हुआ है। इसके बजाय, हमें ऐसी बातों पर मन लगाना है जो हमारी आत्मा को ऊपर की ओर, परमेश्वर और उनके महान कार्यों की ओर ले जाती हैं। तीसरे और चौथे स्थान पर, पौलुस हमें उचित और पवित्र बातों के आधार पर निर्णय लेने के लिए कहता है, न कि उन पर जो सुविधाजनक या सन्तोषजनक हो। यही वह सोच थी जिसने यूसुफ को दाऊद से उस समय अलग किया, जब उन्होंने एक जैसी परिस्थिति का सामना किया। जब पोतीपर की पत्नी यूसुफ के पीछे पड़ गई थी, तो उसने सही बात के आधार पर निर्णय लिया, न कि उस बात के आधार पर जो आसान या तात्कालिक रूप से सन्तोषजनक थी (उत्पत्ति 39:6-12)।

दूसरी ओर, दाऊद ने अपनी भावनाओं का अनुसरण किया और बतशेबा के साथ सोने और उसके पति की हत्या करके बड़ा अन्याय किया (2 शमूएल 11)। उद्धार प्राप्त कर लेने का अर्थ यह नहीं है कि अब हम अपने आप ही अधर्म से बच जाएँगे, जिसका आरम्भ मन में होता है और समापन पापी कार्यों में होता है। लेकिन उद्धार प्राप्त कर लेने के बाद जब हम उद्धार पाए हुए व्यक्ति के रूप में सोचते हैं, तब हम अधर्म से बचे रहते हैं। पाँचवें और छठे स्थान पर, “जो जो बातें सुहावनी हैं” और “जो जो बातें मनभावनी हैं” हमें उन पर ध्यान करना चाहिए—या जैसा कि किंग जेम्स संस्करण में है, उन पर जो “अच्छी प्रतिष्ठा” वाली बातें हैं। जब हम इस तरह से सोचते हैं, तो हम ऐसी बातों को सुनेंगे जो लोगों को बढ़ाती हैं, न कि ऐसी बातों को जो निन्दा करती हैं, निराश करती हैं, और नष्ट करती हैं। यह मानसिकता भाईचारे के प्रेम को बढ़ावा देती है और परमेश्वर के अनुग्रह के साथ चलती है जैसे वह हमारे जीवन में कार्य करता है।

पौलुस द्वारा दिए गए ढांचे के अनुसार अपने विचारों को ढालें और इसके साथ प्रार्थना अवश्य करें (फिलिप्पियों 4:6-8), तब आपके पास चिन्ता के लिए बहुत कम स्थान होगा, अर्थात उस मानसिकता के लिए जो शान्ति को घटाने वाली और आनन्द को नष्ट करने वाली होती है और अक्सर हमारे जीवन में चुपचाप घुस आती है। इसके बजाय, अपने मन को परमेश्वर के विचारों के अनुरूप प्रशिक्षित करें, और तब आप उसकी शान्ति और उपस्थिति का अधिक अनुभव कर पाएँगे।

भजन  119:97-104

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 7–9; इफिसियों 5:1-16 ◊

15 October : प्रार्थनेची योजना करा

Alethia4India
Alethia4India
15 October : प्रार्थनेची योजना करा
Loading
/

तुम्हीं माझ्यामध्यें राहिलात व माझी वचने तुमच्यामध्यें राहिली तर जे काही तुम्हांला पाहिजे असेल ते मागा म्हणजें ते तुम्हांला प्राप्त होईल. तुम्हीं विपुल फळ दिल्याने माझ्या पित्याचा गौरव होतो; आणि तुम्हीं माझे शिष्य व्हाल. . . . माझा आनंद तुमच्यामध्यें असावा व तुमचा आनंद परिपूर्ण व्हावा म्हणून मी तुम्हांला ह्या गोष्टी सांगितल्या आहेत.” (योहान 15:7-8,11)

प्रार्थना, या गोष्टीची जाणीव ठेऊन कीं आपल्यां प्रार्थनांच्या उत्तरस्वरूपांत आपण जे फळ देतो त्याद्वारे देवाचा गौरव होतो, येशूबरोबर फळदायक सहभागितेंत असलेल्या आनंदाचा शोध घेते. पण तरी, देवाची मुले आनंद देणाऱ्या ह्या फलदायी प्रार्थनेच्या अखंडित सवयी विकसित करण्यांत वारंवार का अपयशी ठरतात?

जर मी अति शहाणपण दाखविण्याची चूक करित नसेल, तर याची पुष्कळ कारणें असूं शकतांत आणि त्यांपैकीं एक म्हणजें आपल्याला प्रार्थना करण्यांत रस नसतो असे नाहीं, तर आपण तिची योजना करत नाहीं.

