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27 सितम्बर : वे अपने फल से पहचाने जाते हैं

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27 सितम्बर : वे अपने फल से पहचाने जाते हैं
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“कोई अच्छा पेड़ नहीं जो निकम्मा फल लाए, और न तो कोई निकम्मा पेड़ है जो अच्छा फल लाए। हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है।” लूका 6:43-44

छात्र हमेशा अपने शिक्षकों की शिक्षा का प्रतिबिम्ब होते हैं। चाहे कोई छात्र अपने शिक्षक की क्षमताओं से कहीं आगे क्यों न बढ़ जाए, वह हमेशा उस मार्गदर्शन का ऋणी रहेगा जो उसे मिला था।

जब यीशु ने पेड़ों और उनके फलों के बारे में कहा, तो उनका ध्यान अपने समय के आत्मिक अगुवों की ओर था। इस शिक्षा के माध्यम से उसने हमें एक चेतावनी दी—कि हम गलत शिक्षक का चुनाव न करें। और हम यह कैसे जानें कि कौन-सा शिक्षक अच्छा है और कौन बुरा? यीशु कहता है—उसके फलों से, अर्थात् उनकी शिक्षा और आचरण से जो परिणाम निकलते हैं, वे बताएँगे कि वह शिक्षक कैसा है।

जब हम फलों की बात करते हैं, तो हम शिक्षक के चरित्र के सम्बन्ध में बात कर रहे हैं—और चरित्र को केवल बोलने की कला या प्रतिभा से नहीं परखा जा सकता। यीशु ने जब दाखलता और डाली की बात की, तो वहाँ यह स्पष्ट होता है कि फलवन्त होने का अर्थ मसीह के समान होना है (यूहन्ना 15:1–8)। हर पेड़ उसके फल से पहचाना जाता है। इसलिए आत्मा का फल—प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम (गलातियों 5:22–23)—एक अच्छे शिक्षक के जीवन में स्पष्ट रूप से प्रकट होगा।

हमें शिक्षक की शिक्षा की सामग्री को भी परखना चाहिए। पौलुस ने जब अपने प्रिय सेवक तीमुथियुस को लिखा, तो उसने इस मसले पर कहा: “अपनी चौकसी रख”—अर्थात् अपने चरित्र की—“और अपने उपदेश की चौकसी रख” (1 तीमुथियुस 4:16)। क्योंकि हर वह व्यक्ति जो बाइबल लेकर आता है, जरूरी नहीं कि आपके हित में ही बोलता हो। हर वह व्यक्ति जो मसीह का नाम लेता है, जरूरी नहीं कि वह परमेश्वर के वचन का सच्चा शिक्षक हो। झूठे भविष्यवक्ताओं की भरमार है। इसलिए मसीही विश्वासियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे बाइबल से सीखें, न केवल पवित्रता में बढ़ने के लिए, बल्कि सही शिक्षा को पहचानने के लिए भी—जो कि एक परमेश्वर-भक्त शिक्षक की पहचान है। हमें इस तथ्य से भी ढाढ़स मिलना चाहिए कि पवित्र आत्मा हमारे भीतर निवास करता है, जो हमें सब बातों की शिक्षा देता है और सत्य व असत्य के बीच अन्तर समझने की बुद्धि देता है (1 यूहन्ना 2:27)।

एक शिक्षक के चरित्र और उसकी शिक्षा की सामग्री में गहरा सम्बन्ध होता है—और इसका सीधा असर उस व्यक्ति पर पड़ता है जो उससे शिक्षा प्राप्त करता है। इसलिए अपने आत्मिक शिक्षकों और मार्गदर्शकों का चुनाव सोच-समझकर करें। उनकी बोलने की कला या सांस्कृतिक समझदारी या आत्मविश्वास या हास्य या लोकप्रियता को मत देखें—बल्कि देखें कि उनका चरित्र कैसा है और वे क्या सिखा रहे हैं। क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके जीवन में वही फल दिखाई देगा, जो आप अपने शिक्षक से सीखते हैं। जब लोग आपके पास आएँगे, तो वे क्या पाएँगे? क्या वे आलोचना, कटुता, अभिमान या आत्म-धार्मिकता पाएँगे? क्या वे उत्साह की कमी और विश्वास की दुर्बलता पाएँगे? या फिर, क्या वे प्रेम, आनन्द, शान्ति और धार्मिकता के मधुर फल को चख पाएँगे?

2 तीमुथियुस 2:15-26

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 18–19; यूहन्ना 12:1-26 ◊

26 सितम्बर : तिनका और लट्ठा

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26 सितम्बर : तिनका और लट्ठा
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“जब तू अपनी ही आँख का लट्ठा नहीं देखता, तो अपने भाई से कैसे कह सकता है, ‘हे भाई; ठहर जा तेरी आँख से तिनके को निकाल दूँ’? हे कपटी, पहले अपनी आँख से लट्ठा निकाल, तब जो तिनका तेरे भाई की आँख में है, उसे भली भाँति देखकर निकाल सकेगा।” लूका 6:42

मुझे एक बार की घटना याद है—मैं एक परीक्षा में डेस्क पर बैठा था, जैसे ही मैंने प्रश्न-पत्र पलटा, तुरन्त ही मैं इधर-उधर देखने लगा कि क्या बाकी सभी लोग भी पहले प्रश्न को देखकर उतने ही परेशान हैं जितना मैं था। तभी शिक्षक की सख़्त आवाज़ आई: “दूसरों को मत देखो, खुद पर ध्यान दो!”

