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20 सितम्बर : दूसरों के लिए मन

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20 सितम्बर : दूसरों के लिए मन
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“उसके महात्म्य और पराक्रम के कामों, और मोर्दकै की उस बड़ाई का पूरा ब्योरा, जो राजा ने उसकी की थी, क्या वह मादै और फारस के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में नहीं लिखा है? यहूदी मोर्दकै, क्षयर्ष राजा ही के नीचे था, और यहूदियों की दृष्‍टि में बड़ा था, और उसके सब भाई उससे प्रसन्न थे, क्योंकि वह अपने लोगों की भलाई की खोज में रहा करता था और अपने सब लोगों से शान्ति की बातें कहा करता था।” एस्तेर 10:2-3

कभी-कभी इतिहास के क्रम में ऐसा होता है कि कोई एक व्यक्ति उठ खड़ा होता है, जिसकी उपस्थिति के बिना सब कुछ भिन्न होता। ऐसा ही एक व्यक्ति विंस्टन चर्चिल था—ब्रिटेन का पूर्व प्रधानमन्त्री, राजनेता और स्वतन्त्रता का रक्षक। इतिहास का कोई भी विद्यार्थी ईमानदारी से इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि यदि चर्चिल आगे न बढ़ा होता, तो द्वितीय विश्व युद्ध और उसके परिणामों का इतिहास पूरी तरह भिन्न होता। यद्यपि प्रायः इतिहास की धारा किसी एक व्यक्ति के कार्यों की परवाह किए बिना आगे बढ़ती हुई प्रतीत होती है, फिर भी आप अपने ही देश और समाज में ऐसे लोगों के विषय में सोच सकते हैं जिन्होंने निर्णायक रूप से इतिहास की दिशा मोड़ दी।

पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में मोर्दकै ऐसा ही एक व्यक्ति था। उसके जीवन का पूरा ब्योरा मादै और फारस के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में लिखा गया, क्योंकि यदि वह न उठा होता, तो परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से भिन्न होतीं।

मोर्दकै फारसी नहीं था। वह यहूदी था और एक भिन्न परमेश्वर (एकमात्र सच्चे परमेश्वर) का आदर करता हुआ, फारसियों से भिन्न रीति से जीवन बिताता हुआ और भिन्न परम्पराओं का पालन करता हुआ एक यहूदी के रूप में ही जीवन व्यतीत करता था। फिर भी, यद्यपि वह इतना भिन्न था, वह फारसियों के द्वारा सम्मानित हुआ, इसलिए नहीं कि उसने दोहरी बात की या राजा क्षयर्ष की कृपा पाने का यत्न किया, बल्कि इसलिए कि उसमें पूर्ण सत्यनिष्ठा और नैतिक स्थिरता थी। मोर्दकै ने लोकप्रिय बनने का लक्ष्य नहीं रखा; उसने वही करने का निश्चय किया जो सही था—जो परमेश्वर ने उसे करने के लिए दिया था।

जब किसी को बड़े प्रभाव का पद दिया जाता है, तो प्रायः अन्य लोग ईर्ष्या के कारण उससे अप्रिय हो जाते हैं। अपने सहयहूदियों में मोर्दकै की स्थाई लोकप्रियता असामान्य थी। सम्भवतः इसका एक कारण यह था कि वह उनकी चिन्ता करता था। वह अपनी प्रजा से अलग-थलग या उदासीन नहीं हुआ, और अपने पद का उपयोग अपने स्वयं के समृद्धि के लिए नहीं बल्कि दूसरों के कल्याण के लिए करता रहा और “अपने लोगों की भलाई की खोज में रहा करता था।” जैसा कि एक व्याख्याकार ने इसे संक्षेप में कहा है, “मोर्दकै की स्थाई विरासत यह है कि उसने राजा की सेवा और अपनी प्रजा की सेवा को एक साथ जोड़ा, और किसी में भी समझौता नहीं किया। वह दोनों की सेवा करता है और दोनों के लिए बोलता है, दोनों की भलाई और शान्ति चाहता है।”[1]

मोर्दकै से सीखें। वही करने का लक्ष्य रखें जो सही है—जो परमेश्वर ने आपको करने के लिए दिया है, उस स्थान और उस समय में जिसे उसने आपके लिए ठहराया है। मोर्दकै के समान, आपकी विरासत ऐसी हो कि लोग पहचान सकें कि क्योंकि आपका मन परमेश्वर के लिए है, इसलिए आपका मन दूसरों के लिए भी है और इस प्रकार उनके हित में विश्राम, कल्याण, शान्ति और समृद्धि लाने के लिए जो कुछ आप कर सकते हैं, करते रहें। आपके काम इस संसार की इतिहास की पुस्तकों में लिखे जाएँ या न लिखे जाएँ—परन्तु अनन्तकाल में वे लिखे जाएँगे और मनाए जाएँगे।

    एस्तेर 10:1–3

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 1–2; यूहन्ना 8:30-59


[1] डेब्रा रीड, एस्तेर, टिण्डेल ओल्ड टेस्टामेण्ट कॉमेण्ट्रीज़ (इण्टरवर्सिटी, 2008).

