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25 November : आभारप्रदर्शनाद्वारें देवाचे गौरव करा

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25 November : आभारप्रदर्शनाद्वारें देवाचे गौरव करा
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हे सर्व तुम्हांसाठीं आहे, जितके अधिक लोक त्याच्या कृपेने त्याच्याजवळ येतील, तितके त्याच्या अपार दयेबद्दल त्याचे आभार मानतील आणि परमेश्वराचे अधिक गौरव होईल. (2 करिंथ 4:15)

देवाचे कृतज्ञ असणें ही एक आनंदी भावना आहे. त्याच्या कृपेसाठीं आम्हांमध्ये आनंदाने भरलेली उपकार-स्तुतीची जाणीव आहे. म्हणून एका अर्थानें जर पाहिलें तर आभारप्रदर्शनाच्या भावनेंतच, आम्हीं आजही लाभार्थी आहोत. पण आभारप्रदर्शनाचा गुणच असा आहे कीं त्यामुळें कृपा करणाऱ्याचे गौरव होते. आम्हीं आभारप्रदर्शन करतो तेव्हा आम्हीं आमची गरज आणि परमेश्वराचा दानशील गुण, परमेश्वराची पूर्णता, व त्याच्या गौरवाच्या संपत्तीची कबूली देतो.

ज्याप्रकारे मी रेस्टॉरेंटमध्ये अन्न वाढणाऱ्यास, “धन्यवाद” म्हणतो, तेव्हा मी स्वतःस नम्र करतो आणि त्याची वाखाणणी करतो, त्याचप्रमाणें जेव्हा मी परमेश्वरासाठीं आभारप्रदर्शनाची जाणीव बाळगतो तेव्हा मी स्वतःस नम्र करतो आणि त्यास गौरव देतो. अर्थात फरक हा आहे कीं देवानें मजवर जी कृपा केलीं त्याबद्दल मी त्याचा अतिशय ऋणी आहे, आणि जे कांहीं तो माझ्यासाठीं करतो ते सर्व तो विनामूल्य करतो ज्यांस मी पात्र नाहीं.

मुद्दा हा आहे कीं आभारप्रदर्शन देणाऱ्याचे गौरव करते. त्यामुळें परमेश्वराचे गौरव होते. पौलाच्या सर्व परिश्रमात त्याचे हेच अंतिम ध्येय होते. होय, त्याचे परिश्रम मंडळीसाठीं होते – मंडळीच्या उन्नतीसाठीं. पण मंडळी सर्वोच्च ध्येय नाहीं. पुन्हा ऐका: “हे सर्व तुम्हांसाठीं आहे, जितके अधिक लोक त्याच्या कृपेने त्याच्याजवळ येतील, तितके त्याच्या अपार दयेबद्दल त्याचे आभार मानतील आणि परमेश्वराचे अधिक गौरव होईल.” सर्व तुम्हांसाठीं – परमेश्वराच्या गौरवासाठीं!

सुवार्तेविषयी अद्भुत गोष्ट ही आहे कीं परमेश्वराच्या गौरवासाठीं आमच्याकडून तिला जो प्रतिसाद हवा आहे तो असा प्रतिसाद देखील आहे जो अतिशय स्वाभाविक आणि आनंदाने भरलेला असतो; अर्थात, कृपेसाठीं उपकारबुद्धी किंवा आभार. कृपा करण्यांत परमेश्वराचे सर्व-संपन्न गौरव आणि प्राप्त करण्यात आमचा विनम्र आनंद यांत तोड नाहीं. आनंदानें आभार मानण्याद्वारे परमेश्वराचे गौरव होते.

त्याच्या कृपेसाठीं परमेश्वरास गौरव देणारे जीवन आणि अतिशय आनंदाचे जीवन हे एकच जीवन आहे. आणि यांस जे एकत्र करते ते म्हणजें आभारप्रदर्शन अथवा कृतज्ञता.

24 नवम्बर : आओ, धन्यवाद करने वाले लोगो

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24 नवम्बर : आओ, धन्यवाद करने वाले लोगो
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हर बात में धन्यवाद करो … शान्ति का परमेश्‍वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे-पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें। तुम्हारा बुलाने वाला सच्चा है, और वह ऐसा ही करेगा।” 1 थिस्सलुनीकियों 5:18, 23-24

धन्यवाद देना हमेशा आसान नहीं होता, भले ही अमेरिका एक राष्ट्र के रूप में इसके लिए विशेष अवकाश निर्धारित करता है। इस अवकाश के दौरान हममें से कई लोग जीवन की ऐसी परिस्थितियों से अवगत होते हैं, जो धन्यवाद की भावना उत्पन्न नहीं करतीं। कुछ लोग अपने सबसे अकेले दिनों का सामना कर रहे होते हैं, तो कुछ लोग किसी प्रियजन के सुसमाचार से भटक जाने के भारी बोझ से दबे होते हैं। कुछ लोग इस मौसम में किसी असफलता के कारण बहुत निराश होते हैं—जैसे नौकरी का छूटना, किसी सम्बन्ध का टूटना, या एक और पदोन्नति चूक जाना। कभी-कभी हम खुद को पूरी तरह से फँसा हुआ पाते हैं, निराशा से बाहर निकलने में असमर्थ होते हैं, और कृतज्ञता से उतना ही दूर महसूस करते हैं जितना पूरब से पश्चिम दूर है।

