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5 फरवरी : आज के लिए पर्याप्त

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5 फरवरी : आज के लिए पर्याप्त
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“हमारी दिन भर की रोटी हर दिन हमें दिया कर।”  लूका 11:3

यदि सम्पूर्ण इतिहास में रोटी ने किसी एक बात को दर्शाया है, तो वह है दिन भर का पोषण। अन्य भोजन वस्तुएँ निश्चित रूप से हमारे अस्तित्व में सुखद योगदान प्रदान करती हैं, किन्तु जब हम रोटी के बारे में सोचते हैं तो हममें से अधिकांश लोग जीवन की सबसे मौलिक आवश्यकताओं में से एक के पूरा होने के बारे में सोच रहे होते हैं।

इस तरह की सोच परमेश्वर द्वारा अपने लोगों के लिए किए गए अनोखे प्रावधान के समान है। पुराने नियम में इस्राएलियों के मरुभूमि में भटकने के समय उन्हें अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा किए जाने के लिए परमेश्वर पर पूरी तरह निर्भर रहना होता था। इस बात को सीखने का सबसे ठोस तरीका था, स्वर्ग से मिलने वाले मन्ना के रूप में परमेश्वर का प्रावधान।

परमेश्वर ने अपने लोगों को यह स्पष्ट कर दिया था कि प्रतिदिन वह केवल एक दिन के लिए ही पर्याप्त मन्ना देगा। उन्हें अगला दिन होने तक उसमें से कुछ भी बचाकर नहीं रखना था (निर्गमन 16:19)। एक बार में एक दिन की रोटी देने में उसका उद्देश्य था, अपने लोगों को उसके प्रावधान पर भरोसा करना सिखाना। दुख की बात है कि कुछ इस्राएलियों को सन्देह था कि वह जो प्रतिज्ञा कर रहा था, वह उसे पूरा करेगा भी या नहीं। उन्होंने उसकी अवज्ञा की और कुछ मन्ना अगले दिन के लिए रख छोड़ा (क्योंकि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर सन्देह करना सदैव परमेश्वर की आज्ञाओं की अवज्ञा करने की ओर ले जाता है)। जब वे सबेरे उठे तो बदबूदार, कीड़ों से भरा हुआ मन्ना उनके सामने था (पद 20)। परमेश्वर उन्हें सिखा रहा था कि वे अपने प्रावधान के लिए उस पर भरोसा करें। यह एक ऐसी सीख थी, जिसे सीखने में उन्हें बहुत समय लगने वाला था।

जब हम पुराने नियम के इस उदाहरण के प्रकाश में इन शब्दों पर विचार करते हैं कि “हमारी दिन भर की रोटी हर दिन हमें दिया कर,” तो हम महसूस करते हैं कि प्रभु की प्रार्थना की इस पंक्ति में यीशु एक अनन्त वास्तविकता पर जोर दे रहा है: हर युग में परमेश्वर अपने लोगों को सिखाता है कि वे केवल प्रावधान पर भरोसा न रखें, क्योंकि ऐसा होने पर वे अधिक से अधिक पाने की लालसा करते रहेंगे, इसके विपरीत वह चाहता है कि हम प्रावधान करने वाले  पर भरोसा रखें, जो हमारी प्रत्येक आवश्यकता को पूरा करता है।

परमेश्वर चाहता है कि हम जागें और उसके दैनिक प्रावधान को नए सिरे से प्राप्त करें। यही कारण है कि उसने इस्राएलियों को भावी पीढ़ी के लिए थोड़ा सा मन्ना रखने की आज्ञा दी और कहा कि “इसमें से ओमेर भर अपने वंश की पीढ़ी-पीढ़ी के लिए रख छोड़ो, जिससे वे जानें कि यहोवा हमको मिस्र देश से निकालकर जंगल में कैसी रोटी खिलाता था” (निर्गमन 16:32)। इस निर्देश का पालन करते हुए एक पीढ़ी अगली पीढ़ी से उसके निरन्तर मिलने वाले दैनिक प्रावधान की वास्तविकता और चमत्कार के बारे में बात कर सकती है।

वह पिता, जिसे हम यीशु के द्वारा जानते हैं, हमारी व्यक्तिगत, व्यावहारिक और भौतिक आवश्यकताओं की चिन्ता करता है। हो सकता है कि आज सबेरे जब आप उठे हों, तो अपने जीवन में चल रही समस्याओं से घिरे हुए या आने वाली घटनाओं के बारे में चिन्तित महसूस कर रहे हों। इस बात को याद रखें कि परमेश्वर आपसे व्यक्तिगत रीति से लगाव रखता है, और आप विश्वास के साथ उसके पास जा सकते हैं और उससे कह सकते हैं कि वह आपके आज के लिए सभी आवश्यक वस्तुएँ आपको दे। और फिर आप उस पर भरोसा कर सकते हैं कि वह आपको आज, और फिर कल, और सदा तक वह सब प्रदान करेगा जिसकी आपको आवश्यकता होगी। आप अपनी चिन्ताओं का पूरा भार उस पर डाल सकते हैं, क्योंकि वह आपकी चिन्ता करता है और आपके लिए प्रावधान करता है (1 पतरस 5:7)।

     निर्गमन 16

4 फरवरी : तेरा राज्य आए

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4 फरवरी : तेरा राज्य आए
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“तेरा राज्य आए।”  लूका 11:2

परमेश्वर का राज्य आज तक के या भविष्य के किसी भी सांसारिक साम्राज्य से बहुत अलग है। सांसारिक साम्राज्य उन हाकिमों के अधिकार में होते हैं, जिनकी शक्ति सीमित होती है और निस्सन्देह घटती जाती है। परन्तु परमेश्वर का राज्य किसी भू-राजनीतिक इकाई या इतिहास के किसी हिस्से से कहीं अधिक है। वह सदाकाल का है, सार्वभौमिक है और व्यक्तिगत है, और अपने इस राज्य पर उसका प्रभुत्व सब पीढ़ियों तक बना रहेगा (भजन 145:13)।

