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13 जनवरी : सच्ची मित्रता

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13 जनवरी : सच्ची मित्रता
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“मित्रों के बढ़ाने से तो नाश होता है, परन्तु ऐसा मित्र होता है, जो भाई से भी अधिक मिला रहता है।”  नीतिवचन 18:24

कोई भी व्यक्ति अकेला होना और बिना किसी दोस्त के रहना पसन्द नहीं करता। हम सभी दोस्ती के महत्त्व को और एक सच्चे दोस्त के रूप में मिले अनमोल वरदान के महत्त्व को पहचानते हैं। घनिष्ठ मित्रता, जिसमें अनुरूपता, सच्चाई और भावुकता पाई जाती है, एक ऐसा मानक है जिसे बाइबल हमारे लिए प्रदर्शित करती है।

सुलैमान कहता है कि एक सच्चा मित्र सदैव निष्ठावान रहता है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों: “मित्र सब समयों में प्रेम रखता है” (नीतिवचन 17:17)। हम अपने दोस्तों को ठीक वैसे ही देखते हैं, जैसे वे हैं और फिर भी हम उनके प्रति अपनी निष्ठा में अटल रहते हैं। इसके अतिरिक्त, सच्चे मित्र ऐसे घाव देने से भी नहीं डरते, जिनसे उनके मित्र वह सब बन सकें जो परमेश्वर उन्हें बनाना चाहता है, “जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वास योग्य हैं” (नीतिवचन 27:6)। हो सकता है कि हम इसे विशेष रूप से पसन्द न करें, किन्तु हममें से प्रत्येक को ऐसे मित्रों की आवश्यकता है जो हमसे गलती होने पर हमें जवाबदेह ठहराएँ। और हममें से प्रत्येक को भी ऐसा ही मित्र बनने का बुलावा दिया गया है।

हमें अपनी भाषा के उपयोग पर भी विचार करना चाहिए, जैसा कि पौलुस कहता है कि “कोई गन्दी बात तुम्हारे मुँह से न निकले, पर आवश्यकता के अनुसार वही निकले जो उन्नति के लिए उत्तम हो, ताकि उससे . . . अनुग्रह हो” (इफिसियों 4:29)। आप केवल एक शब्द से किसी का दिल तोड़ सकते हैं, और हो सकता है कि उसे ठीक करने में पूरा जीवन लग जाए।

जो पुरुष और स्त्रियाँ इन सिद्धान्तों को गम्भीरता से लेते हैं, हो सकता है कि वे अपने आप से पूछें कि “क्या सच में कोई ऐसा दोस्त है जिसमें ऐसी विशेषताएँ होंगी? क्या मेरी जानकारी में ऐसा कोई है, जो हमेशा स्थिर रहता है, जो मुझे प्रेम में होकर झिड़कता है, जो मेरे साथ अपने सभी वार्तालापों में अनुग्रह और संवेदनशीलता दिखाएगा?” और अन्ततः इन सभी प्रश्नों का उत्तर मसीह में पाया जाता है। प्रभु यीशु की मित्रता का विस्तार अद्‌भुत है! उसने सबसे अजीब व्यक्तियों से मित्रता की। वह एक महसूल लेने वाले से बात करने के लिए एक पेड़ के नीचे रुका, उसने एक भ्रष्ट स्त्री से पानी माँगा, और एक कोढ़ी की सुधि ली। वह अपने प्रेम में अटल था; वह सत्य के वचन बोलने के लिए तैयार था, चाहे वह करना कितना भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हो; उसने दूसरों की उन्नति की। श्रेष्ठ रूप में, वह वही है जिसने अपने मित्रों से इतना प्रेम किया कि उनके लिए अपना जीवन दे दिया (यूहन्ना 15:13)। वह पापियों का मित्र है:

यीशु कैसा दोस्त प्यारा, दुःख और बोझ उठाने को!

क्या ही उम्दा वक़्त हमारा, बाप के पास अब जाने को! [1]

यीशु की मित्रता हमारे लिए स्वर्णिम मानक है। मसीह के मित्रों के रूप में, हमें भी दूसरों से प्रेम करने और उनसे मित्रता करने का बुलावा मिला है जैसा कि उसने किया। वास्तव में, यीशु ने कहा, “जो आज्ञा मैं तुम्हें देता हूँ, यदि उसे मानो तो तुम मेरे मित्र हो” (यूहन्ना 15:14)। हमें उन लोगों के साथ उसकी इस मित्रता के विस्तार को बाँटने के लिए प्रत्येक अवसर का लाभ उठाना चाहिए, जो मित्रहीन हैं और त्यागे हुए हैं।

हम ऐसे संसार में रहते हैं, जहाँ जान-पहचान के लोग तो प्रायः अनगिनत होते हैं और “फेसबुक के दोस्त” बहुत सारे होते हैं। परन्तु यह सच्ची मित्रता नहीं है। क्या आपके पास ऐसे मित्र हैं जो अटल, घनिष्ठ और मसीह-समान हैं? यदि हैं, तो उन्हें संजो के रखें। यदि नहीं हैं, तो प्रार्थना करें कि आपको ऐसे कुछ मित्र मिलें, और आज आप स्वयं दूसरों के लिए उस तरह के मित्र बनें। आप किसी के अकेलेपन का हल या किसी के विनाश से बचाव का कारण बन सकते हैं।

याकूब 5:13-20

12 जनवरी : सामर्थ्य और पवित्रता

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12 जनवरी : सामर्थ्य और पवित्रता
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“छः दिन के बाद यीशु ने पतरस और याकूब और उसके भाई यूहन्ना को साथ लिया, और उन्हें एकान्त में किसी ऊँचे पहाड़ पर ले गया। वहाँ उनके सामने उसका रूपान्तर हुआ, और उसका मुँह सूर्य के समान चमका और उसका वस्त्र ज्योति के समान उजला हो गया।”  मत्ती 17:1-2

