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21 अक्तूबर : परमेश्वर की स्वीकृति

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21 अक्तूबर : परमेश्वर की स्वीकृति
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“अपने आप को परमेश्‍वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्जित होने न पाए।” 2 तीमुथियुस 2:15

आप किसकी सराहना के लिए जी रहे हैं?

स्वभाव से ही हम दूसरों से स्वीकृति पाने की इच्छा करते हैं। लेकिन विश्वासियों के रूप में जिस स्वीकृति की हमें सबसे अधिक चाहत रखनी है, वह है परमेश्वर की स्वीकृति। इस अद्‌भुत सत्य पर विचार करने के लिए समय निकालना आवश्यक है कि आज हम जो कुछ भी करते हैं, वह उस परमेश्वर को प्रसन्न कर सकता है, जो सारी सृष्टि का पालक है (1 थिस्सलुनीकियों 4:1), और एक दिन, वह उन लोगों का स्वागत करेंगे जिन्होंने उसके लिए पूरी तरह से जीवन व्यतीत किया, और स्वागत के समय ये शब्द बोलेगा, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास” (मत्ती 25:21, 23)। कल्पना कीजिए कि दिव्य होंठों से आपको ये शब्द सुनने को मिलेंगे!

तो फिर, कैसे हम “अपने आप को परमेश्‍वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न करें, जो लज्जित होने न पाए”?

सर्वप्रथम, हमें अन्त तक विश्वास बनाए रखने का संकल्प लेना होगा। पौलुस ने अपनी दौड़ के अन्तिम मोड़ पर तीमुथियुस से कहा, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है” (2 तीमुथियुस 4:7)। पौलुस का जीवन क्षणिक उत्साह के झटकों और फिर लम्बे निष्क्रियता के दौरों से भरा हुआ नहीं था। वह जानता था कि विश्वास की दौड़ एक आजीवन चलने वाली मैराथॉन है, जिसे अन्त तक दृढ़ता से दौड़ना होता है।

हम नहीं चाहते कि हमें केवल कभी-कभार आने वाले छोटे-छोटे उत्साह के झोंकों के लिए जाना जाए। विशेषकर हमें ऐसे लोग बनने से बचना चाहिए जो परमेश्वर का कार्य केवल तभी करते हैं, जब अन्य मसीही लोग हमें देख रहे हों। इसके बजाय, हमें हर दिन पूरी लगन से दौड़ लगानी है, यह स्मरण रखते हुए कि परमेश्वर की दृष्टि सदा हम पर बनी रहती है।

जब हम विश्वास में आगे बढ़ते हैं, तो हम यह याद रख सकते हैं कि हमें “धर्म का वह मुकुट” प्रतिज्ञा किया गया है, जो हमारे लिए “रखा हुआ है” और “जिसे प्रभु, जो धर्मी और न्यायी है,” हमें देगा (2 तीमुथियुस 4:8)। और हमें यह याद रखना चाहिए कि हम अपनी ताकत से नहीं दौड़ रहे हैं। बल्कि हमें यह पूरा विश्वास रखना चाहिए कि “जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलिप्पियों 1:6)। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि वह हमें मार्ग में कभी अकेला नहीं छोड़ेगा (इब्रानियों 13:5)। यदि समापन रेखा अभी दूर है, तो हमें उस पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय यीशु पर ध्यान लगाए रखना है, और अपनी आँखें “विश्वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले” पर लगाए रखनी हैं (इब्रानियों 12:2)।

कभी भी उस एक जीवन के प्रभाव को कम मत आँकिए जो पूरी तरह परमेश्वर की महिमा के लिए जीया गया हो। उस दिन की कल्पना करें, जब आप अपने स्वर्गिक पिता के सामने एक स्वीकृत सेवक के रूप में खड़े होंगे और यह विचार आपके दिल में नम्रता भर देगा और आप कहेंगे, “प्रभु, मैं पूरे मन से यही चाहता हूँ कि मेरे जीवन पर तेरी स्वीकृति बनी रहे। ‘मैं केवल एक हूँ, लेकिन मैं ही हूँ। जो मैं कर सकता हूँ, वह मुझे करना चाहिए। और जो मुझे करना चाहिए, उसे मैं तेरे अनुग्रह से करूँगा।’”[1]

मत्ती 25:14-46

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 22–24; 1 तीमुथियुस 1 ◊


[1] एडवर्ड एवरेट हेल को श्रेय दिया जाता है।

21 October : विवाहाचे मोठे रहस्य

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21 October : विवाहाचे मोठे रहस्य
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म्हणून पुरुष आपल्या आईबापांना सोडून आपल्या पत्नीला जडून राहील; आणि ती उभयता एकदेह होतील.” हे रहस्य मोठे आहे, पण मी ख्रिस्त व मंडळी ह्यांच्यासंबंधाने बोलतो आहे. (इफिस 5:31-32)

येथे इफिस 5:31 मध्यें पौल उत्पत्ति 2:24 चा संदर्भ घेत आहे, जे मोशे बोलला – आणि येशूनें म्हटलें कीं ही वचनें मोशेद्वारे देव बोलला (मत्तय 19:5) – “ह्यास्तव पुरुष आपल्या आईबापांस सोडून आपल्या बायकोशी जडून राहील आणि ती दोघे एकदेह होतील.” पौल म्हणतो कीं देवाचे हे वचन, जे देव मनुष्याचे पापात पडण्यापूर्वी बोलला, ख्रिस्त आणि मंडळीला संबोधून आहे आणि म्हणून यांत एक मोठे रहस्य दडलेलें आहे.