20 September : खरेखुरे सौख्यवादी नाहीं

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20 September : खरेखुरे सौख्यवादी नाहीं
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“पृथ्वीवर आपल्यासाठीं संपत्ती साठवू नका; तेथे कसर व जंग खाऊन नाश करतांत आणि चोर घर फोडून चोरी करतांत; तर स्वर्गात आपल्यासाठीं संपत्ती साठवा; तेथे कसर व जंग खाऊन नाश करत नाहींत व चोर घरफोडी करत नाहींत व चोरीही करत नाहींत.” (मत्तय 6:19-20)

देशाच्या राष्ट्रीय बँकांतून मोठ्याने ओरडून सांगणें आवश्यक असलेला संदेश हा आहे: जगिक मनुष्या, तू खराखुरा सौख्यवादी नाहींस!

ज्यां वाढत्या महागाईचे भक्ष बनतांत आणि ज्यांना मृत्यूचा जंग लागतो अशा किरकोळ आनंद देणाऱ्या गोष्टींत समाधानी राहणें सोडा. गुंतवणूक करायची असेल तर ती उच्च-उत्पन्न देणाऱ्या स्वर्गातील दैवी विम्यात करा जिथें तुमचे धन पूर्णपणें सुरक्षित राहते.

भौतिक सुखसोयी आणि सुरक्षितता आणि रोमांचक आनंद अशा नश्वर गोष्टींसाठीं आपलें आयुष्य घालवणें म्हणजें पैसे उंदराच्या छिद्रांत टाकण्यासारखे आहे. परंतु प्रीतिचे जे श्रम त्यांत जर आपण आपलें आयुष्य गुंतवतो तर शेवटी अतुल्य आणि सार्वकालिक अश्या मोठ्या आनंदाचा लाभांश मिळतो:

“जे तुमचे आहे ते विकून दानधर्म करा; तसेच स्वर्गातील अक्षय धनाच्या जीर्ण न होणार्‍या थैल्या आपणांसाठीं करून ठेवा; तेथे चोर येत नाहीं व कसर लागत नाहीं” (लूक 12:33).

हा उपदेश उत्तम गोष्टींची बातमी आहे : ख्रिस्ताकडें या, ज्याच्या सान्निध्यात पूर्णानंद आणि सौख्ये सदोदित आहेत. खरे ख्रिस्ती सौख्यवादी बनण्यासाठीं श्रम घ्या. कारण परमेश्वर बोलला आहे: ऐशोआरामात जगण्यापेक्षा प्रीति करणें अधिक धन्य आहे! सांप्रतकाळी अति धन्य आणि येणाऱ्या युगात सर्वकाळासाठीं धन्य.

19 सितम्बर : एक दृढ़ प्रतिबद्धता

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19 सितम्बर : एक दृढ़ प्रतिबद्धता
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“यहूदियों ने अपने-अपने लिए और अपनी सन्तान के लिए, और उन सभों के लिए भी जो उनमें मिल गए थे यह अटल प्रण किया, कि उस लेख के अनुसार प्रति वर्ष उसके ठहराए हुए समय में वे ये दो दिन मानें; और पीढ़ी-पीढ़ी, कुल-कुल, प्रान्त-प्रान्त, नगर-नगर में ये दिन स्मरण किए और माने जाएँगे, और पूरीम नाम के दिन यहूदियों में कभी न मिटेंगे और उनका स्मरण उनके वंश से जाता न रहेगा।” एस्तेर 9:27-28

आधुनिक पश्चिमी संस्कृति में “प्रतिबद्धता” एक कम प्रचलित शब्द है।

लोग प्रायः कहते हैं, “मैं नहीं चाहता कि आप किसी प्रकार अपने को प्रतिबद्ध महसूस करें।” परन्तु प्रतिबद्धता अक्सर आवश्यक और अच्छी होती है। मैं चाहता हूँ कि मैं अपनी पत्नी के लिए प्रतिबद्ध रहूँ, और मैं चाहता हूँ कि वह मेरे लिए प्रतिबद्ध रहे। जब मेरे बच्चे छोटे थे, तो मैं चाहता था कि वे माता-पिता के अधिकार के सम्बन्ध में हमारे लिए प्रतिबद्ध रहें। वास्तव में, मनुष्यों के बीच जो भी सम्बन्धों के जो प्रतिबद्धताएँ होती हैं, वे सबसे पहले स्वयं परमेश्वर के लिए प्रतिबद्धताएँ होती हैं।

हामान के हाथों विनाश से बचाए जाने के बाद यहूदियों ने “यह अटल प्रण किया” कि वे इस दिन को एक स्मारक के तौर पर मनाएँगे। वे इस नई परम्परा को मानने के लिए आधे मन से सहमत नहीं हुए, कि जब सुविधा हो तभी ऐसा करेंगे। उन्होंने निश्चय किया कि वे इसे अवश्य पूरा करेंगे। यही कर्तव्य का स्वभाव है।