यीशु भी इन पदों में कुछ ऐसा ही कहता है—एक प्रभावशाली उपमा के ज़रिए वह अपने श्रोताओं को यह सिखाता है कि दूसरों के पापों की ओर अंगुली उठाने से पहले उन्हें अपने पापों से निपटना चाहिए। यीशु ने “तिनके” के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया है, वह आमतौर पर भूसे या लकड़ी के बहुत ही छोटे कणों के लिए इस्तेमाल होता है। इसके विपरीत, “लट्ठे” का भाव किसी घर की छत का भार-वहन करने वाली बड़ी लकड़ी से है। अगर मेरी आँख में ऐसा लट्ठा है, तो यह स्पष्ट है कि दूसरे की आँख का तिनका निकालने से पहले मेरी आँख के लट्ठे को निकाला जाना ज़रूरी है।

पतित मनुष्यों के रूप में हम अक्सर यह सोचने की प्रवृत्ति रखते हैं कि अपनी आत्मिक स्थिति का ध्यान रखने से पहले दूसरों की आत्मिक स्थिति को सुधारना हमारी प्राथमिक ज़िम्मेदारी है। लेकिन मसीह ने हमें इसलिए नहीं बुलाया है कि हम प्राथमिक और प्रारम्भिक रूप से पहले दूसरों की आँखों से तिनके निकालें। नहीं, वह कहता है कि पवित्रशास्त्र के प्रकाश में और उसके द्वारा ठहराए गए मापदण्ड के अनुसार हमें स्वयं को परखना है।

यीशु की यह शिक्षा हमारे सामने एक बड़ी चुनौती रखती है। कई बार हम दूसरों की गलतियों को इस बहाने उजागर करते हैं कि हम उनकी आत्मिक भलाई चाहते हैं। लेकिन यदि हमने पहले अपने ही पापों के प्रति ईमानदारी और कठोरता नहीं दिखाई, तो वह केवल पाखण्ड है! हम अक्सर इस झूठे विचार का शिकार हो जाते हैं कि यदि मैं तुम्हारी गलती पकड़ लूँ और तुम्हें सुधार दूँ, तो शायद मुझे अपने पापों से निपटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। दूसरों की दशा पर बात करना अक्सर अपने हृदय की सच्चाई से सामना करने से आसान लगता है।

यदि हम वास्तव में दूसरों की सहायता करना चाहते हैं, तो पहले हमें अपने हृदय की गम्भीर अवस्था को पहचानना होगा—जैसा कि रॉबर्ट मुरे म’शेन ने कहा था: “सभी पापों के बीज मेरे हृदय में हैं।”[1] जब हम यह सच्चाई स्वीकार कर लेते हैं और उस पर विश्वास करते हैं, तब जब हम दूसरों की ओर जाते हैं, तो हम नम्रता और प्रेम के निम्न स्तर पर खड़े होते हैं, न कि अहंकार और पूर्वानुमान के ऊँचे स्तर पर। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच का अन्तर सम्पूर्ण जीवन का अन्तर है।

यहूदा 20-25

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 16–17; यूहन्ना 11:28-57


[1] एण्ड्रू बोनार, मेमोयर ऐण्ड रिमेंस ऑफ रॉबर्ट मुरे म’शेन (बैनर ऑफ ट्रुथ, 1995) में उद्धृत, पृ. 153.

25 सितम्बर : क्षमाशीलता की विशालता

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25 सितम्बर : क्षमाशीलता की विशालता
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“क्षमा करो, तो तुम्हें भी क्षमा किया जाएगा। दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा।” लूका 6:37-38

हमारे हृदय और सोच को जितनी जल्दी कोई चीज़ भ्रष्ट कर सकती है, वह है क्षमा न करने वाला हृदय। लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सत्य है: सच्चे दिल से क्षमा देने के अनुभव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, जो हमें इतनी जल्दी आन्तरिक स्वतन्त्रता, आनन्द और शान्ति देता है। वास्तव में, किसी को क्षमा करने की हमारी तत्परता ही हमारे आत्मिक जीवन की एक कसौटी है; जब हम पूरे दिल से क्षमा करते हैं, तो यह प्रमाण होता है कि हम वास्तव में परमप्रधान परमेश्वर के पुत्र और पुत्रियाँ हैं (लूका 6:35)।

हमें क्षमा किए जाने और हमारी ओर से क्षमा दिए जाने की इच्छा को यीशु प्रायः एक साथ रखता है (लूका 11:4 देखें)। इसलिए जब हम क्षमा करने के अभ्यास की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह पूछा जाना चाहिए: हमें क्षमा कहाँ से प्राप्त होती है? उत्तर है—सच्ची क्षमा का स्रोत केवल परमेश्वर ही है। परमेश्वर की दया की प्रचुरता से ही क्षमा बहती है।

क्षमा हमारी आत्मा के जीवन और स्वास्थ्य के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितना शारीरिक भोजन हमारे शरीर के लिए। पवित्रशास्त्र बार-बार हमें यह याद दिलाता है कि परमेश्वर एक क्षमाशील परमेश्वर है। भजनकार कहता है: “हे याह, यदि तू अधर्म के कामों का लेखा ले, तो हे प्रभु, कौन खड़ा रह सकेगा? परन्तु तू क्षमा करने वाला है” (भजन संहिता 130:3-4)। इसी तरह भविष्यद्वक्ता दानिय्येल कहता है: “तू दया का सागर और क्षमा की खान है” (दानिय्येल 9:9)। और परमेश्वर का पुत्र, जब उसपर थूका गया, उसे अपमानित किया गया, उसके वस्त्र छीन लिए गए, क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया और दो अपराधियों के बीच तड़पता हुआ छोड़ दिया गया—तब भी उसने यह कहा: “हे पिता, इन्हें क्षमा कर” (लूका 23:34)। परमेश्वर की क्षमा की भावना अतुलनीय है।

यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा जब हम परमेश्वर की सन्तान बन जाते हैं, तो हमें भी अपने पिता और प्रभु का अनुकरण करते हुए क्षमा का अभ्यास करना है। यह मसीही जीवन का इतना मूलभूत हिस्सा है कि यीशु यहाँ तक कहता है कि यदि हम क्षमा करने को तैयार नहीं हैं, तो हमें गम्भीरता से यह पूछना चाहिए कि क्या हम वास्तव में क्षमा किए गए हैं—अर्थात्, क्या हमने सच में सुसमाचार को अपने हृदय में ग्रहण किया है? (मत्ती 6:14-15 देखें)। यदि आपने अपने हृदय में क्षमा न करने का भाव छिपा रखा है, तो उसे अनदेखा न करें, न ही उसे छोटा समझें। इसके बजाय, सुसमाचार को उसमें प्रवेश करने दें। यह विचार करें कि मसीह के द्वारा आपको कितनी बड़ी क्षमा मिली है। अपने पिता की क्षमाशील प्रकृति को याद करें, जिसे आपको अपने जीवन में प्रकट करना चाहिए। क्षमा न करने के भाव को एक विनाशकारी बोझ और जीवन को खोखला कर देने वाला प्रभाव समझें। विशेष रूप से यह सोचें: किसे क्षमा करना है, और कैसे? यही वह मार्ग है जिस पर चलकर हम उस शान्ति और स्वतन्त्रता का अनुभव कर सकते हैं, जो क्षमा देने से आती है—वैसी ही क्षमा जैसी हमें स्वयं मिली है।

लूका 7:36-50

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 14–15; यूहन्ना 11:1-27 ◊

24 सितम्बर : जीवन बोलो, दोष नहीं

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24 सितम्बर : जीवन बोलो, दोष नहीं
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“दोष मत लगाओ, तो तुम पर भी दोष नहीं लगाया जाएगा। दोषी न ठहराओ, तो तुम भी दोषी नहीं ठहराए जाओगे।” लूका 6:37

अक्सर हम इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमें दूसरों पर दोष लगाने का अधिकार है—क्योंकि यह हमारी पापमयी प्रवृत्ति को भाता है। सच कहें तो, जैसे ही हमें नेतृत्व या अधिकार की कोई भी स्थिति मिलती है—चाहे वह छोटी हो या बड़ी—हमें आश्चर्यजनक रूप से जल्दी यह प्रलोभन घेर लेता है कि हम दया दिखाने की बजाय दोष लगाने लगें।

हमें याद रखना चाहिए कि हम दोष लगाने के योग्य नहीं हैं। क्यों? क्योंकि हम किसी दूसरे के दिल को नहीं पढ़ सकते। हम किसी के इरादों का सही आकलन नहीं कर सकते। केवल परमेश्वर ही यह कह सकता है: “हृदय और मन का परखने वाला मैं ही हूँ, और मैं तुममें से हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला दूँगा” (प्रकाशितवाक्य 2:23)। चूंकि आप और मैं परमेश्वर नहीं हैं, इसलिए हम दोष लगाने के अधिकारी नहीं हैं। हम यीशु की इस आज्ञा को सबसे ज़्यादा और सबसे आसानी से किस तरह तोड़ते हैं? अपनी जीभ से। हम दूसरों की बदनामी करके उनके चरित्र पर दोष लगा देते हैं। मसीही समाज में हम अक्सर बड़ी चालाकी से इस तरह की चुगली को प्रार्थना निवेदन या चिन्ता के रूप में पेश करते हैं—लेकिन सच्चाई यह है कि अक्सर हमें यह कहने में एक अजीब-सी खुशी मिलती है: “क्या तुमने उसके बारे में यह सुना है?” “क्या तुम जानते हो उसने ऐसा क्यों किया?” “तुम्हें मालूम है उसके साथ क्या हुआ?” यह वही भाव है जो फरीसियों में था—दूसरों को दोषी ठहराकर खुद को ऊँचा दिखाना। यह प्रवृत्ति आज भी मसीहियों के बीच जीवित है।

इसीलिए हमें अपने शब्दों के प्रयोग को लेकर बेहद सतर्क रहना चाहिए। अपनी जीभ दोष लगाने की बजाय, हमें पवित्र आत्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें जीवनदायक शब्द बोलने का सामर्थ्य दे। मुँह खोलने से पहले हमें मिशनरी एमी कार्माइकल की इस सलाह को याद रखना चाहिए और स्वयं से पूछना चाहिए: “क्या जो मैं कहने जा रहा हूँ, वह दयालु है? क्या वह सत्य है? क्या वह आवश्यक है?” पवित्रशास्त्र इस विषय पर पूर्णतः स्पष्ट है। वास्तव में, नीतिवचन की पुस्तक हमें सिखाती है: “मूर्ख का विनाश उसकी बातों से होता है, और उसके वचन उसके प्राण के लिए फन्दे होते हैं,” लेकिन “विश्वासयोग्य मनुष्य बात को छिपा रखता है” (नीतिवचन 18:7; 11:13)।

हमें यीशु में एक ऐसा उद्धारकर्ता मिला है, जिसका लहू हमारे हर लापरवाह शब्द और हर निन्दात्मक टिप्पणी से हमें शुद्ध करता है—एक ऐसा उद्धारकर्ता जो हमें उस पापी प्रवृत्ति से क्षमा करता है, जो हमें परमेश्वर की भूमिका हथिया लेने की ओर खींचती है। इस सच्चाई के प्रकाश में, हमें प्रतिदिन अपनी जीभ के पापों के लिए पश्चाताप करना चाहिए और पवित्र आत्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारे मन में एक नई लालसा उत्पन्न करे—कि हमारे मुँह के वचन और हमारे हृदय का ध्यान उसके सम्मुख ग्रहण योग्य हों (भजन संहिता 19:14)।

