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12 अक्तूबर : अच्छे कामों के लिए बनाए गए

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“हमारे लोग भी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अच्छे कामों में लगे रहना सीखें ताकि निष्फल न रहें।” तीतुस 3:14

आप यहाँ संयोग से नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा से हैं। आपने अपने आप को नहीं बनाया, और न ही आपने अपनी सृष्टि में कोई भाग लिया। आपको आपकी माता के गर्भ में बारीकी से बुना गया है (भजन 139:13)। परमेश्वर के हाथ ने आपको उस व्यक्ति के रूप में आकार दिया जो आप हैं; उसने आपको उसी क्षण बनाया जब उसने चाहा, और उसने आपको इतिहास के इस बिन्दु पर इसलिए रखा ताकि आप, मसीह में, अनुग्रह के द्वारा, विश्वास के माध्यम से, अच्छे काम कर सकें—वे अच्छे काम जो उसने आपके लिए निर्धारित किए हैं (इफिसियों 2:10)।

दूसरे शब्दों में, आपको अच्छे कार्यों करने के लिए ही अनुग्रह पर अनुग्रह प्राप्त हुआ है।

हालाँकि जब हम परमेश्वर के परिवर्तनकारी अनुग्रह के हमारे ऊपर प्रभाव पर विचार करते हैं, तो “अच्छे कामों को करने” का विचार आपके मन में प्राथमिकता न रखता हो, तौभी शायद यह प्रेरित पौलुस की सूची में लगभग पहले स्थान पर था। तीतुस को अपनी चिट्ठी में वह लिखता है कि परमेश्वर ने यीशु में “अपने आप को हमारे लिए दे दिया कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और शुद्ध करके अपने लिए एक ऐसी जाति बना ले जो भले–भले कामों में सरगर्म हो” (तीतुस 2:14, विशेष जोर दिया गया है)। यह जोर इस चिट्ठी में कई बार आता है, और पौलुस के समापन उपदेश में इस प्रकार निष्कर्ष पर पहुँचता है: “हमारे लोग भी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अच्छे कामों में लगे रहना सीखें।”

पौलुस का अच्छे कामों के प्रति विशेष उत्साह उसके और हमारे दोनों युगों में पूरी तरह से संस्कृति के विपरीत था। हम एक ऐसे संसार में जीते हैं, जहाँ स्वार्थी जीवन जीने के आकर्षण भरे पड़ें हैं। तो फिर हम पौलुस की नकल कैसे करें और अच्छे कार्यों में आगे कैसे बढ़ें?

सबसे पहले, हमें यह स्पष्ट करना होगा कि हमारे अच्छे कार्य परमेश्वर की कृपा को अर्जित नहीं करते। हम अच्छे कार्य इसलिए नहीं करते कि हम बचाए जाएँ, बल्कि हम अच्छे कार्य इसलिए करते हैं क्योंकि हम बचाए गए हैं। बिना अनुग्रह के आधार के सद्‌गुणी जीवन का बुलावा केवल बाहरी आचरण बनाएगा और यह या तो हमें थका देगा या हमें अहंकारी बना देगा। दूसरे, हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे अच्छे कार्य परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं और हम “मनुष्यों को नहीं, परन्तु परमेश्वर को, जो हमारे मनों को जाँचता है, प्रसन्न करते हैं” (1 थिस्सलुनीकियों 2:4)। इसलिए हमें परमेश्वर की आदर देने वाली, मसीह की महिमा करने वाली अच्छाई से भरे रहना चाहिए, जो हमारे महान उद्धार का जीवित प्रमाण है।

पौलुस कहता है कि अच्छे कार्य करने की हमारी क्षमता एक सीखी हुई आदत है। हमें कहा गया है कि हम “अच्छे कामों में लगे रहना सीखें।” हमारे कार्य केवल भावनात्मक उथल-पुथल का परिणाम नहीं होने चाहिएँ, या केवल तब होने चाहिएँ जब इन्हें करने का हमारा मन हो। इसके बजाय, हमें हर दिन इस उद्देश्य से प्रयास करना चाहिए कि हम वह राजकीय कार्य करें जो परमेश्वर ने हममें से प्रत्येक के लिए निर्धारित किया है, और इसे सोच-समझकर और आदतन करें। और हमें उन लोगों को देखना चाहिए जो अपने विश्वास की यात्रा में आगे बढ़ गए हैं और जो इस प्रकार का जीवन जीते हैं, और उनसे सीखने का प्रयास करना चाहिए।

मसीह में, आपके सभी दिन और आपके सभी कार्य किसी व्यक्ति के लिए और किसी बात के लिए अच्छे हो सकते हैं। हर दिन परमेश्वर से यह मांगने की आदत डालें कि आपको मिले अनुग्रह के प्रत्युत्तर के रूप में वह दूसरों के लिए अच्छे कार्य करने में आपकी सहायता करे, यह विश्वास करते हुए कि वह आपको अपने विश्वास के प्रमाण के रूप में अपने कार्यों को दिखाने के लिए अनुग्रह से सक्षम करेगा।

याकूब 1:27 – 2:13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: श्रेष्ठगीत 6– 8; इफिसियों 2

12 October : आपल्या हातून देवाची सेवा होते या मानसिकतेपासून सावध असां

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12 October : आपल्या हातून देवाची सेवा होते या मानसिकतेपासून सावध असां
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ज्या देवानें जग व त्यातले अवघे निर्माण केलें तो स्वर्गाचा व पृथ्वीचा प्रभू असून हातांनी बांधलेल्या मंदिरात राहत नाहीं; आणि त्याला काही उणें आहे, म्हणून माणसांच्या हातून त्याची सेवा घडावी असेही नाहीं; कारण जीवन, प्राण व सर्वकाही तो स्वतः सर्वांना देतो.” (प्रेषितांची कृत्ये 17:24-25)

आपण देवाला त्याच्या गरजां पुरवून त्याचा गौरव करत नाहीं, तर तो आपल्या गरजां पुरवेल अशी प्रार्थना केल्याद्वारे — आणि तो प्रार्थनेचे उत्तर देईल यावर विश्वास ठेविल्याद्वारे, आणि आपण प्रीतिने इतर लोकांच्या सेवेसाठीं आपले जीवन अर्पण करत असताना जो सर्वकाही स्वतः सर्वांना देतो त्या काळजी घेणाऱ्या देवामध्यें असलेल्या आनंदात जीवन जगतो, त्याद्वारे आपण त्याचा गौरव करतो.