जब हम प्रार्थना करते हैं कि “तेरा राज्य आए” तो हमें इन सच्चाइयों को ध्यान में रखना चाहिए। जब ​​हम यीशु के उदाहरण का अनुसरण करते हुए इस प्रकार से प्रार्थना करते हैं, तो वास्तव में हम जो माँग रहे होते हैं उनमें से एक बात यह भी होती है कि परमेश्वर का सम्प्रभु प्रभुत्व हमारे हृदयों और जीवन में अधिकता से स्थापित होता जाए। हम यह प्रार्थना कर रहे होते हैं कि जो मसीह को जानते हैं वे उसके प्रभुत्व के प्रति बढ़ती हुई आनन्दमय अधीनता में रहने पाएँ।

जिन वैश्विक-दृष्टिकोणों का हम प्रतिदिन सामना करते हैं, यह उनसे बहुत अलग है। अधिकांशतः, आज की पश्चिमी संस्कृति व्यक्तिगत उपलब्धि और आत्मनिर्भरता की प्रशंसा करती है। हमें यह मानने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि सब कुछ हमारे नियन्त्रण में हैं। किन्तु जब परमेश्वर का राज्य हमारे जीवन में आ जाता है, अर्थात् जब हम यीशु से प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे हृदय के सिंहासन पर अपना यथोचित स्थान ग्रहण करे, तब एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन घटित होता है। हम अब पाप के दासत्व में नहीं रह जाते। सृष्टि का राजा हमारे जीवन में वास करने लगता है और वह हमें अपने पुत्र के स्वरूप के अनुरूप बनाना आरम्भ कर देता है (रोमियों 8:29)। जब हम इस प्रकार से प्रार्थना करते हैं, तो पवित्र आत्मा हमारे जीवन के प्रत्येक आयाम पर परमेश्वर के शाही प्रभुत्व की स्थापना करने के द्वारा हमारी सहायता करने लगता है।

इतना ही नहीं, जब हम प्रार्थना करते हैं कि “तेरा राज्य आए,” तब हम यह भी स्वीकार रहे होते हैं कि परमेश्वर देश-देश पर राजा है, अर्थात् वह वर्तमान समय की सभी बातों पर प्रभुत्व करता है। यशायाह इस प्रकार वर्णन करता है कि परमेश्वर दूर-दूर की जातियों को “सीटी बजाकर पृथ्वी के छोर से बुलाएगा; देखो वे फुर्ती करके वेग से आएँगे!” (यशायाह 5:26)। यह राजा दूर-दूर की जातियों को इस प्रकार बुलाता है, जैसे हम अपने पालतू कुत्ते को अन्दर आने के लिए बुलाते हैं। जब वह सीटी बजाता है, तो वे उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए दौड़ पड़ते हैं।

तो फिर हमें सांसारिक शक्तियों में होने वाले किसी भी फेरबदल से घबराने या सब कुछ अपने नियन्त्रण में रखने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, हम प्रभु में, अर्थात अपने राजा में आनन्दित रह सकते हैं, जो इन सभी बातों पर सम्प्रभु है।

उसका राज्य कभी विफल नहीं हो सकता,

वह पृथ्वी और स्वर्ग पर राज्य करता है;

मृत्यु और नरक की कुंजियाँ

हमारे यीशु को दी गई हैं: अपना भरोसा परमेश्वर में रखो,

अपनी आवाज़ उठाओ!

आनन्दित हो, मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित हो! [1]

 भजन संहिता 2

3 फरवरी : हम उसे पिता कहते हैं

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3 फरवरी : हम उसे पिता कहते हैं
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“जब तुम प्रार्थना करो तो कहो: ‘हे पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाए।’”  लूका 11:2

जब किसी बच्ची को गोद लिया जाता है, तो उसका पूरा जीवन बदल जाता है। उसे एक नया नाम, एक नया परिवार और प्रायः एक बिल्कुल अलग जीवनशैली मिल जाती है। परन्तु उस बच्ची में शायद उस परिवार से जुड़े होने की सच्ची भावना न हो, तौभी कानूनी वास्तविकता कायम रहती है। किसी बच्चे का एक घर में आकर रहना एक बात है, परन्तु उस परिवार के साथ जुड़ने का पूरी तरह से अनुभव करना और उसे व्यक्त करना, अर्थात् अपने नए माता-पिता को “मम्मी-डैडी” कहना, एक पूरी तरह से अलग ही गहन वास्तविकता होती है।

जब हम यीशु मसीह में विश्वास का अंगीकार करते हैं, तो हमें आत्मिक तौर पर गोद लिए जाने के बारे में भी यही बात लागू होती है। हमें गोद लिया जाना हमारी अवस्था को पूर्ण रीति से, सदा के लिए और निर्विवाद रूप से बदल देता है। परन्तु परमेश्वर केवल नाम परिवर्तन से सन्तुष्ट नहीं होता। वह चाहता है कि हम जानें कि उसके बेटे और बेटियाँ होने का क्या अर्थ है। वह चाहता है कि हम उसे अपने स्वर्गिक पिता के रूप में मानने का आश्चर्यजनक अनुभव प्राप्त करें। ऐसा करने के लिए वह अपना आत्मा प्रदान करता है, ताकि हमारे चरित्र को आकार मिले और उसके साथ अपने सम्बन्ध को बच्चे और पिता के रूप में देखने में हमें सहायता मिले। पौलुस ने गलातियों की कलीसिया से कहा, “और तुम जो पुत्र हो, इसलिए परमेश्‍वर ने अपने पुत्र के आत्मा को, जो ‘हे अब्बा, हे पिता’ कहकर पुकारता है, हमारे हृदयों में भेजा है” (गलातियों 4:6)।

मसीही अनुभव केवल एक कानूनी काम की तरह नहीं होना चाहिए। यह किसी नीति या सिद्धान्त से कहीं बढ़कर है। उद्धार केवल पापों की क्षमा नहीं है; यह तो आत्मा द्वारा सशक्त परिवर्तन का स्वागत करना भी है। मसीहियत कोई मशीनी काम नहीं है, बल्कि एक सम्बन्ध है। यीशु ने क्रूस पर जो काम सबके लिए निष्पक्ष रूप से और कानूनी तौर से पूरा किया है, उसे पवित्र आत्मा हमारे हृदय में व्यक्तिगत रीति से और अनुभव के द्वारा जारी रखता है। हमें बचा लिया गया है, स्वीकार कर लिया गया है और हमसे प्रेम किया गया है। इस परिवर्तन के साथ अब हम भक्ति, सरगर्मी, आँसू, ज्ञानोदय, सहभागिता और अन्ततः स्तुति की आशा कर सकते हैं।

