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13 अप्रैल : अतुलनीय विनम्रता

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13 अप्रैल : अतुलनीय विनम्रता
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“यीशु काँटों का मुकुट और बैंजनी वस्त्र पहने हुए बाहर निकला; और पिलातुस ने उनसे कहा, ‘देखो, यह पुरुष!’” यूहन्ना 19:5

वहाँ खड़ा था मसीह—सिर काँटों के मुकुट से छिदा हुआ, किसी दूसरे के कपड़े पहने हुए, हाथ में एक सरकण्डे की छड़ी पकड़े हुए, सब उसके राजा होने का मजाक उड़ाने के लिए—और रोमी राज्यपाल पिलातुस ने हँसी उड़ाते हुए भीड़ से कहा, “देखो, यह पुरुष!” जबकि वह शब्द तिरस्कार के साथ कहे गए थे, परन्तु विडम्बना यह है कि वे उपयुक्त थे; वहाँ खड़ा था संसार का उद्धारकर्ता, जो अतुलनीय विनम्रता में सुसज्जित था, और संसार के लिए एक अपार प्रेम से सजा हुआ था।

हमारे पास मसीह के उदाहरण से बहुत कुछ सीखने को है। जब विनम्र राजा ने शाही अपमान और मृत्यु से पहले कोड़ों की क्रूर मार की “पूर्व-मृत्यु” को सहन किया, उसने अपनी आत्म-रक्षा में एक भी शब्द नहीं कहा। और वे उसे किस लिए दोषी ठहरा रहे थे? 18 साल से अपंग एक महिला को चंगा करने के लिए (लूका 13:10-13)? नाईन की विधवा के मरे हुए बेटे को जीवित करने के लिए (लूका 7:11-17)? लाजर को जीवित करके कब्र से बाहर लाने के लिए (यूहन्ना 11:1-44)? बच्चों को अपनी गोदी में बैठाने और अपने शिष्यों को यह समझाने के लिए कि “स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है” (मत्ती 19:14)? मसीह के अभियोगी कैसे इस नतीजे पर पहुँचे कि वे उसे इस तरह अपमानित करें? इसका कोई आधार नहीं था। फिर भी उन्होंने ऐसा किया।

जब हमारा विनम्र प्रभु अपने मुकद्दमे के दौरान चुप रहा, तो पिलातुस को ठेस लगी और उसने अपमानित महसूस किया। यहाँ एक बड़ी विडम्बना है, क्योंकि यह रोमी राज्यपाल समस्त सृष्टि के राजा को अपमानित करने का प्रयास कर रहा था! और फिर भी, उस राजा ने अपने अधिकार को साबित करने या अपनी जान बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया। उसने विनम्रता से एक अन्यायपूर्ण मुकद्दमा सहा, जब सवाल किए गए तो सत्य बोला, और हमारे स्थान पर मृत्यु को गले लगाने के लिए आगे बढ़ा।

मैं खुद से पूछता हूँ: क्या मैं सच में उस पुरुष को देखता हूँ, जो पिलातुस के सामने खड़ा है, जो भीड़ के सामने खड़ा है—जो मेरे  सामने खड़ा है? यह कोई असहाय व्यक्ति नहीं है, जो अपनी मदद आप नहीं कर सकता। यह तो देहधारी परमेश्वर है।

क्या मैं सचमुच समझता हूँ कि वह इस अपमानित मार्ग पर क्यों चला? “ओह, वह प्रेम जिसने उद्धार की योजना बनाई”[1]—आपके और मेरे लिए प्रेम और उद्धार की योजना! दो हजार साल पहले, वहाँ रोम राज्यपाल के महल के बाहर एक दुखद दृश्य खड़ा था, और इसका एक कारण यह था कि यीशु की आँखों के सामने हमारे नाम थे—हमारे नाम जिन्हें उसने अपने हाथों की हथेलियों पर उकेरा था, जिन हाथों को निर्दयी कीलें चीरने वाली थीं (यशायाह 49:16 देखें)।

हम कभी भी उस बगावती भीड़ की तरह न बनें, जो मसीह की विनम्रता का मजाक उड़ाती है, न ही पिलातुस की तरह बनें, जो मसीह प्रभावित करना चाहता है। इसके बजाय, इस पुरुष को उसकी सम्पूर्ण विनम्रता में देखो—यह सरकण्डा पकड़े हुए, यह मुकुट धारण किए हुए, यह वस्त्र पहने हुए, उस क्रूस पर लटके हुए—और देखो उसे आह्वान करते हुए। इस पुरुष को देखो, और बिना किसी सन्देह के जान लो कि आपके लिए उसका प्रेम कभी समाप्त नहीं होगा।

यशायाह 52:13 – 53:12

12 अप्रैल : आप यीशु के साथ क्या करेंगे?

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12 अप्रैल : आप यीशु के साथ क्या करेंगे?
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“मेरा राज्य इस संसार का नहीं . . . तू कहता है कि मैं राजा हूँ। मैंने इसलिए जन्म लिया और इसलिए संसार में आया हूँ कि सत्य की गवाही दूँ। जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है।” यूहन्ना 18:36-37

आप यीशु के साथ क्या करेंगे? उस पहले गुड फ्राईडे की सुबह यहूदी धार्मिक अधिकारी यीशु को रोमी राज्यपाल पुन्तियुस पिलातुस के पास ले गए, ताकि उसका मुकद्दमा जारी रखा जा सके। हम सुसमाचारों के विवरण में देख सकते हैं कि कैसे परमेश्वर ने इन घटनाओं को पूरी तरह से अपनी योजना के अनुसार नियोजित किया। यहूदी नेताओं का यीशु को क्रूस पर मरवाने का निर्णय दरअसल परमेश्वर की शाश्वत योजना को पूरा कर रहा था। इस दिव्य योजना में यीशु का पिलातुस के साथ संवाद भी शामिल था, और जब वे एक-दूसरे के सामने खड़े हुए, पिलातुस ने यीशु की पहचान और अधिकार के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल पूछे, जो अनन्त महत्त्व रखते थे, और हममें से हर एक को इसका उत्तर देना चाहिए। एक भजनकार के शब्दों पर विचार करें:

यीशु पिलातुस के महल में खड़ा है—

मित्रविहीन, त्यागा हुआ, सभी से धोखा खाया हुआ;

सुनो! इस अचानक हुई पुकार का क्या अर्थ है?