जब हम ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं और पढ़ते हैं, “हर बात में धन्यवाद करो,” तो हम अक्सर सोचते हैं कि इसका पालन कैसे करें। फिर भी, बाइबल कभी भी किसी आज्ञा को सहायता के बिना नहीं देती।

इस प्रश्न का उत्तर कि हम निरन्तर धन्यवाद कैसे दे सकते हैं, परमेश्वर के हमारे अन्दर पवित्रीकरण के कार्य में छिपा है। “पवित्रीकरण” का अर्थ है “परमेश्वर के लिए अलग किया जाना।” जब प्रभु यीशु मसीह हमारे जीवन में शासन करने आता है, तो पवित्र आत्मा हमारे अन्दर प्रवेश करता है ताकि आत्मिक विकास के लिए आवश्यक निरन्तर शुद्धिकरण कर सके। यही परमेश्वर का कार्य है जो हमें वह बनने की शक्ति देता है जो यीशु हमसे चाहता है: “क्योंकि परमेश्‍वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है” (फिलिप्पियों 2:13)।

जब हम मसीह में बने रहते हैं—“उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते” जाते हैं (कुलुस्सियों 2:7)—अपना बाइबल का अध्ययन करते हैं, प्रार्थना करना सीखते हैं, परमेश्वर के लोगों के साथ संगति रखते हैं, और दूसरों को उसके बारे में बताते हैं—तो हमें याद दिलाया जाता है कि वह हमारे लिए क्या है और उसने हमारे लिए और हमारे भीतर क्या-क्या किया है। हम भजनकार के साथ गाना सीखते हैं: “हे परमेश्‍वर, हम तेरा धन्यवाद करते, हम तेरे नाम का धन्यवाद करते हैं; क्योंकि तेरा नाम प्रगट हुआ है, तेरे आश्चर्यकर्मों का वर्णन हो रहा है” (भजन 75:1)।

हमारे अपने पछतावों और निराशाओं के बावजूद, जब हम उसके अद्‌भुत कामों—उसका क्रूस, उसका पुनरुत्थान, उसका स्वर्गारोहण, और उसके पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे अन्दर किया गया कार्य जो हमें विश्वास में लाता है और विश्वास में बनाए रखता है—को याद करते हैं, तो हम कृतज्ञता से भर सकते हैं।

हमारी परीक्षाएँ कठिन और उदास हो सकती हैं। हो सकता है हम हर क्षण में आभारी न महसूस करें। यह ठीक है, क्योंकि बात यह नहीं है कि हम क्या महसूस कर रहे हैं—मुद्दा यह है कि परमेश्वर हमें आभारी बनने का सामर्थ्य देता है। वही हमें पौलुस की शिक्षाओं को पूरा करने की शक्ति प्रदान करता है।

यदि आप इस समय अपने जीवन में कृतज्ञता की कमी महसूस कर रहे हैं, तो कम से कम एक क्षण के लिए अपनी परिस्थितियों से ध्यान हटाएँ और परमेश्वर के प्रेम के उपहार पर मनन करें। जब आप मसीह में बने रहते हैं और परमेश्वर के आत्मा को उसका पवित्रीकरण का कार्य जारी रखने देते हैं, तो वह आपको भीतर से जागृत करेगा, ताकि आँसुओं, पीड़ा और निराशा के बावजूद, जब वह पुकारे, “आओ, हे कृतज्ञ जनो, आओ,”[1] तो आप उसका उत्तर दे सकें।

  भजन 149

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 10–12; लूका 6:27-49 ◊


[1] हेनरी एलफर्ड, “कम, ये थैंकफुल पीपल, कम” (1844).

24 November : तुमची आशा हस्तगत करां

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24 November : तुमची आशा हस्तगत करां
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म्हणून आपल्या संकल्पाची अचलता अभिवचनाच्या वतनदारांना विशेषत्वानें दाखवावी ह्या इच्छेनें देव शपथेच्या द्वारे मध्ये पडला, ह्यासाठीं कीं, जे आपण, स्वतःपुढे ठेवण्यात आलेंली आशा हस्तगत करण्याकरता आश्रयाला धावलो, त्या आपणांला ज्याविषयी खोटे बोलणें देवाला अशक्य आहे अशा दोन अचल गोष्टींच्या द्वारे चांगलें उत्तेजन मिळावे. (इब्री 6:17-18)

आपण आपली आशा हस्तगत करून ती आम्हीं दृढ धरून राहावी असें उत्तेजन इब्रीलोकांस पत्राचा लेखक आम्हांला का देतो? जर आमच्या आशेचा अंतिम आनंद आपण येशूच्या रक्ताद्वारे प्राप्त केला आणि मिळवला, तर परमेश्वर आम्हास दृढ धरून राहण्यास का सांगतो?

उत्तर येणेंप्रमाणें आहे :

  • जेव्हा ख्रिस्त मरण पावला तेव्हा त्यानें आमच्यासाठीं जे विकत घेतलें ते म्हणजें आपण दृढ धरून राहण्यापासून मुक्त व्हावें हे नसून, दृढ धरून राहण्याचे सामर्थ्यकारी बळ आहे.
  • त्यानें जे विकत घेतलें ते आमच्या इच्छांस रद्द करणें नव्हते जणूकांहीं आम्हांला दृढ धरून राहण्याची गरज नाहीं, पण आमच्या इच्छांचे सामर्थ्य देणारे परिवर्तन होते यासाठीं कीं आम्हीं दृढ धरून राहाण्याची उत्कंठा बाळगावी.
  • त्यानें जे विकत घेतलें ते दृढ धरून राहण्याची आज्ञा रद्द करणें नव्हते, तर दृढ धरून राहण्याच्या आज्ञेची परिपूर्तता विकत घेतली.
  • त्यानें जे विकत घेतलें ते उपदेशाचे अंत नव्हते, तर उपदेशाचा विजय त्यानें विकत घेतला.

