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19 मार्च : एक सच्ची नबूवती आवाज

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19 मार्च : एक सच्ची नबूवती आवाज
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“उन्होंने, ‘शान्ति है, शान्ति’ ऐसा कह कहकर मेरी प्रजा के घाव को ऊपर ही ऊपर चंगा किया, परन्तु शान्ति कुछ भी नहीं है।”  यिर्मयाह 8:11

जब हमारा सामना किसी गम्भीर रोग होता है, तो हममें से कोई भी नौसिखिए डॉक्टर से इलाज नहीं कराना चाहता। कल्पना करें कि आप ऐसे डॉक्टर के पास जाते हैं, जो माँस के सड़ जाने का इलाज केवल एक अच्छी सी पट्टी बाँधकर कर देता है, आपको आपकी परेशानी के बदले में कुछ अच्छे शब्द लिखकर देता है और आपको एक सुखद शाम की शुभकामनाएँ देता है। इससे आपको पहले से अच्छा महसूस हो सकता है, किन्तु इससे समस्या का समाधान नहीं होगा और जल्द ही आपकी हालत पहले से भी खराब हो जाएगी!

पुराने नियम के समय में, भविष्यद्वाक्ताओं का कार्य परमेश्वर के वचन को बोलना और परमेश्वर के लोगों को उसकी वाचा का पालन करने के लिए प्रेरित करना होता था। परमेश्वर अपना वचन भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में डालता था, और वे वही घोषणा करते थे जो परमेश्वर कहता था, न कि जो उनके अपने मन में आता था। और प्रायः उनका सन्देश होता था, सावधान हो जाओ! न्याय आने वाला है।  यह बिल्कुल भी सुखद घोषणा नहीं थी!

क्योंकि परमेश्वर का सन्देश इतना चुनौतीपूर्ण था, इस कारण झूठे भविष्यद्वक्ता बहुत हो गए थे और एक तरह से जो कुछ वे चाहते थे, वह सब उनको प्राप्त हो जाता था। उन्हें भविष्यद्वक्ता के रूप में जाना जाता था और वे बड़ी-बड़ी बातें बोल सकते थे और साथ ही वे लोगों को वे बातें भी कह सकते थे, जो वे सुनना चाहते थे। झूठा भविष्यद्वक्ता उस नौसिखिए डॉक्टर के समान होता था, जो लोगों से कहता था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, जबकि वास्तव में स्थिति निराशाजनक होती थी। यह सुनना अच्छा लगता है कि सब कुछ ठीक है और आपके देश में शान्ति का वास है, जब तक कि शत्रु दरवाज़े पर न दिखाई दे। तब यह आवश्यक हो जाता है कि आप तैयार रहें।

जबकि सच्चे भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के आने वाले न्याय के बारे में बात करते थे, तौभी उनका सन्देश लोगों को अपने आप में सन्तुष्ट रहने के विरुद्ध चेतावनी भी देता था और उन्हें निराशा के विरुद्ध प्रोत्साहित भी करता था। परमेश्वर ने सर्वदा अपने लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का आश्वासन दिया है, उनके लिए एक अति-उत्तम भविष्य की प्रतिज्ञा की है। न्याय से सामना होने पर उनकी एकमात्र आशा परमेश्वर से अलग  शरण मिलने में नहीं, बल्कि परमेश्वर में  शरण मिलने में होती थी।

हमारे समय में भी झूठे भविष्यद्वक्ता भरे पड़े हैं। उनके शब्द किसी समारोह के सामान्य प्रारम्भिक वक्ता की झूठी प्रशंसा में सुनाई दे जाते हैं, जैसे कि “आप इस समाज के अब तक के सबसे बढ़िया युवा लोग हैं। भविष्य आपके हाथों में है। आप उड़ान भरने के लिए तैयार हैं!” परन्तु इसी तरह की उथली बातें बहुत सी कलीसियाओं में भी बोली जाती हैं, जिनकी शिक्षा में अस्पष्ट सामान्य बातें और श्रोताओं के लिए कथित रूप से प्रेरणादायक आधे-अधूरे सत्य शामिल होते हैं; और आधा-सत्य, आधा-झूठ भी होता है।

हमें अपने समय में भी सच्ची भविष्यद्वाणी की आवाज की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी यिर्मयाह के समय में परमेश्वर के लोगों को थी। हमारी कलीसियाओं, हमारे राष्ट्र और पूरे संसार को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो सच बोलने का साहस रखते हैं, भले ही इससे उपहास और अस्वीकृति मिले, जैसे कि पाप के बारे में बोलना, इस बात पर जोर देना कि परमेश्वर के कुछ नैतिक मानक हैं, न्याय की चेतावनी देना, यीशु के भविष्य में पुनः आगमन की घोषणा करना और इस प्रकार केवल उसकी ओर संकेत करने में सक्षम होना, जो बचा सकता है।

परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह ऐसे व्यक्तियों को खड़ा करे जो परमेश्वर के वचन से और परमेश्वर के आत्मा की अधीनता में अपने श्रोताओं को चुनौती देने के लिए तैयार हों। प्रार्थना करें कि जब आप ऐसी आवाज के माध्यम से परमेश्वर के वचन का सच में प्रचार होते हुए सुनें, तो आप आत्म-सन्तुष्टि से अपने आप को बचा सकें, सुनने के लिए तैयार हों, और परमेश्वर में अर्थात् अपनी एकमात्र आशा में शरण लेने के लिए तैयार रहें। और प्रार्थना करें कि आपके आस-पड़ोस में और आपके कार्यस्थल में आप वही आवाज बन सकें।       

1 थिस्सलुनीकियों 5:1-11

19 March : सहा मुद्दयात सुवार्तेचा  सारांश

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19 March : सहा मुद्दयात सुवार्तेचा  सारांश
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कारण आपल्यांला देवाजवळ नेण्यासाठीं ख्रिस्तानेहि पापांबद्दल, म्हणजे नीतिमान पुरुषाने अनीतिमान लोकांकरता, एकदा मरण सोसले. (1 पेत्र 3:18)

इथे सुवार्तेचा सारांश नमूद केला आहे, जो तुम्हांला सुवार्ता समजण्याकरिता, त्याचा आनंद घेण्याकरिता व इतरांना सांगण्याकरिता उपयुक्त ठरील!

