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2 नवम्बर : सही करने का संकल्प

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2 नवम्बर : सही करने का संकल्प
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“तब बोअज़ ने वृद्ध लोगों और सब लोगों से कहा, ‘तुम आज इस बात के साक्षी हो कि जो कुछ एलीमेलेक का और जो कुछ किल्योन और महलोन का था, वह सब मैं नाओमी के हाथ से मोल लेता हूँ। फिर महलोन की स्त्री रूत मोआबिन को भी मैं अपनी पत्नी करने के लिए इस विचार से मोल लेता हूँ।’” रूत 4:9-10

हर दिन जब हम विभिन्न परिस्थितियों का सामना करते हैं, तो हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए: “क्या करना सही है?”

यही बात बोअज़ ने तब सोची जब उसने नगर के फाटक पर जाने का निश्चय किया। वह रूत से विवाह करना चाहता था और निस्तारक-कुटुम्बी के रूप में उसकी रक्षा और देखभाल करना चाहता था। लेकिन वह जानता था कि रूत का एक अन्य सम्बन्धी उसके स्वयं से अधिक उसका निकट-सम्बन्धी था, जिसे इस भूमिका को स्वीकार करने का पहला अधिकार प्राप्त था। बोअज़ एक ईमानदार व्यक्ति था, जो केवल भावनाओं में बहकर कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था, जब रूत ने उसे खलिहान में विवाह का प्रस्ताव दिया था। उसकी दृष्टि पूरी तरह इस बात पर केन्द्रित थी कि वह रूत को उचित रीति से अपनाए। बोअज़ ने अपनी प्रतिष्ठा से अधिक सही कार्य करने को प्राथमिकता दी। वह नगर के सबसे सार्वजनिक स्थान—नगर फाटक—पर गया ताकि वह एक परदेशी से विवाह कर सके, जो उसकी प्रतिष्ठा और विरासत को खतरे में डाल सकता था। अन्य निकट-सम्बन्धी इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार नहीं था (रूत 4:6)। पवित्रशास्त्र में इस व्यक्ति का नाम तक नहीं दिया गया। यह हमारे लिए एक शिक्षा है: हमें स्वयं के लिए नाम बनाने और उसे सुरक्षित रखने का प्रयास नहीं करना चाहिए। दूसरों को हमारे बारे में बात करने और हमारी प्रशंसा करने दें। हमें केवल सही काम करने का प्रयास करना चाहिए।

बोअज़ के शब्दों से स्पष्ट होता है कि उसका एक प्रमुख उद्देश्य था: “मरे हुए का नाम उसके निज भाग पर स्थिर करूँ” (रूत 4:10)। अर्थात, उसने नाओमी के दिवंगत पति एलीमेलेक के नाम और परिवार की वंशावली को बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया। यह निस्वार्थता का परिचायक है और प्रशंसनीय है। यदि बोअज़ केवल अपने स्वार्थ और इच्छाओं की चिन्ता करता, तो वह रूत को चुपचाप अपनी पत्नी बना सकता था। लेकिन उसने अपने दायित्व को पूरा किया और सार्वजनिक रूप से इस स्थिति को स्वीकार किया। उन दिनों में निस्तारक-कुटुम्बी की भूमिका को त्यागने और अपनाने वाले व्यक्ति इस काम को मुहरबन्द करने के लिए अपने जूतों का सार्वजनिक रूप से आदान-प्रदान करते थे (पद 7)। यह आदान-प्रदान एक बड़ी सच्चाई का, अर्थात रूत के लिए बोअज़ की प्रतिबद्धता, प्रेम और व्यक्तिगत बलिदान का प्रतीक था। इसी तरह क्रूस भी सार्वजनिक रूप से सबके सामने खड़ा है, जहाँ हम हमारे लिए मसीह की प्रतिबद्धता, प्रेम और बलिदान को देखते हैं। बोअज़ को रूत से विवाह करने के लिए आर्थिक बलिदान देना पड़ा। हमें छुड़ाने और अपनी प्रिय दुल्हन बनाने के लिए मसीह को अपने स्वयं के जीवन का बलिदान देना पड़ा।

बोअज़ और मसीह के बलिदानों ने भविष्य और आशा प्रदान करने वाली महान आशिषों और विरासतों को उत्पन्न किया, जिनमें से एक, एक मोआबिन युवती और उसकी सास के लिए थी और दूसरी सम्पूर्ण मानवता के लिए थी। बोअज़ के सत्यनिष्ठ प्रयासों के परिणामस्वरूप एक ऐसा विवाह हुआ, जिसने इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि इस वंश से हमारे उद्धारकर्ता का जन्म हुआ (मत्ती 1:5)। और मसीह के बलिदान के कारण अब हम उस दिन की प्रतीक्षा करते हैं जब हम महिमा में खड़े होंगे, उसका मुख देखेंगे, और सदा के लिए उसके नाम की स्तुति करेंगे। हमारा दूल्हा आया और हमें बड़ी कीमत चुकाकर उचित रूप से अपना बना लिया।

कल्पना करें कि जब रूत ने सुना कि बोअज़ ने अपने जूते दे दिए हैं और विवाह की पुष्टि कर दी है, तो उसे कितनी प्रसन्नता हुई होगी। हमें भी वैसा ही आनन्द अनुभव करना चाहिए जब हम क्रूस को देखते हैं और जानते हैं कि हम मसीह के हो चुके हैं। और बोअज़ के उदाहरण से हमें अपने दैनिक निर्णयों और संघर्षों में यह पूछना सीखना चाहिए: “क्या करना सही है?”

रूत 4:1-12

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 21–22; 3 यूहन्ना ◊

1 नवम्बर : एक निस्तारक-कुटुम्बी

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1 नवम्बर : एक निस्तारक-कुटुम्बी
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“मैं तो तेरी दासी रूत हूँ; तू अपनी दासी को अपनी चद्दर ओढ़ा दे, क्योंकि तू हमारी भूमि छुड़ाने वाला कुटुम्बी है।” रूत 3:9

यह एक सत्य सब कुछ बदल देता है: आपके पास एक निस्तारक-कुटुम्बी है।

रूत के दूसरे अध्याय का अन्त नाओमी के इस रहस्योद्‌घाटन के साथ होता है कि बोअज़ एक दूर का रिश्तेदार और “एक कुटुम्बी” है (रूत 2:20)। रूत के घटनाक्रम से बहुत पहले परमेश्वर ने ऐसी प्रथाएँ स्थापित की थीं, जो न केवल रूत पर बल्कि पूरे इस्राएल पर और उद्धार के इतिहास में परमेश्वर के सभी लोगों पर प्रभाव डालने वाली थीं।