याचा अर्थ असा आहे कीं जेव्हां देवानें पुरुष आणि स्त्री यांना बनवलें आणि विवाहाद्वारे त्यांनी एकदेह व्हावें हे ठरविलें, तेव्हा त्यानें फासा टाकून किंवा एक रुपयाचे नाणें हवेत फेकून ते एकमेकांशी कसे संबंधित असावेंत असा नशिबी खेळ खेळला नाहीं. देवानें आपला पुत्र आणि मंडळी यांच्यातील नातेसंबंधाचा नमुना सादर करून अतिशय हेतुपुरस्सर विवाहाचा आदर्श आपल्या समोर ठेवला आहे, ज्याची योजना त्यानें जगाचा पाया घालण्यापूर्वी केलीं होती.

म्हणून, विवाह हे रहस्य मोठे आहे – आपण जे बाह्यरूपाने पाहतो त्यापेक्षा कितीतरी मोठा असा गूढ अर्थ त्यात सामावलेला आहे. देवानें पुरुष आणि स्त्री यांना बनवलें आणि विवाह संस्थेची स्थापना केलीं ती यासाठींच कीं ख्रिस्त आणि त्याची मंडळी यांच्यातील सार्वकालिक करार-बद्ध नात्याचे प्रतिबिंब त्यांच्या वैवाहिक एकदेहाद्वारे दिसून यावें.

पौलानें या रहस्यातून काढलेला निष्कर्ष असा कीं वैवाहिक जीवनांत पती-पत्नींची एकमेकांप्रत असलेली कर्तव्यें ही अहेतुकपणाने किंवा स्वैराचाराने ठरवली जात नाहींत, तर ती ख्रिस्त आणि त्याची मंडळी यांची एकमेकांप्रत असलेली अद्वितीय कर्तव्यें यांत मुळावलेली आहेत.

आपल्यांपैकीं जे विवाहित आहेत त्यांनी वारंवार यावर चिंतन करण्याची गरज आहे कीं आपण आपल्या वैवाहिक जीवनातून वैवाहिक संबंधात असलेल्या आपल्यापेक्षा प्रचंड मोठ्या आणि महान अशा अद्भुत दैवीय वास्तविकतेचे प्रतिबिंब दाखवावे असा विशेषाधिकार देव आपल्याला देतो ही गोष्ट किती रहस्यमय आणि आश्चर्यकारक आहे.

हेंच ते ख्रिस्त आणि मंडळी यांचे रहस्यमय नाते आहे जे आमच्यासाठीं प्रीतिच्या नमुन्याचा पाया आहे ज्याविषयी पौल बोलत आहे. प्रत्येक जोडीदाराने आपल्या जोडीदाराच्या आनंदात स्वतःचा आनंद शोधला पाहिजे असे म्हणणें पुरेसे नाहीं. हे खरे आहे. पण ते पुरेसे नाहीं. हे सांगणें देखील तितकेच महत्त्वाचे आहे कीं पती-पत्नींनी आपल्या वैवाहिक जीवनातून जाणीवपूर्वक ख्रिस्त आणि मंडळी यांच्यासाठीं देवानें ठरविलेल्या नातेसंबंधाचे प्रतिबिंब प्रदर्शित केलें पाहिजे. म्हणजेंच, प्रत्येक जोडप्याने ख्रिस्त आणि मंडळीसाठीं देवानें तयार केलेंल्या शुद्ध आणि आनंदी आलेखाच्या विशिष्ट नमुन्यानुसार आपले वैवाहिक जीवन जगण्याचा प्रयत्न केला पाहिजे.

आपण अविवाहित असा अगर विवाहित, वृद्ध असा अगर तरुण, मला आशा आहे कीं तुम्हीं हे गांभीर्याने घ्याल. करार-पाळणारा ख्रिस्त आणि त्याचा करार-पाळणारी मंडळी यांच्या रहस्याचे प्रकटीकरण त्यावर टिकलेले आहे.

20 अक्तूबर : अलौकिक धैर्य

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20 अक्तूबर : अलौकिक धैर्य
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“हे भाइयो, हम तुम्हें समझाते हैं कि जो ठीक चाल नहीं चलते उनको समझाओ, कायरों को ढाढ़स दो, निर्बलों को सम्भालो, सब की ओर सहनशीलता दिखाओ।” 1 थिस्सलुनीकियों 5:14

धैर्य एक महान गुण है। यह एक बड़ी चुनौती भी है!

जब प्रेरित पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को अपनी पहली पत्री समाप्त की, तो उसने अमूल्य सिद्धान्तों की एक शृंखला लिख डाली। प्रत्येक सिद्धान्त माला में लगे एक रत्न की तरह है, एक पवित्र सत्य जिसे हमें अपने जीवन के राह पर चलते हुए अपने गले में धारण करना चाहिए (नीतिवचन 3:3)। इन सिद्धान्तों में सबसे प्रमुख आदेश है धैर्य रखना।

यूनानी भाषा में पौलुस ने ‘makrothumeo’ शब्द का उपयोग किया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “लम्बे दिल वाला” और जिसे पवित्रशास्त्र में आमतौर पर परमेश्वर के चरित्र को व्यक्त करने के लिए उपयोग किया गया है (उदाहरण के लिए, रोमियों 2:4; 2 तीमुथियुस 1:16; याकूब 5:10)। धैर्य का मतलब है उन लोगों के प्रति जल्दी गुस्सा न होना जो असफल होते हैं। पौलुस हमें बताता है कि हमें इस प्रकार का दिव्य धैर्य रखना चाहिए, जब हमारा सामना आलसी, निराश और कमजोर भाइयों-बहनों से होता है। इनका सामना करने से हमें परमेश्वर के धैर्य को अपने जीवन में जीने का अवसर मिलता है।

हम इस तरह का धैर्य कैसे प्राप्त करें? यह स्वाभाविक रूप से नहीं आता! सबसे पहले हमें परमेश्वर को देखना होगा। हमारा परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है, जो “दयालु और अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करने वाला [makrothumeo] और अति करुणामय है” (भजन 103:8)। वह हमारे पापी और विद्रोही दिलों को देखता है और फिर भी हमें माफ कर देता है। वह हमारी बार-बार होने वाली असफलताओं को देखता है और फिर भी हमें त्यागता नहीं है। वह हमारी शंकाओं और चिन्ताओं को देखता है और फिर भी हमारे साथ कोमल रहता है। हमें इस प्रकार के धैर्य को अपने जीवन में दर्शाना है। और इसलिए हमें परमेश्वर से मदद मांगनी होगी। यह अलौकिक धैर्य केवल परमेश्वर ही अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे जीवनों में उत्पन्न कर सकता है।

