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27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया

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27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया
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“‘बालकों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना न करो, क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य ऐसों ही का है। मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई परमेश्‍वर के राज्य को बालक के समान ग्रहण न करे, वह उसमें कभी प्रवेश करने न पाएगा।’ और उसने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी।” मरकुस 10:14-16

21वीं सदी में जब हम बच्चों के बारे में सोचते हैं, तो हम अक्सर उनके व्यक्तिगत गुणों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं; वे प्यारे और कोमल होते हैं और कभी-कभी हम यह सोचने की गलती कर बैठते हैं कि वे सिद्ध हैं और सारी सृष्टि का केन्द्र हैं। बच्चों के प्रति यह आधुनिक दृष्टिकोण वास्तव में हमें यीशु की इस बात के अर्थ को समझने में रुकावट डालता है, “बालकों को मेरे पास आने दो।”

यीशु की इस उपमा के केन्द्र में वास्तव में बच्चों के वस्तुनिष्ठ गुण हैं। बच्चे न तो मतदान करते हैं, और न उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस होता है। वयस्क आमतौर पर उनसे उनके जीवन या अपने परिवार के महत्त्वपूर्ण अवसरों पर अन्तिम निर्णय लेने के बारे में भी नहीं कहते। अपनी प्रारम्भिक अवस्था में वे पूरी तरह किसी और पर निर्भर होते हैं। सीधे शब्दों में कहें, तो छोटे बच्चे छोटे और असहाय होते हैं, उनके पास कोई विशेष बाहरी योग्यता या दावा दिखाई नहीं देता।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बच्चों को यीशु इतनी गर्मजोशी से अपनाता है? लेकिन यद्यपि यह सचमुच आश्चर्य की बात है, तौभी हमें चकित नहीं होना चाहिए—विशेषकर जब हम यह देखते हैं कि परमेश्वर कितनी बार नम्र और तुच्छ समझे जाने वालों का उपयोग महान कार्यों के लिए करता है। हम स्वर्ग में अपने गुणों या आत्म-मूल्य के आधार पर प्रवेश करने की आशा नहीं कर सकते। बल्कि परमेश्वर का राज्य उन लोगों का है जो जरूरतमंद हैं, अकेले हैं, असहाय हैं, जिनके पास अपने बल पर कोई दावा या योग्यताएँ नहीं हैं—अर्थात ऐसे लोग जो बिल्कुल बच्चों के समान हैं।

जैसे-जैसे हम यह समझने लगते हैं कि “बच्चों के समान” होने का क्या अर्थ है, हमें यह स्पष्ट दिखने लगता है कि परमेश्वर के राज्य में प्रवेश तभी सम्भव है जब हम अपनी असहायता और पूर्ण निर्भरता को स्वीकार कर लें। हम मसीह के पास अपने गुणों या उपलब्धियों से भरे हाथों के साथ नहीं, बल्कि खाली हाथों के साथ आते हैं—ऐसे हाथ जो प्राप्त करने को तैयार होते हैं। और यह उल्लेखनीय है कि सुसमाचार हमें उसी परमेश्वर की ओर देखने के लिए कहता है, जिसने स्वयं देहधारण किया और एक असहाय शिशु के रूप में संसार में आया। इसलिए यह एकदम उचित है कि उसके राज्य में वही प्रवेश करेंगे जो उसके इस नम्र उदाहरण का अनुसरण करते हैं।

यीशु द्वारा बच्चों को गले लगाना—जैसा हम इन वचनों में देखते हैं—हमारे अहंकार को धराशायी करता है और हमारी निर्बलता में हमें थाम लेता है। शायद आप अपने कार्य को सराहनीय मानते हैं, या अपनी पदवी को कुछ विशेष समझते हैं, और आप स्वयं दाता बनाना चाहते हैं, लाभार्थी नहीं। या फिर सम्भव है कि आप जानते हैं कि लोग आपको बहुत छोटा समझते हैं—या आप स्वयं को बहुत छोटा समझते हैं—और यह जानकर चौंकते हैं कि परमेश्वर आपको कुछ भी देना चाहता है, यहाँ तक कि आपके साथ अनन्तकाल बिताने की इच्छा रखता है। परन्तु चाहे आपका स्वभाव जैसा भी हो, या आपकी परिस्थितियाँ कैसी भी हों—हर दिन अपनी कमजोरी और असहायता को जानते हुए एक बालक जैसे विश्वास के साथ यीशु के पास आएँ। उसके राज्य में प्रवेश पाने का और उसके निकट रहने के आशीष को अनुभव करने का एकमात्र मार्ग यही है।

लूका 11:1-13

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 6– 8; 1 यूहन्ना 1 ◊

27 October : देवाला शक्य आहे

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27 October : देवाला शक्य आहे
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“ह्या मेंढवाड्यातली नाहींत अशी माझी दुसरी मेंढरे आहेत, तीही मला आणली पाहिजेत……” (योहान 10:16)

जगातील प्रत्येक लोकगटांत देवाचे निवडलेलें लोक आहेत. ज्यां सामर्थ्यानें त्यानें हे विश्व निर्माण केलें त्याच सामर्थ्यानें तो त्यांना सुवार्तेद्वारें हाक मारून बोलावितो, आणि ते विश्वास ठेवतांत! पृथ्वीच्या सीमांवर असलेल्या आव्हानात्मक प्रांतांत नैराश्येवर मात करण्यासाठीं सामर्थ्य मिळावे म्हणून या शब्दांमध्यें किती ताकद आहे!

पीटर कॅमेरॉन स्कॉट यांचा मिशनरी इतिहास या बाबतींत एक चांगले उदाहरण आहे. स्कॉट यांचा जन्म 1867 मध्यें ग्लासगो येथे झाला. त्यांनी आफ्रिका-इनलँड मिशनची स्थापना केलीं. पण आफ्रिकेत सुवार्ता प्रसाराची त्यांची सुरुवात ही मुळीच अनुकूल किंवा आशादायक नव्हतीं.

