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8 दिसम्बर : सन्तोष में वृद्धि

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8 दिसम्बर : सन्तोष में वृद्धि
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“हर एक बात और सब दशाओं में मैंने तृप्त होना, भूखा रहना, और बढ़ना–घटना सीखा है।” फिलिप्पियों 4:12

सन्तोष का दुर्लभ स्वभाव हमारे युग के लिए नया नहीं है। 17वीं शताब्दी में भी यह विषय इतना महत्त्वपूर्ण था कि प्युरिटन जेरेमायाह बरोज़ ने इस पर एक सम्पूर्ण पुस्तक लिखी—“दि रेअर ज्यूल ऑफ क्रिश्चियन कण्टेण्टमेण्ट”—जो आज भी मसीही भक्ति की एक उत्कृष्ट कृति मानी जाती है। फिर भी आज के पुस्तकालयों में यह पुस्तक शायद ही मिलती है। इसके स्थान पर, हम अधिकतर ऐसी पुस्तकें पाते हैं, जो इस भ्रान्ति को बढ़ावा देती हैं कि हमारी सन्तुष्टि सांसारिक बातों पर निर्भर करती है—जैसे सम्पत्ति की अधिकता या इच्छाओं की पूर्ति।

यदि हम अपने साथ ईमानदार हों, तो हमें मानना पड़ेगा कि हम लोभ की लहरों में बहुत आसानी से बह जाते हैं। हम एक असन्तोषी आत्मा से घिरे रहते हैं, जो सीधा हमारे हालातों से जुड़ा होता है। छोटे बच्चों की तरह, हम हमें मिलने वाली वस्तुओं से अक्सर असन्तुष्ट रहते हैं या इस बात से खिन्न रहते हैं कि हमारे मित्रों के पास अधिक है। इसका परिणाम यह होता है कि हम अपनी आर्थिक, सामाजिक या शारीरिक परिस्थितियों को “सुधारने” के लिए हर सम्भव प्रयास करने लगते हैं।

यह मान लेना आसान है कि या तो आत्म-त्याग या फिर इच्छापूर्ति, लोभ का उत्तर हैं। उदाहरण के लिए, एक झूठे नम्र भाव में मैं यह कह सकता हूँ कि मुझे कश्मीरी ऊन के स्वेटर में कोई रुचि नहीं है, बल्कि केवल ऐसे खुरदरे स्वेटर पसन्द हैं जो मुझे खुजली और चकत्ते देते हैं—परन्तु यह तो केवल मेरे अन्दर एक झूठी “पवित्रता” के घमण्ड को जन्म देगा। दूसरी ओर, मैं यह सोच सकता हूँ कि यदि मैं जितने हो सकें उतने स्वेटर खरीद लूँ, तो शायद मेरी लालसा समाप्त हो जाए!

परन्तु ये दोनों मार्ग प्रभु की महिमा नहीं करते। बल्कि जो मार्ग प्रभु को महिमा देता है, वह यह है कि हम उसी में आशा रखें, जो अपने असीम धन में से हमें आनन्दित करने के लिए उत्तम उपहार प्रदान करता है। यद्यपि हम भौतिक धन में आशा नहीं रखते, तौभी मसीही लोग यह पहचानते हैं कि हर उपहार परमेश्वर के करुणामयी प्रावधान का परिणाम है और जब हम उस उपहार का आनन्द उस रीति से लेते हैं, जैसे वह अपने वचन में हमें सिखाता है, तब हम उसे महिमा देते हैं। हम इन वस्तुओं का आनन्द लेने के लिए स्वतन्त्र हैं, परन्तु हम उन्हें परमेश्वर के स्थान पर न रखें, न ही उनका ऐसा पीछा करें या उनकी ऐसी सेवा करें जैसे वे हमारी आवश्यकताओं को पूरा करेंगे या हमारी आत्मा को तृप्त कर देंगे। सन्तोष तब आता है जब हम स्मरण रखते हैं कि यीशु मसीह ही प्रभु है—और उसके सिवाय और कोई नहीं।

हमारे लिए ऐसा व्यवहार स्वाभाविक नहीं है। आपको और मुझे, पौलुस की तरह, विश्वास में परिपक्व होते हुए इसे सीखना पड़ता है। चाहे वह किसी उदास दिन पर हमारा मनोभाव हो, या एक पदोन्नति से वंचित रह जाने पर हमारी प्रतिक्रिया, या कोई और परिस्थिति—प्रश्न यही रहना चाहिए: मसीह की सम्पूर्ण परिपूर्णता के बारे में ऐसा क्या है, जो यह सिद्ध करता है कि वह मेरे लिए पर्याप्त है, ताकि मैं इस स्थिति में सन्तोष पा सकूँ? सन्तोष एक दुर्लभ रत्न है—और जो इसे पाता है, वह एक अमूल्य खजाना पाता है।

भजन 16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एस्तेर 6– 8; लूका 13:1-21 ◊

7 दिसम्बर : परमेश्वर के साथ चलना

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7 दिसम्बर : परमेश्वर के साथ चलना
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“मतूशेलह के जन्म के पश्चात हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता रहा . . . हनोक परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता था; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्‍वर ने उसे उठा लिया।” उत्पत्ति 5:22, 24

सच्चा विश्वास कोई क्षणिक चमक नहीं है। यह एक निर्णायक कार्य भी है और एक स्थायी मनोवृत्ति भी।

