“उनमें से कुछ . . . यूनानियों को भी प्रभु यीशु के सुसमाचार की बातें सुनाने लगे . . . बहुत लोग विश्वास करके प्रभु की ओर फिरे। जब उनकी चर्चा यरूशलेम की कलीसिया के सुनने में आई, तो उन्होंने बरनबास को अन्ताकिया भेजा। वह वहाँ पहुँचकर और परमेश्वर के अनुग्रह को देखकर आनन्दित हुआ, और सब को उपदेश दिया कि तन मन लगाकर प्रभु से लिपटे रहो।” प्रेरितों के काम 11:20-23
“अपने आश्चर्यकर्मों को करने के लिए परमेश्वर रहस्यमय तरीके से कार्य करता है।”[1] आरम्भिक कलीसिया के समय में यरूशलेम की मण्डली अथवा उस समय पृथ्वी पर की एकमात्र कलीसिया का सताव ही वह कारण था, जिसने सुसमाचार के सन्देश को अधिक दूर और तीव्रता से पहुँचाया। आरम्भिक मसीही लोगों को उनके नगर से भागने के लिए बाध्य किए जाने के बिना ऐसा नहीं हो सकता था। जब विश्वासी तितर-बितर होकर फिनीके, साइप्रस और अन्ताकिया के शहरों तक पहुँचे, तो सुसमाचार उस क्षेत्र में “यूनानी भाषा बोलने वालों” अर्थात यूनानियों तक पहुँच गया और कई लोग विश्वास करने लगे।
परन्तु जब इन गैर-यहूदी लोगों के हृदय परिवर्तन हो जाने का समाचार यरूशलेम में कलीसिया में पहुँचा, तो इस समाचार का तुरन्त स्वागत नहीं किया गया। उस समय तक सुसमाचार का विस्तार लगभग पूरी तरह से यहूदियों के मध्य ही हो सका था। अब यह समाचार मिल रहा था कि यूनानी लोग भी मसीही बन रहे थे। इससे कलीसिया को एक नए विस्तार का सामना करना पड़ा, जिसके लिए वे बिल्कुल तैयार नहीं थे। यह सब क्या हो रहा था? उन्हें इसके बारे में खुश होना चाहिए था या इस पर क्रोधित होना चाहिए था? इस तरह की परिस्थिति को सम्भालने के लिए वे किसको भेज सकते थे?
हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उन्होंने बरनबास को भेजने का निर्णय लिया। जबकि कलीसिया में प्रत्येक व्यक्ति नए और अलग-अलग अवसरों का उपयोग करने में सक्षम नहीं होता, वहीं बरनबास एक प्रोत्साहनकर्ता और एक ऐसा व्यक्ति था, जो दूसरों में परमेश्वर के छुटकारे के कार्य को पहचानता था, तब भी जब वे विचित्र या अनोखे लगते थे (प्रेरितों के काम 9:26-28 देखें)। निश्चित रूप से बरनबास इस बात को समझता था कि जो कुछ हुआ था वह प्रभु का कार्य था और वह परमेश्वर के अनुग्रह के इस प्रदर्शन से खुश था। नए विश्वासियों को वह ऐसे सम्बोधन के साथ प्रोत्साहित कर रहा था, जिसकी हम सभी को आवश्यकता है, अर्थात यह कि अनुग्रह में बने रहो और अपने पूरे हृदय से परमेश्वर के प्रति सच्चे रहो।
यदि हमने परमेश्वर के आत्मा को अपने स्वयं के संकरे मार्गों में प्रवाहित करने का प्रयास करते हुए अपना जीवन जीया है और यह सोचते आए हैं कि यह रास्ता या वह स्थान ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ परमेश्वर काम करेगा, तो हमें पुनर्विचार करना चाहिए। जैसे-जैसे परमेश्वर अपने राज्य का विस्तार करता जाता है और अपने आत्मा को उन लोगों पर उण्डेलने लगता है, जिनके होने की हम कम से कम अपेक्षा कर रहे होते हैं, तब हमारे पास उस उत्साह के साथ प्रत्युत्तर करने का अवसर होता है, जिसका उदाहरण बरनबास ने दिया। जबकि सुसमाचार का सन्देश तो अपरिवर्तनीय है, फिर भी, हमारा संसार और समय निरन्तर बदलते रहते हैं। उसके बाद भी परमेश्वर लोगों को “हर एक जाति और कुल और लोग और भाषा में से” अपने पास आने का बुलावा देता रहता है (प्रकाशितवाक्य 7:9)। हमारी उससे यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वह हमें आश्चर्यचकित कर देगा और वह ऐसे तरीकों से काम करेगा जिनके बारे में हमने सोचा भी नहीं था और वह भी एक ऐसी समय-सीमा में, जो हमारी समय-सीमा से अलग होगी। और जब वह ऐसा करे तो हमें बरनबास की तरह बनने के लिए तैयार रहना चाहिए जो “पवित्र आत्मा और विश्वास से परिपूर्ण था” (प्रेरितों के काम 11:24)। और जो परमेश्वर के नए कार्यों में आनन्दित होता, उनका हिस्सा बनने के लिए तैयार रहता और दूसरों को उसके अनुग्रह में बने रहने के लिए प्रोत्साहित करता था।
प्रेरितों के काम 10:1-48