येथे आपण ख्रिस्ती पूर्णानंदाच्या सुवार्तेचे मर्म पाहतो. आपण साहाय्यासाठीं त्याच्याकडे धावा करावा जेणेंकरून त्याचा गौरव होईल यावर देवाचा जोर. “आणि संकटसमयी माझा धावा कर; मी तुला मुक्त करीन आणि तू माझा गौरव करशील” (स्तोत्र 50:15). हे सत्य आपल्याला या आश्चर्यकारक तथ्यावर विश्वास ठेवण्यास भाग पाडते कीं त्याला आपली गरज आहे असा विचार करण्यापासून आपण सावध असले पाहिजे. आपल्या हातून देवाची सेवा होते या मानसिकतेपासून आपण सावध असले पाहिजे, याउलट त्याच्या हातून आपली सेवा व्हावीं अशी सावधगिरी आपणच बाळगली पाहिजे, जेणेंकरून आपल्या हातून त्याच्या गौरवाची चोरी होऊं नये. “त्याला काही उणें आहे, म्हणून माणसांच्या हातून त्याची सेवा घडावी असेही नाहीं ” (प्रेषित 17:25).

हे एकूण खूप विचित्र वाटू शकते, कारण आपल्यांपैंकीं पुष्कळांना वाटते कीं देवाची सेवा करणें ही पूर्णपणें सर्वसमान्य गोष्ट आहे. देवाची सेवा केल्यानें त्याचा अपमान देखील होऊ शकतो यावर आपण कधी विचारच केला नाहीं. पण आपण प्रार्थनेच्या मूळ अर्थावरच जर लक्ष दिलें तर ही गोष्ट स्पष्ट होईल.

रॉबिन्सन क्रूसो शीर्षक असलेल्या कादंबरीमध्यें नायक जेव्हां बेटावर अडकतो तेव्हां तो स्तोत्र 50:12-15 ला आपला आवडता शास्त्रपाठ म्हणून स्मरण करतो आणि त्यावर आशा ठवतो : तेथे देव म्हणतो, “मला भूक लागली तरी मी तुला सांगणार नाहीं, कारण जग व जगातले सर्वकाही माझे आहे. . . . संकटसमयी माझा धावा कर; मी तुला मुक्त करीन आणि तू माझा गौरव करशील.”

याचा अर्थ असा : देवाची सेवा करण्याचा एक असा दृष्टीकोन आहे जो त्याला कमी लेखून त्याच्याकडे आपल्या सेवेचा गरजू व्यक्ती म्हणून पाहतो. ओह, ख्रिस्तामध्यें आम्हांवर प्रकट झालेंल्या देवाच्या पराक्रमी कृपेला आपण कमी लेखू नये याविषयी आपण किती सावध असले पाहिजे. येशूनें म्हटलें , “कारण मनुष्याचा पुत्रही सेवा करून घेण्यास नाहीं, तर सेवा करण्यास व पुष्कळांच्या मुक्तीसाठीं आपला जीव खंडणी म्हणून अर्पण करण्यास आला आहे” (मार्क 10:45). तो सेवक होण्यासाठीं आला. देणारा म्हणून आपला गौरव करून घ्यावा हे त्याचे ध्येय होते.

11 अक्तूबर : हमारे संघर्षों में आनन्द

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11 अक्तूबर : हमारे संघर्षों में आनन्द
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“हे मेरे भाइयो, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो, यह जानकर कि तुम्हारे विश्‍वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ, और तुम में किसी बात की घटी न रहे।” याकूब 1:2-4

लम्बे समय तक मैंने कल्पना की है कि मैं हर किसी को एक ठेला लिए हुए देखता हूँ। मेरे पास भी एक ठेला है। हम उन्हें इधर-उधर धकेलते फिरते हैं, और उसके अन्दर हमारे संघर्ष, प्रलोभन, डर, विफलताएँ, निराशाएँ, दिल के दुख और इच्छाएँ होती हैं। ये वे चीजें हैं जो हमें जगाती हैं और फिर हमें सुबह तीन बजे तक जगा कर रखती हैं।

इस संसार में जीने से हम पर दबाव आता है, हमें चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और अक्सर हमें पीड़ा और दुख का सामना करना पड़ता है। जब हम इन कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो अक्सर हमें इन्हें नकारने, छिपाने, इन्हें दूर भगाने या उन्हें छोटा समझते हुए जीने के लिए कहा जाता है। इन सबके बीच, हम अपने संघर्षों से नफरत करने और अधिक से अधिक कड़वाहट से भरने के लिए प्रवृत्त होते हैं।

कठिनाइयों पर बाइबल का दृष्टिकोण इन सभी विकल्पों से बहुत अलग है। याकूब ने कहा कि हमारे संघर्षों में पूर्ण, शुद्ध आनन्द का अनुभव करना सम्भव है। यह कैसे हो सकता है? संघर्षों में आनन्द प्राप्त करना एक पूर्ण विरोधाभास लगता है। 21वीं सदी के पश्चिमी जीवन का अधिकांश हिस्सा इस तरह से जीया जाता है कि संघर्षों से बचा जाए। यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि आनन्द प्राप्त करने का तरीका संघर्षों से बचना है।