  1. देवानें आपल्यांला त्याच्या गौरवाकरिता निर्माण केलें आहे.

“माझे पुत्र दुरून व माझ्या कन्या दिगंतापासून घेऊन या; ज्यांस माझे नाम ठेविले, ज्यांस माझ्या गौरवासाठीं उत्पन्न केलें, निर्माण केलें आणि घडिले त्या सर्वास घेऊन या.” (यशया 43:6-7) देवानें आपल्यां सर्वांना त्याच्या प्रतिमेमध्यें बनवले आहे यासाठीं कीं आपण त्याचें चरित्र व नैतिक सौंदर्य प्रतिबिंबीत करावे.

2. यासाठींच प्रत्येक मनुष्याने देवाच्या गौरवासाठीं जगावे

“म्हणून तुम्हीं खाता, पिता किंवा जे काहीं करता ते सर्व देवाच्या गौरवासाठीं करा” (1 करिंथ 10:31). देवाच्या गौरवाकरिता जगण्याचा मार्ग म्हणजे त्याच्यावर प्रीति करणे (मत्तय 22:37), त्याच्यावर विश्वास ठेवणे ( रोमंकरास पत्र 4:20), त्याचें उपकार मानणे (स्तोत्र 50:23), त्याच्या आज्ञा पाळणे (मत्तय 5:16) आणि त्याला प्रथम स्थान देणे व आपले धन मानणे ( फिलिप्पैकरास पत्र 3:8; मत्तय 10:37). आपण जेव्हां हे करतो तेव्हां आपण देवाचे गौरव प्रतिबिंबीत करतो.

3. तरीही, आपण सर्वांनी पाप केलें आणि देवाच्या गौरवाला उणे पडलो.

कारण सर्वांनी पाप केलें आहे आणि ते देवाच्या गौरवाला उणे पडले आहेत (रोमकरांस 3:23). देवाला ओळखूनसुद्धा त्यांनी देव म्हणून त्याचा गौरव केला नाहीं किंवा त्याचें आभार मानले नाहींत….. आणि अविनाशी देवाच्या गौरवाची, नाशवंत मनुष्य, पक्षी, चतुष्पाद पशू व सरपटणारे प्राणी ह्यांच्या प्रतिमांच्या रूपांशी त्यांनी अदलाबदल केलीं (रोमकरांस 3:23 1:21–23). आपण कुणीच देवावर जशी करायला पाहिजे तशी प्रीति केलीं नाहीं, विश्वास ठेवला नाहीं, उपकार मानले नाहींत, आज्ञा पाळल्यां नाहींत किंवा त्याला धन मानले नाहीं.

4. त्यामुळेच आपण सर्वजण सार्वकालिक शिक्षेस पात्र आहों

“कारण पापाचे वेतन मरण आहे; पण देवाचे कृपादान आपल्यां प्रभू येशू ख्रिस्तामध्यें सार्वकालिक जीवन आहे.” (रोमकरांस 6:23). ज्यांनी प्रभू येशूची आज्ञा पाळली नाहीं “त्यांना प्रभूच्या समोरून व त्याच्या सामर्थ्याच्या गौरवापासून दूर करण्यात येऊन युगानुयुगाचा नाश ही शिक्षा त्यांना मिळेल” (2 थेस्सल 1:9). “ते तर सार्वकालिक’ शिक्षा भोगण्यास जातील; आणि नीतिमान ‘सार्वकालिक जीवन उपभोगण्यास’ जातील” (मत्तय 25:46).

5. तरी, त्याच्या महान दयेनुसार, देवानें त्याचा एकुलता एक पुत्र येशू ख्रिस्त, याला जगात पापी लोकांसाठीं सार्वकालिक जीवनाचा मार्ग देऊ करण्याकरिता पाठवले.

“देवानें जगावर एवढी प्रीति केलीं कीं, त्यानें आपला एकुलता एक पुत्र दिला, अशासाठीं कीं, जो कोणी त्याच्यावर विश्वास ठेवतो त्याचा नाश होऊ नये तर त्याला सार्वकालिक जीवन प्राप्त व्हावे” (योहान 3:16). “आपल्यांबद्दल ख्रिस्त शाप झाला आणि त्यानें आपल्यांला नियमशास्त्राच्या शापापासून खंडणी भरून सोडवले” (गलती 3:13). “कारण आपल्यांला देवाजवळ नेण्यासाठीं ख्रिस्तानेही पापांबद्दल, म्हणजे नीतिमान पुरुषाने अनीतिमान लोकांकरता, एकदा मरण सोसले” (1 पेत्र 3:18).

6. म्हणून सार्वकालिक जीवन ही त्या सर्वांसाठीं एक दान आहे जे येशूवर प्रभू व तारणारा म्हणून विश्वास ठेवतात व त्याला त्यांच्या जीवनातले सर्वोच्च धन मानतात.