आफ्रिकेला त्यांचा पहिला प्रवास मलेरियाच्या तीव्र आक्रमणामुळें अर्ध्यावर संपुष्टात आला आणि त्यांना घरी परतावे लागलें. आजारातून बरे होतांच त्यांनी पुन्हां आफ्रिकेला जाण्याचा बेत केला. हा दुसरा प्रवास त्यांच्यासाठीं विशेष समाधान देणारा होता कारण यावेळी त्यांचा भाऊ जॉन सुद्धा त्यांच्यासोबत सामील झाला. पण कांहीं दिवसातच जॉन आजारी पडला.

असहाय झालेंल्यां पीटरनें आपल्या भावाला आफ्रिकन भूमीत पुरलें आणि अशा दु:खाच्या प्रसंगी देखील त्यांनी आफ्रिकेत सुवार्ता सांगण्यासाठीं स्वतःला पुन्हा समर्पित केलें. परंतु त्यांची प्रकृती पुन्हा बिघडलीं आणि विवश होऊन त्यांना इंग्लंडला परतावे लागलें.

त्या दिवसांत ते ज्यां उजाडपणा आणि नैराश्यांमुळें विव्हळ झालें त्यांतून ते कसे बाहेर निघणार होते? त्यांनी देवासाठीं समर्पित होण्याचा निश्चय केलेंला होता. पण आफ्रिकेला परत जाण्याचे सामर्थ्य त्यांना कुठून प्राप्त होणार होते? मनुष्याला हे अशक्य होते!

त्यांना हे सामर्थ्य वेस्टमिन्स्टर ॲबे याठिकाणी मिळालें. डेव्हिड लिव्हिंगस्टोनची कबर आजही तिथें आहे. स्कॉट यांनी शांतपणें वेस्टमिन्स्टर ॲबे मध्यें प्रवेश केला, त्यांना ती कबर आढळलीं आणि प्रार्थना करण्यासाठीं त्यांनी कबरेसमोर गुडघे टेकले. त्यावर असा शिलालेख होता:

ह्या मेंढवाड्यातली नाहींत अशी माझी दुसरी मेंढरे आहेत, तीही मला आणली पाहिजेत

ते एका नव्या आशेनें उत्तुंग होऊन उभें झालें, आणि आफ्रिकेला परतलें. आणि आज, शंभर वर्षांपेक्षा अधिक काळ उलटूनही, त्यांनी स्थापन केलेंलीं मिशनरी संस्था आफ्रिकेत सुवार्तेसाठीं संजीवनाचे कार्य करणारे व वाढत चाललेलें कार्यदल आहे.

जर तुम्हांला सर्वात मोठा आनंद देवाच्या भरभरून वाहणाऱ्या कृपेचा अनुभव घेण्यात असेल, कीं जेणेंकरून ती इतरांच्या कल्याणार्थ तुमच्याकडून ओसंडून वाहावी, तर जगातील सर्वात शुभ वृत्त हे आहे कीं देव सुवार्ताविरहित लोकांपर्यंत त्यांच्या तारणानिमित्त पोहोचावे म्हणून तुमच्यासाठीं अशक्य असलेल्यां गोष्टीं तुमच्याठायीं शक्य करील.

26 अक्तूबर : थामे रखने वाली थियोलॉजी

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26 अक्तूबर : थामे रखने वाली थियोलॉजी
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“यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, ‘मैं तो मरने पर हूँ; परन्तु परमेश्‍वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, और तुम्हें इस देश से निकालकर उस देश में पहुँचा देगा, जिसके देने की उसने अब्राहम, इसहाक, और याकूब से शपथ खाई थी’… इस प्रकार यूसुफ एक सौ दस वर्ष का होकर मर गया।” उत्पत्ति 50:24, 26

बाइबल में अनेक व्यक्तियों की मृत्यु का उल्लेख हमें अपनी मृत्यु की वास्तविकता का सामना करने के लिए प्रेरित करता है। हम सभी के दिन सीमित हैं। परमेश्वर ने हमारे प्रस्थान की तिथि हमें प्रकट नहीं की है, परन्तु भजनकार हमें बताता है कि हमारे जीवन का प्रत्येक दिन परमेश्वर की पुस्तक में पहले से ही लिखा हुआ है (भजन 139:16)। यूसुफ 110 वर्ष तक जीवित रहा—परन्तु अन्ततः, हम सभी के समान उसे भी अपनी नश्वरता को स्वीकार करना पड़ा।

यूसुफ ने अपनी मृत्यु को समझा और स्वीकार किया। कवि डिलन थॉमस के शब्दों में कहें,[1] तो उसमें “प्रकाश के बुझने पर क्रोधित होने” जैसी कोई बात नहीं थी, बल्कि जैसा हमारे प्यूरिटन पूर्वज कहते थे, यह एक “अच्छी मृत्यु” थी। वह क्या है जो हमें अच्छी मृत्यु की ओर ले जाता है? एक ठोस थियोलॉजी—एक गहरी समझ कि परमेश्वर कौन था और कौन है। अन्त समय में, यूसुफ ने अपने विश्वास को इस तरह मजबूत किया कि उसने अपने जीवन भर परमेश्वर की देखभाल और अपने लोगों के लिए उसकी प्रतिज्ञाओं को याद किया। परमेश्वर की भलाई में विश्वास के कारण वह मृत्यु का सामना बिना डरे और बिना स्वार्थ के कर सका। उसने न तो भ्रम को थामने की कोशिश की, न ही व्यर्थ की आशाओं में चिपका। बल्कि उसके शब्द संक्षिप्त थे, और उसका ध्यान उसके परिवार और परमेश्वर पर केन्द्रित था। ऐसी प्रतिक्रिया केवल तभी सम्भव है जब हमारी दृष्टि परमेश्वर के स्वभाव और उद्देश्यों से गढ़ी गई हो।

क्या हम यूसुफ की तरह यह विश्वास रखते हैं कि परमेश्वर अपने लोगों को छुड़ाएगा? क्या हमारे जीवन में इस विश्वास का प्रमाण दिखाई देता है? क्या हमने परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को पीछे मुड़कर देखा है और यह पाया है कि चाहे हमने कैसी भी कठिनाई या टूटापन झेला हो, फिर भी हम भजनकार के साथ कह सकते हैं, “मेरे उद्धार और मेरी महिमा का आधार परमेश्वर है; मेरी दृढ़ चट्टान, और मेरा शरणस्थान परमेश्वर है” (भजन 62:7)?

