ArchivesAlethia4India

9 मार्च : सीखने के लिए एक अवसर

Alethia4India
Alethia4India
9 मार्च : सीखने के लिए एक अवसर
Loading
/

“मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो।”  मत्ती 11:29

जब बच्चे स्कूल से घर पहुँचते हैं, तो उनके माता-पिता उनसे क्या पूछते हैं?

कुछ लोग पूछते होंगे कि “क्या तुमने आज कुछ सीखा?” किन्तु कई लोग कुछ ऐसा कहते होंगे कि “क्या तुमने आज मज़ा किया?”

स्कूली शिक्षा के सम्बन्ध में यह महत्त्व नहीं रखता कि कौन सा प्रश्न पूछा जाता है और उसके परिणामस्वरूप कौन सी प्राथमिकता उजागर होती है। किन्तु कलीसिया के बारे में भी प्रायः यही प्रश्न पूछा जाता है कि क्या हमने आज कलीसिया में मज़ा  किया? क्या हमने कलीसिया का आनन्द  लिया?

इसके विपरीत, हमें जो पूछना चाहिए वह यह है, “हम यीशु के बारे में और यीशु से क्या सीख  रहे हैं?”

यीशु हमें उससे सीखने का अवसर देने का महान विशेषाधिकार प्रदान करता है। चारों सुसमाचारों में उसकी शिक्षा जीवन के बड़े प्रश्नों को सम्बोधित करती है, अर्थात् मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ? मैं कहाँ जा रहा हूँ? क्या जीवन का कोई महत्त्व है भी?

यीशु मसीह को व्यक्तिगत प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में जानना इन बड़े विषयों के बारे में लोगों के सोचने के तरीके को बदल देता है। यह समय के बारे में, संसाधनों के बारे में, आजीविका के बारे में, या फिर वे किस तरह के व्यक्ति से विवाह करना चाहेंगे या वे किस तरह का जीवनसाथी बनना चाहते हैं, इस बारे में उनके दृष्टिकोण को बदल देता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि यीशु को सच में जानने का अर्थ है उसे अपने जीवन पर अधिकारी बनने के लिए आमन्त्रित करना। जैसे-जैसे हम उससे सीखते हैं, सब कुछ बदल जाता है।

यीशु के पास आना इस बात को सीखने और उसके प्रति प्रत्युत्तर देने से आरम्भ होता है कि मसीह, अर्थात् अधर्मियों (जो कि हम हैं) के लिए धर्मी (जो कि वह है) ने पापों के कारण एक बार दुख उठाया ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए (1 पतरस 3:18)। केवल मस्तिष्क में इस बात की जानकारी का होना इस बात पर विश्वास करने, इस पर भरोसा करने और जिसने हमें यह सब दिया है उसका जूआ प्रसन्नता के साथ अपने ऊपर उठा लेने के बराबर नहीं है।

हम सभी ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने जीवन की पहेली को सुलझाने के प्रयास में लगे हैं और पहेली के टुकड़ों को जितना हो सके उतना एक साथ जोड़ने का यत्न कर रहे हैं, और हम सब भी कभी न कभी ऐसी परिस्थिति में रह चुके हैं। किन्तु जब तक हम परमेश्वर से सीखने के लिए तैयार नहीं होंगे तब तक वे टुकड़े एक साथ नहीं जुड़ सकेंगे। परन्तु अब हम वास्तव में परमेश्वर को जान सकते हैं, हमारी बौद्धिक क्षमता के कारण नहीं अपितु इसलिए क्योंकि परमेश्वर अपने वचन की सच्चाई के द्वारा यह चुनता है कि हम उसको जानें।

क्या आप अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यीशु से सीखने के लिए तैयार हैं? क्या आप उसकी शिक्षाओं का पालन करने और अपने आप को उसके अधिकार के अधीन रखने के काम को एक विशेषाधिकार के रूप में देखते हैं, न कि एक बोझ के रूप में? सुनिश्चित करें कि आप सुसमाचार के सत्य को सीखने के प्रत्येक अवसर का लाभ उठाएँगे, जो आपके हृदय की तृष्णा को तृप्त करेगा और दिन-प्रतिदिन आपके जीवन को परिवर्तित करता जाएगा।

      इफिसियों 4:17 – 5:2

March 9 : देव तुमची काळजी घेतो

Alethia4India
Alethia4India
March 9 : देव तुमची काळजी घेतो
Loading
/

“म्हणून देवाच्या पराक्रमी हाताखाली लीन व्हा, ह्यासाठीं कीं, त्यानें योग्य वेळी तुम्हांला उंच करावे. त्याच्या वर तुम्हीं आपली सर्व चिंता टाका कारण तो तुमची काळजी घेतो.” (1 पेत्र 5:6-7)

भविष्याबद्दल काळजी करणे हे गर्व करण्यासारखे का आहे ?

देव अशा प्रकारे उत्तर देईल ( यशया 51:12  – दुसर्‍या शब्दात ):

मी- परमेश्वर, तुझा निर्माणकर्ता – तुमचे सांत्वन करणारा मी, केवळ मीच आहे, तुझी काळजी घ्यायचे मी वचन देतो; जे तुला धमकावतात, ते तर मर्त्य लोक आहेत. त्यामुळे तुझ्या भयाचा असा अर्थ होतो कीं तुझा माझ्यावर विश्वास नाहीं – आणि तुझी काळजी घेण्याकरिता तुझा, तुझ्या स्वत:च्या संसाधनांवर देखील विश्वास नाहीं, तरी तू माझ्या भविष्यातील कृपेवर विश्वास ठेवण्यापेक्षा स्वत: च्या कमकुवत स्वयंपूर्णेतेवर अवलंबून आहेस. त्यामुळे तुझे सर्व थऱथऱ कापणे- कितीही कमकुवत असेल तरी – ते तुझा गर्व प्रकट करते.