यहूदियों ने केवल स्वयं के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी सन्तानों और “उन सभों के लिए भी जो उनमें मिल गए थे,” इस दायित्व की प्रतिबद्धता स्थापित की। उन्होंने इसे हर स्थान और हर पीढ़ी के लिए एक व्यापक प्रतिबद्धता बनाया। और 2500 बाद भी पूरीम की यह परम्परा जारी है। संसार भर का यहूदी समाज आज भी इस पर्व को मनाता है, क्योंकि उस समय के लोगों ने यह निश्चय किया था कि एस्तेर के समय में और एस्तेर के साहस के द्वारा परमेश्वर के हस्तक्षेप को आने वाली पीढ़ियाँ कभी न भूलें।

हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि हमें किसी व्यक्ति या किसी बात के लिए प्रतिबद्ध महसूस करने की आवश्यकता नहीं है, कि हम केवल वर्तमान में अपने लिए जी सकते हैं, और यह कि अधिकांश प्रतिबद्धताओं पर भविष्य में फिर से विचार किया जा सकता है यदि वे असुविधाजनक या अस्थिर लगें। परन्तु परमेश्वर के राज्य में प्रतिबद्धता का महत्त्व है। आखिरकार, परमेश्वर ने स्वयं को अपनी प्रजा को बचाने और सम्भालने के लिए प्रतिबद्ध किया है। जिन बातों के प्रति आप प्रतिबद्ध रहते हो और जिन्हें थामे रहते हो, वे यह प्रकट करती हैं कि आपके लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्या है। इसलिए सुसमाचार के उत्सव के प्रति स्वयं को समर्पित करें, और उन महान अवसरों में भाग लें जिन्हें परमेश्वर ने हमें यह स्मरण करने के लिए दिया है कि उसने हमारे लिए क्या किया है—अर्थात् बपतिस्मा और प्रभु भोज के संस्कार। और जहाँ तक आपके वश में है, यह सुनिश्चित करें कि ये बातें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचें। यदि मसीह हजार वर्ष बाद भी न लौटे, तब भी ऐसे लोग होंगे जो सुसमाचार को जानेंगे और उसके लिए खड़े रहेंगे, क्योंकि हमारी पीढ़ी ने यह प्रतिबद्धता की है।

  एस्तेर 9:20–32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 7–9; यूहन्ना 8:1-29 ◊

19 September : आम्हांला मिळालेला अवर्णनीय विशेषाधिकार

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19 September : आम्हांला मिळालेला अवर्णनीय विशेषाधिकार
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देव मोशेला म्हणाला, “मीं आहें तो आहें.” (निर्गम 3:14)

“मीं आहें तो आहें” (I AM WHO I AM) या पराक्रमी नावाची एक अभिव्यक्ती म्हणजें ही कीं हा अविनाशी, अद्वितीय, सर्वकाहीं पूर्वनियोजित करणारा देव येशू ख्रिस्तामध्यें प्रकट होऊन आपल्याजवळ आला आहे.

योहान 8:56-58 मध्यें येशू यहुदी पुढाऱ्यांनी त्याच्या केलेंल्यां टीकेला उत्तर देत आहे. तो म्हणतो, “तुमचा बाप अब्राहाम माझा दिवस पाहण्यासाठीं उल्लसित झाला; तो त्यानें पाहिला व त्याला हर्ष झाला.” तेव्हा यहूदी त्याला म्हणाले, “तुम्हांला अजून पन्नास वर्षे झाली नाहींत आणि तुम्हीं अब्राहामाला पाहिले आहे काय?” येशू त्यांना म्हणाला, “मी तुम्हांला खचीत खचीत सांगतो, अब्राहामाचा जन्म झाला त्यापूर्वी मी आहे.”

येशू ह्याहीपेक्षा गौरवी शब्द बोलू शकला असता का? जेव्हा येशू म्हणाला, “अब्राहामाचा जन्म झाला त्यापूर्वी मी आहे,” तेव्हा त्यानें देवाच्या नावाला लागू होणारे असें महान परम सत्य स्वतःसाठीं वापरलें, जो नम्र होऊन दासाचे स्वरूप घेऊन आला, ज्याने आमच्या सर्व अपराधांसाठीं प्रायश्चित करण्यासाठीं स्वतःला अर्पण केलें, आणि आपल्यासाठीं मार्ग मोकळा केला, जेणेंकरून आपल्याला यापुढे कोणतीही भीती न बाळगता या अविनाशी, अद्वितीय, सर्वसमर्थ देवाचा महिमा पाहता यावा.

आपण जें देवापासून जन्मलेलें आहों त्यां आपणाला येशू ख्रिस्ताद्वारे परमेश्वर – जो महान “मीं आहें तो आहें” म्हणजें प्रत्यक्ष देव – त्याला आपला पिता म्हणून ओळखण्याचा अवर्णनीय विशेषाधिकार मिळाला आहे :

  • जो आहे
  • जो स्वतःच्या व्यक्तिमत्वाचा आणि सामर्थ्याचा कर्ता आहे
  • जो कधीही बदलत नाहीं
  • जो या विश्वात असलेल्या सर्व शक्तींचा आणि सर्व उर्जेंचा प्रवाह आहे
  • आणि ज्याचे प्रतिबिंब या संपूर्ण सृष्टीला आपल्या जीवनातून प्रकट करणें अगत्याचे आहे.

