8 जून : गिदोन का प्रश्न

Alethia4India
Alethia4India
8 जून : गिदोन का प्रश्न
Loading
/

“उसको [गिदोन को] यहोवा के दूत ने दर्शन देकर कहा, ‘हे शूरवीर सूरमा, यहोवा तेरे संग है।’ गिदोन ने उससे कहा, ‘हे मेरे प्रभु, विनती सुन, यदि यहोवा हमारे संग होता, तो हम पर यह सब विपत्ति क्यों पड़ती?’” न्यायियों 6:12-13

न्यायियों 6 में जब गिदोन की मुलाकात एक स्वर्गदूत से होती है, तो वह क्षण नाटकीय और असंगत दोनों है। स्वर्गदूत उसे “शूरवीर सूरमा” कहता है, जबकि वह मिद्यानियों डर के मारे छिपकर एक दाखरस के कुण्ड में गेहूँ झाड़ रहा है (न्यायियों 6:11)। इस समय उसके अन्दर न तो कोई वीरता दिख रही है और न ही कोई साहस!

यह ऐसा है जैसे परमेश्वर ने गिदोन पर ध्यान केन्द्रित किया हो, जो परमेश्वर की प्रजा का एक सूक्ष्म रूप है। शायद उस क्षण में गिदोन ने मुड़कर देखा और सोचा होगा कि क्या यह अभिवादन वास्तव में उसके लिए था। आखिरकार, प्रभु ने अपने लोगों को गुफाओं में छिपने के लिए मजबूर कर दिया था। इसलिए उसने पूछा, “यदि यहोवा हमारे संग होता, तो हम पर यह सब विपत्ति क्यों पड़ती?”

यह एक समझने योग्य प्रश्न है: यदि परमेश्वर वह है जो वह होने का दावा करता है, तो वह हमारे जीवन में परेशान करने वाली परिस्थितियों को अनुमति क्यों देता है? हम इसे बेशक समझ सकते हैं। हमारा सारा जीवन “यदि,” “लेकिन,” और “क्यों” से भरा रहता है। हालाँकि हमें यह जानकर उत्साहित होना चाहिए कि यदि परमेश्वर गिदोन के प्रश्न और इस्राएल की चीत्कार का उत्तर दे सकता है, तो वह निश्चित रूप से हमारे कठिन प्रश्नों का उत्तर भी दे सकता है—भले ही उसका उत्तर हमेशा वैसा न हो जैसा हम अपेक्षा करते हैं।

जब इस्राएलियों ने न्यायियों 6:7 में परमेश्वर से मदद के लिए पुकारा, तो उसने जवाब में उन्हें छुटकारा देने के लिए एक योद्धा को नहीं भेजा बल्कि उन्हें सिखाने के लिए एक भविष्यवक्ता को भेजा (व 8)। परमेश्वर जानता था कि उन्हें अपनी समस्याओं के बीच में उसके वचन को सुनने की आवश्यकता थी। अन्ततः, उन्हें परमेश्वर की ओर लौटने और उसके वचनों पर विश्वास करने की आवश्यकता थी। भविष्यवक्ता ने उन्हें संक्षेप में वही बताया जो स्वर्गदूत गिदोन से कहने वाला था: “यहोवा तेरे संग है।” परमेश्वर की उपस्थिति और संकट एक साथ रह सकते हैं।

हमारे द्वारा उठाए गए प्रश्नों के उत्तर अन्ततः किसी “पाँच आसान कदमों” की सूची में नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन के माध्यम से उसके खुद के उद्‌घाटन में मिलते है। गिदोन के मामले में ऐसा लग रहा था कि परमेश्वर का प्रतिउत्तर वास्तव में कोई उत्तर था ही नहीं। इस्राएल की परिस्थितियों पर कोई बातचीत नहीं हुई और न ही उनके दुश्मनों के बारे में कोई व्याख्या दी गई। इसके बजाय, प्रभु ने गिदोन से कहा, “अपनी इसी शक्ति पर जा और तू इस्राएलियों को मिद्यानियों के हाथ से छुड़ाएगा। क्या मैंने तुझे नहीं भेजा?” (न्यायियों 6:14)। गिदोन ने खुद को असमर्थ महसूस किया: “मैं इस्राएल को कैसे छुड़ाऊँ? देख, मेरा कुल मनश्शे में सबसे कंगाल है, फिर मैं अपने पिता के घराने में सबसे छोटा हूँ” (न्यायियों 6:15)।

अक्सर हमारे साथ भी ठीक ऐसा ही होता है, जब हम अपनी असमर्थता को स्वीकार करते हैं, तब परमेश्वर हममें कार्य करना आरम्भ करता है। जब तक हम अपनी कमजोरी को नहीं पहचानते, तब तक हम प्रार्थना करने के लिए, संकटों में दृढ़ता से चलने के लिए या खुद पर भरोसा छोड़ने के लिए प्रेरित नहीं होंगे। जब हम अपनी कमियों को पहचान जाते हैं और परमेश्वर के वचन को सुनते हैं कि वह हमारे साथ है और हमारे माध्यम से कार्य करेगा, केवल तब ही हम अपनी पूरी ताकत से उसकी सेवा करने का संकल्प लेते हैं, फिर चाहे हम कितने भी कमजोर क्यों न महसूस करें और कमजोर हों। क्योंकि परमेश्वर अपने वचन में प्रतिज्ञा करता है कि जिस काम को करने के लिए वह हमें बुलाता है, उसे पूरा करने के लिए हमारी कमजोरी और परमेश्वर की ताकत पर्याप्त हैं (फिलिप्पियों 4:13)।

न्यायियों 6:11-24

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 9–11; मत्ती 22:1-22

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *