“जब तुम प्रार्थना करो तो कहो: ‘हे पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाए।’” लूका 11:2
जब किसी बच्ची को गोद लिया जाता है, तो उसका पूरा जीवन बदल जाता है। उसे एक नया नाम, एक नया परिवार और प्रायः एक बिल्कुल अलग जीवनशैली मिल जाती है। परन्तु उस बच्ची में शायद उस परिवार से जुड़े होने की सच्ची भावना न हो, तौभी कानूनी वास्तविकता कायम रहती है। किसी बच्चे का एक घर में आकर रहना एक बात है, परन्तु उस परिवार के साथ जुड़ने का पूरी तरह से अनुभव करना और उसे व्यक्त करना, अर्थात् अपने नए माता-पिता को “मम्मी-डैडी” कहना, एक पूरी तरह से अलग ही गहन वास्तविकता होती है।
जब हम यीशु मसीह में विश्वास का अंगीकार करते हैं, तो हमें आत्मिक तौर पर गोद लिए जाने के बारे में भी यही बात लागू होती है। हमें गोद लिया जाना हमारी अवस्था को पूर्ण रीति से, सदा के लिए और निर्विवाद रूप से बदल देता है। परन्तु परमेश्वर केवल नाम परिवर्तन से सन्तुष्ट नहीं होता। वह चाहता है कि हम जानें कि उसके बेटे और बेटियाँ होने का क्या अर्थ है। वह चाहता है कि हम उसे अपने स्वर्गिक पिता के रूप में मानने का आश्चर्यजनक अनुभव प्राप्त करें। ऐसा करने के लिए वह अपना आत्मा प्रदान करता है, ताकि हमारे चरित्र को आकार मिले और उसके साथ अपने सम्बन्ध को बच्चे और पिता के रूप में देखने में हमें सहायता मिले। पौलुस ने गलातियों की कलीसिया से कहा, “और तुम जो पुत्र हो, इसलिए परमेश्वर ने अपने पुत्र के आत्मा को, जो ‘हे अब्बा, हे पिता’ कहकर पुकारता है, हमारे हृदयों में भेजा है” (गलातियों 4:6)।
मसीही अनुभव केवल एक कानूनी काम की तरह नहीं होना चाहिए। यह किसी नीति या सिद्धान्त से कहीं बढ़कर है। उद्धार केवल पापों की क्षमा नहीं है; यह तो आत्मा द्वारा सशक्त परिवर्तन का स्वागत करना भी है। मसीहियत कोई मशीनी काम नहीं है, बल्कि एक सम्बन्ध है। यीशु ने क्रूस पर जो काम सबके लिए निष्पक्ष रूप से और कानूनी तौर से पूरा किया है, उसे पवित्र आत्मा हमारे हृदय में व्यक्तिगत रीति से और अनुभव के द्वारा जारी रखता है। हमें बचा लिया गया है, स्वीकार कर लिया गया है और हमसे प्रेम किया गया है। इस परिवर्तन के साथ अब हम भक्ति, सरगर्मी, आँसू, ज्ञानोदय, सहभागिता और अन्ततः स्तुति की आशा कर सकते हैं।
जब परमेश्वर की सन्तानों के रूप में अपनी नई अवस्था को भूल जाने प्रलोभन हमारे सामने आता है, तो आत्मा यह साक्षी देने के लिए प्रतीक्षा कर रहा होता है कि नहीं, तुम सचमुच उसके हो! तुम्हें सबसे बड़ा दाम देकर मोल लिया गया है। तुमसे प्रेम किया गया है और तुम बहुत दुलारे हो। जब हम वैसा नहीं करते जैसा परमेश्वर चाहता है और जब हम चोटिल, टूटे हुए और निराश महसूस करते हैं, तो आत्मा हमें इस प्रकार पुकारने में सहायता करता है, “हे पिता, पिता, क्या आप कृपया मेरी मदद कर सकते हैं?” ऐसी विनतियाँ हमें याद दिलाती हैं कि यीशु ने कैसा अचम्भे भरा काम किया है, अर्थात् उसके बलिदान से हमें छुटकारा मिला है और उसका आत्मा हमारे हृदयों में वास करने के लिए आ गया है। इनके बिना हमारे सृष्टिकर्ता और हमारे न्यायी होने के अतिरिक्त परमेश्वर के साथ हमारा कोई अन्य सम्बन्ध नहीं होगा और फिर हमारे दिलों को “हे अब्बा! हे पिता!” कह कर पुकारने का कोई अवसर नहीं मिलेगा।
परमेश्वर किसी विशेष चिह्न या वरदान से नहीं, परन्तु अपने आत्मा की प्रेरक साक्षी के द्वारा पुत्र और पुत्रियों के रूप में हमें गोद लिए जाने पर मुहर करता है। जैसे-जैसे हम प्रार्थना में उससे बात करते जाते हैं, उसके वचन के द्वारा उससे सुनते हैं, और उसके साथ चलते जाते हैं, वैसे-वैसे हम उसके सामर्थ्य और हमारे भीतर उसके कार्य के बारे में जागरूकता में बढ़ते जाते हैं। क्योंकि हम पाप के शाप से मुक्त हो चुके हैं और हमें गोद लिए जाने की आशीष दे दी गई है, इस कारण हम परमेश्वर को पिता कहकर पुकार सकते हैं, उससे प्रेम रख सकते हैं और आत्मा तथा सच्चाई से उसकी आराधना कर सकते हैं। इसलिए मसीहियो, आज आपसे सम्बन्धित सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि आप परमेश्वर की गोद ली गई सन्तान हैं। कोई भी व्यक्ति या कोई भी ताकत इस सच्चाई को बदल नहीं सकती। इसलिए आज चाहे आप कैसा भी महसूस क्यों न कर रहे हों, इस सच्चाई को सबसे अधिक ढाढ़स देने वाली, आधार प्रदान करने वाली, आश्वस्त करने वाली और प्रेरित करने वाली बात बना लें कि आप परमेश्वर की सन्तान हैं।
रोमियों 8:12-25