जब परमेश्वर की सन्तानों के रूप में अपनी नई अवस्था को भूल जाने प्रलोभन हमारे सामने आता है, तो आत्मा यह साक्षी देने के लिए प्रतीक्षा कर रहा होता है कि नहीं, तुम सचमुच उसके हो! तुम्हें सबसे बड़ा दाम देकर मोल लिया गया है। तुमसे प्रेम किया गया है और तुम बहुत दुलारे हो।  जब हम वैसा नहीं करते जैसा परमेश्वर चाहता है और जब हम चोटिल, टूटे हुए और निराश महसूस करते हैं, तो आत्मा हमें इस प्रकार पुकारने में सहायता करता है, “हे पिता, पिता, क्या आप कृपया मेरी मदद कर सकते हैं?” ऐसी विनतियाँ हमें याद दिलाती हैं कि यीशु ने कैसा अचम्भे भरा काम किया है, अर्थात् उसके बलिदान से हमें छुटकारा मिला है और उसका आत्मा हमारे हृदयों में वास करने के लिए आ गया है। इनके बिना हमारे सृष्टिकर्ता और हमारे न्यायी होने के अतिरिक्त परमेश्वर के साथ हमारा कोई अन्य सम्बन्ध नहीं होगा और फिर हमारे दिलों को “हे अब्बा! हे पिता!” कह कर पुकारने का कोई अवसर नहीं मिलेगा।

परमेश्वर किसी विशेष चिह्न या वरदान से नहीं, परन्तु अपने आत्मा की प्रेरक साक्षी के द्वारा पुत्र और पुत्रियों के रूप में हमें गोद लिए जाने पर मुहर करता है। जैसे-जैसे हम प्रार्थना में उससे बात करते जाते हैं, उसके वचन के द्वारा उससे सुनते हैं, और उसके साथ चलते जाते हैं, वैसे-वैसे हम उसके सामर्थ्य और हमारे भीतर उसके कार्य के बारे में जागरूकता में बढ़ते जाते हैं। क्योंकि हम पाप के शाप से मुक्त हो चुके हैं और हमें गोद लिए जाने की आशीष दे दी गई है, इस कारण हम परमेश्वर को पिता कहकर पुकार सकते हैं, उससे प्रेम रख सकते हैं और आत्मा तथा सच्चाई से उसकी आराधना कर सकते हैं। इसलिए मसीहियो, आज आपसे सम्बन्धित सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि आप परमेश्वर की गोद ली गई सन्तान हैं। कोई भी व्यक्ति या कोई भी ताकत इस सच्चाई को बदल नहीं सकती। इसलिए आज चाहे आप कैसा भी महसूस क्यों न कर रहे हों, इस सच्चाई को सबसे अधिक ढाढ़स देने वाली, आधार प्रदान करने वाली, आश्वस्त करने वाली और प्रेरित करने वाली बात बना लें कि आप परमेश्वर की सन्तान हैं।

 रोमियों 8:12-25

2 फरवरी : प्रार्थना का विशेषाधिकार

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2 फरवरी : प्रार्थना का विशेषाधिकार
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“वह किसी जगह प्रार्थना कर रहा था। जब वह प्रार्थना कर चुका, तो उसके चेलों में से एक ने उससे कहा, ‘हे प्रभु, जैसे यूहन्ना ने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखाया वैसे ही हमें भी तू सिखा दे।’”  लूका 11:1

प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ हमारी सहभागिता मुख्य रूप से हमारी प्रार्थनाओं के माध्यम से व्यक्त होती है। वे उसके साथ हमारे सम्बन्ध का प्रमाण देती हैं। वह न केवल अपने वचन के माध्यम से हमसे बात करता है, अपितु उसने हमें प्रार्थना में उसके साथ बात करने का अद्‌भुत विशेषाधिकार भी सौंपा है।

पवित्रशास्त्र हमें स्वयं यीशु के प्रार्थना के जीवन के कई विवरण प्रदान करता है। इन अभिलेखों से हम जितना अधिक परिचित होंगे, उतना ही अधिक हम महसूस कर सकेंगे कि यीशु प्रार्थना को एक पवित्र आदत के रूप में लेता था। वह अपने पिता के समक्ष दिन की योजनाएँ रखने के लिए नियमित रूप से सुबह-सुबह प्रार्थना करता था। शान्त और एकान्त स्थान में की गई प्रार्थनाओं ने यीशु को सक्षम बनाया कि वह भीड़ के शोर और यहाँ तक कि अपने शिष्यों के अनुरोधों से बढ़कर अपने पिता की आवाज का अनुसरण करे। वह अपने सारे निर्णय प्रार्थना की सीमाओं में रहकर ही करता था।

यीशु के प्रार्थना के नियम ने उसके चेलों को यह निवेदन करने के लिए प्रेरित कर दिया, “हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।” स्पष्ट रूप से वे प्रार्थनाओं में उसकी गहनता और एकाग्रता से इतने प्रभावित हुए कि परमेश्वर पिता के साथ ऐसी ही घनिष्ठता के लिए उनके हृदयों में भी एक भूख उत्पन्न हो गई।

उनके अनुरोध के उत्तर स्वरूप यीशु ने अपने चेलों को निर्देश दिया कि वे “बक-बक न करें” या फिर “यह न सोचें कि उनके बहुत से शब्दों के कारण उनकी सुनी जाएगी” (मत्ती 6:7)। दूसरे शब्दों में, प्रार्थना करते समय हमें बड़बड़ाने या बहुत अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत यीशु द्वारा दिए गए उदाहरण में अर्थात् प्रभु की प्रार्थना में हम पाते हैं कि परमेश्वर की आत्मिक सन्तानें परमेश्वर को सीधे-सीधे और सहज रीति से अपने स्वर्गिक पिता के रूप में सम्बोधित करने के लिए स्वतन्त्र हैं।

