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17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा

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17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा
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“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी विनती के द्वारा, और यीशु मसीह की आत्मा के दान के द्वारा, इसका प्रतिफल मेरा उद्धार होगा।”  फिलिप्पियों 1:19

क्या आपके जीवन में ऐसे लोग हैं, जिनके लिए आप इसलिए प्रार्थना नहीं करते क्योंकि आपको लगता है कि उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं है? हमारे सीमित मानवीय दृष्टिकोण में यह सहज बात हो सकती है कि हम उन लोगों को अनदेखा कर दें, जो बाहर से पूरी तरह व्यवस्थित दिखते हैं। किन्तु सच्चाई यह है कि हम सभी को दूसरों की प्रार्थनाओं की आवश्यकता होती है और हमें उन प्रार्थनाओं से लाभ भी होता है।

जब प्रेरित पौलुस जेल में था, तो उसने फिलिप्पियों की कलीसिया को लिखा और कहा कि वह जानता है कि उसका छुटकारा न केवल पवित्र आत्मा की सहायता से होगा, परन्तु परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाओं के द्वारा भी होगा। चाहे उसका तात्पर्य अपनी तात्कालिक कठिनाइयों से छुटकारा हो या उसे मसीह की उपस्थिति में ले जाने वाला अन्तिम उद्धार, पौलुस चाहता था कि फिलिप्पी में उसके मसीही मित्र यह जानें कि सेवाकार्य में बने रहने के लिए वह दूसरों की प्रार्थनाओं पर निर्भर था।

ऐसा उसने केवल इस मण्डली को ही नहीं कहा था। जब पौलुस ने रोम के मसीहियों को लिखा तब भी उसने यही बात कही थी, “हे भाइयो, हमारे प्रभु यीशु मसीह के और पवित्र आत्मा के प्रेम का स्मरण दिला कर मैं तुम से विनती करता हूँ कि मेरे लिए परमेश्‍वर से प्रार्थना करने में मेरे साथ मिलकर लौलीन रहो कि मैं . . . बचा रहूँ” (रोमियों 15:30-31)। वह चाहता था कि वे साथ मिलकर संघर्ष करें और ताजगी से भरे रहें। वह चाहता था कि उसकी सेवा संतों के लिए सहायक हो। वह चाहता था कि उसे उद्धार मिले। और उसने उनसे कहा कि यह सब उनकी प्रार्थनाओं के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है! जैसा कि प्रसिद्ध अंग्रेज प्रचारक सी.एच. स्पर्जन ने कहा था कि प्रार्थना वह रस्सी है जो परमेश्वर की उपस्थिति में लगी घंटियाँ बजाती है।[1] परमेश्वर के प्रावधान में यह उसकी पद्धति, उसकी योजना और उसकी शक्ति को खोल देती है।

परमेश्वर को पुकारो, यही वह बात है जो पौलुस हमें करने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि हम परमेश्वर के आत्मा को एक ऐसे तरीके से कार्य करते देखना चाहते हैं जिसे केवल अलौकिक कहा जा सकता है, तो हमें पहले गम्भीरता से, दीनता से और निरन्तर प्रार्थना करने के लिए तैयार होना होगा। पौलुस के शब्द हमें बताते हैं कि जब हम अन्य संतों के साथ मिलकर काम करते हैं, तो हम उनकी निर्बलताओं में उनकी सहायता कर सकते हैं। हम उनको साहस प्रदान किए जाने की प्रार्थना कर सकते हैं। हम उनके उद्धार में एक भूमिका निभा सकते हैं।

आप किसे जानते हैं, जिसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? क्या आप लगन के साथ, साहसिक रूप से और हठ के साथ उनके लिए प्रार्थना करेंगे? और आप किसे जानते हैं जो बाहर से ऐसा नहीं दिखता कि उसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? वास्तविकता यह है कि उन्हें भी इसकी आवश्यकता है! क्या आप उनके लिए भी इसी प्रकार प्रार्थना करेंगे?      