आप यीशु के साथ क्या करेंगे?

पिलातुस ने सोचा कि वह केवल एक बौद्धिक और राजनीतिक परीक्षा ले रहा था। लेकिन “यीशु कौन हैं?” यह सवाल हमेशा एक आत्मिक और पारलौकिक सवाल होता है। यीशु एक राजनीतिक राजा नहीं था, जैसा पिलातुस सोच रहा था; बल्कि वह तो स्वर्गिक राजा था। यीशु ने पिलातुस से कहा, मेरा राज्य इस संसार का है ही नहीं। मेरा राज्य तो मेरे लोगों के हृदयों में आत्मिक परिवर्तन लाने से सम्बन्धित है। पृथ्वी पर एक राजा के तौर पर जन्म लेने का मेरा उद्देश्य परमेश्वर के सत्य की गवाही देना है। लेकिन पिलातुस अपने अविश्वास में अंधा होकर पहले ही अपना निर्णय ले चुका था। निराश और उदासीन होकर वह इस मूलभूत सवाल से बचने की कोशिश कर रहा था, जिसका उत्तर हम सभी को देना चाहिए: “मैं यीशु के साथ क्या करूँगा?” लेकिन इस सवाल से बचने की कोशिश करते हुए पिलातुस ने अपना जवाब दे दिया। उसका उत्तर था: मैं अपने ऊपर यीशु के दावे को और अपने ऊपर उसके शासन को नकारता हूँ, और ऐसा करके मेरा उद्धार करने के उसके प्रस्ताव को भी ठुकराता हूँ।

आप यीशु के साथ क्या करेंगे?

उदासीन आप नहीं हो सकते;

एक दिन आपका दिल पूछेगा,

वह मेरे साथ क्या करेगा?”[1]

उदासीन आप नहीं हो सकते। आप या तो उनके राज्य के अधीन जीवन जीएँगे, या फिर आप उसे नकार देंगे। इसलिए सुबह जब आप सुबह अपनी बाइबल पढ़कर बन्द करते हैं, तो यह सोचकर अपने दिन का आरम्भ न करें कि यह संसार, इसकी चिन्ताएँ और इसके अस्थायी शासक ही सब कुछ हैं और केवल यही मायने रखता है। इस सोच के साथ अपने दिन का आरम्भ न करें कि इस संसार में आपके जीवन में यीशु की कोई जगह या रुचि नहीं है। यीशु पिलातुस के सामने मित्रविहीन और त्यागा हुआ खड़ा था, ताकि आप उसके मित्र बनकर उनके शाश्वत राज्य में स्वागत किए जा सकें। उदासीनता का कोई विकल्प नहीं है—तो फिर हम इसे क्यों चाहेंगे?

 यूहन्ना 18:28-40

11 अप्रैल : अपनी तलवार म्यान में रख

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11 अप्रैल : अपनी तलवार म्यान में रख
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“तब शमौन पतरस ने तलवार, जो उसके पास थी, खींची और महायाजक के दास पर चलाकर उसका दाहिना कान उड़ा दिया . . . तब यीशु ने पतरस से कहा, ‘अपनी तलवार म्यान में रख। जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है, क्या मैं उसे न पीऊँ?’” यूहन्ना 18:10-11

यीशु की गतसमनी के बग़ीचे में गिरफ्तारी अन्ततः उसके पिता के प्रति उसके समर्पण को प्रकट करती है। जब सैनिक उसे पकड़ने आए, यीशु पहले ही यह निश्चय कर चुका था कि वह कष्ट का प्याला पीएगा—अर्थात क्रूस पर उसकी मृत्यु—ताकि यह हमारे लिए उद्धार का प्याला बन सके।

लेकिन कौन से शिष्य ने तुरन्त कदम बढ़ाया, जैसे कि यह सब एक संकेत था? बेशक, आवेगी शमौन पतरस—जो तलवार लहराते हुए आया! भावुकता में आकर काम करना और कुछ बोल देना पतरस के लिए कोई नई बात नहीं थी। उसने यीशु के पास पानी पर चलकर जाने की कोशिश की थी। उसने मसीह को फटकारने की कोशिश की थी। उसने मसीह के लिए अपने प्राणों की आहुति देने का प्रस्ताव दिया था। और फिर, यीशु की रक्षा के लिए कदम बढ़ाने के तुरन्त बाद उसने डर के मारे यीशु को जानने से भी इनकार कर दिया।

अपने प्रभु को गिरफ्तार होते देखकर पतरस द्वारा की गई प्रतिक्रिया पूरी तरह से समझने योग्य थी, लेकिन पूरी तरह से गलत थी। जबकि पतरस यहाँ यीशु के लिए लड़ा था, वह वास्तव में यीशु के खिलाफ ही लड़ रहा था। वह परमेश्वर की इच्छा के खिलाफ लड़ रहा था, जो यह चाहता था कि मनुष्यों के पापों के लिए यीशु प्रायश्चित बलि बने। पतरस का यह उदाहरण हमें एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा देता है; जैसा कि कैल्विन कहते हैं, “आओ हम अपने आवेग को संयमित करना सीखें। और जैसा कि हमारे शरीर की इच्छाएँ हमें परमेश्वर के आदेशों से अधिक करने के लिए उकसाती हैं, हम यह सीखें कि हमारे आवेग का परिणाम तब गलत हो जाएगा जब हम परमेश्वर के वचन से आगे बढ़ने की हिम्मत करेंगे।”[1]