देव करो, ज्यांना देवाच्या नावाची ओळख झालेंली आहे त्यांनी त्याजवर आपला भाव ठेवावा (स्तोत्र 9:10).

18 सितम्बर : महान उलटफेरों का परमेश्वर

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18 सितम्बर : महान उलटफेरों का परमेश्वर
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“जिस दिन राजा की आज्ञा और नियम पूरे होने को थे, और यहूदियों के शत्रु उन पर प्रबल होने की आशा रखते थे, परन्तु इसके विपरीत यहूदी अपने बैरियों पर प्रबल हुए।” एस्तेर 9:1

हामान और उसके साथियों को पूरा विश्वास था कि बारहवें महीने के तेरहवें दिन यहूदी जाति का विनाश अवश्यम्भावी है। यह आज्ञा सारे राज्य में घोषित हो चुकी थी। यहूदियों का सर्वनाश होना तय समझा जा रहा था। परन्तु जब वह दिन आया, तो यहूदियों ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की। हामान और उसके मित्रों ने लगभग एक वर्ष यह ठहराने में लगाया था कि उनके शत्रुओं को मारने के लिए कौन सा दिन सबसे उपयुक्त होगा (एस्तेर 3:7)। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि लेखक उस दिन को विशेष रूप से चिह्नित करता है, जब बड़ा उलटफेर हुआ—“जिस दिन” को हामान ने चुना था!

यह एस्तेर की पुस्तक में कई बड़े उलटफेरों में से केवल एक है। इससे पहले हामान अभी राजा और रानी एस्तेर के साथ भोज से निकलकर ऐसा अनुभव कर रहा था मानो वह संसार की चोटी पर हो। वह अपने घर गया और अपनी पत्नी और मित्रों से “अपने धन के वैभव, और अपने बाल–बच्चों की बढ़ती” का वर्णन किया (एस्तेर 5:11)। परन्तु उसी दिन, जिस दिन को हामान ने चुना था, उसके दसों पुत्र—जो उसकी शान थे—मार डाले गए (9:7–10)। उसका घराना वैभव से गिरकर विनाश में पहुँच गया।

मौर्दकै का अनुभव इसके ठीक विपरीत था। वह गुमनामी और स्पष्ट महत्त्वहीनता से उठकर राजा के अधीन सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया। उसका आरम्भ इस साधारण रीति से हुआ था, “शूशन गढ़ में मोर्दकै नामक एक यहूदी रहता था” (एस्तेर 2:5), जो राजा के फाटक पर बैठता था—जो कुछ खास नहीं लगता! परन्तु पुस्तक के अन्त तक वह ऐसा हो गया कि “मोर्दकै तो राजा के यहाँ बहुत प्रतिष्ठित था, और उसकी कीर्ति सब प्रान्तों में फैल गई; वरन् उस पुरुष मोर्दकै की महिमा बढ़ती चली गई” (9:4)।

मौर्दकै और एस्तेर ने अपने शत्रुओं के विनाश पर घमण्ड नहीं किया। परन्तु उन्होंने अपने यहूदी समाज के साथ नृत्य किया और आनन्द मनाया (एस्तेर 9:18), क्योंकि उन्होंने पहचाना कि ये उलटफेर परमेश्वर की ओर से थे, और इसलिए वे उनकी दृष्टि में अद्‌भुत थे (भजन 118:23)। हम उन्हें मानो उद्धार का यह गीत गाते हुए सुन सकते हैं:

तू ने मेरे लिए विलाप को नृत्य में बदल डाला;

तू ने मेरा टाट उतरवाकर मेरी कमर में आनन्द का पटुका बाँधा है,

ताकि मेरी आत्मा तेरा भजन गाती रहे और कभी चुप न हो।

हे मेरे परमेश्‍वर यहोवा, मैं सर्वदा तेरा धन्यवाद करता रहूँगा!” (भजन 30:11–12)

परमेश्वर महान उलटफेरों का परमेश्वर है। वह शाप को आशीष में बदल सकता है। वह असम्भव को सिद्ध करता है; “अपरिवर्तनीय” शब्द उसके लिए अर्थहीन है, और कोई भी परिस्थिति उसके लिए अजेय नहीं है। कलवरी का क्रूस इसका सर्वोच्च और अनन्त प्रमाण है।

यदि आप ऐसी परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं जो निराशाजनक प्रतीत होती हैं, तो सहायता के लिए परमेश्वर को पुकारें। चाहे आपको अपनी सारी सांसारिक यात्रा में प्रतीक्षा ही क्यों न करनी पड़े, वह आपको छुड़ाने की प्रतिज्ञा करता है। और यदि आप अपने जीवन में पहले ही परमेश्वर के किसी उलटफेर का अनुभव कर चुके हैं, तो समय निकालकर उसका धन्यवाद करें और उसकी स्तुति गाएँ। वह निश्चय ही भला है!