तो यासाठीं मेला कीं तुम्हीं अगदी तेच करावे जे पौल फिलिप्पै 3:12 मध्ये म्हणतो, “ज्यासाठीं ख्रिस्त येशूनें मला आपल्या कह्यात घेतलें ते मी आपल्या कह्यात घ्यावे म्हणून मी त्याच्यामागे लागतो आहे.” हा मूर्खपणा नाहीं, ही सुवार्ता आहे, पापी व्यक्तीस ते करावयास सांगणें जे करण्याचे सामर्थ्य केवळ ख्रिस्त त्याला देऊ शकतो; म्हणजें परमेश्वराठायीं आशा.

म्हणून, मी तुम्हांला संपूर्ण अंतःकरणानें असें उत्तेजन देतो : पुढे जा आणि ज्यासाठीं ख्रिस्तानें तुम्हांला आपल्या कह्यात घेतलें आहे ती गोष्ट आपल्या कह्यात घेण्यासाठीं तिच्या मागे लागा. आपल्या संपूर्ण शक्तीनें ती दृढ धरून राहा – जे त्याचे सामर्थ्य आहे, म्हणजें त्यानें आपल्या रक्तानें विकत घेतलेंलें तुमच्यां आज्ञापालनाची देणगी.

23 नवम्बर : पीड़ा का सवाल

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23 नवम्बर : पीड़ा का सवाल
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“भूमि तेरे कारण शापित है। तू उसकी उपज जीवन भर दुख के साथ खाया करेगा।” उत्पत्ति 3:17

कोई भी व्यक्ति पीड़ा से अछूता नहीं है। चाहे वह किसी प्रियजन की मृत्यु हो, कोई दर्दनाक निदान, कार्यस्थल पर संघर्ष, टूटा हुआ रिश्ता, या कोई अन्य कष्टदायक परिस्थिति—परीक्षाएँ केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होतीं। पूरे पवित्रशास्त्र में हमें पीड़ा के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

जैसे-जैसे हम जीवन जीते हैं और बाइबल पढ़ते हैं, यह बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाती है कि पीड़ा मानव अस्तित्व का एक स्वाभाविक हिस्सा है।

जब हम इस सच्चाई को स्वीकार कर लेते हैं, तब एक सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे मन में उठता है: “क्यों?” लोग पीड़ा क्यों सहते हैं? सभी विश्वदृष्टियाँ और धर्म इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करते हैं: “दर्द केवल एक भ्रान्ति है।” “कोई परमेश्वर नहीं है; दर्द व्यर्थ है।” “दर्द परमेश्वर के नियन्त्रण से बाहर है।” “दर्द वर्तमान या पूर्व जीवन के कर्मों का फल है।” इन सभी उत्तरों में एक बात समान है: ये कोई आशा नहीं देते। लेकिन परमेश्वर स्वयं हमें एक बेहतर उत्तर देता है।

हालाँकि परमेश्वर शैतान को धोखा देने से, या आदम और हव्वा को धोखा खाने से, या यहाँ तक कि पीड़ा को पूरी तरह रोक सकता था। फिर भी परमेश्वर ने पीड़ा का उपयोग करने का मार्ग चुना, ताकि मनुष्य प्रेमपूर्वक आज्ञाकारिता और उद्धारकर्ता की आवश्यकता का अर्थ सीख सके। यह हमारी स्वतन्त्रता ही है, जो इस पाठ को सीखने को सम्भव बनाती है। परमेश्वर ने हमें रोबोट की तरह नहीं बनाया; वह चाहता था कि हम स्वेच्छा और प्रेम से उसकी सेवा-उपासना करें, न कि मजबूरी या डर से। दुख की बात यह है कि उसी स्वतन्त्रता में मानवता ने परमेश्वर से अलग जीवन चुन लिया, जिसके भयानक परिणाम हुए। और जब भी हम पाप करते हैं, हम दिखाते हैं कि हम आदम और हव्वा से अलग नहीं हैं।

परमेश्वर जानता था कि पुरुषों और महिलाओं को इस सच्चाई का सामना करना होगा कि उसके विरुद्ध विद्रोह करना मूर्खता है। इसी कारण उसने आदम और हव्वा को जीवन के वृक्ष से दूर कर दिया (उत्पत्ति 3:22–24)। इसी कारण यह संसार और हमारे शरीर भी अब वैसे काम नहीं करते, जैसा इन्हें बनाया गया था (उत्पत्ति 3:16–19)। जैसे कोई विद्रोही बच्चा अपनी गलती समझ कर स्वेच्छा से घर लौट आता है और अपने परिवार की अधिक सराहना करता है, वैसे ही हम भी परमेश्वर के प्रेम की लालसा करते हुए उसके पास लौट सकते हैं। परमेश्वर ने पाप को उसकी समस्त भयानकता के साथ संसार में आने की अनुमति दी, ताकि हम अपने चुनावों के परिणामों को महसूस कर सकें और जब वह बुराई से भरी इस दुनिया में अपने प्रेम की सुन्दरता प्रकट करता है, तब हम उसे और भी अधिक प्रेम करना सीखें।