जर तुम्हांला चार आठवड्यांची सुट्टी घ्यायची असेल, तर तुम्हीं एक दिवस सकाळी-सकाळी उठून असे म्हणत नाहीं, “चला, आज ऑफिसला जाऊया!” त्यासाठीं तुमची तयारी नसते. तुम्हाला कुठे जायचे हे कळणार नाहीं. काहीही नियोजन केलेंलें नसते.

पण आपल्यांपैकीं बरेच लोक प्रार्थनेला असेच समजतांत. आपण प्रत्येक दिवशी उठतो आणि आपल्यां लक्षात येते कीं अरे, आपल्या जीवनाचा एक महत्वाचा भाग प्रार्थनेची ठराविक वेळ असायला पाहिजे, परंतु प्रार्थना कशाविषयी करावीं यावर आपल्याकडे विषयच नसतो.

कुठून सुरवात करावी हे आपल्याला माहित नसते. कोणतीही योजना केलेंलीं नसते. ठराविक वेळ नाहीं. ठराविक ठिकाण नाहीं. कुठलाही क्रम नाहीं. आणि आपल्या सर्वांना ठाऊक आहे कीं जेथें योग्य योजना असते तेथें प्रार्थना ही खोल अं:तकरणात उत्स्फूर्त अशा अनुभवांचा एक अद्भुत प्रवाह बनते. जेथें योग्य योजना नसते तेथें त्यांच त्यां जुन्या पुनरावृत्ती असतांत.

जर तुम्हीं सुट्ट्यांचा आनंद कुठे आणि कसा घ्यावा याची योग्य योजनाच केलीं नाहीं, तर तुम्हीं कदाचित घरी राहून टीव्ही पाहत बसाल. आध्यात्मिक जीवनाच्या ह्या अशा स्वाभाविक आणि अनियोजित सरावामुळें संजीवनाचा स्तर अधिक खालच्या पातळीवर जातो. आम्हांला नेमून दिलेली धाव धावायची आहे आणि एक युद्ध जिंकायचे आहे. जर तुम्हांला तुमच्या प्रार्थनेच्या जीवनांत एक नवे परिवर्तन घडवून आणायचे असेल, तर तुम्हांला ते परिवर्तन मूर्त स्वरूपांत पाहण्यासाठीं तशी योजनाहि करणें आवश्यक आहे.

म्हणून, मीं तुम्हांला सोप्या भाषेंत उत्तेजन देतो : आपण आजच आपला प्राधान्यक्रम आणि त्या क्रमाशी प्रार्थनेची सांगड कशी बसते यांवर पुनर्विचार करण्यासाठीं वेळ काढूया. आपण काहीं नवनवीन संकल्प करूं. देवाच्या सामर्थ्याने काही नवे पराक्रम करण्याचा प्रयत्न करूं. एक ठराविक वेळ साध्य करूं. एक ठिकाण ठरवू. मार्गदर्शनासाठीं पवित्र शास्त्राचा एक भाग निवडा.

स्वतःवर व्यस्त दिवसांची जुलमी हुकुमत चालू देऊन कामाच्या दडपणाखाली येऊ नका. आम्हां सर्वांना आपली दिनचर्या सुधारण्याची गरज आहे. आजचा हा दिवस तो दिवस बनूं द्या जेव्हां तुम्हीं प्रार्थनेच्या नित्यक्रमाकडे वळलांत- जेणेंकरून देवाचा गौरव व्हावा आणि तुमचा आनंद परिपूर्ण व्हावा.

14 अक्तूबर : अनुचित दुख

Alethia4India
Alethia4India
14 अक्तूबर : अनुचित दुख
Loading
/

“हे प्रियो, जो दुख रूपी अग्नि तुम्हारे परखने के लिए तुम में भड़की है, इस से यह समझकर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है। पर जैसे-जैसे मसीह के दुखों में सहभागी होते हो, आनन्द करो, जिससे उसकी महिमा के प्रगट होते समय भी तुम आनन्दित और मगन हो।” 1 पतरस 4:12-13

कोई भी सच्चा विश्वासी अन्ततः अन्यायपूर्ण दुख का सामना करेगा। यदि हम मसीह के सच्चे अनुयायी हैं, तो ऐसे समय आएँगे जब हम आरोपों, बदनामी, या अपमान का शिकार होंगे। यह हमारे घर, कार्यस्थल, स्कूल, या यहाँ तक कि कलीसिया में भी हो सकता है।

यह परीक्षाएँ वास्तव में चुनौतीपूर्ण होती हैं। जब हम तथ्यों को निष्पक्ष रूप से अपने सामने रखते हैं, तो हम सोचते हैं, “तुम्हें पता है? उसे ऐसा कहने का कोई अधिकार नहीं था! उसे ऐसा सोचने का कोई अधिकार नहीं था! उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था! और फिर भी, मुझे यह सब सहना पड़ा। यह ठीक नहीं है!”