पतरस के इस काम को सही करने की आवश्यकता को जानकर यीशु ने उससे एक प्रश्न पूछा: “जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है, क्या मैं उसे न पीऊँ?” वह परमेश्वर की इच्छा के उस हिस्से को स्वीकार कर रहा था, जिसे उसने अभी प्रार्थना में स्वीकार किया था, और जिसके कारण बाद में उसने क्रूस पर यह पुकारा था, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। उसकी पीड़ा के माध्यम से उसकी महिमा प्रकट हुई और विश्वास करने वाले सभी लोगों के लिए उद्धार मुक्त रूप से प्रस्तुत किया गया। पतरस द्वारा निकाला गया कोई भी मार्ग इस मार्ग से बेहतर नहीं हो सकता था, और वह इसे नकार कर गलत कर रहा था।

जब हमारी अधीरता परमेश्वर की योजनाओं में हस्तक्षेप करने का प्रयास करती है, तो हमें अपनी आभासी तलवारें छोड़ देनी चाहिएँ। हमें परमेश्वर की योजना पर विश्वास करना चाहिए, उसके समय का इंतजार करना चाहिए, और उसके आदेशों पर चलना चाहिए। जितना अधिक हम पवित्रशास्त्र से परिचित होंगे—उसमें पाई जाने वाली महान कहानी, प्रतिज्ञाओं और सच्चाइयों को जानेंगे—हम उसकी योजनाओं को उतना ही बेहतर समझ पाएँगे। लेकिन फिर भी, ऐसे समय आएँगे जब उसके मार्ग हमारे लिए रहस्यमय होंगे और हम जिस मार्ग पर वह हमें ले जा रहा है, उसके खिलाफ लड़ने का प्रलोभन होगा। शायद आप अभी भी ऐसा कर रहे हैं।

पतरस से कहे गए यीशु के शब्दों को दिल से लें: “अपनी तलवार म्यान में रख।” परमेश्वर के प्रेमी हाथ पर विश्वास करें, उसके आदेशों का पालन करें, और उसके मार्गदर्शन का अनुसरण करें। वह हमारे विश्वास का “कर्ता और सिद्ध करने” वाला है (इब्रानियों 12:2), और जिस कहानी को वह लिख रहा है, वह आपकी कल्पना से कहीं अधिक शानदार है।

भजन संहिता 23

10 अप्रैल : सभी राष्ट्रों के लिए शान्ति

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10 अप्रैल : सभी राष्ट्रों के लिए शान्ति
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“हे सिय्योन बहुत ही मगन हो! हे यरूशलेम, जयजयकार कर! क्योंकि तेरा राजा तेरे पास आएगा; वह धर्मी और उद्धार पाया हुआ है, वह दीन है, और गदहे पर वरन् गदही के बच्चे पर चढ़ा हुआ आएगा। मैं एप्रैम के रथ और यरूशलेम के घोड़े नष्ट करूँगा; और युद्ध के धनुष तोड़ डाले जाएँगे, और वह जाति–जाति से शान्ति की बातें कहेगा; वह समुद्र से समुद्र तक और महानद से पृथ्वी के दूर-दूर के देशों तक प्रभुता करेगा।” जकर्याह 9:9-10

एक जनसमूह के साथ यीशु के यरूशलेम में प्रवेश करने का घटनाक्रम नाटकीयता से भरा हुआ था।

सुसमाचारों में कई बार ऐसा हुआ है कि यीशु और उसके शिष्य भीड़ से दूर, जितना सम्भव हो सके, शान्त और गोपनीय रूप से अकेले कहीं चले जाते थे। यीशु के लिए यह सम्भव था कि वह किसी का ध्यान अपनी ओर खींचे बिना शहर में प्रवेश करे। इसके बजाय, उसने जानबूझकर तय किया कि वह यरूशलेम में इस तरीके से प्रवेश करेगा, जो उसे उस मसीह-राजा के रूप में घोषित करेगा, जिसकी पवित्रशास्त्र में लम्बे समय से प्रतिज्ञा की गई थी। हालाँकि, लोगों की यह अवधारणा कि यीशु का यहूदियों का राजा बनने का वास्तव में तात्पर्य क्या था, इतनी भ्रान्तिपूर्ण थी कि यीशु जो दिखाना चाह रहा था, उसे लोगों ने गलत समझ लिया। लोग पहले भी यीशु को बलपूर्वक राजा बनाने की कोशिश कर चुके थे, लेकिन वह उनसे बचकर चला गया था (यूहन्ना 6:14-15)। वह जानता था कि लोग क्या सोचते थे कि राजा को क्या करना चाहिए, और वह तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं करने आया था। लोगों का दृष्टिकोण गलत था। उस समय भी यही स्थिति तब थी जब यह समझा जा रहा था कि यीशु किसी राजनीतिक क्रान्ति में शामिल है। इस पर उसने उत्तर दिया, “मेरा राज्य इस संसार का नहीं है” (यूहन्ना 18:36)।

यरूशलेम में यीशु के विजयी प्रवेश के दौरान भीड़ के नारे जुनून, आशा, और भ्रम से भरे हुए थे। वे रोम की कब्जे के अधीन नहीं रहना चाहते थे। वे राष्ट्रीय पुनर्स्थापना और राजनीतिक क्रान्ति चाहते थे। उन्हें एक राजनीतिक नायक की आवश्यकता थी, और यीशु उनकी सबसे बड़ी उम्मीद था। ऐसा लगता है कि वे यह विश्वास कर रहे थे कि यीशु उन्हें कुछ ऐसा देने वाला था, जो उसने कभी देने का इरादा किया ही नहीं था। जब भीड़ ने “होसन्ना!” (अर्थात “हमें बचा!”) कहा, तो वे व्यक्तिगत, आध्यात्मिक उद्धार के बारे में नहीं सोच रहे थे; वे जो सोच रहे थे वह उनके वर्तमान समय की बात थी।