जैसा कि जॉन लेनन और पॉल मैक्कार्टनी ने एक बार व्यक्त किया था कि ऐसी जगहें हैं जिन्हें हम जीवन भर याद रखेंगे।[1] निश्चित रूप से पतरस, याकूब और यूहन्ना के लिए यह पहाड़, जहाँ उन्होंने मसीह का रूपान्तर देखा था, ऐसा ही स्थान रहा होगा। निश्चित रूप से पतरस इसे कभी नहीं भूला (2 पतरस 1:17-18)।

रूपान्तर में क्या-क्या हुआ था? सबसे पहले, यीशु का रूप बदल गया। उसका चेहरा “चमक उठा।” स्पष्ट रूप से यह साफ होने के कारण नहीं था, अपितु अलौकिक परिवर्तन के कारण ऐसा हुआ था। उसके चेहरे पर एक उज्ज्वल तेज था, जिसे मत्ती “सूर्य के सामान” वर्णित करता है। उसके कपड़े ज्योति के सामान उजले हो गए थे, इतने उजले जितने आपने या मैंने कभी न देखे होंगे, जो स्वर्ग की अतुलनीय शुद्धता को दर्शाता है।

पुराने नियम में परमेश्वर का वर्णन करने के तरीकों में से एक यह है कि वह “उजियाले को चादर के समान ओढ़े रहता है” (भजन संहिता 104:2)। और यीशु पहाड़ की चोटी पर ऐसा ही दिख रहा था। ऐसा कौन करता है? केवल परमेश्वर! यह कोई संयोग नहीं था, परन्तु यह एक संकेत था कि रूपान्तर केवल परमेश्वर की ओर से एक प्रकाशन ही नहीं था अपितु स्वयं परमेश्वर का एक प्रकाशन था। इस दृश्य में मसीह ने अपने आप को अभूतपूर्व रीति से परमेश्वर के रूप में प्रकट किया था। पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि यीशु “उसकी महिमा का प्रकाश” है (इब्रानियों 1:3)। फिर भी जब वह हमारी दुनिया में आया तो मसीह की दीन मानवता में परमेश्वर की महिमा पर्दे में ढँकी हुई थी। रूपान्तर वह काम था जिसे जॉन कैल्विन ने “उसकी महिमा का एक अस्थायी प्रदर्शन” कहा था।[2] यह पर्दे को थोड़ा-सा हटाने जैसा था, मानो पहाड़ की छोटी पर और इन तीन चेलों के मनों में एक छोटी-सी झलक। परमेश्वर पतरस, याकूब और यूहन्ना के लिए यह सम्भव बना रहा था कि वे उस वस्तु का स्वाद चख लें, जिसे वे अभी तक पूरी तरह से समझ नहीं पाए थे, किन्तु भविष्य में अनन्त काल तक उसका आनन्द लेंगे।

पवित्रशास्त्र में जब कभी परमेश्वर की महिमा का प्रदर्शन हुआ है, तो लोग प्रायः अपने मुँह के बल गिर जाया करते हैं। ये चेले कुछ अलग नहीं थे, वे भी अत्यन्त डरे हुए थे। किन्तु यीशु ने उनसे दया के साथ कहा, “उठो, डरो मत” (मत्ती 17:7)।

क्या आप और मैं मसीह के पास उसकी सिद्ध पवित्रता और पारलौकिकता के प्रति इस प्रकार भय-युक्त प्रेम के साथ आते हैं? या क्या ऐसी सम्भावना है कि परमेश्वर के बारे में हमारा दृष्टिकोण कभी-कभी बहुत छोटा होता है? उसके समक्ष इस प्रकार आएँ कि आप उसके सामर्थ्य और उसकी पवित्रता पर विचार करते हुए अपने आप को मुँह के बल गिरे हुए पाएँ। फिर उसकी दया में उसे यह कहते हुए सुनें, उठो। तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है।  आज और प्रति दिन, भय-युक्त प्रेम और आनन्द में जीने का यही तरीका है, जब तक कि आप स्वयं हमारे महिमामय प्रभु को न देख लें।

 मत्ती 17:1-9

11 जनवरी : अन्धकार के समय में स्तुति

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11 जनवरी : अन्धकार के समय में स्तुति
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“तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत करके कहा, ‘मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।’ इन सब बातों में भी अय्यूब ने न तो पाप किया, और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।”  अय्यूब 1:20-22

कठिनाई में धीरज रखने का सम्भवतः सबसे बड़ा बाइबल का उदाहरण अय्यूब है। एक निष्कलंक और खरा व्यक्ति होने के बाद भी एक ही दिन में उसने अपने बच्चों की मृत्यु देखी और लगभग अपनी सारी सम्पत्ति खो दी। फिर भी, उसकी पहली प्रतिक्रियाओं में से एक यह थी कि बहुतायत और घटी में, आनन्द की परिस्थितियों को लाने में और दुखद परिस्थितियों को लेकर आने में, उसने परमेश्वर की सम्प्रभुता को स्वीकार किया। जब उथल-पुथल, निराशा और कष्ट उस पर छा गए तो उसने अपना सिर मुँड़ा लिया, अपना फटा हुआ बागा पहना और भूमि पर बैठ, न केवल पीड़ा में अपितु आराधना के भाव में उसने ऐसा किया।

उल्लेखनीय रूप से इस कष्ट के अन्धकार में “अय्यूब ने न तो पाप किया और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।” इसके विपरीत, अपने आँसुओं में उसने परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा किया। दूसरे शब्दों में, उसने इस बात को पहचाना कि परमेश्वर जानता है कि वह प्रत्येक परिस्थिति में क्या कर रहा है। सबसे कठिन परिस्थितियों में भी परमेश्वर हमारी स्तुति के योग्य है। अय्यूब जानता था कि उसके सब दिन परमेश्वर के हाथों में हैं (भजन संहिता 31:15)।