  एस्तेर 9:1–19

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 4– 6; यूहन्ना 7:28-53

18 September : एकमेव खरे स्वातंत्र्य

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18 September : एकमेव खरे स्वातंत्र्य
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“जीविताची आवड धरून, चांगले दिवस पाहावे, अशी ज्याची इच्छा असेल. . . त्यानें वाइटाकडें पाठ फिरवून बरे ते करावे.” (1 पेत्र 3:10-11)

खरे स्वातंत्र्य म्हणजें काय? तुम्हीं स्वतंत्र आहांत का?

जर तुम्हीं पूर्णपणें स्वतंत्र आहांत, तर येथे अशा चार गोष्टी आहेंत ज्यां तुमच्या बाबतींत सत्य असायला पाहिजेत.

  1. जर तुम्हांला एखादी गोष्ट करण्याची इच्छा नसेल, तर तुम्हीं ती करण्यास पूर्णपणें स्वतंत्र नाहीं. ओह, तुम्हांला जे करावेसे वाटत नाहीं ते करण्याची इच्छाशक्ती तुमच्याकडें असू शकते, परंतु आपण याला खरे स्वातंत्र्य म्हणत नाहीं. आपल्याला ज्या प्रकारे जीवन जगायचे आहे हे ते नाहीं. आपण एका अशा बंधनांत आणि दबावात असतो जे आपल्याला नको आहे.
  2. आणि जर तुम्हांला एखादी गोष्ट करण्याची इच्छा असेल, परंतु ती साध्य करण्याची शक्ती मात्र नसेल, तर तुम्हीं ती करण्यास पूर्णपणें स्वतंत्र नाहीं.
  3. आणि जर तुम्हांला एखादी गोष्ट करण्याची इच्छा आणि शक्ती ह्या दोन्ही असतील, परंतु ती करण्याची संधीच जर नसेल, तर तुम्हीं ती करण्यास पूर्णपणें स्वतंत्र नाहीं.
  4. आणि जर तुम्हांला एखादी गोष्ट करण्याची इच्छा असेल, आणि ती करण्याची शक्ती असेल, आणि ती करण्याची संधीही असेल, परंतु शेवटी ती तुमचा नाश करत असेल, तर जेव्हां तुम्हीं ती करता, तुम्हीं पूर्णपणें स्वतंत्र नाहीं —जे खरे स्वात्यंत्र आहे, त्यानुसार नक्कीच स्वतंत्र नाहीं.

जर पूर्णपणें स्वतंत्र व्हावयाचे असेल, तर आपल्याजवळ ती इच्छा, ती शक्ती आणि ती संधी आवश्यक आहे ज्यां द्वारे साध्य केलेंल्यां गोष्टीं आपल्याला सर्वकाळचा आनंद देतील. म्हणजें पश्चात्ताप होणार नाहीं. आणि केवळ येशू, जो देवाचा पुत्र जो मरण पावला आणि आपल्यासाठीं पुन्हा उठला, तोच हे शक्य करू शकतो.

जर पुत्र तुम्हांला बंधमुक्त करील तर तुम्हीं खरेखुरे बंधमुक्त व्हाल (योहान 8:36).

17 सितम्बर : रोना, विनती करना, और बोलना

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17 सितम्बर : रोना, विनती करना, और बोलना
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“फिर एस्तेर दूसरी बार राजा से बोली; और उसके पाँव पर गिर, आँसू बहा बहाकर उससे गिड़गिड़ाकर विनती की कि अगागी हामान की बुराई और यहूदियों की हानि की उसकी युक्ति निष्फल की जाए।” एस्तेर 8:3

परमेश्वर की सन्तान के लिए स्वार्थ कभी स्वीकार्य नहीं है।

यदि एस्तेर का उद्देश्य केवल इतना ही होता कि हामान को उसके कर्मों का उचित फल मिल जाए, और उसका अपना जीवन बच जाए तथा उसका ऊँचा पद सुरक्षित रहे, तो हामान की मृत्यु के साथ ही उसका लक्ष्य पूरा हो जाता। परन्तु उसका उद्देश्य इससे कहीं बढ़कर था—उसमें न केवल हामान का दण्ड और उसकी अपनी सुरक्षा सम्मिलित थी, बल्कि पूरे यहूदी राष्ट्र का उद्धार भी शामिल था। जब तक उसकी प्रजा विनाश के खतरे में थी, तब तक केवल स्वयं का बच जाना एस्तेर के लिए पर्याप्त नहीं था।

जब एस्तेर “दूसरी बार राजा से बोली,” तो अभी कुछ ही घण्टे बीते थे जब हामान केवल अपने ही विषय में चिन्तित होकर एस्तेर के पाँवों पर गिर पड़ा था (एस्तेर 7:7-8)। इसके विपरीत, एस्तेर राजा के पाँवों पर अपनी प्रजा के लिए चिन्तित होकर गिरी। वह उनका विनाश सहन नहीं कर सकती थी।