यावर उपाय? स्वतावर विसंबून राहण्याऐवजी देवावर विसंबून रहा, आणि भविष्यातील कृपेसाठीं देवाच्या स्वयंसिद्ध अभिवचनांच्या सामर्थ्यावर भरवसा ठेवा.

1 पेत्र 5:6-7 मध्यें, तुम्हीं पाहू शकता कीं, चिंता करणे हे एक प्रकारच्या गर्वा प्रमाणे आहे, “देवा च्या…. पराक्रमी हाताखाली…. लीन व्हा” (आणि वचन 7)” त्याच्यावर तुम्हीं आपली सर्व चिंता टाका”  यातील व्याकरण पहा. वचन 7 हे नवीन वाक्य नाहीं, ते संयुक्त वाक्य आहे, ते एकमेकाला जोडलेले आहे. ते आपण अशा शब्दांत मांडू शकतो : “त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाकून लीन व्हा.”

याचा अर्थ देवावर आपल्यां सर्व चिंता टाकणे म्हणजे त्याच्या पराक्रमी हाताखाली लीन होणे असा होतो. हे असे म्हणण्यासारखे आहे कीं, “नम्रपणे जेव…. आपले तोंड बंद ठेवून,” किंवा, “लक्षंपूर्वक गाडी चालव …. तुझी दृष्टि रस्त्यावर ठेवून,” किंवा, “दानशूर हो…. कोणाला तरी घरी भोजनाला आमंत्रित करून,” किंवा,  स्वत:ला लीन कर…. सर्व भय देवावर टाकून.”

स्वत:ला नम्र करण्याचा एक मार्ग म्हणजे आपल्यां सर्व चिंता देवावर टाकणे. याचा अर्थ, देवावर सर्व चिंता टाकण्यामध्यें आपला गर्व अडथळा निर्माण करतो. याचा अर्थ, आपली गैरवाजवी चिंता एक प्रकारचा गर्वच आहे. कितीही कमकुवत वाटला किंवा दिसला तरी.

तर मग, आपली चिंता देवावर टाकणे हे गर्वाच्या विपरीत कसे आहे ? कारण गर्व हे मान्य करीत नाहीं कीं त्याला चिंता आहेत. किंवा आपण त्यांची काळजी स्वत: घेऊ शकत नाहीं. जर गर्वाला हे मान्य करायचे असेल कीं आपले भयावर नियंत्रण नाहीं, तरी देखील त्याला यावरील उपाय, कीं आपण दुसर्‍या कोणावर तरी विसंबून राहायचे जो आपल्यांपेक्षा जास्त सामर्थ्यशाली आणि ज्ञानी आहे, ते मान्य करायचे नसते.  

दुसर्‍या शब्दात सांगायचे झाले तर, गर्व हा एक प्रकारचा अविश्वास आहे, ज्याला देवाच्या भविष्यातील कृपेवर विश्वास ठेवायचा नसतो. पण याउलट, विश्वास हे मान्य करतो कीं त्याला सहाय्याची गरज आहे. गर्व हे मान्य करीत नाहीं. विश्वास देवाच्या सहाय्यावर भरवसा ठेवून राहतो, गर्व हे नाहीं करत. विश्वास सर्व चिंता देवावर टाकतो, गर्व टाकींत नाहीं.

ह्यास्तव, गर्वाच्या अविश्वासावर लढा द्यायचा असेल तर हे कबूल करावें कीं मला चिंता आहेत, आणि देवाचे भविष्यातील कृपेचे अभिवचन “तो तुमची काळजी करतो” याचे मनात जतन करा. आणि मग सर्व चिंता त्याच्या सामर्थ्यशाली बाहुंवर सोपवून द्या.

8 मार्च : अब्राहम की आशा

Alethia4India
Alethia4India
8 मार्च : अब्राहम की आशा
Loading
/

“न अविश्वासी होकर परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा पर संदेह किया, पर विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्‍वर की महिमा की।”  रोमियों 4:20

अब्राहम के सन्तान पैदा होने से पहले ही परमेश्वर ने उससे प्रतिज्ञा की थी कि उसके वंशज संख्या में वृद्धि करके एक विशाल जनसमूह बन जाएँगे। समय बीतता गया और ऐसा लगने लगा कि अब्राहम और उसकी पत्नी सारा को कभी कोई सन्तान नहीं होगी। ऐसा लग रहा था कि प्रतिज्ञा पूरी न हो सकेगी, इसलिए अब्राहम और सारा ने प्रतीक्षा न करते हुए स्वयं ही इस विषय में कुछ करने का निर्णय लिया। सारा ने अपनी दासी हाजिरा को अब्राहम के लिए एक सन्तान उत्पन्न करने का प्रस्ताव दिया और हाजिरा ने एक बच्चे को जन्म दिया, जिसका नाम इश्माएल रखा गया। फिर भी परमेश्वर ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसने जो वंशज देने की प्रतिज्ञा की थी, वे इश्माएल की वंशावली से नहीं आने वाले थे। परमेश्वर अब्राहम और सारा को दिखा रहा था कि यदि उसकी प्रतिज्ञा को पूरा होना है, तो केवल वही इसे पूरा कर सकता है। अब्राहम को एक काम दिया गया और वह था परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा करना, एक ऐसी प्रतिज्ञा पर जिसके पूर्ण होने में भारी कठिनाइयाँ थीं और इसलिए उसे पूर्ण करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता थी।