हमें पुराने नियम की दो महत्त्वपूर्ण प्रथाओं को समझने की आवश्यकता है, ताकि हम इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि और इसके आनन्द की सराहना कर सकें। ये दो प्रथाएँ परिवार की विधवा का पुनर्विवाह और गोएल हैं। परिवार की विधवा के पुनर्विवाह की प्रथा इस्राएलियों की पुनर्विवाह परम्परा को नियन्त्रित करती थी, ताकि यदि किसी पुरुष की मृत्यु हो जाए, तो उसका नाम और वंश उसकी मृत्यु के साथ समाप्त न हो जाए या अन्य लोगों की इच्छाओं पर निर्भर न रहे (व्यवस्थाविवरण 25:5-10)। दूसरी ओर, गोएल एक इब्रानी क्रिया है जिसका अर्थ है “पुनः प्राप्त करना या छुड़ाना” और सामान्यतः इसका अनुवाद “निस्तारक-कुटुम्बी” के रूप में किया जाता है। मूसा का व्यवस्था-विधान लैव्यव्यवस्था 25 में इस जिम्मेदारी को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है, जहाँ एक रिश्तेदार को यह अधिकार और दायित्व दिया जाता है कि वह कठिनाई में पड़े अपने परिवार के सदस्य की देखभाल और सहायता करे। निस्तारक-कुटुम्बी को अपने रिश्तेदार की भूमि को सुरक्षित करने और उसका सहारा बनने के लिए सभी आवश्यक प्रयास करने होते थे।

बोअज़ ने इन दोनों परम्पराओं का स्वेच्छा से पालन किया और कठिन परिस्थिति में पड़ी हुई बेसहारा नाओमी व रूत की सहायता की। बोअज़ न केवल यीशु के पूर्वजों में से एक था, बल्कि इस कृत्य के द्वारा उसने हमारे निस्तारक-कुटुम्बी के रूप में मसीह के आने की भविष्यवाणी भी की।

जैसे रूत ने पूर्णतः असहाय अवस्था में बोअज़ की दया पर निर्भर होकर स्वयं को उसके चरणों में डाल दिया, वैसे ही हम भी मसीह की करुणा की खोज में स्वयं को मसीह के चरणों में डालते हैं। और जैसे बोअज़ ने रूत के साथ व्यवहार किया, वैसे ही मसीह हर उस पापी के साथ व्यवहार करता है जो पश्चाताप के साथ उसके पास आता है। वह उन्हें वाचा के लहू से ढक देता है, जिसके द्वारा वह हमें अपनी छत्रछाया में शान्ति, सुरक्षा और सन्तोष प्रदान करता है (भजन 91:4)। वह हमारे दुखों में हमें शान्ति देता है, हमारे भय को दूर करता है और हमारे आँसुओं को पोंछता है। रूत एक निर्धन परदेशी के रूप में बोअज़ के पास आई और उसकी आशिषों से समृद्ध हो गई। हम आत्मिक निर्धनता में यीशु के पास आते हैं और उसके साथ उसके उत्तराधिकारी बन जाते हैं (रोमियों 8:17)। जैसे बोअज़ ने रूत को लेकर उसे अपनी दुल्हन बना लिया, वैसे ही मसीह हमें लेकर अपनी दुल्हन बना लेता है (प्रकाशितवाक्य 19:7-8)।

बाइबल में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ परमेश्वर अपने लोगों की आवश्यकताओं में उनकी देखभाल और रक्षा करता है, इससे पहले कि वे स्वयं अपनी आवश्यकताओं को समझें। इस्राएल में रूत के लिए और इतिहास भर में परमेश्वर के सभी लोगों के लिए परमेश्वर के उद्धार योजना न केवल निस्तारक-कुटुम्बी की भूमिका की स्थापना के समय से आई थी, बल्कि सृष्टि के प्रारम्भ से ही तैयार की गई थी (इफिसियों 1:3-7)।

आज निश्चिन्त रहें क्योंकि यीशु अपनी कलीसिया का दूल्हा और निस्तारक-कुटुम्बी है। निश्चिन्त रहें क्योंकि उसने आपके लिए आवश्यक सभी देखभाल और प्रबन्ध करने का, तथा आपको सुरक्षित रूप से प्रतिज्ञा किए हुए शाश्वत देश में पहुँचाने का दायित्व उठाया है। निश्चिन्त रहें क्योंकि चाहे कोई भी आन्तरिक या बाहरी संकट आपको घेर ले, आप उसकी छत्रछाया में सुरक्षित हैं।

भजन 57

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 19–20; 2 यूहन्ना

31 अक्तूबर : प्रतीक्षा कक्ष से बाहर

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31 अक्तूबर : प्रतीक्षा कक्ष से बाहर
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“तब [रूत] चुपचाप गई, और [बोअज़ के] पाँव उघाड़ के लेट गई। आधी रात को वह पुरुष चौंक पड़ा, और आगे की ओर झुककर क्या पाया, कि उसके पाँवों के पास कोई स्त्री लेटी है!” रूत 3:7-8

मसीही जीवन आरामदायक क्षेत्र में नहीं जीया जाता।

रूत 3 में हम पाते हैं कि रूत ने बड़ा जोखिम उठाया जब वह बोअज़ के पास यह अनुरोध करने गई कि वह उसे अपनी पत्नी के रूप में अपनाए। वह, एक अकेली स्त्री, आधी रात को एक खलिहान में गई जहाँ केवल पुरुष थे, जो अभी-अभी फसल की कटनी के पूरा होने का उत्सव मना कर हटे थे। जब बोअज़ सो गया, तो वह अन्धेरे की आड़ में उसके पास गई और उसके पाँवों पर से चादर हटाई। यदि उसने कोई गलती की होती या पकड़ी गई होती, तो कहना मुश्किल है कि उन पुरुषों ने उसके साथ क्या किया होता या लोग उसकी मंशा के बारे में क्या कहते।

ये घटनाएँ हमारी 21वीं सदी की दृष्टि से अजीब लगती हैं, लेकिन रूत के असामान्य कार्य परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में उसके सच्चे विश्वास को दर्शाते हैं। परमेश्वर ने अपने व्यवस्था-विधान में यह निर्धारित किया था कि बोअज़ एक निस्तारक-कुटुम्बी के रूप में—एक रक्षक और पालक के रूप में—रूत की सहायता कर सकता है। परमेश्वर ने अपने प्रावधान के अनुसार रूत को बोअज़ के खेत में पहुँचाया, जहाँ उसने रूत पर अनुग्रह किया। रूत की कहानी बार-बार यह दिखाती है कि परमेश्वर कैसे अपने लोगों की भलाई और अपनी महिमा के लिए सभी अनापेक्षित परिस्थितियों पर प्रभुता करता है।