हमें जीवन में जो थामे रखता है और मृत्यु के संघर्ष में जो हमें सान्त्वना देता है, वह हमारी भावनाएँ नहीं, अच्छी थियोलॉजी होती है। जब कठिन दिन आते हैं, तब हम उसी सत्य को थामते हैं जिसे हम जानते हैं—जो अटल और अपरिवर्तनीय है। यूसुफ और उसके जीवन से हम यह अद्‌भुत सत्य सीख सकते हैं: जिस परमेश्वर ने हमें अपने हाथों से रचा है, उसी ने हमारे जीवन के हर दिन के लिए हर एक कदम निर्धारित किया है, और वह हमारे जीवन को अपनी सम्प्रभु योजना की महान कहानी में बुन रहा है—एक ऐसी योजना जिसमें वह अपनी प्रतिज्ञाओं को अपनी प्रजा के लिए पूर्ण करता है। इस परमेश्वर पर विश्वास रखकर, हम मृत्यु का सामना भी गीत गाते हुए कर सकते हैं:

करुणा और न्याय के साथ उसने मेरा समय बुना;

दुख की ओस भी उसकी प्रेम की आभा से दमक उठी;

मैं उस हाथ को धन्य कहूँगा जिसने मेरा मार्गदर्शन किया,

मैं उस हृदय को धन्य कहूँगा जिसने मेरी योजना बनाई,

जब मैं महिमा में विराजमान रहूँगा इम्मानुएल के देश में।[2]

भजन 62

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 3–5; 1 तीमुथियुस 6


[1] इन कण्ट्री स्लीप, ऐण्ड अदर पोएम्स  में “डू नॉट गो जेण्टल इनटू दैट गुड नाईट” (डेण्ट, 1952)

[2] ऐनी आर. कज़न, “द सैण्ड्स ऑफ टाईम आर सिंकिंग” (1857).

26 October : सुवार्तीकांसाठीं औषध

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26 October : सुवार्तीकांसाठीं औषध
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देवाला सर्वकाही शक्य आहे.” (मार्क 10:27)

देवाची सार्वभौम कृपा ही ख्रिस्ती पूर्णानंदासाठीं जीवनाचा झरा आहे. कारण ख्रिस्ती पूर्णानंदाच्या शोधांत असलेल्या व्यक्तीला सर्वात अधिक प्रिय असलेली गोष्ट म्हणजें ही कीं देवाच्या सार्वभौम कृपेचा आस्वाद त्याला भरून काढतो आणि त्याच्याद्वारे इतरांचेहि कल्याण व्हावे म्हणून तो झरा त्याच्यांतून विपुलपणें वाहतो.

ख्रिस्ती पूर्णानंदाच्या शोधांत असलेला प्रत्येक सुवार्तिक “ते मी केलें असे नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्‍या देवाच्या कृपेनें केलें” (1 करिंथ 15:10) ह्या सत्याचा आस्वाद घेण्यांस आतुर असतो. त्यांनी सुवार्तेसाठीं घेतलेल्यां श्रमाचे फळ हे पूर्णपणें देवाकडून आहे या सत्यांत ते आनंद करतांत (1 करिंथ 3:7; रोम 11:36).

जेव्हा प्रभू म्हणतो, “माझ्यापासून वेगळे असल्यास तुम्हांला काही करता येत नाहीं” (योहान 15:5) तेव्हा या गोष्टीचा त्यांना अति आनंद होतो. एका नव्या सृष्टीची निर्मिती करण्याचा अशक्य भार देवानें त्यांच्या खांद्यावर न टाकता तो त्यानें स्वतःवर घेतला आहे हे सत्य जाणून घेतल्यावर ते निरागस कोकऱ्यांप्रमाणें आनंदाने उडी मारतात. आपल्या मनांत न गोंधळता, ते म्हणतात, “आम्हीं स्वत: कोणतीही गोष्ट आपण होऊनच ठरवण्यास समर्थ आहोत असे नव्हे, तर आमच्या अंगची पात्रता देवाकडून आलेली आहे” (2 करिंथ 3:5).

जेव्हा ते काहीं काळ रजा घेऊन विश्रांतीसाठीं घरी येतात, तेव्हां ते मोठ्या आनंदाने भारावून जाऊन पाठवणाऱ्या मंडळीला आपल्या यशाचा समाचार या शब्दांत देतांत, “ख्रिस्ताने माझ्या हातून न घडवलेले काही सांगण्याचे धाडस मी करणार नाहीं; तर परराष्ट्रीयांनी आज्ञापालन करावे म्हणून त्यानें माझ्या शब्दांनी व कृतींनी, चिन्हे व अद्भुते ह्यांच्या सामर्थ्याने, देवाच्या पवित्र आत्म्याच्या सामर्थ्याने जे जे घडवले तेच मी सांगतो” (रोम 15:18).

“देवाला सर्वकाही शक्य आहे!” –हे शब्द समोरून आपल्याला आशा देतांत, तर पाठीमागून आम्हांला दीन अं:तकरणाचे बनवितांत. ते आमच्या नैराश्यासाठीं रोगप्रतिकारक आणि अभिमानासाठीं रोगप्रतिकारक असे आहेत – म्हणजें सुवार्तीकांसाठीं एक सार्थक व परिपूर्ण औषध.