हमें किस बात के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? सबसे पहले तो हमें यह माँगना है कि परमेश्वर के नाम का उचित आदर हो, कि वह हमारे भीतर और हमारे आस-पास अपना राज्य लेकर आए और वह हमारी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे। हमें पश्चाताप करने की अपनी दैनिक आवश्यकता, दूसरों को क्षमा करने की आवश्यकता और प्रलोभन से बचने के लिए परमेश्वर पर अपनी निर्भरता को स्वीकारना है। यीशु ने समझाया कि अपनी प्रार्थनाओं में हमें प्रतिदिन के जीवन में परमेश्वर की महिमा और अनुग्रह को देखने का प्रयास करना है और उसी की माँग करनी है।

हमारी मसीही यात्रा में एक अर्थपूर्ण प्रार्थना के जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण और कुछ भी नहीं है। प्रार्थना के ऐसे जीवन को बनाए रखने से अधिक कठिन भी और कुछ नहीं है। किन्तु हमारे लिए सहायता उपलब्ध है। यदि परमेश्वर के दिव्य पुत्र यीशु को प्रार्थना करने की आवश्यकता थी, तो आपको और मुझे भी है। हमें दीन करने वाला यह विचार ही हमें अपने घुटनों पर ले जाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। और जब हम अपने घुटनों पर हों, तो हम अपनी प्रार्थना में सहायता के रूप में प्रभु की प्रार्थना का मुक्त रूप से उपयोग कर सकते हैं। परमेश्वर ने आपको प्रार्थना में उसके पास जाने और उसे पिता कहकर सम्बोधित करने का एक विशेषाधिकार दिया है। वह सुनने और सहायता करने के लिए तत्पर रहता है। प्रार्थना को अपनी एक पवित्र आदत बना लें और इसे एक अतिरिक्त विकल्प के तौर पर कदापि न लें।

लूका 11:1-13

1 फरवरी : आनन्दपूर्ण आराधना

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1 फरवरी : आनन्दपूर्ण आराधना
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“निश्चय जानो कि यहोवा ही परमेश्‍वर है! उसी ने हम को बनाया, और हम उसी के हैं; हम उसकी प्रजा, और उसकी चराई की भेड़ें हैं।”  भजन संहिता 100:3

भजन संहिता की पुस्तक को हमारी आत्माओं के लिए दवा का सन्दूक भी कहा जा सकता है। हम इसमें कुचले हुओं के लिए विलाप के गीत, परीक्षाओं के समय में परमेश्वर को पुकारने तथा स्तुति और धन्यवाद की भेंटों को देख सकते हैं। जो कुछ भी आपको सताता हो, उसके लिए भजन संहिता में आपको मरहम मिल जाएगा।

स्तुति के भजनों में विशेष रूप से यह मूलभूत सत्य गुथा हुआ है कि यहोवा ही परमेश्वर है और हम उसी के हैं। परमेश्वर के लोगों के रूप में हमारा अस्तित्व ही इस बात का संकेत है कि वह कौन है। एक समय हम कुछ भी नहीं थे, परन्तु अब हम परमेश्वर की प्रजा हैं। एक समय हम पर दया नहीं हुई थी, परन्तु अब हम पर प्रतिदिन दया होती है (1 पतरस 2:10)।

मूल बात यह है कि हम अपने नहीं हैं। न ही कभी थे। हम एक सामर्थी सृष्टिकर्ता द्वारा निर्मित उसके स्वरूप को धारण करने वाले प्राणी हैं। वह कुम्हार है, जिसने हमें बनाया है और “हम उसके हैं।” इसके अतिरिक्त, हम छुटकारा पाए हुए पापी हैं, जिन्हें एक प्रेमपूर्ण उद्धारकर्ता द्वारा “दाम देकर मोल लिया गया है” (1 कुरिन्थियों 6:20)। वह ऐसा चरवाहा है, जिसने हमारे लिए अपना प्राण दिया और अब हमारी रखवाली करता है (यूहन्ना 10:11-15) और “हम उसके हैं।” हमें दो बार दाम देकर मोल लिया गया, एक बार सृष्टि के सृजन में और दूसरी बार छुटकारे के काम में, और हम उसके हैं।

इस कारण प्रभु यीशु मसीह में हमारे पास अब जो अवसर है, वह गर्व करने का नहीं परन्तु स्तुति करने का अवसर है। यह जानना कि यहोवा ही परमेश्वर है और हम उसी के हैं, हमें उसकी स्तुति करने और उसको धन्यवाद देने के लिए प्रेरित करेगा (भजन संहिता 100:3)।

जो कुछ अनमोल होता है, उसकी प्रशंसा किया जाना एक स्वाभाविक बात होती है। जिस वस्तु को लोग बहुमूल्य समझते हैं, वे स्वाभाविक रूप से उसकी प्रशंसा करते हैं। परमेश्वर हमारा रचयिता है और हमें छुटकारा दिलाने वाला है और इसलिए वह हमारी प्रशंसा पाने का अधिकारी और स्तुति के योग्य है। उससे अधिक कोई भी और कुछ भी आपकी स्तुति के योग्य नहीं है।

हमारी असामान्य परिस्थितियों में भी हमारे पास परमेश्वर की स्तुति करने के पर्याप्त कारण होते हैं, क्योंकि वह परमेश्वर है। अपने किसी प्रिय जन को खो देने पर या अपनी सांसारिक सुख-सुविधाएँ प्रदान करने वाली किसी नौकरी को खो देने पर भी हम उसकी स्तुति करने का चयन कर सकते हैं। जब हमारी आवाज़ आँसुओं के कारण रुकने लगे, जब हमारे दिल हमें निराश करने लगें, जब हमारी परिस्थितियाँ हमें निष्फल कर दें, जब जीवन हमें हतोत्साहित कर दे, तब भी उसकी “करुणा” जो “सदा के लिए” है (भजन संहिता 100:5), उसमें हम परमेश्वर में आनन्दपूर्ण आराधना और आभार से भरी स्तुति के लिए अन्तहीन कारण ढूँढ सकते हैं। वह सदैव आपका सामर्थी सृष्टिकर्ता और प्रेमी उद्धारकर्ता है।

एक मसीही व्यक्ति की विशिष्ट पहचान उसका आभार से भरा हृदय होता है। आज यह आपकी भी पहचान बन जाए।

भजन संहिता 148

26 जनवरी : जब कुछ भी आपके अनुसार न हो रहा हो

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सब प्रकार की कड़वाहट, और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा, सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए।”  इफिसियों 4:31

हममें से सब तो नहीं किन्तु अधिकांश लोग जानते हैं कि यह सोचते हुए सवेरे उठना कैसा होता है कि जीवन बिल्कुल भी वैसा नहीं है जैसा हम चाहते हैं। हो सकता है कि आज सवेरे उठने पर आपको भी ऐसा लगा हो। हो सकता है कि शारीरिक रूप से, भावनात्मक रूप से, सम्बन्धों में, आर्थिक और आत्मिक रूप से भी हम कठिन दिनों का सामना कर रहे हों और इसके परिणामस्वरूप हम निराश हो सकते हैं। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?