रूत की तरह, हमें भी कभी-कभी जीवन में ऐसे अवसरों का सामना करना पड़ता है, जब हम अपने अगले कदम से आगे कुछ नहीं देख सकते। हममें से अधिकांश लोग तब तक प्रतीक्षा कक्ष में रहना पसन्द करते हैं, जब तक कि सारी बातें स्पष्ट और ज्ञात न हो जाएँ। हम सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं और साथ ही चाहते हैं कि सब कुछ हमारे नियन्त्रण में रहे। लेकिन यदि हम तब तक कभी आगे नहीं बढ़ते जब तक हम ऐसा महसूस न करें, तो हमारा जीवन आध्यात्मिक प्रगति की बहुत कम गवाही देगा और परमेश्वर के अद्‌भुत कार्यों का बहुत कम साक्षी होगा। गलत दिशा में जाने का डर हमें आगे बढ़ने से पूरी तरह रोक देता है।

जब हम अपने अगले कदम से आगे नहीं देख सकते या जीवन में अनिश्चित समय आता है—और ऐसा समय आएगा!—तो हमें परमेश्वर पर विश्वास करना होगा और उसके वचन की सच्चाई के आधार पर कार्य करना होगा और उसके आत्मा की अगुवाई में भरोसा करना होगा। रूत की योजना न तो सुरक्षित थी और न ही निश्चित, लेकिन उसने आगे बढ़ने का निर्णय लिया क्योंकि वह उस परमेश्वर पर भरोसा करती थी, जिसने बार-बार अपनी विश्वासयोग्यता प्रमाणित की थी।

क्या आपको इस प्रकार सोचना आरम्भ करने की आवश्यकता है? क्या आपको अपने आराम क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर और आगे देखना की आवश्यकता है, जहाँ परमेश्वर आपको बुला रहा है? यदि रूत विश्वास और आज्ञाकारिता से प्रेरित थी, तो आप किससे प्रेरित होते हैं? इस क्षण आपके जीवन में ऐसा क्या है, जो विश्वास को दर्शाता है? हो सकता है कि आपको कोई निर्णय लेना हो, कहीं जाना हो, कोई प्रयास करना हो, या कोई बातचीत करनी हो, जिसके सभी परिणाम आपको ज्ञात न हों, और आप केवल इतना कह सकते हैं, “मुझे बिल्कुल नहीं पता कि यह कैसे होगा, लेकिन यही वह है जिसके लिए परमेश्वर मुझे बुला रहा है।”

इन परिस्थितियों में परमेश्वर का वचन आपको बुद्धि का उपयोग करने और फिर विश्वास में एक-एक कदम करके आगे बढ़ने के लिए बुलाता है, उस पर भरोसा करते हुए जिसने आपके लिए प्राण दिए और जिसने यह प्रतिज्ञा की है, “मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20)। अपने जीवन को अपने आराम क्षेत्र की सुरक्षा में नहीं, बल्कि परमेश्वर के सम्प्रभु हाथों में सौंप दें।

रूत 3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 16–18; 1 यूहन्ना 5 ◊

30 अक्तूबर : परमेश्वर के प्रावधान की सान्त्वना

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30 अक्तूबर : परमेश्वर के प्रावधान की सान्त्वना
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“नाओमी ने उससे कहा, ‘हे मेरी बेटी, क्या मैं तेरे लिए ठाँव न ढूँढ़ूँ कि तेरा भला हो? अब जिसकी दासियों के पास तू थी, क्या वह बोअज़ हमारा कुटुम्बी नहीं है? वह तो आज रात को खलिहान में जौ फटकेगा। तू स्नान कर तेल लगा, और अच्छे वस्त्र पहिनकर खलिहान को जा।’” रूत 3:1-3

परमेश्वर सम्प्रभु है, इसलिए हम साहसिक निर्णय ले सकते हैं।

जैसे कोई भी भला व्यक्ति करता है, वैसे ही नाओमी भी चाहती थी कि उसकी विधवा बहू रूत का जीवन सुरक्षित और स्थिर हो। इसलिए उसने रूत से आग्रह किया कि वह बोअज़ के पास जाए और उससे विवाह करके जीवनभर की सुरक्षा की याचना करे।

निस्सन्देह, हमें इस पुराने नियम की कथा में आज के समय के विचारों को ज़रूरत से ज़्यादा नहीं डालना चाहिए, क्योंकि उस समय की अपनी सांस्कृतिक परम्पराएँ थीं। परन्तु यह भी याद रखना ज़रूरी है कि यह वास्तविक लोगों का वास्तविक जीवन था, जो एक वास्तविक मध्य-पूर्वी गाँव में एक जीवित परमेश्वर से मिल रहे थे और अपने जीवन को पूरी तरह से उसे समर्पित कर रहे थे।

इसलिए इसमें कुछ शाश्वत सत्य हैं, जिन्हें हम सीख सकते हैं। मुख्य रूप से, हम सीख सकते हैं कि हालाँकि परमेश्वर की सर्वशक्तिमान योजना हमारे जीवनों पर शासन करती है, तौभी वह हमारे निर्णय लेने की स्वतन्त्रता को सीमित नहीं करती। परमेश्वर की प्रभुता न तो नाओमी की सोच को रोकती है, न ही रूत की प्रतिक्रिया को। प्रभु उन सभी बातों पर प्रभुत्व रखता है, लेकिन वह उनके चुनावों को जबरन प्रभावित नहीं कर रहा था।

रूत की कहानी यह भी याद दिलाती है कि भले ही गलतियाँ हमारे जीवन की दिशा को बदल दें, तौभी परमेश्वर उन्हें हमारे अन्तिम भले और अपनी महिमा के लिए छुटकारे में बदल देता है। नाओमी के पति को अपने परिवार को प्रतिज्ञा के देश से परमेश्वर की प्रजा के शत्रु देश मोआब में नहीं ले जाना चाहिए था; और उसके बेटों को मोआबी स्त्रियों से विवाह नहीं करना चाहिए था, क्योंकि परमेश्वर के व्यवस्था-विधान के अनुसार अन्य धर्मों के लोगों से विवाह करने की मनाही थी। फिर भी इन गलत चुनावों ने रूत को नाओमी तक पहुँचाया, परमेश्वर तक पहुँचाया, और यीशु के पूर्वज के रूप में उसे उद्धार की वंशावली में शामिल कर दिया (मत्ती 1:1-6)।