हमें बताया गया है कि हनोक “परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता रहा”—परन्तु यह आरम्भ से ऐसा नहीं था। उत्पत्ति 5 से यह स्पष्ट होता है कि हनोक के जीवन में ऐसा समय था, जब विश्वास का आरम्भ हुआ। वास्तव में, हमें बताया गया है कि “मतूशेलह के जन्म के पश्चात हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता रहा।” सम्भव है कि अन्य जीवन-परिवर्तनकारी अनुभवों की भाँति, पिता बनने की ज़िम्मेदारी और चुनौतियों ने शीघ्र ही हनोक को उसकी अपनी सीमाएँ दिखा दी हों। जो भी कारण रहा हो, ऐसा प्रतीत होता है कि हनोक के जीवन में एक ऐसा क्षण आया जब उसने अपने ऊपर विश्वास करना और अपने बल पर निर्भर रहना छोड़ दिया, और परमेश्वर पर विश्वास करना और उस पर निर्भर रहना आरम्भ कर दिया।

परन्तु हनोक का विश्वास केवल सोच-समझकर किया गया चुनाव ही नहीं था, बल्कि वह एक स्थायी सम्बन्ध भी था। विश्वास एक निर्णायक कार्य के रूप में आरम्भ होता है और उसी प्रकार निरन्तर बना रहता है। हनोक “परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता रहा” और फिर “वह लोप हो गया।” और उसके इस स्थायी विश्वास के परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने उसे उठा लिया। उसने मृत्यु का स्वाद नहीं चखा।

हनोक के जीवन के अन्त का यह लगभग अद्वितीय अनुभव उस महिमामय देह की ओर संकेत करता है, जिसे हर विश्वासी प्रभु यीशु मसीह की वापसी पर प्राप्त करेगा। पौलुस स्पष्ट करता है कि “तुरही फूँकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएँगे, और हम बदल जाएँगे। क्योंकि अवश्य है कि यह नाशवान देह अविनाश को पहन ले, और यह मरनहार देह अमरता को पहन ले” (1 कुरिन्थियों 15:52–53)। जब हम परमेश्वर के साथ चलते हैं—इस सच्चाई को स्मरण रखते हुए कि हमारे जीवन का हर आयाम उसकी प्रभुता और योजना के अधीन है—तो हमारे अनन्त भविष्य में एकत्रित किया जाना हमारे शरीर और हमारे स्थान को तो बदलेगा, परन्तु हमारी संगति को नहीं।

हनोक का यह स्थायी सम्बन्ध परमेश्वर के साथ, अन्ततः उसकी उपस्थिति के अनन्त आनन्द में परिणत हुआ। यदि हम अनन्त काल को अपने परमेश्वर की आराधना में बिताने वाले हैं, तो पृथ्वी पर उसकी आराधना करके हम ऐसे काम का आरम्भ कर रहे हैं, जिसका कभी अन्त नहीं होगा। यदि हम अनन्तकाल उसकी संगति और स्तुति में बिताएँगे, तो यहाँ का हमारा अनुभव वहाँ की तैयारी है। अतः आज उसके साथ चलें। उसकी उपस्थिति के प्रति सचेत रहें। उसके अनुग्रह और सामर्थ्य पर निर्भर रहें। उससे क्षमा माँगने में तत्पर रहें। उसकी अगुवाई को पहचानने में सतर्क रहें। आज उसके साथ चलें—जब तक कि आज ही वह दिन न बन जाए जब आप उसे आमने-सामने देखें।

1 थिस्सलुनीकियों 4:13-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एस्तेर 3–5; लूका 12:32-59

6 दिसम्बर : जागते रहना

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6 दिसम्बर : जागते रहना
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“अब तुम्हारे लिए नींद से जाग उठने की घड़ी आ पहुँची है; क्योंकि जिस समय हमने विश्‍वास किया था, उस समय के विचार से अब हमारा उद्धार निकट है . . . जैसा दिन को शोभा देता है, वैसा ही हम सीधी चाल चलें, न कि लीला–क्रीड़ा और पियक्‍कड़पन में, न व्यभिचार और लुचपन में, और न झगड़े और डाह में।” रोमियों 13:11, 13

“लापरवाह बातों से जानें जा सकती हैं”—यह एक प्रसिद्ध अभियान था जो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाया गया था। सरकार चाहती थी कि लोग अपने आस-पास के खतरे को लेकर सतर्क रहें: यह जानते हुए कि शत्रु कान लगाए बैठा है और जुबान की जरा-सी चूक भी घातक सिद्ध हो सकती है। इसी प्रकार, प्रेरित पौलुस हमारे मसीही जीवन के लिए भी ऐसी ही एक चेतावनी देता है: लापरवाही जानलेवा हो सकती है।

लापरवाही हमें खतरे के घेरे में ले आती है। बहुत से लोग आत्मिक दृष्टि से एक प्रकार की नैतिक नींद में जी रहे हैं—जागृत और सतर्क रहने के बजाय वे आत्मिक शिथिलता में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इससे हम शत्रु के लिए एक आसान लक्ष्य बन जाते हैं। शुद्धता के जीवन में जागते और सतर्क रहने के इन दो मुख्य कारणों पर ध्यान दें।

पहला, प्रेरित पतरस हमें चेतावनी देता है: “तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जने वाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किस को फाड़ खाए” (1 पतरस 5:8)। आइए खुद को धोखा न दें—पाप एक शिकारी है। शत्रु एक सिंह है। याद करें कि प्रभु ने कैन से क्या कहा था जब वह अपने भाई से क्रोधित था: “पाप द्वार पर छिपा रहता है; और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और तुझे उस पर प्रभुता करनी है” (उत्पत्ति 4:7)।

क्या आप जानते हैं कि कौन एक आसान शिकार होता है? एक संगति से दूर रहने वाला मसीही। जब हम आत्मिक संगति से कट जाते हैं, तो हम असुरक्षित और उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाते हैं। धर्मी संगति में चलना हमें सचेत और स्थिर बनाता है। हम दिन के बच्चे हैं—अतः हमें अन्धकार की ओर आकर्षित नहीं होना चाहिए, क्योंकि अन्धकार अलगाव और गुमराही को जन्म देता है। शुद्धता के प्रति उत्साह का अर्थ है कि हम ज्योति में चलें और उन लोगों के साथ चलें, जो ज्योति के पुत्र हैं।