“प्रभू येशू ख्रिस्तावर विश्वास ठेव म्हणजे तुझे व तुझ्या घराण्याचे तारण होईल.” (प्रेषित16:31). “कीं, येशू प्रभू आहे असे जर ‘तू आपल्यां मुखाने’ कबूल करशील आणि देवानें त्याला मेलेल्यांतून उठवलें असा ‘आपल्यां अंत:करणात’ विश्वास ठेवशील तर तुझे तारण होईल” (रोमकरांस 10:9). कारण कृपेनेच विश्वासाच्या द्वारें तुमचे तारण झालेले आहे आणि हे तुमच्या हातून झाले असे नाहीं, तर हे देवाचे दान आहे; कोणी आढ्यता बाळगू नये म्हणून कर्मे केल्यांने हे झाले नाहीं. (इफिस 2:8–9). “मी ख्रिस्ताबरोबर वधस्तंभावर खिळलेला आहे; आणि ह्यापुढे मी जगतो असे नाहीं, तर ख्रिस्त माझ्या ठायी जगतो; आणि आता देहामध्यें जे माझे जीवित आहे ते देवाच्या पुत्रावरील विश्वासाच्या योगाने आहे; त्यानें माझ्यावर प्रीति केलीं व स्वत:ला माझ्याकरता दिले” (गलती 2:20). “इतकेच नाहीं, तर ख्रिस्त येशू माझा प्रभू, ह्याच्याविषयीच्या ज्ञानाच्या श्रेष्ठत्वामुळे मी सर्वकाहीं हानी असे समजतो; त्याच्यामुळे मी सर्व गोष्टींना मुकलो, आणि त्या केरकचरा अशा लेखतो; ह्यासाठीं कीं, मला ख्रिस्त हा लाभ प्राप्त व्हावा” (फिलिप्पै 3:8).

18 मार्च : विजयी सिंह

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18 मार्च : विजयी सिंह
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“तब मैं फूट फूटकर रोने लगा, क्योंकि उस पुस्तक के खोलने या उस पर दृष्टि डालने के योग्य कोई न मिला। इस पर उन प्राचीनों में से एक ने मुझ से कहा, ‘मत रो; देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिए जयवन्त हुआ है।’ तब मैं ने उस सिंहासन और चारों प्राणियों और उन प्राचीनों के बीच में, मानो एक वध किया हुआ मेमना खड़ा देखा।”  प्रकाशितवाक्य 5:4-6

हममें से कई लोगों ने बचपन में अपने माता-पिता से यह सुना होगा, “क्या तुम्हें . . . याद रहा?” इसका एक उदाहरण इस प्रकार है; जब भी मैं किसी के घर से लौटता था, तो मुझे प्रायः यह सुनने को मिलता था, “क्या तुम्हें धन्यवाद कहना याद रहा?” मुझे कोई नई बात बताए जाने की आवश्यकता नहीं होती थी; मुझे केवल याद रखना होता था। जब यीशु द्वारा उस स्वर्गिक वास्तविकता का दर्शन प्रेरित यूहन्ना ने देखा, तो वह आँसुओं में डूब गया क्योंकि वह डर गया कि कोई भी ऐसा नहीं है जो संसार के रहस्यों को देख सके और उसके पहली सदी के अनुभव की परेशानियों का अर्थ बता सके। किन्तु यूहन्ना को कोई नई जानकारी दिए जाने की आवश्यकता नहीं थी। उसे केवल वह याद दिलाए जाने की आवश्यकता थी, जो वह पहले से जानता था। उसने मूलभूत बातों को भूलकर गलती की थी।

यूहन्ना से कहा गया कि वह रोए नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की ओर देखे जो पुस्तक को खोल सकता है। जब वह मुड़ा तो उसने “मानो एक वध किया हुआ मेमना खड़ा देखा।” मेमने के घाव मसीह की मृत्यु की याद दिलाते थे, जिनके द्वारा उसने उद्धार को जीता था। किन्तु यह मेमना खड़ा था, जो उसके पुनरुत्थान की विजय का प्रतीक था। यहाँ इस दर्शन में हम यीशु को देखते हैं, जो परम-दयालु और सर्वशक्तिमान है। वह मेमना है, और वह सिंह है। वह पूरे संसार की आराधना और आज्ञाकारिता के योग्य है और उसकी मांग करता है और उसे वह अवश्य मिलेगी।

यूहन्ना के आँसुओं का समाधान यीशु था, ठीक वैसे ही जैसे हमारे अपने भय के आँसुओं का समाधान भी वही है, विशेषकर तब जब हम महसूस करते हैं कि सारा संसार हमारे विरुद्ध हो गया है, हम थक चुके हैं, छोटे, निर्बल और अधिकारहीन हैं, और जब यह मान लेने का प्रलोभन हमारे सामने आता हैं कि यह संसार किसी के नियन्त्रण में नहीं है और इसमें केवल अराजकता का बोलबाला है।

हममें से कोई नहीं जानता कि कोई दिन क्या लेकर आएगा या किसी रात में क्या घटित हो जाएगा। ये रहस्य केवल परमेश्वर के अधिकार में हैं। परन्तु हम कितने महान अनुग्रह का अनुभव करते हैं, जब परमेश्वर हमारे कन्धे पर थपथपाकर हमें हमारी बाइबल की ओर मोड़ते हुए कहता है कि क्या तुम भूल रहे हो कि यहूदा के गोत्र का सिंह वास्तव में विजय प्राप्त कर चुका है, कि नियन्त्रण उसके हाथ में है, कि भविष्य उसके अधिकार में है, कि वह राजा है?  यीशु ने पहले ही यूहन्ना से कह दिया था, “मत डर; मैं प्रथम और अन्तिम और जीवता हूँ; मैं मर गया था, और अब देख मैं युगानुयुग जीवता हूँ; और मृत्यु और अधोलोक की कुंजियाँ मेरे ही पास हैं” (प्रकाशितवाक्य 1:17-18)।