वर्ष बीतते गए और सारा अभी भी गर्भवती न हुई। परमेश्वर फिर से अब्राहम के पास आया और उसे आश्वस्त किया कि इतनी आयु हो जाने के बाद भी सारा एक बेटे को जन्म देगी। अन्ततः, नब्बे साल की आयु में उसने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम इसहाक रखा गया, जिसका अर्थ है “वह हँसता है।” अब्राहम, जो एक बार इसहाक के जन्म की सम्भावना पर सन्देह करते हुए हँसा था (उत्पत्ति 17:17), वह अब निश्चित रूप से विस्मय से अभिभूत था।

परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करता है। नब्बे साल की स्त्री के लिए सन्तान को जन्म देना असम्भव बात है, परन्तु परमेश्वर ऐसा करने में सक्षम है। इस वृद्ध दम्पति को दी गई एक वारिस की प्रतिज्ञा को पूरा होने के लिए अन्य किसी भी बात से बढ़कर जीवन के अलौकिक वरदान की आवश्यकता थी। परमेश्वर के दिव्य हस्तक्षेप के बिना कोई सन्तान नहीं हो सकती थी, अर्थात् कोई जन्म हो ही नहीं सकता था। इसी प्रकार, परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना कोई आत्मिक जीवन नहीं हो सकता। किन्तु उसके सामर्थ्य से एक नया जीवन मिल सकता है, एक सच्चा जीवन! आदि से ही परमेश्वर अपने लोगों को सिखा रहा था कि किसी भी जीवन में सुसमाचार को जड़ पकड़ने के लिए आश्चर्यकर्म की आवश्यकता पड़ती है।

परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाएँ पूरी करता है। और अपने लोगों से की गई उसकी प्रतिज्ञाएँ बहुत सारी हैं, वे सभी शोभायमान हैं और वे सब मसीह में “हाँ” के साथ हैं (2 कुरिन्थियों 1:20)। हमारा काम बसी यही है कि हम वही करें जो अब्राहम ने करना सीखा था, अर्थात् परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना, भले ही उनका पूरा होना बहुत दूर की बात या असम्भव क्यों न लगता हो। और फिर, एक ऐसी प्रतिज्ञा जिसके पूरे होने में भारी कठिनाइयाँ हों, उसे पूरा करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता होती है, और वही तो वह परमेश्वर है, जिसे आप और मैं पिता कहकर पुकारते हैं।

क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसे यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि परमेश्वर आज भी अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है? यदि सच कहें तो हम सभी को यह बात याद दिलाए जाने की आवश्यकता है। अब्राहम के समान केवल परमेश्वर पर ही अपनी आशा रखें। वह अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सक्षम है और केवल उसके सामर्थ्य से ही वे पूरी हो सकेंगी। किन्तु आप तो जानते हैं कि परमेश्वर आश्चर्यकर्म करता है, केवल इतना करें कि आईने में देखें और याद करें कि सितारों को उनके स्थान पर रखने और संसार को बनाए रखने में जिस दिव्य सामर्थ्य की आवश्यकता है, उसी सामर्थ्य ने आपके हृदय को जागृत किया है, आप में विश्वास पैदा किया है और आपको अनन्त जीवन दिया है।       उत्पत्ति 15:1-21

March 8 : तुमच्या मनाची कवाडे उघडा

Alethia4India
Alethia4India
March 8 : तुमच्या मनाची कवाडे उघडा
Loading
/

 “चेपलेला बोरू तो मोडणार नाहीं, मिणमिणती वात तो विझविणार नाहीं.” (यशया 42:3)

 बर्‍याच आठवड्यानंतर मनाला उत्तेजन देणारे शब्द माझ्या वाचनात आले, जे यशया 42:1-3 यातून होते, जे येशू त्याच्या आत्मिक शक्तीचा वापर कशाप्रकारे करेल याविषयीं सांगतात. 

तुम्हांला एखाद्या चेपलेल्यां बोरू प्रमाणे वाटते का – ईस्टर लिलीच्या फुलाप्रमाणे, ज्याची फांदी चेपलेली आहे व त्यामुळे काहींच सत्व न मिळाल्यांमुळे ते फूल खाली पडले आहे. तुम्हांला कधी असे वाटते का, कीं तुमचा विश्वास जळत्या ज्वालेमध्यें एका लहान ठिणगी प्रमाणे आहे- वाढदिवसाच्या विझवीलेल्यां मेणबत्तीच्या वातेतील लहानश्या ठिणगी प्रमाणे?

धीर धरा! ख्रिस्ताचा आत्मा हा उत्तेजनाचा आत्मा आहे, तो तुमचे फूल तोडून टाकणार नाहीं, तो तुमच्यातील ठिणगी विझविणार नाहीं.