इस प्रकार का छुटकारा जानबूझकर विद्रोह करने का बहाना नहीं है, बल्कि यह निरन्तर आश्वासन है कि हमें अपने अतीत की गलतियों के कारण निराश होने की आवश्यकता नहीं है। उसी प्रकार, परमेश्वर की प्रभुता—जो पहले उसके पुत्र को संसार में लाकर और फिर अपने लोगों को उसमें विश्वास करने के लिए बुलाकर उसके छुटकारे की योजना को बुनती है—तब हमारे लिए निरन्तर आश्वासन बनी रहती है, जब हम निर्णयों का सामना करते हैं और इस या उस मार्ग को चुनने का विचार करते हैं।

हम विश्वास से भरे कार्यों के माध्यम से परमेश्वर पर भरोसा करते हैं। नाओमी बस अपने घर में बैठकर परमेश्वर के चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं करती रही और यह नहीं कहती रही, जो होगा देखा जाएगा। नहीं—उसने कार्य किया, उसने रूत को आगे बढ़ने और अगला कदम उठाने को कहा, जो कि परमेश्वर की योजना का हिस्सा लगता था। परमेश्वर की प्रभुता पर विश्वास का अर्थ यह नहीं कि हम निष्क्रिय होकर बस योजना को घटित होते हुए देखें और Que será, será गाते रहें—अर्थात जो होना है, वह होकर रहना है—क्योंकि “भविष्य हमारे हाथों में नहीं है”[1]

इसके बजाय, हमें यीशु के शब्दों को दोहराना चाहिए: “मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” (लूका 22:42)। इस प्रार्थना को करने के बाद यीशु ने इसे अपने जीवन में पूरी तरह आज्ञाकारिता से जीया, यहाँ तक कि मृत्यु तक। जीवन का मार्ग चाहे जितना भी टेढ़ा-मेढ़ा हो, परमेश्वर का वचन यह प्रतिज्ञा करता है: “कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28)। इस प्रतिज्ञा में ढाढ़स रखें।

क्या आप किसी निर्णय का सामना कर रहे हैं? क्या आप सोच रहे हैं कि कौन सा मार्ग चुनें? परमेश्वर सम्प्रभु है और वह उद्धार करता है। आप जो भी निर्णय लें, परमेश्वर के प्रावधान की सान्त्वना के भीतर साहसपूर्वक और स्वतन्त्र रूप से जीवन जीएँ।

प्रेरितों 16:6-15

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 14–15; 1 यूहन्ना 4


[1] रेय इवैंस, “क्यू सेरा, सेरा” (1956).

29 अक्तूबर : परमेश्वर की कृपा को दूसरों तक बढ़ाना

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29 अक्तूबर : परमेश्वर की कृपा को दूसरों तक बढ़ाना
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“उसने अपनी सास को बता दिया कि मैंने किसके पास काम किया, और कहा, ‘जिस पुरुष के पास मैं ने आज काम किया उसका नाम बोअज़ है।” नाओमी ने अपनी बहू से कहा, “वह यहोवा की ओर से आशीष पाए, क्योंकि उसने न तो जीवित पर से और न मरे हुओं पर से अपनी करुणा हटाई!’” रूत 2:19-20

आज आप अदृश्य परमेश्वर को दृश्य बना सकते हैं।

जब रूत खेतों में अनाज बीनने के लिए निकली, तो उसे यह कभी नहीं पता था कि परमेश्वर का प्रावधान कितना अद्‌भुत होगा। वह परमेश्वर में शरण में तो आ ही चुकी थी, लेकिन बोअज़ के माध्यम से उसने यह अनुभव किया कि प्रभु उसकी सोच या उसके मांगने से कहीं अधिक करने में सक्षम था।

जब परमेश्वर ने इस्राएल के साथ अपनी वाचा स्थापित की, तो उसने अपनी कृपा का परिचय इस रूप में दिया कि वह “अनाथों और विधवाओं का न्याय चुकाता, और परदेशियों से ऐसा प्रेम करता है कि उन्हें भोजन और वस्त्र देता है” (व्यवस्थाविवरण 10:18)। उसने अपना व्यवस्था-विधान अपने लोगों को इसलिए नहीं दिया था कि वे कर्मकाण्डवादी बन जाएँ, बल्कि इसलिए कि वे उसके गुणों को प्रदर्शित करें और अपने आज्ञापालन के माध्यम से उसके नाम की महिमा करें। उस व्यवस्था-विधान के एक हिस्से ने कठिनाई में जी रहे लोगों के लिए प्रावधान करने का एक ढांचा प्रदान किया था।

जब बोअज़ ने व्यवस्था-विधान के निर्देश का पालन करते हुए रूत को भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया (रूत 2:14), तो उसने यह कृपापूर्वक किया। उसने परमेश्वर की कृपा प्राप्त की थी, और उसे यह एहसास हुआ कि वह इसे दूसरों के साथ साझा कर सकता है। उसने परमेश्वर के आदेशों का पालन करने के लिए सचमुच हाथ-पैर लगाए और इसके परिणामस्वरूप रूत ने परमेश्वर का हृदय और भी अधिक जाना। इसके अतिरिक्त, बोअज़ की कृपा उदारता के साथ जुड़ी हुई थी: उसने रूत को केवल भोजन करने का आमन्त्रण नहीं दिया, बल्कि उसे अपनी फसल काटने वाले मजदूरों के बीच बैठने का स्थान भी दिया। उसने उसे अपनी तृप्ति तक खाने के लिए प्रोत्साहित किया। उसने उसे केवल बाकी बचा हुआ अनाज नहीं, बल्कि गेहूँ के सबसे अच्छे पूलों में से अन्न लेने की अनुमति दी। उसके सामाजिक और जातीय भेदभाव के बावजूद उसने रूत को अलग-थलग नहीं किया, और न ही उसे दूरी पर रखा।

इसके विपरीत, बोअज़ ने परमेश्वर के व्यवस्था-विधान से कहीं अधिक किया। यह उस स्वागत की केवल एक झलक है, जो परमेश्वर मसीह के माध्यम से हमें प्रदान करता है, जब वह हमें अपनी स्वर्गिक मेज़ पर आमन्त्रित करता है। और यह वही प्रस्ताव है जिसे हम सभी मसीहियों को अपने जीवन में प्रदर्शित करना चाहिए। यदि कोई—चाहे वह विधवा हो, गरीब हो, दुखी हो या कड़वाहट से भरा हो—कलीसिया की सभा या किसी मसीही घर में प्रवेश करता है, तो वहाँ उसे विश्वासयोग्य स्वीकृति का अनुभव होना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर की प्रजा उसकी वाचागत देखभाल को अपने जीवन से प्रकट करती है।