सी.एस. लुईस ने इस प्रकार कहा: “परमेश्वर हमारे सुख में फुसफुसाता है, हमारी अन्तरात्मा में बोलता है, परन्तु हमारे दर्द में चिल्लाता है। यह एक बहरे संसार को जगाने के लिए उसका मेगाफोन है।”[1]

परमेश्वर बुराई का रचयिता नहीं है, लेकिन वह बुराई पर सम्प्रभु हैं। इसलिए हमें यह आशा है: एक दिन वह सारी बुराई को समाप्त कर देगा। फिलहाल, वह सब कुछ वैसा ही रहने देता है, ताकि हमारी परीक्षाओं के बीच हम उस दुखी सेवक को थामे रहें जो हमारा उद्धारकर्ता है। इस पतित संसार के जीवन में आपके निराशा भरे अनुभव आपको यह सोचने पर मजबूर न करें कि परमेश्वर मौजूद नहीं हैं या उसे कोई परवाह नहीं है। बल्कि ये अनुभव बार-बार आपको आपके उद्धारकर्ता की ओर लौटाएँ—जो यह प्रतिज्ञा करता है कि वह एक दिन हर बुराई का अन्त करेगा और आपके सामने एक ऐसा अनन्त भविष्य रखेगा जिसमें सब कुछ ठीक होगा।

  लूका 15:11-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 7–9; लूका 6:1-26


[1] द प्रोब्लम ऑफ पेन (हार्पर कोलिंस, 2001), पृ. 91.

23 November : जेव्हा परमेश्वर आपलीच शपथ वाहतो

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23 November : जेव्हा परमेश्वर आपलीच शपथ वाहतो
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त्याला शपथ वाहण्यास स्वतःपेक्षा कोणी मोठा नसल्यामुळें त्यानें ‘आपलीच शपथ वाहून’ म्हटलें कीं, “मी तुला आशीर्वाद देईनच देईन व तुला बहुगुणित करीनच करीन.” (इब्री 6:13-14)

एक आत्मा आहे ज्याचे मोल आणि आदर आणि प्रतिष्ठा आणि महानता आणि थोरवी आणि सौंदर्य आणि ख्याती ही इतर सर्व संयुक्त केलेंल्या मूल्यांपेक्षा अमूल्य असें आहे – दहा हजार पटींपेक्षा जास्त – तो म्हणजें स्वतः परमेश्वर. म्हणून, जेव्हा परमेश्वर शपथ वाहतो, तो ती स्वतःची शपथ वाहतो.

जर तो आणखी उंच जाऊ शकला असता, तर तो आणखी उंच गेला असता. का? यासाठीं कीं त्यानें तुम्हांला तुमच्यां आशेविषयी अधिक बळकटी व उत्तेजन द्यावें. स्वतःची शपथ वाहतांना परमेश्वर असें म्हणतो कीं आम्हांला आशीर्वाद देण्याचे आपलें अभिवचन मोडणें त्याच्यासाठीं तितकेच अशक्य आहे जितके कीं त्याच्यासाठीं स्वतःला तुच्छ मानणें अशक्य आहे.

या विश्वात देवाचे मोल सर्वाधिक आहे. परमेश्वरापेक्षा अधिक मौल्यवान किंवा अद्भुत असा कोणी नाहीं. म्हणून, परमेश्वर परमेश्वराचीच शपथ वाहतो. आणि असें करतांना तो म्हणतो, “तुमच्यांसाठीं माझा हेतू हा आहे कीं तुम्हीं शक्य होईल तितका माझ्याठायीं विश्वास ठेवावा.” कारण जर यापेक्षा अधिक शक्य असते, तर इब्री 6:13 म्हणते कीं त्यानें आम्हास तेहि दिलें असते. “त्याला शपथ वाहण्यास स्वतःपेक्षा कोणी मोठा नसल्यामुळें त्यानें ‘आपलीच शपथ वाहून’ म्हटलें.”

लक्षांत घ्या, हा आमचा परमेश्वर आहे, असा परमेश्वर जो तुम्हांला त्याच्याठायीं अढळ आशा ठेवण्यास प्रेरणा देण्यासाठीं जितके उंच जाता येईल तितके उंच जातो. म्हणून, आश्रयाला परमेश्वराकडे धाव घ्या. जगाच्या सर्व बाह्य आणि स्वतःहून अपयशी ठरणाऱ्या आशांपासून दूर व्हा, आणि परमेश्वरावर आपला भाव ठेवा. आश्रय आणि आशेचा खडक म्हणून परमेश्वरासारखा कोणी नाहीं आणि कांहींही नाहीं.

22 नवम्बर : स्वर्ग का चित्र

“मैंने दृष्‍टि की, और देखो, हर एक जाति और कुल और लोग और भाषा में से एक ऐसी बड़ी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता था, श्वेत वस्त्र पहने और अपने हाथों में खजूर की डालियाँ लिए हुए सिंहासन के सामने और मेमने के सामने खड़ी है, और बड़े शब्द से पुकारकर कहती है, ‘उद्धार के लिए हमारे परमेश्‍वर का, जो सिंहासन पर बैठा है, और मेमने का जय–जय कार हो!’” प्रकाशितवाक्य 7:9-10

स्वर्ग के बारे में हमारे कई विचार और गीत वास्तव में बाइबल कम आधारित हैं और विक्टोरियन युग के ईसाई धर्म तथा यूनानी दार्शनिक प्लेटो की शिक्षा पर आधारित ब्रह्मांड-दृष्टिकोण पर अधिक आधारित हैं। कुछ कलाकारों ने जैसा दिखाया है कि हम बादलों पर बैठकर वीणा बजाते रहेंगे—ऐसा स्वर्ग में नहीं होगा। हम इससे कहीं अधिक बेहतर काम करेंगे। पवित्रशास्त्र हमें दिखाता है कि हम परमेश्वर की स्तुति और मेमने की आराधना करेंगे।