हममें से अधिकांश लोग व्यथा की चीखों और आँसुओं के कुण्डों से होकर गए हैं। हम जानते हैं कि तूफान के बीच में परमेश्वर की सम्प्रभुता और भलाई का अंगीकार करना कितना कठिन हो सकता है। हमें सन्देह होता है कि वह कहाँ है। कष्ट के प्रति हमारे मानवीय प्रत्युत्तर में हम में परमेश्वर के प्रावधान के बारे में कही गई बातों को नीरस या पुराने ज़माने की बातें समझने का झुकाव होता है, परन्तु ऐसा नहीं है। वास्तव में, समय बीतने या परिस्थितियों के बदलने के साथ हम पीछे मुड़कर देख सकते हैं और पहचान सकते हैं कि ऐसी कोई दुखद परिस्थिति नहीं है, जिसकी अनुमति परमेश्वर ने सम्प्रभुता में होकर न दी हो। वह सभी बातों को अपने हाथों से होकर जाने देता है और उनमें से कोई भी उसे आश्चर्यचकित नहीं करती।

हमें एक-दूसरे के कष्ट को कम नहीं आँकना चाहिए या उनको सहज उत्तर प्रदान नहीं करने चाहिए। इसके विपरीत, हमें कठिनाई के समय में एक-दूसरे को मसीह के समान बनने के लिए प्रेरित करने के लिए बुलाहट दी गई है, एक-दूसरे को स्मरण दिलाते हुए कि परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन और अटल प्रेम दिया है और उसकी चौकसी में हमारे प्राणों की रक्षा हुई है (अय्यूब 10:12)। और निश्चित रूप से हम इतिहास में पीछे देखकर जान सकते हैं कि हमारे परमेश्वर ने इस संसार के अन्धकार में प्रवेश किया है और उस पीड़ा को परख के पूरी तरह समझा है। वह एक ऐसा परमेश्वर है जो जानता है कि मनुष्य को अपने जीवन में कैसा महसूस होता है। वह एक ऐसा परमेश्वर है, जिसने हमारे सामने एक ऐसा भविष्य रखा है जहाँ कोई कष्ट या रोना नहीं है।

जीवन की कठिनाइयों और कष्ट की गहराइयों में भी परमेश्वर का पिता-सदृश प्रावधान हमारी भलाई और उसकी महिमा के लिए सब बातों के होने की अनुमति देता है। उसने यह प्रमाणित कर दिया है कि वह जानता है कि वह क्या कर रहा है। इस कारण हम अन्धकार में भी उसकी स्तुति कर सकते हैं।

भजन संहिता 22

10 जनवरी : सब कुछ साझे का

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10 जनवरी : सब कुछ साझे का
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और सब विश्वास करने वाले इकट्ठे रहते थे, और उनकी सब वस्तुएँ साझे में थीं।”  प्रेरितों के काम 2:44

आस-पास के मूर्तिपूजक संसार की नजर में आरम्भिक कलीसिया के प्रति सबसे बड़ा आकर्षण था उसकी सामुदायिक जीवनशैली। ऐसा क्या था जो इतने अलग-अलग लोगों, अर्थात यूनानी और यहूदी, खतना किए हुए और खतनारहित, जंगली और स्कूती, दास और स्वतन्त्र लोगों को एक साथ जोड़ता था (कुलुस्सियों 3:11)? वह था यीशु मसीह। इन मसीहियों के इकट्ठे रहने की समानता के लिए उसके अतिरिक्त कोई वास्तविक व्याख्या नहीं थी।

उन दिनों से लेकर अब तक, कलीसिया सदैव बहुत कुछ साझे का होने के कारण एक अनूठी संगति में एकजुट रही है। पहली साझा बात है इसका साझा विश्वास।  आरम्भिक कलीसिया जाति, शिक्षा, रुचियों या किसी और बात के आधार पर इकट्ठा नहीं होती थी; इसके विपरीत, वे अपने अलग-अलग जीवनों को अपने उद्धारकर्ता के रूप में यीशु मसीह को स्वीकारते हुए एक साझे विश्वास में लेकर आए। आज के समय में प्रभु भोज इसी एकता की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति है; हमारे लिए एक ही रोटी और एक ही प्याला है, जिसमें हम एक देह के रूप में सहभागिता करते हैं। यीशु वह जीवन की रोटी है, जो हमारा पोषण करना है और हमें जोड़ता है।

दूसरी साझा बात है हमारा एक साझा परिवार।  जब हम यीशु को अपना उद्धारकर्ता मान लेते हैं, तो हमें अन्य विश्वासियों के साथ उसके परिवार में सहर्ष स्वीकारा जाता है, जिसमें सब का एक ही स्वर्गिक पिता है। यह पारिवारिक बन्धन सांसारिक परिवारों से भी अधिक बढ़कर है, क्योंकि विश्वास का परिवार अनन्त परिवार है। इसी कारण, हमें अपने आत्मिक भाइयों और बहनों के हितों का ध्यान रखना चाहिए। हमारे लिए विश्वासियों के रूप में एक दूसरे से प्रेम न करना न केवल दुखद होगा, परन्तु विरोधाभासी भी होगा, क्योंकि “जो कोई परमेश्वर से प्रेम रखता है वह अपने भाई से भी प्रेम रखे” (1 यूहन्ना 4:21)।