दिन के अन्त तक, रूत बोअज़ द्वारा बार-बार दिखाए जा रहे अनुग्रह से अभिभूत हो गई थी। जब वह अपने प्रचुर प्रावधान के साथ घर लौटी, तो नाओमी ने उस उदारता पर आनन्दित होकर उसका वर्णन ख़ेसेद शब्द से किया—जो परमेश्वर की निरन्तर प्रेममय करुणा और दयालु प्रावधान को दर्शाता है। बोअज़ के ख़ेसेद ने रूत और नाओमी के हृदयों को उस परमेश्वर की आराधना करने के लिए प्रेरित किया जो ख़ेसेद में भरपूर है (निर्गमन 34:6-7)।

बोअज़ की कृपा उस अनुग्रहपूर्ण, उदार, और निरन्तर करुणा से प्रवाहित हुई जो उसने स्वयं परमेश्वर से प्राप्त की थी। प्रभु की देखभाल के सह-प्राप्तकर्ता होने के नाते जब हम दूसरों पर ऐसी करुणा दर्शाते हैं, तब वे भी परमेश्वर को जान सकते हैं। अदृश्य परमेश्वर हर पीढ़ी में अपने लोगों की करुणा के माध्यम से दृश्य हो जाता है। आज आप किस पर ऐसी अनुग्रहपूर्ण, उदार, और अप्रत्याशित करुणा प्रकट करेंगे?

रूत 2:14-23

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 12–13; 1 यूहन्ना 3 ◊

28 अक्तूबर : चौकस रहो!

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28 अक्तूबर : चौकस रहो!
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“कुत्तों से चौकस रहो, उन बुरे काम करने वालों से चौकस रहो, उन काट कूट करने वालों से चौकस रहो। क्योंकि खतना वाले तो हम ही हैं।” फिलिप्पियों 3:2-3

प्रेरित पौलुस ने अपनी सभी पत्रियों में शायद ही कहीं इतना तीव्र और स्पष्ट वक्तव्य दिया हो जितना इस पद में दिया है। अपने समय के झूठे शिक्षकों को “कुत्ते” कहकर सम्बोधित करना आज की तुलना में उस समय और भी अधिक साहसी और टकरावपूर्ण था। लेकिन पौलुस ने इस भाषा का उपयोग केवल प्रभाव डालने के लिए नहीं किया; वह गम्भीर रूप से चिन्तित था क्योंकि कुछ खतरनाक लोग फिलिप्पी की कलीसिया में घूम रहे थे।

झूठे सम्प्रदाय और झूठे शिक्षक प्रायः आनन्दहीन होते हैं, और फिलिप्पी के ये दुष्ट पुरुष कोई अपवाद नहीं थे। वे जो होने का दावा करते थे, उससे बिल्कुल विपरीत थे—वे इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि पुराने नियम की धार्मिक विधियाँ सच्चे मसीही होने के लिए आवश्यक थीं। वे उन फिलिप्पी विश्वासियों से, जिन्होंने प्रभु में आनन्द प्राप्त किया था, मूल रूप से यह पूछ रहे थे: यदि तुम बाहरी खतना की विधि पर ध्यान नहीं देते तो क्या तुम सच में सच्चे मसीही हो? पौलुस की यह चेतावनी कि “चौकस रहो” (फिलिप्पियों 3:2), इस युवा कलीसिया को यह स्मरण दिलाने के लिए थी कि जब मसीही विश्वास में कुछ जोड़ दिया जाता है, तो वह वास्तव में सुसमाचार को बिगाड़ देता है। सुसमाचार में कुछ भी जोड़ने से हमेशा उसमें से आनन्द और यहाँ तक कि उद्धार भी निकल जाता है।

इसलिए जब हम इस पद में “कुत्ते” शब्द पढ़ते हैं, तो हमें एक प्यारे पारिवारिक पालतू जानवर की कल्पना नहीं करनी चाहिए। पौलुस यहाँ किसी गोल्डन रिट्रीवर की बात नहीं कर रहा था। इसके बजाय, एक ऐसे आवारा, रोगग्रस्त कुत्ते की कल्पना करें जो कूड़ेदानों के आस-पास घूमता रहता है और जिसके काटने से आप गम्भीर रूप से घायल हो सकते हैं। पौलुस ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि ये लोग, जो अनुग्रह के योग्य बनने के लिए लोगों से विधिवत आवश्यकताओं को पूरा करने की मांग कर रहे थे, उन कुत्तों के समान ही खतरनाक थे। वे मसीह से ध्यान हटा रहे थे और उसकी मृत्यु, पुनरुत्थान, और स्वर्गारोहण की पर्याप्तता को कम कर रहे थे।

पौलुस ने लगातार झूठी शिक्षा के दुखद परिणामों के बारे में चेतावनी दी—और क्योंकि वह फिलिप्पी की कलीसिया के लोगों से प्रेम करता था, उन्हें अपना “आनन्द और मुकुट” (फिलिप्पियों 4:1) कहकर सम्बोधित करता था, इसलिए वह किसी भी व्यक्ति और किसी भी चीज़ का विरोध करता था जो उन्हें महिमा के एकमात्र मार्ग से भटका देती। वह चाहता था कि वे चौकस रहें।

हम भी बहुत आसानी से यह भूल सकते हैं कि सुसमाचार का सन्देश केवल यह है, “अपना सर्वोत्तम करो और पर्याप्त रूप से अच्छे बनो!” जबकि सुसमाचार का सच्चा सन्देश यह है: “तुम्हारा सर्वोत्तम कभी पर्याप्त नहीं होगा—परन्तु यीशु पर्याप्त है।”

इसलिए शुभ समाचार यह है: केवल मसीह में विश्वास के द्वारा हम सच्चा “खतना” हैं—अर्थात वे लोग जो परमेश्वर की सच्ची प्रजा के रूप में अलग किए गए हैं, इसलिए नहीं कि हमारे शरीर से कुछ काटा गया है, बल्कि इसलिए कि मसीह हमारे लिए काटा गया। हर पीढ़ी में कुछ लोग होते हैं जो विश्वास के बाहरी रूपों पर ज़ोर देते हैं और—प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से—उन रीति-रिवाजों को उद्धार के लिए आवश्यक बना देते हैं। लेकिन कोई भी बाहरी अनुष्ठान या धार्मिक कार्य हमें उद्धार नहीं दे सकता। अपने शरीर पर भरोसा न रखें—न अपनी कलीसिया में उपस्थिति पर, न अपनी दैनिक बाइबल पढ़ने की आदत पर, न अपने पति या पत्नी, माता-पिता, कर्मचारी या सुसमाचार प्रचारक के रूप में प्रदर्शन पर। अपना सारा भरोसा मसीह में रखें। वह और केवल वही पर्याप्त है।