इसलिए जब आप वर्तमान या भविष्य से निराश या पराजित या परेशान महसूस करें, तो माँग केवल यही है कि जो आप पहले से जानते हैं उसे याद रखें। यहूदा के सिंह की ओर देखें, जो हमारे लिए वध किया गया मेमना है। वह योग्य है और सक्षम है कि वह पुस्तकों को खोल सके और इस संसार के इतिहास को उसके अन्त की ओर, अर्थात् उसके पुनः आगमन और महिमा में हमारे प्रवेश की ओर ले जा सके।       

प्रकाशितवाक्य 5

18 March : आपण आशेला घट्ट धरून का ठेवायचे आहे

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18 March : आपण आशेला घट्ट धरून का ठेवायचे आहे
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म्हणून आपल्यां संकल्पाची अचलता अभिवचनाच्या वतनदारांना विशेषत्वाने दाखवावी ह्या इच्छेने देव शपथेच्या द्वारें मध्यें पडला, ह्यासाठीं कीं, जे आपण, स्वतःपुढे ठेवण्यात आलेली आशा हस्तगत करण्याकरता आश्रयाला धावलो, त्या आपणांला ज्याविषयी खोटे बोलणे देवाला अशक्य आहे अशा दोन अचल गोष्टींच्या द्वारें चांगले उत्तेजन मिळावे. (इब्री 6 : 17-18)

पौलाचा जीव घेतल्यांशिवाय आम्हीं काहीं खाणार किंवा पिणार नाहीं असा संकल्प  करून दबा धरून बसलेल्यां लोकांचे काय?

देवच्या ठायी विसंगतपणा नाहीं. तो अभिवचनें, शपथा व त्याच्या पुत्राचे रक्त यांद्वारें स्वत:चे सामर्थ्य यासाठीं प्रकट करत नाहीं कीं आपल्यां सुरक्षेची एक बाजू घट्ट धरून, दुसरी बाजू हवेत आधांतरी ठेवावी.

ख्रिस्ताने त्याच्या रक्ताने मिळवलेले तारण, हे त्याच्या लोकांना केवळ अर्धवट नाहीं तर संपूर्णपणे वाचवते.

म्हणून आपण हा प्रश्न विचारावयांस उत्तेजित होतो कीं, इब्री 6:18 मध्यें लेखक आपल्यांला, आपल्यां आशेला हस्तगत करण्यास का सांगत आहे? जर आपले हस्तगत करणे येशूच्या रक्ताद्वारें मिळवलेले आहे व त्याची सुरक्षा अपरिवर्तनीय आहे (हाच जुना करार व नवीन करारातील फरक आहे ) – मग देव आपल्यांला का बरे आशा हस्तगत करण्यास सांगतो?

याचे उत्तर आहे :

  • जेव्हां ख्रिस्त मरण पावला तेव्हां त्यानें आपल्यां करिता आशेला हस्तगत करण्याची कृती घडवून आणण्याची सक्षमता मिळवली, ना कीं आपल्यांला त्यातून मुक्त केलें. 
  • जे त्यानें मिळवले ते आपली हस्तगत करण्याची इच्छा रद्द करत नाहीं, जसे कीं आपल्यांला आशेला धरून राहण्याची इच्छाच नाहीं, तर ते आपल्यां इच्छेला सक्षम करते ज्यामुळे आपल्यांला आशेला हस्तगत करण्याची इच्छा निर्माण होते.
  • त्यानें जे मिळवले त्याद्वारें हस्तगत करण्याची आज्ञा रद्द होत नाहीं, तर हस्तगत करण्याच्या आज्ञेची पूर्तता होते.
  • त्यानें जे मिळविले त्याद्वारें उत्तेजनाचा अंत होत नाहीं, तर त्याद्वारें उत्तेजनाचा विजय प्राप्त केला आहे.

तो मरण पावला यासाठींच कीं पौल जे फिलिपै 3:12 मध्यें करतो, आपणहि तेच करावे, “तर ज्यासाठीं ख्रिस्त येशूनें मला आपल्यां कह्यांत घेतले ते मी आपल्यां कह्यांत घ्यावे म्हणून मी त्याच्यामागे लागलो आहे.” आपण जे पापी जनांस सांगतो कीं देवानें दिलेली आशा हस्तगत करा, ज्याच्यासाठीं केवळ येशूच आपल्यांला सक्षम करू शकतो, तर हा मूर्खपणा नाहीं, तर शुभवर्तमान आहे. यासाठींच मी पूर्ण अंत:करणाने आपणास बोध करतो कीं : जे ख्रिस्ताने तुमच्या करिता हस्तगत केलें आहे, ते तुम्हीं हस्तगत करा, आणि त्याला घट्ट पकडून ठेवा – ती महान कृती तोच तुमच्यात करत आहे.