लेकिन याकूब हमें यह बताता है कि हमें “पूरे आनन्द” का अनुभव करने के लिए अपने आप को किसी किले में बन्द करने की आवश्यकता नहीं है, जहाँ हमारी समस्याएँ हम तक न पहुँच पाएँ, बल्कि इसके लिए हमें इन समस्याओं के प्रति अपने दृष्टिकोणों को बदलने की आवश्यकता है। जब वह कहता है, “यह जानकर,” तो वह हमें याद दिलाता है कि हमें अपनी भावनाओं को उस सत्य के अधीन लाना होगा जिसे हम भली-भाँति जानते हैं। और हम क्या जानते हैं? यह कि केवल विश्वास से ही सहनशीलता विकसित नहीं होती। असली विश्वास तभी सिद्ध और मजबूत होता है जब वह परखा जाता है। जिन बातों से हम बचना चाहते हैं, वही बातें हमें दृढ़ बनाती हैं।

हमें जिन संघर्षों का सामना करना पड़ता है, उसके बारे में हमें ईमानदार होना होगा। हम अभी तक स्वर्ग नहीं पहुँचे हैं, इसलिए हमारा विश्वास अभी भी परखा जा रहा है। यह किसी सुखद, दूसरे जगत के अनुभव में प्रकट नहीं होता, बल्कि दैनिक जीवन के उतार-चढ़ाव में दिखता है। और असली विश्वास की परीक्षा हमेशा दृढ़ता उत्पन्न करती है। यह हमें यीशु के समान बनाती है। यह हमें दूसरों को सान्त्वना देने में सक्षम बनाती है। इसलिए हम विश्वास कर सकते हैं कि हमारी सभी कठिनाइयों के माध्यम से परमेश्वर हममें एक ऐसे विश्वास का निर्माण करेगा, जो परिपूर्ण और सम्पूर्ण हो। जब हम इस प्रतिज्ञा को पकड़े रहते हैं, तब हम संघर्ष के सामने या संघर्ष के मध्य में “पूरे आनन्द” का अनुभव करते हैं। हम यह सोचने में सक्षम हो जाते हैं, “मैं इस मार्ग को न चुनता, लेकिन प्रभु ने इसे चुना है, और वह इसका उपयोग करके स्वयं को मुझ पर और अधिक प्रकट करेगा तथा मुझे और अधिक अपने समान बनाएगा।”

आज आपके ठेले में क्या है? ये वे चीजें हैं जिन्हें आपने नहीं चुना होगा। लेकिन यदि आप इन्हें अपने विश्वास की परीक्षा, मजबूती और परिपूर्णता के अवसर के रूप में देखते, तो क्या बदलता? यही रास्ता है गहरे, अजेय आनन्द का।

रोमियों 5:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: श्रेष्ठगीत 4–5; इफिसियों 1 ◊

11 October : आम्हांला कांहीं करता येत नाहीं

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11 October : आम्हांला कांहीं करता येत नाहीं
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“मीच वेल आहें, तुम्हीं फाटे आहां; जो माझ्यामध्यें राहतो आणि मी ज्याच्यामध्यें राहतो तो पुष्कळ फळ देतो, कारण माझ्यापासून वेगळे असल्यास तुम्हांला कांहीं करितां येत नाहीं.” (योहान 15:5)

कल्पना करा कीं तुम्हीं अर्धांगवायूमुळें पूर्णपणें अंथरूणाला खिळले गेलें आहां आणि फक्त बोलण्यावांचून तुम्हीं स्वतःहून इतर कांहीच करू शकत नाहीं. आणि समजा तुमच्या एका सशक्त आणि विश्वासपात्र मित्रानें तुमच्यासोबत राहून तुम्हाला जे कांहीं करायचे आहे ते सर्व तुमच्यासाठीं करण्याचे वचन दिलें आहे. आता, जर एखादा अनोळखी गृहस्थ तुम्हाला भेटायला आला तर तुम्हीं तुमच्या या मित्राची प्रशंसा-सुमने कशी कराल?

तुम्हीं अंथरुणातून उठून त्याला त्या व्यक्तीच्या समोर घेऊन जाण्याचा प्रयत्न करून त्याचे औदार्य आणि बळ यांची प्रशंसा-सुमने कराल का? नाहीं! उलट तुम्हीं असे म्हणाल, “मित्रा, तू मला हाथ लावून जरा वर उचलशील, आणि मी माझ्या पाहुण्याकडे पाहू शकेन म्हणून माझ्या मागे उशी ठेवशील का? आणि कृपा करून माझ्या डोळ्यांवर माझा चष्मा सुद्धा लावशील का?

आणि त्यामुळें तुम्हांला भेटायला आलेला गृहस्थ तुमच्या विनंतीवरून जाणेल कीं तुम्हीं असहाय्य आहां आणि तुमचा मित्र सशक्त आणि कनवाळू आहें. तुम्हीं तुमच्या मित्राला गरजेच्या वेळीं हाक मारतां, त्याच्याकडे मदतीसाठीं विनवणी करतां व स्वतःला त्याच्यावर अवलंबून असलेलें दाखवता तेव्हां तुम्हीं त्याची प्रशंसा-सुमने करतां किबहुंना त्याचा गौरवच करतां.

योहान 15:5 मध्यें, येशू म्हणतो, “माझ्यापासून वेगळे असल्यास तुम्हांला कांहीं करितां येत नाहीं.” त्यामुळें आपण खरोखरच अर्धांगवायूच्या व्याधीने ग्रस्त झालो आहोत. ख्रिस्तापासून वेगळे असल्यास आम्हीं ख्रिस्ताचा गौरव होईल असे चांगले ते करण्यास खरोखर सक्षम नाहीं. रोमकरांस 7:18 मध्यें पौल म्हणतो, “माझ्या ठायीं म्हणजें माझ्या देहस्वभावात काही चांगले वसत नाहीं.”