दूसरा, हमें जागते और सतर्क रहना चाहिए क्योंकि अनन्तता हमारी प्रतीक्षा कर रही है। इब्रानियों 11 के नायकों को “विश्वास के वीर” किस कारण कहा गया? क्योंकि वे अपने से परे एक नगर की प्रतीक्षा में थे—एक ऐसा नगर जिसका आधार और रचयिता स्वयं परमेश्वर है (इब्रानियों 11:10)।

मूसा को ही देखें: उसने तात्कालिक सुख-सुविधा के प्रलोभन के आगे हार नहीं मानी। उसने क्षण भर की विलासिता के लिए अपनी आत्मा नहीं बेची। उसने मिस्र के ऐश्वर्य के कारण अपना सेवाकार्य, भविष्य और परिवार नहीं छोड़ा। और इसका कारण क्या था? “उसने मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा, क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं” (इब्रानियों 11:26)। मूसा निष्कलंक नहीं था—और हम भी नहीं हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम मसीह के लिए शुद्ध और पवित्र जीवन न जीएँ। क्योंकि हमारी मुक्ति का दिन निकट आता जा रहा है, और हम चाहते हैं कि जब प्रभु यीशु प्रकट हो, तो वह हमें तैयार और चौकस पाए।

आपका अतीत चाहे जैसा भी रहा हो, चाहे हाल ही में आपके कदम लड़खड़ाए हों या निराशाएँ आई हों, अभी भी समय है कि आप जाग जाएँ और सतर्क हो जाएँ। शत्रु तो सोएगा नहीं, लेकिन जागृत रहने वाले का प्रतिफल अनन्त जीवन है। आज ही परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपके हृदय पर शुद्धता के जीवन की प्रतिबद्धता अंकित कर दे, ताकि आप आज सावधानीपूर्वक और सीधा चलें—सिर ऊँचा करके और अपनी दृष्टि उस महिमामय दिन पर केन्द्रित करके, जब आपकी मुक्ति पूर्ण हो जाएगी।

इफिसियों 6:10-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एस्तेर 1–2; लूका 12:1-31 ◊

5 दिसम्बर : उसने स्वयं को दीन किया

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5 दिसम्बर : उसने स्वयं को दीन किया
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“और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा . . . उसकी परिपूर्णता में से हम सब ने प्राप्त किया अर्थात् अनुग्रह पर अनुग्रह।” यूहन्ना 1:14, 16

अभिनेता स्टीव मैक्वीन का जीवन अत्यन्त रोचक, यद्यपि कई बार भ्रष्ट और अस्त-व्यस्त रहा। उनका देहान्त 1980 में हुआ, परन्तु इससे पहले कि बीमारी उन्हें अपना ग्रास बना लेती, एक विश्वासयोग्य पास्टर ने उन्हें सुसमाचार सुनाया और उन्होंने नम्र होकर मसीह में विश्वास किया। उनके जीवन-परिवर्तन के बाद, वे नियमित रूप से बाइबल अध्ययन और रविवार की आराधना में भाग लेते रहे, लेकिन बिना किसी सार्वजनिक प्रशंसा के। वे इस सत्य से विस्मित रहते थे कि यद्यपि उनका जीवन तलाकों, व्यसनों और नैतिक पतनों से भरा था, फिर भी परमेश्वर ने उन्हें ऐसा प्रेम दिखाया।

मैक्वीन इस सच्चाई को समझने लगे कि परमेश्वर ने उन्हें “शून्य” बना दिया, ताकि जब वे अपनी शून्यता को पहचानें, तब परमेश्वर उन्हें “कुछ” बना सके। यही कार्य परमेश्वर हमारे साथ भी करता है।

इसमें हम मसीह यीशु की पद्धति का अनुसरण करने के लिए बुलाए गए हैं। अपने जन्म के दिन से ही मसीह ने अपनी शाश्वत अतुल्य महिमा को त्याग दिया, ताकि वह इस पतित और असहाय संसार में हमारे लिए आ सके। वह रथ पर सवार होकर नहीं, परन्तु चरनी में आया; वह राजदण्ड लेकर नहीं, परन्तु एक गौशाला में आया। यीशु जितना स्वर्गिक राजा है, उतना ही वह पृथ्वी पर दास बना।

यह कहना कि उसने अपने आप को “शून्य” कर दिया, यह नहीं दर्शाता कि वह परमेश्वर होना छोड़कर मनुष्य बन गया और फिर से परमेश्वर बन गया। जब हम पढ़ते हैं, “वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया,” तो हमें इस विस्मयकारी विरोधाभास पर मनन करना चाहिए कि हमारे अद्‌भुत उद्धारकर्ता ने अपने आप को मानवता में उण्डेल दिया, लेकिन अपने ईश्वरत्व को नहीं छोड़ा। वह पूर्णतः परमेश्वर है और पूर्णतः मनुष्य भी!

हमारी सीमित मानवीय बुद्धि कभी-कभी मसीह के ईश्वरत्व पर इतना ध्यान देती है कि हम यह भूल जाते हैं कि वह हमारे समान पूर्णतः मानव था; और कभी-कभी हम उसकी मानवता में इतने खो जाते हैं कि उसका ईश्वरत्व दृष्टि से हमारी ओझल हो जाता है। परन्तु पवित्रशास्त्र मसीह के इन दोनों स्वभावों को पूर्ण सामंजस्य में रखता है: वह मनुष्य के रूप में पाया गया (फिलिप्पियों 2:8), परन्तु वह केवल वही नहीं था जो बाहरी दृष्टि से प्रतीत होता था।

