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11 जून : खुला कान, तत्पर इच्छा

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11 जून : खुला कान, तत्पर इच्छा
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“तब प्रभु ने उससे कहा, ‘उठकर उस गली में जा जो ‘सीधी’ कहलाती है, और यहूदा के घर में शाऊल नामक एक तरसुसवासी को पूछ; क्योंकि देख, वह प्रार्थना कर रहा है।’” प्रेरितों 9:11

बाइबल में, प्रेरितों 9 से पहले हनन्याह का कोई उल्लेख नहीं है, और इसके बाद भी केवल एक संक्षिप्त उल्लेख (प्रेरितों 22:12) है। इन दोनों उल्लेखों के अनुसार वह कोई महान व्यक्ति नहीं था, जिसने संसार के मापदण्डों के अनुसार कोई महान कार्य किए थे। फिर भी, परमेश्वर ने उसके भीतर एक विश्वासपूर्ण हृदय देखा और उसे शाऊल (जो बाद में पौलुस के नाम से जाना गया) के जीवन-परिवर्तन की प्रक्रिया में अद्‌भुत रीति से उपयोग किया।

हनन्याह की तरह शायद आपने भी अपने जीवन में कोई महान कार्य नहीं किए होंगे, अद्‌भुत स्थानों पर नहीं गए होंगे, या कोई बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त नहीं की होगी। लेकिन परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को चुनता है और उन्हें अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए उपयोग करता है। हमारा भाग बस इतना है कि हम हनन्याह की तरह हों, अर्थात कान खुले रखें और अपनी इच्छा को परमेश्वर को सुनने और उसकी आज्ञा को मानने के लिए तैयार रखें।

इस पद में जो मुख्य बात है वह यह नहीं है कि परमेश्वर ने हनन्याह से कैसे बात की, बल्कि यह है कि हनन्याह ने कैसे प्रतिक्रिया दी: “हाँ, प्रभु।” उसका कान परमेश्वर को सुनने के लिए तैयार था। क्या आपके कान भी ऐसे हैं? क्या आप परमेश्वर को उसके वचन के माध्यम से बोलते हुए सुनते हैं? क्या आपके हृदय की अवस्था ऐसी है कि जो कुछ भी वह आपको करने के लिए बुला रहा है, आप कहेंगे, “हाँ, प्रभु”?

जब हम विचार करते हैं कि परमेश्वर ने हनन्याह से क्या करने को कहा और किसके लिए कहा, तो उसका परमेश्वर को दिया गया उत्तर उल्लेखनीय प्रतीत होता है। उसने “इस मनुष्य [शाऊल] के विषय में बहुतों से सुना है कि इसने यरूशलेम में तेरे पवित्र लोगों के साथ बड़ी–बड़ी बुराइयाँ की हैं” और वह जानता था कि दमिश्क में भी शाऊल को “प्रधान याजकों की ओर से अधिकार मिला है कि जो लोग तेरा नाम लेते हैं, उन सब को बाँध ले” (प्रेरितों 9:13-14)। फिर भी उसने शाऊल और उसकी गतिविधियों के प्रति किसी भी डर या नफरत के बावजूद परमेश्वर के बुलावे का पालन करने का निर्णय लिया। उसने सुना, और उसने कार्य किया।

हम कितनी बार परमेश्वर के बुलावे के जवाब में अपनी निष्क्रियता के लिए बहाने बनाते हैं? हम कितनी बार अपने डर के पीछे छिपते हैं या अत्यधिक सावधानी से जीते हैं और यह भूल जाते हैं कि “परमेश्‍वर ने हमें भय की नहीं पर सामर्थ्य और प्रेम और संयम की आत्मा दी है” (2 तीमुथियुस 1:7)? हनन्याह ने अपने आज्ञापालन के माध्यम से इस शक्तिशाली आत्मा का प्रदर्शन किया।

हमारी संस्कृति बड़े नामों, बड़ी उपलब्धियों, और बड़ी रेटिंग्स की परवाह करती है। परमेश्वर के पास वही प्राथमिकताएँ नहीं हैं। हनन्याह का कोई बड़ा नाम या भारी लोकप्रियता नहीं थी; उसके पास बस परमेश्वर की आवाज़ सुनने के लिए एक खुला कान था और उसकी आज्ञा का पालन करने की इच्छाशक्ति थी। इसके परिणामस्वरूप उसका जीवन परमेश्वर की सेवा में उपयोगिता के लिए समर्पित हुआ। और उस दिन, इसका अर्थ यह हुआ कि वह पहला ऐसा व्यक्ति था जिसने पौलुस के पास जाकर उसे “भाई” कहकर परमेश्वर का प्रेम और अनुग्रह उसपर प्रकट किया (प्रेरितों 9:17)। इस प्रकार, भले ही वह बाइबल में केवल एक छोटा सा पात्र हों, फिर भी आप और मैं उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।

हो सकता है कि इस जीवन में मसीह के प्रति आपकी विश्वासयोग्यता के लिए आपको कोई पहचान न मिले। हो सकता है कि आप उसकी सेवा में जोखिम उठा रहे हों और बलिदान कर रहे हों और महसूस कर रहे हों कि इससे कुछ ज्यादा अन्तर नहीं आ रहा और इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा। लेकिन यह संसार आपको जो कुछ भी दे सकता है, उससे कहीं बेहतर है कि जब आप स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे, तो आप परमेश्वर से यह सुनेंगे, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास” (मत्ती 25:21)। उसकी सेवा में किया गया कोई भी अच्छा कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता। वह इसे उद्धार की महान गाथा में बुन देता है।

यशायाह 6:1-13

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 18–19; मत्ती 23:23-39 ◊

10 जून : न्याय, कृपा, और नम्रता

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10 जून : न्याय, कृपा, और नम्रता
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“हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्‍वर के साथ नम्रता से चले?” मीका 6:8

जब अठारहवीं सदी के भजनकार और प्रचारक जॉन न्यूटन ने इस पद पर प्रवचन दिया, तो उन्होंने अपने प्रवचन का शीर्षक दिया, “मसीह के सुसमाचार के बिना परमेश्वर के पास कोई नहीं पहुँच सकता।” उन्होंने ऐसा शीर्षक क्यों रखा, जिसका इस पद से कोई सम्बन्ध नहीं लगता? न्यूटन ने खुद टिप्पणी की, “बाइबल का शायद ही कोई ऐसा पद हो जिसे इससे अधिक गलत समझा गया हो।”[1]

ऐसा लगता है कि उन्होंने अपने प्रवचन का यह शीर्षक सामान्य गलतफहमियों को ठीक करने के उद्देश्य से रखा था।