पण योहान 15:5 असेहि म्हणते कीं, ख्रिस्ताचा गौरव होईल असे पुष्कळ जे चांगले ते आपण करावें अशी देवाची आपल्यासंबंधाने इच्छा आहे, म्हणजें हे कीं आपण पुष्कळ फळ द्यावे: “जो माझ्यामध्यें राहतो आणि मी ज्याच्यामध्यें राहतो तो पुष्कळ फळ देतो.” यास्तव आपला शक्तिशाली आणि विश्वासू मित्र या नात्यानें- “मी तुम्हांला मित्र म्हटलें आहें ” (योहान 15:15) – तो आपल्यासाठीं आणि आपल्याद्वारे ते सर्व करण्याचे अभिचचन देतो जे आपण स्वतःहून करूं शकत नाहीं.

मग आपण त्याचा गौरव कसा करतो? योहान 15:7 मध्यें येशू उत्तर देतो : “तुम्हीं माझ्यामध्यें राहिलात व माझी वचनें तुमच्यामध्यें राहिली तर जे कांहीं तुम्हांला पाहिजे असेल ते मागा म्हणजें ते तुम्हांला प्राप्त होईल.” आम्हीं प्रार्थना करतो! आम्हीं स्वतःहून जे करूं शकत नाहीं -फळ देणें- ते देवानें ख्रिस्ताद्वारे आपल्याठायीं करावे अशी आपण त्याजकडे विनंती करतो.

योहान 15:8 याचे पर्यवसान आहे : “तुम्हीं विपुल फळ दिल्यानें माझ्या पित्याचा गौरव होतो.” आता, प्रार्थनेद्वारे देवाचा गौरव कसा होतो? प्रार्थना ही उघड-उघड कबुली आहे कीं ख्रिस्तापासून वेगळे असल्यास आम्हांला कांहीं करितां येत नाहीं. आणि प्रार्थना म्हणजें असा विश्वास ठेऊन स्वतःकडून देवाकडे वळणें कीं तो गरजेच्या वेळी आपले सहाय्य करील

10 अक्तूबर : प्रार्थना द्वारा सहारा

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10 अक्तूबर : प्रार्थना द्वारा सहारा
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“इस्राएलियों ने तेरी वाचा टाल दी … मैं ही अकेला रह गया हूँ; और वे मेरे प्राणों के भी खोजी हैं।” 1 राजाओं 19:14

एक बार एक विशेष पादरी सम्मेलन में एक सेमिनार आयोजित किया गया था, जिसमें सेवाकार्य में पाई जाने वाली निराशा और तनाव पर चर्चा की गई थी। चाहे इसे अत्यन्त उत्साहवर्धक कहा जाए या अत्यन्त निराशाजनक, इस सेमिनार में उस सम्मेलन के सबसे अधिक लोग उपस्थित हुए थे, जिसमें इतने अधिक लोग आ गए थे कि सबने खड़े रहकर पूरा सेमिनार सुना। पासबान, जिनमें से कुछ पासबान अपनी पत्नियों के साथ आए थे, सेवाकार्य में गम्भीर निराशा के मध्य में आशा और उत्तरों की तलाश में थे।

नबी एलिय्याह भली-भाँति जानता होगा कि उस कमरे में सबसे अधिक दुखी सेवक को कैसा महसूस हो रहा होगा। उसने अपनी सेवा में निराशा का अनुभव किया था। एक बार वह 450 सशस्त्र पुरुषों के सामने अकेला खड़ा हुआ था। ये सब झूठे देवता बाल के नबी थे, जो पूरी तरह से एलिय्याह के खिलाफ थे और परमेश्वर ने अपनी महान शक्ति से आकर उन्हें नष्ट कर दिया था। फिर भी, इसके तुरन्त बाद उसे रानी ईज़ेबेल से धमकी भरा सन्देश मिला और वह जंगल की ओर भाग गया। उसने एक गुफा में निराशा भरी रात बिताई, यह मानते हुए कि वह अकेला ही ऐसा व्यक्ति जीवित बचा है, जो परमेश्वर के प्रति उत्साही है। और इस सबसे निराश अवस्था में परमेश्वर ने एलिय्याह से मिलकर उसे प्रोत्साहित किया, विशेषकर इस प्रतिज्ञा के साथ कि “मैं सात हज़ार इस्राएलियों को बचा रखूँगा। ये तो वे सब हैं, जिन्होंने न तो बाल के आगे घुटने टेके, और न मुँह से उसे चूमा है” (1 राजाओं 19:18)।

आपका विश्वास और मसीह के स्वरूप में आपकी वृद्धि आपके पासबान के लिए बहुत बड़ा प्रोत्साहन है। जब प्रेरित पौलुस ने सुना कि थिस्सलुनीके में युवा मण्डली अभी भी अपने विश्वास में दृढ़ खड़ी है, तो उसने उन्हें लिखा कि “अब हम जीवित हैं” और वर्णन किया कि “हमें तुम्हारे कारण अपने परमेश्‍वर के सामने आनन्द मिला है” (1 थिस्सलुनीकियों 3:8-9)।