“परमेश्वराचा आत्मा माझ्यावर आला आहे, कारण दीनांस सुवार्ता सांगण्यास त्यानें मला अभिषेक केला” (लूक 4:18). “तुमच्यावर न्याय्यत्वाचा सूर्य उदय पावेल, त्याच्या पंखांच्या ठायी आरोग्य असेल” (मलाखी 4:2). “[तो] मनाचा सौम्य व लीन आहे……‘तुमच्या जिवांना विसावा मिळेल” (मत्तय 11:29). “परमेश्वराची प्रतीक्षा कर; खंबीर हो, हिम्मत धर; परमेश्वराचीच प्रतीक्षा कर” (स्तोत्र 27:14).

आपल्यांला दु:ख वाटू शकते कीं, आपण एक मोठी ज्वाला नसून, केवळ एक ठिणगी आहोंत. पण ऐका! आणि उत्तेजन प्राप्त करून घ्या: होय, मोठ्या आगीमध्यें व ठिणगीमध्यें खूप मोठा फरक आहे. पण ठिणगी असण्यामध्यें आणि ठिणगी नसण्यामध्यें देखील खूप मोठा फरक आहे. विश्वासच नसणे या पेक्षा मोहरीच्या दाण्याएवढा विश्वास, हा डोंगरा एवढा विश्वास होण्यापेक्षा जास्त सोयीस्कर आहे.

देवाच्या अभिवचनाची कवाडे उघडा आणि पवित्र आत्म्याला तुमच्या मनाच्या प्रत्येक खोलीमध्यें फुंकर घालू द्या. देवाचा पवित्र आत्मा कधीच मोडणार नाहीं किंवा विझवीणार नाहीं. तो तुमचे मस्तक उंच करील, व तुमच्यातील ठिणगीला वारा देऊन एक ज्वाला बनवेल. तो उत्तेजनाचा आत्मा आहे.

7 मार्च : सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में यीशु

Alethia4India
Alethia4India
7 मार्च : सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में यीशु
Loading
/

“खोजे ने फिलिप्पुस से पूछा, ‘मैं तुझ से विनती करता हूँ, यह बता कि भविष्यद्वक्ता यह किसके विषय में कहता है, अपने या किसी दूसरे के विषय में?’ तब फिलिप्पुस ने अपना मुँह खोला, और इसी शास्त्र से आरम्भ करके उसे यीशु का सुसमाचार सुनाया।”  प्रेरितों के काम 8:34-35

बाइबल का गम्भीरता से अध्ययन करते समय हम जान जाते हैं कि यीशु किसी अप्रत्याशित रूप से अस्तित्व में नहीं आ गया। आरम्भ से लेकर अन्त तक बाइबल की पुस्तक उसी के बारे में बताती है। निस्सन्देह, पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं ने भी आत्मा की प्रेरणा से यीशु के बारे में लिखा। चाहे हम पवित्रशास्त्र को कितनी भी अच्छी तरह से जानते हों, फिर भी यदि हम मसीह से अपनी आँखें हटा लेते हैं तो हम इसके केन्द्र, इसकी कुंजी और इसके नायक को देखने से चूक जाएँगे।

सुसमाचारों में यीशु लोगों का ध्यान पुराने नियम की ओर लाता है, जिससे उन्हें यह समझने में सहायता मिल सके कि वह कौन था। अपने सेवाकार्य के आरम्भ में वह एक बार आराधनालय में यशायाह की पुस्तक से पढ़ रहा था। लूका हमें बताता है कि जब उसने समाप्त किया, तो वह अपने सुनने वालों से “कहने लगा, आज ही यह लेख तुम्हारे सामने पूरा हुआ है” (लूका 4:21)। आगे, पुराने नियम में विशेष रूप से रुचि रखने वाले और उसे अच्छी रीति से जानने वाले लोगों से बात करते हुए यीशु ने उन्हें चेतावनी दी, “तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है” (यूहन्ना 5:39)। अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के बाद जब इम्माऊस के मार्ग में यीशु का सामना अपने कुछ निराश अनुयायियों से हुआ, तो उसने “मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्रशास्त्र में से अपने विषय में लिखी बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया।” (लूका 24:27)।

दूसरे शब्दों में, यीशु ने स्पष्ट रूप से यह शिक्षा दी कि पुराने नियम का प्रत्येक भाग उसी में अपना केन्द्र और पूर्णता पाता है।

जब आप पवित्रशास्त्र पढ़ते हैं तो आपकी मुलाकात यीशु से होती है, क्योंकि यह पुस्तक उसी की गवाही देती है। भले ही पुराने नियम के खण्डों का हमारा अध्ययन और समझ हमें जीवन के बारे में अच्छे और महत्त्वपूर्ण नैतिक सत्य प्रदान करते हैं, फिर भी एक बहुत बड़ा संकट यह है कि हम उस परम सत्य, अर्थात् यीशु को उसमें न देख पाएँ। आपकी बाइबल के प्रत्येक पृष्ठ का उद्देश्य यह है कि आप यीशु से भेंट कर सकें, उसे जान सकें, और उसके महान नाम की उद्‌घोषणा कर सकें और यह सब उसकी महिमा के लिए हो।

उस प्रत्येक प्रवचन में जिसे आप सुनते हैं, उस प्रत्येक पाठ में जिसका आप अध्ययन करते हैं, और परमेश्वर के वचन के उस प्रत्येक खण्ड में जिसे आप पढ़ते हैं, आप अपने आप से पूछें कि “क्या यह मुझे मसीह तक लेकर आया? क्या मैंने इसमें यीशु को पाया?” और जब तक आप “हाँ” में उत्तर न दे सकें तब तक सुनना, अध्ययन करना और पढ़ना बन्द न करें क्योंकि उद्धार, सत्य, बुद्धि और आश्वासन के खजाने उसी में पाए जाते हैं।       