जब हम दुख का सामना करते हैं, तो उसे एक अजीब दुर्भाग्य मानने का बड़ा प्रलोभन हमारे सामने आता है—जो कि यीशु का अनुसरण करने के मूल अर्थ से बिल्कुल ही बाहर की बात है। भीतर से यह सोचना बहुत आसान होता है कि जब हम मसीह का अनुसरण कर रहे होते हैं, तो सब कुछ आसान होना चाहिए। कुछ समय तक, कुछ क्षेत्रों में (विशेषकर पश्चिमी देशों में), हम इस मान्यता के साथ खुशी-खुशी जीवन जी सकते हैं। लेकिन फिर हम एक “दुख रूपी अग्नि” का सामना करते हैं, और अचानक हमारे जीवन का अनुभव यह प्रमाणित कर देता है कि मसीही होना वास्तव में आसान नहीं है।

अपने समय में कलीसिया की देखभाल करते हुए पतरस ने विश्वासियों को कठिनाइयों से हैरान न होने के लिए प्रेरित किया। जैसे एक माता-पिता अपने बच्चे से दुनिया में अकेले कदम रखने से पहले बातचीत करते हैं, उसी तरह पतरस ने विश्वासियों से आग्रह किया कि वे पीड़ा की प्रत्याशा करें। ऐसा नहीं था कि वे किसी बुरे तरीके से काम करने जा रहे थे और इसलिए उचित न्याय का सामना करने जा रहे थे। नहीं, इसका मतलब यह था कि वे सिर्फ मसीह यीशु के प्रति अपने समर्पण के कारण दुख उठाएँगे। पतरस ने उन्हें बताया कि यह मसीही जीवन का एक अटूट हिस्सा था। यह कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए था, बल्कि एक प्रत्याशा होनी चाहिए थी।

आखिरकार, जैसा कि यीशु ने खुद अपने शिष्यों से उस रात कहा जब संसार की घृणा उसे क्रूस पर चढ़ाने जा रही थी, “दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता। यदि उन्होंने मुझे सताया, तो तुम्हें भी सताएँगे” (यूहन्ना 15:20)। विचार करें कि पिलातुस के दरबार में यीशु के साथ कैसा व्यवहार किया गया था। पूछताछ के दौरान, पिलातुस ने यीशु के बारे में—तीन बार में से पहली बार—कहा, “मैं तो उसमें कुछ दोष नहीं पाता” (18:38; 19:4, 6)। उसे विश्वास था कि यीशु के विरोधी परिस्थितियों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे और वह यह भी विश्वास करता था कि यीशु पर लगे आरोपों में कोई सच्चाई नहीं थी। लेकिन फिर भी, पिलातुस ने यीशु को छोड़ने के बजाय उसे कोड़े लगवाए और फिर उसे क्रूस पर चढ़ाने के लिए सौंप दिया। यीशु द्वारा अनुभव किया गया प्रत्येक शोक और दुख अन्यायपूर्ण था। और जब हम मसीह का अनुसरण करने का निर्णय लेते हैं, तो हमें भी उसी तरह दुख सहने के लिए तैयार होना चाहिए जैसा उसने सहा था।

क्या आप भी आज दुख रूपी अग्नि का सामना कर रहे हैं या उसमें से गुज़रने के बाद अव्यवस्थित हो रहे हैं? हिम्मत रखें! जब मसीही जीवन पीड़ादायक होता है, तो हम उसके कारण दुख सह रहे होते हैं जिसने हमारे लिए कहीं अधिक कष्ट उठाए। हम अपना जीवन उसे दे रहे होते हैं, जिसने अपना जीवन हमें दे दिया। और हम उस दिन की प्रतीक्षा कर सकते हैं, जब ये परीक्षाएँ समाप्त हो जाएँगी, जब न्याय होगा, और हम अपने उद्धारकर्ता की महिमा में हमेशा के लिए जीएँगे।

यूहन्ना 15:18 – 16:4

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 4– 6; इफिसियों 4

14 October : देव नम्र करून बरे करतो

Alethia4India
Alethia4India
14 October : देव नम्र करून बरे करतो
Loading
/

“मी त्याची चालचर्या पाहिली, मी त्याला सुधारीन; मी त्याला मार्ग दाखवीन, मी त्याचे, त्याच्यातल्या शोकग्रस्तांचे समाधान करीन. मी त्याच्या तोंडून आभारवचन उच्चारवीन, जे दूर आहेत व जे जवळ आहेत, त्यांना शांती असो, शांती असो; मी त्यांना सुधारीन असे परमेश्वर म्हणतो.” (यशया 57:18-19)