न्यूटन का शीर्षक हमें यह सावधान करता है कि हमें यहाँ जो गुण बताए गए हैं, उन्हें पढ़ने के बाद सुसमाचार के बिना जीने की कोशिश न करें, या सुसमाचार के स्थान पर इन्हें परमेश्वर के पास पहुँचने का तरीका मानकर इनका प्रचार न करें। इनमें से कोई भी उस उद्देश्य को पूरा नहीं करता जो भविष्यद्वक्ता—और प्रभु—ने चाहा था। मीका 6:8 को समझने का सबसे अच्छा तरीका यह नहीं है कि इसे ऐसे कार्यों की सूची माना जाए, जो हमारे धर्मी ठहराए जाने में योगदान करती हैं, बल्कि इन्हें हमारे धर्मी ठहराए जाने के प्रमाण के रूप में देखा जाना चाहिए। जब हम इसे इस तरह से देखते हैं और उचित प्रेरणा तथा लक्ष्य स्थापित करते हैं, तो हम समझ सकते हैं कि परमेश्वर ने इस्राएल को और हमें क्या करने के लिए बुलाया है।

पहले, परमेश्वर हमें मीका के माध्यम से “न्याय से काम” करने के लिए कहता है। इसका अर्थ है परमेश्वर की इच्छा और उद्देश्य के अनुसार कार्य करने का संकल्प लेना। उदाहरण के लिए, व्यवस्थाविवरण की पुस्तक में मूसा कहता है कि परमेश्वर “अनाथों और विधवा का न्याय चुकाता, और परदेशियों से ऐसा प्रेम करता है कि उन्हें भोजन और वस्त्र देता है” (व्यवस्थाविवरण 10:18)। हम उन चीजों के बारे में परवाह करना चाहते हैं जिनकी परमेश्वर को परवाह है, जिसका अर्थ है कि हम इन प्राथमिकताओं को गम्भीरता से लें और “जहाँ तक अवसर मिले हम सबके साथ भलाई करें, विशेष करके विश्वासी भाइयों के साथ।” (गलातियों 6:10)।

दूसरे, परमेश्वर हमें “कृपा से प्रीति” रखने के लिए कहता है। यदि न्याय करना क्रिया है, तो कृपा से प्रेम करना हृदय की वह भावना है जो इसे प्रेरित करती है। यह स्नेहपूर्ण सहानुभूति है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि हम न्याय का पालन केवल किसी कर्तव्य की तरह नहीं, बल्कि उदारता की खुशी के साथ करें।

तीसरे, हमें “नम्रता से चलने” के लिए कहा गया है। दूसरे शब्दों में, हमें परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण में चलना है और हर कदम पर उसके ऊपर हमारी पूरी निर्भरता को अपनाना है। मीका इस पद को नम्रता पर क्यों समाप्त करता है? पहले, क्योंकि नम्रता ही वह गुण है जो यह स्वीकार करने के लिए आवश्यक है कि हम कृपा से प्रेम करने और न्याय के काम करने के बुलावे का पूरी तरह से पालन नहीं कर सकते—और इसलिए हमें केवल परमेश्वर की आज्ञाओं की ही नहीं, बल्कि उसकी क्षमा की भी आवश्यकता है। और दूसरा, क्योंकि जब हम उसका वैसा आज्ञापालन करते हैं जैसा मीका 6:8 हमें कहता है, तो हमारे प्रयासों का फल अन्ततः हम पर निर्भर नहीं करता।

आप और मैं संसार को सुधार नहीं सकते; इसके बजाय हमें संसार के राजा और न्यायाधीश को समाधान सौंप देना चाहिए। ऐसा करने से हमें प्रेरणा मिलती है और हम स्थापित रहते हैं, परमेश्वर की सहायता से, न्याय, कृपा, और नम्रता के माध्यम से, हमारे पड़ोसियों के भले के लिए, कलीसिया की गवाही के लिए, और मसीह की महिमा के लिए उस सुसमाचार के अनुसार जी पाते हैं जिसने हमें बचाया है। सदियों बाद भी आज मीका आपको बुलावा देता है कि आप इस सुसमाचार की आवश्यकता पर विनम्रता से विचार करें, अपने हृदय को देखें और पवित्र आत्मा की सहायता से इसे मसीही कृपालुता में बढ़ाएँ, और फिर अपने संसार को देखें और सक्रिय रूप से न्याय और निष्पक्षता का पालन करें।

  मीका 6:1-8

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 15–17; मत्ती 23:1-22


[1] द वर्क्स ऑफ रेव्ह. जॉन न्यूटन (1808), खण्ड. 2, पृ. 543.

9 जून : टुकड़ों को एकसाथ जोड़ना

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9 जून : टुकड़ों को एकसाथ जोड़ना
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“तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिए मेरे पास आना नहीं चाहते।” यूहन्ना 5:39-40

एक क्रिसमस, हमारे परिवार ने तय किया कि हम सारा परिवार मिलकर एक जिगसॉ पहेली को सुलझाएँगे। हमने सबसे बड़ी जिगसॉ पहेली खरीदी और उसके सारे टुकड़ों को खोल कर मेज पर रख दिया। दुर्भाग्यवश हमारा जोश बहुत जल्दी खत्म हो गया। हम बारी-बारी उस मेज पर जाते, कुछ टुकड़े उठाते, उन्हें जोड़ने की कोशिश करते, लेकिन जब असफल हो जाते, तो हार मानकर चले जाते।

यह पूरी तरह से सम्भव है कि आप और मैं बाइबल का अध्ययन उसी तरह करें जैसे हम जिगसॉ पहेली के टुकड़े उठाते हैं, उन्हें जोड़ने में असफल होते हैं और उस अद्‌भुत चित्र को कभी नहीं देख पाते जो हमारे सामने है। दूसरे शब्दों में, जैसा कि इब्रानियों की पुस्तक में कहा गया है, हमने परमेश्वर के वचन का अध्ययन तो किया, लेकिन इससे हमें “कुछ लाभ न हुआ” क्योंकि यह हमारे “मन में विश्‍वास के साथ नहीं बैठा” (इब्रानियों 4:2)। हम बाइबल का अध्ययन करने में सतर्क और बाइबल के वचनों को कण्ठस्थ करने में अनुशासित हो सकते हैं, और फिर भी हमेशा उस मसीह को सचमुच स्वीकार करने से इनकार कर सकते हैं, जिसके बारे में हम पढ़ रहे हैं। ऐसे लोगों को यीशु चुनौतीपूर्ण शब्दों में कहता है: “तुम उसके [परमेश्वर के] वचन को मन में स्थिर नहीं रखते, क्योंकि जिसे उसने भेजा तुम उसका विश्‍वास नहीं करते।” (यूहन्ना 5:38)।