उदाहरण के लिए, पौलुस ने प्रार्थना की कि कुलुस्से के विश्वासी “उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाएँ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सकें” (कुलुस्सियों 1:11)। हममें से प्रत्येक को कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए जो हमारे लिए यह प्रार्थना करे, और साथ ही हमें स्वयं के लिए भी यह प्रार्थना करनी चाहिए। हममें से प्रत्येक को दूसरों के लिए भी यही करना चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसी प्रार्थना है जिसका उत्तर देने के लिए परमेश्वर तत्पर है। जब परमेश्वर की शक्ति हमारे जीवन में प्रकट होती है, तो हम तब भी सहन कर सकते हैं जब हमें हार मान लेने का मन होता है, और हम तब भी धैर्य दिखा सकते हैं जब भीतर से सब कुछ खो देने जैसा महसूस होता है।

आप दैनिक जीवन की परेशानियों का कैसे जवाब देंगे—जब आप किसी लाइन में खड़े हों, या हरी बत्ती खड़े हों लेकिन आपके सामने वाली कार नहीं चल रही हो? आप उन भाई-बहनों से कैसे पेश आएँगे जो आलसी, निराश, या कमजोर हैं? उन परिस्थितियों में और उन लोगों के साथ आपका बस एक ही नारा होना चाहिए—धैर्य। हो सकता है कि आपके आस-पास के लोग आपके धार्मिक ज्ञान से ज्यादा प्रभावित न हों, लेकिन वे निश्चित रूप से आपकी अधीरता को देखेंगे, जो यह दर्शाता है कि आप दूसरों की तुलना में अपने समय और रुचियों को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन इसके विपरीत, वे आपके धैर्य को भी देखेंगे, जो उन्हें यह बताएगा है कि आप दूसरों की भलाई और उनकी जरूरतों को अपने से ऊपर मानते हैं (फिलिप्पियों 2:3)—ठीक वैसे ही जैसे हमारा स्वर्गिक पिता करता है।

निश्चित रूप से आज आपको ऐसे अवसर मिलेंगे जब आप मानव अधीरता दिखाने के बजाय ईश्वरीय धैर्य दिखा सकें। उन क्षणों में, परमेश्वर के धैर्य की विशालता को पहचानें जो उसने आपके प्रति दिखाया है और आप निश्चित रूप से दूसरों के लिए अपने धैर्य में वृद्धि करेंगे।

कुलुस्सियों  1:9-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 19–21; 2 पतरस 3

20 October : प्रार्थनेचा प्रथम हेतू

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20 October : प्रार्थनेचा प्रथम हेतू
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ह्यास्तव तुम्हीं ह्या प्रकारे प्रार्थना करा :‘हे आमच्या स्वर्गातील पित्या, तुझे नाव पवित्र मानले जावो.” (मत्तय 6:9)

प्रभूनें शिकविलेल्यां प्रार्थनेत, येशूनें शिकवलें कीं प्रार्थना करताना प्रथम प्राधान्य म्हणजें आपल्या स्वर्गीय पित्याला त्याचे नाव पवित्र मानले जावो अशी प्रार्थना करणें : आम्हांमध्यें, मंडळीत, जगात आणि सर्वत्र.

लक्षात घ्या कीं ही एक याचिका आहे, विनंती आहे. ही घोषणा किंवा भव्य स्वागत नाहीं. ही स्तुतीची अभिव्यक्ती नाहीं, तर याचना आहे. वर्षानुवर्षे मी प्रभूच्या प्रार्थनेचे चुकीचे वाचन करत आलेला आहे कीं जणू तिची सुरुवात स्तुतीने होते : “देवाची स्तुती करा, परमेश्वराचे नाव पवित्र, आदरणीय, व पराक्रमी आहे!” पण ती स्तुती नाहीं. ती प्रार्थना आहे. ती देवाला विनवणी आहे कीं त्याचे स्वतःचे नाव पवित्र मानले जात आहे ह्याची त्यानें खात्री करून घ्यावीं.

हे अगदी मत्तय 9:38 मधील एका आणखी शास्त्रलेखाप्रमाणें आहे, जिथे येशू आपल्याला पिकाच्या धन्याने आपल्या कापणीस कामकरी पाठवून द्यावेत म्हणून त्याची प्रार्थना करावयास सांगतो. आपण जे कामकरी आहों त्यां आम्हीं पिकाच्या धन्याला, ज्याला कापणीचे ज्ञान आमच्यापेक्षा जास्त आहे, त्यानें आपल्या कापणीस आणखी कामकरी पाठवून द्यावेत अशी प्रार्थना आपण त्याला करावीं असा बोध आम्हांला करण्यांत यावा ही गोष्ट मला नेहमीच आश्चर्यचकित करून सोडते.

पण इथे प्रभूच्या प्रार्थनेत हीच गोष्ट नाहीं का—येशू आपल्याला सांगत आहे कीं देवाला, जो आपल्या नावाच्या प्रतिष्ठेसाठीं इतका इर्ष्यावान आहे, त्याचे नाव पवित्र मानले जावे याची त्यानें स्वतः खात्री करून घावीं अशी आपण प्रार्थना करावीं, ज्याचा अर्थ आहे प्रतिष्ठित मानलें जावें, आदरणीय मानलें जावें, अति मौल्यवान म्हणून गौरविले जावें?

कदाचित आपल्याला याचे आश्चर्य वाटेल, परंतु ते असेच आहे. आणि यातून आपण दोन गोष्टी शिकतो.