मनुष्य हा त्याची बंडखोरी आणि हट्टीपणा या गंभीर रोगाने ग्रस्त असला तरी, देव त्याला बरे करील. त्याला कसे बरे केलें जाईल? यशया 57:15 सांगते कीं देव ज्याचे चित्त अनुतापयुक्त व नम्र आहे त्याच्या ठायीं वसतो. असे असले तरी, यशया 57:17 मधील लोक हे कांहीं नम्र लोक नाहींत. ते अभिमानी वृत्तीने निर्लज्जपणें आपापल्या मार्गाचे अनुसरण करित आहेत. तर मग, याचा उपचार कसा केला जाईल?

उपचाराचा एकच मार्ग असू शकते. देव त्यांना नम्र करून बरे करील. तो त्याचा अभिमान ठेचून त्यां रुग्णाला बरा करील. ज्यांचे चित्त अनुतापयुक्त व नम्र आहे जर असेच लोक देवाच्या वस्तीचा आनंद घेऊं शकतांत (यशया 57:15), आणि जर इस्राएल बंडखोरी आणि हट्टीपणा या गंभीर रोगाने ग्रस्त आहे (यशया 57:17), आणि जर देवा त्यांना बरे करण्याचे अभिवचन देतो (यशया 57:18), तर मग नम्र करणें हा त्याचा उपचार अनुतापयुक्त हृदय हे त्याचे समाधान असणें आवश्यक आहे.

यिर्मयाने ज्याला नवा करार आणि नव्या हृदयाची देणगी म्हटलें होते त्याच बाबतींत भविष्यवाणी करण्याची ही यशयाची पद्धत नाहीं का? त्यानें म्हटलें, “असे दिवस येत आहेत कीं त्यात इस्राएलाचे घराणें व यहूदाचे घराणें ह्यांच्याबरोबर मी नवा करार करीन. . . . मी आपले नियमशास्त्र त्यांच्या अंतर्यामी ठेवीन; मी ते त्यांच्या हृत्पटलावर लिहीन; मी त्यांचा देव होईन व ते माझे लोक होतील” (यिर्मया 31:31, 33).

यशया आणि यिर्मया दोघेही असे दिवस येत असल्याचे दर्शन पाहतात जेव्हा रोगग्रस्त, आज्ञा न मानणारे, व पाषाण हृदयी अशा लोकांची अंतर्यामें अलौकिकरित्या बदलून टाकिलें जातील. यशया बरे होण्याविषयी बोलतो, तर यिर्मया त्यांच्या हृत्पटलावर नियमशास्त्र लिहिले जाण्याविषयी बोलतो. आणि यहेज्केल हेच सत्य अशा शब्दांत मांडतो: “मी तुम्हांला नवे हृदय देईन, तुमच्या ठायीं नवा आत्मा घालीन; तुमच्या देहातून पाषाणमय हृदय काढून टाकीन व तुम्हांला मांसमय हृदय देईन” (यहेज्केल 36:26)

ह्याप्रमाणें यशया 57:18 चे बरे केलें जाणें हे नव्या हृदय प्रत्यारोपणाचे एक प्रमुख कार्य आहे — पाषाण रुपी जुने, गर्विष्ठ, हट्टी हृदय बाहेर काढले जाते, आणि त्या ठिकाणी एक नवें मऊ, कोमल असे मांसाचे हृदय प्रत्यारोपित केलें जाते, एक अशी शस्त्रक्रिया ज्यामध्यें मागील पाप आणि कायमस्वरूपी असे जे पाप ह्याचे स्मरण देऊन ते सहजपणें नम्र आणि अनुतप्त केलें जाते.

हेंच ते चित्त जेथें तो महाप्रतापी ज्याचे नाव पवित्र आहे सर्वकाळ वस्ती करील.

13 अक्तूबर : एक उत्तम देश के अभिलाषी

Alethia4India
Alethia4India
13 अक्तूबर : एक उत्तम देश के अभिलाषी
Loading
/

“यूसुफ अपने पिता के घराने समेत मिस्र में रहता रहा, और यूसुफ एक सौ दस वर्ष जीवित रहा…यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, ‘मैं तो मरने पर हूँ; परन्तु…परमेश्‍वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा…तुम तेरी हड्डियों को यहाँ से उस देश में ले जाना।’” उत्पत्ति 50:22, 24-25

यूसुफ के जीवन के बाकी के लगभग 60 वर्षों का सारांश इस वाक्य में दिया गया है: “यूसुफ अपने पिता के घराने समेत मिस्र में रहता रहा।” उसके जीवन का यह समय शायद उसके प्रारम्भिक जीवन की नाटकीय घटनाओं की तुलना में कहीं अधिक शान्तिपूर्ण था। लेकिन निश्चित रूप से ये 60 साल निरर्थक नहीं थे। यूसुफ के जीवन के इस काल पर विचार करते हुए हमें यह सोचने का अवसर मिलता है: हम किस लिए जी रहे हैं? जो समय परमेश्वर ने हमें दिया है, हम उसे किस तरह से उपयोग कर रहे हैं?