ऐसे में सबसे सहायक तरीकों में एक है सबसे पहले परमेश्वर से आत्मिक परेशानी के तीन शक्तिशाली स्रोतों से सुरक्षा के लिए प्रार्थना करना, जो कड़वाहट, आक्रोश और आत्म-दया नामक ऐसी स्थितियाँ हैं, जो कोई भी आरम्भिक चेतावनी दिखाए बिना मृत्यु का कारण बन सकती हैं। । ये तीनों धीरे-धीरे हमारे विश्वास का गला घोंट देंगी और उन लोगों के प्रति ईर्ष्या और द्वेष के रूप में बढ़ने लगेंगी जिनके पास वह सब है जो हम चाहते हैं। इसलिए हमारे सामने खड़ी परिस्थितियों में, जो प्रायः केवल हमें और परमेश्वर को ही पता होती हैं, निष्ठुर आत्माओं के विपरीत कोमल हृदय के साथ प्रत्युत्तर देने में हमें परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता होती है।

इफिसुस के विश्वासियों को लिखे अपने पत्र में पौलुस ने उन्हें प्रोत्साहित किया, अपितु यह आज्ञा दी कि वे सारी कड़वाहट, प्रकोप और क्रोध को अपने से दूर करें। यद्यपि यह कहना तो सरल है, किन्तु करना कठिन है, फिर भी पौलुस की यह आज्ञा अपने आप में बहुत स्पष्ट है। वास्तव में, परमेश्वर के वचन में कहीं भी ऐसी कोई आज्ञा नहीं है जिसका हम पालन न कर सकें, चाहे वह कितनी भी कठिन क्यों न लगे, क्योंकि परमेश्वर जो आज्ञा देता है, उसके लिए हमें सशक्त भी बनाता है। इसलिए यदि वह कहता है कि इस काम को करना छोड़ दो,  तो आप और मैं निश्चिन्त हो सकते हैं कि वह हमारे जीवनों में उसके निमित्त आत्मा का सामर्थ्य भी दे सकता है, जिससे हम वह कर सकें जो उसने आज्ञा दी है। जब हम अपने हृदयों में कड़वाहट, आक्रोश या आत्म-दया भरकर जीते हैं, तो उसका दोषी हमें केवल अपने आप को ही ठहराना चाहिए। मैं जितना भी चाहूँ, उसका दायित्व मैं परमेश्वर पर नहीं डाल सकता।

हन्ना एक ऐसी महिला थी, जो यह तर्क दे सकती थी कि उसकी परिस्थितियों के कारण इन तीनों विषैली भावनाओं का होना तर्कसंगत था। उसकी कहानी को हम 1 शमूएल के आरम्भ में पढ़ते हैं। वह इनमें से प्रत्येक भावना के साथ जूझती होगी, जब प्रत्येक माह के बीतने पर भी वह गर्भवती न हो सकी और जब वह प्रतिदिन अपने पति की दूसरी पत्नी के ताने सुनती होगी और परमेश्वर द्वारा उस स्त्री को दिए गए बच्चों को देखती होगी। परन्तु उसने अपनी निराशा और उदासी के साथ कुछ अच्छा किया, उसने प्रार्थना की। उसने परमेश्वर को अपने हृदय की सारी वेदना बताई। और यह जानते हुए कि उसकी बात सुन ली गई है, वह शान्ति के साथ चली गई। यद्यपि उस समय तक उसका शरीर अभी भी बाँझ था और उसकी परिस्थितियाँ बदली नहीं थीं, फिर भी उसकी आत्मा को उसके स्वर्गिक पिता ने उन्मुक्त कर दिया था।

परमेश्वर ने हन्ना को कड़वाहट, आक्रोश और आत्म-दया रूपी मूक हत्यारों से बचाया और वह हमारी भी उसी प्रकार रक्षा करेगा। तो फिर यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हुए, कि आपका जीवन वैसा ही चले जैसा आप चाहते हैं, आपको रात में जागते रहने की आवश्यकता नहीं है। और आपको अनचाही परिस्थितियों से भरे एक और दिन में जागने पर उस अप्रिय एहसास से प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, आप अपने हृदय के प्रश्नों को और अपनी समझ से बाहर की परिस्थितियों को परमेश्वर की देखभाल में दे देने के महत्त्व को सीखने के लिए इन अवसरों का उपयोग कर सकते हैं, क्योंकि यही वह स्थान हैं जहाँ इन्हें वास्तव में होना चाहिए।

1 शमूएल 1

25 जनवरी : अनुग्रह में बने रहें

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25 जनवरी : अनुग्रह में बने रहें
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“उनमें से कुछ . . . यूनानियों को भी प्रभु यीशु के सुसमाचार की बातें सुनाने लगे . . . बहुत लोग विश्वास करके प्रभु की ओर फिरे। जब उनकी चर्चा यरूशलेम की कलीसिया के सुनने में आई, तो उन्होंने बरनबास को अन्ताकिया भेजा। वह वहाँ पहुँचकर और परमेश्वर के अनुग्रह को देखकर आनन्दित हुआ, और सब को उपदेश दिया कि तन मन लगाकर प्रभु से लिपटे रहो।”  प्रेरितों के काम 11:20-23

“अपने आश्चर्यकर्मों को करने के लिए परमेश्वर रहस्यमय तरीके से कार्य करता है।”[1] आरम्भिक कलीसिया के समय में यरूशलेम की मण्डली अथवा उस समय पृथ्वी पर की एकमात्र कलीसिया का सताव ही वह कारण था, जिसने सुसमाचार के सन्देश को अधिक दूर और तीव्रता से पहुँचाया। आरम्भिक मसीही लोगों को उनके नगर से भागने के लिए बाध्य किए जाने के बिना ऐसा नहीं हो सकता था। जब विश्वासी तितर-बितर होकर फिनीके, साइप्रस और अन्ताकिया के शहरों तक पहुँचे, तो सुसमाचार उस क्षेत्र में “यूनानी भाषा बोलने वालों” अर्थात यूनानियों तक पहुँच गया और कई लोग विश्वास करने लगे।