17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा

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17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा
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“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी विनती के द्वारा, और यीशु मसीह की आत्मा के दान के द्वारा, इसका प्रतिफल मेरा उद्धार होगा।”  फिलिप्पियों 1:19

क्या आपके जीवन में ऐसे लोग हैं, जिनके लिए आप इसलिए प्रार्थना नहीं करते क्योंकि आपको लगता है कि उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं है? हमारे सीमित मानवीय दृष्टिकोण में यह सहज बात हो सकती है कि हम उन लोगों को अनदेखा कर दें, जो बाहर से पूरी तरह व्यवस्थित दिखते हैं। किन्तु सच्चाई यह है कि हम सभी को दूसरों की प्रार्थनाओं की आवश्यकता होती है और हमें उन प्रार्थनाओं से लाभ भी होता है।

जब प्रेरित पौलुस जेल में था, तो उसने फिलिप्पियों की कलीसिया को लिखा और कहा कि वह जानता है कि उसका छुटकारा न केवल पवित्र आत्मा की सहायता से होगा, परन्तु परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाओं के द्वारा भी होगा। चाहे उसका तात्पर्य अपनी तात्कालिक कठिनाइयों से छुटकारा हो या उसे मसीह की उपस्थिति में ले जाने वाला अन्तिम उद्धार, पौलुस चाहता था कि फिलिप्पी में उसके मसीही मित्र यह जानें कि सेवाकार्य में बने रहने के लिए वह दूसरों की प्रार्थनाओं पर निर्भर था।

ऐसा उसने केवल इस मण्डली को ही नहीं कहा था। जब पौलुस ने रोम के मसीहियों को लिखा तब भी उसने यही बात कही थी, “हे भाइयो, हमारे प्रभु यीशु मसीह के और पवित्र आत्मा के प्रेम का स्मरण दिला कर मैं तुम से विनती करता हूँ कि मेरे लिए परमेश्‍वर से प्रार्थना करने में मेरे साथ मिलकर लौलीन रहो कि मैं . . . बचा रहूँ” (रोमियों 15:30-31)। वह चाहता था कि वे साथ मिलकर संघर्ष करें और ताजगी से भरे रहें। वह चाहता था कि उसकी सेवा संतों के लिए सहायक हो। वह चाहता था कि उसे उद्धार मिले। और उसने उनसे कहा कि यह सब उनकी प्रार्थनाओं के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है! जैसा कि प्रसिद्ध अंग्रेज प्रचारक सी.एच. स्पर्जन ने कहा था कि प्रार्थना वह रस्सी है जो परमेश्वर की उपस्थिति में लगी घंटियाँ बजाती है।[1] परमेश्वर के प्रावधान में यह उसकी पद्धति, उसकी योजना और उसकी शक्ति को खोल देती है।

परमेश्वर को पुकारो, यही वह बात है जो पौलुस हमें करने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि हम परमेश्वर के आत्मा को एक ऐसे तरीके से कार्य करते देखना चाहते हैं जिसे केवल अलौकिक कहा जा सकता है, तो हमें पहले गम्भीरता से, दीनता से और निरन्तर प्रार्थना करने के लिए तैयार होना होगा। पौलुस के शब्द हमें बताते हैं कि जब हम अन्य संतों के साथ मिलकर काम करते हैं, तो हम उनकी निर्बलताओं में उनकी सहायता कर सकते हैं। हम उनको साहस प्रदान किए जाने की प्रार्थना कर सकते हैं। हम उनके उद्धार में एक भूमिका निभा सकते हैं।

आप किसे जानते हैं, जिसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? क्या आप लगन के साथ, साहसिक रूप से और हठ के साथ उनके लिए प्रार्थना करेंगे? और आप किसे जानते हैं जो बाहर से ऐसा नहीं दिखता कि उसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? वास्तविकता यह है कि उन्हें भी इसकी आवश्यकता है! क्या आप उनके लिए भी इसी प्रकार प्रार्थना करेंगे?      

 फिलिप्पियों 1:3-11

17  March : प्रार्थनेचा प्रमुख उद्गार

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17  March : प्रार्थनेचा प्रमुख उद्गार
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“देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे; म्हणून आम्हीं देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो.” ( 2 करिंथकरास पत्र 1:20 )

प्रार्थना ही देवाच्या अभिवचनाला, म्हणजे भविष्यातील त्याच्या खात्रीदायक कृपेला दिलेला प्रतिसाद आहे.

प्रार्थना ही देवाच्या खात्यातून त्यानें आपल्यां करिता जमवलेली भविष्यातील कृपा काढून घेणे हे आहे.

प्रार्थना म्हणजे असा अंधविश्वास नाहीं कीं, कदाचित चांगले हेतु असलेला एक देव असू शकतो. प्रार्थना देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवते, आणि देवाच्या भविष्यातील कृपेच्या खात्याकडें दररोज जाते आणि गरजेच्या वेळी लागणारी कृपा काढून घेते.

ह्या महान वचनातील दोन भागांमध्यें जो दुवा आहे तो लक्ष्यांत घ्या. “म्हणून” या शब्दाकडें लक्ष द्या.

“देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे. म्हणून (यास्तव)  आपण देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो.”

आपल्यां ते लक्ष्यांत आले याची खात्री करण्याकरिता ह्या दोन भागांकडें पाहूया : आपण प्रार्थना करतो तेव्हां आपण देवाला ख्रिस्ता द्वारें आमेन म्हणतो, कारण देवानें ख्रिस्तामधील त्याच्या सर्व अभिवचनांना खात्रीपूर्वक आमेन  म्हंटले आहे. प्रार्थना ही देवाकडें केलेलीं भरवशाची विनवणी आहे कीं त्यानें ख्रिस्तामध्यें भविष्यासाठीं देऊ केलेल्यां अभिवचनांनी आपल्यांला आशीर्वादित करावे. प्रार्थना आपल्यां भविष्यातील कृपेवरील विश्वासाला सर्व गोष्टींच्या पायाशी जोडते, जो येशू ख्रिस्त आहे.   

हि गोष्ट आपल्यांला आपल्यां शेवटच्या मुद्दयाकडें आणते : “आमेन” हा प्रार्थनेतील एक संपूर्ण आणि मोलवान शब्द आहे. याचा अर्थ असा होत नाहीं कीं , “होय, मी ही प्रार्थना केलीं आहे.” याचा प्रामुख्याने अर्थ असा आहे कीं, “होय, देवानें ही सर्व अभिवचनें देऊ केलीं आहेत.”