यह बहुत आसान है कि हम अपना जीवन केवल पार्थिव उद्देश्यों का पीछा करते हुए व्यतीत कर दें, जैसे व्यावसायिक सफलता, वित्तीय स्थिरता, या आरामदायक विलासिता। यह मिथक आकर्षक है: कि जीवन का लक्ष्य केवल अपनी नौकरी में कठिन परिश्रम करना है, ताकि आप अपने आरामदायक जीवन को स्थापित करने के लिए पर्याप्त संसाधन जुटा सकें—यह कि जीवन का उद्देश्य केवल सेवानिवृत्ति की तैयारी करना है। जब विश्वासियों के पास आमतौर पर वित्तीय, भावनात्मक और सामाजिक दृष्टिकोण से पर्याप्त समय होता है, जिसे वे परमेश्वर के राज्य की सेवा में लगा सकते हैं, तब वे अक्सर आराम की बात करने लगते हैं।

यीशु के अनुयायी के रूप में हमें इस तरह नहीं जीना चाहिए जैसे कि यही संसार सब कुछ है। फिर भी हममें से कुछ लोग ईमानदारी से ऐसा नहीं कह सकते, “इस जीवन से बढ़कर भी कुछ है,” क्योंकि हम अपने समय, संसाधन और धन के साथ जो कुछ भी कर रहे हैं, वह यह सन्देश दे रहा है, “बस यही सब कुछ है! इसीलिए मैं प्रति सप्ताह 60 घण्टे काम कर रहा हूँ। यही कारण है कि मैं घर नहीं आता या छुट्टी नहीं लेता। यही कारण है कि पिछले रविवार मैं कलीसिया नहीं गया। यही कारण है कि मैं अपने पड़ोसियों के साथ सुसमाचार साझा करने या सेवा करने के लिए समय नहीं निकालता और जोखिम नहीं उठाता। क्योंकि बस यही सब कुछ है।”

यह एक बात होती है कि हम किसी संघर्ष के बीच एक जीवन्त और अडिग विश्वास कायम रखते हैं; लेकिन यह पूरी तरह से एक नई चुनौती होती है कि हम दैनिक दिनचर्या के बीच एक स्थिर आज्ञाकारिता का जीवन जीते हैं। जीवन को अच्छी तरह से जीने के लिए—विशेषकर जब हम अपने संसाधनों और धरोहर के बारे में बात करते हैं—हमें केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि हम जीवन में क्या चाहते हैं, बल्कि हमें यह भी सोचना चाहिए कि हमें जीवन के साथ क्या करना चाहिए। हमें एक स्वर्गिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

यूसुफ के पास अपने जीवन के लिए और उन अन्तिम, शान्तिपूर्ण वर्षों के लिए एक उद्देश्य था। उसकी दृष्टि मिस्र की सीमाओं के पार लगी हुई थी। वह अपने पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर रहा था; बल्कि उसने बड़ी जिम्मेदारी से यह सुनिश्चित किया कि उसके बच्चे और उसके बच्चों के बच्चे मिस्र में बहुत आराम से न बसें, बल्कि वे इतने अस्थिर हो जाएँ ताकि वे एक दिन प्रतिज्ञा किए गए देश में वास्तव में स्थिरता से बस सकें। परमेश्वर ने उसे मिस्र में शान्ति, प्रतिष्ठा और समृद्धि दी थी—वह सब कुछ जिसका हममें से अधिकांश लोग आज के दिन में पीछा करते हैं। फिर भी वह हमेशा मिस्र के पार देखता रहा। वह जानता था कि यह वह स्थान नहीं था, जहाँ पर उसे या परमेश्वर के लोगों को सचमुच बसना था। यह उसका अपना घर नहीं था। हमें भी इस तरह जीना चाहिए कि हम अपने प्रियजनों और अपने दिलों को “एक उत्तम अर्थात् स्वर्गीय देश के अभिलाषी” बनाए रखें (इब्रानियों 11:16)। चाहे आज आपके पास कुछ हो या न हो, यह वर्तमान संसार आपका घर नहीं है। इससे कुछ अधिक और बेहतर आना अभी बाकी है। यह सुनिश्चित कर लें कि आपका समय, संसाधन और धन इस ज्ञान को प्रदर्शित करें।

1 थिस्सलुनीकियों 5:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 1–3; इफिसियों 3 ◊