परन्तु जब इन गैर-यहूदी लोगों के हृदय परिवर्तन हो जाने का समाचार यरूशलेम में कलीसिया में पहुँचा, तो इस समाचार का तुरन्त स्वागत नहीं किया गया। उस समय तक सुसमाचार का विस्तार लगभग पूरी तरह से यहूदियों के मध्य ही हो सका था। अब यह समाचार मिल रहा था कि यूनानी लोग भी मसीही बन रहे थे। इससे कलीसिया को एक नए विस्तार का सामना करना पड़ा, जिसके लिए वे बिल्कुल तैयार नहीं थे। यह सब क्या हो रहा था? उन्हें इसके बारे में खुश होना चाहिए था या इस पर क्रोधित होना चाहिए था? इस तरह की परिस्थिति को सम्भालने के लिए वे किसको भेज सकते थे?

हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उन्होंने बरनबास को भेजने का निर्णय लिया। जबकि कलीसिया में प्रत्येक व्यक्ति नए और अलग-अलग अवसरों का उपयोग करने में सक्षम नहीं होता, वहीं बरनबास एक प्रोत्साहनकर्ता और एक ऐसा व्यक्ति था, जो दूसरों में परमेश्वर के छुटकारे के कार्य को पहचानता था, तब भी जब वे विचित्र या अनोखे लगते थे (प्रेरितों के काम 9:26-28 देखें)। निश्चित रूप से बरनबास इस बात को समझता था कि जो कुछ हुआ था वह प्रभु का कार्य था और वह परमेश्वर के अनुग्रह के इस प्रदर्शन से खुश था। नए विश्वासियों को वह ऐसे सम्बोधन के साथ प्रोत्साहित कर रहा था, जिसकी हम सभी को आवश्यकता है, अर्थात यह कि अनुग्रह में बने रहो और अपने पूरे हृदय से परमेश्वर के प्रति सच्चे रहो।

यदि हमने परमेश्वर के आत्मा को अपने स्वयं के संकरे मार्गों में प्रवाहित करने का प्रयास करते हुए अपना जीवन जीया है और यह सोचते आए हैं कि यह रास्ता या वह स्थान ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ परमेश्वर काम करेगा, तो हमें पुनर्विचार करना चाहिए। जैसे-जैसे परमेश्वर अपने राज्य का विस्तार करता जाता है और अपने आत्मा को उन लोगों पर उण्डेलने लगता है, जिनके होने की हम कम से कम अपेक्षा कर रहे होते हैं, तब हमारे पास उस उत्साह के साथ प्रत्युत्तर करने का अवसर होता है, जिसका उदाहरण बरनबास ने दिया। जबकि सुसमाचार का सन्देश तो अपरिवर्तनीय है, फिर भी, हमारा संसार और समय निरन्तर बदलते रहते हैं। उसके बाद भी परमेश्वर लोगों को “हर एक जाति और कुल और लोग और भाषा में से” अपने पास आने का बुलावा देता रहता है (प्रकाशितवाक्य 7:9)। हमारी उससे यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वह हमें आश्चर्यचकित कर देगा और वह ऐसे तरीकों से काम करेगा जिनके बारे में हमने सोचा भी नहीं था और वह भी एक ऐसी समय-सीमा में, जो हमारी समय-सीमा से अलग होगी। और जब वह ऐसा करे तो हमें बरनबास की तरह बनने के लिए तैयार रहना चाहिए जो “पवित्र आत्मा और विश्वास से परिपूर्ण था” (प्रेरितों के काम 11:24)। और जो परमेश्वर के नए कार्यों में आनन्दित होता, उनका हिस्सा बनने के लिए तैयार रहता और दूसरों को उसके अनुग्रह में बने रहने के लिए प्रोत्साहित करता था।

प्रेरितों के काम 10:1-48

24 जनवरी : दाता को लौटाना

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24 जनवरी : दाता को लौटाना
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मैं क्या हूँ और मेरी प्रजा क्या है कि हम को इस रीति से अपनी इच्छा से तुझे भेंट देने की शक्ति मिले? तुझी से तो सब कुछ मिलता है, और हम ने तेरे हाथ से पाकर तुझे दिया है।”  1 इतिहास 29:14

कुछ समय पहले हमारी कलीसिया के कुछ कर्मचारियों ने कलीसिया के भवन की प्रत्येक वस्तु पर एक स्टिकर लगाने का निर्णय लिया, जिसमें लिखा था, “यह पार्कसाइड चर्च की सम्पत्ति है।” पहले तो मैंने सोचा कि क्या हम यह आशा कर रहे हैं कि कोई व्यक्ति जो कचरे का डिब्बा चुराना चाहता होगा वह रुकेगा, स्टिकर पढ़ेगा और अनायास ही उसे वापस करने का निर्णय ले लेगा। यह बहुत ही बेकार का काम लग रहा था। तथापि मुझे जल्द ही पता चल गया कि मुझे सच में वस्तुओं पर इन छोटे स्टिकरों को देखकर आनन्द आने लगा था, जिन पर लिखा था, “यह कलीसिया की सम्पत्ति है”!