 फिलिप्पियों 1:3-11

16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति

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16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति
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“जिनकी [तुम्हारी] रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिए, जो आने वाले समय में प्रगट होने वाली है, की जाती है। इस कारण तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अभी कुछ दिन के लिए नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुख में हो।”  1 पतरस 1:5-6

दुख के बारे में हमें दो बातें स्वीकार करने की आवश्यकता है, पहली कि दुख वास्तव में होता है,  और दूसरी कि यह कष्ट देता है।  कष्ट हर किसी के जीवन की वह वास्तविकता है, जो कभी न कभी अवश्य ही आता है। ऐसा कष्ट कई रूपों में आता है, जिसमें मानसिक कष्ट सबसे बड़ा है।

संगी विश्वासियों को दुख के बारे में लिखते समय पतरस ने कहा कि दुख अनेक और विभिन्न तरीके से आ सकता है। पतरस के पहले पाठकों को जो विशिष्ट दुख था, वह मानसिक पीड़ा थी जो कठिनाइयों को सहते रहने से आती है, किन्तु पतरस भली-भाँति जानता था कि ऐसी कई प्रकार की परीक्षाएँ होती हैं, जो हमारे मनों को परेशान करती हैं और हमारी आत्माओं को कुचल देती हैं।

सुसमाचार के कारण पतरस अपने लेख का समापन निराशा और हताशा की स्थिति में नहीं करता। इसके विपरीत, वह हमें ऐसी प्रतिज्ञाएँ देता है, जिन पर हम विश्वास कर सकते हैं।

सबसे पहले, पतरस हमें याद दिलाता है कि हमारी परीक्षाएँ केवल “कुछ दिन” के लिए हैं। अब, “कुछ दिन” को अनन्त काल के प्रकाश में समझने की आवश्यकता है। यहाँ तक कि जीवन भर का समय भी सदा काल की तुलना में “कुछ दिन” ही है! इस प्रकार, इस जीवन में कष्ट का एक लम्बा समय भी परमेश्वर की व्यवस्था में और उसकी सन्तानों के लिए उसकी योजना और उद्देश्य के सन्दर्भ में “कुछ दिन” है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस तरह के कष्ट का समय थोड़ा महसूस होगा,  विशेषकर जब हम कष्ट के मध्य में हों। कई लोगों के लिए कष्ट का अर्थ यह होता है कि एक मिनट भी एक दिन जैसा लगता है, एक दिन एक साल जैसा लगता है, और एक साल कभी न समाप्त होने वाला समय लगता है। किन्तु हम इस प्रतिज्ञा से लिपटे रह सकते हैं और हमें रहना भी चाहिए कि हमारी वर्तमान विपत्ति अनन्त काल के लिए हमारा अन्त नहीं है। हो सकता है कि आज आपका जीवन दुख से भरा हो, परन्तु एक दिन, “उस अन्तिम समय में,” आप उद्धार से भर जाएँगे।

दूसरी बात, हम हियाव के साथ कह सकते हैं कि दुख के प्रत्येक क्षण में परमेश्वर उपस्थित होता है। तरसुस के शाऊल के हृदय परिवर्तन के वृतान्त में हम पाते हैं कि यीशु अपने लोगों के दुख के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है। वह कहता है, “हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे  क्यों सताता है?” (प्रेरितों 9:4, अतिरिक्त महत्त्व जोड़ा गया)। जब यीशु स्वर्ग में था तो वह “मुझे” कैसे कह सकता था? इसका कारण यह था कि आत्मा के माध्यम से मसीह अपने लोगों के साथ उपस्थित था। वह उनके साथ पूर्ण एकता में खड़ा था। जब वे घाटियों से होते हुए अपने अन्तिम उद्धार के दिन की ओर बढ़ रहे थे, उस समय उसका आत्मा उनकी रक्षा करते हुए उनके साथ था। वह हमारे लिए भी ऐसा ही करता है।

आपके पास प्रभु यीशु के रूप में एक महान महायाजक है, जो आपकी निर्बलताओं में आपके साथ दुखी होने में पूरी तरह सक्षम है (इब्रानियों 4:15)। जब इस झूठ पर विश्वास करने का प्रलोभन आपके सामने आए कि परमेश्वर ने आपको छोड़ दिया है या फिर यह कि कोई नहीं समझ सकता कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं या आप क्या झेल रहे हैं, तो आप इस बात में हियाव रख सकते हैं कि “हमारे दिल की कोई धड़कन या कोई पीड़ा ऐसी नहीं है, जिसे वह ऊपर बैठा महसूस नहीं कर सकता।”[1] और आप इस बात में भी हियाव रख सकते हैं कि एक दिन सारा दुख पीछे रह जाएगा और आगे केवल महिमा होगी। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसमें आप आज आनन्दित हो सकते हैं, चाहे आज कुछ भी हो।       