यह सोचना चिन्ताजनक है कि लोग स्वयं को परमेश्वर के वचन पर विचार करने के लिए अनुशासित करने के बावजूद भी यीशु के पास आने से इनकार कर सकते हैं, जो जीवनदाता और पालनहार है। स्वभाव से ही, परमेश्वर की आवाज़ को न सुनने के लिए हमने अपने कानों में अंगुलियाँ डाली हुई हैं। स्वभाव से ही, पवित्रशास्त्र हमें बताता है, “कोई परमेश्‍वर का खोजने वाला नहीं” (रोमियों 3:11)।

जैसा कि एक लेखक लिखता है, “पवित्रशास्त्र में अपने आप में जीवन नहीं है . . . यदि हम इसके द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करते हैं, तो यह हमें उस तक पहुँचाता है और इस प्रकार हम जीवन पाते हैं, पवित्रशास्त्र में नहीं, बल्कि इसके द्वारा उसमें।”[1] पवित्रशास्त्र में परमेश्वर का वचन और परमेश्वर का देहधारी वचन एक दूसरे में बुने हुए हैं और परमेश्वर का आत्मा परमेश्वर के वचन को लोगों तक लाकर उन्हें मसीह से मिलाने और उसे पाने का काम करता है।

क्या आप बाइबल के हिस्सों को आपस में जोड़े बिना अपने मन में लिए घूम रहे हैं और फिर खड़े होकर सोच रहे हैं कि यीशु की छवि, जिसमें उसकी बाँहें खुली हुई हैं, उन्हें बचाने के लिए तैयार है जो विश्वास से उसके पास आते हैं और अपने पापों से मन फिराते हैं? क्या आप परमेश्वर के वचन के ज्ञान को सच्चे विश्वास के साथ जोड़ेंगे, ताकि आप इस खतरे से बचे रहें कि आप वचन के बारे में बहुत सारा ज्ञान तो प्राप्त कर लें, लेकिन देहधारी वचन को जाने ही न? क्या आप हर दिन परमेश्वर के वचन के पास इस उम्मीद के साथ आएँगे कि आप यीशु से मिलेंगे, जैसे उसका आत्मा उसके वचन के माध्यम से कार्य करता है? आइए हम शमूएल भविष्यद्वक्ता की तरह परमेश्वर के वचन को खोलते समय यह कहें: “कह, क्योंकि तेरा दास सुन रहा है” (1 शमूएल 3:10)।

2 तीमुथियुस 3:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 12–14; मत्ती 22:23-46 ◊


[1] जी. कैम्पबैल मोर्गन, द गॉस्पल अकोर्डिंग टू जॉन (मार्शल, मोर्गन, ऐण्ड स्कॉट, 1933), पृ. 94.

8 जून : गिदोन का प्रश्न

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8 जून : गिदोन का प्रश्न
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“उसको [गिदोन को] यहोवा के दूत ने दर्शन देकर कहा, ‘हे शूरवीर सूरमा, यहोवा तेरे संग है।’ गिदोन ने उससे कहा, ‘हे मेरे प्रभु, विनती सुन, यदि यहोवा हमारे संग होता, तो हम पर यह सब विपत्ति क्यों पड़ती?’” न्यायियों 6:12-13

न्यायियों 6 में जब गिदोन की मुलाकात एक स्वर्गदूत से होती है, तो वह क्षण नाटकीय और असंगत दोनों है। स्वर्गदूत उसे “शूरवीर सूरमा” कहता है, जबकि वह मिद्यानियों डर के मारे छिपकर एक दाखरस के कुण्ड में गेहूँ झाड़ रहा है (न्यायियों 6:11)। इस समय उसके अन्दर न तो कोई वीरता दिख रही है और न ही कोई साहस!

यह ऐसा है जैसे परमेश्वर ने गिदोन पर ध्यान केन्द्रित किया हो, जो परमेश्वर की प्रजा का एक सूक्ष्म रूप है। शायद उस क्षण में गिदोन ने मुड़कर देखा और सोचा होगा कि क्या यह अभिवादन वास्तव में उसके लिए था। आखिरकार, प्रभु ने अपने लोगों को गुफाओं में छिपने के लिए मजबूर कर दिया था। इसलिए उसने पूछा, “यदि यहोवा हमारे संग होता, तो हम पर यह सब विपत्ति क्यों पड़ती?”

यह एक समझने योग्य प्रश्न है: यदि परमेश्वर वह है जो वह होने का दावा करता है, तो वह हमारे जीवन में परेशान करने वाली परिस्थितियों को अनुमति क्यों देता है? हम इसे बेशक समझ सकते हैं। हमारा सारा जीवन “यदि,” “लेकिन,” और “क्यों” से भरा रहता है। हालाँकि हमें यह जानकर उत्साहित होना चाहिए कि यदि परमेश्वर गिदोन के प्रश्न और इस्राएल की चीत्कार का उत्तर दे सकता है, तो वह निश्चित रूप से हमारे कठिन प्रश्नों का उत्तर भी दे सकता है—भले ही उसका उत्तर हमेशा वैसा न हो जैसा हम अपेक्षा करते हैं।

जब इस्राएलियों ने न्यायियों 6:7 में परमेश्वर से मदद के लिए पुकारा, तो उसने जवाब में उन्हें छुटकारा देने के लिए एक योद्धा को नहीं भेजा बल्कि उन्हें सिखाने के लिए एक भविष्यवक्ता को भेजा (व 8)। परमेश्वर जानता था कि उन्हें अपनी समस्याओं के बीच में उसके वचन को सुनने की आवश्यकता थी। अन्ततः, उन्हें परमेश्वर की ओर लौटने और उसके वचनों पर विश्वास करने की आवश्यकता थी। भविष्यवक्ता ने उन्हें संक्षेप में वही बताया जो स्वर्गदूत गिदोन से कहने वाला था: “यहोवा तेरे संग है।” परमेश्वर की उपस्थिति और संकट एक साथ रह सकते हैं।