तीसरी साझा बात है, परमेश्वर के अनुग्रह में होकर सच्ची कलीसिया एक साझी भावना  का अनुभव भी करती है। हम खेल के आयोजनों में इसका एक छोटा संस्करण देख सकते हैं। प्रत्येक प्रशंसक अलग होता है किन्तु एकसाथ मिलकर वे एक साझी भावना, विश्वास और लक्ष्य साझा करते हैं। कभी-कभी वे एक साथ उत्साहित होते हैं और कभी-कभी वे एक साथ निराश होते हैं। इसी प्रकार, एक ही परिवार के सदस्य के रूप में हम एक-दूसरे के आनन्द, शान्ति, दर्द और दुख में भागीदार होते हैं। जैसा कि पौलुस ने भी कहा है, “यदि एक अंग दुख पाता है, तो सब अंग उसके साथ दुख पाते हैं और यदि एक अंग की बड़ाई होती है, तो उसके साथ सब अंग आनन्द मनाते हैं” (1 कुरिन्थियों 12:26)। उस अध्याय में पौलुस द्वारा उपयोग किया गया रूपक कलीसिया को एक देह के रूप में दर्शाता है। विश्वासियों के रूप में हम अलग-अलग हैं और हमारे गुण और निर्बलताएँ अलग-अलग हैं, और इसलिए हम एक ऐसी देह निर्मित करते हैं, जो अलग-अलग होने की तुलना में एक साथ अधिक भली रीति से काम करती है। मेरी सीमाएँ और निर्बलताएँ आपके गुणों के द्वारा पूरित होती हैं, और इसके उलटे क्रम में भी ऐसा ही है।

सभी परिवारों में कठिनाइयाँ और संघर्ष होते हैं, और हम सभी पापी हैं; इसलिए परमेश्वर के लोगों के साथ सम्बन्ध में होने के विशेषाधिकार को भूल जाना सरल होता है। अन्तिम बार ऐसा कब हुआ था कि आपने अपने पिता को अपनी कलीसिया के परिवार के लिए धन्यवाद दिया था? अन्तिम बार कब ऐसा हुआ था कि जब वे रविवार को एक साथ इकट्ठा थे, तो आप अपने भाइयों और बहनों की ओर देखकर यह जानते हुए उत्साहित हुए थे कि अनुग्रह के द्वारा आप भी इस परिवार का एक भाग हैं?

हमारा संसार, प्रेरितों के दिनों के समान ही, विभाजन और अकेलेपन से भरा है। लोग छिन्न-भिन्न, भयभीत और खोए हुए हैं। परन्तु हम, मसीह की संयुक्त देह, इस संसार को एक प्रगाढ़ संगति और अनन्तता का आशा से भरा भविष्य दे सकते हैं। जब आप लोगों को परमेश्वर के परिवार में लाते हैं, तो उनके जीवनों का हिस्सा बनने के द्वारा आपको अपने स्वर्गिक पिता के हाथ और पैर बनने का अवसर मिलता है। क्या आप इस अवसर को अपने अधिकार में लेंगे?

  कुलुस्सियों 3:5-17

9 जनवरी : सभी निमन्त्रणों से बड़ा निमन्त्रण

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9 जनवरी : सभी निमन्त्रणों से बड़ा निमन्त्रण
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“हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।”  मत्ती 11:28

जब भी आपको कोई निमन्त्रण मिलता है, तो हो सकता है कि आप अपने आप से एक ही तरह के प्रश्न पूछते हों कि यह किसकी ओर से है? यह किसके लिए है? यह महत्त्वपूर्ण क्यों है? यह पद पूरे नए नियम में सबसे प्यारे निमन्त्रणों में से एक प्रस्तुत करता है, परन्तु इसे भली-भाँति समझने के लिए हमें वही प्रश्न पूछने होंगे।

सबसे पहले, यह एक व्यक्तिगत निमन्त्रण है। यह किसी कार्यक्रम के लिए निमन्त्रण नहीं है, न ही यह हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, कन्फ्यूशीवाद, न्यू एज-इज़म, मानवतावाद या किसी अन्य “वाद” के साथ जुड़ जाने के लिए किसी धर्म या दर्शन द्वारा दिया गया निमन्त्रण है, जो आज के समय के वैश्विक दृष्टिकोणों में पाया जाता है। यह स्वयं यीशु की ओर से एक निमन्त्रण है। वह हममें से प्रत्येक को यह निमन्त्रण दे रहा है कि “मेरे पास आओ।”

निमन्त्रण का महत्त्व इस बात में निहित है कि यह किसकी ओर से है। सुसमाचारों में यीशु यह घोषणा करता है कि वह कौन है, कि वह जगत का उद्धारकर्ता मसीह है, परमेश्वर का पुत्र है (यूहन्ना 4:25-26; 1 यूहन्ना 4:14 देखें)। इस पहचान के आधार पर यीशु इसके प्रति प्रत्युत्तर करने की माँग कर सकता था, परन्तु इसके विपरीत वह एक निमन्त्रण दे रहा है।

और वह किसे आने के लिए निमन्त्रण दे रहा है? “सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे हुए लोगों को।” यह निमन्त्रण सब लोगों के लिए है। यह किसी बड़े समूह में से किसी एक समूह को अलग नहीं कर रहा है, अपितु पूरी मानवता का वर्णन कर रहा है। हममें से प्रत्येक को ये शब्द सुनने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो चिन्ताओं, दायित्वों, डर और असफलताओं से भरे प्रतीकात्मक ठेले को धकेलता न हो, जो उसके जीवन की रचना करते हैं।

यह सब महत्त्व की बात क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि यीशु हमें “हमारी आत्माओं को विश्राम” देने के लिए निमन्त्रण दे रहा है। वह अनन्त के सन्दर्भ में एक ऐसे विश्राम के बारे में बोल रहा है, जो कभी विफल नहीं होगा। वह हमें भोज के लिए बुलाता है और वह हमसे भोज के अनुकूल परिधान लाने के लिए भी नहीं कह रहा। हम भोज में उसी प्रकार आते हैं जैसे हम हैं। परमेश्वर उन सभी “अच्छे कर्मों” रूपी परिधानों को लेता है, जिन्हें हममें से बहुत से लोग पहनना पसन्द करते हैं, और वह उनको चिथड़े कहता है और उन्हें एक ओर फेंक देता है। वह उन सभी “बुराइयों, गड़बड़ियों, और निराशाओं” रूपी परिधानों को भी लेता है और उन्हें भी एक ओर फेंक देता है। उनके स्थान पर वह हमें “धार्मिकता के वस्त्र” (यशायाह 61:10) पहनाता है, जो स्वयं यीशु मसीह के द्वारा प्रदान किए जाते हैं। जब हम यीशु के पास आते हैं और उससे हमको वह सब मिल जाता है जिसकी हमें आज आवश्यकता है और जिसकी हमें भविष्य में भी आवश्यकता पड़ सकती है, तो हम अपने आप को किसी प्रकार स्थापित कर लेने या अपने लिए स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करने के अपने प्रयास से विश्राम ले सकते हैं।