13 October : चाकरमानीधनी

Alethia4India
Alethia4India
13 October : चाकरमानीधनी
Loading
/

. . . ह्यासाठीं कीं, ख्रिस्त येशूच्या ठायीं त्याच्या तुमच्या-आमच्यावरील ममतेच्या द्वारे येणार्‍या युगात त्यानें आपल्या कृपेची अपार समृद्धी दाखवावी. (इफिस 2:7)

मला ख्रिस्ताच्या दुसऱ्या आगमनाचे बायबलमधील सर्वात अद्भुत मूर्त स्वरूप लूक 12:35-37 मध्यें दिसते, जे लग्नाच्या मेजवानीवरुन परतणाऱ्या धन्याचे ह्याप्रकारे चित्रण करते:

“तुमच्या कंबरा बांधलेल्या आणि दिवे लागलेले असू द्या. लग्नाच्या मेजवानीवरुन परतणाऱ्या धन्याची वाट पाहणाऱ्या लोकांसारखे व्हा जेणेंकरून, तो परत येतो व दरवाजा ठोकावतो तेव्हा त्याच्यासाठीं त्यांनी ताबडतोब दरवाजा उघडावा. धनी परत आल्यावर जे दास त्यास जागे व तयारीत असलेले आढळतील ते धन्य. मी तुम्हास खरे सांगतो, तो स्वतः त्यांची सेवा करण्यासाठीं कंबर कसेल, त्यांना मेजावर बसायला सांगून त्यांची सेवा करील.”

आपल्याला सेवक म्हटलें आहें, यांत शंका नाहीं- आणि याचा अर्थ असा आहे कीं आपण आपल्याला सांगितल्याप्रमाणेंच वागायचे असते. पण या चित्रात असलेलें अद्भुत निरक्षण आगळे-वेगळे आहे. येथें “धनी” सेवा करण्यावर जोर देत आहे. येशू पृथ्वीवर सेवा करित होता त्यां काळांत आपण कदाचित या सेवेची अपेक्षा केलीं असती, कारण त्यानें म्हटलेंहि होते कीं, “मनुष्याचा पुत्रही सेवा करून घेण्यास नाहीं, तर सेवा करण्यास व पुष्कळांच्या मुक्तीसाठीं आपला जीव खंडणी म्हणून अर्पण करण्यास आला आहे” (मार्क 10:45). पण लूक 12:35-37 हे त्याच्या दुसऱ्या आगमनाचे चित्र आहे, जेव्हा मनुष्याचा पुत्र 2 थेस्सलनीकाकरांस 1:7-8 मध्यें सांगितल्याप्रमाणें आपल्या पित्याच्या आंधळे करून सोडणाऱ्या “अग्निज्वालेमधून, आपल्या महाप्रतापी दूतांसह स्वर्गातून प्रकट” होईल. आता, त्याच्या दुसऱ्या आगमनाच्या वेळी येशूला मेज्याजवळ सेवा करणारा सेवक म्हणून का चित्रित केलें गेलें असावें?

कारण आपल्या कृपेची अपार समृद्धी दाखवावी हाच त्याच्या गौरवाचा शिखर आहे जी गरजवंतांवर दयेचा सागर बनून विपुलपणें ओतली जाते. म्हणूनच इफिस 2:7 म्हणते कीं, “येणार्‍या युगात त्यानें आपल्या कृपेची अपार समृद्धी दाखवावी” हा त्याचा हेतू आहे.

आपल्या देवाचा महाप्रताप काय आहे? ह्या जगांत त्याचे वेगळेपण काय आहे? यशया याचे उत्तर देतो: “हे देवा, तुझी आशा धरून राहणार्‍यांचे इष्ट काम करणारा असा तुझ्याशिवाय दुसरा कोणी प्राचीन कालापासून ऐकण्यात आलेला नाहीं, त्याचे नाव आलेले नाहीं, कोणी तो डोळ्यांनी पाहिला नाहीं” (यशया 64:4). यासारखा दुसरा देव नाहीं. जी प्रजा पूर्णपणें त्याच्यावर अवलंबून आहे व जी त्याच्याठायीं आनंद करते अशा लोकांचे अक्षय इष्ट करण्याऱ्या परोपकारी देवाच्या भूमिकेपासून तो कधी सन्यास घेत नाहीं.