हमारे द्वारा उठाए गए प्रश्नों के उत्तर अन्ततः किसी “पाँच आसान कदमों” की सूची में नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन के माध्यम से उसके खुद के उद्‌घाटन में मिलते है। गिदोन के मामले में ऐसा लग रहा था कि परमेश्वर का प्रतिउत्तर वास्तव में कोई उत्तर था ही नहीं। इस्राएल की परिस्थितियों पर कोई बातचीत नहीं हुई और न ही उनके दुश्मनों के बारे में कोई व्याख्या दी गई। इसके बजाय, प्रभु ने गिदोन से कहा, “अपनी इसी शक्ति पर जा और तू इस्राएलियों को मिद्यानियों के हाथ से छुड़ाएगा। क्या मैंने तुझे नहीं भेजा?” (न्यायियों 6:14)। गिदोन ने खुद को असमर्थ महसूस किया: “मैं इस्राएल को कैसे छुड़ाऊँ? देख, मेरा कुल मनश्शे में सबसे कंगाल है, फिर मैं अपने पिता के घराने में सबसे छोटा हूँ” (न्यायियों 6:15)।

अक्सर हमारे साथ भी ठीक ऐसा ही होता है, जब हम अपनी असमर्थता को स्वीकार करते हैं, तब परमेश्वर हममें कार्य करना आरम्भ करता है। जब तक हम अपनी कमजोरी को नहीं पहचानते, तब तक हम प्रार्थना करने के लिए, संकटों में दृढ़ता से चलने के लिए या खुद पर भरोसा छोड़ने के लिए प्रेरित नहीं होंगे। जब हम अपनी कमियों को पहचान जाते हैं और परमेश्वर के वचन को सुनते हैं कि वह हमारे साथ है और हमारे माध्यम से कार्य करेगा, केवल तब ही हम अपनी पूरी ताकत से उसकी सेवा करने का संकल्प लेते हैं, फिर चाहे हम कितने भी कमजोर क्यों न महसूस करें और कमजोर हों। क्योंकि परमेश्वर अपने वचन में प्रतिज्ञा करता है कि जिस काम को करने के लिए वह हमें बुलाता है, उसे पूरा करने के लिए हमारी कमजोरी और परमेश्वर की ताकत पर्याप्त हैं (फिलिप्पियों 4:13)।

न्यायियों 6:11-24

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 9–11; मत्ती 22:1-22

7 जून : बदला प्रभु लेगा

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7 जून : बदला प्रभु लेगा
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“तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘आँख के बदले आँख, और दाँत के बदले दाँत।’ परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ कि बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।” मत्ती 5:38-39

जब यीशु ने ये परिचित शब्द कहे, तो वह किसे सम्बोधित कर रहा था? यीशु किसे बुराई को सहने और बदला न लेने के लिए कह रहा था?

यह सवाल सरल लग सकता है, लेकिन यह एक महत्त्वपूर्ण भेद को उजागर करता है जो प्रेरित पौलुस के मन में था जब उसने रोम की कलीसिया को अपनी पत्री लिखी। रोमियों अध्याय 12 में, वह अपने पाठकों को उत्साहित करता है कि “बुराई के बदले किसी से बुराई न करो” (रोमियों 12:17) और “भलाई से बुराई को जीत लो” (व 21), जो प्रभु की शिक्षाओं का प्रतिध्वनि है: कि हमें दूसरा गाल भी फेर देना चाहिए। फिर भी, कुछ ही पदों के बाद रोमियों 13 में वह कहता है कि परमेश्वर ने नागरिक अधिकारियों को अपने सेवकों के रूप में स्थापित किया है, ताकि वे भलाई को स्वीकृति दें और बुराई को दण्डित करें (13:1-4)। इसलिए कभी-कभी बुराई को उसका फल मिलता है, और कभी-कभी नहीं मिलता—कम से कम तुरन्त तो नहीं।

पौलुस और यीशु दोनों ने एक महत्त्वपूर्ण भेद को पहचाना है, जिसे हमें याद रखना चाहिए कि व्यक्तिगत रूप से मसीहियों के साथ जो बुराई की जाती है, उसका (जिसे रोमियों 12 में सम्बोधित किया गया है) और कानूनी प्रक्रिया का प्रतिउत्तर उन्हें कैसे देना चाहिए (जो रोमियों 13 में सम्बोधित किया गया है)।

मसीहियों को न्याय को अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। बल्कि हमें बुराई का बदला उन अधिकारियों के हाथों में सौंप देना चाहिए, जिन्हें परमेश्वर ने स्थापित किया है। नागरिक अधिकारी एक उदाहरण हैं। जब वे अपनी भूमिकाओं को सही तरीके से निभाते हैं, तो वे बुरे आचरण के लिए आतंक का कारण बनते हैं, लेकिन अच्छे आचरण के लिए नहीं। वे कानून का पालन करने के लिए और इसका उल्लंघन करने वालों को दण्ड देने के लिए नियुक्त किए गए हैं।

यह समझ जाने से, कि परमेश्वर पूरी तरह से न्यायपूर्ण हैं, हमें यीशु के आदेश को मानने की स्वतन्त्रता मिलेगी कि हमें दूसरा गाल भी फेर देना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि जो बुराई हमारे साथ हुई है, हम उसे बुराई न मानें या एक निराशाजनक दृष्टिकोण अपनाएँ, जो कहता है कि न्याय कहीं है ही नहीं। न ही इसका अर्थ यह है कि जब हम पीड़ित होते हैं, तो हमें नागरिक अधिकारियों का सहारा नहीं लेना चाहिए। नहीं, मसीहियों को बुराई को सहने के लिए बुलाया गया है और हम इसे सह सकते हैं, क्योंकि बदला लेना प्रभु का काम है (रोमियों 12:19)। कभी-कभी वह यह बदला इसी जीवन में दे देता है, जब वह नागरिक सरकारों को “तलवार उठाने” की अनुमति देता है (13:4)। लेकिन प्रभु के दिन वह खुद सीधे न्याय करेगा और उसके संसार में की गई हर बुराई का पूरा बदला लेगा।

इसलिए आप और मैं, परमेश्वर द्वारा स्थापित अधिकारियों से न्याय प्राप्त करने के लिए स्वतन्त्र हैं, जो लोगों की रक्षा करने और अपराधों को दण्डित करने के लिए नियुक्त किए गए हैं। साथ ही, हम मसले को अपने हाथों में लेने और अपना बदला खुद लेने की स्वाभाविक प्रवृत्ति का विरोध करते हुए दूसरे गाल को भी फेर देने के लिए स्वतन्त्र हैं। न्याय आएगा, लेकिन यह हमारे हाथों से नहीं आएगा।

मत्ती 5:38-48 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 6– 8; मत्ती 21:23-46 ◊

6 जून : अपने आप से ईमानदार रहें

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6 जून : अपने आप से ईमानदार रहें
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क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म का यहोवा लेखा न ले, और जिसकी आत्मा में कपट न हो।” भजन 32:2