गलातियों 2:11-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 9–11; 1 यूहन्ना 2

27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया

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27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया
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“‘बालकों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना न करो, क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य ऐसों ही का है। मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई परमेश्‍वर के राज्य को बालक के समान ग्रहण न करे, वह उसमें कभी प्रवेश करने न पाएगा।’ और उसने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी।” मरकुस 10:14-16

21वीं सदी में जब हम बच्चों के बारे में सोचते हैं, तो हम अक्सर उनके व्यक्तिगत गुणों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं; वे प्यारे और कोमल होते हैं और कभी-कभी हम यह सोचने की गलती कर बैठते हैं कि वे सिद्ध हैं और सारी सृष्टि का केन्द्र हैं। बच्चों के प्रति यह आधुनिक दृष्टिकोण वास्तव में हमें यीशु की इस बात के अर्थ को समझने में रुकावट डालता है, “बालकों को मेरे पास आने दो।”

यीशु की इस उपमा के केन्द्र में वास्तव में बच्चों के वस्तुनिष्ठ गुण हैं। बच्चे न तो मतदान करते हैं, और न उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस होता है। वयस्क आमतौर पर उनसे उनके जीवन या अपने परिवार के महत्त्वपूर्ण अवसरों पर अन्तिम निर्णय लेने के बारे में भी नहीं कहते। अपनी प्रारम्भिक अवस्था में वे पूरी तरह किसी और पर निर्भर होते हैं। सीधे शब्दों में कहें, तो छोटे बच्चे छोटे और असहाय होते हैं, उनके पास कोई विशेष बाहरी योग्यता या दावा दिखाई नहीं देता।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बच्चों को यीशु इतनी गर्मजोशी से अपनाता है? लेकिन यद्यपि यह सचमुच आश्चर्य की बात है, तौभी हमें चकित नहीं होना चाहिए—विशेषकर जब हम यह देखते हैं कि परमेश्वर कितनी बार नम्र और तुच्छ समझे जाने वालों का उपयोग महान कार्यों के लिए करता है। हम स्वर्ग में अपने गुणों या आत्म-मूल्य के आधार पर प्रवेश करने की आशा नहीं कर सकते। बल्कि परमेश्वर का राज्य उन लोगों का है जो जरूरतमंद हैं, अकेले हैं, असहाय हैं, जिनके पास अपने बल पर कोई दावा या योग्यताएँ नहीं हैं—अर्थात ऐसे लोग जो बिल्कुल बच्चों के समान हैं।

जैसे-जैसे हम यह समझने लगते हैं कि “बच्चों के समान” होने का क्या अर्थ है, हमें यह स्पष्ट दिखने लगता है कि परमेश्वर के राज्य में प्रवेश तभी सम्भव है जब हम अपनी असहायता और पूर्ण निर्भरता को स्वीकार कर लें। हम मसीह के पास अपने गुणों या उपलब्धियों से भरे हाथों के साथ नहीं, बल्कि खाली हाथों के साथ आते हैं—ऐसे हाथ जो प्राप्त करने को तैयार होते हैं। और यह उल्लेखनीय है कि सुसमाचार हमें उसी परमेश्वर की ओर देखने के लिए कहता है, जिसने स्वयं देहधारण किया और एक असहाय शिशु के रूप में संसार में आया। इसलिए यह एकदम उचित है कि उसके राज्य में वही प्रवेश करेंगे जो उसके इस नम्र उदाहरण का अनुसरण करते हैं।

यीशु द्वारा बच्चों को गले लगाना—जैसा हम इन वचनों में देखते हैं—हमारे अहंकार को धराशायी करता है और हमारी निर्बलता में हमें थाम लेता है। शायद आप अपने कार्य को सराहनीय मानते हैं, या अपनी पदवी को कुछ विशेष समझते हैं, और आप स्वयं दाता बनाना चाहते हैं, लाभार्थी नहीं। या फिर सम्भव है कि आप जानते हैं कि लोग आपको बहुत छोटा समझते हैं—या आप स्वयं को बहुत छोटा समझते हैं—और यह जानकर चौंकते हैं कि परमेश्वर आपको कुछ भी देना चाहता है, यहाँ तक कि आपके साथ अनन्तकाल बिताने की इच्छा रखता है। परन्तु चाहे आपका स्वभाव जैसा भी हो, या आपकी परिस्थितियाँ कैसी भी हों—हर दिन अपनी कमजोरी और असहायता को जानते हुए एक बालक जैसे विश्वास के साथ यीशु के पास आएँ। उसके राज्य में प्रवेश पाने का और उसके निकट रहने के आशीष को अनुभव करने का एकमात्र मार्ग यही है।

लूका 11:1-13

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 6– 8; 1 यूहन्ना 1 ◊

26 अक्तूबर : थामे रखने वाली थियोलॉजी

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26 अक्तूबर : थामे रखने वाली थियोलॉजी
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“यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, ‘मैं तो मरने पर हूँ; परन्तु परमेश्‍वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, और तुम्हें इस देश से निकालकर उस देश में पहुँचा देगा, जिसके देने की उसने अब्राहम, इसहाक, और याकूब से शपथ खाई थी’… इस प्रकार यूसुफ एक सौ दस वर्ष का होकर मर गया।” उत्पत्ति 50:24, 26

बाइबल में अनेक व्यक्तियों की मृत्यु का उल्लेख हमें अपनी मृत्यु की वास्तविकता का सामना करने के लिए प्रेरित करता है। हम सभी के दिन सीमित हैं। परमेश्वर ने हमारे प्रस्थान की तिथि हमें प्रकट नहीं की है, परन्तु भजनकार हमें बताता है कि हमारे जीवन का प्रत्येक दिन परमेश्वर की पुस्तक में पहले से ही लिखा हुआ है (भजन 139:16)। यूसुफ 110 वर्ष तक जीवित रहा—परन्तु अन्ततः, हम सभी के समान उसे भी अपनी नश्वरता को स्वीकार करना पड़ा।

