“फिर अपने परमेश्वर यहोवा की सुनने के कारण ये सब आशीर्वाद तुझ पर पूरे होंगे … परन्तु यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की बात न सुने, और उसकी सारी आज्ञाओं और विधियों के पालने में जो मैं आज सुनाता हूँ चौकसी नहीं करेगा, तो ये सब शाप तुझ पर आ पड़ेंगे।” व्यवस्थाविवरण 28:2, 15
मोआब के मैदानों में यरदन नदी के किनारे इस्राएली लोग अन्ततः उस देश में प्रवेश करने पर थे, जिसे परमेश्वर ने उन्हें देने की प्रतिज्ञा की थी। मूसा ने लोगों को अन्तिम बार सम्बोधित किया, यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हुए कि वे पिछली पीढ़ी की तरह अवज्ञा करके परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को खराब न करें। उसने उन्हें स्मरण कराया कि परमेश्वर ने अतीत में क्या कहा और क्या किया, और उसने उन्हें परमेश्वर के महान हस्तक्षेप के और वाचा निभाने वाली विश्वासयोग्यता के आधार पर परमेश्वर के लिए एक अलग किए हुए लोग बने रहने का आग्रह किया।
मूसा की शिक्षाओं के माध्यम से परमेश्वर ने अपने लोगों के सामने दो स्पष्ट विकल्प रखे—और अपेक्षाएँ बहुत ऊँची थीं। उसने उन्हें आशीर्वाद की एक प्रतिज्ञा दी और फिर एक चेतावनी दी। उसने उनसे एक सरल प्रश्न किया: वे कैसा जीवन जीने वाले हैं? क्या वे वाचा का पालन करेंगे और देश में आशीर्वादों का आनन्द लेंगे, या वे अवज्ञा करेंगे और उस देश से निकाल दिए जाएँगे?
जो लोग उस देश की सीमा पर एकत्रित हुए थे, उन्होंने शायद परमेश्वर के वचनों को सुनकर कहा होगा, अरे नहीं, ऐसी अवज्ञा तो हमसे कभी नहीं होगी! लेकिन कुछ सौ वर्षों के बाद हम उन्हें कहाँ पाते हैं? “बेबीलोन की नहरों के किनारे हम लोग बैठ गए, और सिय्योन को स्मरण करके रो पड़े . . . हम यहोवा के गीत को, पराए देश में कैसे गाएँ?” (भजन 137:1, 4)। विदेशी लोगों के बन्दी बनकर इस्राएली पीछे मुड़कर देखते हैं और सोचते हैं कि वे इस दशा तक कैसे पहुँच गए।
एक पतित संसार में जीते हुए प्राणी के रूप में आप और मैं बहुत ही असुरक्षित, प्रलोभन के खतरे में, और बार-बार परीक्षा में पड़ने के खतरे में बने रहते हैं। हम अवज्ञा से और परमेश्वर से दूर हो जाने से केवल एक निर्णय की दूरी पर होते हैं। हमें परमेश्वर की सहायक कृपा की अत्यन्त आवश्यकता है। दुख की बात यह है कि बहुत से लोग जो कभी समर्पित, प्रतिबद्ध और प्रतिज्ञा किए हुए देश की ओर बढ़ते प्रतीत होते थे, वे सिर्फ लड़खड़ाए नहीं, बल्कि अविश्वास में गिर पड़े। और हमारी सबसे बड़ी गलती यह सोच है, “अरे नहीं, यह तो मेरे साथ कभी नहीं होगा!”
दुष्ट एक झूठ फैलाना पसन्द करता है—कि परमेश्वर ने हमें अपना व्यवस्था-विधान और आज्ञाएँ इसलिए दी हैं ताकि वह हमारे जीवन को फीका बना दे, हमें आनन्द से वंचित कर दे, और हमारे दिन दुखों और पीड़ाओं से भर दे। यह सब झूठों में सबसे बड़ा झूठ है। परमेश्वर ने अपना वचन हमारे भले के लिए दिया है! पवित्रशास्त्र की सभी चेतावनियाँ इसलिए दी गई हैं कि जब हम विनाश के कगार पर खड़े हों तो हमें चेताएँ और हमें नियन्त्रण में रखें; पवित्रशास्त्र की सभी प्रतिज्ञाएँ इसलिए दी गई हैं कि जब हम भयभीत और अनिश्चित हों तो हमें सम्भालें; और पवित्रशास्त्र की सभी आज्ञाएँ इसलिए दी गई हैं कि हमें परमेश्वर के संसार में, परमेश्वर की उपस्थिति में, परमेश्वर की आशिषों से भरे जीवन में ले जाएँ। हमारी भलाई के लिए उसकी प्रतिबद्धता सबसे पूर्ण रूप से उसके पुत्र में प्रकट होती है, जो हमारी अवज्ञा के शाप को सहने के लिए आया, ताकि हम वह आशीष पा सकें जो केवल वही पाने के योग्य था।
क्या आप परमेश्वर से प्रेम करते हैं? क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर आपसे प्रेम करता है? तो फिर उसकी चेतावनियों पर ध्यान दें, उसकी आज्ञाओं का पालन करें, और उसकी प्रतिज्ञाओं की सान्त्वनाओं को संजो कर रखें।
गलातियों 3:10-14
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 19–21; लूका 2:22-52