प्रकाशितवाक्य की पुस्तक हमें मेमने के चारों ओर के प्रशंसा के सतत बढ़ते हुए घेरे को देखने के लिए आमन्त्रित करती है। पहले घेरे में हम चार जीवित प्राणी और चौबीस प्राचीनों को देखते हैं, जो धूप चढ़ाते हैं और स्तुति का नया गीत गाते हैं (प्रकाशितवाक्य 5:8-9)। दूसरे घेरे में, पद 11-13 में, हजारों-हजार स्वर्गदूत उसे आदर देते हैं, और फिर समस्त सृष्टि के सारे प्राणी इस गीत में सम्मिलित हो जाते हैं।

इसके बाद, प्रकाशितवाक्य की पुस्तक उन लोगों को उजागर करती है, जो मेमने के लहू से छुड़ाए गए हैं (7:4, 9)। उन्हें 1,44,000 की निश्चित संख्या में और एक ऐसी भीड़ के रूप में दर्शाया गया है, जिसे कोई गिन नहीं सकता। वे एक ओर इस्राएल की बारह जातियों से हैं, और दूसरी ओर हर जाति और भाषा के लोगों का समूह हैं। ये विवरण एक-दूसरे के विरोधी लग सकते हैं, लेकिन परमेश्वर के दृष्टिकोण से यह बिल्कुल संगत है। निश्चित संख्या पूर्णता और समाप्ति को दर्शाती है; परन्तु मनुष्य की दृष्टि से वह भीड़ इतनी विशाल है कि उसे गिना नहीं जा सकता।

परमेश्वर की दृष्टि में, जो लोग छुड़ाए गए हैं, वे उसके चुने हुए बेटे और बेटियाँ हैं, और हर जाति का प्रतिनिधित्व करते हुए। वह हर एक को व्यक्तिगत रूप से जानता है। फिर भी, उसकी प्रजा सभी लोगों में से बुलाई गई है। यह परमेश्वर की पूर्ण और सम्पूर्ण विजय का दृश्य है—और उसकी प्रजा उसकी जयजयकार करते हुए उसकी विजय में आनन्दित होती है।

इसलिए, हालाँकि इस दृश्य का आरम्भ चार जीवों और चौबीस प्राचीनों से होता है, लेकिन यह हजारों-हजारों की भीड़ तक पहुँचता है, जैसा कि पौलुस कहता है: “जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हैं, वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें” (फिलिप्पियों 2:10, विशेष बल दिया गया है)। हमारी स्तुति उस अनगिनत भीड़ की स्तुति से जुड़ जाएगी, और हम सभी यह घोषणा करेंगे कि मसीह वह मेमना है जो बलिदान हुआ, कि उसके लहू से हमारे पाप धो दिए गए हैं, कि हम धार्मिकता को धारण किए हुए हैं, और कि उसकी संगति में हम अनन्तकाल तक जीवित रहेंगे।

एक दिन हम मसीह के चारों ओर इस स्तुति के घेरे में शामिल होंगे, और हमारा प्रिय दूल्हा विजयी सिंह और दीन मेमने के रूप में आगे बढ़ेगा। लेकिन हमें तब तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम अभी भी उसकी ओर अपनी दृष्टि लगाए हुए आराधना का गीत गा सकते हैं। एक दिन आप उसके सामने खड़े होंगे और उसे देखेंगे! और तब तक, आप प्रतिदिन उस दिन की ओर बढ़ते जा रहे हैं।

प्रकाशितवाक्य  7:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 4– 6; लूका 5:17-39 ◊

22 November : आध्यात्मिक प्रौढपणाची किल्ली

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22 November : आध्यात्मिक प्रौढपणाची किल्ली
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पण ज्यांच्या ज्ञानेंद्रियांना वहिवाटीनें चांगलें आणि वाईट समजण्याचा सराव झाला आहे अशा प्रौढांसाठीं जड अन्न आहे. (इब्री 5:14)

पाहा, हे किती अद्भुत आहे. हे समजून घ्यां. हे तुमची वर्षे वाया जाण्यापासून वाचवील. 

या वचनाचा अर्थ असा आहे कीं जर तुम्हांस प्रौढ व्हावयाचे असेल आणि वचनाची आणखी जड अशी शिकवण समजून तिचे महत्व जाणायचे असेल, तर परमेश्वराच्या सुवार्तेत असलेल्यां अभिवचनांच्या समृद्ध, पोषक तत्वांनी भरपूर, आणि बहुमूल्य दुधामुळें तुमची नैतिक ज्ञानेंद्रिये – तुमचे आत्मिक मन – बदलने गरजेचे आहे- यासाठीं कीं तुम्हांला चांगलें आणि वाईट समजण्याचा सराव व्हावा.

किंवा, मीं हे दुसऱ्या शब्दांत मांडतो. परमेश्वराच्या सर्व वचनाचा आस्वाद घेण्यास तयार होणें प्रथमतः एक बौद्धिक आव्हान नाहीं; ते प्रथमतः एक नैतिक आव्हान आहे. जर तुम्हांला वचनाचे जड अन्न खावयाचे असेल , तर तुम्हीं तुमच्यां आत्मिक ज्ञानेंन्द्रियांस तसा सरावही दिला पाहिजे, यासाठीं कीं तुमच्यांठायीं असें मन उत्पन्न व्हावे ज्यास बऱ्यावाईटाची ओळख आहे. हे फक्त बौद्धिक आव्हान नसून एक नैतिक आव्हान आहे. 