1 पतरस 1:3-9

15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना

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15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों।”  इफिसियों 1:3-4

बाइबल इस बात का कोई सीधा उत्तर नहीं देती कि परमेश्वर ने अदन की वाटिका में पतन क्यों होने दिया। वह केवल इतना बताती है कि परमेश्वर सब कुछ पर नियन्त्रण रखता है, यहाँ तक कि उस घटना पर भी।

तथापि इफिसियों को लिखे पौलुस के पत्र में हमें परमेश्वर की अनन्त योजना की एक झलक दी गई है। हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे संसार के अस्तित्व में आने से पहले ही काम कर रहा था और पतन की घटना ने उसे चौंका नहीं दिया था। जब आदम और हव्वा के विद्रोह के परिणामस्वरूप राज्य भ्रष्ट हो गया, तो परमेश्वर पहले से जानता था कि ऐसा होगा। आदम और हव्वा के बनाए जाने से पहले, उनकी अनाज्ञाकारिता से पहले, परमेश्वर उद्धार की योजना बना चुका था।

जब हम परमेश्वर के उद्धार के कार्य के बारे में सोचते हैं जो अन्ततः क्रूस पर पूर्ण हुआ, तो हमें इसे केवल एक संकट के समय में प्रदान किए गए समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके विपरीत, हमें क्रूस को परमेश्वर की अनन्त मंशा से जुड़ा हुआ देखना चाहिए, जिसने अनन्त काल से निश्चय किया हुआ था कि वह यीशु के माध्यम से अपने लिए एक प्रजा को बुलावा देगा और पतन के कारण जो कुछ भ्रष्ट हो चुका है उसे पुनः स्थापित करेगा।

इस योजना में परमेश्वर का उद्देश्य “उसकी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार” था और है तथा यह “उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति” के लिए है (इफिसियों 1:5-6)। परमेश्वर की अनन्त योजना में प्रेरणा केवल मनुष्यों को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं थी—यद्यपि मनुष्य इस कारण से अन्ततः प्रसन्न हो जाते हैं—परन्तु यह प्रेरणा उसके नाम के लिए उसकी चिन्ता थी। उसने निश्चय किया था कि सब कुछ उसके पुत्र प्रभु यीशु के चरणों के अधीन और नियन्त्रण में लाया जाए, जैसा कि होना भी चाहिए। इस प्रकार, छुटकारे की परमेश्वर की अनन्त योजना हमारे बारे में नहीं परन्तु उसके बारे में है। यह हमें प्रभावित अवश्य करती है। यह हमें बदल अवश्य देती है। किन्तु यह सब परमेश्वर के बारे में है। जब तक सुसमाचार हमें उसकी स्तुति करने और उसके लिए जीने के लिए प्रेरित नहीं करता, तब तक हमने इसे ठीक से नहीं समझा है।

परमेश्वर इस संसार का केन्द्र है। पतन के बाद से मनुष्यों ने परमेश्वर के अधिकार को स्वीकार करने से इनकार किया है और साथ ही उसे उसके उपयुक्त स्थान से हटाने का भरसक प्रयास किया है, जिसके परिणाम विनाशकारी हुए हैं। इस वर्तमान जीवन का कोई भी भाग ऐसा नहीं है जो मृत्यु की धूल से ढका न हो, क्योंकि मनुष्य ने यह निर्धारित कर लिया है कि वह इस तथ्य को पसन्द नहीं करता कि परमेश्वर केन्द्र में है।

क्या आप अपने जीवन को पुनः व्यवस्थित करेंगे और इसके प्रत्येक पहलू की देखरेख करने के परमेश्वर के अधिकार को मान्यता देंगे? क्या आप अपनी बढ़ाई के लिए नहीं, परन्तु उसकी स्तुति के लिए और अपने उद्देश्यों के लिए नहीं, परन्तु उसके उद्देश्य के लिए जीने का चुनाव करेंगे? विरोधाभास यह है कि जब आप अपनी नहीं परन्तु उसकी महिमा खोजेंगे, तब आप उस आनन्द का अनुभव करेंगे जो उसके पुत्र को अपने जीवन का केन्द्र मानकर जीने से आता है, जिसकी योजना परमेश्वर ने आपके लिए और समस्त सृष्टि के लिए अनन्त काल से बनाई थी।      