लूका 6:37-45

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 11–13; यूहन्ना 10:22-42

23 सितम्बर : पिता की दया की अनुकरण करना

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23 सितम्बर : पिता की दया की अनुकरण करना
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“अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, और भलाई करो, और फिर पाने की आशा न रखकर उधार दो; और तुम्हारे लिए बड़ा फल होगा, और तुम परमप्रधान के सन्तान ठहरोगे, क्योंकि वह उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो।” लूका 6:35-36

“जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो”—यीशु के प्रसिद्ध धन्य-वचनों की शिक्षा का सार है (लूका 6:20-23), और वास्तव में यह हर विश्वासी के जीवन का एक उत्तम आदर्श वाक्य हो सकता है। ये शब्द उस हर बात पर बल देते हैं, जो यीशु पहले ही हमें दूसरों के प्रति हमारे व्यवहार के बारे में सिखा चुका है—विशेषकर उनके प्रति जो प्रभु के प्रति हमारी निष्ठा के कारण हमसे बैर रखते हैं (पद 22)।

हालाँकि, यह बात हमें एक प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है: दयालु होना वास्तव में कैसा दिखता है? हमारा बुद्धिमान और कोमल चरवाहा यीशु हमें इस सिद्धान्त को स्वयं ही समझने के लिए नहीं छोड़ देता। इसके विपरीत, वह हमें यह स्पष्ट रूप से बताता है कि हमारे स्वर्गिक पिता की दया का अनुकरण करना कैसा दिखता है।

परमेश्वर “उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है।” और चूंकि हम उसकी सन्तान हैं, इसलिए हमें भी यही दया दिखाने के लिए बुलाया गया है—अर्थात अपने शत्रुओं से प्रेम करना, बुराई के बदले भलाई करना, और बिना किसी प्रतिफल की आशा किए दूसरों को देना। ध्यान दें कि यीशु यहाँ किसी प्रकार की छूट या ऐसा न करने का कोई बहाना नहीं देता।

जब यीशु हमें परमेश्वर की दया के वाहक बनने के लिए बुलाता है, तो उसी क्षण वे हमें यह भी बताता है कि हमें दूसरों पर दोष नहीं लगाना है (लूका 6:37)। वह यह नहीं कह रहा कि हम अपने रिश्तों में सही-गलत की परख करने की क्षमता को एक ओर रख दें। हमें सत्य और असत्य या भलाई और बुराई में भेद करना बन्द नहीं कर देना है। यीशु यह भी नहीं कह रहा कि हम पापों को अनदेखा करें या गलतियों को न सुधारें। बल्कि जब यीशु कहता है कि “दोष मत लगाओ,” तो वह एक प्रकार की आत्म-धर्मी, खुद को ऊँचा समझने वाली, कपटी और कठोर आलोचना वाली प्रवृत्ति को गलत ठहरा रहा है—एक ऐसा दृष्टिकोण जो केवल दूसरों की गलतियाँ उजागर करता है और हमेशा कटुता की भावना लेकर आता है।

एक निर्दयी मनोदशा पूरी तरह से यीशु की उस प्रेरणा के विरुद्ध है, जिसमें उसने हमसे कहा है कि हम अपने मित्रों और शत्रुओं दोनों के प्रति दया दिखाएँ। हममें से हर किसी को अपने भीतर किसी भी प्रकार की आलोचनात्मक भावना को पहचानकर उसे जड़ से उखाड़ फेंकना है, और उसकी जगह कोमलता और समझदारी को देना है।

यही वह तरीका है जिससे हम दूसरों को वह दया दिखाते हैं, जो परमेश्वर ने हम पर दिखाई है। एक (सम्भवतः काल्पनिक) कहानी बताई जाती है कि जब रानी एलीज़ाबेथ द्वितीय छोटी थीं, तो उनकी माँ उन्हें और उनकी बहन मार्गरेट को किसी पार्टी में जाने से पहले कहा करती थीं: “याद रखना: तुम शाही सन्तान हो, इसलिए शाही व्यवहार करना।” उनका आचरण उन्हें शाही परिवार का सदस्य नहीं बनाता था, लेकिन यह दिखाता था कि वे उस परिवार के सदस्य हैं।

मसीही भाइयो और बहनो, आप और मैं इस सृष्टि के शाही परिवार के सदस्य हैं, और इस सृष्टि का राजा हमारा पिता है। यह निश्चित करें कि आपका व्यवहार यह दर्शाए कि आप कौन हैं और किसके हैं। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो

इफिसियों 4:25 – 5:2

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 8–10; यूहन्ना 10:1-21 ◊

22 सितम्बर : प्रेम का नियम

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22 सितम्बर : प्रेम का नियम
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“मैं तुम सुनने वालों से कहता हूँ कि अपने शत्रुओं से प्रेम रखो; जो तुम से बैर करें, उनका भला करो।” लूका 6:27

जब आप बाइबल पढ़ते हैं और उसमें मसीही आस्था का वर्णन पाते हैं, और फिर आप अपने आप को देखते हैं, तो क्या कभी आप यह सोचते हैं कि क्या आप सचमुच एक मसीही हैं या नहीं? मुझे पता है कि मैं ऐसा करता हूँ।

विश्वासियों के रूप में हमारा आश्वासन और परमेश्वर का हमसे प्रेम इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कुछ मसीही सिद्धान्तों का अपने जीवन में कितने अच्छे तरीके से पालन करते हैं; बल्कि ये दोनों हमारे लिए मसीह द्वारा क्रूस पर किए गए काम पर निर्भर करते हैं। फिर भी, बाइबल हमें वर्तमान में अपनी मुक्ति के प्रमाण देखने के बारे में सिखाती है। यदि हम सचमुच अपने स्वर्गिक पिता के बच्चे हैं, तो हमें दूसरों के प्रति एक ऐसा प्रेम दिखाना होगा जो यीशु के हमारे लिए प्रेम के समान हो।