आमेन म्हणजे, “होय, प्रभू तू हे करू शकतोस.” “होय, प्रभू तू सामर्थ्यशाली आहेस.  होय, प्रभू तू ज्ञानी आहेस. होय, प्रभू तू दयाळू आहेस. होय, प्रभू भविष्यातील सर्व कृपा तुझ्याकडून येते आणि त्याची खात्री ख्रिस्ता द्वारें आम्हांला प्राप्त झाली आहे.”

“आमेन” हा सादर केलेंल्यां प्रार्थनेच्या आशेचा उद्गार आहे, आणि साहाय्यासाठीं केलेंल्यां प्रार्थनेच्या भरवश्याची खात्री आहे.

16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति

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16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति
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“जिनकी [तुम्हारी] रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिए, जो आने वाले समय में प्रगट होने वाली है, की जाती है। इस कारण तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अभी कुछ दिन के लिए नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुख में हो।”  1 पतरस 1:5-6

दुख के बारे में हमें दो बातें स्वीकार करने की आवश्यकता है, पहली कि दुख वास्तव में होता है,  और दूसरी कि यह कष्ट देता है।  कष्ट हर किसी के जीवन की वह वास्तविकता है, जो कभी न कभी अवश्य ही आता है। ऐसा कष्ट कई रूपों में आता है, जिसमें मानसिक कष्ट सबसे बड़ा है।

संगी विश्वासियों को दुख के बारे में लिखते समय पतरस ने कहा कि दुख अनेक और विभिन्न तरीके से आ सकता है। पतरस के पहले पाठकों को जो विशिष्ट दुख था, वह मानसिक पीड़ा थी जो कठिनाइयों को सहते रहने से आती है, किन्तु पतरस भली-भाँति जानता था कि ऐसी कई प्रकार की परीक्षाएँ होती हैं, जो हमारे मनों को परेशान करती हैं और हमारी आत्माओं को कुचल देती हैं।

सुसमाचार के कारण पतरस अपने लेख का समापन निराशा और हताशा की स्थिति में नहीं करता। इसके विपरीत, वह हमें ऐसी प्रतिज्ञाएँ देता है, जिन पर हम विश्वास कर सकते हैं।

सबसे पहले, पतरस हमें याद दिलाता है कि हमारी परीक्षाएँ केवल “कुछ दिन” के लिए हैं। अब, “कुछ दिन” को अनन्त काल के प्रकाश में समझने की आवश्यकता है। यहाँ तक कि जीवन भर का समय भी सदा काल की तुलना में “कुछ दिन” ही है! इस प्रकार, इस जीवन में कष्ट का एक लम्बा समय भी परमेश्वर की व्यवस्था में और उसकी सन्तानों के लिए उसकी योजना और उद्देश्य के सन्दर्भ में “कुछ दिन” है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस तरह के कष्ट का समय थोड़ा महसूस होगा,  विशेषकर जब हम कष्ट के मध्य में हों। कई लोगों के लिए कष्ट का अर्थ यह होता है कि एक मिनट भी एक दिन जैसा लगता है, एक दिन एक साल जैसा लगता है, और एक साल कभी न समाप्त होने वाला समय लगता है। किन्तु हम इस प्रतिज्ञा से लिपटे रह सकते हैं और हमें रहना भी चाहिए कि हमारी वर्तमान विपत्ति अनन्त काल के लिए हमारा अन्त नहीं है। हो सकता है कि आज आपका जीवन दुख से भरा हो, परन्तु एक दिन, “उस अन्तिम समय में,” आप उद्धार से भर जाएँगे।

दूसरी बात, हम हियाव के साथ कह सकते हैं कि दुख के प्रत्येक क्षण में परमेश्वर उपस्थित होता है। तरसुस के शाऊल के हृदय परिवर्तन के वृतान्त में हम पाते हैं कि यीशु अपने लोगों के दुख के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है। वह कहता है, “हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे  क्यों सताता है?” (प्रेरितों 9:4, अतिरिक्त महत्त्व जोड़ा गया)। जब यीशु स्वर्ग में था तो वह “मुझे” कैसे कह सकता था? इसका कारण यह था कि आत्मा के माध्यम से मसीह अपने लोगों के साथ उपस्थित था। वह उनके साथ पूर्ण एकता में खड़ा था। जब वे घाटियों से होते हुए अपने अन्तिम उद्धार के दिन की ओर बढ़ रहे थे, उस समय उसका आत्मा उनकी रक्षा करते हुए उनके साथ था। वह हमारे लिए भी ऐसा ही करता है।

आपके पास प्रभु यीशु के रूप में एक महान महायाजक है, जो आपकी निर्बलताओं में आपके साथ दुखी होने में पूरी तरह सक्षम है (इब्रानियों 4:15)। जब इस झूठ पर विश्वास करने का प्रलोभन आपके सामने आए कि परमेश्वर ने आपको छोड़ दिया है या फिर यह कि कोई नहीं समझ सकता कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं या आप क्या झेल रहे हैं, तो आप इस बात में हियाव रख सकते हैं कि “हमारे दिल की कोई धड़कन या कोई पीड़ा ऐसी नहीं है, जिसे वह ऊपर बैठा महसूस नहीं कर सकता।”[1] और आप इस बात में भी हियाव रख सकते हैं कि एक दिन सारा दुख पीछे रह जाएगा और आगे केवल महिमा होगी। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसमें आप आज आनन्दित हो सकते हैं, चाहे आज कुछ भी हो।       

1 पतरस 1:3-9

16 March : येशू महान कामगिरी पूर्ण करणार

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16 March : येशू महान कामगिरी पूर्ण करणार
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“सर्व राष्ट्रांना साक्षीसाठीं म्हणून राज्याची ही सुवार्ता सर्व जगात गाजवली जाईल, तेव्हां शेवट होईल.” (मत्तय 24 : 14 )

मला सुवार्ताप्रसाराविषयीं येशूच्या ह्या अभिवचनापेक्षा इतर कोणतेच शब्द प्रेरणादायी वाटत नाहींत.