यदि हम सुसमाचार को अपनी सोच के केन्द्र में न रखें, तो हम भी इसी प्रकार के जुनून, आशा, और भ्रम का शिकार हो सकते हैं। आज भी, हममें से कई लोग अपने लिए एक ऐसा यीशु बना लेते हैं, जो हमारी अपनी अपेक्षाओं को पूरा कर सके, एक ऐसा “उद्धारकर्ता” जो हमारे लिए आराम, समृद्धि, या स्वास्थ्य लेकर आया है, जो हमारे परिवार, आस-पड़ोस, और राष्ट्र को आशीर्वाद देने आया है। लेकिन मसीह यरूशलेम में विजयी राष्ट्रवादी के रूप में रथ पर सवार होकर नहीं आया; वह तो शान्ति लाने वाले अन्तर्राष्ट्रीयवादी के रूप में विनम्रता से गधे पर सवार होकर आया। वह तो जकर्याह 9 की भविष्यवाणी को पूरा करने आया था, यह घोषणा करते हुए कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर उसके सिद्ध और सार्वभौमिक शासन में “सभी राष्ट्रों के लिए शान्ति” लाई जाएगी। यही सुसमाचार का सन्देश है—एक ऐसा सन्देश जो हर किसी के लिए, हर जगह, हमेशा अच्छा है। ऐसा नहीं कि हमारे सपने और माँगें उसके लिए बहुत बड़ी हैं, बल्कि यह कि वे बहुत छोटी हैं।

यीशु आज हमें यह चुनौती देता है, जैसे उसने अपने समय में लोगों को चुनौती दी थी कि हम उसकी आराधना वैसे करें जैसा वह है, वैसे नहीं जैसा हम उसे चाहते हैं। उसे हमारे कामों का हिस्सा मत बनाइए; इसे एक विशेषाधिकार मानिए कि आप उसके कामों का हिस्सा बनें।

जकर्याह 9:9-17

9 अप्रैल : सब नामों से ऊँचा नाम

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9 अप्रैल : सब नामों से ऊँचा नाम
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“मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। इस कारण परमेश्‍वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है।” फिलिप्पियों 2:8-9

एक प्रकार से बाइबल के सन्देश का सर्वोत्तम सार और इस सृष्टि का सबसे बुनियादी सत्य बस यह है: यीशु मसीह प्रभु है।

अधिकांश धर्मशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि जिस “नाम” का उल्लेख पौलुस ने पद 9 में किया है, केवल “प्रभु” ही हो सकता है (फिलिप्पियों 2:11)। यहाँ “प्रभु” के लिए प्रयुक्त यूनानी शब्द कुरियोस है, जिसका उपयोग यहोवा (याहवेह) के दिव्य नाम के रूप में 6,000 से अधिक बार सेप्टुआजिण्ट (पुराने नियम का यूनानी अनुवाद) में किया गया है—वह नाम जिसे आजकल अधिकांश अंग्रेजी बाइबलों में “प्रभु” के रूप में अनुवादित किया गया है। पौलुस पहले हमें यीशु के पृथ्वी पर रहने के दौरान उसकी दीनता के बारे में याद दिलाता है और फिर परमेश्वर के दिव्य नाम का उपयोग करके यीशु की दिव्यता को प्रमुख रूप से उजागर करता है।

याहवेह नाम चार व्यंजनाक्षरों (YHWH) से मिलकर बना है, जिसे इब्रानी में मूल रूप से उच्चारित करना असम्भव है—और ऐसा जानबूझकर किया गया था, क्योंकि यहूदी इस दिव्य नाम को अपने मुँह से उच्चारण करने का साहस नहीं करते थे। फिर भी, यह अद्वितीय परमेश्वर याहवेह पृथ्वी पर अवतरित हुआ और मसीह के रूप में स्वयं को मनुष्यों के सामने प्रकट किया। वह विनम्रता से क्रूस पर मर गया, और फिर उसे उच्चतम स्थान—उसका उचित स्थान—दिया गया और उस नाम से नवाजा गया जो “सब नामों से ऊँचा नाम है।” एक टिप्पणीकार ने कहा, “उसने अपरिभाष्य नाम को बदलकर एक ऐसा नाम बना दिया जिसे मनुष्य उच्चारित कर सके और जो पूरी दुनिया में जिसकी कामना की जा सके।” जिसने यह नाम धारण किया, परमेश्वर की दिव्यता उसमें “दया के वस्त्रों में सुसज्जित है।”[1]

पुराने नियम की भविष्यवाणी इस विचार को बार-बार मजबूत करती है। यशायाह 45 में, परमेश्वर एक ऐसी विशेषता का वर्णन करता है, जो केवल उसके स्वयं पर लागू होती है: “मुझे छोड़ कोई और दूसरा परमेश्‍वर नहीं है, धर्मी और उद्धारकर्ता परमेश्‍वर मुझे छोड़ और कोई नहीं है” (यशायाह 45:21)। पौलुस, जो पहले मसीह और उसके अनुयायियों का कट्टर विरोधी था, इस विशेष विवरण को मसीह पर लागू करता है, और उसकी दिव्यता का प्रभावशाली उद्‌घोष करता है। वह यह इंगित करता है कि यीशु को सार्वजनिक रूप से उसी महिमा से नवाजा गया है, जो उसके पृथ्वी पर हमारी खातिर अपमान सहने के लिए आने से पहले भी उचित रूप में उसकी थी। अब वह पिता के दाहिने हाथ विराजमान है। उसकी महिमा उन सभी के लिए दृष्टिगोचर है, जो उसे उद्धारकर्ता के रूप में जानते हैं। उसकी पहचान अस्पष्ट या संदिग्ध नहीं है।

एकमात्र उद्धारकर्ता केवल परमेश्वर है—और वह उद्धारकर्ता यीशु ही है, जिसके बारे में कहा गया था, “तू उसका नाम यीशु रखना, क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा” (मत्ती 1:21)। वर्षों बाद, जब पौलुस की आँखें यीशु के बारे में सत्य के लिए खुल चुकी थीं, तौभी फिलिप्पियों को लिखे गए उसके शब्दों में हम श्रद्धा और प्रेम का अनुभव महसूस कर सकते हैं। यीशु मसीह प्रभु है। उसका नाम सब नामों से ऊँचा है। पौलुस ने इस सत्य से परिचित होने के बावजूद इस पर कभी भी लापरवाही नहीं दिखाई। हमें भी ऐसा नहीं करना चाहिए। अब रुकें और हर शब्द को इस अद्‌भुत व्यक्ति की प्रशंसा में एक श्रद्धा भरी स्तुति के रूप में आने दें: यीशु, अपने लोगों का उद्धारकर्ता . . . मसीह, लम्बे समय से प्रतिज्ञा किया गया राजा . . . प्रभु है, जो अवर्णनीय, प्रकट परमेश्वर है। और आप उसे “भाई” कह सकते हैं (इब्रानियों 2:11)।