12 अक्तूबर : अच्छे कामों के लिए बनाए गए

Alethia4India
Alethia4India
12 अक्तूबर : अच्छे कामों के लिए बनाए गए
Loading
/

“हमारे लोग भी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अच्छे कामों में लगे रहना सीखें ताकि निष्फल न रहें।” तीतुस 3:14

आप यहाँ संयोग से नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा से हैं। आपने अपने आप को नहीं बनाया, और न ही आपने अपनी सृष्टि में कोई भाग लिया। आपको आपकी माता के गर्भ में बारीकी से बुना गया है (भजन 139:13)। परमेश्वर के हाथ ने आपको उस व्यक्ति के रूप में आकार दिया जो आप हैं; उसने आपको उसी क्षण बनाया जब उसने चाहा, और उसने आपको इतिहास के इस बिन्दु पर इसलिए रखा ताकि आप, मसीह में, अनुग्रह के द्वारा, विश्वास के माध्यम से, अच्छे काम कर सकें—वे अच्छे काम जो उसने आपके लिए निर्धारित किए हैं (इफिसियों 2:10)।

दूसरे शब्दों में, आपको अच्छे कार्यों करने के लिए ही अनुग्रह पर अनुग्रह प्राप्त हुआ है।

हालाँकि जब हम परमेश्वर के परिवर्तनकारी अनुग्रह के हमारे ऊपर प्रभाव पर विचार करते हैं, तो “अच्छे कामों को करने” का विचार आपके मन में प्राथमिकता न रखता हो, तौभी शायद यह प्रेरित पौलुस की सूची में लगभग पहले स्थान पर था। तीतुस को अपनी चिट्ठी में वह लिखता है कि परमेश्वर ने यीशु में “अपने आप को हमारे लिए दे दिया कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और शुद्ध करके अपने लिए एक ऐसी जाति बना ले जो भले–भले कामों में सरगर्म हो” (तीतुस 2:14, विशेष जोर दिया गया है)। यह जोर इस चिट्ठी में कई बार आता है, और पौलुस के समापन उपदेश में इस प्रकार निष्कर्ष पर पहुँचता है: “हमारे लोग भी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अच्छे कामों में लगे रहना सीखें।”

पौलुस का अच्छे कामों के प्रति विशेष उत्साह उसके और हमारे दोनों युगों में पूरी तरह से संस्कृति के विपरीत था। हम एक ऐसे संसार में जीते हैं, जहाँ स्वार्थी जीवन जीने के आकर्षण भरे पड़ें हैं। तो फिर हम पौलुस की नकल कैसे करें और अच्छे कार्यों में आगे कैसे बढ़ें?

सबसे पहले, हमें यह स्पष्ट करना होगा कि हमारे अच्छे कार्य परमेश्वर की कृपा को अर्जित नहीं करते। हम अच्छे कार्य इसलिए नहीं करते कि हम बचाए जाएँ, बल्कि हम अच्छे कार्य इसलिए करते हैं क्योंकि हम बचाए गए हैं। बिना अनुग्रह के आधार के सद्‌गुणी जीवन का बुलावा केवल बाहरी आचरण बनाएगा और यह या तो हमें थका देगा या हमें अहंकारी बना देगा। दूसरे, हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे अच्छे कार्य परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं और हम “मनुष्यों को नहीं, परन्तु परमेश्वर को, जो हमारे मनों को जाँचता है, प्रसन्न करते हैं” (1 थिस्सलुनीकियों 2:4)। इसलिए हमें परमेश्वर की आदर देने वाली, मसीह की महिमा करने वाली अच्छाई से भरे रहना चाहिए, जो हमारे महान उद्धार का जीवित प्रमाण है।

पौलुस कहता है कि अच्छे कार्य करने की हमारी क्षमता एक सीखी हुई आदत है। हमें कहा गया है कि हम “अच्छे कामों में लगे रहना सीखें।” हमारे कार्य केवल भावनात्मक उथल-पुथल का परिणाम नहीं होने चाहिएँ, या केवल तब होने चाहिएँ जब इन्हें करने का हमारा मन हो। इसके बजाय, हमें हर दिन इस उद्देश्य से प्रयास करना चाहिए कि हम वह राजकीय कार्य करें जो परमेश्वर ने हममें से प्रत्येक के लिए निर्धारित किया है, और इसे सोच-समझकर और आदतन करें। और हमें उन लोगों को देखना चाहिए जो अपने विश्वास की यात्रा में आगे बढ़ गए हैं और जो इस प्रकार का जीवन जीते हैं, और उनसे सीखने का प्रयास करना चाहिए।

मसीह में, आपके सभी दिन और आपके सभी कार्य किसी व्यक्ति के लिए और किसी बात के लिए अच्छे हो सकते हैं। हर दिन परमेश्वर से यह मांगने की आदत डालें कि आपको मिले अनुग्रह के प्रत्युत्तर के रूप में वह दूसरों के लिए अच्छे कार्य करने में आपकी सहायता करे, यह विश्वास करते हुए कि वह आपको अपने विश्वास के प्रमाण के रूप में अपने कार्यों को दिखाने के लिए अनुग्रह से सक्षम करेगा।