उल्लेखनीय सत्य हे आहे कीं, जर तुम्हीं उत्पत्ती आणि इब्रीकरांस लिहिलेंल्या पत्रातील मलकींसदेकास समजून घेण्याविषयी अडखळणत असाल तर त्याचे कारण कदाचित हे असू शकते कीं तुम्हीं दूरदर्शनावरील आक्षेपार्ह कार्यक्रम पाहता. देवानें जगाच्या स्थापनेपूर्वी त्याच्या लोकांची केलेलीं निवड यामुळें जर तुम्हीं अडखळत असाल, तर कदाचित त्याचे कारण हे आहे कीं तुम्हीं अजूनही कुठल्यातरी लबाड टीवी उपदेशाकाला ऐकत आहां. जर तुम्हीं वधस्तंभावरील ख्रिस्ताच्या परमेश्वर-केंद्रित कार्याबाबत अडखळत असाल, तर याचे कारण कदाचित हे आहे कीं तुमचे पैशावर प्रेम आहे आणि तुम्हीं जास्त खर्च करता आणि फार कमी देता.

प्रौढपणाकडे आणि पवित्र शास्त्राच्या जड अन्नाकडे जाणारा मार्ग प्रथमतः बौद्धिक व्यक्ती बनणें नाहीं, तर आज्ञाधारक व्यक्ती बनणें आहे. तुम्हीं दारू आणि यौनसंबंध आणि पैसा आणि फुरसतीची वेळ आणि अन्न आणि कम्प्युटर यासोबत काय करता, आणि तुम्हीं इतर लोकांशी कसे वागता, याचा संबंध तुम्हीं कोणत्या शाळेत जाता किंवा कोणते पुस्तक वाचता यापेक्षा जड अन्न पचविण्याच्या तुमच्यां क्षमतेशी आहे.

हे अत्यंत महत्त्वाचे आहे याचे कारण आपल्या उच्च तंत्रज्ञानसंपन्न समाजात आपण असा विचार करण्याची शक्यता असते कीं शिक्षण – विशेषेकरून बौद्धिक शिक्षण – प्रौढपणाची किल्ली आहे. असें अनेक पीएच.डी. झालेलें लोक आहेत जे त्यांच्या आध्यात्मिक अप्रौढत्वात परमेश्वराच्या गोष्टींवर अडखळतात. आणि असें अनेंक कमी-शिक्षित पवित्र जन आहेत जे अतिशय प्रौढ आहेत आणि जे परमेश्वराच्या वचनाच्या गहन गोष्टींवर भरण-पोषण पाऊन प्रगती करूं शकतांत.

21 नवम्बर : चुप रहो और सुनो

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21 नवम्बर : चुप रहो और सुनो
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“हाय उस पर जो काठ से कहता है, जाग, या अबोल पत्थर से, उठ! क्या वह सिखाएगा? देखो, वह सोने चाँदी में मढ़ा हुआ है, परन्तु उसमें आत्मा नहीं है। परन्तु यहोवा अपने पवित्र मन्दिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शान्त रहे।” हबक्कूक 2:19-20

हबक्कूक के समय का संसार उथल-पुथल अवस्था में था और ऐसा प्रतीत होता था कि अब उसकी कोई सुध नहीं ली जा सकती। उसका अपना हृदय भी बहुत व्याकुल था, जिससे वह परमेश्वर से यह पूछने को प्रेरित हुआ कि जो कुछ हो रहा है, वह उसे क्यों होने दे रहा है (हबक्कूक 1:2-3)। भविष्यवक्ता चाहता था कि कुछ किया जाए। वह उत्तर चाहता था। वह परिवर्तन चाहता था। और परमेश्वर ने हबक्कूक से कहा, याद रखो कि मैं अब भी राज्य करता हूँ। याद रखो कि मैं कौन हूँ, और तुम कौन हो। परमेश्वर अब भी “अपने पवित्र मन्दिर में” उपस्थित था, और सम्पूर्ण पृथ्वी पर सम्प्रभुता के साथ शासन कर रहा था। उसने पहले ही उस योजना को निश्चित कर दिया था जिसके द्वारा उसकी इच्छा पूरी होनी थी। इस सच्चाई को स्वीकार करना हबक्कूक के लिए नम्रता और मौन का बुलावा था। यद्यपि उसके पास प्रश्न और शिकायतें थीं, और यद्यपि परमेश्वर ने उसे उन्हें उठाने की अनुमति दी थी, परन्तु उससे भी अधिक आवश्यक यह था कि वह परमेश्वर की बातों को सुने और उन पर विचार करे।

हम इस मौन के बुलावे को सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में देखते हैं। परमेश्वर भजनकार के माध्यम से कहता है, “चुप हो जाओ, और जान लो कि मैं ही परमेश्‍वर हूँ” (भजन संहिता 46:10)। नए नियम में, जब यीशु अपनी स्वर्गिक महिमा में रूपान्तरण पर्वत पर पतरस, याकूब और यूहन्ना के सामने प्रकट हुआ और पतरस ने डर के कारण जो पहली बात मन में आई, कह दी, तब यह दिव्य वाणी शिष्यों ने सुनी: “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रसन्न हूँ : इसकी सुनो” (मत्ती 17:5, विशेष बल दिया गया)।