 प्रकाशितवाक्य 1:9-20

8 अप्रैल : परमेश्वर अपने लोगों को इंसाफ दिलाता है

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8 अप्रैल : परमेश्वर अपने लोगों को इंसाफ दिलाता है
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“जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो। हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्‍वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, ‘बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।’ . . . बुराई से न हारो, परन्तु भलाई से बुराई को जीत लो।” रोमियों 12:18-19, 21

कल्पना करें कि एक बच्चा स्कूल से घर आता है और बहुत दुखी है, क्योंकि किसी अन्य बच्चे ने उसे कुछ बुरा कहा या उसके साथ कुछ बुरा किया है। एक ऐसी चोट के कारण, जो पहाड़ से भी बड़ी लग रही है, उसके लिए यह सोचना आसान होगा कि वह उस बच्चे से अब कभी बात नहीं करेगा जिसने उसे दुख पहुँचाया, या वह यह योजना बनाने लगे कि एक दिन मैं अपना बदला जरूर लूँगा।

लेकिन साथ ही यह भी कल्पना करें कि उसके माता-पिता उसे साधारण शब्दों में यह सन्देश लिखने का सुझाव देते हैं, जिसमें वह माफ़ी और दोस्ती, दोनों को प्रकट करता है, और अगले दिन, ऐसा करने के बाद, वह खुशी से खबर देता है: “मैंने यह कर दिया! मैं स्कूल में वह सन्देश लेकर गया और उससे काम बन गया। हम गले मिले, और हम दोस्त बन गए। यह शानदार था!”

पौलुस के इस आह्वान का पालन करने का अर्थ यही है, कि “जहाँ तक तुम्हारे ऊपर निर्भर हो, शान्ति से रहो।” कभी-कभी, शान्ति असम्भव महसूस हो सकती है; लेकिन कभी भी ऐसा न हो कि यह हमारी खुद की कमी के कारण हो। और यह इस कारण भी न हो क्योंकि हम बदला लेने की कोशिश कर रहे हैं या योजना बना रहे हैं। बदला लेना तो केवल परमेश्वर का काम है, उसके लोगों का नहीं।

सच कहूँ तो, हमारे अधिकांश विवाद वास्तव में बचपन में होने वाली घटनाओं के बड़े संस्करण होते हैं। अन्याय के सामने हमारी प्रतिक्रिया यह बताती है कि वास्तव में हमारा विश्वास क्या है। क्या हम “बुराई के बदले बुराई” (1 पतरस 3:9) करेंगे, जो दुनिया का तरीका है, या क्या हम मसीह के मन के अनुसार प्रतिक्रिया करेंगे?

हमारे सभी संघर्ष और चोटें उस दर्द के सामने कुछ नहीं हैं, जो यीशु ने सहा और महसूस किया। फिर भी जब यीशु का अपमान किया गया, तो उसने बदले में अपमान नहीं किया। जब उसने दुख उठाया, तो उसने शाप या धमकी नहीं दी। हमें यह बड़ी गलती नहीं करनी चाहिए कि हम यीशु की मुक्ति को तो स्वीकार कर लें, लेकिन उसके उदाहरण को नजरअंदाज कर दें, और अपने नाम को साफ करने, अपने इरादों का पक्ष रखने, और अपने आप को स्पष्ट करने में अपना जीवन बर्बाद कर दें, और हर गलती के लिए भुगतान और हर अपमान के लिए प्रतिशोध की तलाश करते रहें। स्वाभाविक रूप से हमारे साथ ऐसा ही होता है; और हमें उस रास्ते से छुटकारा पाने के लिए यह याद रखना चाहिए कि हम परमेश्वर पर विश्वास कर सकते हैं कि वह अपने लोगों को समय पर इंसाफ दिलाएगा। इंसाफ होगा, और यह हम नहीं करेंगे। तो क्या कोई है, जिससे आपको शान्ति से सम्पर्क करने की आवश्यकता है? क्या कोई है, जिसे आप अपने क्रोध का सामना करा रहे हैं, बजाय इसके कि आप उसे अपना प्रेम दिखाएँ? प्रिय मित्र, प्रतिशोध को परमेश्वर पर छोड़ दो, और बुराई को अच्छाई से हराओ। आज ही।

1 पतरस 2:18-25

7 अप्रैल : तुम शुद्ध हो जाओगे

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7 अप्रैल : तुम शुद्ध हो जाओगे
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“तब एलीशा ने एक दूत से उसके पास यह कहला भेजा, ‘तू जाकर यरदन में सात बार डुबकी मार, तब तेरा शरीर ज्यों का त्यों हो जाएगा, और तू शुद्ध होगा।’ परन्तु नामान क्रोधित हो . . . चला गया!”