1. पहिली ही कीं प्रार्थना देवाला त्यां गोष्टी करण्यास प्रवृत्त करत नाहीं ज्यां त्याला करायच्या नसतांत, किंवा ज्या करण्यांस तो नाखूष आहे. त्याचे नाव पवित्र मानलें जावें हा त्याचा पावित्राच (अगदी मूळ उद्देश) आहे. देवानें ज्यां ज्यां गोष्टींना प्राधान्य दिलें आहे त्यांत ह्यापेक्षा सर्वप्रथम असें काहीही नाहीं. पण तरीही आपण तशी प्रार्थना करावीं.

2. दुसरी म्हणजें ही कीं प्रार्थना हा देवाचा तो मार्ग आहे ज्याद्वारे तो आपलें प्राधान्य त्याच्या प्रधान्याशी सुसंगत बनवितो. जेव्हा आमच्या प्रार्थना त्याच्या महान उद्देष्ट्याशी सुसंगत परिणाम म्हणून समोर येतांत तेव्हा आपल्या प्रार्थनेने उद्भवणारे परिणाम याद्वारे महान गोष्टी घडवून आणाव्यात ही देवाची इच्छा आहे.

आपले नांव पवित्र मानले जावें अशी जी देवाची ईर्ष्या आहे त्याशी तुमचे अंतःकरण सुसंगत करा म्हणजें तुमच्या प्रार्थना मोठ्या परिणामकारक ठरतील. तुमची पहिली आणि खात्रीदायक प्रार्थना देवाचे नांव पवित्र मानलें जावें यासाठींच असू द्या म्हणजें तुमच्या प्रार्थना त्याला त्याच्या नावासाठीं असलेल्या सामर्थ्यवान ईर्षेबरोबर सुसंगत होतील.

19 अक्तूबर : चुप्पी और दुख

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19 अक्तूबर : चुप्पी और दुख
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“अय्यूब के इन तीन मित्रों ने इस सब विपत्ति का समाचार पाया जो उस पर पड़ी थीं। तब वे . . . अपने-अपने यहाँ से उसके पास चले . . . वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु . . . किसी ने उससे एक भी बात न कही . . . तब तेमानी एलीपज ने कहा, ‘यदि कोई तुझसे कुछ कहने लगे, तो क्या तुझे बुरा लगेगा? परन्तु बोले बिना कौन रह सकता है?” अय्यूब 2:11, 13; 4:1-2

अय्यूब के दोस्तों ने हमें यह दिखाया कि जब कोई व्यक्ति गहरे दर्द और शोक से गुजर रहा हो, तो हमें कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए—और फिर उन्होंने यह भी दिखाया कि हमें क्या नहीं करना चाहिए।

अय्यूब के दोस्तों को उसके दुखों का साक्षी बनने का अवसर मिला था, और वे उसे अपने शब्दों से कोई सान्त्वना नहीं दे पाए थे। उनका अन्तिम प्रत्युत्तर पूरी तरह से शाब्दिक था और बहुत अप्रभावी था।

यदि हमें सामने वाले व्यक्ति के जैसा अनुभव नहीं हुआ है या हमने उसे अच्छे से सुनने और परमेश्वर से विनम्रता से प्रार्थना करने में समय नहीं बिताया है, तो दुख भोग रहे उस व्यक्ति के बारे में टिप्पणी करना या उसे सलाह देना बहुत खतरनाक हो सकता है। अय्यूब 16 में इन दोस्तों को “मूर्खता भरी सान्त्वना देने वाले” कहा गया है—जो अय्यूब के खिलाफ “बातें जोड़ सकते थे” और जिनके शब्दों का अन्त नहीं था (16:4)। अय्यूब के दुख का तुरन्त इलाज और त्वरित उत्तर पाने की कोशिश करते हुए उसके दोस्तों ने उस पर आरोपों की बौछार कर दी। विशेष रूप से सोपर ने अय्यूब को यह याद दिलाया कि उसके साथ इस समय जो कुछ हुआ था, वास्तव में उसके साथ इससे भी बुरा होना चाहिए था (अय्यूब 11:4-6)।

इसी प्रकार, एलीपज ने यह सुझाव दिया कि शायद अय्यूब परमेश्वर से भटक गया था और उसे परमेश्वर से अधिक सावधानी से सुनने की आवश्यकता थी (22:21-23)। इन पुरुषों ने अय्यूब के दुख के लिए एक अत्यधिक सरल दृष्टिकोण अपनाया—एक ऐसा दृष्टिकोण जो उपचार करने के बजाय और भी पीड़ादायी था। वे अय्यूब के प्रत्येक विलाप का उत्तर देने के लिए तत्पर थे। जब एलीपज ने पहली बात बोली और पूछा, “बोले बिना कौन रह सकता है?” तो उसे स्वयं को यह उत्तर देना चाहिए था, “मैं!”

अय्यूब ने उनके परामर्श के तरीके पर तीखा प्रहार किया: “तुम लोग झूठी बात के गढ़ने वाले हो; तुम सबके सब निकम्मे वैद्य हो। भला होता कि तुम बिलकुल चुप रहते, और इससे तुम बुद्धिमान ठहरते!” (अय्यूब 13:4-5)। और वास्तव में, उसके दोस्तों ने आरम्भ में ठीक यही किया था। वे एक सप्ताह तक बिना कुछ बोले उसके पास बैठे रहे थे।

दुख के अनुभव में, पीड़ित के सामने मौन रहना अक्सर बहुत शब्दों से कहीं अधिक सहायक होता है। यह पूरी सम्भावना है कि यदि उसके दोस्त अपनी प्रारम्भिक प्रतिक्रिया बनाए रखते—उसके पास चुपचाप बैठे रहते—तो अय्यूब को अधिक आराम और साथ मिल सकता था।