25 अक्तूबर : शरीर में काँटा

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25 अक्तूबर : शरीर में काँटा
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“इसलिए कि मैं प्रकाशनों की बहुतायत से फूल न जाऊँ, मेरे शरीर में एक काँटा चुभाया गया, अर्थात् शैतान का एक दूत कि मुझे घूँसे मारे ताकि मैं फूल न जाऊँ।” 2 कुरिन्थियों 12:7

यदि आप विभिन्न प्रतिभाशाली संगीतकारों को इकट्ठा करें, जो केवल अपने व्यक्तिगत भागों में ही रुचि रखते हैं, तो वे एक ऑर्केस्ट्रा नहीं बना सकते। वे केवल असंगत शोर उत्पन्न करेंगे, जो श्रोताओं के कानों के लिए अपमानजनक होगा। परन्तु जब वही प्रतिभा निस्वार्थ भाव और दीनता में एक संचालक के अधीन और एक स्वरूप के नियम के अनुसार उपयोग की जाती है, तो वह सुन्दर और सामंजस्यपूर्ण संगीत उत्पन्न करती है।

जिस प्रकार किसी संगीतकार की व्यक्तिगत महानता की इच्छा ऑर्केस्ट्रा की उपयोगिता के लिए विनाशकारी होती है, वैसे ही हमारे मसीही विश्वास के साथ भी है। आत्मिक वरदान कभी भी घमण्ड का स्रोत नहीं होना चाहिए—क्योंकि, आखिरकार, यह एक वरदान है! फिर भी, हमें अक्सर यह प्रलोभन होता है कि हम परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों को अपनी उपलब्धि समझें, मानो हमने उन्हें स्वयं विकसित किया हो या हम उनके योग्य हों, या फिर हम उनका उपयोग केवल अपने लिए करें, मानो वे हमारे अपने हों। यह हमें अपने महत्त्व के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर सोचने के गम्भीर खतरे में डाल देता है—और जिनके पास सबसे महत्त्वपूर्ण वरदान होते हैं, वे सामान्यतः इस खतरे में सबसे अधिक होते हैं।

पौलुस को स्वयं इस प्रलोभन का सामना करना पड़ा। वह अत्यन्त बुद्धिमान था, उसने उत्तम शिक्षा प्राप्त की थी, वह एक प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से था, और वह बहुतों के जीवन में प्रभावशाली रहा था (फिलिप्पियों 3:4-6 देखें)। जब वह अपने समय के झूठे प्रेरितों का सामना कर रहा था, जो परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर दावे कर रहे थे, तो पौलुस ने ईमानदारी से वर्णन किया कि उसने असाधारण दर्शन देखे थे (2 कुरिन्थियों 12:2-4)। वह अहंकार से भर जाने के लिए एक आसान लक्ष्य था।

उसे इससे किसने बचाया? उसके शरीर में एक काँटे ने। पौलुस यह स्पष्ट रूप से नहीं बताता कि यह क्या था, और इसलिए हमें भी अनुमान लगाने से बचना चाहिए। महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि वह काँटा क्या था, बल्कि यह कि उसने क्या उद्देश्य पूरा किया; क्योंकि पौलुस ने स्वीकार किया कि यह काँटा परमेश्वर की ओर से उसे उसकी दुर्बलता की याद दिलाने के लिए दिया गया था, ताकि वह अपने महत्त्व पर घमण्ड न करे और निरन्तर परमेश्वर पर निर्भर रहे।

उन झूठे शिक्षकों की तरह, जिनसे पौलुस ने मसीही समुदाय की रक्षा की, हमारे सामने भी यह प्रलोभन आते हैं कि अपने प्रभाव और बाहरी सफलता के आधार पर हम अपने मूल्य को आँकें। परन्तु अन्ततः ये सब अस्थाई चीजें अस्थाई ही सिद्ध होंगी और समाप्त हो जाएँगी। परमेश्वर की बुद्धिमानी और भलाई में, पौलुस का “काँटा” हमें हमारी कठिनाइयों को समझने में सहायता करता है—चाहे वह बीमारी हो, आर्थिक संघर्ष हो, सम्बन्धों की समस्याएँ हों, बच्चों का पालन-पोषण हो, या पाप से निरन्तर संघर्ष हो। परमेश्वर जानता है कि वह हमारे जीवन में इन आवश्यक, असुविधाजनक, और निरन्तर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को क्यों अनुमति देता है।

बेहतर है कि हम दीन और संघर्षरत विश्वासी बने रहें, जिनके जीवन में काँटे हों, बजाय इसके कि हम अहंकारी और आत्मनिर्भर होकर विश्वास से दूर हो जाएँ और किसी भी संघर्ष से मुक्त हो जाएँ। हमें अपनी दुर्बलता को पहचानने की आवश्यकता है, ताकि हम अपने अनन्त उद्धार के लिए परमेश्वर के अनुग्रह और अपने दैनिक जीवन के लिए उसके सामर्थ्य पर पूरी तरह निर्भर रहें।

प्रश्न यह नहीं है कि काँटे आपके जीवन में आएँगे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या आप परमेश्वर को अपने “काँटों” का उपयोग करने देंगे, ताकि वह आपको यह स्मरण कराए कि आपके वरदानों का एकमात्र स्रोत वही है और वही आपको आत्मिक रूप से उपयोगी बनाता है।

2 कुरिन्थियों 11:30 – 12:10

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 1–2; 1 तीमुथियुस 5 ◊

25 October : महान प्रेषितीय (मिशनरी) आशा

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25 October : महान प्रेषितीय (मिशनरी) आशा
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पण आपल्यां अपराधांमध्यें मृत झालों असतांहि (देवानें) ख्रिस्तामध्यें आपणांस जीवंत केलें व कृपेनेच तुमचें तारण झालें आहे. (इफिस 2:5)

महान प्रेषितीय किंवा मिशनरी आशा ही आहे कीं जेव्हां पवित्र आत्म्याच्या सामर्थ्यानें सुवार्ता सांगितली जाते, तेव्हां जे मनुष्याला करणें अशक्य आहे ते देव स्वत: करतो : तो आम्हांमध्यें तारणदायी विश्वास निर्माण करतो. मनुष्याचे पाचारण जे करू शकत नाहीं ते देवाचे पाचारण करते. त्याची पाचारण मृतांना जिवंत करते. ती आध्यात्मिक जीवन उत्पन्न करते. येशूनें कबरेंत मृत पडलेल्या लाजराला “बाहेर ये” अशी जी हाक मारली त्याच हाकेसारखी ही हाक आहे. आणि मृत पडलेल्या माणसाने त्याची आज्ञा पाळली आणि बाहेर आला. ह्या हाकेने जीवन उत्पन्न करून आज्ञाधारकपणा उत्पन्न केला (योहान 11:43). प्रत्येक मनुष्य असाच तारला जातो.