यीशु हमें लोगों से इस प्रकार प्रेम करने के लिए कहता है, जो उनके आकर्षण, योग्यता या अनुराग्यता से सम्बन्धित न हो। हम जानते हैं कि परमेश्वर हमसे ठीक ऐसा ही प्रेम करता है—उसका प्रेम इस बात पर आधारित नहीं है कि हमने अपना व्यवहार ठीक किया है, हम उसके ध्यान के योग्य हैं या हम उसकी सेवा में सहायक अथवा उपयोगी हैं। इन सभी बातों से परमेश्वर का प्रेम हमारे लिए बढ़ता नहीं है। नहीं—“परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरा” (रोमियों 5:8, अतिरिक्त बल जोड़ा गया)।

इसलिए, हमारी आस्था का सबसे बड़ा मापदण्ड प्रेम है—वह प्रेम जो उस प्रेम को दर्शाता है जो हमें इतनी अधिकता में प्राप्त हुआ है। हम अगापे प्रेम में संलग्न होते हैं—शर्त-रहित, बलिदानी प्रेम—क्योंकि यह परमेश्वर के चरित्र और उसके द्वारा हमारे लिए किए गए कामों का एक प्रकट रूप है। हम अपने शत्रुओं से इस प्रकार का प्रेम इस कारण नहीं करते क्योंकि हम उन्हें उनके असली रूप में नहीं देख पाते, बल्कि इसलिए क्योंकि हमने अपने स्वयं के लिए परमेश्वर के प्रेम को देखा है। यीशु कहता है कि जब हम दूसरों को जैसा वे हैं वैसे देखते हैं—उनकी सारी कुरूपता और नफरत, उनके सारे शाप, उनके सारे द्वेष, और हमसे उधार लिए हुए को न चुकाना—तो हमें इसके बारे में यथार्थवादी होना चाहिए, और फिर उनसे प्रेम करना चाहिए। यीशु कहता है, जब तुम यह सारी शत्रुता देखो, तो मैं चाहता हूँ कि तुम अपने शत्रुओं से प्रेम करो।

स्वभाव से, हम इस प्रकार के प्रेम को दिखाने में असमर्थ हैं। लेकिन ज़रा सोचिए कि यदि हम तैयार हों कि हर अपने दैनिक जीवन में और असाधारण परिस्थितियों में भी मसीह जैसा प्रेम दर्शाएँ—एक ऐसा प्रेम जो उनके लिए भी भलाई चाहता है जिन्होंने हमारे प्रति शत्रुता दिखाई हो—तो हम अपनी संस्कृति में कितना बड़ा बदलाव ला सकते हैं। यह निश्चित रूप से एक क्रान्तिकारी परिवर्तन होगा और इसमें कोई सन्देह नहीं है।

प्रेरितों 9:10-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 5–7; यूहन्ना 9:24-41

21 सितम्बर : उत्पीड़न का आशीर्वाद

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21 सितम्बर : उत्पीड़न का आशीर्वाद
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“धन्य हो तुम जब मनुष्य के पुत्र के कारण लोग तुम से बैर करेंगे, और तुम्हें निकाल देंगे, और तुम्हारी निन्दा करेंगे, और तुम्हारा नाम बुरा जानकर काट देंगे। उस दिन आनन्दित होकर उछलना, क्योंकि देखो, तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा प्रतिफल है; उनके बाप–दादे भविष्यद्वक्‍ताओं के साथ भी वैसा ही किया करते थे।” लूका 6:22-23

यह एक ऐसी सच्चाई है, जो हममें से लगभग सभी को सहज रूप से स्पष्ट लगती है कि यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि लोग हमें पसन्द करें। इसलिए यह बात हमें हैरान कर देती है जब हम यह सुनते हैं कि यीशु ने स्पष्ट रूप से यह सिखाया कि जब लोग “मनुष्य के पुत्र के कारण” हमें तिरस्कृत करें, बहिष्कृत करें, और अपमानित करें, तब हम धन्य हैं।

यह विरोध और निन्दा केवल इसलिए होती है क्योंकि हमारा सम्बन्ध यीशु मसीह से है। वास्तव में, यीशु ने यह स्पष्ट किया कि जो भी उसका अनुसरण करेगा, उसे यह संसार अस्वीकार करेगा। यह सत्य उसने अन्य स्थानों पर भी सिखाया है। उदाहरण के लिए, जब उसने अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने से एक रात पहले अपने चेलों को याद दिलाया कि यदि संसार तुम से बैर रखता है, तो यह जान लो कि उसने तुमसे पहले मुझसे बैर रखा है, और यदि उन्होंने मेरे साथ ऐसा किया, तो वे तुम्हारे साथ भी ऐसा करेंगे (यूहन्ना 15:18-20)।

हो सकता है आपने खुद भी इस प्रकार के सताव का अनुभव किया हो—शायद स्कूल में आपने बाइबल का पक्ष लिया और फिर अचानक आप अपने दोस्तों से अलग कर दिए गए। या किसी दोस्त को यीशु के बारे में समझाने के कारण आपको उनके समूह से निकाल दिया गया, या कार्यस्थल पर पदोन्नति से वंचित कर दिया गया क्योंकि आपने मसीह की साक्षी दी कि वह कौन था, उसकी मृत्यु कैसे हुई, और इन सब के क्या मायने हैं। शायद आपके परिवार के ही किसी सदस्य ने आपके विश्वास के कारण आपको ठुकरा दिया। जब आप मसीह के लिए खड़े होते हैं, तो धीरे-धीरे लेकिन स्पष्ट रूप से लोगों की नाराजगी, नफरत और उपेक्षा सामने आने लगती है। यह आसान नहीं होता। अपमानित या अकेला महसूस करना कोई सुखद अनुभव नहीं है, विशेषकर जब आप परमेश्वर की आज्ञाकारिता में जी रहे हों। अस्वीकृति का दर्द वास्तविक होता है। तो ऐसे में हम कैसे आशीष और सान्त्वना पा सकते हैं?