मौन अक्सर हमारे दुखों के प्रति प्रतिक्रिया में गायब रहने वाला तत्व होता है। जबकि यह निश्चित रूप से एकमात्र आवश्यक प्रतिक्रिया नहीं है, तौभी इसके महत्त्व को बहुत कम आंका जाता है। यदि हम बिना किसी उद्देश्य के अपने चारों ओर के शोर से अलग हो जाएँ और पीड़ितों की आवाज़ों को सुनने का प्रयास करें, तो हम मौन चिन्तन में इतनी अधिक प्रगति कर सकते हैं, जितनी हमने कल्पना भी नहीं की होगी। और तब हमारे पास कहने के लिए बहुत अधिक उपयोगी बातें हो सकती हैं, और हमें पता होगा कि हमें क्या कहना है और कैसे कहना है। अय्यूब निश्चित रूप से ऐसा ही सोचता था। क्या इस सप्ताह कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आप अपनी शान्त उपस्थिति से आशीषित कर सकते हैं?

भजन 42 – 43

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 17–18; 2 पतरस 2 ◊

19 October : प्रितीचा महान आनंद

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19 October : प्रितीचा महान आनंद
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कोणी कधी आपल्या देहाचा द्वेष केलेंला नाहीं; तर तो त्याचे पालनपोषण करतो; जसे ख्रिस्तही मंडळीचे पालनपोषण करतो तसे तो करतो, कारण आपण ख्रिस्ताच्या शरीराचे अवयव आहोत. (इफिस 5:29-30)

ती शेवटची अभिव्यक्ती चुकवू नका : “कारण आपण ख्रिस्ताच्या शरीराचे अवयव आहोत.” आणि पौलाने अगदी दोन वचनांपूर्वी जे म्हटलें ते विसरू नका, ते हे कीं ख्रिस्तानें स्वतःस आपल्यासाठीं समर्पण केलें, अशासाठीं कीं “गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी.” अशाप्रकारे पौल ही गोष्ट दोन वेगवेगळ्या पद्धतीने मांडून हे स्पष्ट करतो कीं ख्रिस्तानें आपल्या लोकांना पवित्र करून, त्यांना सुशोभित करून व त्यांना आपला आनंद देऊन स्व:ताचा आनंद साध्य केला आहें.

ख्रिस्त आणि त्याची वधू यांच्यातील नाते इतके घनिष्ठ आहे (“एकदेह”) कीं तो जे काहीं चांगले तिच्यासाठीं करतो ते जणू त्यानें स्वतःसाठीं केलेंले सत्कर्म ठरते. याचा अर्थ असा कीं, परमेश्वर आपल्या वधूचे पालनपोषण, भरण-पुरण, पवित्रीकरण आणि शुद्धीकरण करण्यास प्रवृत्त होतो ते यासाठीं कारण यातच त्याचा आनंद आहे असेच हा शास्त्रपाठ स्पष्टपणें अभिव्यक्त करत आहे.

आपण जर काहीं लोकांच्या व्याख्यांवर दृष्टि टाकली, तर त्यांच्यामते ही प्रीति असू शकत नाहीं. ते म्हणतांत, प्रीति ही स्वार्थ शोधापासून मुक्त असली पाहिजे – विशेषतः जशी प्रीति ख्रिस्तानें केलीं ती, विशेषत: कॅल्व्हरी वर प्रकट झालेंलीं प्रीति. प्रीतिची अशी व्याख्या जी पवित्र शास्त्राच्या या पाठाबरोबर सुसंगत होईल, मी कधीही पाहिली नाहीं.

तरीही ख्रिस्त आपल्या वधूसाठीं जे करतो, ती प्रीति आहे असे हा शास्त्रपाठ स्पष्टपणें उघड करतो : “पतींनो, जशी ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा. . . (इफिस 5:25). प्रीतिची व्याख्या नीतीशास्त्र किंवा तत्त्वज्ञान यांच्या मदतीने करण्याऐवजी आपण ह्या शास्त्रपाठालाच प्रीतिची व्याख्या करूं दिलीं तर? या शास्त्रपाठानुसार, प्रीति म्हणजें आपल्या प्रेयसीच्या पवित्र आनंदातच ख्रिस्ताचा आनंदाचा शोध (म्हणजें ख्रिस्त त्याच्या वधूच्या शुद्धीकरणात आपला आनंद शोधतो).

तर मग, आत्मकेंद्रीत आनंद आपण प्रीतिपासून विभक्त करावा याचा कोणताही मार्ग नाहीं, कारण आत्मकेंद्रीत आनंद आणि स्वार्थ या दोन्हीं गोष्टीं वेगवेगळ्या आहें. स्वार्थ हा इतरांना तरवारीच्या धारेवर धरून स्वतःचा खाजगी आनंद शोधतो.

ख्रिस्ताच्या प्रीतिसारखी प्रीति ही इतरांच्या आनंदात आपला आनंद शोधते – त्यांना तरवारीच्या धारेवर धरून नाहीं. ही अशी प्रीति आहे जी आपल्या प्रेयसीच्या जीवनात आणि पवित्रतेमध्यें तिचा आनंद पूर्ण व्हावा म्हणून आपल्या प्रियकरासाठीं दुःख सहन करेल आणि मरणही सोसेल.

ख्रिस्ताने आम्हांवर अशीच प्रीति केलीं आणि आपणही एकमेकांवर अशीच प्रीति करावीं यासाठीं त्यानें आपल्याला पाचारण केलें आहें.

18 अक्तूबर : काम के लिए तैयारी

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18 अक्तूबर : काम के लिए तैयारी
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“इस कारण अपनी-अपनी बुद्धि की कमर बाँधकर, और सचेत रहकर, उस अनुग्रह की पूरी आशा रखो जो यीशु मसीह के प्रगट होने के समय तुम्हें मिलने वाला है।” 1 पतरस 1:13

पायलट बनने के प्रशिक्षण में घण्टों और कई घण्टों की कड़ी तैयारी की आवश्यकता होती है। इसमें से कुछ प्रशिक्षण सिमुलेटर्स में होता है, जहाँ दबाव इतना तीव्र होता है कि पसीना और तनाव उत्पन्न हो जाता है। पायलटों को ऐसा कठिन प्रशिक्षण क्यों दिया जाता है? ताकि वे तब सही निर्णय ले सकें, जब सच में वह जरूरी हो!