भजन संहिता 119:17-32

7  March : मी पवित्र आत्म्याने स्वत:ला कसे भरू शकतो?

Alethia4India
Alethia4India
7  March : मी पवित्र आत्म्याने स्वत:ला कसे भरू शकतो?
Loading
/

“धीराच्या व शास्त्रापासून मिळणार्‍या उत्तेजनाच्या योगे आपण आशा धरावी म्हणून जे काहीं शास्त्रात पूर्वी लिहिले ते सर्व आपल्यां शिक्षणाकरिता लिहिले “ ( रोम 15:4)

आपण पवित्र आत्म्याने कसे भरले जाऊ शकतो? आपण आपल्यां मंडळीवर व स्वत:वर पवित्र आत्म्याचा वर्षाव कसा अनूभवू शकतो, कीं जेणेकरून तो आपल्यांला अदम्य अश्या आनंदाने भरून टाकींल आणि आपल्यांला स्वतंत्र करील, सामर्थ्य देईल ज्याच्या द्वारें आपण इतरांवर अश्याप्रकारे प्रीति करू शकू कीं त्यांना आपण ख्रिस्तासाठीं जिंकून घेऊं?

उत्तर : यासाठीं देवाच्या अतुलनीय, आशा देणार्‍या वचनांवर दिवस-रात्र मनन करा. जसे रोमकरास पत्र 15:4 सांगते, “धीराच्या व शास्त्रापासून मिळणार्‍या उत्तेजनाच्या योगे आपण आशा धरावी म्हणून जे काहीं शास्त्रात पूर्वी लिहिले ते सर्व आपल्यां शिक्षणाकरिता लिहिले” ह्याच्याद्वारें पौल त्याचें अंत:करण आशा, आनंद आणि प्रीतिने भरत असे.

आपल्यांला आशेची संपूर्ण खात्री देवाच्या अभिवचनांवर मनन केल्यांने येते. आणि रोम 15:13 मध्यें सांगितल्यां प्रमाणे पवित्र आत्मा आशा देऊ करतो, या वचनाबरोबर विरोधाभास होत नाहीं. याचे कारण हे कीं, पवित्र आत्मा हा शास्त्राचा दैवी लेखक आहे. त्याचें कार्य हे त्याच्या शब्दाद्वारें होते. आपल्यांला त्याच्या अभिवचनांनी भरून तो आपल्यांला आशेने भरतो ह्या त्याच्या पद्धतीमध्यें कुठेच विरोधाभास नाहीं.

आशा ही एखादी संदिग्ध भावना नाहीं, जी पोटदुखी प्रमाणे अचानक उदभवेल. आशा हा एक प्रकारचा भरवसा आहे कीं पवित्र आत्म्याने त्याच्या वचनाद्वारें आपल्यां उज्ज्वल भविष्याबद्दल जे अभिवचन दिले आहे, ते खरे होईल. तर पवित्र आत्म्याने भरण्याचा मार्ग म्हणजे त्याच्या वचनाने भरणे. आणि आत्म्याचे सामर्थ्य प्राप्त करण्याचा मार्ग म्हणजे देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवणे.

कारण देवाचे वचनच आहे जें आपल्यांला आशेने भरते, आणि आशा आपल्यांला आनंदाने भरते, आणि आनंद आपल्यां शेजार्‍यावर प्रीति करण्याच्या सामर्थ्याने आणि स्वातंत्र्याने ओसंडून वाहतो. आणि हेंच पवित्र आत्म्याने परिपूर्ण होणे आहे.   

6 मार्च : तू कहाँ है?

Alethia4India
Alethia4India
6 मार्च : तू कहाँ है?
Loading
/

“आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्‍वर से छिप गए . . . तब यहोवा परमेश्‍वर ने पुकारकर आदम से पूछा, ‘तू कहाँ है?’”  उत्पत्ति 3:8-9

जातियों, भाषाओं और भौगोलिक सीमाओं से परे, प्रत्येक स्थान पर बच्चे लुका-छिपी खेलने का आनन्द लेते हैं। यह सारे जगत में खेला जाने वाला भोलेपन से भरा एक खेल है। किन्तु इस संसार में लुका-छिपी का पहला खेल न तो मनोरंजक था और न ही भोलेपन से भरा हुआ। वह बहुत ही चिन्ताजनक था।

बगीचे में आदम और हव्वा अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अंजीर के पत्तों के पीछे एक-दूसरे से और बगीचे के पेड़ों के पीछे अपने सृष्टिकर्ता से छिप गए। उन्होंने छिपे रहने का प्रयास किया, परन्तु परमेश्वर इस एक साधारण प्रश्न के साथ उन्हें खोजने आया, “तू कहाँ है?”