दोस्तोएव्स्की के द ब्रदर्स कारमाज़ोव में, एक पात्र दूसरे को यह सलाह देता है: “सबसे बढ़कर, अपने आप से झूठ मत बोलो। जो व्यक्ति अपने आप से झूठ बोलता है और अपने ही झूठ को मानता है, वह इस स्थिति में पहुँच जाता है कि वह न तो अपने भीतर और न ही अपने आस-पास किसी भी सत्य को पहचान पाता है, और इस प्रकार वह न केवल अपने प्रति बल्कि दूसरों के प्रति भी अनादर करने लगता है।”[1] लगभग तीन सहस्राब्दी पहले, दाऊद ने भी इस बात का वर्णन किया था कि यदि हम अपने वास्तविक स्वभाव को लेकर स्वयं को धोखा देते हैं, तो उसके क्या प्रभाव हो सकते हैं।

सच्ची खुशी की खोज के लिए ईमानदारी अत्यन्त आवश्यक है। जो लोग वास्तव में आनन्द और सन्तोष से भरे होते हैं, वे न तो स्वयं से और न ही दूसरों से झूठ बोलते हैं। हम खुद को धोखा देकर वास्तविक खुशी का अनुभव नहीं कर सकते; छल और आनन्द एक साथ नहीं रह सकते।

बाइबल हमसे अपेक्षा करती है कि हम अपने बारे में उतने ही ईमानदार हों, जितनी वह स्वयं हमारे विषय में ईमानदार है। यह हमारे हृदय और मन पर एक खोजी प्रकाश डालती है, जिससे मानव जीवन की वास्तविक स्थिति प्रकट होती है। हमें बताया गया है कि हम अधर्म में जीते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि हमारे भीतर स्वाभाविक रूप से बुराई की ओर झुकाव होता है और हमारा स्वभाव पाप से भ्रष्ट हो गया है। हम अपराधी हैं, ऐसे स्थानों पर जाते हैं जहाँ हमें नहीं जाना चाहिए। हम पापी हैं, जो न केवल परमेश्वर के द्वारा स्थापित मानकों पर, बल्कि अपने ही बनाए हुए मानकों पर भी खरे नहीं उतरते।

इस पद का आश्चर्यजनक पहलू यह है कि दाऊद अपने वचन का आरम्भ “धन्य” या “आनन्दित” शब्द से करता है, लेकिन इसके तुरन्त बाद वह हमारे अधर्म और स्वयं को और परमेश्वर को धोखा देने की हमारी प्रवृत्ति जैसी कठोर सच्चाइयों का उल्लेख करता है। लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस समस्या का वह सामना कर रहा है, उसके समाधान के रूप में परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया उद्धार कहीं अधिक सामर्थी है।

ध्यान दें कि दाऊद यह नहीं कहता, क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म को यहोवा अधर्म ही नहीं मानता। बल्कि वह कहता है, “क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म का यहोवा लेखा न ले।” क्योंकि परमेश्वर पवित्र है, इसलिए उसे पाप का हिसाब रखना ही होगा—लेकिन वह उसे किसी और के ऊपर डालता है। वह उसे अपने पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह पर डालता है। दाऊद के इन शब्दों में हमें विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने की अद्‌भुत शिक्षा मिलती है, जिसे हम पहली बार अब्राहम के साथ परमेश्वर के सम्बन्ध में देखते हैं, जब अब्राहम ने “यहोवा पर विश्‍वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना” (उत्पत्ति 15:6)। जिस क्षण हम वास्तव में विश्वास कर लेते हैं कि हमारे पापों का लेखा हमारे उद्धारकर्ता पर डाला गया है, उस क्षण हम धन्य हो जाते हैं; हम पहले से कहीं अधिक आनन्दित हो जाते हैं।

इसलिए आशीष प्राप्त करने का मार्ग ईमानदारी से आरम्भ होता है। हम ऐसे अच्छे लोग नहीं हैं जो कभी-कभार गलतियाँ कर बैठते हैं। हम अद्‌भुत व्यक्ति नहीं हैं, जिनमें बस कुछ कमियाँ हैं, जिनका दोष हम अपने पालन-पोषण, परिवेश या पिछली रात की कम नींद पर डाल सकते हैं। हम पापी हैं, जिनके हृदय कपटी हैं, जो परमेश्वर की महिमामय अपेक्षाओं से बहुत पीछे रह जाते हैं और जो स्वभाव से केवल क्रोध के अधिकारी हैं (यिर्मयाह 17:9; रोमियों 3:23; इफिसियों 2:1-3)। अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति ईमानदार बनें। अपने पापों को स्पष्ट रूप से स्वीकार करें, कि आपने किस प्रकार प्रभु के विरुद्ध पाप किया है। तब आप इस संसार की सबसे आनन्ददायक खुशखबरी को अपनाने के लिए तैयार होंगे: “हमारे पाप भले ही अनेक हों, पर उसकी दया और भी अधिक है।”[2]

  भजन 38

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 3–5; मत्ती 21:1-22


[1] फ्योडोर दोस्तोएव्स्की, द ब्रदर्स कारमाज़ोव: ए नोवल इन फोर पार्ट्स विद एपिलोग, अनुवादक रिचर्ड पेविएर और लारिसा वोलोखोनस्की (1990; पुनः मुद्रित फर्रार, स्ट्रॉस, ऐण्ड गिरोक्स, 2002), पृ. 44.

[2] मैट पापा ऐण्ड मैट बोस्वल, “हिज़ मर्सी इज़ मोर” (2016).

5 जून : परीक्षाओं और संकटों में आराधना करना

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5 जून : परीक्षाओं और संकटों में आराधना करना
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“जो काम वह करता है उसको यहोवा उसके हाथ से सफल कर देता है।” उत्पत्ति 39:2-3

यदि यूसुफ के पास केवल उसका प्रसिद्ध रंग-बिरंगा बागा ही होता, तो जब उसके भाइयों ने उसे उससे छीन लिया था और उसे गुलामी में बेच दिया था, तो वह पूरी तरह से बर्बाद हो गया होता। लेकिन उस बागे को पहनने वाले व्यक्ति के अन्दर एक सशक्त चरित्र था—और जब यूसुफ ने अपना बागा खो दिया, तब भी उसने अपना चरित्र नहीं खोया। इसके बजाय, वह पोतीपर के घर में एक दास के रूप में और अधिक ढलता और तराशा जाता रहा। इस कठिन परीक्षा में, परमेश्वर ने यूसुफ के जीवन पर आशीष और अनुग्रह उण्डेला।