यूसुफ ने अपनी मृत्यु को समझा और स्वीकार किया। कवि डिलन थॉमस के शब्दों में कहें,[1] तो उसमें “प्रकाश के बुझने पर क्रोधित होने” जैसी कोई बात नहीं थी, बल्कि जैसा हमारे प्यूरिटन पूर्वज कहते थे, यह एक “अच्छी मृत्यु” थी। वह क्या है जो हमें अच्छी मृत्यु की ओर ले जाता है? एक ठोस थियोलॉजी—एक गहरी समझ कि परमेश्वर कौन था और कौन है। अन्त समय में, यूसुफ ने अपने विश्वास को इस तरह मजबूत किया कि उसने अपने जीवन भर परमेश्वर की देखभाल और अपने लोगों के लिए उसकी प्रतिज्ञाओं को याद किया। परमेश्वर की भलाई में विश्वास के कारण वह मृत्यु का सामना बिना डरे और बिना स्वार्थ के कर सका। उसने न तो भ्रम को थामने की कोशिश की, न ही व्यर्थ की आशाओं में चिपका। बल्कि उसके शब्द संक्षिप्त थे, और उसका ध्यान उसके परिवार और परमेश्वर पर केन्द्रित था। ऐसी प्रतिक्रिया केवल तभी सम्भव है जब हमारी दृष्टि परमेश्वर के स्वभाव और उद्देश्यों से गढ़ी गई हो।

क्या हम यूसुफ की तरह यह विश्वास रखते हैं कि परमेश्वर अपने लोगों को छुड़ाएगा? क्या हमारे जीवन में इस विश्वास का प्रमाण दिखाई देता है? क्या हमने परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को पीछे मुड़कर देखा है और यह पाया है कि चाहे हमने कैसी भी कठिनाई या टूटापन झेला हो, फिर भी हम भजनकार के साथ कह सकते हैं, “मेरे उद्धार और मेरी महिमा का आधार परमेश्वर है; मेरी दृढ़ चट्टान, और मेरा शरणस्थान परमेश्वर है” (भजन 62:7)?

हमें जीवन में जो थामे रखता है और मृत्यु के संघर्ष में जो हमें सान्त्वना देता है, वह हमारी भावनाएँ नहीं, अच्छी थियोलॉजी होती है। जब कठिन दिन आते हैं, तब हम उसी सत्य को थामते हैं जिसे हम जानते हैं—जो अटल और अपरिवर्तनीय है। यूसुफ और उसके जीवन से हम यह अद्‌भुत सत्य सीख सकते हैं: जिस परमेश्वर ने हमें अपने हाथों से रचा है, उसी ने हमारे जीवन के हर दिन के लिए हर एक कदम निर्धारित किया है, और वह हमारे जीवन को अपनी सम्प्रभु योजना की महान कहानी में बुन रहा है—एक ऐसी योजना जिसमें वह अपनी प्रतिज्ञाओं को अपनी प्रजा के लिए पूर्ण करता है। इस परमेश्वर पर विश्वास रखकर, हम मृत्यु का सामना भी गीत गाते हुए कर सकते हैं:

करुणा और न्याय के साथ उसने मेरा समय बुना;

दुख की ओस भी उसकी प्रेम की आभा से दमक उठी;

मैं उस हाथ को धन्य कहूँगा जिसने मेरा मार्गदर्शन किया,

मैं उस हृदय को धन्य कहूँगा जिसने मेरी योजना बनाई,

जब मैं महिमा में विराजमान रहूँगा इम्मानुएल के देश में।[2]

भजन 62

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 3–5; 1 तीमुथियुस 6


[1] इन कण्ट्री स्लीप, ऐण्ड अदर पोएम्स  में “डू नॉट गो जेण्टल इनटू दैट गुड नाईट” (डेण्ट, 1952)

[2] ऐनी आर. कज़न, “द सैण्ड्स ऑफ टाईम आर सिंकिंग” (1857).

25 अक्तूबर : शरीर में काँटा

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25 अक्तूबर : शरीर में काँटा
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“इसलिए कि मैं प्रकाशनों की बहुतायत से फूल न जाऊँ, मेरे शरीर में एक काँटा चुभाया गया, अर्थात् शैतान का एक दूत कि मुझे घूँसे मारे ताकि मैं फूल न जाऊँ।” 2 कुरिन्थियों 12:7

यदि आप विभिन्न प्रतिभाशाली संगीतकारों को इकट्ठा करें, जो केवल अपने व्यक्तिगत भागों में ही रुचि रखते हैं, तो वे एक ऑर्केस्ट्रा नहीं बना सकते। वे केवल असंगत शोर उत्पन्न करेंगे, जो श्रोताओं के कानों के लिए अपमानजनक होगा। परन्तु जब वही प्रतिभा निस्वार्थ भाव और दीनता में एक संचालक के अधीन और एक स्वरूप के नियम के अनुसार उपयोग की जाती है, तो वह सुन्दर और सामंजस्यपूर्ण संगीत उत्पन्न करती है।

जिस प्रकार किसी संगीतकार की व्यक्तिगत महानता की इच्छा ऑर्केस्ट्रा की उपयोगिता के लिए विनाशकारी होती है, वैसे ही हमारे मसीही विश्वास के साथ भी है। आत्मिक वरदान कभी भी घमण्ड का स्रोत नहीं होना चाहिए—क्योंकि, आखिरकार, यह एक वरदान है! फिर भी, हमें अक्सर यह प्रलोभन होता है कि हम परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों को अपनी उपलब्धि समझें, मानो हमने उन्हें स्वयं विकसित किया हो या हम उनके योग्य हों, या फिर हम उनका उपयोग केवल अपने लिए करें, मानो वे हमारे अपने हों। यह हमें अपने महत्त्व के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर सोचने के गम्भीर खतरे में डाल देता है—और जिनके पास सबसे महत्त्वपूर्ण वरदान होते हैं, वे सामान्यतः इस खतरे में सबसे अधिक होते हैं।

पौलुस को स्वयं इस प्रलोभन का सामना करना पड़ा। वह अत्यन्त बुद्धिमान था, उसने उत्तम शिक्षा प्राप्त की थी, वह एक प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से था, और वह बहुतों के जीवन में प्रभावशाली रहा था (फिलिप्पियों 3:4-6 देखें)। जब वह अपने समय के झूठे प्रेरितों का सामना कर रहा था, जो परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर दावे कर रहे थे, तो पौलुस ने ईमानदारी से वर्णन किया कि उसने असाधारण दर्शन देखे थे (2 कुरिन्थियों 12:2-4)। वह अहंकार से भर जाने के लिए एक आसान लक्ष्य था।

उसे इससे किसने बचाया? उसके शरीर में एक काँटे ने। पौलुस यह स्पष्ट रूप से नहीं बताता कि यह क्या था, और इसलिए हमें भी अनुमान लगाने से बचना चाहिए। महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि वह काँटा क्या था, बल्कि यह कि उसने क्या उद्देश्य पूरा किया; क्योंकि पौलुस ने स्वीकार किया कि यह काँटा परमेश्वर की ओर से उसे उसकी दुर्बलता की याद दिलाने के लिए दिया गया था, ताकि वह अपने महत्त्व पर घमण्ड न करे और निरन्तर परमेश्वर पर निर्भर रहे।