यह प्रश्न इस आम धारणा को उलट देता है कि मनुष्य उस परमेश्वर को ढूँढ रहा है, जो जगत में कहीं या उससे भी परे कहीं छिपा हुआ है। इसके विपरीत, हम इसके उलट पाते हैं कि हम ही छिपे हुए हैं और परमेश्वर हमें ढूँढता हुआ आता है।

परमेश्वर द्वारा इन पहले मनुष्यों से पूछा गया ये प्रश्न विचित्र लग सकता है। क्या परमेश्वर पहले से ही सब कुछ नहीं जानता? आदम और हव्वा कहाँ थे, यह प्रश्न परमेश्वर ने इसलिए नहीं पूछा था कि वह नई जानकारी प्राप्त कर सके, परन्तु इसलिए कि वह उन्हें उनकी परिस्थिति को समझने में सहायता करना चाहता था। परमेश्वर उन्हें बाहर निकालने  से अधिक उन्हें उजागर करने  के लिए आया था।

कल्पना कीजिए कि आदम और हव्वा के विद्रोह के उत्तर स्वरूप परमेश्वर कितने तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था। यदि उसने न्याय करते हुए कठोरता से उत्तर दिया होता, तो वह उसी क्षण मृत्यु-दण्ड ला सकता था जिसके बारे में उसने उन्हें चेतावनी भी दी थी (उत्पत्ति 2:16-17)। किन्तु सदैव दया करना परमेश्वर के स्वभाव में है, इसलिए वह ऐसा करने के विपरीत केवल एक प्रश्न लेकर आया। मानवजाति द्वारा परमेश्वर से मुँह मोड़ने के बाद यह परमेश्वर के अनुग्रह की पहली झलक है। परमेश्वर ने उन्हें उसी समय वह नहीं दिया जिसके वे योग्य थे; परन्तु अपनी असीम दया में से उसने वह दिया जिसके वे योग्य नहीं थे, अर्थात् प्रत्युत्तर देने और लौट आने का एक अवसर।

हम में से कोई भी सहज महसूस नहीं करेगा यदि हमारे सबसे निकटतम लोग हमारे सभी गुप्त विचारों और किए गए कार्यों को देख सकते। हम एक-दूसरे से और सम्भवतः अपने आप से भी सच्चाई छिपा सकते हैं। परन्तु परमेश्वर से छिपाना व्यर्थ है। न तो छिपाने का कोई तरीका है और न ही किसी और पर दोष मढ़ने का कोई तरीका है।

हमें इस झूठ पर विश्वास नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर उन “छोटे” पापों को नहीं देखेगा, जिन्हें हम दूसरों से छिपाते हैं। वह सब देखता है। वह तो हमारी आत्माओं के भीतर देखता है और जानता है कि हमने क्या किया है और हमारी परिस्थिति क्या है। यह बहुत बढ़िया है कि हमें यह दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है कि हम कुछ छिपा सकते हैं। वह हम पर दया करने आता है हमारा न्याय करने नहीं, क्योंकि “परमेश्‍वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए” (यूहन्ना 3:17)। क्या आप किसी सताने वाले पाप या छिपी हुई लज्जा के कारण बोझिल हैं? क्या आप परमेश्वर से भी वह बात छिपाना चाह रहे हैं, जो आप दूसरों से छिपाते रहे हैं? परमेश्वर से छिपाना बन्द करने का सबसे अच्छा समय अब है। ज्योति में आ जाएँ। जो उसके सामने छिपा नहीं रह सकता उसे उजागर करें, ताकि वह उसे अपने लहू से ढक सके और आप जान सकें कि आप को जान लिया गया है और क्षमा कर दिया गया है। वह एक दयालु और बचाने वाला परमेश्वर है, जो हमारे साथ सम्बन्ध स्थापित करने की अभिलाषा रखता है।       1 यूहन्ना 1:8-2:2

6 March : देव दीनांकडें लक्ष्य देतो

Alethia4India
Alethia4India
6 March : देव दीनांकडें लक्ष्य देतो
Loading
/

“अनादि देव तुझा आश्रय आहे, सनातन बाहुंचा तुला आधार आहे.”  (अनुवाद 33:27)

तुम्हीं कदाचित ह्या क्षणी अश्या काहीं परिस्थितीतून जात असाल जी तुम्हांला वेदनादायक रीतीने येशूच्या व त्याच्या लोकांच्या मौल्यवान सेवेकरिता तयार करत असेल. जेव्हां एखादा व्यक्ति शून्यतेने किंवा असहाय्यपणे रसातळास जातो, तेव्हां त्याला ह्या गोष्टीची जाणीव होईल कीं तो अनादि आश्रय दुर्गाला येऊन पोचला आहे.

मला माझ्या कुटुंबासोबतच्या सकाळच्या भक्तिच्या वेळी वाचलेले स्त्रोत्र 138:6 यातील एका सुंदर वचनाची आठवण झाली, “परमेश्वर थोर आहे, तरी तो दीनांकडें लक्ष देतो.”

तुम्हीं निराशेमध्यें इतकेपण खोल बुडून जाऊ शकत नाहीं कीं देव तुम्हांला पाहत नाहीं किंवा तुमची काळजी करत नाहीं. खरं तर, तो त्या तळाशी तुम्हांला धरण्याकरिता वाट पहात असतो. जसा मोशे म्हणाला, “अनादि देव तुझा आश्रय आहे, सनातन बाहुंचा तुला आधार आहे” ( अनुवाद 33:27 ), अगदी त्या प्रमाणे.

होय, तो तुम्हांला थरथरतांना व घसरतांना पहात असतो. तुम्हीं तळाशी पोचण्यापूर्वी तो तुम्हांला पकडू शकतो ( जे तो नेहमी करतो ). पण या वेळी त्याला तुम्हांला कदाचित काहीं नवीन गोष्टी शिकवायच्या असतील.

स्त्रोत्रकर्ता स्त्रोत्र 119:71 मध्यें म्हणतो, “मी पीडित झाल्यांमुळे माझे बरे झाले; कारण त्यामुळे मी तुझे नियम शिकलो.”  तो असे म्हणत नाहीं कीं त्याला त्यात आनंद वाटला किंवा त्याला बरे वाटले. गत गोष्टींचा विचार करून तो केवळ हे म्हणतो कीं, “त्यामुळे माझे बरे झाले.”