यह सभी निमन्त्रणों से बड़ा निमन्त्रण है। आज ही, पहली बार हो या फिर हजारवीं बार, अपने बोझ को उसके पास लेकर आएँ। उसका विश्राम ग्रहण करें।

जैसा मैं हूँ बगैर एक बात, पर तेरे लहू से हयात

और तेरे नाम से है नजात, मसीह, मसीह, मैं आता हूँ। [1]

 मत्ती 11:25-30

8 जनवरी: कड़वाहट से जूझना

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8 जनवरी: कड़वाहट से जूझना
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“अरामी लोग दल बाँधकर इस्राएल के देश में जाकर वहाँ से एक छोटी लड़की बन्दी बनाकर ले आए थे और वह नामान की पत्नी की सेवा करती थी। उसने अपनी स्वामिनी से कहा, ‘यदि मेरा स्वामी शोमरोन के भविष्यद्वक्ता के पास होता, तो क्या ही अच्छा होता! क्योंकि वह उसको कोढ़ से चंगा कर देता।’”  2 राजाओं 5:2-3

पीड़ा अपने आप में किसी व्यक्ति को परमेश्वर के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध में नहीं ले जाती। जो लोग परमेश्वर का वचन सुनते तो हैं परन्तु उस पर विश्वास के साथ प्रत्युत्तर नहीं देते, उनके समान हम भी जब विश्वास और आशा के बिना पीड़ा का सामना करते हैं, तो हम कड़वाहट से भर जाएँगे, क्योंकि हमारा हृदय परमेश्वर के प्रति नरम होने के विपरीत कठोर हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, पीड़ा हमें या तो परमेश्वर की ओर भागने पर बाध्य कर देगी या उससे दूर कर देगी। परखे जाने पर हमें अपने आप से यह पूछना चाहिए, “क्या यह परीक्षा मुझे कड़वा और कठोर बना रही है, या यह मुझे प्रेमपूर्ण और कोमल बना रही है?”

2 राजाओं की पुस्तक के मध्य में, राजाओं और भविष्यद्वाक्ताओं की कहानियों के बीच, एक छोटी इस्राएली लड़की के उदाहरण के माध्यम से हम बहुत बड़ी व्यथा से सामना होने पर कोमलता और दीनता का एक असाधारण चित्र देखने पाते हैं। अरामी लोग एक आक्रमण के समय इस छोटी लड़की को बन्दी बनाकर ले आए थे; वे उसे उसके परिवार और इस्राएल से दूर ले गए थे और उसे एक अरामी सेनाध्यक्ष नामान की सेवा करने के लिए बाध्य किया गया था। उस छोटी बच्ची और उसके परिवार के लिए यह एक अति-अकल्पनीय त्रासदी थी!

फिर भी, उसकी इतनी अधिक पीड़ा में भी हम उसके कोमल हृदय की एक झलक पाते हैं। यह जानने पर कि उसके स्वामी को कुष्ठ रोग है, इस बच्ची ने नामान की पत्नी को बताया कि वह कैसे ठीक हो सकता है। यदि उसने अपने आप को कड़वाहट से भरने दिया होता, तो जिस समय घर में यह बात फैली थी कि उसका स्वामी बीमार है, वह कहती कि अच्छा हुआ, यह इसी के लायक था।  परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। वह अपने शत्रु के लिए सबसे उत्तम बात चाह रही थी, न कि सबसे बुरे होने की आशा कर रही थी। यह एक उल्लेखनीय बात है। वह ऐसा कैसे कर पाई थी? क्योंकि सम्भवतः अपने खालीपन और अपने परिवार से अलग हो जाने के दुख से सामना होने पर वह बार-बार अपने प्रेममय परमेश्वर और उसकी प्रतिज्ञाओं की ओर देखती होगी।

जब हम पीड़ा से होकर जा रहे हों और जब हम उन लोगों की सेवा करना चाहते हों जो गम्भीर यातनाओं में हैं, तो हमें एक कोमल और खुले हृदय को विकसित करना नहीं भूलना चाहिए। क्या ऐसा करना सरल होगा? कदापि नहीं! किन्तु परमेश्वर की विश्वासयोग्यता इतनी विस्तृत, इतनी व्यापक है, कि वह हमें हमारी सबसे तीव्र पीड़ा में भी सहारा दे सकती है। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में परमेश्वर की ओर मुड़ें और उसकी विश्वासयोग्यता और प्रावधान द्वारा शान्ति प्राप्त करें। ऐसा करने पर आप “उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें जो किसी प्रकार के क्लेश में हों” (2 कुरिन्थियों 1:4)।

2 कुरिन्थियों 5:6-21

7 जनवरी: सुसमाचार की अभिव्यक्ति

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7 जनवरी: सुसमाचार की अभिव्यक्ति
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“केवल इतना करो कि तुम्हारा चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो।”  फिलिप्पियों 1:27

प्रति दिन . . . जिस तरह से हम कपड़े पहनते हैं, जिस तरह से हम मुस्कुराते हैं या गुस्सा करते हैं, जिस तरह से हमारा चाल-चलन होता है, हम जो बोलते हैं और हमारे बोलने का लहजा, उसके द्वारा हम सदैव अपने आस-पास के लोगों को बताते रहते हैं कि कौन सी बात वास्तव में महत्त्व रखती है और जीवन वास्तव में क्या है।