परमेश्वर के स्वामित्व और अनुग्रहपूर्ण प्रावधान के स्मृति चिह्न पूरे पवित्रशास्त्र में गूंजते हैं। जब राजा दाऊद मन्दिर के लिए योजना बनाने में लगा था तब उसने परमेश्वर के प्रावधान के बारे में स्पष्टता और दीनता के साथ स्वीकारा; वह जानता था कि एक सृजित संसार में सृजित प्राणियों के रूप में हम अपने सृष्टिकर्ता को केवल वही दे सकते हैं, जो हमें हमारे सृष्टिकर्ता ने पहले से हमें दिया है। नए नियम में भी प्रेरित पौलुस यह लिखता है, “तेरे पास क्या है जो तू ने (दूसरे से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (दूसरे से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया?” (1 कुरिन्थियों 4:7)।

दाऊद के शब्द परमेश्वर के लोगों के लिए कोई नई अन्तर्दृष्टि प्रदान नहीं कर रहे थे। पीढ़ियों पहले जब इस्राएली परमेश्वर का निवास-स्थान बनाने की तैयारी कर रहे थे, तब मूसा ने इस्राएलियों को निर्देश दिया था, “तुम्हारे पास से यहोवा के लिए भेंट ली जाए” (निर्गमन 35:5)। और उनके पास था क्या? केवल वही तो था जो सृष्टिकर्ता द्वारा दिया गया था। केवल वही, जो उनको छुटकारा दिलाने वाले ने मिस्र से उनके निकलने के समय उन्हें दिया था (निर्गमन 12:35-36)। केवल वही था जो उनके जीवन के पालनहार ने उनके लिए सम्भव बनाया था (निर्गमन 35:30-35)।

कलीसिया की सम्पत्ति की तरह ही, जिस पर अब उसके नाम की परची लगी थी, हम कह सकते हैं कि हमारे पास जो कुछ भी है, निस्सन्देह सृष्टि की प्रत्येक वस्तु परमेश्वर के नाम की परची के साथ मुहरबन्द है। एक प्रभावशाली ईश्वर-विज्ञानी अब्राहम काइपर ने, जिन्होंने 20वीं सदी के आरम्भ में नीदरलैंड के प्रधानमंत्री के रूप में भी काम किया, कहा, “हमारे मानव अस्तित्व के पूरे शासन-क्षेत्र में एक भी इंच ऐसा नहीं है जिसके विषय में मसीह, जो सब  पर सम्प्रभु है, चीखकर यह न कहता हो कि यह ‘मेरा’ है।”[1]

यह दृष्टिकोण हमारी समकालीन संस्कृति से बहुत अलग है, जिसका झुकाव इन दो गलत धारणाओं की ओर जाता है कि या तो हम स्व-निर्मित लोग हैं या फिर पृथ्वी पर सब कुछ, जिसमें हम स्वयं भी हैं, ईश्वर है। बाइबल इसका विरोध करती है और कहती है, “पृथ्वी और जो कुछ उस में है यहोवा ही का है, जगत और उसमें निवास करने वाले भी” (भजन संहिता 24:1)।

जबकि हम यह स्मरण रखते हैं कि हमारे पास जो कुछ भी है वह सब उसी से आया है, इस कारण परमेश्वर हमें दीनता के साथ चलने का बुलावा दे रहा है। हमारे जीवनों से यह घोषणा होनी चाहिए, “मैं परमेश्वर का हूँ!” आपके पास परमेश्वर को देने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पहले से ही उसका नहीं है। इसलिए जैसे भी परमेश्वर आपको निर्देश देता है, उसके अनुग्रह के प्रत्युत्तर स्वरूप स्वेच्छा से और उदारता से दें,  चाहे वह आपका धन हो, आपका समय हो या आपके कौशल।

     2 कुरिन्थियों 8:1-15

23 जनवरी ;प्रभु का काम

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23 जनवरी ;प्रभु का काम
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“वचन में या काम में जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।”  कुलुस्सियों 3:17

आज आपको और मुझे करने के लिए एक काम दिया गया है।

कुरिन्थियों को लिखे अपने पहले पत्र में जब प्रेरित पौलुस ने कलीसिया को आदेश दिया कि वे तीमुथियुस का अपने बीच तन्मयता से स्वागत करें, तो ऐसा इसलिए नहीं था कि तीमुथियुस अपना नाम करने का प्रयास कर रहा था, या उसके पास कोई विशेष सम्मान या उपाधि थी, या वह उल्लेखनीय बनने का इच्छुक था। कदापि नहीं, यह केवल इसलिए था क्योंकि तीमुथियुस “प्रभु का काम करता था” (1 कुरिन्थियों 16:10)।

प्रभु के काम में वह सब शामिल है, जिसको करने के हम इच्छुक हैं या अपने मन को केन्द्रित करते हैं और जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है, और जो हम दूसरों को प्रभावित करने के बजाय प्रभु के लिए करते हैं (कुलुस्सियों 3:23)। यह मसीह की देह के भीतर या हमारे आस-पास के संसार की सेवा के रूप में किया जाने वाला कोई भी काम हो सकता है।

पौलुस ने एक उद्देश्य के साथ पद 17 में “जो कुछ भी करो” वाक्यांश को जोड़ा है। मसीही सेवा में “जो कुछ भी” का अर्थ है कि हमारे सभी प्रयासों में पवित्र आत्मा की सहायता से हमें सुसमाचार के सेवाकार्य में प्रभावी रूप से लगे होने के लिए अपने आप को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। भले ही हम किसी पड़ोसी की सहायता कर रहे हों, हमारी कलीसिया के दरवाजे से आने वाले आगंतुकों का अभिवादन कर रहे हों, या समुदाय में स्वयंसेवक के रूप में कार्य कर रहे हों, प्रत्येक सेवा दूसरों को हमारे उद्धारकर्ता के बारे में साक्षी देने का एक अवसर है। यह जानना कितने विशिष्ट आदर की बात है कि हमें यहाँ पृथ्वी पर अविश्वासी लोगों को यीशु मसीह के प्रतिबद्ध अनुयायी बनते देखने के लिए रखा गया है!

मसीह की देह के भीतर हमें यह समझना चाहिए कि हमारा आत्मिक विकास प्रभु के प्रति दूसरों की सेवा का परिणाम है। पौलुस ने कुरिन्थियों को मसीह के नाम पर अपने श्रम के परिणाम के रूप में उचित रीति से देखा और यह लिखा कि “क्या तुम प्रभु में मेरे बनाए हुए नहीं?” (1 कुरिन्थियों 9:1)। कुरिन्थुस में कलीसिया का अस्तित्व इसी तथ्य के कारण था कि वह प्रभु का काम कर रहा था। पौलुस न तो निष्फल था और न ही विशेष; इसके विपरीत, वह उद्देश्यपूर्ण रूप से एक विशिष्ट जिम्मेदारी के लिए नियुक्त किया गया था।