यीशु में वह सामर्थ्य था जो बाहरी रूप से दिखाई नहीं देता था। वह देखने में तो अन्य पुरुषों के समान प्रतीत होता था, परन्तु ऐसा कोई अन्य मनुष्य नहीं है जो आँधी-तूफान के मध्य में नौका में खड़ा होकर समुद्र को शान्त कर दे। केवल परमेश्वर ही लंगड़े को चला सकता है या अन्धे को दृष्टि दे सकता है। केवल वही मनुष्य स्वर्गदूतों की आराधना और सम्पूर्ण सृष्टि की स्तुति का अधिकारी है। फिर भी यीशु ने जब देहधारण किया, तो यह सोचकर नहीं आया कि मुझे इससे क्या लाभ मिलेगा? बल्कि वह इस उद्देश्य के साथ आया कि “मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे” (मरकुस 10:45)।

उसने सब कुछ छोड़ने और “शून्य” बनने को स्वीकार किया, ताकि अपनी शून्यता को स्वीकार करने वाले लोगों को परमेश्वर “सब कुछ” दे सके। वह देहधारी हुआ ताकि वह सेवा कर सके, और उसने उन सब के लिए दीनता का उत्तम आदर्श प्रस्तुत किया, जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं। आज जब आप अपने कार्यों और जिम्मेदारियों में लगें हैं, तो क्या आप यीशु के इस नम्र आदर्श की ओर दृष्टि करेंगे?

फिलिप्पियों  2:1-13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 34–36; लूका 11:29-54

4 दिसम्बर : परमेश्वर की सन्तान

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4 दिसम्बर : परमेश्वर की सन्तान
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“परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्‍वर से उत्पन्न हुए हैं।” यूहन्ना 1:12-13

कुछ कलीसियाओं में यह आम बात है कि वे परमेश्वर की सार्वभौमिक पितृत्व और मानवजाति के भाईचारे की बात करते हैं। परन्तु हमें ऐसे दावों की सीमाओं के प्रति सजग रहना चाहिए। यह बात एक अर्थ में सत्य है कि हम सब सृष्टि के भाव से परमेश्वर की सन्तान हैं, परन्तु नया नियम यह भी स्पष्ट करता है कि साथ ही हम “क्रोध की सन्तान” हैं (इफिसियों 2:3)—जो खोए हुए हैं और जिन्हें परमेश्वर के परिवार में ग्रहण किए जाने की आवश्यकता है।

हम स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की सन्तान नहीं बनते। यह न तो मानव वंशानुक्रम का परिणाम है, न ही किसी मानवीय प्रयास का। कोई भी जन्म से परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं करता—इसीलिए यीशु ने नीकुदेमुस से कहा, जो कि एक धार्मिक पुरुष था और यहूदी वंशावली में निर्दोष था, कि उसे नए सिरे से जन्म लेना अवश्य है (यूहन्ना 3:3)। परमेश्वर की सन्तान बनना एक आत्मिक प्रक्रिया है—ऐसा कार्य जिसे परमेश्वर अपनी दया और अनुग्रह से हमारे लिए करता है।

अपने शारीरिक जन्म के विषय में सोचें। उस पर आपका कोई नियन्त्रण नहीं था। यह आपकी अपनी उपलब्धि नहीं थी। मसीह में नया जन्म भी ऐसा ही है। जब परमेश्वर किसी को नया जन्म देता है, तो जो नया जीवन उत्पन्न होता है वह केवल उसी की प्रभुता के कारण सम्भव होता है। वही हमें अपनी सन्तान बनने का अधिकार देता है।

कहा जाता है कि सम्राट नेपोलियन एक बार अपने घोड़े पर से लगभग गिर ही गया था जब उसने लगाम छोड़ दी ताकि अपने साथ रखे दस्तावेज़ पढ़ सके। जैसे ही घोड़ा बेकाबू हुआ, एक युवा सैनिक ने तुरन्त हस्तक्षेप किया और घोड़े की लगाम थाम ली। नेपोलियन ने उसकी ओर मुड़कर कहा, “धन्यवाद, कप्तान।” सैनिक ने तुरन्त पूछा, “किस टुकड़ी का, श्रीमान?” सम्राट ने उत्तर दिया, “मेरे अंगरक्षकों का।”[1]

क्षणमात्र में उस सैनिक को पदोन्नत कर दिया गया, उसे सेनापति के मुख्यालय में प्रवेश का अधिकार मिल गया और वह सम्राट के अधिकारियों में सम्मिलित हो गया। जब लोगों ने उससे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहा है, तो वह उत्तर दे सकता था: “मैं सम्राट के आदेश से अंगरक्षकों का कप्तान हूँ।”

यदि आपने यीशु को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता ग्रहण किया है, तो आप परमेश्वर की सन्तान हैं। परमेश्वर ने आपके जीवन पर एक नई पहचान की मुहर लगा दी है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। आप इस महान आश्वासन के साथ जीवन जी सकते हैं कि राजाओं के राजा और आपके उद्धार के सेनापति यीशु ने आपको परमेश्वर की सन्तानों में गिने जाने के योग्य बना दिया है। यही वह महान सत्य है जो अब आपकी पहचान का केन्द्र है—फिर चाहे आप कोई भी हों और आपकी परिस्थिति कोई भी हो। यही वह सत्य है जो आपको हर दिन सिर उठाकर, आत्मविश्वास से जीने में समर्थ बनाता है, यह जानते हुए कि जो भी हो, आप परमेश्वर की सन्तान हैं।

  1 यूहन्ना 2:28 – 3:3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 32–33; लूका 11:1-28 ◊


[1] जेम्स मोण्ट्गोमेरी बोइस, दि गॉस्पल ऑफ जॉन: ऐन एक्सपोज़िशनल कॉमैण्ट्री (ज़ोण्डरवन, 1975), खण्ड. 1, पृ. 89.