मसीहियों के लिए ऐसी अभिव्यक्तियाँ सुसमाचार के अनुरूप होनी चाहिए। इसलिए पौलुस ने फिलिप्पियों को उनके विश्वास और उनके व्यवहार, अर्थात उनके द्वारा अपनाए गए विश्वास वचन और उनके द्वारा प्रदर्शित आचरण के बीच की खाई को पाटने का बुलावा दिया। आज के समय में हमारे लिए मसीह की बुलाहट इससे भिन्न नहीं है। फिर भी, चाहे हम अपने विश्वास में कितने भी परिपक्व क्यों न हों और हम इस खाई को कितना भी क्यों न पाट लें, कुछ न कुछ उससे बढ़कर करने की आवश्यकता सदा बनी रहती है।

पौलुस का वाक्यांश “तुम्हारा चाल-चलन” यूनानी भाषा के क्रिया शब्द politeuesthe से आया है, जिसका अनुवाद अंग्रेजी की NIV बाइबल “तुम्हारा आचरण” के रूप में करती है। इस शब्द का उद्‌गम polis शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ है “नगर,” और यही हमें पुलिस (police) और राजनीति (politics) जैसे अन्य शब्द प्रदान करता है। बहुत वास्तविक अर्थों में, पौलुस मसीही नागरिकता और आचरण को सम्बोधित कर रहा है। जबकि हम अपने आप को परमेश्वर के नगर के वासी समझते हैं, तब हम यह सीखने पाते हैं कि उस दूसरे नगर, अर्थात मनुष्य के नगर में परदेसी और राजदूत के रूप में रहने का क्या अर्थ है। जब हम विश्वास और व्यवहार के बीच की खाई को पाटते हैं, तभी अन्य लोगों को उनके साथ किए गए हमारे व्यवहार के द्वारा स्वर्ग का पूर्वाभास मिल सकेगा।

तो हमारे कार्यों से किस तरह की अभिव्यक्ति होनी चाहिए? केवल इतनी कि मसीह का सुसमाचार प्रेम का सुसमाचार है। हम इसे यूहन्ना के शब्दों में इस प्रकार देखते हैं, “प्रेम इसमें नहीं कि हमने परमेश्वर से प्रेम किया, पर इसमें है कि उसने हमसे प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा। हे प्रियो, जब परमेश्वर ने हमसे ऐसा प्रेम किया, तो हमको भी आपस में प्रेम रखना चाहिए” (1 यूहन्ना 4:10-11)। दूसरे शब्दों में, जैसे परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, वैसे ही हमें अपने आस-पास के लोगों से भी प्रेम करना चाहिए। यहाँ तक कि उन लोगों से भी जिन्हें हम या दूसरे लोग अनाकर्षित या अप्रिय मानते हैं, और हमें यह प्रेम आशा और आनन्द के साथ करना चाहिए! प्रेम का यह सन्देश वह चुनौती है जो पौलुस हमें देता है।

केवल तुम्हारे कहे गए शब्दों में ही नहीं,

केवल तुम्हारे द्वारा अंगीकार किए गए कामों में ही नहीं,

परन्तु सबसे अनजानी रीतियों से मसीह प्रकट होता है। [1]

तो आज आप कैसे कपड़े पहनेंगे, आज जब आप मुसकुराएँगे और जब क्रोधित होंगे, आज आपका चाल-चलन कैसा होगा, और आज आपके बोलचाल और उसका लहजा क्या होगा, इन सबके बारे में थोड़ा रुककर सोचें। आप संसार के सामने किस तरह की अभिव्यक्तियाँ प्रदान कर रहे हैं? उन्हें ऐसी होने दें जो प्रेम के सुसमाचार के अनुरूप हों।

1 यूहन्ना 4:7-21

6 जनवरी: परमेश्वर के वचन को संजोना

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6 जनवरी: परमेश्वर के वचन को संजोना
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“हे मेरे पुत्र, मेरी बातों को माना कर, और मेरी आज्ञाओं को अपने मन में रख छोड़। मेरी आज्ञाओं को मान, इससे तू जीवित रहेगा, और मेरी शिक्षा को अपनी आँख की पुतली जान; उनको अपनी उँगलियों में बाँध, और अपने हृदय की पटिया पर लिख ले।”  नीतिवचन 7:1-3

जब मुझे भूख लग रही हो तब खाने के सामान की खरीदारी करना मेरे लिए जोखिम भरी बात होती है। मुझे लगता है कि मैं खाने की ऐसी चीजें खरीदने के लिए प्रलोभित हो जाता हूँ, जो सामान्य परिस्थितियों में मुझे कदापि पसन्द न आएँ। परन्तु मैं अकेला ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ, राजा सुलैमान के अनुसार: “सन्तुष्ट होने पर मधु का छत्ता भी फीका लगता है, परन्तु भूखे को सब कड़वी वस्तुएँ भी मीठी जान पड़ती हैं” (नीतिवचन 27:7)।

यही सिद्धान्त पवित्रता की हमारी खोज पर भी लागू हो सकता है। आत्मिक रूप से भूखे रहकर अपने दिन बिताना एक वास्तविक संकट है, क्योंकि हमने परमेश्वर के वचन को भोजन के रूप में अच्छे से खाया नहीं है।

यदि हम अपनी पवित्रता बनाए रखने के लिए कोई सार्थक प्रयास करने जा रहे हैं, तो यह आवश्यक है कि हम न केवल परमेश्वर के वचन को पढ़ें; किन्तु उसे संजो कर भी रखें।  जब सुलैमान, इस्राएल का वह राजा जिसे परमेश्वर ने ऐसी बुद्धि दी जो सबसे बढ़कर थी (1 राजाओं 3:3-14), अपने बेटे से कहता है कि उसके वचनों को “माना कर,” उन्हें “मन में रख छोड़,” उन्हें “अपनी आँख की पुतली जान,” उन्हें “बाँध” रख, और उन्हें अपने हृदय पर “लिख ले,” तो वह ऐसी भाषा का प्रयोग करता है, जो परमेश्वर के वचन को संजोने के भाव तक पहुँचा देती है।

