“सब प्रकार की कड़वाहट, और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा, सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए।” इफिसियों 4:31
हममें से सब तो नहीं किन्तु अधिकांश लोग जानते हैं कि यह सोचते हुए सवेरे उठना कैसा होता है कि जीवन बिल्कुल भी वैसा नहीं है जैसा हम चाहते हैं। हो सकता है कि आज सवेरे उठने पर आपको भी ऐसा लगा हो। हो सकता है कि शारीरिक रूप से, भावनात्मक रूप से, सम्बन्धों में, आर्थिक और आत्मिक रूप से भी हम कठिन दिनों का सामना कर रहे हों और इसके परिणामस्वरूप हम निराश हो सकते हैं। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?
ऐसे में सबसे सहायक तरीकों में एक है सबसे पहले परमेश्वर से आत्मिक परेशानी के तीन शक्तिशाली स्रोतों से सुरक्षा के लिए प्रार्थना करना, जो कड़वाहट, आक्रोश और आत्म-दया नामक ऐसी स्थितियाँ हैं, जो कोई भी आरम्भिक चेतावनी दिखाए बिना मृत्यु का कारण बन सकती हैं। । ये तीनों धीरे-धीरे हमारे विश्वास का गला घोंट देंगी और उन लोगों के प्रति ईर्ष्या और द्वेष के रूप में बढ़ने लगेंगी जिनके पास वह सब है जो हम चाहते हैं। इसलिए हमारे सामने खड़ी परिस्थितियों में, जो प्रायः केवल हमें और परमेश्वर को ही पता होती हैं, निष्ठुर आत्माओं के विपरीत कोमल हृदय के साथ प्रत्युत्तर देने में हमें परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता होती है।
इफिसुस के विश्वासियों को लिखे अपने पत्र में पौलुस ने उन्हें प्रोत्साहित किया, अपितु यह आज्ञा दी कि वे सारी कड़वाहट, प्रकोप और क्रोध को अपने से दूर करें। यद्यपि यह कहना तो सरल है, किन्तु करना कठिन है, फिर भी पौलुस की यह आज्ञा अपने आप में बहुत स्पष्ट है। वास्तव में, परमेश्वर के वचन में कहीं भी ऐसी कोई आज्ञा नहीं है जिसका हम पालन न कर सकें, चाहे वह कितनी भी कठिन क्यों न लगे, क्योंकि परमेश्वर जो आज्ञा देता है, उसके लिए हमें सशक्त भी बनाता है। इसलिए यदि वह कहता है कि इस काम को करना छोड़ दो, तो आप और मैं निश्चिन्त हो सकते हैं कि वह हमारे जीवनों में उसके निमित्त आत्मा का सामर्थ्य भी दे सकता है, जिससे हम वह कर सकें जो उसने आज्ञा दी है। जब हम अपने हृदयों में कड़वाहट, आक्रोश या आत्म-दया भरकर जीते हैं, तो उसका दोषी हमें केवल अपने आप को ही ठहराना चाहिए। मैं जितना भी चाहूँ, उसका दायित्व मैं परमेश्वर पर नहीं डाल सकता।
हन्ना एक ऐसी महिला थी, जो यह तर्क दे सकती थी कि उसकी परिस्थितियों के कारण इन तीनों विषैली भावनाओं का होना तर्कसंगत था। उसकी कहानी को हम 1 शमूएल के आरम्भ में पढ़ते हैं। वह इनमें से प्रत्येक भावना के साथ जूझती होगी, जब प्रत्येक माह के बीतने पर भी वह गर्भवती न हो सकी और जब वह प्रतिदिन अपने पति की दूसरी पत्नी के ताने सुनती होगी और परमेश्वर द्वारा उस स्त्री को दिए गए बच्चों को देखती होगी। परन्तु उसने अपनी निराशा और उदासी के साथ कुछ अच्छा किया, उसने प्रार्थना की। उसने परमेश्वर को अपने हृदय की सारी वेदना बताई। और यह जानते हुए कि उसकी बात सुन ली गई है, वह शान्ति के साथ चली गई। यद्यपि उस समय तक उसका शरीर अभी भी बाँझ था और उसकी परिस्थितियाँ बदली नहीं थीं, फिर भी उसकी आत्मा को उसके स्वर्गिक पिता ने उन्मुक्त कर दिया था।
परमेश्वर ने हन्ना को कड़वाहट, आक्रोश और आत्म-दया रूपी मूक हत्यारों से बचाया और वह हमारी भी उसी प्रकार रक्षा करेगा। तो फिर यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हुए, कि आपका जीवन वैसा ही चले जैसा आप चाहते हैं, आपको रात में जागते रहने की आवश्यकता नहीं है। और आपको अनचाही परिस्थितियों से भरे एक और दिन में जागने पर उस अप्रिय एहसास से प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, आप अपने हृदय के प्रश्नों को और अपनी समझ से बाहर की परिस्थितियों को परमेश्वर की देखभाल में दे देने के महत्त्व को सीखने के लिए इन अवसरों का उपयोग कर सकते हैं, क्योंकि यही वह स्थान हैं जहाँ इन्हें वास्तव में होना चाहिए।
1 शमूएल 1