2 राजाओं 5:10-11

इतिहास और समाजशास्त्र का संक्षिप्त अध्ययन भी यह स्पष्ट कर देता है कि मनुष्यजाति अपने टूटे हुए संसार को ठीक करने में असमर्थ है। कुछ समय पहले, हमें यह बताया गया था कि लोग बुरे काम इसलिए करते हैं क्योंकि वे गरीब हैं; यदि हम भौतिक जरूरतों का समाधान करते हैं, तो हम बेहतर व्यवहार देख पाएँगे। अब, दुनिया के कुछ सबसे समृद्ध देशों में, कुछ समाजशास्त्री यह बताते हैं कि लालच, भ्रष्टाचार और हत्या का कारण अधिक भौतिक सम्पत्ति होना है। विशेषज्ञ और वैश्विक नेता इन बाहरी ताकतों के सामने हैरान हैं, और गलत जगहों पर उत्तर ढूँढ रहे हैं।

नामान को एक ऐसा रोग था, जिसने उसे दुखी किया हुआ था और उसके लिए इससे निपटना काफी कठिन था। किसी भी प्रकार का इलाज करने के लिए उसके पास सारे आवश्यक संसाधन मौजूद थे, और वह सम्भवतः किसी भी हद तक जाने को तैयार था। समस्या यह थी कि वह उत्तर को गलत जगहों पर खोज रहा था। उसका रुतबा, सम्पत्ति, और शाही सम्बन्ध उसे वह इलाज नहीं दिला पाए जो वह चाहता था, और जब वह राहत के लिए इस्राएल के राजा के पास गया, तो उसके अनुरोध से उसे निराशा ही हाथ लगी; राजा ने अपने कपड़े फाड़ डाले क्योंकि उसे पता था कि वह उसकी मदद नहीं कर सकता था (2 राजाओं 5:7)।

राजा की प्रतिक्रिया उसी प्रकार की प्रतिक्रिया थी जो शायद हमारे वैश्विक नेता सार्वजनिक सेवा में कुछ करने की कोशिश करते हुए देश-विदेश की यात्राओं के दौरान महसूस करते हैं। रात के समय शायद वे भी ऐसा ही महसूस करते होंगे कि हम भी अपने कपड़े फाड़ते हुए कहें, “मैं इस मामले को कैसे सुलझाऊँ और कुछ अन्तर लाऊँ? हम शान्ति कैसे ला सकते हैं? हम इलाज कैसे ला सकते हैं?”

जो काम राजा नहीं कर सका, वह परमेश्वर के भविष्यवक्ता ने कर दिया। लेकिन वह इलाज उस कोढ़ी के लिए अपमानजनक लग रहा था! नामान कुछ भव्य चाहता था—कुछ ऐसा जो उसकी उच्च स्थिति के अनुकूल हो और उसे आत्म-महत्त्व का एक झूठा अहसास दिलाए। वह सोचता था कि इलाज सरल या कम प्रभावशाली नहीं होना चाहिए। उसने एलीशा के उपाय को अपमानजनक और हास्यास्पद माना।

जहाँ वास्तविक कुष्ठ रोग को काफी हद तक समाप्त कर दिया गया है, वहीं हम सभी उस कुरूप और घातक बीमारी के साथ जी रहे हैं, जिसे पाप कहा जाता है। फिर भी बहुत से लोग इसके इलाज को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं, जैसे नामान तैयार नहीं था। हमारे पाप के एकमात्र और पर्याप्त इलाज के तौर पर मसीह के क्रूस पर मरने का सन्देश “यहूदियों के लिए ठोकर का कारण और अन्यजातियों के लिए मूर्खता है” (1 कुरिन्थियों 1:23) और यह आज भी बहुत से लोग ऐसा ही सोचते हैं। यहाँ तक कि विश्वासियों के लिए भी यह परीक्षा का कारण बन सकता है कि जब पाप के इलाज की बात आती है, तो हमें खुद कुछ करना होगा।हमें रोज़ाना उस इलाज के लिए अपनी आँखें खोलनी चाहिएँ, जिसकी हमें आवश्यकता है और विनम्रता में झुकना चाहिए, जैसा कि नामान ने अन्ततः किया (2 राजाओं 5:14)। क्योंकि ऐसा करने वाला व्यक्ति जान सकता है कि “तू शुद्ध होगा” अब अतीत की बात है, और वह खुशी से यह स्वीकार कर सकता है कि यीशु उसे देखता है और कहता है, “तुम शुद्ध हो” (यूहन्ना 13:10-11; 15:3)। आईने में देख कर यह न सोचें कि आपका इलाज आपके रुतबे में या आपके कामों में है; इसके बजाय, विश्वास की खिड़की से देखें, क्रूस को देखें, और जानें कि यह सब उसने किया है।

   2 राजाओं 5:1-14

6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान

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6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान
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मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्तुएँ तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्ध, ग्रहण करने योग्य बलिदान है, जो परमेश्‍वर को भाता है।” फिलिप्पियों 4:18

यह आपके सोचने के लिए एक अद्‌भुत विचार है: आप परमेश्वर को प्रसन्न करने में सक्षम हैं।

यह एक चौंकाने वाला विचार है: कि हमारा सृष्टिकर्ता हमारे कार्यों से प्रसन्न होगा। फिर भी पवित्रशास्त्र हमें इस वास्तविकता को देखने के लिए प्रोत्साहित करता है। मसीही होने के नाते, हम अपने स्वर्गिक पिता की मुस्कान के तहत जीने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के लिए एक बाइबल में दी गई यह प्रेरणा एक बड़ा प्रोत्साहन है, “जैसे तुमने . . . परमेश्वर को प्रसन्न करना सीखा है . . . वैसे ही और भी बढ़ते जाओ” (1 थिस्सलुनीकियों 4:1)—और इसे करने का एक तरीका हमारा उदारता से दिया जाने वाला दान है, जो परमेश्वर के समक्ष “ग्रहण करने योग्य बलिदान” है। पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया के दान को पुराने नियम के पशु बलिदान के अभ्यास की शब्दावली में व्यक्त किया। जब पुराने नियम में परमेश्वर के लोग अपने होमबलि लाते थे, तो उन बलिदानों के साथ धूप भी जलाया जाता था। इसलिए इस बलिदान से एक आकर्षक सुगन्ध आती थी। एक भाव में, यह परमेश्वर की दृष्टि में बलिदान की मिठास और स्वीकृति का प्रतीक था। उसी तरह, परमेश्वर पहली शताब्दी में और अब इक्कीसवीं शताब्दी में अपने लोगों कहता है, जब तुम्हारा दान मेरे साथ मेल खाते हुए दिल से आता है, तो यह एक मधुर सुगन्ध उत्पन्न करता है, और तुम्हारा बलिदान मुझे प्रसन्न करता है।”