सदियों बाद, एक और यहूदी ने, जब उसका जीवन परमेश्वर द्वारा पूरी तरह पकड़ लिया गया, यह कहा, “मुझे बड़ा शोक है, और मेरा मन सदा दुखता रहता है, क्योंकि मैं यहाँ तक चाहता था कि अपने भाइयों के लिए जो शरीर के भाव से मेरे कुटुम्बी हैं, स्वयं ही मसीह से शापित हो जाता। वे इस्राएली हैं, और लेपालकपन का अधिकार और महिमा और वाचाएँ और व्यवस्था और उपासना और प्रतिज्ञाएँ उन्हीं की हैं” (रोमियों 9:2-4)। प्रेरित पौलुस इस बात से सन्तुष्ट नहीं था कि वह अकेला दमिश्क के मार्ग पर यीशु से मिला था। वह यह लालसा रखता था कि उसके लोग भी मसीह के उद्धारक ज्ञान तक पहुँचे। इसमें उसने अपने प्रभु और उद्धारकर्ता का अनुसरण किया, जो अपने स्वर्गिक सिंहासन से उतरकर चरनी की दीन दशा में आया, ताकि अपनी प्रजा को कीचड़ भरे गड्ढे से निकालकर अपने अनन्त स्वर्ग में ले जाए। स्वयं प्रभु यीशु उन लोगों के लिए रोया जिन्होंने यह न पहचाना कि उसके आगमन में परमेश्वर उनके सामने युद्ध के स्थान पर शान्ति और न्याय के स्थान पर उद्धार रख रहा था (लूका 19:41-44)।

जब कोई पुरुष या स्त्री मसीह के उद्धार को जान लेता है, तो न केवल वह परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध में स्थापित होता है, बल्कि वह यह भी समझने लगता है कि जिन लोगों ने यीशु पर विश्वास नहीं किया है, उनका परमेश्वर के साथ सम्बन्ध अभी भी टूटा हुआ है और वे न्याय का सामना कर रहे हैं, तथा उसकी प्रेममय उपस्थिति से दूर अनन्तता की ओर बढ़ रहे हैं।

हमें कभी हामान के समान नहीं होना चाहिए, जो केवल अपने ही विषय में चिन्तित था। जब हम ऐसे होते हैं, तो परमेश्वर हमें क्षमा करे। यह उचित है कि हम रोएँ, जब हम यह पहचानते हैं कि जो लोग मसीह में शरण नहीं लेते, उनके सामने कैसी विपत्ति खड़ी है—चाहे वे हमारे परिवार के हों, मित्र हों, या पड़ोसी। पौलुस के समान, हमें अपने उद्धार से भी अधिक उनके उद्धार की चिन्ता करनी चाहिए। परन्तु पौलुस के ही समान, हम केवल रो ही नहीं सकते, क्योंकि हमारे आँसू प्रार्थनाओं के साथ जुड़ सकते हैं कि जिनसे हम प्रेम करते हैं, वे यीशु की ओर फिरें और उसे अपना मसीह ग्रहण करें, और सुसमाचार की घोषणा के साथ भी, इस आशा में कि प्रभु हमें प्रयोग करे ताकि उनका मार्ग मृत्यु से जीवन की ओर मोड़ दे, जैसे उसने एस्तेर के द्वारा यहूदियों को बचाया। आज आप किसके लिए रोएँगे, किसके लिए प्रार्थना करेंगे, और किससे बोलने का प्रयत्न करेंगे?

  एस्तेर 8:1–17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 1–3; यूहन्ना 7:1-27 ◊

17 September : गडगडाटी वादळांत देवाची उपासना करा.

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17 September : गडगडाटी वादळांत देवाची उपासना करा.
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“कारण जशी वीज आकाशाच्या एका बाजूस चमकून दुसर्‍या बाजूपर्यंत प्रकाशते, तसेच मनुष्याच्या पुत्राचेही त्याच्या दिवशी होईल.” (लूक 17:24)

मी एकदा रात्री शिकागोहून मिनियापोलिसला जात होतो, आणि विमानात जवळजवळ एकटाच होतो. पायलटने जाहीर केलें कीं मिशिगन सरोवर आणि विस्कॉन्सिनमध्यें गडगडाटी वादळ आहे. गोंधळ होऊं नये म्हणून तो विमान पश्चिमेकडें स्कर्ट करायचा.

मी विमानाच्या पूर्वेकडें असलेल्या घनदाट काळोखाकडें पाहत बसलो असताना, अचानक संपूर्ण आकाश प्रकाशाने चकाकले आणि विमानाच्या खाली चार मैलांवर पांढऱ्या ढगांची एक पोकळ पडली व लगेच नाहींशी झाली.

एका सेकंदानंतर, क्षितिजावर उत्तरेकडून दक्षिणेंकडें प्रकाशाचा एक विशाल पांढरा बोगदा फुटला आणि पुन्हा घनदाट काळोखांत नाहींसा झाला. लगेच त्या गडगडाटी विजांची सर स्थिरावली , ज्यामुळें ढगांच्या अथांगातून आणि ढगांच्या दूरच्या पांढऱ्या पर्वतांच्या मागे प्रकाशाचे ज्वालामुखी फुटलेलें दिसू लागलें.