आपण हाक मारून एखाद्याला झोपेतून उठवू शकतो, परंतु देवाचे पाचारण (हाक) ज्यां गोष्टीं नाहीं त्यां गोष्टीं अस्तित्वात आणावयांस समर्थ आहे (रोमकरांस 4:17). देवाचे पाचारण या अर्थाने अप्रतीरोध्य आहे कीं ते सर्व प्रतिकारांवर मात करण्यांस समर्थ आहे. देवाच्या सत्संकल्पानुसार हे पाचारण चमत्कारीकरित्या प्रभावी आहे – इतके कीं पौलानें म्हटलें, “आणि [देवानें]  ज्यांना पाचारण केलें त्यांना त्यानें नीतिमानहि ठरवलें” (रोमकरांस 8:30), तथापि आपण केवळ विश्वासाने नीतिमान ठरविलें जातो.

दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे झाल्यांस, देवाचे पाचारण इतके प्रभावी असते कीं ते न चुकता आम्हांमध्यें तो विश्वास निर्माण करते ज्याद्वारे आपण नीतिमान ठरविले जातो. रोमकरांस 8:30 च्या प्रमाणें पाचारण करण्यांत आलेल्यां सर्वांना नीतिमान ठरविले जाते. परंतु विश्वासावांचून कोणीही नीतिमान ठरविला जात नाहीं (रोमकरांस 5:1). म्हणून देव ज्यां हेतूनें पाचारण करतो त्याचा तो हेतू पूर्ण झाल्यावांचून राहत नाहीं. तो अप्रतीरोध्यपणें असा विश्वास अस्तित्वात आणतो ज्या द्वारे तो आम्हांला नीतिमान ठरवतो.

मनुष्य हे करू शकत नाहीं. हे त्याच्यासाठीं अशक्य आहे. पाषाणरुपी-हृदय फक्त देवच काढू शकतो (यहेज्केल 36:26). केवळ देवच लोकांना पुत्राकडे आकर्षित करू शकतो (योहान 6:44, 65). केवळ देवच आध्यात्मिकरित्या मृतावस्थेंत असलेलें अंत: करण उघडू शकतो जेणेंकरून ते सुवार्तेच्या सांगण्याकडे लक्ष देईल (प्रेषितांची कृत्ये 16:14). केवळ उत्तम मेंढपाळ, जो ख्रिस्त, आपल्या मेंढरांना ओळखतो, आणि त्यांना नावाने एका अशा आकर्षक शक्तीने हाक मारतो कीं ते सर्व त्याच्या मागे येतांत – आणि त्यांचा कधीही नाश होत नाहीं (योहान 10:3-4, 14).

देवाची सर्वोच्च सार्वभौम कृपा, जी गोष्ट येशू ख्रिस्ताच्या सुवार्तेद्वारे मनुष्याला अशक्य असलेली गोष्ट अस्तित्वात आणते, ही महान प्रेषितीय किंवा मिशनरी आशा आहे.

24 अक्तूबर : उद्धार के गीत

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24 अक्तूबर : उद्धार के गीत
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“तू मेरे छिपने का स्थान है; तू संकट से मेरी रक्षा करेगा; तू मुझे चारों ओर से छुटकारे के गीतों से घेर लेगा।” भजन 32:7

यदि आप रॉबिन हुड या राजा आर्थर की पुरानी ब्लैक एण्ड व्हाईट फ़िल्में देखें, तो आपको रानियाँ युद्ध के मैदानों में घोड़ों पर सवार दिखाई देंगी। वे अकेली यात्रा नहीं करतीं, बल्कि उनके चारों ओर घुड़सवार सैनिक होते हैं जो उनकी सुरक्षा करते हैं।

कठिन दिनों में, हम अपने आप को यह स्मरण दिला सकते हैं कि परमेश्वर “अपने दूतों को तेरे [हमारे] निमित्त आज्ञा देगा, कि जहाँ कहीं तू जाए [हम जाएँ], वे तेरी [हमारी] रक्षा करें” (भजन 91:11)। इसके अतिरिक्त, उसने हमें उन विश्वासियों की संगति में रखा है जो मसीह के ध्वज का अनुसरण कर रहे हैं—अर्थात हमारी कलीसिया। मसीही जीवन एक व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि एक सामूहिक यात्रा है। हमें इस अद्‌भुत अवसर का लाभ उठाना चाहिए कि हम मसीह के उद्देश्य के लिए एक साथ खड़े हो सकते हैं। हमें उन लोगों से घिरा रहना चाहिए जो “छुटकारे के गीतों” को गाते हैं। जब हम सामूहिक रूप से आराधना करते हैं, तो हम उस उद्धार के आशीर्वादों का अनुभव करते हैं जो परमेश्वर हमें प्रदान करता है।

जब हम जीवन की परेशानियों से घिरे होते हैं या अपनी कमजोरियों, असफलताओं, निराशाओं और सन्देहों से अवगत होते हैं, तो समाधान यह नहीं है कि हम अपने ही बल पर खड़े होने की कोशिश करें। बल्कि हमें यह देखना चाहिए कि यीशु ने हमारे लिए क्या किया है और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे भाई-बहन हमें यह याद दिला रहे हैं कि मसीह ने हमारे लिए क्या किया है। परमेश्वर के वचन के साथ एक साधारण भजन-संग्रह की सहायता से हम एक-दूसरे को अंधकारमय दिनों में प्रोत्साहित कर सकते हैं और अपने मनों को पवित्रशास्त्र और गीतों के माध्यम से सत्यों से भर सकते हैं।

