“वह किसी जगह प्रार्थना कर रहा था। जब वह प्रार्थना कर चुका, तो उसके चेलों में से एक ने उससे कहा, ‘हे प्रभु, जैसे यूहन्ना ने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखाया वैसे ही हमें भी तू सिखा दे।’” लूका 11:1
प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ हमारी सहभागिता मुख्य रूप से हमारी प्रार्थनाओं के माध्यम से व्यक्त होती है। वे उसके साथ हमारे सम्बन्ध का प्रमाण देती हैं। वह न केवल अपने वचन के माध्यम से हमसे बात करता है, अपितु उसने हमें प्रार्थना में उसके साथ बात करने का अद्भुत विशेषाधिकार भी सौंपा है।
पवित्रशास्त्र हमें स्वयं यीशु के प्रार्थना के जीवन के कई विवरण प्रदान करता है। इन अभिलेखों से हम जितना अधिक परिचित होंगे, उतना ही अधिक हम महसूस कर सकेंगे कि यीशु प्रार्थना को एक पवित्र आदत के रूप में लेता था। वह अपने पिता के समक्ष दिन की योजनाएँ रखने के लिए नियमित रूप से सुबह-सुबह प्रार्थना करता था। शान्त और एकान्त स्थान में की गई प्रार्थनाओं ने यीशु को सक्षम बनाया कि वह भीड़ के शोर और यहाँ तक कि अपने शिष्यों के अनुरोधों से बढ़कर अपने पिता की आवाज का अनुसरण करे। वह अपने सारे निर्णय प्रार्थना की सीमाओं में रहकर ही करता था।
यीशु के प्रार्थना के नियम ने उसके चेलों को यह निवेदन करने के लिए प्रेरित कर दिया, “हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।” स्पष्ट रूप से वे प्रार्थनाओं में उसकी गहनता और एकाग्रता से इतने प्रभावित हुए कि परमेश्वर पिता के साथ ऐसी ही घनिष्ठता के लिए उनके हृदयों में भी एक भूख उत्पन्न हो गई।
उनके अनुरोध के उत्तर स्वरूप यीशु ने अपने चेलों को निर्देश दिया कि वे “बक-बक न करें” या फिर “यह न सोचें कि उनके बहुत से शब्दों के कारण उनकी सुनी जाएगी” (मत्ती 6:7)। दूसरे शब्दों में, प्रार्थना करते समय हमें बड़बड़ाने या बहुत अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत यीशु द्वारा दिए गए उदाहरण में अर्थात् प्रभु की प्रार्थना में हम पाते हैं कि परमेश्वर की आत्मिक सन्तानें परमेश्वर को सीधे-सीधे और सहज रीति से अपने स्वर्गिक पिता के रूप में सम्बोधित करने के लिए स्वतन्त्र हैं।
हमें किस बात के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? सबसे पहले तो हमें यह माँगना है कि परमेश्वर के नाम का उचित आदर हो, कि वह हमारे भीतर और हमारे आस-पास अपना राज्य लेकर आए और वह हमारी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे। हमें पश्चाताप करने की अपनी दैनिक आवश्यकता, दूसरों को क्षमा करने की आवश्यकता और प्रलोभन से बचने के लिए परमेश्वर पर अपनी निर्भरता को स्वीकारना है। यीशु ने समझाया कि अपनी प्रार्थनाओं में हमें प्रतिदिन के जीवन में परमेश्वर की महिमा और अनुग्रह को देखने का प्रयास करना है और उसी की माँग करनी है।
हमारी मसीही यात्रा में एक अर्थपूर्ण प्रार्थना के जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण और कुछ भी नहीं है। प्रार्थना के ऐसे जीवन को बनाए रखने से अधिक कठिन भी और कुछ नहीं है। किन्तु हमारे लिए सहायता उपलब्ध है। यदि परमेश्वर के दिव्य पुत्र यीशु को प्रार्थना करने की आवश्यकता थी, तो आपको और मुझे भी है। हमें दीन करने वाला यह विचार ही हमें अपने घुटनों पर ले जाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। और जब हम अपने घुटनों पर हों, तो हम अपनी प्रार्थना में सहायता के रूप में प्रभु की प्रार्थना का मुक्त रूप से उपयोग कर सकते हैं। परमेश्वर ने आपको प्रार्थना में उसके पास जाने और उसे पिता कहकर सम्बोधित करने का एक विशेषाधिकार दिया है। वह सुनने और सहायता करने के लिए तत्पर रहता है। प्रार्थना को अपनी एक पवित्र आदत बना लें और इसे एक अतिरिक्त विकल्प के तौर पर कदापि न लें।
लूका 11:1-13