परमेश्वर के वचन को इस तरह से समझने के लिए हमें बाइबल का उपयोग अध्ययन किए जाने वाली किसी पाठ्यपुस्तक, या तर्कों के लिए प्रमाण-पत्रों की किसी पुस्तक, या फिर एक प्रतिज्ञा की किसी पुस्तक से कहीं बढ़ कर करना होगा, जिन्हें हम कभी-कभार ही देखते हैं। परमेश्वर के वचन को संजोने के लिए हमें भजनकार के उस दृष्टिकोण की खोज करने की आवश्यकता है, जो अपने समय के घमण्डियों और ठट्ठा करने वालों से अपने आप को दूर रखते हुए परमेश्वर के साथ चलने वाले व्यक्ति के बारे में यों कहता है, “वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है” (भजन संहिता 1:2)।

 परमेश्वर के वचन से प्रसन्न रहने, अर्थात उसे अपने जीवन को चलाने और मार्गदर्शन करने देने, तथा पवित्रता के लिए सरगर्मी रखने के बीच एक सीधा सम्बन्ध है। यदि हम पवित्रशास्त्र को संजोने में विफल रहते हैं, तो प्रश्न यह नहीं है कि क्या  हम पवित्रता के सन्दर्भ में ठोकर खाएँगे या नहीं,  परन्तु प्रश्न यह है कि ऐसा कब  होगा।

हममें से प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में छिपे रहने का स्थान देकर अपनी चाल को शुद्ध रख सकता है (भजन संहिता 119:9)। क्या आपने पवित्रशास्त्र को कण्ठस्थ करने की कोई योजना बनाई है? मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहता हूँ कि आप बाइबल के किसी एक पद को स्मरण करने का संकल्प लें, चाहे आप हर दूसरे दिन, प्रतिदिन, साप्ताहिक रूप से या जैसे भी ऐसा करना चाहें। एक योजना बनाएँ और उस पर टिके रहें।

परमेश्वर के वचन का आनन्द लें और सन्तुष्ट रहें। पवित्रशास्त्र को संजोएँ और पवित्र बनें।

     भजन संहिता 119:1-16

5 जनवरी : हमारा महान महायाजक

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5 जनवरी : हमारा महान महायाजक
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“क्योंकि हर एक महायाजक मनुष्यों में से लिया जाता है और मनुष्यों ही के लिए उन बातों के विषय में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, ठहराया जाता है कि भेंट और पाप बलि चढ़ाया करे . . . यह आदर का पद कोई अपने आप से नहीं लेता, जब तक कि हारून के समान परमेश्वर की ओर से ठहराया न जाए। वैसे ही मसीह ने भी महायाजक बनने की बड़ाई अपने आप से नहीं ली, पर उसको उसी ने दी, जिसने उससे कहा था, ‘तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे उत्पन्न किया है’; इसी प्रकार वह दूसरी जगह में भी कहता है, ‘तू मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिए याजक है।’”  इब्रानियों 5:1, 4-6

याजक पद और बलिदान पद्धति की अवधारणा हमारे समकालीन संसार से बहुत भिन्न है, किन्तु इसे समझना मसीही जीवन का आधार है। पुराने नियम के इस्राएल में पशु बलि की प्रथा कोई मानव निर्मित व्यवस्था नहीं थी जिसे परमेश्वर तक पहुँचने और मनुष्यों को उसके लिए स्वीकार्य बनाए जाने के निरर्थक प्रयास के रूप में ठहराया गया था। इसके विपरीत, इसका उद्देश्य परमेश्वर के वाचा के लोगों को उसके चरित्र, उसकी अपेक्षाओं और उसके छुटकारे की योजना की भव्यता को समझने में सहायता करना था (और वह आज भी इस तरह से हमारी सहायता कर सकती है)। इसके सभी सूक्ष्म विवरणों के द्वारा परमेश्वर अपने लोगों को प्रभु यीशु मसीह के पूर्ण और सिद्ध कार्य की ओर इंगित कर रहा था, जो उसके लोगों का महान महायाजक और उनकी ओर से चढ़ाए जाने वाले एक सिद्ध बलिदान दोनों के रूप में आने वाला था।

ऐतिहासिक रूप से इस्राएल का महायाजक मूसा के भाई हारून की वंशावली से आया होगा और उसे “अपने भाइयों में प्रमुख” माना जाता होगा (लैव्यव्यवस्था 21:10)। इस व्यक्ति ने उन्हीं सामाजिक परिस्थितियों, दबावों और परीक्षणों का अनुभव किया होगा, जिनका वह प्रतिनिधित्व कर रहा था जिससे उसे उनकी ओर से एक अति-करुणामय मध्यस्थ बनने में सहायता मिली होगी।

तथापि यीशु के आगमन से बहुत पहले हेरोदेस महान और अन्य शासकों ने महायाजकीय नियुक्तियों का ऐतिहासिक रूप भ्रष्ट कर दिया था, जो अपने लिए महायाजकों का चयन स्वयं किया करते थे। वे यह नहीं समझते थे कि महायाजक का पद मनुष्य द्वारा दिया जाने वाला कोई सम्मान नहीं होता अपितु परमेश्वर की ओर से एक बुलावा होता है, जैसा कि हारून के लिए ठहराया गया था। महायाजकों का काम किसी राजनीतिक समूह का प्रतिनिधित्व करना नहीं था; उनका कार्य था परमेश्वर के लोगों का प्रतिनिधित्व स्वयं परमेश्वर के सामने करना।