हमें यीशु की कही हुई इस सच्चाई को थामे रहना है: जब संसार की नफ़रत हमारे प्रति केवल इस कारण प्रकट होती है कि हम “मनुष्य के पुत्र,” अर्थात यीशु मसीह के प्रति विश्वासयोग्य हैं—तो इसका अर्थ यह नहीं कि कुछ गलत हुआ है। बल्कि वहीं पर हमें पता चलता है कि आशीष क्या होती है। और यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हमारा विश्वास वास्तविक है और हमारा प्रभु से जीवित सम्बन्ध है। इसके अतिरिक्त, यीशु ने यह भी प्रतिज्ञा की है कि यदि हम मनुष्यों के सामने उसका अंगीकार करेंगे, तो वह भी इसके विषय में अपने स्वर्गिक पिता के सामने हमारा अंगीकार करेगा। (मत्ती 10:32)

जो व्यक्ति पवित्र जीवन जीता है—जो साहस के साथ परमेश्वर के वचन को बोलता और मानता है और जो यह दिखाने का प्रयास नहीं करता कि वह एक साथ आज्ञाकारी और लोकप्रिय बना रह सकता है—वह एक दिन अनिवार्य रूप से इस संसार के पापपूर्ण मार्ग से टकराएगा और विरोध झेलेगा। अब प्रश्न यह है: क्या आप किसी को मसीह के बारे में बताने, या मसीह के लिए जीवन जीने के कारण अस्वीकृति का जोखिम उठाने को तैयार हैं? हतोत्साहित न हों! जब लोग आपके विरुद्ध झूठ बोलें, आपको नापसन्द करें, या तिरस्कार करें—केवल इस कारण कि आप सुसमाचार पर विश्वास रखते हैं—तो प्रसन्न हों, क्योंकि जैसा यीशु ने कहा: “देखो, तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा प्रतिफल है।” यह संसार जो कुछ भी देता है, वह उस प्रतिफल के सामने कुछ भी नहीं है।

दानिय्येल 3 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 3–4; यूहन्ना 9:1-23 ◊

20 सितम्बर : स्वीकार करना कि हम दीन हैं

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20 सितम्बर : स्वीकार करना कि हम दीन हैं
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“तब उसने अपने चेलों की ओर देखकर कहा, ‘धन्य हो तुम जो दीन हो, क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य तुम्हारा है।’” लूका 6:20

यीशु उस वस्तु को महत्त्व देता है जिसे संसार तुच्छ समझता है, और जिसे संसार सराहता है, उसे यीशु अस्वीकार करता है।

यही है धन्य-वचनों की सबसे बड़ी चुनौती, और विशेष रूप से तब जब यीशु धन-सम्पत्ति के विषय में सिखाता है। हम एक ऐसे संसार में जीते हैं जो हमें लगातार यह कहता है कि हम अपनी पहचान विशेष रूप से वित्तीय सफलता और भौतिक सुख-सुविधाओं में खोजें। आराम और सुविधा इस उपभोक्तावादी संस्कृति का राजा है—और यह संस्कृति वह जल है, जिसमें हम सब तैर रहे हैं।

इसलिए यीशु के इस उपदेश के आरम्भिक शब्द हमें चुनौती देते हैं: “धन्य हो तुम जो दीन हो।” वह क्या कहना चाह रहा है? क्या वह सिखा रहा है कि दीन-दरिद्रता उद्धार की कुंजी है? बिल्कुल नहीं! बल्कि वह यह समझा रहा है कि जो व्यक्ति अपनी आत्मिक दरिद्रता को पहचान लेता है, वही परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करता है।

कुछ लोग दावा करते हैं कि यीशु का अर्थ यह है कि यदि आप दरिद्र हैं, तो आपको अत्यन्त प्रसन्न होना चाहिए क्योंकि आप स्वर्ग के राज्य में स्वाभाविक रूप से ही प्रवेश कर जाते हैं। लेकिन इस प्रकार की दरिद्रता परमेश्वर के राज्य में प्रवेश की कुंजी नहीं है और न ही धन-सम्पत्ति किसी के बाहर रह जाने का मुख्य कारण है। वास्तविकता तो यह है कि दरिद्र और धनवान—दोनों को ही जब यह अहसास होता है कि उन्हें उनके पापों के लिए क्षमा की आवश्यकता है और जब वे यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, तभी वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश पाते हैं। यदि ऐसा न होता, तो फिलिप्पी में रहने वाली एक समृद्ध व्यापारी स्त्री लुदिया कभी सुसमाचार की सच्चाई को न समझ पाती (प्रेरितों 16:11-15)। नहीं, आवश्यक यह है कि हम मसीह के बिना अपनी आत्मिक दरिद्रता को पहचानें।

हालाँकि यह समझना भी आवश्यक है कि वित्तीय दरिद्रता आत्मिक आशीष का माध्यम बन सकती है। दरिद्रता अक्सर मनुष्यों को परमेश्वर पर सम्पूर्ण निर्भरता की ओर ले जाती है—न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, बल्कि आत्मिक आशिषों के लिए भी। यही कारण है कि दरिद्र वर्ग में सुसमाचार को लेकर अधिक सकारात्मक और विनम्र प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, जबकि भौतिक समृद्धि हमारी गहरी आत्मिक आवश्यकता को, अर्थात् परमेश्वर के राज्य में प्रवेश पाने की आवश्यकता को ढँक सकती है। धन अक्सर गर्व के पनपने की भूमि बन जाता है, जहाँ हृदय यह भूल जाता है कि चाहे धनवान हो या दरिद्र, “वह घास के फूल की तरह जाता रहेगा” (याकूब 1:10)।

जैसा कि जॉन कैल्विन ने कहा: “वही व्यक्ति आत्मा में दरिद्र होता है, जो अपने आप को पूरी तरह शून्य समझता है और केवल परमेश्वर की दया पर निर्भर रहता है।” दरिद्रता के साथ कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि धन के साथ भी परीक्षाएँ आती है—जैसे कि अहंकार, आत्मनिर्भरता और आत्मिक सुस्ती की परीक्षा?