3 दिसम्बर : परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देना

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3 दिसम्बर : परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देना
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“वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।” यूहन्ना 1:11

बहुत से अभिनेता यह सोचते हैं कि वे हैमलेट की भूमिका निभाने के योग्य हैं। परन्तु अनेक बार, वे वास्तव में उस योग्य नहीं होते। उनमें वह क्षमता और अनुभव नहीं होता, जो इस गहन भूमिका के लिए अपेक्षित है—हालाँकि यह तथ्य उन्हें इसका प्रयास करने से रोकता नहीं है!

इसी प्रकार, हर पुरुष और स्त्री अपने जीवन में किसी न किसी समय परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देने के प्रलोभन में पड़ते हैं और यह भ्रम पाल लेते हैं कि वे वह भूमिका निभा सकते हैं जो केवल वही निभा सकता है। अक्सर हम अपनी परिस्थितियों में उसकी दिव्य योजना और नियन्त्रण पर भरोसा करने में असफल होते हैं। इसके स्थान पर, हम उसके सम्पूर्ण प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते हैं। हम उस स्थान को छीनने का प्रयास करते हैं, जो केवल सृष्टिकर्ता परमेश्वर का है।

परमेश्वर के अधिकार का विरोध कोई नई बात नहीं है। जब यीशु पुराने नियम की भविष्यवाणियों की पूर्ति के रूप में इस पृथ्वी पर आया, तब भी अपने सेवा-काल में वह अपने ही लोगों द्वारा अस्वीकार किया गया। इस्राएल मसीह की प्रतीक्षा कर रहा था—परन्तु जब वह आया, तब उन्होंने उसके अधिकार पर प्रश्न उठाया और उसकी पहचान को अस्वीकार कर दिया। वे भविष्यवाणियों को जानते थे, परन्तु उनकी पूर्ति को नहीं पहचान सके।

यहूदी धार्मिक अगुवों और अन्यजाति शासकों द्वारा क्रूस पर मारे जाने से कुछ दिन पहले यीशु ने दुष्ट किसानों का दृष्टान्त कहा, जिन्होंने दाख-वाटिका के स्वामी के पुत्र को अस्वीकार किया और उसे मार डाला। प्रभु ने इस दृष्टान्त के द्वारा मुख्य याजकों, शास्त्रियों और अगुवों के आत्मिक अन्धेपन को उजागर किया, जो उससे उसके कार्यों का हिसाब मांग रहे थे (मरकुस 12:1–12)। वे समझ गए थे कि यीशु स्वयं को परमेश्वर का पुत्र कह रहा था। परन्तु जब यीशु ने स्पष्ट रूप से उन्हें चेतावनी दी कि वे उन किसानों जैसे हैं, जिन्होंने स्वामी के पुत्र को मार डाला, तब दुख की बात है कि वे उसी क्षण उसे पकड़ने का षड्यन्त्र रचने लगे!

हमें यह सोचने का प्रलोभन हो सकता है: “वे धार्मिक अगुवे कितने घमण्डी थे, जो सृष्टि के राजा के सामने खड़े होकर उसके अधिकार को चुनौती दे रहे थे!” परन्तु सच तो यह है कि हम भी पहले उनसे भिन्न नहीं थे। अपने पापपूर्ण स्वभाव में, हम भी उस पुत्र को ग्रहण नहीं करना चाहते थे जिसे परमेश्वर ने भेजा था। हम अन्धकार में रहना पसन्द करते थे। सच कहें तो, वह अन्धकार हमें भाता था!

यूहन्ना इस सत्य को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है जब वह कहता है, “ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उनके काम बुरे थे” (यूहन्ना 3:19)। मनुष्य स्वाभाविक रूप से यह नहीं करते कि वे बैठकर सुसमाचार की ज्योति को अपने हृदय में आने की प्रतीक्षा करें। परन्तु अपने अनुग्रह में, परमेश्वर अन्धों की आँखें खोलता है, जिससे वे उसके पुत्र की पहचान को देखें, उस पर विश्वास करें और उसकी आराधना करें।

यही कारण है कि बाइबल हमेशा “आज” की बात करती है। मसीह के लिए जीवन जीने का कोई दिन आज से उत्तम नहीं है। हम विश्वासियों को भी, अपने मसीही जीवन में निरन्तर पश्चाताप और पुनर्स्थापना के लिए बुलाया गया है। हमें अपने जीवन में वह स्थान नहीं हथियाना है, जो केवल परमेश्वर के लिए आरक्षित है। जब हमारे हृदय अपने पाप के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, और जब हम उसके धीरज और दया को अनुभव करते हैं, तो उसकी भलाई हमें पवित्रता की ओर ले जाती है। और जब आप अपने जीवन के केन्द्र में परमेश्वर को रखते हैं—उसे वह भूमिका निभाने देते हैं जो केवल उसी के योग्य है—तब आप आनन्द और आत्मविश्वास के साथ उस भूमिका को पूरा कर सकते हैं जो उसने आपको दी है, अर्थात वह जीवन जीना जो उसने आपको उपहारस्वरूप दिया है, और उस उद्देश्य को पूरा करना जिसके लिए उसने आपको जीवन के “मंच” पर बुलाया—एक ऐसा जीवन जो उसे जानने, उससे प्रेम करने, और उसकी सेवा करने में व्यतीत होता है।

मरकुस 12:1-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 30–31; लूका 10:25-42

2 दिसम्बर : सृष्टिकर्ता को जानना

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2 दिसम्बर : सृष्टिकर्ता को जानना
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“सच्‍ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आने वाली थी। वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहचाना।” यूहन्ना 1:9-10

यद्यपि चारों सुसमाचार प्रभु यीशु मसीह के जीवन का विवरण देने के लिए भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाते हैं, फिर भी उनका उद्देश्य एक ही है: जैसा कि यूहन्ना लिखता है, “तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है, और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ” (यूहन्ना 20:31)। ये वचन उसके सुसमाचार के अन्त के निकट आते हैं और यह उसके आरम्भिक पाठकों को यह स्मरण दिलाने के लिए लिखे गए थे कि परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक पहल की, ताकि हम उसे जानें और उससे प्रेम करें।

