“हे इस्राएलियो, ये बातें सुनो : यीशु नासरी . . .” प्रेरितों 2:22
हर गुजरते वर्ष के साथ, मैंने महसूस किया है कि आधी रात को जागना मेरी एक आदत हो गई है। जब आधी रात को मैं नींद से उठता हूँ, तो अक्सर चिन्ता मेरे विचारों में भर जाती है—और एक पास्टर के रूप में मेरी एक चिन्ता यह भी है: क्या मैं मसीह को सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के अन्दर और पवित्रशास्त्र के द्वारा देख रहा हूँ और सिखा रहा हूँ?
यह सम्भव है कि हम बाइबल का अध्ययन मसीह को अपने केन्द्र में रखे बिना करें। हम अपने अध्ययन के व्यवस्थित तरीके से करने पर गर्व कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करते हुए हम इस खतरे में पड़ सकते हैं कि हम अपनी पद्धति पर इतने मोहित हो जाएँ कि हम मसीह को देखने में विफल हो जाएँ।
प्रेरितों के काम 2 में, जब पतरस भीड़ को सम्बोधित करता है, तो वह कहता है, “हे इस्राएलियो, ये बातें सुनो।” (उसकी आवाज़ में अधिकार स्पष्ट दिखता है, है न?) और फिर ध्यान दें कि उसके बाद वह क्या कहता है: “यीशु नासरी . . .।” पतरस अपनी बात लोगों की आवश्यकता पर जोर देते हुए या सुसमाचार के व्यावहारिक लाभ प्रस्तुत करते हुए आरम्भ नहीं करता, और न ही वह किसी प्रकार की सैद्धान्तिक शिक्षा को समझाने या प्रस्तावों की शृंखला पेश करने का प्रयास करता है। इसके बजाय, वह यह बताता है कि यीशु कौन हैं, वह क्यों आया, और उसने क्या किया।
पतरस की शिक्षा दिल तक पहुँचने वाली, अनुग्रह में जमी हुई और मसीह पर केन्द्रित थी। इस प्रकार की शिक्षा के लिए एक कीमत चुकानी पड़ती है—एक ऐसी कीमत जिसे हर कोई चुकाने के लिए तैयार नहीं होता। दिन-प्रतिदिन के मुद्दों पर चर्चा करना मसीह को गहराई से जानने और साझा करने की तुलना में कहीं अधिक आसान है। कभी-कभी उन कलीसियाओं में भी, जो बाइबल को अत्यन्त सम्मान देती हैं, हम अपनी पसंदीदा सैद्धान्तिक शिक्षाओं के बारे में बात करना अधिक सहज समझते हैं, बजाय उस मसीह के, जो अक्सर हमें असहज कर देता है और हमारे जीवन के तरीकों को चुनौती देता है। लेकिन कठिन कार्य करना ही सही कार्य है। क्या यह उर्जा की भयानक बर्बादी नहीं है कि हम हर चीज़ में अन्तर्दृष्टि प्राप्त करें या मार्गदर्शन दें, परन्तु यीशु के उद्धार की कहानी पर कोई बात ही न करें?
पवित्रशास्त्र का केन्द्र और उसकी पूर्ति मसीह में है। इस बात का असली परीक्षण कि परमेश्वर का वचन हमारे भीतर कितनी गहराई से निवास करता है, यह नहीं है कि हम कहानी को कितनी अच्छी तरह से व्यक्त कर सकते हैं, बल्कि यह है कि हम पवित्रशास्त्र में यीशु को कितना देख पाते हैं। मसीह केवल मसीही विश्वास का आरम्भ नहीं हैं, बल्कि वह उसका पूर्ण योग है। हमारा लक्ष्य मसीह में गहराई तक जाना होना चाहिए, उससे परे आगे बढ़ जाना नहीं।
शायद जब भी हम अपनी बाइबल के पृष्ठ खोलें, तो हमारी प्रार्थना यह होनी चाहिए:
यीशु के बारे में और अधिक जानूँ,
उसके अनुग्रह को दूसरों को दिखाऊँ;
उसके उद्धार की परिपूर्णता को और अधिक देखूँ,
उसके प्रेम को और समझूँ, जिसने मेरे लिए प्राण दिए।
यीशु के बारे में और अधिक सीखूँ,
उसकी पवित्र इच्छा को और अधिक पहचानूँ;
परमेश्वर की आत्मा, मेरे शिक्षक बनो,
मुझे मसीह के विषय में सिखाओ।[1]
लूका 24:13-35