एलेक मोट्यर ने एक बार लिखा, “जब कोई सत्य किसी विश्वास-संहिता या भजन-संग्रह में समाहित हो जाता है, तो वह पूरी कलीसिया की आत्म-विश्वासपूर्ण सम्पत्ति बन जाता है।”[1] जब हम उन गीतों को गाते हैं जो गहरी आत्मिक सच्चाइयों से भरे होते हैं, तो हम प्रतिदिन अपने आप से कह सकते हैं, “मसीह ही मेरे लिए पर्याप्त है।” फिर परमेश्वर के लोगों के साथ मिलकर हम सामूहिक आराधना कर सकते हैं और अपने प्रभु से अनुग्रह और शान्ति माँग सकते हैं। एक जीवित कलीसिया हमेशा गाने वाली कलीसिया होगी।

आपको केवल एकान्त में आराधना करने के लिए नहीं बुलाया गया है। सामूहिक आराधना का एक उद्देश्य यही है: उद्धार के गीतों से घिरे रहना। आपके सृजनहार ने आपको इस रीति से बनाया है कि आप उन लोगों के साथ खड़े हों जो इन स्मरणीय शब्दों के द्वारा इस सच्चाई की आपके लिए पुष्टि करें और आप उनके लिए इसकी पुष्टि करें:

गाओ, मेरे उद्धारकर्ता के विषय में गाओ!

उसने अपने लहू से मुझे मोल लिया;

क्रूस पर उसने मेरी क्षमा को सुनिश्चित किया,

ऋण चुका दिया और मुझे स्वतन्त्र कर दिया।[2]

भजन 147

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 30–31; 1 तीमुथियुस 4


[1] लुक टू द रॉक: ऐन ओल्ड टेस्टामेण्ट बैकग्राऊण्ड टू आवर अण्डरस्टैण्डिग ऑफ क्राईस्ट (क्रेगेल, 2004), पृ. 222 टिप्पणी 48.

[2] पि. पि. ब्लिस, “आई विल सिंग ऑफ माई रिडीमर” (1876).

23 अक्तूबर : नया और उत्तम आदम

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23 अक्तूबर : नया और उत्तम आदम
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“क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।” रोमियों 5:19

आदम, जो पहला मनुष्य था, परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया था। प्रभु ने आदम को सारी सृष्टि में एक अनूठी भूमिका दी थी, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने में असफल रहा और उसे अदन से निकाल दिया गया। फिर परमेश्वर ने इस्राएलियों के साथ एक नया आरम्भ किया; उन्हें उसकी प्रजा के रूप में बुलाया गया ताकि वे उसके व्यवस्था-विधान का पालन करके उसके चरित्र को प्रकट करें। लेकिन आदम की तरह इस्राएल भी अपने बुलावे में असफल रहा और उन्हें निर्वासन में भेज दिया गया।

लेकिन जब हम नए नियम में आते हैं, तो हम देखते हैं कि जहाँ आदम और इस्राएल असफल हुए, वहाँ यीशु ने पूर्ण सफलता पाई। यीशु वही है जो परमेश्वर की प्रजा को होना चाहिए था—अर्थात नया और उत्तम आदम, सच्चा इस्राएल। वह आदम का वंशज है और आदम की सन्तान के साथ पूरी तरह से एक है। यीशु हमारे साथ पूरी तरह से एक हो गया, फिर भी आदम पाप कर बैठा था, लेकिन जब यीशु की परीक्षा ली गई, तो उसने कभी पाप नहीं किया (इब्रानियों 4:15)।

प्रभु यीशु वह एकमात्र व्यक्ति है जिसने सिद्ध रूप में परमेश्वर की पूरी आज्ञाकारिता की, और जिससे परमेश्वर सदा प्रसन्न है। उसने व्यवस्था के प्रत्येक शब्द का पालन किया। इसलिए यीशु एकमात्र मनुष्य है जो परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले जाने के योग्य नहीं था। लेकिन फिर भी, उसे निकाला गया। क्रूस पर उसने स्वेच्छा से वह दण्ड झेला जिसे आदम की सन्तानों को भुगतना चाहिए था, जो आदम के पाप में बंधे हुए पापी हैं।

सम्पूर्ण मनुष्यजाति अपनी प्रकृति और वंश के द्वारा आदम से जुड़ी हुई है। हम पाप में जन्मे हैं और परमेश्वर के विरुद्ध आदम के विद्रोह में भागीदार हैं। इसमें कोई अपवाद नहीं है। इस स्थिति का एकमात्र उत्तर यही है कि मनुष्य उस एकमात्र व्यक्ति को जानें जिसने पूरी व्यवस्था को सिद्ध रूप से पूरा किया और जो परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले जाने के योग्य नहीं था, लेकिन जिसने हमारे लिए क्रूस पर मृत्यु तक आज्ञाकारिता दिखाई ताकि हम अनुग्रह द्वारा विश्वास से वह सब पा सकें जो वह पाने के योग्य था, बजाय इसके कि हम वह सब भुगतें जिसे आदम ने भुगतना था।

यह सत्य हर बात का केन्द्र बिन्दु है। विश्वासियों के बारे में जो कुछ पहले सत्य था, उसकी जड़ आदम के एक ही कार्य में थी, लेकिन अब विश्वासियों के बारे में जो कुछ सत्य है, वह मसीह की आज्ञाकारिता का परिणाम है।

यदि आप आश्वासन में कमी महसूस कर रहे हैं, तो शायद आप अपने आत्मिक जीवन की जाँच इस दृष्टि से कर रहे हैं कि क्या आप पर्याप्त रूप से कार्य कर रहे हैं। लेकिन याद रखें कि आपका उद्धार आपके द्वारा किए गए किसी भी कार्य के कारण नहीं हुआ है। जैसे कि एक भजनकार हमें स्मरण कराता है, हमें उस कार्य के द्वारा बचाया गया है जो हमारे लिए किया गया है:

क्योंकि निर्दोष उद्धारकर्ता मरा,

मेरा पापी प्राण स्वतन्त्र ठहरा,

धर्मी परमेश्वर सन्तुष्ट हुआ,

उसे देखकर मुझे क्षमा किया।[1]

रोमियों 5:6-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 27–29; 1 तीमुथियुस 3 ◊


[1] चारिटी लीस बानक्रोफ्ट, “बिफोर द थ्रोन ऑफ गॉड अबव” (1863).