यद्यपि यीशु उस संसार का सृष्टिकर्ता था जिसमें वह आया, फिर भी संसार ने उसे नहीं पहचाना। वह स्वर्ग से मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर उतरा, नगरों की गलियों में चला-फिरा, और हमारे बीच वास किया, ताकि हम उसके साथ ज्योति में जीएँ और अनन्तकाल के लिए अन्धकार में न पड़े रहें। परन्तु आज भी, जैसे दो हज़ार वर्ष पूर्व था, बहुत से लोग इस संसार में मसीह द्वारा प्रदान किए गए जीवन के महानतम वरदान को नहीं समझते, और इस कारण वे उस अनन्त जीवन को भी खो देते हैं, जिसे मसीह ने हमें देने के लिए जन्म लिया, क्योंकि वे उसे नहीं जानते।

प्रेरित पौलुस ने अपनी प्रभावशाली पुस्तक रोमियों में लिखा कि परमेश्वर के “अदृश्य गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व, जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं” (रोमियों 1:20)। अर्थात्, सामान्य अनुग्रह के कारण सृष्टि में इतना प्रमाण विद्यमान है कि मनुष्य कम से कम एक सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर सके। इसलिए मनुष्य “निरुत्तर हैं” (रोमियों 1:20)।

किन्तु इस सन्दर्भ में भी पौलुस आगे कहता है कि “परमेश्वर को जानने पर भी उन्होंने परमेश्वर के योग्य बड़ाई और धन्यवाद न किया, परन्तु व्यर्थ विचार करने लगे, यहाँ तक कि उनका निर्बुद्धि मन अन्धकारमय हो गया” (रोमियों 1:21)। वे परमेश्वर के अस्तित्व से अवगत थे, परन्तु उन्होंने उस सत्य को दबा दिया, और प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में उसे जानने से इनकार कर दिया।

यह हमारे लिए एक विनम्रतापूर्ण चेतावनी है। यदि हम परमेश्वर को उसका यथोचित सम्मान और महिमा नहीं देते, तो हम इस तथ्य को भूलने का जोखिम उठाते हैं कि वह आज भी प्रेमपूर्वक और अनुग्रह से हमारी खोज करता है।

पश्चिमी संसार में प्रभु यीशु का वचन, सत्य और कथा सदियों से उपलब्ध हैं—फिर भी, यहाँ के लोग यह पहचाने बिना अपना जीवन जीते रहते हैं कि यीशु वास्तव में कौन है। विश्वासी भी इस दशा से बचे हुए नहीं है; वे ऐसे जीवन जीते हैं जिनमें रविवार की आराधना या सुबह की भक्ति को छोड़कर और कहीं कोई चिह्न नहीं दिखता कि वे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु को जानते हैं। कल्पना करें कि यदि हम हर क्षण यह स्मरण रखते कि वही हमारे भीतर का प्रकाश और नया जीवन है, कि वही हमें अनन्तकाल परमेश्वर के साथ बिताने के योग्य बनाता है, कि वही हमारा महान प्रभु और दीन उद्धारकर्ता है और उसे जानना सबसे मूल्यवान है, तो इससे हमारे जीवन में कितना अधिक अन्तर आ जाता।

1 कुरिन्थियों 1:18-31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 28–29; लूका 10:1-24 ◊

1 दिसम्बर : आदि में वचन था

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1 दिसम्बर : आदि में वचन था
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“आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था। यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था।” यूहन्ना 1:1-2

हमारे मन में यीशु मसीह की जो तस्वीरें बनी हुई हैं, वे बाइबल की थियोलॉजी के बजाय कलात्मक कल्पनाओं पर आधारित हैं। बाइबल में मसीह का शारीरिक वर्णन नहीं मिलता, सिवाय इसके कि वह “डील–डौल में . . . बढ़ता गया” (लूका 2:52)। इसलिए यह हमारे लिए अत्यन्त अनुपयोगी है कि हम उसकी कल्पना सुनहरे बालों और चमकीली नीली आँखों वाले व्यक्ति के रूप में करें, जैसा कि पश्चिमी संस्कृति में प्रचलित है। इस प्रकार की कल्पना न केवल यह भूल जाती है कि यीशु एक मध्य-पूर्वी यहूदी था, बल्कि यह हमें यूहन्ना के सुसमाचार में जिस अद्‌भुत रीति से यीशु का परिचय दिया गया है, उसे समझने और उसका आनन्द लेने से भी वंचित कर देती है।

यूहन्ना अपने सुसमाचार के पहले ही पद से मसीह की शाश्वतता, व्यक्तित्व और दिव्यता को प्रकट करता है। हम समय के आरम्भ को जितना भी पीछे लेकर जाएँ, या समय की उत्पत्ति के बारे में हमारे मन में जो भी विचार हो, वहाँ हम परमेश्वर के पुत्र को उसके देहधारण के पहले के रूप में पाएँगे। उसे सृजा नहीं गया था, क्योंकि वह स्वयं सृष्टिकर्ता है। चरनी में पड़ा शिशु वही था जिसने आकाश में तारों को रखा था—यहाँ तक कि वही तारा भी, जिसने पूरब से ज्योतिषियों को उसकी आराधना करने के लिए मार्ग दिखाया था।

अपनी शाश्वतता में यह वचन, अर्थात यीशु, पिता और पवित्र आत्मा से भिन्न है, भिन्न व्यक्ति है लेकिन सार-तत्व में नहीं। वह “परमेश्वर के साथ था,” फिर भी वह “परमेश्वर था।” यह भले ही रहस्यमयी लगे, लेकिन यूहन्ना किसी अमूर्त विचार की बात नहीं कर रहा था; वह उस व्यक्ति का वर्णन कर रहा था, जिससे वह मिला था, जिसे उसने स्वयं देखा, सुना और छूआ था। मंच अब तैयार है, ताकि प्रेरित यूहन्ना के साथ पाठक भी कह सकें, “यह जीवन प्रगट हुआ, और हमने उसे देखा” (1 यूहन्ना 1:2), क्योंकि यही जीवित परमेश्वर के वचन का सामर्थ्य है।