मी अक्षरशः अविश्वासाने डोके हलवत बसलो, आणि ओरडू लागलो, हे परमेश्वरा, जर या तुझ्या तलवारीला धारदार करतांना उडणाऱ्या केवळ ठिणग्यामात्र असतील, तर तुझ्या प्रकट होण्याचा दिवस कसा असेल! आणि मला ख्रिस्ताचे शब्द आठवले : “जशी वीज आकाशाच्या एका बाजूस चमकून दुसर्‍या बाजूपर्यंत प्रकाशते, तसेच मनुष्याच्या पुत्राचेही त्याच्या दिवशी होईल” (लूक 17:24).

आताही ते दृश्य आठवत असताना माझे मुख त्याच्या गौरवाच्या शब्दांनी भरून जाते. मी देवाचे आभार मानतो कीं त्यानें माझ्या अंतःकरणात त्याच्या प्रकट होण्याची, त्याला पाहण्याची आणि ख्रिस्ती परमानंदाच्या मेजवानीला बसून गौरवाच्या राजाची उपासना करण्याची इच्छा वारंवार जागृत केलीं आहे. तो मैफिल हॉल खूप मोठा आहे. या.

16 सितम्बर : क्या परमेश्वर को हमारी आवश्यकता है?

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16 सितम्बर : क्या परमेश्वर को हमारी आवश्यकता है?
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“एस्तेर रानी ने उत्तर दिया, ‘हे राजा! यदि तू मुझ पर प्रसन्न है, और राजा को यह स्वीकार हो, तो मेरे निवेदन से मुझे, और मेरे माँगने से मेरे लोगों को प्राणदान मिले। क्योंकि मैं और मेरी जाति के लोग बेच डाले गए हैं, और हम सब घात और नष्ट किए जाने वाले हैं। यदि हम केवल दास–दासी हो जाने के लिए बेच डाले जाते, तो मैं चुप रहती; चाहे उस दशा में वह विरोधी राजा की हानि भर न सकता।’” एस्तेर 7:3-4

हम जोखिम उठाते हैं और अपने परमेश्वर की सेवा करते हैं, क्योंकि हमारी सफलता हम पर निर्भर नहीं करती।

वह समय आ गया था जब एस्तेर को मौर्दकै की चुनौती के अनुसार कार्य करना था और परमेश्वर की प्रजा के लिए राजा से बोलना था (एस्तेर 4)। उसने जानबूझकर उस आज्ञा-पत्र के शब्दों का प्रयोग किया: “घात” और “नष्ट” (3:13)। इसके अतिरिक्त, एस्तेर ने राजा से उसकी नैतिकता के आधार पर विनती नहीं की। इसके बजाय, उसने राजा के स्वार्थ—उसकी प्रिय रानी की हत्या—के आधार पर अपील की। एस्तेर ने कुशलता से ऐसे शब्द बोले कि राजा को दोषी ठहराए बिना ध्यान हामान पर केन्द्रित हो गया। जब राजा ने पूछा, “वह कौन है, और कहाँ है, जिसने ऐसा करने का निश्चय किया है?” (7:5), तो एस्तेर न्यायसंगत रूप से उसे दर्पण दिखा सकती थी—परन्तु वह बुद्धिमानी न होती!

इन सब के माध्यम से, परमेश्वर उन घटनाओं में कार्य कर रहा था जिन पर एस्तेर का कोई नियन्त्रण नहीं था। और वह उस ढंग में भी कार्य कर रहा था जिसमें एस्तेर ने अपनी बुद्धि, कौशल, आज्ञाकारिता आदि का प्रयोग किया—उसके व्यक्तित्व के वे पक्ष जिन पर उसका नियन्त्रण था।

ऐसा नहीं था कि परमेश्वर को एस्तेर की इतनी आवश्यकता थी कि यदि वह कार्य न करती तो उसकी योजना विफल हो जाती। ऐसा सोचना मानवीय उत्तरदायित्व को अत्यधिक महत्त्व देना होता। परन्तु यह भी सत्य नहीं है कि परमेश्वर एस्तेर की सहभागिता की परवाह किए बिना जो चाहता वह कर ही लेता। ऐसी सोच उसकी सार्वभौमिक सत्ता को मानवीय सहभागिता से अलग कर देती है। यह एक महान रहस्य है! परमेश्वर मनुष्यों को साधन के रूप में उपयोग कर सकता है, परन्तु वह हमारे बिना भी कार्य कर सकता है। और जब वह हमें उपयोग करता भी है, तब भी सफलता न तो उसके सेवकों पर और न उनके कार्यों पर निर्भर करती है।