सेवाकार्य का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जिसमें परमेश्वर के सेवक निराशा से बच सकें। मसीही सेवा का मार्ग उतार-चढ़ाव से भरा होता है; कुछ दिन आनन्दमय होते हैं और कुछ दिन विनाशकारी। जब हम निराश होते हैं, तो आगे बढ़ना कठिन लगता है—लेकिन पासबानों और सेवाकार्य के अगुवों को सहारा देने के लिए परमेश्वर अपने लोगों को उनके विश्वास, विकास और उनकी प्रार्थनाओं के द्वारा उपयोग करता है। जब सी.एच. स्पर्जन लोगों को लंदन के मेट्रोपोलिटन टैबरनेकल का दौरा कराते थे, तो वह उन्हें नीचे ले जाकर “बॉयलर रूम” दिखाते थे। वहाँ कोई बॉयलर नहीं था; इसके बजाय, वहाँ सीटें थीं। हर रविवार सुबह कई सौ लोग वहाँ इकट्ठे होते थे और स्पर्जन के प्रचार के दौरान उनके लिए प्रार्थना करते थे। वह जानते थे कि उनके सेवाकार्य की प्रभावशीलता उन लोगों पर निर्भर करती है जो प्रार्थना करते हैं और उस परमेश्वर पर निर्भर करती है जो उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर देता है।

यदि आप सेवाकार्य में हैं (चाहे वेतनभोगी हों या न हों) और निराश महसूस कर रहे हैं, तो इस पर विचार करें: आपने शाश्वतता के लिए जीवनों को प्रभावित किया है। पिछले कुछ वर्षों में देखें और कठिनाइयों के बीच आप परमेश्वर के कार्य के प्रमाण देख पाएँगे। इसे अपने प्रोत्साहन के रूप में लें! और आप चाहे जो भी हों, यह कितने समय पहले हुआ था, जब आपने अपने आस-पास सेवाकार्य में व्यस्त लोगों को प्रोत्साहन का सन्देश लिखा था या उनके लिए प्रार्थना की थी? यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है कि आप ऐसा करें। भले ही ये अगुवे एक ही प्रकार के सन्देश का प्रचार करते रहें और एक ही प्रकार की सेवा करते रहें, जैसे वे हमेशा से करते आ रहे हैं, तौभी जब हम उनके लिए विश्वास से प्रार्थना करते हैं, तो इसका प्रभाव कहीं अधिक होगा। ऐसा करना हम सभी की जिम्मेदारी है—वास्तव में, एक विशेषाधिकार है।

1 थिस्सलुनीकियों 2:17 – 3:13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: श्रेष्ठगीत 1–3; यूहन्ना 21

10 October : उत्तम शास्त्रपाठ

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त्याच्या (येशूच्या) रक्ताने विश्वासाच्या द्वारे प्रायश्‍चित्त होण्यास देवानें त्याला पुढे ठेवले. ह्यासाठीं कीं, पूर्वी झालेंल्या पापांची देवाच्या सहनशीलतेने उपेक्षा झाल्यामुळें त्यानें आपले नीतिमत्त्व व्यक्त करावे; म्हणजें आपले नीतिमत्त्व सांप्रतकाळी असे व्यक्त करावे कीं, आपण नीतिमान असावे आणि येशूवर विश्वास ठेवणार्‍याला नीतिमान ठरवणारे असावे. (रोमकरांस 3:25-26)

आपण रोमकरांस 3:25-26 ला बायबलमधील सर्वात महत्त्वाची वचनें म्हणूं शकतो.

देव पूर्णपणें नीतिमान आहे! आणि तो अनीतिमानांना नीतिमान ठरवतो! खरंच? म्हणजें असा न्यायमूर्ती जो दोषींची निर्दोष मुक्तता करतो!

एकतर हे/किंवा ते असे नाहीं! तर दोन्ही! तो दोषींची निर्दोष मुक्तता करतो, परंतु असे करताना तो स्वतः मात्र दोषी ठरत नाहीं. ही आहे जगातील सर्वात मोठी बातमी!

  • “ज्याला [येशूला] पाप ठाऊक नव्हते त्याला त्यानें [देवानें] तुमच्या-आमच्याकरता पाप असे केलें; ह्यासाठीं कीं, आपण त्याच्या ठायीं देवाचे नीतिमत्त्व असे व्हावे” (2 करिंथ 5:21). तो आमचे पाप स्वतःवर घेतो. आम्हीं त्याचे नीतिमान घेतो.
  • “देवानें आपल्या स्वतःच्या पुत्राला पापमय देहासारख्या देहाने व पापाबद्दल पाठवून देहामध्यें पापाला दंडाज्ञा ठरवली” (रोमकरांस 8:3). कोणाचा देह? ख्रिस्ताचा. त्या देहामध्यें कोणाच्या पापाला दंडाज्ञा ठरवली? आमच्या पापाला. मग आमच्यासाठीं काय? आता दंडाज्ञा नाहींच!
  • “[ख्रिस्ताने] त्यानें स्वतः तुमची आमची पापे’ स्वदेही ‘वाहून’ खांबावर ‘नेली.” (1 पेत्र 2:24)
  • “कारण आपल्याला देवाजवळ नेण्यासाठीं ख्रिस्तानेही पापांबद्दल, म्हणजें नीतिमान पुरुषाने अनीतिमान लोकांकरता, एकदा मरण सोसले. तो देहरूपात जिवे मारला गेला आणि आत्म्यात जिवंत केला गेला.” (1 पेत्र 3:18)
  • “कारण जर आपण त्याच्या मरणाच्या प्रतिरूपाने त्याच्याशी संयुक्त झालो आहोत, तर त्याच्या उठण्याच्याही प्रतिरूपाने त्याच्याशी संयुक्त होऊ.” (रोमकरांस 6:5)

आम्हांवर आमच्या सृष्टीकर्त्याची दंडाज्ञा आहे आणि त्याच्या गौरवाचे मूल्य जपण्यासाठीं त्यानें आमच्या पापावर सार्वकालिक क्रोध ओतून आपला नाश करावा म्हणून तो स्वतःच्या नीतिमान चारित्र्यामुळें बाध्य आहे हे जर जगातील सर्वात अरिष्टकारक वर्तमान असेल . . .