शुद्धता के सन्दर्भ में अक्सर ऐसा होता है कि लोग पाप में इसलिए फँस जाते हैं क्योंकि वे क्षणिक भावनाओं के प्रभाव में महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने की कोशिश करते हैं। इससे काम नहीं बनेगा। यदि हमें शुद्धता बनाए रखनी है, तो हमें पहले से और परमेश्वर के वचन के आधार पर निर्णय लेने होंगे।

इसीलिए पतरस हमें “अपनी-अपनी बुद्धि की कमर बाँधकर, और सचेत रहकर” तैयार रहने को कहता है। किंग जेम्स संस्करण में इस पद का अनुवाद इस प्रकार किया गया है: “अपने मन की कमर कस लो।” दूसरे शब्दों में, हमें अपने मन पर नियन्त्रण रखना है—अपने विचारों की प्रक्रिया को समझना है—ताकि हम अच्छाई का पीछा कर सकें और बुराई से दूर भाग सकें।

यदि हम अपनी बुद्धि की कमर बाँधकर सचेत नहीं रहते, तो हम आसानी से बहक सकते हैं और दुर्घटनाओं के शिकार हो सकते हैं। हम आमतौर पर कठिन और जीवन बदलने वाले निर्णयों को उस गरम माहौल में लेंगे, जब हमारी भावनाएँ सक्रिय होंगी और हमारी इच्छाएँ हमें चिल्लाकर बुला रही होंगी। लेकिन शुद्धता का जीवन आकस्मिक नहीं होता; यह परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित पूर्ण संकल्प का कार्य होता है, जो उसके वचन द्वारा मार्गदर्शन पाता है और उसकी शक्ति से सक्षम होता है।

हमें शुद्धता के प्रति एक दृढ़ संकल्प करने की आवश्यकता है, जैसे भजनकार ने कहा, “मैं ने शपथ खाई, और ठान लिया है, कि मैं तेरे धर्ममय नियमों के अनुसार चलूँगा” (भजन 119:106)। बहुत देर होने से पहले अपना संकल्प कर लें।

एक सुझाव इस प्रकार है कि किस प्रकार का संकल्प लिया जाना चाहिए: संकल्प करें कि आप संकीर्ण मार्ग के मध्य में चलेंगे, किनारे पर नहीं। नीतिवचन 7 में उस युवक की तरह न बनें जो “पराई स्त्री” के प्रलोभन का शिकार हुआ था। वह किनारे पर चल रहा था; वह “उस स्त्री के घर के कोने के पास की सड़क पर चला जाता था, और उसने उसके घर का मार्ग लिया” (नीतिवचन 7:5, 8-9)। बाइबल का सन्देश स्पष्ट है: गलत समय और गलत स्थान पर न फँसे।

शुद्धता के मामले में किनारे पर रहने से कुछ हासिल नहीं होता। प्रलोभन आने से पहले अपना संकल्प कर लें, ताकि जब बुरे दिन आएँ, तो आप कह सकें, “नहीं, मैंने पहले ही यह निर्णय ले लिया था।” अपने जीवन को संकीर्ण मार्ग के मध्य में रखें और वहाँ बने रहने का संकल्प लें। जिस दिन मसीह यीशु लौटेगा और उसके लोग उसके सिंहासन के चारों ओर खड़े होंगे, हममें से कोई नहीं कहेगा कि पवित्रता के मार्ग पर चलना निरर्थक था।

नीतिवचन 7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 15–16; 2 पतरस 1

18 October : विवाहाचा येशूचा आनंद

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पतींनो, जशी ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें, अशासाठीं कीं, तिला त्यानें वचनाद्वारे जलस्नानाने स्वच्छ करून पवित्र करावे, आणि गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी, म्हणजें तिला डाग, सुरकुती किंवा अशासारखे काही नसून ती पवित्र व निर्दोष असावी. (इफिस 5:25-27)

वैवाहिक जीवनात इतकीं दुःखें येतांत ते ह्यामुळें नाहीं कीं पती-पत्नी आपापल्या सुखाच्या शोधांत असतांत, तर ती ह्यामुळें कीं ते आपलें सुख आपल्या जोडीदाराच्या सुखामध्यें शोधत नाहींत. पती-पत्नींना बायबलची आज्ञा ही आहे कीं तुम्हीं तुमच्या जोडीदाराच्या आनंदातच तुमचा स्वतःचा आनंद शोधावा.

इफिस 5:25-30 मध्यें वैवाहिक जीवनाविषयी जो शास्त्रपाठ आहे त्यापेक्षा बायबलमध्यें इतरत्र क्वचितच अशा पूर्णानंदाला संबोधित करणारा शास्त्रपाठ असेल. जशी ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं तशी पतींनीही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करावी असे त्यांना येथें सांगण्यांत आलें आहें.

त्यानें मंडळीवर कशी प्रीति केलीं? वचन 25 म्हणते कीं त्यानें “स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें.” पण का? वचन 26 म्हणते, “अशासाठीं कीं, तिला त्यानें वचनाद्वारे जलस्नानाने स्वच्छ करून पवित्र करावे.” पण त्याला असं का करावें लागलें? वचन 27 उत्तर देते, “गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी!”

आहाहा! येथें मूळ आहे! “जो आनंद त्याच्यापुढे होता त्याकरता त्यानें लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला” (इब्री 12:2). कसला आनंद? मंडळी, जी त्याची वधू आहे, तिजबरोबर विवाहाचा आनंद. रक्ताने विकत घेतलेली गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी हा आनंद.