जब समय कठिन होता है, तो हम में से कुछ लोग अपने स्वभाव के अनुसार एक कार्यकर्ता की तरह प्रतिक्रिया करते हैं: समस्या को हल करना है, इसलिए हम स्वयं को समाधान खोजने में झोंक देते हैं। हममें से कुछ निराशावादी हो जाते हैं: इस समस्या का कोई समाधान नहीं है, इसलिए हम उसके नीचे दब जाते हैं या उससे बचने के लिए व्यर्थ की गतिविधियों में लग जाते हैं। दोनों ही प्रतिक्रियाएँ इस कारण होती हैं कि हम परमेश्वर के सामने शान्त होकर उसकी बातों को सुनने और विचार करने के लिए रुकते नहीं हैं। हम एक शोरगुल से भरी दुनिया में जीते हैं: शब्द, शब्द, शब्द—विशेषज्ञों, प्रोफेसरों और नेताओं की निरन्तर बकबक। लेकिन यदि हम परमेश्वर की नहीं सुनेंगे, तो अन्ततः हम किसी ऐसी मूरत पर भरोसा कर बैठेंगे जो बोल ही नहीं सकती (हबक्कूक 2:18-19)। मूरतें न हमारे जीवन के बारे में, न ही हमारे संसार की परिस्थितियों के बारे में कोई सत्य बात कह सकती हैं।

जब कठिन दिनों का सामना होता है, तो हबक्कूक हमें स्मरण कराता है, “समस्त पृथ्वी उसके सामने शान्त रहे।” हमारे पास सभी उत्तर नहीं हैं, और न ही विशेषज्ञों के पास हैं। प्रश्न करना या समाधान खोजना गलत नहीं है, परन्तु यदि ऐसा करते हुए हम परमेश्वर के वचन को सुनने और उसकी आवाज़ पर ध्यान देने को अनदेखा कर दें, तो यह गलत है। हमारे चारों ओर चाहे जो कुछ भी हो रहा हो, हमें सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि हम याद रखें कि प्रभु अपने पवित्र मन्दिर में है, और वह अपने सिंहासन से अपने लोगों की भलाई के लिए इतिहास का संचालन कर रहा है। यही वह नींव है, जिस पर हम इस संसार में परमेश्वर के कार्य को समझने की समझदारी की रूपरेखा बना सकते हैं।

क्या आपको ऐसा लगता है कि राष्ट्र क्रोधित हो रहे हैं और राज्य हिल रहे हैं? क्या पर्वत डगमगा रहे हैं और लहरें उछाल मार रही हैं (भजन 46:2-3, 6)? शान्त हो जाएँ, जान लें कि परमेश्वर ही परमेश्वर है, और उसकी सुनें।

भजन 46

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 1–3; लूका 5:1-16

21 November : कृतज्ञतेची गंभीरता

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21 November : कृतज्ञतेची गंभीरता
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शेवटल्या काळी कठीण दिवस येतील हे समजून घे. कारण माणसे स्वार्थी, धनलोभी, बढाईखोर गर्विष्ठ, निंदक, आईबापांना न मानणारी, उपकार न स्मरणारी, अपवित्र… (2 तीमथ्य 3:1-2)

लक्षात घ्या कीं कृतघ्नतेसोबत गर्व, गैरवर्तन, आणि अवमान यांचा प्रादुर्भाव कसा होतो.

एका ठिकाणी पौल म्हणतो, “तसेच अमंगळपण, बाष्कळ गोष्टी व टवाळी ह्यांचाही उच्चार न होवो, ती उचित नाहींत; तर त्यापेक्षा उपकारस्तुती होवो” (इफिस 5:4). म्हणून, असें दिसते कीं कृतज्ञता आणि आभारी असणें ही विद्रपुता आणि हिंसेच्या सर्वथा उलट आहे.

हे असें असण्याचे कारण हे आहे कीं उपकारबुद्धीची म्हणजें कृतज्ञतेची भावना ही अहंकाराची भावाना नसून नम्रतेची भावना आहे. ही स्वतःचे गौरव शोधणारी नसून, ती इतरांची प्रशंसा करणारी भावना आहे. आणि ती रागीष्ट नसून प्रसन्नचित्त असते. ती कटुत्व बाळगत नाहीं. कटु उपकारशीलता ही जणू शब्दांचा विरोधाभास आहे.

कृतज्ञतायुक्त अंतःकरणास उघडणारी आणि कटुत्व व कुरूपता आणि अनादर व हिंसा यावर मात करणारी किल्ली म्हणजें आपला उत्पन्नकर्ता आणि प्रतिपालक व प्रदाता आणि आशा देणाऱ्या परमेश्वराठायीं दृढ विश्वास असणें. आम्हीं जर हा विश्वास धरत नाहीं कीं आमच्याजवळ जे कांहीं आहे आणि जे प्राप्त करण्याची आम्हीं आशा धरतो त्या सर्व गोष्टींसाठीं आम्हीं परमेश्वराचे अतिशय ऋणी आहोत, तर मग कृतज्ञतेचा झराच ओसरला आहे.

म्हणून, मी असें म्हणून शेवट करतो कीं अंतिम समयी हिंसाचार आणि पवित्र वस्तू भ्रष्ट करणें आणि कुरूपता आणि अवज्ञा ही परमेश्वराची समस्या आहे जी तो स्वतः हाताळेल. जर आमची मूळ समस्या जर आहे तर ती आमच्या निर्भरतेच्या उच्च पातळीवर कृतज्ञतेची भावना नसणें ही आहे.