तो असे म्हणत नाहीं कीं : ही सुवार्ता गाजवली पाहिजे. 

असे म्हणत नाहीं कीं : ही सुवार्ता कदाचित गाजवली जाईल.

पण तो म्हणतो : ही सुवार्ता गाजवली जाईल.

ही महान कामगिरी नाहीं किंवा महान आज्ञा नाहीं. तर ही महान निश्चितता आहे, महान भरवसा आहे.

कोणी अश्याप्रकारे बोलायचे धाडस कसे काय करू शकते? त्याला कसे ठाऊक आहे कीं असेच होईल? त्याला कशी खात्री असू शकते कीं मंडळी सुवार्ता कार्यात अपयशी ठरणार नाहीं?

उत्तर : सुवार्ताप्रसार कार्याची कृपा ही पुनरुज्जीवनाच्या कृपेप्रमाणेच आहे, कोणी त्याचा प्रतिकार करू शकत नाहीं. ख्रिस्त वैश्विक घोषणेचे वचन देऊ शकतो कारण तो सार्वभौम आहे. त्याला भविष्यातील सुवार्ता कार्याच्या यशाबद्दल ठाऊक आहे कारण तोच भविष्य ठरवतो. सर्व राष्ट्रे ऐकतील!

“राष्ट्र” म्हणजे आधुनिक “देश” नव्हे. जुन्या करारात जेव्हां इतर राष्ट्रांचा उल्लेख केला जातो, तेव्हां तें वांशिक लोक गटांबद्दल बोलले गेले आहे, जसे कीं यबुसी, हित्ती, अमोरी, मवाबी, कनानी आणि पलिष्टी. “राष्ट्र” म्हणजे स्वत:ची विशिष्ट भाषा आणि संस्कृती असणारे विविध वंशाचे लोक. ( स्तोत्र 117:1 ) : “सर्व राष्ट्रांनो परमेश्वराचे स्तवन करा, अहो सर्व लोकांनो, त्याचें स्तवन करा.” राष्ट्र म्हणजे लोक – विविध लोक गट, जसे कीं आपण त्यांना संबोधतो.

देवाचा सार्वभौम पुत्र आणि मंडळीचा प्रभू या नात्यानें, येशूनें हा दैवी उद्देश हाती घेतला आणि संपूर्ण खात्रीने तो बोलला कीं, “सर्व राष्ट्रांना साक्षीसाठीं म्हणून राज्याची ही सुवार्ता सर्व जगात गाजवली जाईल, तेव्हां शेवट होईल” ( मत्तय 24 : 14 ).

जगाच्या सुवार्ताप्रसाराचे कार्य यशस्वी होणार याबद्दल खात्री दिली गेली आहे. ते अपयशी ठरू शकत नाहीं. मग हे रास्त नाहीं का, कीं आपण मोठ्या विश्वासाने प्रार्थना करू व मोठ्या भरवश्याने गुंतवणूक करू आणि यशाच्या खात्रीने  पुढे वाटचाल करू ?

15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना

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15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों।”  इफिसियों 1:3-4

बाइबल इस बात का कोई सीधा उत्तर नहीं देती कि परमेश्वर ने अदन की वाटिका में पतन क्यों होने दिया। वह केवल इतना बताती है कि परमेश्वर सब कुछ पर नियन्त्रण रखता है, यहाँ तक कि उस घटना पर भी।

तथापि इफिसियों को लिखे पौलुस के पत्र में हमें परमेश्वर की अनन्त योजना की एक झलक दी गई है। हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे संसार के अस्तित्व में आने से पहले ही काम कर रहा था और पतन की घटना ने उसे चौंका नहीं दिया था। जब आदम और हव्वा के विद्रोह के परिणामस्वरूप राज्य भ्रष्ट हो गया, तो परमेश्वर पहले से जानता था कि ऐसा होगा। आदम और हव्वा के बनाए जाने से पहले, उनकी अनाज्ञाकारिता से पहले, परमेश्वर उद्धार की योजना बना चुका था।

जब हम परमेश्वर के उद्धार के कार्य के बारे में सोचते हैं जो अन्ततः क्रूस पर पूर्ण हुआ, तो हमें इसे केवल एक संकट के समय में प्रदान किए गए समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके विपरीत, हमें क्रूस को परमेश्वर की अनन्त मंशा से जुड़ा हुआ देखना चाहिए, जिसने अनन्त काल से निश्चय किया हुआ था कि वह यीशु के माध्यम से अपने लिए एक प्रजा को बुलावा देगा और पतन के कारण जो कुछ भ्रष्ट हो चुका है उसे पुनः स्थापित करेगा।