डाग, सुरकुती किंवा अशासारखे काही असलेली पत्नी स्वतःला सादर करावी असा येशूचा हेतू नव्हतां. म्हणून, तो आपल्या विवाहितेला पवित्र करण्यासाठीं आणि शुद्ध करण्यासाठीं मरण पत्करण्यास तयार झाला जेणेंकरून तो गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करू शकेल. त्यानें आपल्या वधूच्या कल्याणासाठीं दुःख सोसून व स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण करून आपला मनोरथ पूर्ण केला.

मग पौल ख्रिस्ताने जे केलें ते 28-30 या वचनांमध्यें पतींवर लागू करतो: “त्याचप्रमाणें पतींनी आपापली पत्नी आपलेच शरीर आहे असे समजून तिच्यावर प्रीति करावी. जो आपल्या पत्नीवर प्रीति करतो तो स्वतःवरच प्रीति करतो. कोणी कधी आपल्या देहाचा द्वेष केलेंला नाहीं; तर तो त्याचे पालनपोषण करतो; जसे ख्रिस्तही मंडळीचे पालनपोषण करतो तसे तो करतो. कारण आपण ख्रिस्ताच्या शरीराचे अवयव, [त्याच्या हाडामांसाचे] आहोत.”

येशूनें पती-पत्नींना – आणि इतर सर्वांना – “जशी आपणावर तशी आपल्या शेजाऱ्यावर प्रीति कर” असे म्हटलें होते (मत्तय 22:39). वैवाहिक जीवन ही आज्ञा पाळण्याचे अद्भुत स्थान आहे. ही आज्ञा फक्त असे म्हणत नाहीं कीं “जेव्हां” तुम्हीं स्वतःवर प्रीति करतां. तर तुम्हीं स्वतःवर प्रीति करतच आहात. जेव्हा तुम्हीं त्या व्यक्तीवर प्रीति करता जिच्याशी देवानें तुम्हाला एक-देह बनवले आहे, तेव्हा तुम्हीं स्वतःवर प्रीति करता. म्हणजेंच, तुम्हीं तुमच्या जोडीदाराच्या सर्वात मोठ्या आनंदाच्या शोध घेऊनच तुमचा सर्वात मोठा आनंद प्राप्त करून घेतां.

17 अक्तूबर : हमारा धैर्यवान शिक्षक

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“पर यह बात उन की समझ में नहीं आई, और वे उससे पूछने से डरते थे।” मरकुस 9:32

कल्पना कीजिए एक छात्रा कक्षा में बैठी हुई है, बोर्ड पर लिखे एक सूत्र को घूर रही है। उस सूत्र के चिह्न उसके लिए पूरी तरह से अर्थहीन हैं, लेकिन वह समझने के उद्देश्य से प्रश्न पूछने के लिए हाथ उठाने से डर रही है। हममें से कई लोगों ने शायद ऐसा अनुभव किया होगा या ऐसी किसी स्थिति में फँस गए होंगे, जहाँ एक ओर हमें यह डर था कि कहीं हम मूर्ख न समझे जाएँ या उत्तर हमें ऐसी दिशा में न ले जाए जहाँ हम नहीं जाना चाहते, और दूसरी ओर हम यह जानने थे कि यदि हमने नहीं पूछा, तो हम इस उलझन में फँसे रहेंगे।

यद्यपि यीशु के शिष्य यीशु के साथ रहते थे, उसके उपदेश सुनते थे, उसकी शिक्षाएँ ग्रहण करते थे, और उसके अद्‌भुत कार्यों के साक्षी बनते थे, फिर भी वे उसके सेवाकार्य की पूरी तस्वीर को समझने में संघर्ष करते रहे। यीशु ने कई बार बहुत स्पष्ट रूप से बताया कि उसके साथ क्या होने वाला था—उससे विश्वासघात, मृत्यु, और पुनरुत्थान। फिर भी शिष्य सबसे कठिन स्थिति में थे: “वे इस बात को समझ न सके और उससे पूछने से डरते थे।”

पतरस, याकूब, और यूहन्ना ने अभी-अभी यीशु का रूपान्तरण देखा था (मरकुस 9:2-8)। वे जानते थे कि वह परमेश्वर का पुत्र है। फिर भी शिष्यों में यीशु को मसीह मानने की जो गम्भीरता थी, वह इस समझ से मेल नहीं खाती थी कि वास्तव में उसके मसीह होने का क्या अर्थ था। मसीह के प्रति उनकी धारणा धुंधली और अधूरी थी, जिससे उनके भीतर भ्रम और भय उत्पन्न हुआ। शायद उन्होंने यीशु से और स्पष्टीकरण इसलिए नहीं माँगा क्योंकि वे अपनी अज्ञानता को स्वीकार नहीं करना चाहते थे; या फिर इसलिए, क्योंकि वे उन बातों के परिणामों का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे, जो यीशु उन्हें बता रहा था—न तो उसके स्वयं के लिए (पद 30-31) और न ही उनके लिए (8:34-35)।

यहाँ तक कि यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के बाद भी इम्माऊस के मार्ग पर दो शिष्यों को यीशु ने पूरी बाइबल के घटनाक्रमों के द्वारा फिर से सब कुछ समझाया ताकि वे उसके दुखों को समझ जाते और इन बातों का अर्थ समझ पाते (लूका 24:26-27)। यीशु के स्वर्गारोहण के ठीक पहले तक भी शिष्य मसीह के राज्य के स्वरूप को लेकर असमंजस में थे। इस बार उन्होंने यीशु से प्रश्न पूछा और यीशु ने उन्हें यह नहीं कहा, फिर वही सवाल? “तुम एक ही सवाल कितनी बार पूछोगे?” बल्कि उसने नम्रता और कृपा से समझाया कि उसका राज्य यरूशलेम के मन्दिर की पुनः स्थापना से नहीं आएगा, बल्कि प्रत्येक शिष्य में होने वाले पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा फैलेगा (प्रेरितों 1:8)।