जब हम इस प्रकार के दान पर विचार करते हैं, तो हमें “बलिदान” शब्द को जल्दी से अनदेखा नहीं कर देना चाहिए। बलिदानी दान हमेशा उदार दान के समान नहीं होता। हमारे लिए यह सम्भव है कि हम उदार हों—जैसा कि सच में कई विश्वासियों होते हैं—बिना इसके कि हमारे जीवन या परिस्थितियों पर इसका कोई वास्तविक प्रभाव पड़े।

इसी बिन्दु को स्पष्ट करते हुए, यीशु ने अपने शिष्यों का ध्यान एक गरीब विधवा की ओर आकर्षित किया, जो मन्दिर में अपनी दशमाँश राशि दे रही थी। जब उसने देखा कि यह महिला ताम्बे के दो सिक्के, जो कुछ भी मूल्य नहीं रखते थे, खजाने में डाल रही थी तो उसने उसके आस-पास खड़े अमीर लोगों के उपहारों से उसकी तुलना करते हुए कहा, “इस कंगाल विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है। क्योंकि उन सबने अपनी-अपनी बढ़ती में से दान में कुछ डाला है, परन्तु इसने अपनी घटी में से अपनी सारी जीविका डाल दी है” (लूका 21:2-4)। अमीर लोगों का दान उदार था; परन्तु विधवा का दान बलिदानी था। उसने दान देने के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। और उसके प्रभु ने देखा और जो उसने देखा उससे प्रसन्न हुआ।

हम स्वभाव से बलिदानी दाता नहीं हैं। लेकिन पूरी मसीही यात्रा—प्राप्ति और दान में, देखभाल और साझेदारी में—आरम्भ से लेकर अन्त तक कृपा से भरी हुई है। जब हम एक ऐसे दिल से बलिदानी रूप में देते हैं, जो परमेश्वर को प्रसन्न करने की इच्छा करता है, तो वह वचन देता है कि वह “अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है, तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा” (फिलिप्पियों 4:19)। इसका भाव यह है कि हम मनन करें कि परमेश्वर ने हमें क्या दिया है, और परमेश्वर हमें क्या दे रहा है, और परमेश्वर हमें क्या देगा। जब हम ऐसा करते हैं, तो इससे हमारे दिल खुल जाते हैं और हम बलिदानी रूप से और खुशी से देने की शक्ति पाते हैं। और जब हम ऐसा करते हैं, तो हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।

फिलिप्पियों का व्यवहार, और उनके खाते का विवरण, यह दिखाता है कि वे वास्तव में इस पर विश्वास करते थे। आपके विवरण कितने हद तक इस विश्वास को दर्शाते हैं?

1 थिस्सलुनीकियों 4:1-12

5 अप्रैल : परमेश्वर का शासन और आशीर्वाद

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5 अप्रैल : परमेश्वर का शासन और आशीर्वाद
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“इसलिए अब यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, और मेरी वाचा का पालन करोगे, तो सब लोगों में से तुम ही मेरा निज धन ठहरोगे; समस्त पृथ्वी तो मेरी है।” निर्गमन 19:5

आज्ञाकारिता का महत्त्व आज की दुनिया में कम हो गया है, लेकिन यह मसीही जीवन का केन्द्र है।

यह असामान्य नहीं है कि हम अच्छे से अच्छे लोगों को भी अधिकार के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त करते हुए सुनें, क्योंकि हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जो अधिकार-विरोधी है। एक समय में कलीसिया में पवित्र माना जाने वाला पवित्रशास्त्र का अधिकार आज कुछ लोगों के मन में सहजता से नहीं बसता। लेकिन जब हम अपनी शर्तों पर और परमेश्वर के अधिकार से हटकर स्वतन्त्रता पाने का प्रयास करते हैं, तो हम स्वयं को उसके आशीर्वाद से भी वंचित कर लेते हैं।

जब आदम और हव्वा ने अदन की वाटिका में परमेश्वर के नियम का उल्लंघन किया, तो वे उससे अलग हो गए; उन्होंने उसकी उपस्थिति के आशीर्वाद को खो दिया। परमेश्वर की व्यवस्था को अस्वीकार करने से हम हमेशा, और हमेशा ही, अपने सृष्टिकर्ता से दूर हो जाएँगे और उसके आशीर्वाद को खो बैठेंगे। इसके विपरीत, परमेश्वर के शासन की पुनःस्थापना हमेशा उस संगति और सहभागिता का आशीर्वाद लाती है, जिसे परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए बनाया था।

परमेश्वर के शासन और आशीर्वाद की यह प्रतिज्ञा इस्राएल के इतिहास में उसकी व्यवस्था के दान में पूरी हुई। इस्राएलियों की ओर से व्यवस्था के प्रति आज्ञाकारिता उनके लिए उद्धार प्राप्त करने का पुरज़ोर प्रयास नहीं थी; बल्कि यह उस उद्धार के प्रति एक प्रतिक्रिया थी जो पहले ही उनके लिए पूरा हो चुका था। परमेश्वर पहले अपने लोगों के पास पहुँचा और उन्हें थाम लिया, उन्हें मिस्र की दासता से छुड़ाया—और उसके बाद उन्हें व्यवस्था दी गई।

दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने व्यवस्था को उद्धार के साधन के रूप में या उसके लोगों में शामिल होने का मार्ग बनाने के लिए नहीं दिया। इसके बजाय, इस्राएलियों को छुड़ाने के बाद उसने उन्हें अपनी कृपा का माध्यम प्रदान किया ताकि वे यह जान सकें कि उसके शासन के अधीन कैसे जीना है और उसके आशीर्वाद का पूरा आनन्द कैसे लेना है। यदि इस सिद्धान्त को उल्टा कर दिया जाए, तो सब कुछ गलत हो जाता है। हम कर्मकाण्डवाद की कठोर पकड़ में अपना जीवन बिताएँगे, हर समय यह सोचते हुए कि हमारे प्रयास हमें परमेश्वर के सामने सही स्थिति में ला सकते हैं। लेकिन साथ ही, यदि हम यह भूल जाते हैं कि परमेश्वर ने हमें इसलिए बचाया ताकि हम उसके शासन के अधीन जीवन का आनन्द ले सकें, और हम जब चाहें उसकी व्यवस्थाओं को अनदेखा करना जारी रखते हैं, तो हम अपने जीवन में यह सोच-सोचकर परेशान होते रहेंगे कि उसके आशीर्वाद हमसे दूर क्यों रहते हैं।