जब यूहन्ना इस सच्चाई को दृढ़ता से स्थापित करता है कि मसीह न केवल परमेश्वर के साथ था, बल्कि वह स्वयं परमेश्वर था, तो वह चाहता है कि हम उसके पूरे सुसमाचार को यीशु की दिव्यता को ध्यान में रखकर पढ़ें। जब हम हर पन्ना पलटें, यीशु के वचन पढ़ें और उसके कार्यों को देखें, तो हमें यह समझना चाहिए कि ये स्वयं परमेश्वर के वचन और कार्य हैं।

यदि यीशु मात्र एक भला मनुष्य था, तो यूहन्ना के सुसमाचार में जो कुछ भी लिखा है, वह वास्तव में ईश-निन्दा है। परन्तु वह केवल मनुष्य नहीं था। वह सम्पूर्ण सृष्टि के परमेश्वर के साथ एक था, है, और सदा रहेगा। हमें यूहन्ना के आरम्भिक पदों को समझने की आवश्यकता है, ताकि हम यीशु को सही रूप में जान सकें और हम ब्रूस मिल्ने के शब्दों में कह सकें: “हम उसकी आराधना बिना रुके करें, उसकी आज्ञा बिना झिझक मानें, उससे बिना किसी शर्त के प्रेम करें, और उसकी सेवा बिना रुके करते रहें।”[1]

यदि आज आपको प्रभु की आराधना करने, उसकी आज्ञा मानने, उससे प्रेम करने या उसकी सेवा करने में कठिनाई हो रही है, तो उत्तर यही है: उसकी ओर देखें। क्योंकि जितना अधिक हम यह समझेंगे कि चरनी में पड़ा वचन वही था जो आदि से परमेश्वर के साथ था और परमेश्वर था, उतना ही सहज रूप से हमारे मसीही कर्तव्य आनन्द में बदलते जाएँगे।

यूहन्ना 1:1-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 25–27; लूका 9:37- 62


[1] द मैसेज ऑफ जॉन, द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकैडेमिक, 2020), पृ. 21.

30 नवम्बर : परमेश्वर हमारी पुकार सुनता है

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30 नवम्बर : परमेश्वर हमारी पुकार सुनता है
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“इस्राएली कठिन सेवा के कारण लम्बी-लम्बी साँस लेकर आहें भरने लगे, और पुकार उठे … परमेश्‍वर ने उनका कराहना सुनकर अपनी वाचा को … स्मरण किया।” निर्गमन 2:23-24

भोजन की प्रतिज्ञा ने याकूब और उसके परिवार को अपने अकालग्रस्त देश को छोड़ने और मिस्र जाकर यूसुफ के साथ बसने के लिए प्रेरित किया। कुछ समय तक सब कुछ बहुत अच्छा था। लेकिन परिस्थितियाँ तब बिगड़ने लगीं जब मिस्र में एक नया राजा सत्ता में आया। उसे इस्राएलियों की बढ़ती संख्या और प्रभाव अच्छा नहीं लगा, इसलिए उसने उन्हें कठोर दासता में झोंक दिया। उनका जीवन आँसुओं और कड़वाहट से भर गया।

परमेश्वर की प्रजा के पास अब भी उसकी प्रतिज्ञाएँ थी, लेकिन वे प्रतिज्ञाएँ अब खोखली सी लगने लगी थीं। जब वे स्वतन्त्र थे और भरपेट खाते थे, तब परमेश्वर पर भरोसा करना आसान था। लेकिन जब वे गुलामी में थे, तब यह भरोसा बहुत कठिन हो गया। वर्षों की लम्बी पीड़ा में कुछ लोगों ने अवश्य सोचा होगा: मुझे लगता है परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को भूल गया है। मुझे अब बिल्कुल भरोसा नहीं कि वह सचमुच वही करेगा जो उसने कहा था। फिर भी, इसके बावजूद, उन्होंने परमेश्वर को पुकारा और छुटकारे की तीव्र पुकार लगाई।

परमेश्वर ने उन्हें नहीं भुलाया था—और उसका उत्तर आया। परमेश्वर ने उनकी आहें सुनीं; उसने उनकी कराह को सुना और प्रतिक्रिया में उसने छुटकारे की एक योजना आरम्भ की। परमेश्वर उन्हें उनके दुख में छोड़ने वाला नहीं था। वह उन्हें दासता से छुड़ाने के लिए अपनी योजना को पूरा करने जा रहा था। उसने “अपनी वाचा को स्मरण किया”—इसका यह अर्थ नहीं कि वह अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा को भूल गया था, बल्कि यह कि अब, एकदम सही समय पर (हालाँकि शायद उस समय नहीं जब उसकी प्रजा चाहती थी), उसने अपने लोगों से की गई वाचा को पूरा करने की दिशा में कार्य किया।

यही वह सच्चाई है जो आज परमेश्वर की प्रजा को याद दिलाए जाने की आवश्यकता है, ठीक वैसे ही जैसे तब थी: परमेश्वर हमारी कराह को सुनता है, वह हमारे हालात को जानता है, और वह कार्य करेगा। उसकी एक भी प्रतिज्ञा असफल नहीं होगी। वास्तव में, जब हमारे दुखों में हमारे शब्द समाप्त हो जाते हैं, तब हम यह पाते हैं कि पवित्र आत्मा स्वयं हमारे लिए कराहते हुए प्रार्थना करता है (रोमियों 8:26-27)। यही है परमेश्वर की हमारे लिए चिन्ता की गहराई और उसके अपने लोगों के लिए अनन्त भलाई करने की प्रतिबद्धता।

जब आपकी आत्मा की पुकारें अनसुनी लगने लगें—जब आप सोचने लगें कि क्या कोई सच में परवाह करता है—तो याद करें कि परमेश्वर ने स्वयं को मिस्र में और सर्वोत्तम रूप से अपने पुत्र में कैसे प्रकट किया है:

मैं क्यों उदास हो जाऊँ,

क्यों अंधेरे मुझे घेरें,

क्यों मेरा हृदय अकेला हो

और स्वर्ग व घर की लालसा करे,

जब यीशु ही मेरा भाग है?

