27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया

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27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया
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“‘बालकों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना न करो, क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य ऐसों ही का है। मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई परमेश्‍वर के राज्य को बालक के समान ग्रहण न करे, वह उसमें कभी प्रवेश करने न पाएगा।’ और उसने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी।” मरकुस 10:14-16

21वीं सदी में जब हम बच्चों के बारे में सोचते हैं, तो हम अक्सर उनके व्यक्तिगत गुणों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं; वे प्यारे और कोमल होते हैं और कभी-कभी हम यह सोचने की गलती कर बैठते हैं कि वे सिद्ध हैं और सारी सृष्टि का केन्द्र हैं। बच्चों के प्रति यह आधुनिक दृष्टिकोण वास्तव में हमें यीशु की इस बात के अर्थ को समझने में रुकावट डालता है, “बालकों को मेरे पास आने दो।”

यीशु की इस उपमा के केन्द्र में वास्तव में बच्चों के वस्तुनिष्ठ गुण हैं। बच्चे न तो मतदान करते हैं, और न उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस होता है। वयस्क आमतौर पर उनसे उनके जीवन या अपने परिवार के महत्त्वपूर्ण अवसरों पर अन्तिम निर्णय लेने के बारे में भी नहीं कहते। अपनी प्रारम्भिक अवस्था में वे पूरी तरह किसी और पर निर्भर होते हैं। सीधे शब्दों में कहें, तो छोटे बच्चे छोटे और असहाय होते हैं, उनके पास कोई विशेष बाहरी योग्यता या दावा दिखाई नहीं देता।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बच्चों को यीशु इतनी गर्मजोशी से अपनाता है? लेकिन यद्यपि यह सचमुच आश्चर्य की बात है, तौभी हमें चकित नहीं होना चाहिए—विशेषकर जब हम यह देखते हैं कि परमेश्वर कितनी बार नम्र और तुच्छ समझे जाने वालों का उपयोग महान कार्यों के लिए करता है। हम स्वर्ग में अपने गुणों या आत्म-मूल्य के आधार पर प्रवेश करने की आशा नहीं कर सकते। बल्कि परमेश्वर का राज्य उन लोगों का है जो जरूरतमंद हैं, अकेले हैं, असहाय हैं, जिनके पास अपने बल पर कोई दावा या योग्यताएँ नहीं हैं—अर्थात ऐसे लोग जो बिल्कुल बच्चों के समान हैं।

जैसे-जैसे हम यह समझने लगते हैं कि “बच्चों के समान” होने का क्या अर्थ है, हमें यह स्पष्ट दिखने लगता है कि परमेश्वर के राज्य में प्रवेश तभी सम्भव है जब हम अपनी असहायता और पूर्ण निर्भरता को स्वीकार कर लें। हम मसीह के पास अपने गुणों या उपलब्धियों से भरे हाथों के साथ नहीं, बल्कि खाली हाथों के साथ आते हैं—ऐसे हाथ जो प्राप्त करने को तैयार होते हैं। और यह उल्लेखनीय है कि सुसमाचार हमें उसी परमेश्वर की ओर देखने के लिए कहता है, जिसने स्वयं देहधारण किया और एक असहाय शिशु के रूप में संसार में आया। इसलिए यह एकदम उचित है कि उसके राज्य में वही प्रवेश करेंगे जो उसके इस नम्र उदाहरण का अनुसरण करते हैं।

यीशु द्वारा बच्चों को गले लगाना—जैसा हम इन वचनों में देखते हैं—हमारे अहंकार को धराशायी करता है और हमारी निर्बलता में हमें थाम लेता है। शायद आप अपने कार्य को सराहनीय मानते हैं, या अपनी पदवी को कुछ विशेष समझते हैं, और आप स्वयं दाता बनाना चाहते हैं, लाभार्थी नहीं। या फिर सम्भव है कि आप जानते हैं कि लोग आपको बहुत छोटा समझते हैं—या आप स्वयं को बहुत छोटा समझते हैं—और यह जानकर चौंकते हैं कि परमेश्वर आपको कुछ भी देना चाहता है, यहाँ तक कि आपके साथ अनन्तकाल बिताने की इच्छा रखता है। परन्तु चाहे आपका स्वभाव जैसा भी हो, या आपकी परिस्थितियाँ कैसी भी हों—हर दिन अपनी कमजोरी और असहायता को जानते हुए एक बालक जैसे विश्वास के साथ यीशु के पास आएँ। उसके राज्य में प्रवेश पाने का और उसके निकट रहने के आशीष को अनुभव करने का एकमात्र मार्ग यही है।

लूका 11:1-13

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 6– 8; 1 यूहन्ना 1 ◊

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