मसीहियों के रूप में हमें केवल बैठकर सीखने का नहीं अपितु विकसित होने तथा जाने का, और मछली पकड़ने तथा खिलाने का बुलावा मिला है। परमेश्वर प्रत्येक विश्वासी को मसीही सेवाकार्य और सेवा के अन्तर्गत विशेष जिम्मेदारियाँ सौंपता है और उन जिम्मेदारियों में आज हमारे सामने आने वाली परिस्थितियों और अवसरों में उसके लिए काम करना शामिल है; क्योंकि वे संयोग मात्र से नहीं परन्तु ईश्वरीय योजना द्वारा प्राप्त होती हैं। पौलुस ने परमेश्वर की बुलाहट के प्रति अपनी आज्ञाकारिता के द्वारा इसे हमारे लिए सराहनीय रूप से प्रस्तुत किया है, यह पहचानते हुए कि वह “चुना हुआ पात्र” था, जो “अन्यजातियों और राजाओं और इस्राएलियों के सामने” परमेश्वर का नाम प्रकट करने वाला था (प्रेरितों के काम 9:15)।

प्रभु का काम वह काम था जिसे पौलुस ने गम्भीरता से लिया। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। हम सभी को, चाहे हम जहाँ कहीं भी हों, परमेश्वर का आदर करने का बुलावा दिया गया है। इस पर विचार करें कि आपके सोचने और काम करने के तरीके में क्या बदलाव आ सकता है, यदि आप प्रति क्षण अपने आप से पूछें कि “अब, यीशु मुझसे इस परिस्थिति में क्या करवाना चाहता है? मैं इस क्षण में उसके नाम की स्तुति कैसे कर सकता हूँ और उसे कैसे प्रसन्न कर सकता हूँ?” आज आपके पास उसके लिए काम करने का विशेषाधिकार है।

भजन संहिता 127

22 जनवरी : तूफानों के आने पर

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22 जनवरी : तूफानों के आने पर
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“तब बड़ी आँधी आई, और लहरें नाव पर यहाँ तक लगीं कि वह पानी से भरी जाती थी। पर वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था। तब उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, ‘हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?’ तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, ‘शान्त रह, थम जा!’ और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया।”  मरकुस 4:37-39

जो व्यक्ति काफी जीवन जी चुका है, वह जानता है कि जीवन में तूफान अवश्य आएँगे। कभी-कभी, पता नहीं कहाँ से, कभी अचानक हमें नौकरी छूट जाने, किसी भयानक बीमारी का पता लगने, किसी प्रियजन की दुखद मृत्यु का या किसी के चले जाने के दुख का सामना करना पड़ता है। गलील की झील पर तूफान में फँसे चेलों की तरह हम भी इन परीक्षाओं से पूरी तरह पराजित महसूस कर सकते हैं, मानो हमारी नाव डूब रही हो।

यीशु के पीछे चलने से हम जीवन के तूफानों से बच तो नहीं जाते, किन्तु हम यह जानते हुए विश्राम अवश्य पा सकते हैं कि परमेश्वर हमें इनमें स्थिर रखने की प्रतिज्ञा करता है। वह हमारे हृदयों को शान्त कर सकता है और वह तूफानों को भी शान्त कर सकता है।

जब तूफान आते हैं तो हम प्रायः परमेश्वर पर सन्देह करने के लिए प्रलोभित हो जाते हैं। चेलों ने भी यीशु से प्रश्न पुछा, भले ही उन्होंने उसके चमत्कारों को प्रत्यक्ष रूप से देखा था। उन्होंने यीशु को आमने-सामने देखा था और वे प्रतिदिन उनके साथ खाना खाते थे, किन्तु जब तूफान आया तो वे अविश्वास के आतंक में डूब गए, मानो वे भूल गए हों कि वह कौन था या वह क्या करने में सक्षम था। क्या हम प्रायः अपने आप को भी ऐसी ही परिस्थिति में नहीं पाते हैं? जैसे ही उतार-चढ़ाव आते हैं, जैसे ही जीवन की आँधियाँ और लहरें उठने लगती हैं, हमारे सन्देह और निर्बलताएँ फूट पड़ती हैं, हम भूल जाते हैं कि हमारे भीतर कौन रहता है और वह क्या करने में सक्षम है।

परमेश्वर तूफानों को आने से रोकता नहीं है। किन्तु वह एक ऐसा परमेश्वर है, जो उन तूफानों के मध्य में उपस्थित रहता है और उन पर सम्प्रभुता रखता है। यीशु न केवल बड़ी आँधी आने के समय चेलों के साथ रहा, अपितु उसने उसे शान्त करके अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन भी किया। परमेश्वर होने के नाते उसने स्वयं उस समुद्र को रचा था। वह समुद्र उसके लिए क्या ही समस्या ठहरेगा? हमारे लिए भी, यहाँ तक कि ऐसी परिस्थितियाँ भी जो निराशाजनक और दुर्गम लगती हैं, हमारे लिए वही सामने लेकर आती हैं जो उसकी योजना है। जब कठिनाइयाँ, डर और कष्ट बने रहें, उन समयों में भी हम उस पर भरोसा कर सकते हैं कि वह हमें ऐसी शान्ति देगा जो “सारी समझ से परे है” (फिलिप्पियों 4:7) और हमें शान्ति के स्थान पर ले आएगा, चाहे वह इस जीवन में आए या केवल मृत्यु के अन्तिम तूफान के बाद।

तो फिर, प्रश्न यह नहीं है कि “क्या मेरे जीवन में तूफान आएँगे?” यह तो निश्चित है कि वे आएँगे। इसके विपरीत, हमें यह पूछना चाहिए कि “जब तूफान आएँगे तो क्या मैं विश्वास करूँगा कि यीशु मसीह उनसे निपटने में सक्षम है, और क्या मैं उसे ऐसा करने दूँगा?” वह हमारे मनों में छाए सन्देह के बादलों को हटा सकता है। वह टूटे हुए दिलों को जोड़ सकता है। वह प्रेम के लिए हमारी लालसा को शान्त कर सकता है। वह थकी हुई आत्माओं को सजीव कर सकता है। वह व्याकुल आत्माओं को शान्ति प्रदान कर सकता है।

यीशु को जगत के सृष्टिकर्ता के रूप में देखने पर, जिसने समुद्र को शान्त किया, और जिसमें सब कुछ स्थिर बना रहता है, आप भी तूफान के शान्त हो जाने का अनुभव कर सकते हैं।

 मरकुस 4:35-41