. . . तर जगांत सर्वांत अद्भुत वर्तमान (शुभवर्तमान!) हे कीं देवानें तारणाच्या एका अशा मार्गाचे प्रयोजन केलें आहे आणि तो अंमलात आणला आहे जो त्याच्या सर्व निवडलेल्यांचे सार्वकालिक तारण तर साध्य करतोच पण त्याचबरोबर त्याच्या गौरवाचे मूल्य जपून, त्याच्या पुत्राची प्रतिष्ठा देखील राखतो. येशू ख्रिस्त पापी लोकांना तारावयांस ह्या जगात आला.

9 अक्तूबर : प्रतिज्ञा के साथ शपथ

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9 अक्तूबर : प्रतिज्ञा के साथ शपथ
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“इसलिए जब परमेश्‍वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर और भी साफ रीति से प्रगट करना चाहा कि उसका उद्देश्य बदल नहीं सकता, तो शपथ को बीच में लाया। ताकि दो बे-बदल बातों के द्वारा, जिनके विषय में परमेश्‍वर का झूठा ठहरना अनहोना है, दृढ़ता से हमारा ढाढ़स बंध जाए, जो शरण लेने को इसलिए दौड़े हैं कि उस आशा को जो सामने रखी हुई है प्राप्त करें। वह आशा हमारे प्राण के लिए ऐसा लंगर है जो स्थिर और दृढ़ है, और परदे के भीतर तक पहुँचता है।” इब्रानियों 6:17-19

एक शपथ का उन दोनों व्यक्तियों के लिए अत्यधिक महत्त्व होना चाहिए, जो शपथ ले रहा है और जिसे शपथ दी जा रही है। इसमें उच्चतम उपलब्ध शक्ति को एक निर्णायक साक्षी बनाया जाता है, ताकि किसी के शब्दों पर सन्देह समाप्त किया जा सके और दी गई प्रतिज्ञा की विश्वसनीयता की पुष्टि की जा सके। हालाँकि लोग बार-बार झूठ बोलने और शपथें तोड़ने के माध्यम से शपथों का मज़ाक उड़ाते हैं, फिर भी इसके द्वारा किसी के शब्दों की निष्ठा प्रकट होती है।

स्वाभाविक रूप से, शपथ केवल उस व्यक्ति के चरित्र के बराबर होती है जो इसे लेता है। इसलिए हम जानते हैं कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ भरोसेमंद हैं, और इसका यदि कोई अन्य कारण नहीं है तो केवल यह कारण ही पर्याप्त है कि ये स्वयं परमेश्वर ने दी हैं। उसे अपनी प्रतिज्ञा को शपथ से सुनिश्चित करने की आवश्यकता नहीं थी; केवल परमेश्वर द्वारा अपने लोगों को दी गई प्रतिज्ञा ही काफी है कि हम उस पर विश्वास करें। फिर भी, उसने एक और कदम आगे बढ़ाते हुए खुद की शपथ ली, क्योंकि उसके स्वयं से बड़ा और कोई है ही नहीं जिसकी वह शपथ ले सकता।

परमेश्वर हमें निराशा के संसार से आशा की वास्तविकता में लाया है, और हमारी आत्माओं का लंगर सुरक्षित और निश्चित है। यह एक अचल वस्तु से बंधा हुआ है, अर्थात परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से और उस परमेश्वर द्वारा, जो झूठ नहीं बोल सकता, अदृश्य स्वर्गिक क्षेत्र में बांधा गया है। वास्तव में ये प्रतिज्ञाएँ इतनी सुरक्षित हैं कि इन्हें दूसरों के साथ प्रचार में साझा करना उन्हें आकर्षक बनाता है, क्योंकि हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जो निराशा से भरा हुआ है और एक ऐसी संस्कृति में जीते हैं जो अपने असन्तोष को नकली मुस्कान, छुट्टियों और भौतिक लाभों से ढकने की कोशिश करती है।

कितना अद्‌भुत है कि हम ऐसे लोग हो सकते हैं जो विश्वास में दृढ़ हैं, और अपने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के लंगर से सुरक्षित हैं। यीशु मसीह हमारे विश्वास के योग्य है और हम यह जान सकते हैं कि “परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में ‘हाँ’ के साथ हैं” (2 कुरिन्थियों 1:20), जिसका जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण हमारे लिए एक ऐतिहासिक और शाश्वत विजय का कारण बने हैं।

परमेश्वर की कौन सी प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करना और उन्हें अपने जीवन का आधार बनाना आपको सबसे कठिन लगता है? याद रखें कि ये प्रतिज्ञाएँ किसने दी हैं। वह वही परमेश्वर हैं जिसने निस्सन्तान और वृद्ध अब्राहम को शपथ दी थी कि उसका वंश आकाश के तारों के समान अनगिनत होगा और जिसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। वह वही परमेश्वर हैं जिसने अपने शिष्यों को शपथ दी थी कि उसे ठुकराया और मारा जाएगा, और फिर तीन दिनों के बाद वह फिर से जीवित हो जाएगा और जिसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। याद रखें कि जिन प्रतिज्ञाओं पर आपको विश्वास करने में कठिनाई हो रही है, वे प्रतिज्ञाएँ किसने दी हैं। याद रखें कि वह किस तरह का परमेश्वर है। वही आपके आत्मा का लंगर और आपके भविष्य की आशा है।

भजन 105

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 47–48; यूहन्ना 20 ◊

9 October : देवाचे कृपा-प्रदर्शक शहाणपण

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9 October : देवाचे कृपा-प्रदर्शक शहाणपण
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आम्हीं तर वधस्तंभावर खिळलेला ख्रिस्त गाजवतो; हा यहूद्यांना अडखळण व हेल्लेण्यांना मूर्खपणा असा आहे खरा, परंतु पाचारण झालेंल्या यहूदी व हेल्लेणी अशा दोघांनाहीं ख्रिस्त हा देवाचे सामर्थ्य व देवाचे शहाणपण आहे. (1 करिंथ 1:23-24)

आम्हांवर आमच्या सृष्टीकर्त्याची दंडाज्ञा आहे आणि त्याच्या गौरवाचे मूल्य जपण्यासाठीं त्यानें आमच्या पापावर सार्वकालिक क्रोध ओतून आपला नाश करावा म्हणून तो स्वतःच्या नीतिमान चारित्र्यामुळें बाध्य आहे या अरिष्टकारक वर्तमानाला घातक असे सुवार्तेचे एक अद्भुत वर्तमान आहे.