यही एक कारक है जो यीशु को सबसे उत्कृष्ट महायाजक बनाता है: उसके महायाजक बनने की महिमा में उसकी पहल सम्मिलित नहीं थी; इसके विपरीत, उसे उसके पिता द्वारा ठहराया गया था। उसने स्वीकार किया कि “यदि मैं आप अपनी महिमा करूँ, तो मेरी महिमा कुछ नहीं; परन्तु मेरी महिमा करने वाला मेरा पिता है, जिसे तुम कहते हो कि ‘वह तुम्हारा परमेश्वर है’” (यूहन्ना 8:54)। उसने उन्हीं कठिनाइयों को सिद्धता के साथ सहन किया जिनका हम सामना करते हैं। पापरहित होने के बाद भी वह हमारे पापों के कारण सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समक्ष गया। दीनता की आत्मा में होकर यीशु हमें धार्मिकता की ओर प्रेरित करता है। क्योंकि उसने वास्तव में सिद्ध बलिदान चढ़ाया, क्योंकि वह स्वयं सिद्ध बलिदान था, इस कारण आप और मैं अभी और सदा के लिए परमेश्वर की उपस्थिति का आनन्द उठा सकते हैं। कोई भी पाप या पीड़ा, कोई भी निराशा या हताशा, इस महिमामय वास्तविकता को नहीं बदल सकती कि आपके पास सदा के लिए एक याजक है, और इसलिए आपके पास सदा के लिए उसके साथ एक स्थान है।

 इब्रानियों 4:14-5:10

4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट

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4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट
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“मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ; उसी में सन्तोष करूँ। मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ।”  फिलिप्पियों 4:11-12

हम असन्तोष से भरे समाज में रहते हैं। विज्ञापन हमें ईर्ष्यालु बनाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। यद्यपि वास्तविक समस्या वह समाज नहीं है, जिसमें हम रहते हैं परन्तु हमारे अपने हृदय और मन की स्थिति है। हम उन बातों के द्वारा सन्तुष्टि से बहुत दूर कर दिए जाते हैं, जो हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए शोर मचाती हैं, जैसे कि उपाधियाँ, सम्पत्ति, प्रभाव या प्रसिद्धि। फिर भी, ये सभी और अन्य बहुत-सी ऐसी बातें हमें यह विश्वास दिलाकर कि इतना तो कभी पूरा नहीं पड़ेगा, हमें उसमें आनन्द मनाने की भावना को लूट लेना चाहती हैं, जो हमें परमेश्वर ने दिया है। और इन्हें प्राप्त कर लेने का यह प्रयास कभी खत्म नहीं होता।

यद्यपि पौलुस न केवल यह कह सकता था कि वह सन्तुष्ट था, अपितु यह भी कि वह “जिस दशा में” भी हो, वह उसमें सन्तुष्ट रह सकता है। यही तो वह चीज है, जिसको हर कोई खोज रहा है! तो फिर इसका रहस्य क्या था? यह था प्रभु यीशु मसीह की पर्याप्तता में अपनी व्यक्तिगत पहचान और जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्थापित करना। पौलुस ने प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए धैर्य और लचीलापन बनाए रखने का समर्थन नहीं किया या आत्मनिर्भरता का कोई झूठा सुसमाचार प्रस्तुत नहीं किया। कदापि नहीं, उसका सन्तोष परमेश्वर की इच्छा के आगे अपने हृदय और मन को अधीन करने का परिणाम था, भले ही वह किसी भी परिस्थिति का सामना क्यों न करे।

सब लोग हर प्रकार की परिस्थिति में नहीं रह चुके हैं। सब लोग नहीं जानते कि किसी दूसरे की परिस्थिति में रहना कैसा होता है। परन्तु पौलुस यह जानता था। वह जानता था कि धनवान होना और पोषित होना क्या होता है, और वह जानता था कि निर्धन होना और वंचित रहना क्या होता है। यदि उसका सन्तोष परिस्थितियों का परिणाम होता तो उसका जीवन लगातार उतार-चढ़ाव भरा होता, एक क्षण वह मोहक विलासिता में चूर होता और अगले ही क्षण उस विलासिता की अनुपस्थिति से पूरी तरह पराजित। ऐसी अस्थिर आत्मा ने पौलुस को निष्क्रिय कर दिया होता, जिससे वह मसीह की सेवा करने में असमर्थ हो जाता।

पौलुस सामान्य आवश्यकताओं वाला एक सामान्य व्यक्ति था। रोम की एक कालकोठरी से तीमुथियुस को लिखे एक पत्र में पौलुस ने लिखा कि “मेरे पास शीघ्र आने का प्रयत्न कर . . . बागा . . . और पुस्तकें विशेष करके चर्मपत्रों को लेते आना” (2 तीमुथियुस 4:9, 13)। दूसरों ने उसे छोड़ दिया था और उसके पास कुछ वस्तुओं की घटी थी। हाँ, पौलुस को कपड़े, पुस्तकें और एक साथी चाहिए था। किन्तु वह जानता था कि वह इनके बिना भी ठीक से रह सकेगा, क्योंकि उसकी शान्ति उनसे किसी बड़ी बात में निहित थी।

पौलुस की तरह आपका सन्तोष भी अन्ततः यीशु के साथ आपके मेल किए जाने पर आधारित हो सकता है और ऐसा होना भी चाहिए। पूरी तरह से उसके हो जाने और पूरी तरह से उसके अधिकार के अधीन रहने के अतिरिक्त अन्य सभी महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर दें। जब आप मसीह को जान लेते हैं और जान जाते हैं कि वह कितना अद्‌भुत है, कि वह आपका सब कुछ है, चाँदी से अधिक मूल्यवान है, सोने से अधिक महँगा है, हीरों से अधिक सुन्दर है, और आपके पास जो कुछ भी है, वह उसके तुल्य कुछ भी नहीं है,[1] तब आपका अपनी परिस्थितियों को देखने का तरीका और आपकी सन्तुष्टि का मापदण्ड पूरी तरह से बदल जाएगा।

भजन संहिता 73.