शायद आप स्वयं को भी इन शिष्यों के स्थान पर पाते हैं, जहाँ परमेश्वर के वचन को पूरी तरह समझना आपको कठिन लग रहा है, या आपने जो थोड़ा सा समझा है, उसके निहितार्थों से आपको डर लग रहा है। लेकिन यह डर का विषय नहीं है। यह कितना अच्छा है कि यीशु एक कोमल और धैर्यवान शिक्षक है—जैसे वह अपने शिष्यों के साथ धैर्य रखता था, वैसे ही वह हमारे साथ भी धैर्य रखता है। और यह भी कितनी अच्छी बात है कि पवित्र आत्मा आपके भीतर निवास करता है और आपको वही सब करने का सामर्थ्य देता है जिसके लिए प्रभु ने आपको बुलाया है (यहेजकेल 36:26-27; गलातियों 5:16)। इसलिए आज यदि आपको बुद्धि और समझ की कमी महसूस हो रही हो, तो बस परमेश्वर से माँगें—“जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है” (याकूब 1:5)।

1 कुरिन्थियों 2:1-16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 13–14; इफिसियों 6 ◊

17 October : संपत्तीचा उद्देश

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चोरी करणार्‍याने पुन्हा चोरी करू नये; तर त्यापेक्षा गरजवंताला देण्यास आपल्याजवळ काही असावे म्हणून जे चांगले ते आपल्या हातांनी करून उद्योग करत राहावे. (इफिस 4:28)

भौतिक वस्तुं मिळवून समृद्धीत कसे जगायचे याचे तीन विकल्प आहेत : (1) तुम्हीं त्यां भौतिक वस्तुं मिळविण्यासाठीं चोरी करूं शकतां; (2) किंवा तुम्हीं त्यां मिळविण्यासाठीं आपल्या हातांनी काहीं कष्ट करूं शकतां; (3) किंवा गरजवंताला देण्यास आपल्याजवळ काहीं असावे म्हणून  तुम्हीं उद्योग करूं शकतां.

ख्रिस्ती विश्वासाचा अंगीकार करणारे बरेंच लोक दुसऱ्या क्रमांकाचा विकल्प घेऊन आपापलें जीवन जगतांत. आम्हांला चोरी करण्यापेक्षा किंवा उसने पैसे मागत भिकाऱ्याचे जीवन जगण्यापेक्षा स्वतः कष्ट करायला आवडते आणि आपण चोरी केलीं नाहीं व कोणाकडून उसने पैसे घेतलें नाहीं आणि प्रामाणिकपणें दिवसाचा सदुपयोग केला असा विचार करून आपल्याला काहींतरी कर्तव्यतत्पर कृती केल्याची भावना जाणवते. असे वाटणें म्हणजें काही वाईट गोष्ट नाहीं. आपल्या हातांनी काहीं उद्योग करणें हे चोरी करण्यापेक्षा किंवा “उधार कीं ज़िन्दगी” जगण्यापेक्षा कधीही चांगलेच आहे. पण प्रेषित आपल्याला हे असे स्वतःपुरते जीवन जगण्याचे आव्हान करित नाहींये.

मानव संस्कृतीतील जवळजवळ सर्वच बळें आपल्याला वरील तीनपैकीं दोन स्तरावर जीवन जगण्याचे आव्हान करतांत : मिळकतीसाठीं आपल्या हातांनी काहीं उद्योग करा. परंतु बायबल आपल्याला सातत्यानें तिसऱ्या स्तरावर आणून सोडते : गरजवंतांना देण्यास आपल्याजवळ काही असावें म्हणून उद्योग करणें. “सर्व प्रकारची कृपा तुमच्यावर विपुल होऊ देण्यास देव समर्थ आहे; ह्यासाठीं कीं, तुम्हांला सर्व गोष्टींत सगळा पुरवठा नेहमी होऊन प्रत्येक चांगल्या कामासाठीं सर्वकाही तुमच्याजवळ विपुल व्हावे” (2 करिंथ 9:8).

देव आपल्याला सर्व गोष्टींचा विपुल पुरवठा का करतो? यासाठीं कीं आपल्या उपजीविकेसाठीं आपल्याकडे पुरेसे असावें, आणि त्या नंतर उर्वरित सर्व प्रकारच्या चांगल्या कामांसाठीं आपण देण्यांस समर्थ व्हावें, जेणेंकरून आध्यात्मिक आणि शारीरिक दुःख दूर होतील – म्हणजें क्षणिक आणि सार्वकालिक दु:खे. आमच्यासाठीं पुरेसे; इतरांसाठीं विपुल.

मुद्दा हा नाहीं कीं एखादी व्यक्ती किती कमावते. मोठ-मोठे उद्योग आणि भरपूर पगार हे आपल्या काळातील सत्य आहे आणि हे वाईटच आहेत असे नाहीं. वाईट आहे ते हा विचार करून स्वतःची फसवणूक करणें कीं आपल्याला इतका मोठा पगार मिळावा कीं आपण एक आलिशान जीवनशैली जगूं शकूं.

आपण देवाची कृपा इतरांपर्यंत वाहवत न्यावीं म्हणून देवानें आपल्याला त्याच्या कृपेच्या नलिका बनवलें आहे. पण नलिका ह्या सोन्याने मढलेल्यां असाव्यांत असा विचार करणें दुर्दैवच. नाहीं, त्यां सोन्याने मढलेल्यां नसाव्यांत. साधे पीव्हीसी (पॉलीविनाइल क्लोराईड) पाईप पुरे आहेंत.  पीव्हीसी पाईप टिकाऊपणा आणि अष्टपैलूपणामुळें इतरांना विपुल पुरवठा करूं शकतात. आणि आनंद देणारा विपुल आशीर्वाद हा आपण कसे देतो ह्यांत आहे (प्रेषित 20:35).