वह मेरा सदा का मित्र है।

उसकी दृष्टि गौरैया पर है,

और मैं जानता हूँ—वह मुझ पर भी दृष्टि रखता है।[1]

छुटकारे के लिए पुकारते रहें। परमेश्वर सुनता है, परवाह करता है, और आपके लिए कार्य करता है।

  मरकुस 5:21-43

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 23–24; लूका 9:18-36 ◊


[1] सिविल्ला डी. मार्टिन, “हिज़ आई इज़ ऑन द स्पैरो” (1905)

29 नवम्बर : एकता में आराधना

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29 नवम्बर : एकता में आराधना
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“हे भाइयो, मैं तुम से हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से विनती करता हूँ कि तुम सब एक ही बात कहो, और तुम में फूट न हो, परन्तु एक ही मन और एक ही मत होकर मिले रहो।” 1 कुरिन्थियों 1:10

सुसमाचार में एकता रखने वाली कलीसिया एक स्वस्थ कलीसिया होती है। और विभाजन से बढ़कर और कुछ नहीं है जो कलीसिया को इतनी तेजी से नष्ट करता है।

परमेश्वर की प्रजा के साथ हमेशा से ऐसा ही होता रहा है। जब-जब वे एकता में रहे हैं, उन्होंने अपना सर्वोत्तम समय देखा है। उदाहरण के लिए, जब इस्राएली लोग बेबीलोन की बँधुआई से लौटे, तो नहेम्याह 8 में लिखा है कि वे “एक मन होकर” एकत्र हुए ताकि याजक एज्रा द्वारा व्यवस्था की पुस्तक का सार्वजनिक पाठ सुन सकें (नहेम्याह 8:1)। उस समय लगभग 5,000 पुरुष और स्त्रियाँ जल फाटक के सामने के चौक में एकता और आपसी समर्पण की भावना से इकट्ठा हुए थे। उनका ध्यान केवल इस पर नहीं था कि “मुझे इस उपदेश से क्या मिल रहा है,” बल्कि इस पर भी था कि “मैं अपने साथियों के लिए क्या ला रहा हूँ, जो मेरे साथ आराधना करने आए हैं।”

परमेश्वर की प्रजा को आराधना में इसी भावना से आना चाहिए यदि हमें अपने बीच सच्ची एकता चाहिए।

जब हम वास्तव में मसीह के साथ चल रहे होते हैं, तो हम उन लोगों के साथ सामूहिक आराधना करने की लालसा रखते हैं जो मसीह से प्रेम करते हैं। हालाँकि हमारी प्रेरणा कभी-कभी क्षीण हो सकती है, फिर भी पवित्र आत्मा की सहायता से हम भजनकार की आराधना की भावना को अपना कर कह सकते हैं: “जब लोगों ने मुझ से कहा, ‘आओ, हम यहोवा के भवन को चलें,’ तब मैं आनन्दित हुआ!” (भजन 122:1)। सामूहिक कलीसिया की आराधना केवल एक कार्यक्रम नहीं है, जिसमें हम भाग लें या उसे बर्दाश्त करें; यह हमारे राजा के प्रति हमारी साझी निष्ठा की घोषणा है और परमेश्वर की प्रजा द्वारा प्राप्त गहन एकता की सामर्थी याद दिलाती है।

हमारी कलीसियाओं में हम हमेशा एकमत नहीं होते और नहीं होंगे—हमारी अपनी व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द और मान्यताएँ होती हैं। लेकिन परमेश्वर के परिवार में सदस्यता का मूल किसी बात पर स्पष्ट एकता में होना चाहिए—जैसे बाइबल की अधिकारिता, यीशु की केन्द्रीयता और प्रधानता, सुसमाचार प्रचार की अनिवार्यता, और प्रार्थना व आराधना की अपने दैनिक जीवन में प्राथमिकता। यही साझे विश्वास परमेश्वर की प्रजा को एकता में एकत्र होने की शक्ति देते हैं।

इसलिए, यद्यपि मंच से हास्य, सुन्दर संगीत, और परिवारों के लिए अर्थपूर्ण कार्यक्रम प्रभु की ओर से उपहार हो सकते हैं, तौभी वे हमारी प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय, हमें एकता में मिलकर आराधना करने की इच्छा रखते हुए अपने सह-विश्वासियों के लिए प्रार्थना में लगे रहना चाहिए, यह मांगते हुए कि परमेश्वर के वचन के सत्य को सुनने की हमारी स्वयं की इच्छा आत्मिक जागृति का कारण बने। क्योंकि जब कोई मण्डली प्रार्थनापूर्वक अपेक्षा करती है, तो परमेश्वर निश्चय ही वही करेगा जो उसने अपने वचन के माध्यम से करने का प्रतिज्ञा की है।

कलीसिया के प्रति “पहले मैं” वाला दृष्टिकोण रखना और तुरन्त आलोचना करना बहुत आसान होता है—आसान, लेकिन घातक होता है। अगले रविवार को सुनिश्चित करें कि आप वहाँ केवल अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए भी हों। आप अपने गीतों और वचनों में ऐसी भावना रखें जो साझी एकता को बनाए और मजबूत करे।

नहेम्याह 8:1-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 21–22; लूका 9:1-17