परमेश्वर की व्यवस्था उद्धार नहीं देती, लेकिन यह “सम्पूर्ण व्यवस्था है, स्वतन्त्रता की व्यवस्था,” और जो इसका पालन करता है, वह “अपने काम में आशीर्वाद पाएगा” (याकूब 1:25)। परमेश्वर द्वारा पाप से छुड़ाए गए लोगों के रूप में हमें उसके उद्धार का उत्तर हर्षित आज्ञाकारिता में चलने के द्वारा देना है।

जब हम प्रभु के साथ चलते हैं

उसके वचन के प्रकाश में,

तो कैसी महिमा हमारे मार्ग पर पड़ती है!

जब हम उसकी भली इच्छा पूरी करते हैं,

वह हमारे साथ बना रहता है,

और उन सब के साथ जो विश्वास करेंगे और आज्ञापालन करेंगे।[1]

भजन 119:49-64

4 अप्रैल : पवित्रशास्त्र में मसीह को देखना

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4 अप्रैल : पवित्रशास्त्र में मसीह को देखना
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“हे इस्राएलियो, ये बातें सुनो : यीशु नासरी . . .” प्रेरितों 2:22

हर गुजरते वर्ष के साथ, मैंने महसूस किया है कि आधी रात को जागना मेरी एक आदत हो गई है। जब आधी रात को मैं नींद से उठता हूँ, तो अक्सर चिन्ता मेरे विचारों में भर जाती है—और एक पास्टर के रूप में मेरी एक चिन्ता यह भी है: क्या मैं मसीह को सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के अन्दर और पवित्रशास्त्र के द्वारा देख रहा हूँ और सिखा रहा हूँ?

यह सम्भव है कि हम बाइबल का अध्ययन मसीह को अपने केन्द्र में रखे बिना करें। हम अपने अध्ययन के व्यवस्थित तरीके से करने पर गर्व कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करते हुए हम इस खतरे में पड़ सकते हैं कि हम अपनी पद्धति पर इतने मोहित हो जाएँ कि हम मसीह को देखने में विफल हो जाएँ।

प्रेरितों के काम 2 में, जब पतरस भीड़ को सम्बोधित करता है, तो वह कहता है, “हे इस्राएलियो, ये बातें सुनो।” (उसकी आवाज़ में अधिकार स्पष्ट दिखता है, है न?) और फिर ध्यान दें कि उसके बाद वह क्या कहता है: “यीशु नासरी . . .।” पतरस अपनी बात लोगों की आवश्यकता पर जोर देते हुए या सुसमाचार के व्यावहारिक लाभ प्रस्तुत करते हुए आरम्भ नहीं करता, और न ही वह किसी प्रकार की सैद्धान्तिक शिक्षा को समझाने या प्रस्तावों की शृंखला पेश करने का प्रयास करता है। इसके बजाय, वह यह बताता है कि यीशु कौन हैं, वह क्यों आया, और उसने क्या किया।

पतरस की शिक्षा दिल तक पहुँचने वाली, अनुग्रह में जमी हुई और मसीह पर केन्द्रित थी। इस प्रकार की शिक्षा के लिए एक कीमत चुकानी पड़ती है—एक ऐसी कीमत जिसे हर कोई चुकाने के लिए तैयार नहीं होता। दिन-प्रतिदिन के मुद्दों पर चर्चा करना मसीह को गहराई से जानने और साझा करने की तुलना में कहीं अधिक आसान है। कभी-कभी उन कलीसियाओं में भी, जो बाइबल को अत्यन्त सम्मान देती हैं, हम अपनी पसंदीदा सैद्धान्तिक शिक्षाओं के बारे में बात करना अधिक सहज समझते हैं, बजाय उस मसीह के, जो अक्सर हमें असहज कर देता है और हमारे जीवन के तरीकों को चुनौती देता है। लेकिन कठिन कार्य करना ही सही कार्य है। क्या यह उर्जा की भयानक बर्बादी नहीं है कि हम हर चीज़ में अन्तर्दृष्टि प्राप्त करें या मार्गदर्शन दें, परन्तु यीशु के उद्धार की कहानी पर कोई बात ही न करें?

पवित्रशास्त्र का केन्द्र और उसकी पूर्ति मसीह में है। इस बात का असली परीक्षण कि परमेश्वर का वचन हमारे भीतर कितनी गहराई से निवास करता है, यह नहीं है कि हम कहानी को कितनी अच्छी तरह से व्यक्त कर सकते हैं, बल्कि यह है कि हम पवित्रशास्त्र में यीशु को कितना देख पाते हैं। मसीह केवल मसीही विश्वास का आरम्भ नहीं हैं, बल्कि वह उसका पूर्ण योग है। हमारा लक्ष्य मसीह में गहराई तक जाना होना चाहिए, उससे परे आगे बढ़ जाना नहीं।

शायद जब भी हम अपनी बाइबल के पृष्ठ खोलें, तो हमारी प्रार्थना यह होनी चाहिए:

यीशु के बारे में और अधिक जानूँ,

उसके अनुग्रह को दूसरों को दिखाऊँ;

उसके उद्धार की परिपूर्णता को और अधिक देखूँ,

उसके प्रेम को और समझूँ, जिसने मेरे लिए प्राण दिए।

यीशु के बारे में और अधिक सीखूँ,

उसकी पवित्र इच्छा को और अधिक पहचानूँ;

परमेश्वर की आत्मा, मेरे शिक्षक बनो,

मुझे मसीह के विषय में सिखाओ।[1]

 लूका 24:13-35