यह समझ में आता कि यदि यूसुफ खुद को मिस्र के एक घर में गुलाम के रूप में पाकर पूरी तरह से अकेलेपन में चला जाता, अपने आस-पास के संसार से अलग-थलग हो जाता, मिस्र की मूर्तिपूजा का विरोध करता और पोतीपर के अधिकार से घृणा करता। लेकिन इस दृष्टिकोण से उसे गवाही देने या परमेश्वर के कार्य को दिखाने का कोई अवसर नहीं मिलता। इसके बजाय, यूसुफ ने यह निश्चय किया कि वह पोतीपर का सबसे अच्छा सेवक बनेगा, क्योंकि वह जानता था कि अन्ततः वह परमेश्वर की सेवा कर रहा है।

हालाँकि यूसुफ परमेश्वर की भलाई के कारण समृद्ध हुआ, फिर भी वह गुलाम ही रहा। उसका दिन-प्रतिदिन का जीवन कठिन परिश्रम से भरा था—जिससे हममें से अधिकांश लोग परिचित हैं! लेकिन यदि हम सबसे बुरे या सबसे उबाऊ हालात में भी समृद्ध होना चाहते हैं, तो हमें यह सीखना होगा कि जीवन के साधारण अनुभवों में भी, चाहे वे कुछ भी हों, हमें परमेश्वर के आशीर्वाद को देखना है।

क्योंकि यूसुफ अपने संघर्षों में परमेश्वर पर भरोसा कर सका, इसलिए हमें बताया गया है कि पोतीपर ने देखा कि यहोवा यूसुफ के साथ था और उसने उसे सफलता दी थी। यूसुफ को पोतीपर को यह बताने की आवश्यकता नहीं पड़ी कि उसके जीवन में परमेश्वर की विशेष कृपा है। जब परमेश्वर की आशीष किसी के जीवन पर होती है, तो वह स्वतः ही प्रकट हो जाती है—और कभी-कभी, जैसा कि हम पोतीपर के मामले में देखते हैं, यहाँ तक कि अविश्वासी भी इसे अनदेखा नहीं कर सकते।

हमें यह सीखने की आवश्यकता है कि हम अपने जीवन के हर कार्य, हर क्षण और हर निर्णय को परमेश्वर की महिमा और स्तुति के अवसर के रूप में देखें। हम जहाँ कहीं भी हों, हम (जैसा कि पौलुस ने उन लोगों से कहा, जो यूसुफ की तरह परमेश्वर के लोग होते हुए भी गुलामी में थे) “जो कुछ [भी करें] तन मन से [करें], यह समझकर कि मनुष्यों के लिए नहीं परन्तु प्रभु के लिए करते [हैं]; क्योंकि [हम जानते हैं कि हमें] इसके बदले प्रभु से मीरास मिलेगी; [हम] प्रभु मसीह की सेवा करते [हैं]” (कुलुस्सियों 3:23-24)।

केवल जब हम यह समझ जाते हैं कि हमें परमेश्वर की महिमा के लिए बनाया गया है, तब हम जीवन के संघर्षों और कठिनाइयों को आराधना के कार्यों में बदल सकते हैं। बाइबल कहती है कि हमारी ज़िम्मेदारियाँ ऐसे अवसर हैं जिनसे हमारी परमेश्वर पर निर्भरता प्रकट होती है और उसकी आशिषों के प्रमाण मिलते हैं। चाहे हम किसी कम्पनी के मालिक हों या सड़क साफ करने वाले हों, शेयरों का व्यापार कर रहे हों, घर बना रहे हों या बच्चों की देखभाल कर रहे हों, हम विनम्र भी होंगे और ऊपर भी उठाए जाएँगे, जब हम यह प्रार्थना करेंगे:

हे मेरे परमेश्वर और राजा,

मुझे हर परिस्थिति में तुझे देखने दे,

और जो कुछ भी मैं करूँ,

उसे तेरे लिए करूँ।[1]

उत्पत्ति 39 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 1–2; मत्ती 20:17-34 ◊


[1] जॉर्ज हर्बर्ट, “दि एलिक्सिर,” दि इंगलिश पोएम्स ऑफ जॉर्ज हर्बर्ट, सम्पादक हेलेन विलकोक्स (केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 2007), पृ. 640.

4 जून : दीपकों के समान चमकना

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4 जून : दीपकों के समान चमकना
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“सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना विवाद के किया करो, ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्‍वर के निष्कलंक सन्तान बने रहो, जिनके बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते दीपकों के समान दिखाई देते हो।” फिलिप्पियों 2:14-15

मसीह के लहू के द्वारा मुक्त किए गए लोग होने के नाते हमें चमकना है। जो यीशु को जानते हैं, उनमें एक विशेष गौरव होना चाहिए। लेकिन कुड़कुड़ाना हमेशा उस गौरव को छिपा लेता है। यद्यपि यह बच्चों का एक गीत है, तौभी इसके शब्द हमेशा हमारे दिल में गूंजने चाहिएँ:

छोड़ दो अब कुड़कुड़ाने की गली,

और सूरज चौक में आ जाओ,

क्योंकि वहीं यीशु रहता है,

और वहाँ सदा उजियाला रहता है।”

मसीहियों के लिए यह समझना बहुत आवश्यक है कि यीशु के कारण हमें पाप के दोष और मलिनता से शुद्ध कर दिया गया है। मसीह में हमें असाधारण स्वतन्त्रता मिली है, और हमारे भीतर वास करने वाले पवित्र आत्मा के द्वारा हम उथल-पुथल से भरे इस जीवन में और मसीह को अस्वीकार करने वाले इस संसार में स्वतन्त्रता और आशा का अनुभव कर सकते हैं। सुसमाचार केवल हमारे विश्वास का आरम्भिक बिन्दु नहीं है; यह सम्पूर्ण उद्देश्य है। और प्रभु अपनी कृपा में होकर हमें लगातार यह याद दिलाता है कि हम उसकी सन्तान हैं, जिससे हम उसके साथ अपनी जीवन-यात्रा में आगे बढ़ सकें।

मसीह में हमारी स्थिति अडिग और अपरिवर्तनीय है। एक बार जब हम उसके परिवार में गोद ले लिए जाते हैं, तो परमेश्वर हमारे प्राणों को कभी नहीं छोड़ता। हमारे सबसे अच्छे सप्ताह में भी हम परमेश्वर के उतने ही निकट होते हैं, जितने कि अपने सबसे बुरे सप्ताह में, क्योंकि पिता के साथ हमारा सम्बन्ध मसीह की धार्मिकता पर आधारित है, न कि हमारी अपनी धार्मिकता पर। हम परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध में इसलिए नहीं हैं, क्योंकि हमने कुछ किया या हमारे भीतर से कुछ निकला, बल्कि इसलिए क्योंकि यह हमारे लिए किया गया है।