इस योजना में परमेश्वर का उद्देश्य “उसकी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार” था और है तथा यह “उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति” के लिए है (इफिसियों 1:5-6)। परमेश्वर की अनन्त योजना में प्रेरणा केवल मनुष्यों को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं थी—यद्यपि मनुष्य इस कारण से अन्ततः प्रसन्न हो जाते हैं—परन्तु यह प्रेरणा उसके नाम के लिए उसकी चिन्ता थी। उसने निश्चय किया था कि सब कुछ उसके पुत्र प्रभु यीशु के चरणों के अधीन और नियन्त्रण में लाया जाए, जैसा कि होना भी चाहिए। इस प्रकार, छुटकारे की परमेश्वर की अनन्त योजना हमारे बारे में नहीं परन्तु उसके बारे में है। यह हमें प्रभावित अवश्य करती है। यह हमें बदल अवश्य देती है। किन्तु यह सब परमेश्वर के बारे में है। जब तक सुसमाचार हमें उसकी स्तुति करने और उसके लिए जीने के लिए प्रेरित नहीं करता, तब तक हमने इसे ठीक से नहीं समझा है।

परमेश्वर इस संसार का केन्द्र है। पतन के बाद से मनुष्यों ने परमेश्वर के अधिकार को स्वीकार करने से इनकार किया है और साथ ही उसे उसके उपयुक्त स्थान से हटाने का भरसक प्रयास किया है, जिसके परिणाम विनाशकारी हुए हैं। इस वर्तमान जीवन का कोई भी भाग ऐसा नहीं है जो मृत्यु की धूल से ढका न हो, क्योंकि मनुष्य ने यह निर्धारित कर लिया है कि वह इस तथ्य को पसन्द नहीं करता कि परमेश्वर केन्द्र में है।

क्या आप अपने जीवन को पुनः व्यवस्थित करेंगे और इसके प्रत्येक पहलू की देखरेख करने के परमेश्वर के अधिकार को मान्यता देंगे? क्या आप अपनी बढ़ाई के लिए नहीं, परन्तु उसकी स्तुति के लिए और अपने उद्देश्यों के लिए नहीं, परन्तु उसके उद्देश्य के लिए जीने का चुनाव करेंगे? विरोधाभास यह है कि जब आप अपनी नहीं परन्तु उसकी महिमा खोजेंगे, तब आप उस आनन्द का अनुभव करेंगे जो उसके पुत्र को अपने जीवन का केन्द्र मानकर जीने से आता है, जिसकी योजना परमेश्वर ने आपके लिए और समस्त सृष्टि के लिए अनन्त काल से बनाई थी।      

इफिसियों 1:3-14

15 March : ख्रिस्ताकारिता विध्वंसक

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15 March : ख्रिस्ताकारिता विध्वंसक
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मग तो (येशू) पलीकडें गदरेकरांच्या देशात गेल्यांवर दोन भूतग्रस्त कबरांतून निघून येत असताना त्याला भेटले, तेव्हां पाहा, ते ओरडून म्हणाले, ” हे देवाच्या पुत्रा, तू मध्यें का पडतोस ? नेमलेल्यां समयापूर्वी तू आम्हांला पीडण्यास येथे आला आहेस काय ?” मत्तय 8:29

दुरात्मे इथे एक रहस्य शिकत आहेत. त्यांना ठाऊक आहे कीं त्यांचा नाश होणार आहे. त्यांना ठाऊक आहे कीं देवाचा पुत्र हा विजयी होईल. पण त्यांना हे ठाऊक नव्हते कीं त्यांच्या अंतिम पराभवाच्या आधीच ख्रिस्त प्रकट होणार होता.

ख्रिस्त लढाई करिता त्याच्या सैन्य दलाचे पुढारीपण करण्यासाठीं शेवटच्या युद्धा पर्येंत थांबणार नाहीं. त्यानें सैतानाच्या प्रदेशामध्यें विध्वंसक शक्तीला दाखल केलें आहे. त्यानें जीवन वाचवण्यासाठीं त्याच्या “बचाव पथकाला” प्रशिक्षण दिले आहे. ख्रिस्ताने शेवटच्या विजयापूर्वी, विजयी होण्याकारिता अनेक रणनीती आखल्यां आहेत.

त्यामुळे आता युद्धनीती अशी आहे कीं – ज्याअर्थी आता सैतानाचा नाश ठरलेलाच आहे, व हे त्याला पण ठाऊकहि आहे, त्याअर्थी जेव्हां पण तो आपल्यांला त्याचा मागे जाण्यासाठीं मोहात टाकू पाहतो तेव्हां आपण त्याला ह्या गोष्टीची आठवण करून द्यायची आहे. आपण त्याचावर हसून म्हणायचे, “तुझे डोके ठिकाणावर आहे का, तू हरला आहेस आता तुला कोण साथ देणार?”

मंडळी ही “ ह्या युगाच्या दैवतापासून” मुक्त केलीं गेली आहे ( 2 करिंथ 4:4). आपण गनिमी काव्यातले सैनिक आणि योद्धे आहोंत. आपण आज्ञा मोडण्यार्‍या राज्याचा “अंतरिक्षातील अधिपतीच्या” विरुद्ध बंडखोरी करणारे असे सैनिक आहोंत (2 इफिस 2:2).

हे सुरक्षित नाहीं. पण हे थरारक आहे. खूप लोकांचा जीव यात गेला आहे. सैतानाचे दूत त्याच्या विरुद्ध कारवाया करणारांच्या सतत शोधात असतात. जे जीव जाईपर्यन्त लढा देतात ख्रिस्ताने त्यांना पुनरुत्थानाची खात्री दिली आहे. पण त्यानें शत्रूंच्या प्रदेशामध्यें शांती, जगाकडून स्विकृती किंवा समृद्धीची खात्री दिली नाहीं.

पुष्कळांनी आपल्यां सेनापतिच्या आज्ञा पाळत त्यांच्या जीवाचे बलिदान दिले आहे. आणि मी यापेक्षा चांगल्यां जीवनाचा विचार देखील करू शकत नाहीं – आणि मरणाचा देखील नाहीं!