यह हमारे लिए भी सत्य है, जब हम लोगों को यीशु के विषय में बताने या परमेश्वर के वचन की शिक्षा देने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर जैसे चाहे वैसे अपने आप को प्रकट कर सकता है और अपनी प्रजा के विश्वास को जैसे चाहे वैसे बढ़ा सकता है, परन्तु वह हमें भी एक भूमिका देता है। वह हमें सिखाने, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने, और सुसमाचार का प्रचार करने की आज्ञा देता है। और इसलिए हम ऐसा करते हैं। परन्तु अन्ततः, हम जानते हैं कि किसी भी हृदय और जीवन का परिवर्तन जीवते परमेश्वर के कार्य के बिना कभी नहीं होता। वही कठोर हृदयों को कोमल करता है और अन्धकार में डूबी आँखों को खोलता है। वही साधनों और परिणाम, दोनों को ठहराने में समर्थ है।

और यही कारण है कि क्योंकि परमेश्वर सम्प्रभु है, आपके पास उसकी आज्ञा मानने के लिए हर कारण है। यद्यपि सफलता आप पर निर्भर नहीं करती, फिर भी जिस परमेश्वर ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है, उसने आपको उपयोग करने का चुनाव किया है। वह अपना भला कार्य पूरा करेगा (फिलिप्पियों 1:6)। वह अपनी प्रजा को अपने लोगों तक पहुँचाने और अपने लोगों की सेवा करने के लिए उपयोग करेगा। यह समझ आपको दीन बनाए, और साथ ही आपको उन कार्यों का सामना करने के लिए उत्साह दे जिनके लिए आपको बुलाया गया है—जोखिम उठाने, और उसकी सेवा करने और आज्ञा मानने के लिए, जब वह आप में और आपके द्वारा कार्य करता है।

  एस्तेर 6:12–7:10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: विलापगीत 3–5; यूहन्ना 6:52-71

16 September : जिवाची अंतिम मेजवानी

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16 September : जिवाची अंतिम मेजवानी
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परमेश्वराजवळ मी एक वरदान मागितले, त्याच्या प्राप्तीसाठीं मी झटेन; ते हे कीं, आयुष्यभर परमेश्वराच्या घरात माझी वस्ती व्हावी; म्हणजें मी परमेश्वराचे मनोहर रूप पाहत राहीन व त्याच्या मंदिरात ध्यान करीन. (स्तोत्र 27:4)

भग्न व अनुतप्त आत्म्याला देव प्रतिसाद देणार नाहीं हे अशक्य आहे. तो धाव घेतो आणि आमचे पापाचे ओझे उचलतो आणि आमची अंत:करणें आनंद व उपकारस्तुतीनें भरतो. “तू माझा विलाप दूर करून मला नाचायला लावले आहेस; तू माझे गोणताट काढून मला हर्षरूपी वस्त्र नेसवले आहेस; ह्यासाठीं कीं माझ्या आत्म्याने तुझे गुणगान गावे, गप्प राहू नये; हे परमेश्वरा, माझ्या देवा, मी सर्वकाळ तुझे उपकारस्मरण करीन!” (स्तोत्र 30:11-12).

पण आपला हा आनंद आम्हांवर केवळ पूर्वी झालेंल्यां कृपेच्या कृतज्ञतेतून येत नाहीं. तर हा आनंद आम्हीं ज्यां भावी कृपेवर आशा ठेवितो त्यांतून सुद्धा येतो : “हे माझ्या जिवा, तू का खिन्न झालास? तू आतल्या आत का तळमळत आहेस? देवाची आशा धर; तो मला दर्शन देऊन माझा उद्धार करतो, म्हणून मी त्याचे पुनरपि गुणगान गाईन.” (स्तोत्र 42:5-6).

“मी याहवेहची वाट पाहतो, मोठ्या अपेक्षेने माझा जीव वाट पाहतो, आणि मी माझी आशा त्याच्या वचनावर टाकली आहे” (स्तोत्र 130:5-अनुवादक).

शेवटी, भग्न व अनुतप्त हृदय हे देवाकडून मिळणाऱ्या कोणत्याही चांगल्या दानांसाठीं नाहीं तर स्वतः देवासाठीं लुसलुसते. त्याचे दर्शन घेणें आणि त्याला ओळखणें व त्याच्या उपस्थितीत राहणें ही आमच्या जिवाची अंतिम मेजवानी आहे. यापलीकडें कोणताही शोधाशोध शिल्लक राहत नाहीं. माझ्याकडें शब्द नाहीं. आपण आपल्या शब्दांत ह्याला आनंद, हर्ष, सुख म्हणतो. परंतु हे केवळ त्या अकथनीय अनुभवाचे दुर्बळ सूचकमात्र आहेत :

“परमेश्वराजवळ मी एक वरदान मागितले, त्याच्या प्राप्तीसाठीं मी झटेन; ते हे कीं, आयुष्यभर परमेश्वराच्या घरात माझी वस्ती व्हावी; म्हणजें मी परमेश्वराचे मनोहर रूप पाहत राहीन व त्याच्या मंदिरात ध्यान करीन.” (स्तोत्र 27:4)

“तुझ्या सान्निध्यात पूर्णानंद आहे; तुझ्या उजव्या हातांत सौख्ये सदोदित आहेत” (स्तोत्र 16:11).

“परमेश्वराच्या ठायीं तुला आनंद होईल” (स्तोत्र 37:4).