मागील आठवडी मी जेम्स स्टुअर्ट ह्या स्कॉटलँड मधील पाळकाचे पुस्तक वाचत होतो. ते असे म्हणतात कीं, “प्रीतिच्या सेवेमध्यें, केवळ जखमी सैनिकच सेवा करू शकतात.” यासाठींच माझा असा विश्वास आहे कीं तुमच्या पैकीं काहीं जणांची कोणत्या तरी प्रीतिच्या मौल्यवान सेवेकरिता तयारी होत आहे. कारण तुम्हीं जखमी आहात.

असे समजू नका कीं तुमची जखम ही देवाच्या कृपेच्या रचने शिवाय आली आहे. ह्या वचनाचे स्मरण करा, “आता पाहा, मी, मीच तो आहे, माझ्याशिवाय कोणी देव नाहीं; प्राण हरण व प्राण दान करणारा मीच आहे.”  ( अनुवाद 32:39 )

जे तुम्हीं कोणत्या तरी ओझ्या खाली दु:ख सोसत आहात, त्यां तुम्हांला देव विशेष कृपा देऊ करो. देव तुम्हांला सौम्यतेने जी नवी प्रीति देऊ करत आहे तिचा आतुरतेने शोध करा.

5 मार्च : परमेश्वर हमारी ओर है

Alethia4India
Alethia4India
5 मार्च : परमेश्वर हमारी ओर है
Loading
/

“जब किसी की परीक्षा हो, तो वह यह न कहे कि मेरी परीक्षा परमेश्‍वर की ओर से होती है; क्योंकि न तो बुरी बातों से परमेश्‍वर की परीक्षा हो सकती है, और न वह किसी की परीक्षा आप करता है।”  याकूब 1:13

जब हम यीशु मसीह में विश्वास करते हैं और पाप के बन्धन टूट जाते हैं, तो हमारे लिए कई बातें उसी समय से सच हो जाती हैं। हम मृत्यु से जीवन में स्थानान्तरित हो जाते हैं और परमेश्वर का आत्मा हमारे भीतर वास करने लगता है। हम उसके घराने के हो जाते हैं। हम छुटकारा पाए लोग बन जाते हैं, हम में बदलाव हो जाता है और हमारा नया जन्म हो जाता है। पाप अब हमारे जीवनों में प्रभुत्व नहीं करता। किन्तु वह बना  अवश्य रहता है।

मसीह पर भरोसा करने के द्वारा हम ऐसी सहजता का जीवन व्यतीत नहीं करने लग जाते, जिससे हम दुष्ट के हमलों से या अपने हृदय की कपटी इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, हृदय परिवर्तन से लेकर मसीह को देखने और उसके जैसा बनते जाने तक प्रत्येक मसीही व्यक्ति प्रलोभन के विरुद्ध “एक निरन्तर और अपरिवर्तनीय युद्ध”[1] में उलझा रहता है।

पवित्रशास्त्र प्रलोभन के बारे में चेतावनियों से भरा हुआ है, अर्थात् पाप और बुराई के प्रति वह आकर्षण जिसका हम सभी अनुभव करते हैं। प्रलोभन केवल उन वस्तुओं की लालसा का होना ही नहीं है जो निरंकुश और अकल्पनीय हों, परन्तु परमेश्वर ने जो भली वस्तुएँ हमें दी हैं उनका उपयोग (या दुरुपयोग) इस तरह से करना जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप है। स्क्र्यूटेप लेटर्स  में सी. एस. लुईस पाप की इस कुटिलता का उस स्थान पर उल्लेख करते हैं, जहाँ स्क्र्यूटेप अपने प्रशिक्षु दुष्टात्मा को भड़कता है कि “जिन सुखों को हमारे शत्रु [अर्थात्, परमेश्वर] ने उत्पन्न किया है, वह जाकर मनुष्यों को प्रोत्साहित करे कि वे कभी-कभार, ऐसे तरीकों से, या मात्राओं में लें जिन्हें उसने निषिद्ध किया है।”[2]

पवित्रशास्त्र स्पष्ट है कि परमेश्वर कभी भी प्रलोभन का स्रोत नहीं होता और न ही हो सकता है। जब याकूब कहता है कि “परमेश्वर . . . किसी को प्रलोभन में नहीं डालता,” तो वह अपना कथन परमेश्वर के चरित्र पर आधारित कर रहा है। परमेश्वर दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने में इसलिए असमर्थ है, क्योंकि वह स्वयं इससे प्रभावित नहीं होता। दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने के लिए बुराई में हर्षित होने की आवश्यकता पड़ेगी, और परमेश्वर बुराई से प्रसन्न नहीं होता।

जिस शब्द का अनुवाद “प्रलोभन” के रूप में किया गया है, उसका अनुवाद “परीक्षण” के रूप में भी किया जा सकता है। इस प्रकार जिसे हमारा पतित स्वभाव पाप के प्रलोभन में बदल सकता है, वह एक ऐसा परीक्षण भी है जो हमारे विश्वास को दृढ़ कर सकता है। जब हम परीक्षण के समय का सामना करते हैं, जिसकी अनुमति स्वयं परमेश्वर देता है, तो हमें याद रखना चाहिए कि उसका उद्देश्य हमारी विफलता नहीं, बल्कि हमारा लाभ है। शैतान चाहता है कि हम असफल हों, परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम सफल हों। परमेश्वर हमारी ओर है, और वह प्रत्येक बात को, यहाँ तक कि परीक्षण और प्रलोभन भी, हमारी भलाई के लिए कर रहा है।