तो क्या हम अपनी आत्मिक दरिद्रता को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? या क्या हम अपनी सांसारिक समृद्धि में पूर्णतः आत्म-निर्भर और आत्म-सन्तुष्ट हो गए हैं? इन प्रश्नों का सच्चा उत्तर जानने का एक तरीका यह है: क्या आपका हृदय नीतिवचन में आगूर की इस प्रार्थना को दोहरा सकता है—“मुझे न तो निर्धन कर और न धनी बना” (नीतिवचन 30:8)?

लूका 6:20-36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 1–2; यूहन्ना 8:30-59

19 सितम्बर : दिल से किया गया बलिदान

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विश्‍वास ही से हाबिल ने कैन से उत्तम बलिदान परमेश्‍वर के लिए चढ़ाया, और उसी के द्वारा उसके धर्मी होने की गवाही भी दी गई, क्योंकि परमेश्‍वर ने उसकी भेंटों के विषय में गवाही दी।” इब्रानियों 11:4

वह क्या है जो हमारे कार्यों को परमेश्वर के लिए सराहनीय बनाता है?

उत्पत्ति 4 में इस संसार में सबसे पहले जन्मे दो पुत्रों—कैन और हाबिल—की कहानी बताई गई है: “कुछ दिनों के पश्चात कैन यहोवा के पास भूमि की उपज में से कुछ भेंट ले आया, और हाबिल भी अपनी भेड़–बकरियों के कई एक पहलौठे बच्चे भेंट चढ़ाने ले आया और उनकी चर्बी भेंट चढ़ाई; तब यहोवा ने हाबिल और उसकी भेंट को तो ग्रहण किया, परन्तु कैन और उसकी भेंट को उसने ग्रहण न किया” (उत्पत्ति 4:3-5)। इसी बलिदान का उल्लेख इब्रानियों का लेखक करता है जब वह हाबिल और उसके विश्वास के बारे में हमें बताता है।

सबसे पहले वह यह कहता है कि “विश्वास से” ही हाबिल ने अपने भाई से उत्तम बलिदान चढ़ाया। और इसी बलिदान के कारण हाबिल “धर्मी ठहराया गया।” यदि हम यह अनुमान लगाते रहेंगे कि क्यों परमेश्वर ने हाबिल की भेंट को स्वीकार किया और कैन की भेंट को नहीं, तो हम खो जाएँगे। लेकिन हमें उन तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए जो स्पष्ट रूप से बताए गए हैं—और जो जानकारी हमें दी गई है, उसका केन्द्र में यह तथ्य सुस्पष्ट रीति से बताया गया है: परमेश्वर हमारे कार्यों को इसलिए स्वीकार नहीं करता कि वे बाहरी रूप से कितने बड़े या प्रभावशाली हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे एक आज्ञाकारी और समर्पित हृदय की सच्ची अभिव्यक्ति होते हैं।

हाबिल की भेंट इसलिए स्वीकार नहीं की गई थी क्योंकि वह पशु की बलि थी, जबकि कैन की भेंट पौधों की उपज थी। अन्तर भेंटों में नहीं, बल्कि भेंट चढ़ाने वालों में था। जॉन कैल्विन इस पर टिप्पणी करते हैं कि हाबिल की भेंट को इसलिए ग्रहण किया गया क्योंकि वह “विश्वास के द्वारा पवित्र की गई” थी।[1]

यह सिद्धान्त वही है, जो परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा भी स्पष्ट किया है। उदाहरण के लिए, वह यशायाह में कहता है: “व्यर्थ अन्नबलि फिर मत लाओ; धूप से मुझे घृणा है। नए चाँद और विश्रामदिन का मनाना, और सभाओं का प्रचार करना, यह मुझे बुरा लगता है। महासभा के साथ ही साथ अनर्थ काम करना मुझसे सहा नहीं जाता” (यशायाह 1:13)। यह ऐसा है मानो परमेश्वर कह रहा हो: मुझे बछड़ों, बकरों और मेमनों की मिमियाहट में कोई रुचि नहीं है। मैं बलिदान से अधिक आज्ञाकारिता की लालसा करता हूँ (1 शमूएल 15:22 देखें)। यदि तुम इन कार्यों पर इस आशा से निर्भर हो कि वे तुम्हें मेरे लिए ग्रहणयोग्य बना देंगे, तो मैं तुम्हें यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ऐसा कभी नहीं होगा।

“विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है” (इब्रानियों 11:6)। हमारे अच्छे कार्य परमेश्वर के सामने स्वीकृति पाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे उस स्वीकृति का फल हैं जो हमें विश्वास के द्वारा मिलती है। वे हमारी ओर से परमेश्वर के प्रेम का प्रत्युत्तर हैं, न कि उसके प्रेम को पाने का साधन। यदि आपके कार्य—हाबिल के समान—परमेश्वर की महिमा और प्रसन्नता के कारण बनते हैं, तो यह केवल इसलिए होगा क्योंकि वे आपके प्रेम, समर्पण और व्यक्तिगत विश्वास की बाहरी अभिव्यक्ति हैं। इसलिए आज, परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन इस उद्देश्य से न करें कि आप उसके द्वारा स्वीकृत किए जाएँ या उसकी स्वीकृति बनाए रखें। वह स्वीकृति तो विश्वास के द्वारा पहले ही मिल चुकी है। साथ ही, इस कारण लापरवाही भी न बरतें कि आप पहले से ही स्वीकृत हैं। बल्कि, उसके प्रेम में अपनी स्थिति का आनन्द लें—और यही आनन्द आपकी आज्ञाकारिता के पीछे की प्रेरणा बने।