इफिसियों 1:3-14

14 मार्च : आदर्श प्रतिबद्धता

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14 मार्च : आदर्श प्रतिबद्धता
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“नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालेब, जो देश के भेद लेने वालों में से थे, अपने-अपने वस्त्र फाड़कर, इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे, “जिस देश का भेद लेने को हम इधर-उधर घूम कर आए हैं, वह अत्यन्त उत्तम देश है। यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, पहुँचाकर उसे हमें दे देगा।”  गिनती 14:6-8

3 मई 1953 को सिंगापुर से लन्दन जा रहा एक विमान भारत के कोलकाता से 22 मील उत्तर-पश्चिम में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें कोई भी जीवित नहीं बचा। फ्रेड मिशेल, जो दस साल पहले चाइना इनलैंड मिशन के निदेशक बने थे, उस विमान में यात्रा कर रहे थे। उनकी जीवनी में फ्रेड को “एक साधारण व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया था, जो एक गाँव से थे और उनके माता-पिता श्रमिक वर्ग के थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन प्रान्तों में रहते हुए एक रसायनज्ञ के रूप में बिताया और वे परमेश्वर के साथ चलते थे।”[1]

जब तक यपुन्ने का पुत्र कालेब एक भेदी न बना था, जिसे मूसा ने उस देश का भेद लेने के लिए नियुक्त किया था, जिसे देने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अपने लोगों से की थी, तब तक ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह संकेत दे कि वह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण या प्रतिष्ठित था। परन्तु ऐसा लगता है कि निश्चित रूप से उन साधारण अनुभवों में उसकी नीरस जीवन-यात्रा में परमेश्वर ने उस चरित्र को गढ़ा और विकसित किया जो गिनती 14 में प्रकट होता है।

संकट हमारे चरित्र को उजागर कर देता है। जब इस्राएली भेदिए कनान देश का भेद लेकर वापस आए तो उन्होंने वर्णन करते हुए कहा कि उसके नगर गढ़ वाले हैं, और “उन लोगों पर चढ़ने की शक्ति हममें नहीं है; क्योंकि वे हमसे बलवान हैं . . . हम अपनी दृष्टि में उनके सामने टिड्डे के समान दिखाई पड़ते थे” (गिनती 13:31, 33)। और लोग परमेश्वर पर आरोप लगाने लगे कि उसने उन्हें ऐसे देश में भेजा है, जहाँ वे मर जाएँगे (गिनती 14:3)।

कालेब की परमेश्वर के लिए प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वह इतने लोगों की सामान्य राय के विरुद्ध खड़ा होने के लिए तैयार था। जब अन्य भेदियों ने प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश न करने का सुझाव दिया तो उसने उनका विरोध किया। जब सभी लोग परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर रहे थे तो उसने उनका साथ नहीं दिया। वह और उसका विश्वासयोग्य मित्र यहोशू ही थे, जिन्होंने परमेश्वर के प्रति साहसी आज्ञाकारिता का सुझाव दिया।

कालेब को निश्चय था कि परमेश्वर के सामर्थ्य से सब कुछ सम्भव है। उसने दूसरे भेदियों की कही गई बातों की सच्चाई को नकारा नहीं, परन्तु उसने केवल इसे एक अलग दृष्टिकोण से देखा। वह न तो अपनी क्षमता पर और न ही इस्राएलियों की क्षमता पर, किन्तु परमेश्वर के सामर्थ्य और उसके चरित्र की विश्वसनीयता पर भरोसा कर रहा था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जो भय के मध्य में भी विश्वास कर रहा था। वह जानता था कि जिस टिड्डे को परमेश्वर से सहायता प्राप्त हो, वह टिड्डा भी बड़े काम कर सकता है।

यद्यपि हमें लग सकता है कि हमारा जीवन नीरस है, फिर भी हम नीरसता में भी सदैव परमेश्वर को खोज सकते हैं। दैनिक जीवन के साधारण क्षणों में वह हमारे चरित्र को गढ़ेगा कि हम भी प्रत्येक परिस्थिति में साहसी व्यक्ति बन सकें। परमेश्वर अपनी योजनाओं को पूरी करने के लिए बहुत महान लोगों को नहीं ढूँढ रहा है। वह ऐसे साधारण लोगों को ढूँढ रहा है जो उस पर भरोसा करें, विश्वास में आगे कदम बढ़ाएँ और साहसपूर्वक आज्ञा मानने के लिए तैयार हों। आज आपको वैसा व्यक्ति बनने से कोई नहीं सकता।       