उन झूठे शिक्षकों की तरह, जिनसे पौलुस ने मसीही समुदाय की रक्षा की, हमारे सामने भी यह प्रलोभन आते हैं कि अपने प्रभाव और बाहरी सफलता के आधार पर हम अपने मूल्य को आँकें। परन्तु अन्ततः ये सब अस्थाई चीजें अस्थाई ही सिद्ध होंगी और समाप्त हो जाएँगी। परमेश्वर की बुद्धिमानी और भलाई में, पौलुस का “काँटा” हमें हमारी कठिनाइयों को समझने में सहायता करता है—चाहे वह बीमारी हो, आर्थिक संघर्ष हो, सम्बन्धों की समस्याएँ हों, बच्चों का पालन-पोषण हो, या पाप से निरन्तर संघर्ष हो। परमेश्वर जानता है कि वह हमारे जीवन में इन आवश्यक, असुविधाजनक, और निरन्तर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को क्यों अनुमति देता है।

बेहतर है कि हम दीन और संघर्षरत विश्वासी बने रहें, जिनके जीवन में काँटे हों, बजाय इसके कि हम अहंकारी और आत्मनिर्भर होकर विश्वास से दूर हो जाएँ और किसी भी संघर्ष से मुक्त हो जाएँ। हमें अपनी दुर्बलता को पहचानने की आवश्यकता है, ताकि हम अपने अनन्त उद्धार के लिए परमेश्वर के अनुग्रह और अपने दैनिक जीवन के लिए उसके सामर्थ्य पर पूरी तरह निर्भर रहें।

प्रश्न यह नहीं है कि काँटे आपके जीवन में आएँगे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या आप परमेश्वर को अपने “काँटों” का उपयोग करने देंगे, ताकि वह आपको यह स्मरण कराए कि आपके वरदानों का एकमात्र स्रोत वही है और वही आपको आत्मिक रूप से उपयोगी बनाता है।

2 कुरिन्थियों 11:30 – 12:10

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 1–2; 1 तीमुथियुस 5 ◊

24 अक्तूबर : उद्धार के गीत

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24 अक्तूबर : उद्धार के गीत
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“तू मेरे छिपने का स्थान है; तू संकट से मेरी रक्षा करेगा; तू मुझे चारों ओर से छुटकारे के गीतों से घेर लेगा।” भजन 32:7

यदि आप रॉबिन हुड या राजा आर्थर की पुरानी ब्लैक एण्ड व्हाईट फ़िल्में देखें, तो आपको रानियाँ युद्ध के मैदानों में घोड़ों पर सवार दिखाई देंगी। वे अकेली यात्रा नहीं करतीं, बल्कि उनके चारों ओर घुड़सवार सैनिक होते हैं जो उनकी सुरक्षा करते हैं।

कठिन दिनों में, हम अपने आप को यह स्मरण दिला सकते हैं कि परमेश्वर “अपने दूतों को तेरे [हमारे] निमित्त आज्ञा देगा, कि जहाँ कहीं तू जाए [हम जाएँ], वे तेरी [हमारी] रक्षा करें” (भजन 91:11)। इसके अतिरिक्त, उसने हमें उन विश्वासियों की संगति में रखा है जो मसीह के ध्वज का अनुसरण कर रहे हैं—अर्थात हमारी कलीसिया। मसीही जीवन एक व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि एक सामूहिक यात्रा है। हमें इस अद्‌भुत अवसर का लाभ उठाना चाहिए कि हम मसीह के उद्देश्य के लिए एक साथ खड़े हो सकते हैं। हमें उन लोगों से घिरा रहना चाहिए जो “छुटकारे के गीतों” को गाते हैं। जब हम सामूहिक रूप से आराधना करते हैं, तो हम उस उद्धार के आशीर्वादों का अनुभव करते हैं जो परमेश्वर हमें प्रदान करता है।

जब हम जीवन की परेशानियों से घिरे होते हैं या अपनी कमजोरियों, असफलताओं, निराशाओं और सन्देहों से अवगत होते हैं, तो समाधान यह नहीं है कि हम अपने ही बल पर खड़े होने की कोशिश करें। बल्कि हमें यह देखना चाहिए कि यीशु ने हमारे लिए क्या किया है और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे भाई-बहन हमें यह याद दिला रहे हैं कि मसीह ने हमारे लिए क्या किया है। परमेश्वर के वचन के साथ एक साधारण भजन-संग्रह की सहायता से हम एक-दूसरे को अंधकारमय दिनों में प्रोत्साहित कर सकते हैं और अपने मनों को पवित्रशास्त्र और गीतों के माध्यम से सत्यों से भर सकते हैं।

एलेक मोट्यर ने एक बार लिखा, “जब कोई सत्य किसी विश्वास-संहिता या भजन-संग्रह में समाहित हो जाता है, तो वह पूरी कलीसिया की आत्म-विश्वासपूर्ण सम्पत्ति बन जाता है।”[1] जब हम उन गीतों को गाते हैं जो गहरी आत्मिक सच्चाइयों से भरे होते हैं, तो हम प्रतिदिन अपने आप से कह सकते हैं, “मसीह ही मेरे लिए पर्याप्त है।” फिर परमेश्वर के लोगों के साथ मिलकर हम सामूहिक आराधना कर सकते हैं और अपने प्रभु से अनुग्रह और शान्ति माँग सकते हैं। एक जीवित कलीसिया हमेशा गाने वाली कलीसिया होगी।

आपको केवल एकान्त में आराधना करने के लिए नहीं बुलाया गया है। सामूहिक आराधना का एक उद्देश्य यही है: उद्धार के गीतों से घिरे रहना। आपके सृजनहार ने आपको इस रीति से बनाया है कि आप उन लोगों के साथ खड़े हों जो इन स्मरणीय शब्दों के द्वारा इस सच्चाई की आपके लिए पुष्टि करें और आप उनके लिए इसकी पुष्टि करें:

गाओ, मेरे उद्धारकर्ता के विषय में गाओ!

उसने अपने लहू से मुझे मोल लिया;

क्रूस पर उसने मेरी क्षमा को सुनिश्चित किया,

ऋण चुका दिया और मुझे स्वतन्त्र कर दिया।[2]

भजन 147

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 30–31; 1 तीमुथियुस 4


[1] लुक टू द रॉक: ऐन ओल्ड टेस्टामेण्ट बैकग्राऊण्ड टू आवर अण्डरस्टैण्डिग ऑफ क्राईस्ट (क्रेगेल, 2004), पृ. 222 टिप्पणी 48.

[2] पि. पि. ब्लिस, “आई विल सिंग ऑफ माई रिडीमर” (1876).