याकूब 1:27 – 2:13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: श्रेष्ठगीत 6– 8; इफिसियों 2

12 October : आपल्या हातून देवाची सेवा होते या मानसिकतेपासून सावध असां

Alethia4India
Alethia4India
12 October : आपल्या हातून देवाची सेवा होते या मानसिकतेपासून सावध असां
Loading
/

ज्या देवानें जग व त्यातले अवघे निर्माण केलें तो स्वर्गाचा व पृथ्वीचा प्रभू असून हातांनी बांधलेल्या मंदिरात राहत नाहीं; आणि त्याला काही उणें आहे, म्हणून माणसांच्या हातून त्याची सेवा घडावी असेही नाहीं; कारण जीवन, प्राण व सर्वकाही तो स्वतः सर्वांना देतो.” (प्रेषितांची कृत्ये 17:24-25)

आपण देवाला त्याच्या गरजां पुरवून त्याचा गौरव करत नाहीं, तर तो आपल्या गरजां पुरवेल अशी प्रार्थना केल्याद्वारे — आणि तो प्रार्थनेचे उत्तर देईल यावर विश्वास ठेविल्याद्वारे, आणि आपण प्रीतिने इतर लोकांच्या सेवेसाठीं आपले जीवन अर्पण करत असताना जो सर्वकाही स्वतः सर्वांना देतो त्या काळजी घेणाऱ्या देवामध्यें असलेल्या आनंदात जीवन जगतो, त्याद्वारे आपण त्याचा गौरव करतो.

येथे आपण ख्रिस्ती पूर्णानंदाच्या सुवार्तेचे मर्म पाहतो. आपण साहाय्यासाठीं त्याच्याकडे धावा करावा जेणेंकरून त्याचा गौरव होईल यावर देवाचा जोर. “आणि संकटसमयी माझा धावा कर; मी तुला मुक्त करीन आणि तू माझा गौरव करशील” (स्तोत्र 50:15). हे सत्य आपल्याला या आश्चर्यकारक तथ्यावर विश्वास ठेवण्यास भाग पाडते कीं त्याला आपली गरज आहे असा विचार करण्यापासून आपण सावध असले पाहिजे. आपल्या हातून देवाची सेवा होते या मानसिकतेपासून आपण सावध असले पाहिजे, याउलट त्याच्या हातून आपली सेवा व्हावीं अशी सावधगिरी आपणच बाळगली पाहिजे, जेणेंकरून आपल्या हातून त्याच्या गौरवाची चोरी होऊं नये. “त्याला काही उणें आहे, म्हणून माणसांच्या हातून त्याची सेवा घडावी असेही नाहीं ” (प्रेषित 17:25).

हे एकूण खूप विचित्र वाटू शकते, कारण आपल्यांपैंकीं पुष्कळांना वाटते कीं देवाची सेवा करणें ही पूर्णपणें सर्वसमान्य गोष्ट आहे. देवाची सेवा केल्यानें त्याचा अपमान देखील होऊ शकतो यावर आपण कधी विचारच केला नाहीं. पण आपण प्रार्थनेच्या मूळ अर्थावरच जर लक्ष दिलें तर ही गोष्ट स्पष्ट होईल.

रॉबिन्सन क्रूसो शीर्षक असलेल्या कादंबरीमध्यें नायक जेव्हां बेटावर अडकतो तेव्हां तो स्तोत्र 50:12-15 ला आपला आवडता शास्त्रपाठ म्हणून स्मरण करतो आणि त्यावर आशा ठवतो : तेथे देव म्हणतो, “मला भूक लागली तरी मी तुला सांगणार नाहीं, कारण जग व जगातले सर्वकाही माझे आहे. . . . संकटसमयी माझा धावा कर; मी तुला मुक्त करीन आणि तू माझा गौरव करशील.”

याचा अर्थ असा : देवाची सेवा करण्याचा एक असा दृष्टीकोन आहे जो त्याला कमी लेखून त्याच्याकडे आपल्या सेवेचा गरजू व्यक्ती म्हणून पाहतो. ओह, ख्रिस्तामध्यें आम्हांवर प्रकट झालेंल्या देवाच्या पराक्रमी कृपेला आपण कमी लेखू नये याविषयी आपण किती सावध असले पाहिजे. येशूनें म्हटलें , “कारण मनुष्याचा पुत्रही सेवा करून घेण्यास नाहीं, तर सेवा करण्यास व पुष्कळांच्या मुक्तीसाठीं आपला जीव खंडणी म्हणून अर्पण करण्यास आला आहे” (मार्क 10:45). तो सेवक होण्यासाठीं आला. देणारा म्हणून आपला गौरव करून घ्यावा हे त्याचे ध्येय होते.