हे असे सत्य आहे जे कोणीहि निसर्गाकडून शिकू शकत नाहीं. सुवार्तेचे हे सत्य शेजाऱ्यांना कळवणें आवश्यक आहे आणि मंडळीमध्यें त्याची घोषणा केलीं गेली पाहिजे आणि सुवार्तीक हेच सत्य घेऊन जगांत गेलें पाहिजे.

उत्तम बातमी अशी कीं आपण संपूर्ण मानवजातीला दंडाज्ञा देऊ नये पण तरीही आपल्या न्यायीपणाच्या सर्व अटी पूर्ण व्हाव्यांत अशी व्यवस्था देवानें स्वतः केलीं आहे.

पापी लोकांचा हिशेब चुकता करण्याचा आणि आपले न्यायीपण कायमस्वरूपी जपण्याचा एक मार्ग म्हणजें नरक. पण आणखी एक मार्ग आहे. आणि देवानें त्या दुसऱ्या मार्गाचे प्रयोजन केलें. हेच ते शुभवृत्त.

देवाचे शहाणपण हे कीं देवानें देवाच्या न्यायाशी तडजोड न करता आम्हीं देवाच्या क्रोधापासून सोडविले जावे असा प्रीतिचा मार्ग देवानें स्वतः नियोजित केला आहे. हा तो मार्ग : शुभवर्तमान. मी ते पुन्हा सावकाशपणें सांगतो : देवाचा सुज्ञपणा हा कीं देवानें देवाच्या न्यायाशी तडजोड न करता आम्हीं देवाच्या क्रोधापासून सोडविले जावे असा प्रीतिचा मार्ग देवानें स्वतः नियोजित केला आहे.

आणि हे शहाणपण काय आहे? पापी लोकांसाठीं देवाच्या पुत्राचे मरणें! “आम्हीं तर वधस्तंभावर खिळलेला ख्रिस्त गाजवतो. . . देवाचे सामर्थ्य व देवाचे शहाणपण” (1 करिंथ 1:23-24).

ख्रिस्ताचे मरण हे देवाचे शहाणपण आहे ज्याद्वारे देवाची प्रीति पापी लोकांना देवाच्या क्रोधापासून वाचवते, आणि त्याचवेळी ख्रिस्तामध्यें देवाचे नीतिमत्वहि टिकवून ठेवते आणि उघडपणें प्रदर्शित करते.

8 अक्तूबर : घर्षण पर विजयी होना

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8 अक्तूबर : घर्षण पर विजयी होना
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“जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो, अर्थात् सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो; और मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो।” इफिसियों 4:1-3

घर्षण का एक उपोत्पाद गर्मी है: जब दो या दो से अधिक वस्तुएँ एक-दूसरे से रगड़ती हैं, तो तापमान बढ़ता है। इसी प्रकार, जब आप पापी लोगों को एक साथ रखते हैं—यहाँ तक कि कलीसिया में भी, जहाँ पाप अब शासन नहीं करता, लेकिन उसकी उपस्थिति अभी भी है—वहाँ घर्षण होना तय है। हमें इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हम सही आकार में बनाई गई ईंटें नहीं हैं, जो बड़ी सुन्दरता से एक साथ फिट हो जाती हैं। हम खुरदरे और अधूरे लोग हैं। लेकिन फिर भी, हमें घर्षण के कारण अपने अन्तिम उद्देश्य से विचलित नहीं हो जाना चाहिए।

घर्षण को नजरअंदाज करने से वह गायब नहीं होगा; इसके बजाय, जब हम मसीह पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और उसे महत्त्व देते हैं जिसे वह विश्वासियों की मण्डली के लिए महत्त्व देता है, जैसे कि आतिथ्य, एक-दूसरे के बोझों को सहन करना, आपसी प्रोत्साहन, प्रार्थना और दान, तब हम घर्षण पर विजयी होते हैं। ये मूल्य हमें यह पूछने के लिए प्रेरित नहीं करते कि “मसीह की देह मेरे लिए क्या कर सकती है?” बल्कि यह कि “मैं मसीह की देह के लिए क्या कर सकता हूँ?” जब हम इस दृष्टिकोण से काम करते हैं, तब हमारी आत्म-दया, गुस्सा और चिन्ताएँ दूर होना शुरू होते हैं।

इसलिए जबकि घर्षण की उम्मीद की जानी चाहिए, फिर भी इसे सहन नहीं किया जाना चाहिए। विश्वासियों के रूप में, हमें विनम्र और पश्चाताप करने वाले दिलों के प्रमाण दिखाने चाहिएँ। जब हम ऐसा नहीं करते, तो यह उपयुक्त हो जाता है कि कलीसिया के अन्य लोग हमारी मदद करें और यदि आवश्यक हो तो हमें प्रेमपूर्वक चुनौती दें और अनुशासित करें। सुधार काल के दौरान कलीसिया के अगुवों ने कहा था कि एक कलीसिया सच्ची कलीसिया तब होती है, जब उसमें परमेश्वर का वचन सुनाया जाता है, संस्कारों का पालन किया जाता है, और कलीसियाई अनुशासन का पालन किया जाता है।