22 अक्तूबर : प्रत्येक उत्तर जो हमें चाहिए

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“जब पौलुस एथेंस में उनकी बाट जोह रहा था, तो नगर को मूरतों से भरा हुआ देखकर उसका जी जल गया। अतः वह आराधनालय में यहूदियों और भक्तों से, और चौक में जो लोग उससे मिलते थे उनसे हर दिन वाद–विवाद किया करता था। तब इपिकूरी और स्तोईकी दार्शनिकों में से कुछ उससे तर्क करने लगे।” प्रेरितों 17:16-18

जब पौलुस एथेंस नगर में अपने समय के बुद्धिजीवियों को सम्बोधित कर रहा था, तब उसने पाया कि उसके श्रोता दो मूलभूत विचारधाराओं से प्रभावित थे: स्टॉइकवाद और एपिक्यूरियनवाद। स्टॉइकवाद यह मानता है कि संसार की घटनाएँ एक कठोर, भावशून्य और व्यक्तिगत रूप से असम्बद्ध नियति द्वारा नियन्त्रित होती हैं, जबकि एपिक्यूरियनवाद यह सिखाता है कि “अच्छाई” वही है जिससे सबसे अधिक सुख मिलता है। लेकिन ये दोनों ही विचारधाराएँ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सन्तान के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

मसीही विश्वास की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि हम संसार को देखने और समझाने के अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर सकते हैं। अपने चारों ओर की संस्कृति के विपरीत, हम जानते हैं कि हमारा समय परमेश्वर के हाथ में है (भजन 31:15)—कि हम किसी अंधी ताकत के शिकंजे में फँसे हुए नहीं हैं और न ही हम किस्मत की लहरों पर उछाले जा रहे हैं। चाहे कोई व्यक्ति मार्क्सवाद, हिन्दू धर्म, नास्तिकता या किसी अन्य दर्शन या धर्म से प्रभावित हो—हर कोई अन्ततः उन प्रश्नों और असुरक्षाओं का सामना करता है जो उनकी आस्था के भीतर छिपे होते हैं। क्या वे एक वर्गहीन समाज के संघर्ष में उलझे हुए हैं या जन्म और पुनर्जन्म के अन्तहीन चक्र में? शायद वे मानते हैं कि जीवन का कोई अर्थ ही नहीं है। लेकिन किसी के प्रश्न या मान्यताएँ चाहे जो भी हों, परमेश्वर उनके हर प्रश्न का उत्तर देता है।

एक मूर्खतापूर्ण और असंवेदनशील नियति के बन्धन में जीने, या अनिश्चितता की गिरफ्त में रहने के बजाय, विश्वासी लोग अब अटल आशा के साथ जीवन जीते हैं। पौलुस की तरह ही अब हमें भी वे उत्तर सौंपे गए हैं जो परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा हमें दिए हैं—वे उत्तर जिन्हें हमें इस संसार से साझा करना है। परमेश्वर ने हमें एक महान भरोसा दिया है और उसका नाम है यीशु।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि क्या हमारे पास ऐसा सन्देश है जो प्रत्येक मनुष्य की गहरी तड़प और हर दर्शन या धर्म की आपत्तियों का उत्तर दे सकता है—क्योंकि हमें ऐसा ही सन्देश दिया गया है। असली प्रश्न तो यह है कि क्या हम उस सन्देश को साझा करेंगे? जब पौलुस एथेंस में था, तो उसने वह देखा जो दूसरों ने नहीं देखा था। उसने उन प्रभावशाली स्थलों का आनन्द नहीं लिया, न ही वह नगर की बौद्धिक प्रतिष्ठा से अभिभूत हुआ। उसने देखा कि यह नगर मूर्तिपूजा में डूबा हुआ है—और “उसका जी जल गया,” क्योंकि हर बार जब किसी मूर्ति की पूजा की जाती है, तो प्रभु यीशु की उस महिमा को छीना जाता है, जो केवल उसी को मिलनी चाहिए। और इसलिए अपनी प्रतिष्ठा की परवाह किए बिना, पौलुस ने उस नगर के नागरिकों के साथ तर्क किया और उन्हें पुनरुत्थान की आशा का सुसमाचार सुनाया (प्रेरितों 17:18)।

आज जहाँ भी आप रहते हैं, किसी न किसी रूप में आप अपने आप को एक आधुनिक एथेंस में पाते हैं। आपके आस-पास के लोग किन मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं? क्या उन्हें देखने से आपका जी भी जल उठता है? आपके पास वह उत्तर है जो किसी भी मूर्ति की तुलना में अधिक सन्तोष दे सकता है। आपके पास परमेश्वर को महिमा देने का अवसर है। आज आप किससे बात कर सकते हैं और कह सकते हैं: “क्या आप देख सकते हैं कि जिसे आप पूज रहे हैं, वह आपको सन्तुष्ट नहीं कर सकता? क्या मैं आपको सावधान कर सकता हूँ कि आप उस परमेश्वर की उपेक्षा कर रहे हैं जो अर्थ और आशा देता है—परन्तु जिसका उपहास नहीं किया जा सकता? क्या मैं आपको यीशु मसीह को जानने में मिले उत्तरों के बारे में बता सकता हूँ?”