आप नियमित रूप से किन प्रलोभनों से जूझ रहे हैं (या हार मान रहे हैं)? उन्हें प्रलोभन के रूप में तो देखें, किन्तु अपने चल रहे युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ऐसे अवसरों के रूप में भी देखना सीखें जो आज्ञाकारिता चुनने, अपने पिता को प्रसन्न करने, मसीह के समान बनने के क्षण हैं। “शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा” (याकूब 4:7)।       

1 पतरस 1:13-21

5 March : तुमच्या आनंदाकरिता येशूकडें पहा

Alethia4India
Alethia4India
5 March : तुमच्या आनंदाकरिता येशूकडें पहा
Loading
/

“आपली सर्व कामे लोकांनी पाहावीत म्हणून ते ती करतात….जेवणावळतील श्रेष्ठ स्थाने, सभास्थांनातील श्रेष्ठ आसने, बाजारात नमस्कार घेणे व लोकांकडून गुरुजी म्हणवून घेणे त्यांना आवडते.” ( मत्तय 23 : 57)

लोकांकडून स्वतःचे वाखाण करून घेण्याच्या लालसेला शमवण्यासाठीं केवळ स्वीकृतीचा लोभ असतो. जर आपल्यांला स्वावलंबी बनून आनंद मिळत असेल तर, इतरांनी आपल्यां स्वावलंबीपणाची प्रशंसा केल्यांशिवाय देखील आपल्यांला आनंद वाटणार नाहीं.

यासाठीं मत्तय 23:5 मध्यें येशू परुशी लोकांचे वर्णन करित असें म्हणतो, “आपली सर्व कामे लोकांनी पहावीत म्हणून ते ती करतात.”

हा चेष्टेखोरपणा आहे. आपल्यांला असे वाटत नाहीं का कीं स्वावलंबीपणा हा गर्विष्ठ व्यक्तिला इतरांच्या मतांपासून मुक्त करायला पाहिजे? यालाच “स्वत: मध्यें संतुष्ट” म्हणतात. तसे पहायाला गेले तर या आत्मसंतुष्टीमध्यें किंवा स्वावलंबीपणामध्यें एक रिक्तता आहे.

स्वत्वाची निर्मिती स्वत: मध्यें संतुष्ट होण्यात किंवा स्वत: वर अवलंबून राहण्याकरिता केलीं गेली नव्हती. स्वत्व कधीच स्वयंपूर्ण होवू शकत नाहीं. आपण परमेश्वर नाहीं. आपण परमेश्वराच्या प्रतिमेमध्यें बनवले गेलोय. आणि जी गोष्ट आपल्यांला देवाची “प्रतिमा” बनवते ती गोष्ट म्हणजे आपण स्वतःमध्यें संतुष्ट राहणे ही नाहीं. आपण सावली व प्रतिध्वनि आहोंत. त्यामुळे जो आत्मा स्वत: मध्येंच संतुष्टी शोधण्याकरिता झटत असेल,  तर त्यात एक रिक्तपणा असणारच.

इतरांकडून प्रशंसा मिळविण्याची ही भूक गर्वाचे अपयश व देवाच्या सतत मिळत असलेल्यां कृपेच्या कार्यावरील अविश्वासाचे चिन्ह आहे. येशूनें  मनुष्याचा स्व-गौरवाच्या लोभाचा अनिष्ट परिणाम पाहिला. त्यानें योहान 5:44 मध्यें ह्या गोष्टीचा उल्लेख केला आहे, “जे तुम्हीं एकमेकांकडून प्रशंसा करून घेता आणि जो एकच देव त्याचाकडून प्रशंसा करून घेण्याची खटपट करत नाहीं, त्या तुम्हांला विश्वास ठेवता येणे कसे शक्य आहे?” याचे उत्तर आहे, तुम्हीं विश्वास ठेवू शकत नाहीं. जे इतरांकडून प्रशंसेची लालसा करीत असतांत त्यांना विश्वास ठेवणे शक्य नाहीं. का?

कारण विश्वास स्वत:कडून दृष्टी हटवून देवाकडें पाहतो. कारण विश्वास म्हणजे येशूमध्यें देव जे सर्व काहीं आहे त्यात संतुष्ट असणे. आणि जर तुम्हीं तुमची लालसा इतरांच्या प्रशंसेद्वारें शमवण्याचा हट्ट करीत असाल तर, तुम्हीं येशूपासून दूर जाणार. येशू असा नाहीं. तो त्याच्या पित्याच्या गौरवा करिता जगतो. आणि आपल्यांला पण तो हेच करण्यास सांगतो.

पण जर तुम्हीं तुमच्या स्वतःमध्यें संतुष्ट राहण्यापासून वळाल (पश्चाताप कराल), आणि येशूकडें, देव जे सर्व काहीं आहे त्या सर्वाचा आनंद घेण्याकरिता येशूकडें (विश्वासाने) याल, मग त्या लालसेच्या रिक्ततेची बदल पूर्णतेने होईल- यालाच येशू “सार्वकालिक जीवनासाठीं उपळत्या पाण्याचा झरा” असे संबोधतो.   ( योहान 4:14).