मार्टिन लूथर ने कहा था कि एक अर्थ में, सुसमाचार हमारे बाहर है।[1] यदि हम बार-बार अपने भीतर झांकें कि हम सब कुछ कितना अच्छे से कर रहे हैं, तो हमें लगेगा कि परमेश्वर के सामने हमारी कोई स्थाई स्थिति नहीं है। लेकिन जब हम यह समझ जाते हैं कि परमेश्वर की शाश्वत योजना हमें अपने पुत्र के स्वरूप में ढालने की है, और कि मसीह की आज्ञा का पालन करने की प्रक्रिया हमें उसी स्वरूप में ढालती जाती है, तो हम आत्मा-प्रेरित आनन्द का अनुभव करने लगेंगे, जिसे परमेश्वर अनुग्रहपूर्वक हमें प्रदान करता है। और जब ऐसा होगा, तो हमें शिकायत करने का अवसर बहुत कम मिलेगा!

हमें भय और कांपते हुए अपने उद्धार का कार्य पूरा करना है, क्योंकि परमेश्वर का यही उत्तम कार्य है, जो हमें उसकी प्रसन्नता के लिए और इसी के साथ हमारे आनन्द और सन्तोष के लिए जीने योग्य बनाता है (फिलिप्पियों 2:12-13)। जब हम ऐसा करते हैं, तो हम सच में चमकने लगते हैं—और दूसरे लोग हमारे द्वारा मसीह को देख सकते हैं। तो फिर, आप किन बातों को लेकर कुड़कुड़ाते हैं? क्या परमेश्वर की सन्तान होने का गौरव आपके लिए ठण्डा पड़ गया है? आज जब आपको यह एहसास हो कि आप शिकायत करने वाले हैं, चाहे अपने मन में या किसी और से, तो उन शब्दों को बदलकर परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता के शब्द बना दें—उन सब बातों के लिए जो प्रभु ने आपके लिए की हैं और कर रहा है। तब आप सच में चमक उठेंगे।

  मत्ती 5:1-16

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 12–14; मत्ती 20:1-16


[1] “दो प्रकार की धार्मिकता।”

3 जून : विरासत छोड़कर जाना

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3 जून : विरासत छोड़कर जाना
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“पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर, और अपनी सेवा को पूरा कर।” 2 तीमुथियुस 4:5

हममें से प्रत्येक व्यक्ति एक विरासत छोड़ रहा है। हर दिन, हम अपने जीवन के चित्र में कुछ नया जोड़ रहे हैं, और अन्ततः जो कुछ हम पीछे छोड़ेंगे—हमारे निर्णय, हमारे योगदान, हमारी प्राथमिकताएँ—वे कुछ समय तक दूसरों के विचारों और चिन्तन में रहेंगे।

पौलुस द्वारा तीमुथियुस को लिखी दूसरी पत्री के अन्त में हमें एक वृद्ध व्यक्ति के शब्द मिलते हैं, जिसका जीवन समाप्ति की ओर बढ़ रहा था: वह कहता है, “अब मैं अर्घ के समान उण्डेला जाता हूँ, और मेरे कूच का समय आ पहुँचा है।” (2 तीमुथियुस 4:6)। इस सन्दर्भ में, वह तीमुथियुस को अपने उत्तरदायित्व को गम्भीरता से लेने, अपनी विरासत पर विचार करने, और उन अनेक लोगों द्वारा छोड़ी गई अच्छी और बुरी विरासतों पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है, जिनसे पौलुस का सामना हुआ था।

पत्र के पहले अध्याय में, पौलुस तीमुथियुस को यह याद दिलाता है कि “आसिया वाले सब मुझ से फिर गए हैं, जिनमें फूगिलुस और हिरमुगिनेस हैं” (2 तीमुथियुस 1:15)। इन व्यक्तियों का बाइबल में केवल एक बार उल्लेख हुआ है और वह भी इस तथ्य को दर्ज करने के लिए कि उन्होंने जरूरत के समय पौलुस को छोड़ दिया। पौलुस तीमुथियुस को हुमिनयुस और फिलेतुस जैसे लोगों से भी सावधान रहने के लिए कहता है, जिनका “वचन सड़े घाव की तरह फैलता जाएगा।” और जिन्होंने “सत्य से भटक” कर गलत शिक्षा दी, और वह सिकन्दर ठठेरे का भी उल्लेख करता है, जिसने पौलुस के साथ “बहुत बुराइयाँ की” (2:17-18; 4:14)। जब हम इन व्यक्तियों द्वारा छोड़ी गई विरासत को देखते हैं, तो हमें त्याग, झूठी शिक्षा, और सुसमाचार के विरोध की विरासत दिखाई देती है।

लेकिन पौलुस का यह पत्र उन लोगों का भी उल्लेख करता है, जिन्होंने एक प्रेरणादायक और उपयोगी विरासत छोड़ी। उदाहरण के लिए, लोइस और यूनीके ने एक सच्चे विश्वास का प्रदर्शन किया, और पौलुस को पूरा भरोसा था कि वही विश्वास अब युवा पास्टर तीमुथियुस में भी है (2 तीमुथियुस 1:5)। इसी तरह, वह तीमुथियुस को उनेसिफुरुस को याद रखने के लिए कहता है, जिसने “बहुत बार मेरे जी को ठंडा किया और मेरी जंजीरों से लज्जित न हुआ। पर जब वह रोम में आया, तो बड़े यत्न से ढूँढ़कर मुझ से भेंट की” (पद 16-17)। उनेसिफुरुस ने विश्वास, साहस और दृढ़ निश्चय की विरासत छोड़ी। यदि उसने किसी स्थान पर रहने का वादा किया, तो वह वहाँ अवश्य होता था। वह ऐसा व्यक्ति था जिस पर पौलुस पूरी तरह भरोसा कर सकता था।

हम सभी एक विरासत छोड़ रहे हैं। जब हम किसी कमरे से बाहर निकलते हैं, तो या तो हम मसीह की सुगन्ध छोड़ते हैं, जो हर जगह उसकी पहचान फैलाती है (2 कुरिन्थियों 2:15-16), या हम आत्म-प्रचार की अप्रिय गन्ध या अर्थहीन उपस्थिति की शून्यता छोड़ जाते हैं। विश्वासयोग्यता, भक्ति, दयालुता, कोमलता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, प्रेम, और शान्ति की विरासत वह विरासत है, जिसे स्नेह के साथ याद किया जाएगा। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह विरासत लोगों का ध्यान उस व्यक्ति की ओर ले जाएगी, जिसका जीवन सबसे अधिक मायने रखता है—अर्थात प्रभु यीशु की ओर।

