“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे?” 1 कुरिन्थियों 6:9
विश्वासियों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यीशु मसीह के राज्य में हमें सदस्यता मिल चुकी है। यही वह बात है जो मसीहियों को अद्वितीय बनाती है। अब हम एक बिलकुल नए राज्य के सदस्य हैं। हो सकता है कि हम काले या गोरे, अमीर या गरीब, पुरुष या स्त्री हों, किन्तु जो बात हमें एक करती है, वह है एक ही राजा, अर्थात् यीशु के प्रति हमारी निष्ठा। हम उसके निर्देशों पर चलते हैं, हम उसके दल के साथ आनन्दित होते हैं और हम उसकी आज्ञा का पालन करने में प्रसन्न होते हैं।
परमेश्वर का राज्य एक धर्मी राज्य है। उसका चरित्र सिद्ध है, उसके मानक उत्कृष्ट हैं और वह पाप को नहीं देख सकता। इसलिए पौलुस चेतावनी देता है कि जो लोग उसके चरित्र को नकारते हैं और उसके मानकों को अस्वीकार करते हैं “वे परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।” दुष्टता, विद्रोह और आत्मनिर्भरता से चिह्नित जीवनशैली मसीह की प्रभुता के साथ मेल नहीं खाती और इस कारण इस तरह से जीवन बिताने का निर्णय उसके राज्य की सीमाओं से बाहर रहने का निर्णय है।
हमें ध्यान देना है कि पौलुस यहाँ अधर्म के छोटे-मोटे कामों का उल्लेख नहीं कर रहा है। मसीह के राज्य का कोई भी सदस्य अनन्त महिमा के इस पार पाप रहित जीवन नहीं जीता। इसके विपरीत, पौलुस किसी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख कर रहा है, जो निरन्तर पाप में लगा रहता है या उससे घृणा नहीं करता। वह ऐसे जीवन की बात कर रहा है जो घोषित करता हो कि “मैं नहीं चाहता कि परमेश्वर मेरी इच्छाओं में हस्तक्षेप करे, फिर भी मैं इस धारणा के साथ जीना चाहता हूँ कि मैं उसके राज्य का हूँ और उसके सभी लाभ भी चाहता हूँ।”
परमेश्वर अपने राज्य की सीमाओं का निर्धारण करता है। यह बात पूर्णतः सत्य है कि सारे मनुष्य उसके राज्य के नागरिक नहीं होगे, फिर चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उनका विश्वास चाहे कुछ भी क्यों न हो, या वे चाहे कुछ भी क्यों न चाहते हों! यह धारणा बहुत ही स्वीकार्य लग सकती है, परन्तु परमेश्वर का वचन ऐसा कदापि नहीं सिखाता। केवल परमेश्वर यह निर्धारित करता है और उसके अतिरिक्त कोई अन्य यह तय नहीं कर सकता कि उसके राज्य में कौन होगा।
परमेश्वर कहता है कि न्याय का एक दिन आएगा। निस्सन्देह, यीशु अपनी महिमा में वापस आएगा और “सब जातियाँ उसके सामने इकट्ठा की जाएँगी; और वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा” कि वे या तो परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करें या अनन्त विनाश में भेजे जाएँ (मत्ती 25:32)। परमेश्वर का राज्य ऐसा कुछ नहीं है, जिसे यीशु पुरातन से चली आ रही प्रणाली में मौजूद किसी दोष को ठीक करने के लिए लेकर आया हो। इसकी योजना अनन्तकाल से थी।
आने वाले न्याय के कारण सुसमाचार प्रचार में तत्परता की भावना उत्पन्न होनी चाहिए और इससे हममें हमारे पाप के प्रति सच्चरित्रता और निर्दयता उत्पन्न होनी चाहिए। हमें संसार के सामने यीशु के रूप में एक ऐसा जीवित उद्धारकर्ता प्रस्तुत करना चाहिए, जो ठीक वही करेगा जिसे करने के बारे में उसने कहा था और हमें स्वयं को भी यही प्रचार करना चाहिए। केवल अपने पाप को पहचानने और उद्धारकर्ता की हमारी आवश्यकता को पहचानने के द्वारा ही यह सम्भव है कि हम परमेश्वर के इस अनन्त राज्य के वारिस बन सकेंगे। लूका 13:22-30