  यशायाह 1:10-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 7–9; यूहन्ना 8:1-29 ◊


[1] कॉमैणट्रीज़ ऑन दि एपिस्ट्ल ऑफ पॉल दि अपोस्ट्ल टू द हिब्रूज़, अनुवादक जॉन ओवेन (कैल्विन ट्रांसलेशन सोसायटी, 1853), पृ. 267.

18 सितम्बर : अब और सदा के लिए

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“फिर मैंने नए आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहला आकाश और पहली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।” प्रकाशितवाक्य 21:1

यीशु मसीह की वापसी के बारे में हम क्या जानते हैं? बाइबल हमें कुछ बातें बताती है, जो सीधी और स्पष्ट हैं। हम जानते हैं कि यीशु व्यक्तिगत रूप से, शारीरिक रूप से, दृश्यमान रूप से और महिमामय रूप से लौटेगा। हम यह भी जानते हैं कि उसके पुनः प्रकट होने का समय गुप्त होगा, यह अचानक होगा, और यह उन लोगों के बीच विभाजन लाएगा जो उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं और जो उसे अस्वीकार कर रहे हैं।

इसके अलावा, जैसा कि पहले शताब्दी में कष्ट सहने वाले संतों को प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में बताया गया था, वही आज हमें भी बताया जा रहा है: हमें इस संसार की समस्याओं से घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि सब कुछ यीशु के नियन्त्रण में है। मसीह का राज्य तब पूर्ण रूप से स्थापित हो जाएगा, जब उसका राज्य सम्पूर्ण और स्थाई रूप में आएगा और उसकी वापसी एक नए स्वर्ग और नई पृथ्वी का आरम्भ करेगी।

यह विचार कि स्वर्ग पृथ्वी पर आ सकता है—कि एक दिन “नया यरूशलेम स्वर्ग से परमेश्‍वर के पास से” उतरेगा (प्रकाशितवाक्य 21:2)—यह विचार आधुनिक संसार के कई दृष्टिकोणों में, विशेषकर पश्चिमी संस्कृति में, अपूर्ण रूप से झलकता है। हमारी संस्कृति स्वाभाविक रूप से आत्मविश्वासी है, इसलिए यह थोड़ी सी और शिक्षा, थोड़े से और सामाजिक कल्याण और दूसरों के प्रति थोड़ी सी और संवेदनशीलता के जरिए इस संसार को सुधारने का प्रयास करती है। लेकिन मनुष्य द्वारा बनाई गई कोई भी योजना उस वास्तविक पुनर्स्थापना को नहीं ला सकती, जिसकी हमारे संसार को ज़रूरत है। मानवीय प्रयास चीज़ों को बेहतर बना सकते हैं, परन्तु उन्हें सिद्ध नहीं कर सकते। स्वर्ग तब तक पृथ्वी पर नहीं आएगा, जब तक मसीह स्वयं वापिस नहीं आता। सृष्टि इस समय पाप की पकड़ में जकड़ी हुई है, और अन्त में केवल परमेश्वर ही इसे पूरी तरह सुधार सकता है— और वह ऐसा अवश्य करेगा—जब उसकी प्रजा मेमने के सामने दण्डवत करेगी और उसकी स्तुति करेगी।

फिलहाल, आप और मैं एक परदेशी भूमि में निर्वासितों के समान जी रहे हैं। हम ऐसे संसार में रह रहे हैं, जो मसीह का विरोधी है, उसके वचन का विरोधी है और उस जीवन का विरोधी है जो उसकी आज्ञाकारिता में जीया जाता है। विश्वासियों के रूप में हमारे लिए यह प्रलोभन आता है कि हम भाग जाएँ और छिप जाएँ—एक छोटी-सी “पवित्र मण्डली” बनाकर संसार से खुद को अलग कर लें और उसकी चिन्ता न करें। लेकिन जैसा कि यिर्मयाह ने बेबीलोन में निर्वासित लोगों से कहा था कि वे उस नगर की भलाई की खोज करें जिसमें वे रह रहे हैं (यिर्मयाह 29:7), उसी प्रकार हमें भी उस संसार की भलाई की खोज करनी है, जिसमें हम रह रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि हम इस संसार में तो रहें, परन्तु इसके जैसे न बनें—ऐसा जीवन जीएँ और ऐसे वचन बोलें जो एक भिन्न स्थान की ओर इशारा करते हैं।

मसीह की—जो कि क्रूस पर मरा, मरे हुओं में से जी उठा, अब राज्य कर रहा है और एक दिन लौटकर आएगा—विजयी कहानी में आनन्दित होना ही हमें यह साहस देता है कि हम इस संसार से आगे देख सकें। उसकी वापसी की आशा और उसकी उपस्थिति में अनन्त जीवन की आशा ही वह उत्तम प्रेरणा है, जो हमें लगातार पवित्र जीवन जीने और उसके नाम में उत्साह के साथ सुसमाचार प्रचार के लिए प्रेरित करती है। अब विश्वास की दृष्टि से उसके लौटने की आशा करें—और फिर आज उठकर अपने आस-पास के लोगों की भलाई के लिए जीवन जीएँ।

1 कुरिन्थियों 15:50-58

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 4– 6; यूहन्ना 7:28-53