कलीसिया में पश्चाताप न करने वाली विभाजनकारी प्रवृत्तियों को सहन करना न केवल घर्षण से उत्पन्न होने वाली गर्मी को अनियन्त्रित छोड़ने की अनुमति देता है, बल्कि यह विनाश का कारण भी बन सकता है। हम किसी को अपने भोजन कक्ष की मेज पर बैठने और हमारे परिवारों केवल इस कारण नष्ट करने की अनुमति नहीं देंगे क्योंकि उनका रवैया बुरा है; फिर भी यह कितना आसान है कि हम कलीसिया में घर्षण और विभाजन को सहन कर लें ताकि यह प्रतीत हो सके कि हम एक अच्छा, आरामदायक स्थान प्रदान कर हैं। लेकिन हमें कठिन मार्ग अपनाना होगा। कलीसिया का भविष्य इसी पर निर्भर करता है।

घर्षण आएगा। हम गलतियाँ करेंगे। इसलिए हमें एक-दूसरे के साथ प्रेम से सहन करना होगा। हमें एक-दूसरे के प्रति धैर्य रखना होगा। हमें हर सम्भव “यत्न” करना होगा ताकि हम उस एकता को बनाए रख सकें जो आत्मा हममें लाता है, जब वह हमें विश्वास के द्वारा परमेश्वर के परिवार में लाता है (इफिसियों 4:3)। दूसरे शब्दों में, हमें मसीह की तरह बनना होगा, क्योंकि उसका निःस्वार्थ अगापे प्रेम ही है जो हमें सिखाता है कि हम एक-दूसरे से बलिदानी प्रेम कैसे करें और संघर्ष पर कैसे विजयी हों। एकता एक कीमती उपहार है, और इसलिए घर्षण को सम्बोधित किया जाना चाहिए—नम्रता और धैर्य से, लेकिन फिर भी इसे सम्बोधित किया जाना चाहिए। शायद आज आपको किसी से बात करने की आवश्यकता है। शायद आज आपको किसी से पश्चाताप करने की आवश्यकता है, या किसी को क्षमा करने की आवश्यकता है, या कलीसिया के किसी सदस्य के साथ उनके घर्षण को सुलझाने में मदद करने के लिए उनके साथ चलने की आवश्यकता है।

याकूब 3:13-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 45–46; यूहन्ना 19:23-42

8 October : आमचे हित करण्यांत देवाचा आनंद

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8 October : आमचे हित करण्यांत देवाचा आनंद
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आणि मी त्यांच्याशी सर्वकाळचा करार करीन; तो असा कीं मी त्यांचे हित करण्यापासून माघार घेणार नाहीं; मी आपले भय त्यांच्या मनात उत्पन्न करीन, म्हणजें ते माझ्यापासून माघार घेणार नाहींत. मी त्यांच्याविषयी आनंद पावून त्यांचे कल्याण करीन व मी मनापासून जिवाभावाने त्यांची ह्या देशात खरोखर लागवड करीन.” (यिर्मया 32:40-41)

आपल्याकडून देवाचे गुणगान व्हावें हा त्याचा शोध आणि त्याच्यामध्यें आपल्या सर्व आनंदाचा शोध, हे दोन्हीं उद्यमांचा शेवट एकच आहेत. त्याचा गौरव व्हावा म्हणून देवाची मोहीम आणि आपण केवळ त्याच्यामध्यें संतुष्ट राहावे ही आमची मोहीम ह्या दोन्हीं गोष्टींचा कळस यांत आहे : देवामध्यें आमचा आनंद, जो स्तुतीने भरून वाहतो.

देवाच्या बाजूने, स्तुती ही त्याच्या लोकांच्या अंतःकरणात त्याच्या स्वतःच्या वैभवाची गोड प्रतिध्वनी आहे.

आमच्या बाजूने, स्तुती ही त्या संतुष्टीचा शिखर आहे जी देवाच्या सहवासात राहण्याने प्राप्त होते.

या शोधाचा मती गुंग करणारा निहीतार्थ हा आहे कीं देवाची ती सर्वसमर्थ शक्ती जी देवाच्या अंत:करणाला त्याचा स्वतःच्या गौरवाचा शोध घेण्यांस चालना देते तीच सर्वसमर्थ शक्ती जे त्याच्यामध्यें आपला आनंद शोधतात त्यांच्या अंतःकरणाला आपण संतुष्ट करावे म्हणून देखील त्याला चालना देते.

बायबलचे शुभवर्तमान हेच कीं देव त्याच्यावर आशा ठेवणाऱ्यांची अंतःकरणें संतुष्ट करण्यापासून कदापि माघार घेत नाहीं. अगदी उलट आहे : जी गोष्ट आपल्याला सर्वात जास्त आनंद देऊ शकते देव त्यांच गोष्टीमध्यें त्याच्या पूर्ण अंतःकरणाने आणि पूर्ण जिवाने आनंद करतो. “मी त्यांच्याविषयी आनंद पावून त्यांचे कल्याण करीन व मी मनापासून जिवाभावाने त्यांची ह्या देशात खरोखर लागवड करीन” (यिर्मया 32:41) हे शब्द अद्भुत आहेत.

देव आपल्या पूर्ण अंतःकरणाने आणि पूर्ण जिवाने सार्वकालिक आनंदाच्या शोधाच्या आमच्या ह्या मोहीमेत सामील होतो कारण त्याच्यामध्यें असलेल्या त्या आनंदाचा सर्वोच्च शिखर त्याच्या अपरिमित महानतेचा गौरव आहे.