एक विरासत, प्रतिदिन लिए गए उन छोटे-छोटे निर्णयों से बनती है, जो मसीह के लिए फर्क पैदा करने के लिए किए जाते हैं: उससे प्रेम करने, अपने पड़ोसी से प्रेम करने, शान्ति की खोज करने और उसके बारे में बात करने के निर्णय। आज, आप अपनी विरासत का एक छोटा—या शायद बहुत महत्त्वपूर्ण—हिस्से का निर्माण करेंगे। इसलिए वह कार्य करें जो परमेश्वर ने आपके लिए तैयार किया है, और उसके लिए एक फर्क पैदा करें। आखिरकार, क्या पता कि हम अपनी विरासत में आखिरी योगदान देकर कूच कर जाएँ।

तीतुस 2:2-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 9–11; मत्ती 19 ◊

2 जून : क्या वह फल पाएगा?

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2 जून : क्या वह फल पाएगा?
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“वह दूर से अंजीर का एक हरा पेड़ देखकर निकट गया कि क्या जाने उसमें कुछ पाए : पर पत्तों को छोड़ कुछ न पाया; क्योंकि फल का समय न था। इस पर उसने उससे कहा, ‘अब से कोई तेरा फल कभी न खाए!’ और उसके चेले सुन रहे थे।” मरकुस 11:13-14

यहाँ एक घटना प्रस्तुत की गई है जो “कठिनाइयों से भरी हुई है।”[1]

यीशु द्वारा अंजीर के पेड़ को श्राप देना चौंकाने वाली बात है क्योंकि यह विनाश का चमत्कार था। मरकुस के सुसमाचार में अब तक हमने यीशु को केवल रूपान्तरण या पुनर्स्थापना के चमत्कार करते हुए देखा था। चूंकि यह यीशु के अन्य कार्यों से पूरी तरह विपरीत था, इसलिए हमें इसके महत्त्व को गहराई से समझने की आवश्यकता है।

पुराने नियम में, दाखलता और अंजीर के पेड़ का उपयोग अक्सर इस्राएलियों की परमेश्वर के सामने स्थिति को दर्शाने के लिए रूपक के तौर पर किया गया है। जब दाखलता या अंजीर का पेड़ अच्छा फल उत्पन्न करता था, तो सब कुछ सही माना जाता था; लेकिन जब कोई फल नहीं होता था या बुरा फल उत्पन्न होता था, तो इसका अर्थ था कि परमेश्वर के लोग भटक गए हैं।

जब यीशु ने उस समय की धार्मिक गतिविधियों की ऊपरी चमक के पीछे के पूरे खालीपन को देखा, तो नबी मीका के ये शब्द उसके मन में आए होंगे: “हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया हूँ जो धूपकाल के फल तोड़ने पर, या रही हुई दाख बीनने के समय के अन्त में आ जाए, मुझे तो पक्की अंजीरों की लालसा थी, परन्तु खाने के लिये कोई गुच्छा नहीं रहा।” (मीका 7:1)।

इसलिए, यीशु द्वारा अंजीर के पेड़ को श्राप देना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह एक भविष्यवाणी के तौर पर प्रतीकवाद से भरी हुई दृष्टान्त क्रिया थी। इस दृश्य के माध्यम से यीशु ने यह दिखाया कि यरूशलेम पर शीघ्र ही न्याय आने वाला था। यीशु धार्मिक जीवन का केन्द्र माने जाने वाले नगर में प्रार्थना और आत्मिक फलवन्तता की खोज में आया था, लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं पाया। वह बाँझ अंजीर का पेड़ एक धार्मिक व्यवस्था का प्रतीक था, जो दिखावे के लिए परमेश्वर को सन्तुष्ट करने और आत्मा की भूख को तृप्त करने का दावा करता था, लेकिन जब लोग ऐसे धर्म की अधीनता में आते थे, तो उनकी सन्तुष्टि के लिए उसमें कुछ भी नहीं होता था—और परमेश्वर-पुत्र के इस दिव्य कार्य से यह स्पष्ट हो गया कि परमेश्वर इससे प्रसन्न नहीं था।

क्या भविष्यवाणी के तौर पर आई यह चेतावनी हमारे लिए भी कोई महत्त्व रखती है, जबकि हम अंजीर के पेड़ों और मन्दिरों से बहुत दूर हैं? हाँ! अच्छा फल उत्पन्न करने की चुनौती हमारे लिए भी बनी हुई है। लेकिन हमें इस बात से भी सावधान रहना चाहिए कि धार्मिक कर्मकाण्ड को निभाने या नियमों का पालन करने से आने वाली आत्म-धार्मिकता को हम सच्चे आत्मिक फल न समझ बैठें। परमेश्वर के लोग जीवन्त सम्बन्ध का स्थान खोखले कर्मकाण्ड को दे देने के खतरे में हमेशा रहते हैं। इस सूखे अंजीर के पेड़ की चेतावनी को मानने का सही तरीका क्या है? यीशु हमें बताता है: “जो डाली मुझमें है और नहीं फलती, [मेरा पिता] उसे वह काट डालता है . . . मैं दाखलता हूँ, तुम डालियाँ हो। जो मुझमें बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:2, 5)। दूसरे शब्दों में, समाधान यह नहीं है कि हम बेहतर करने का प्रयास करें, बल्कि यह है कि हम यीशु को और अधिक जानें और उसमें बने रहें।

क्या इस अंजीर के पेड़ के विवरण का कोई भी हिस्सा हमारे जीवन में भी सत्य है? जब यीशु आएगा और हमारी जाँच करेगा, तो क्या वह हमारे जीवन में फल पाएगा? क्या वह विश्वास पाएगा? अपने आप को यीशु से, जो सच्ची दाखलता है, जुड़ा रखें, और उसका आत्मा आपके जीवन में वही फल उत्पन्न करेगा जिसकी वह खोज कर रहा है।

  यूहन्ना 15:1-11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 5–8; मत्ती 18:21-35


[1] सी. ई. बी. क्रैनफील्ड, द गॉस्पल अकोर्डिंग टू मार्क, केम्ब्रिज ग्रीक टेस्टामेण्ट कॉमैण्ट्री, सम्पादक सी.एफ.डी. मूल (1959; पुनः मुद्रित केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 2000), पृ. 354.