जेव्हा आपण देवाचे आभार न मानण्याचा कळस पार करतो, तेव्हा आभारपणाचा सर्व तलाव डोंगराखाली जाऊन आणखीच कोरडा होऊ लागतो. आणि जेव्हा आभारपणा नाहींसा होतो, स्वतःचे प्रभूत्व त्याच्या सुखासाठीं भ्रश्टाचाराकडे आणखी डोळेझाक करू लागते.

विनम्र भावानें आभारी असण्याविषयीं मोठे संजीवन यावे म्हणून प्रार्थना करा.

20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना

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20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना
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“उसी में चलते रहो, और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्‍वास में दृढ़ होते जाओ, और अधिकाधिक धन्यवाद करते रहो।” कुलुस्सियों 2:6-7

यदि हम एक भरे हुए गिलास को लेकर चल रहे हों और अचानक कोई हमसे टकरा जाए, तो जो कुछ भी उस गिलास में है, वही बाहर निकलेगा। यही सिद्धान्त हमारे चरित्र पर भी लागू होता है: यदि हमारे भीतर कड़वाहट, कृतघ्नता, ईर्ष्या या जलन भरी हुई है, तो थोड़ा-सा “धक्का” ही इन भावनाओं को बाहर लाने के लिए पर्याप्त होता है।

जब पौलुस ने कुलुस्से के मसीही विश्वासियों को लिखा, तो उसने उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे एक आभारी हृदय से पहचाने जाएँ—जो कि मसीही जीवन की एक प्रमुख विशेषता है। पौलुस ने इस धन्यवाद को व्यक्त करने के लिए जिस शब्द का उपयोग किया है, “अधिकाधिक” (कुलुस्सियों 2:7), वह यूनानी शब्द perisseuo है, जिसका अर्थ होता है “बहकर निकलना” या “उफन पड़ना।” पौलुस का तात्पर्य स्पष्ट है: जब लोग इन विश्वासियों से “टकराएँ,” तो जो बाहर निकले वह कृतज्ञता होनी चाहिए।

जब स्त्री-पुरुष मसीह द्वारा परिवर्तित नहीं होते, तो उनके जीवन में अक्सर कृतघ्नता का ही शासन होता है—और उसके फलस्वरूप कड़वाहट, शिकायत, क्रोध और द्वेष भी उनमें भरा रहता है। परन्तु मसीह में विश्वासियों का जीवन इस प्रकार बदलता है कि वे कृतघ्नता की जगह धन्यवाद, कड़वाहट की जगह आनन्द, और क्रोध की जगह शान्ति को अपनाते हैं। हमने परमेश्वर की सम्पूर्ण सच्चाई में प्रकट हुए अनुग्रह की खुशखबरी को सुना है और मन फिराकर तथा विश्वास करके उसकी ओर लौटे हैं। हमारे पाप क्षमा कर दिए गए हैं। हमारे भीतर उसका आत्मा वास करता है। हम परमेश्वर की कलीसिया में एक नए परिवार का हिस्सा हैं। हमारे सामने अनन्त जीवन है। हम प्रार्थना के द्वारा स्वर्गिक सिंहासन तक पहुँच सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, हमारे पास आभारी होने के लिए काफी कुछ है। कृतज्ञता मसीही जीवन का गीत बन जाती है—जो भीतर से उफनता रहता है।

इस प्रकार की कृतज्ञता के गहरे प्रभाव होते हैं। यह हमारी दृष्टि को परमेश्वर की ओर मोड़ देती है और हमें स्वयं पर तथा अपनी परिस्थितियों पर केन्द्रित रहने से हटा देती है। यह हमें शैतान की कानाफूसी से बचाती है, जो हमें निराशा की ओर खींचती है और परमेश्वर की कही बातों पर अविश्वास करने को प्रेरित करती है। यह हमें घमण्ड से भी सुरक्षित रखती है, और हमारे शब्दकोश से ऐसे वाक्य मिटा देती है जैसे—“मुझे इससे ज्यादा मिलना चाहिए था” या “मेरे साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।” और यह हमें इस सच्चाई में विश्राम करने देती है कि परमेश्वर अपनी प्रेमपूर्ण योजना को केवल सुखद और उत्साहवर्धक अनुभवों में ही नहीं, बल्कि अस्थिर और पीड़ादायक परिस्थितियों में भी पूरा करता है। केवल अनुग्रह के द्वारा ही हम यह सीख सकते हैं: “हर बात में धन्यवाद करो” (1 थिस्सलुनीकियों 5:18, अतिरिक्त बल दिया गया है)।

कृतघ्नता का एकमात्र इलाज मसीह के साथ मेल में ही पाया जाता है। क्या आप अपने भीतर यह अनुभव करते हैं कि परमेश्वर ने आपको जो नहीं दिया, उसके लिए कोई कड़वाहट या असन्तोष अब भी बाकी है? तो उस भावना को मसीह के चरणों में ले आएँ, मसीह से क्षमा माँगें, और उससे यह प्रार्थना करें कि वह आपको दिखाए कि उसने अपने सुसमाचार में आपको कितना कुछ निशुल्क दे दिया है। हर दिन कुछ समय निकालें और परमेश्वर से प्राप्त आशिषों को लिखें और उन्हें स्वयं को याद दिलाएँ। तब आप वास्तव में कृतज्ञता से उफनने लगेंगे।

भजन 103

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 28–29; लूका 4:31-44 ◊