1 थिस्सलुनीकियों 1:1-10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 25–26; 1 तीमुथियुस 2

22 October : पती-पत्नींसाठीं पूर्णानंद

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22 October : पती-पत्नींसाठीं पूर्णानंद
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री मंडळी जशी ख्रिस्ताच्या अधीन असते, तसे स्त्रियांनीही सर्व गोष्टींत आपापल्या पतीच्या अधीन असावे.पतींनो, जशी ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें. (इफिस 5:24-25)

देवानें वैवाहिक जीवनासाठीं प्रीतिचा एक अनुकरणीय आदर्श नेमून दिलेला आहे.

पती-पत्नीच्या भूमिका सारख्या नसतांत. पतीने मंडळीचा मस्तक असलेल्या ख्रिस्ताकडून त्याच्यासाठीं ठरविलेलें सुत्रे घायची आहें. तर पत्नीने ख्रिस्ताच्या अधीन असलेल्या मंडळीसाठीं देवानें जो नमुना दिला आहे त्यापासून तिनें तिचे सुत्रे घायची आहें.

असे केल्यानें, पापांत झालेंल्या पतनाची दुष्टायी आणि त्याचे विनाशकारी परिणाम पालटू लागतांत. पापांत झालेंल्यां पतनामुळें स्त्रीचे मस्तक म्हणून पुरुषाची वात्सल्यमय भूमिका पालटून काही पुरुषांमध्यें तिने जुलूमशाही वर्चस्वाचे विकृत रूप घेतलें आहे, तर इतर पुष्कळ पुरुषांमध्यें तिचे रुपांतर आपल्या कर्तव्याशी हलगर्जीपणा बाळगण्यांत झाला. या पतनामुळें स्त्रीचे शहाणपण आणि ऐच्छिक अधीनता विकृत होऊन तिचे रुपांतर काहीं स्त्रियांमध्यें कावेबाज व कारस्थानी वृत्तीत झालें आहे तर इतर काहीं स्त्रियांमध्यें निर्लज्ज मुजोरी आणि दबंगपणाची वृत्ती निर्माण झालीं आहें.

पापाच्या या बंधनापासून सोडविणारा मशीहा काळाची पूर्णता झाल्यावर जेव्हां येशू ख्रिस्तामध्यें प्रकट होणार होता तेव्हा आम्हीं ज्या मुक्तीची प्रतीक्षा करित होतो ती मुक्ती म्हणजें स्त्रीचे मस्तक म्हणून पुरुषाची वात्सल्यमय भूमिका आणि स्त्रीची ऐच्छिक अधीनता ह्या व्यवस्थेचा विध्वंस करण्यासाठीं नव्हती तर ती पुन्हा स्थापित व्हावी म्हणून होती. पत्नींनो, आनंदी मंडळीसाठीं देवानें जो कित्ता घालून दिला आहे त्याचे अनुकरण करून तुम्हीं तुमच्या पतन पावलेल्या अधिनस्थ भूमिकेची पुनर्स्थापना करा! पतींनो, प्रीतिनें भरलेला ख्रिस्त असा जो मंडळीचा प्रेमळ मस्तक म्हणून देवानें जो आदर्श तुमच्यापुढे मांडीला त्याचे अनुकरण करून तुम्हीं तुमच्या पतन पावलेल्या मस्तकपणाच्या भूमिकेची पुनर्स्थापना करा!

मी इफिस 5:21-33 मध्यें या दोन गोष्टी पाहतो: (1) वैवाहिक जीवनांत ख्रिस्ती पूर्णानंद काय आहे याचे दर्शन आणि (2) आणि त्याच्या प्रेरक-शक्तीचा उद्गम.

पत्नींनो, तुमच्या वैवाहिक नात्यातील “मस्तक” किंवा पुढारी म्हणून देवानें तुमच्या पतींना जी भूमिका नेमून दिलीं आहे ती मान्य करून आणि त्याला पूर्ण सन्मान देऊन तुमच्या पतीच्या आनंदात तुमचा आनंद शोधा. पतींनो, जसे ख्रिस्तानें मंडळीचे पुढारपण केलें आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें अगदी तसेच पुढारपण करण्याची आपली जबाबदारी स्वीकारून तुमच्या पत्नीच्या आनंदात तुमचा आनंद शोधा.

मी आनंदाने माझ्या आयुष्यात देवाच्या चांगुलपणाची साक्ष देऊं इच्छितो. 1968 मध्यें माझे लग्न झालें त्याच वर्षी मला ख्रिस्ती पूर्णानंदाचा शोध लागला. तेव्हापासून, नोएल आणि मी, येशू ख्रिस्ताच्या आज्ञेत राहून, आम्हीं शक्य तितक्या आवेशाने, पूर्णपणें चिरस्थायी असलेल्या आनंदाचा एकमेकांमध्यें शोध करित आलेले आहों. जरी अपूर्णपणें, तर पुष्कळ प्रसंगी अर्ध्या मनाने का होईना, आम्हीं एकमेकांच्या आनंदातच स्वतःचा आनंद लुटला आहे.

आणि आम्हीं लग्नाच्या जवळजवळ 50 वर्षांनंतर एक मनानें अशी साक्ष देऊ शकतो : जे लग्न करण्याचा विचार करित आहेत त्यांना आमचा संदेश हा कीं तुमचा मनोरथ साध्य करण्याचा हाच मार्ग आहे. माझ्या आणि नोएलच्या बाबतींत, विवाह म्हणजें ख्रिस्ती पूर्णानंदाचा आवश्यक घटक आहे. जेव्हां एक जोडीदार आपल्या दुसऱ्या जोडीदाराच्या आनंदात आपल्या आनंदाचा शोध घेतो आणि देवानें नेमून दिलेली आपली भूमिका पार पाडतो, तेव्हा ख्रिस्त आणि मंडळी यांच्यातील नात्याचा दृष्टांत म्हणून विवाहाचे रहस्य त्याच्या महान गौरवासाठीं आणि आपल्या महान आनंदासाठीं प्रकट होते.