2 जून : क्या वह फल पाएगा?

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2 जून : क्या वह फल पाएगा?
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“वह दूर से अंजीर का एक हरा पेड़ देखकर निकट गया कि क्या जाने उसमें कुछ पाए : पर पत्तों को छोड़ कुछ न पाया; क्योंकि फल का समय न था। इस पर उसने उससे कहा, ‘अब से कोई तेरा फल कभी न खाए!’ और उसके चेले सुन रहे थे।” मरकुस 11:13-14

यहाँ एक घटना प्रस्तुत की गई है जो “कठिनाइयों से भरी हुई है।”[1]

यीशु द्वारा अंजीर के पेड़ को श्राप देना चौंकाने वाली बात है क्योंकि यह विनाश का चमत्कार था। मरकुस के सुसमाचार में अब तक हमने यीशु को केवल रूपान्तरण या पुनर्स्थापना के चमत्कार करते हुए देखा था। चूंकि यह यीशु के अन्य कार्यों से पूरी तरह विपरीत था, इसलिए हमें इसके महत्त्व को गहराई से समझने की आवश्यकता है।

पुराने नियम में, दाखलता और अंजीर के पेड़ का उपयोग अक्सर इस्राएलियों की परमेश्वर के सामने स्थिति को दर्शाने के लिए रूपक के तौर पर किया गया है। जब दाखलता या अंजीर का पेड़ अच्छा फल उत्पन्न करता था, तो सब कुछ सही माना जाता था; लेकिन जब कोई फल नहीं होता था या बुरा फल उत्पन्न होता था, तो इसका अर्थ था कि परमेश्वर के लोग भटक गए हैं।

जब यीशु ने उस समय की धार्मिक गतिविधियों की ऊपरी चमक के पीछे के पूरे खालीपन को देखा, तो नबी मीका के ये शब्द उसके मन में आए होंगे: “हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया हूँ जो धूपकाल के फल तोड़ने पर, या रही हुई दाख बीनने के समय के अन्त में आ जाए, मुझे तो पक्की अंजीरों की लालसा थी, परन्तु खाने के लिये कोई गुच्छा नहीं रहा।” (मीका 7:1)।

इसलिए, यीशु द्वारा अंजीर के पेड़ को श्राप देना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह एक भविष्यवाणी के तौर पर प्रतीकवाद से भरी हुई दृष्टान्त क्रिया थी। इस दृश्य के माध्यम से यीशु ने यह दिखाया कि यरूशलेम पर शीघ्र ही न्याय आने वाला था। यीशु धार्मिक जीवन का केन्द्र माने जाने वाले नगर में प्रार्थना और आत्मिक फलवन्तता की खोज में आया था, लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं पाया। वह बाँझ अंजीर का पेड़ एक धार्मिक व्यवस्था का प्रतीक था, जो दिखावे के लिए परमेश्वर को सन्तुष्ट करने और आत्मा की भूख को तृप्त करने का दावा करता था, लेकिन जब लोग ऐसे धर्म की अधीनता में आते थे, तो उनकी सन्तुष्टि के लिए उसमें कुछ भी नहीं होता था—और परमेश्वर-पुत्र के इस दिव्य कार्य से यह स्पष्ट हो गया कि परमेश्वर इससे प्रसन्न नहीं था।

क्या भविष्यवाणी के तौर पर आई यह चेतावनी हमारे लिए भी कोई महत्त्व रखती है, जबकि हम अंजीर के पेड़ों और मन्दिरों से बहुत दूर हैं? हाँ! अच्छा फल उत्पन्न करने की चुनौती हमारे लिए भी बनी हुई है। लेकिन हमें इस बात से भी सावधान रहना चाहिए कि धार्मिक कर्मकाण्ड को निभाने या नियमों का पालन करने से आने वाली आत्म-धार्मिकता को हम सच्चे आत्मिक फल न समझ बैठें। परमेश्वर के लोग जीवन्त सम्बन्ध का स्थान खोखले कर्मकाण्ड को दे देने के खतरे में हमेशा रहते हैं। इस सूखे अंजीर के पेड़ की चेतावनी को मानने का सही तरीका क्या है? यीशु हमें बताता है: “जो डाली मुझमें है और नहीं फलती, [मेरा पिता] उसे वह काट डालता है . . . मैं दाखलता हूँ, तुम डालियाँ हो। जो मुझमें बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:2, 5)। दूसरे शब्दों में, समाधान यह नहीं है कि हम बेहतर करने का प्रयास करें, बल्कि यह है कि हम यीशु को और अधिक जानें और उसमें बने रहें।

क्या इस अंजीर के पेड़ के विवरण का कोई भी हिस्सा हमारे जीवन में भी सत्य है? जब यीशु आएगा और हमारी जाँच करेगा, तो क्या वह हमारे जीवन में फल पाएगा? क्या वह विश्वास पाएगा? अपने आप को यीशु से, जो सच्ची दाखलता है, जुड़ा रखें, और उसका आत्मा आपके जीवन में वही फल उत्पन्न करेगा जिसकी वह खोज कर रहा है।

  यूहन्ना 15:1-11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 5–8; मत्ती 18:21-35


[1] सी. ई. बी. क्रैनफील्ड, द गॉस्पल अकोर्डिंग टू मार्क, केम्ब्रिज ग्रीक टेस्टामेण्ट कॉमैण्ट्री, सम्पादक सी.एफ.डी. मूल (1959; पुनः मुद्रित केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 2000), पृ. 354.

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