गिनती 13:25 – 14:25

13 मार्च : सब प्रकार के धीरज सहित

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13 मार्च : सब प्रकार के धीरज सहित
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“प्रेरित के लक्षण भी तुम्हारे बीच सब प्रकार के धीरज सहित चिह्नों, और अद्‌भुत कामों, और सामर्थ्य के कामों से दिखाए गए।”  2 कुरिन्थियों 12:12

जब हम मसीह के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के तुरन्त बाद के समय के बारे में सोचते हैं, उस समय के बारे में जब प्रेरितों ने सेवाकार्य में उन्नति की और कलीसिया का जन्म हुआ, तो वे “चिह्न, अद्‌भुत काम, और सामर्थ्य के काम” जो किए गए थे, उनकी कल्पना करके यह आशा करना एक सामान्य बात है कि काश हम उन्हें देखने के लिए वहाँ होते तो हमारा विश्वास दृढ़ होता और उनके द्वारा हमारे सेवाकार्य में बढ़ोत्तरी होती।

निस्सन्देह, उस समय की अलौकिक घटनाओं की गुणवत्ता और मात्रा दोनों ही विशेष और अद्वितीय थीं। प्रेरितों को उस रीति से अलौकिक वरदान दिया गया था, जो आज के समय के मसीही लोगों को नहीं दिया गया है। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि तब भी आरम्भिक कलीसिया ने इन अनुभवों को अपने विश्वास का मापदण्ड नहीं बनाया। हम केवल उन चमत्कारों पर ध्यान केन्द्रित करके उनके सन्दर्भ को नहीं भूल सकते कि वे लोग जो परमेश्वर के आत्मा से भरे गए थे तुरन्त परमेश्वर के वचन को समझने और उद्‌घोषित करने में लौलीन हो गए थे, जिससे वे अपने पूरे जीवन भर “सब प्रकार का धीरज,” जिसे “बड़ा धीरज” भी कहा जा सकता है, रखने के लिए सशक्त बनाए गए थे। कलीसिया के निर्माण का श्रेय प्रेरितों के चमत्कारों का उतना नहीं दिया जाना चाहिए, जितना उन प्रेरितों की विश्वासयोग्य, साहसिक सहनशीलता को दिया जाना चाहिए।

पौलुस चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु न तो उन अनेक चमत्कारों पर हो, जो उसके द्वारा हुए थे और न ही उन बड़ी परीक्षाओं पर हो जो, जिनका उसने सामना किया था। बल्कि वह तो यह चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु उस दृढ़ विश्वास पर हो, जो परमेश्वर ने उसे दिया था और उस सत्य पर हो, जिसका उसने प्रचार किया था। पौलुस के सेवाकार्य को देखकर, उसके बोझ को देखकर और उसके हृदय की पुकार को सुनकर हमारे लिए यह देखना सरल हो जाता है कि परमेश्वर ने उसके माध्यम से जो चिह्न और चमत्कार किए थे, वे मसीही दिखावे के दिखावटी प्रदर्शन नहीं थे। अपितु वे पीड़ा और विपत्ति से उत्पन्न हुए थे, वे एक ऐसे जीवन में किए गए जो सहे जाने से परे था और उन्होंने उस सन्देश की सच्चाई को रेखांकित कर दिया जिसका प्रचार किया जा रहा था।

इस सन्दर्भ को जानने के बाद पौलुस के अनुयायियों ने यह नहीं पूछा होगा कि उसने ऐसे चमत्कार कैसे किए थे, बल्कि यह कि वह इतना दृढ़ विश्वास कैसे प्रदर्शित कर सका। वह कष्ट सहते हुए “सब प्रकार के धीरज” के साथ आगे कैसे बढ़ सका? केवल यीशु मसीह में उसके विश्वास और परमेश्वर के वचन के उसके ज्ञान से वह ऐसा करने में सक्षम हो सका था।

हमें मसीही जीवन में धैर्य-युक्त सहनशीलता के साथ परीक्षाओं का सामना करने और चुनौतियों का सामना करने में कौन सी बात सक्षम बनाती है? क्या वे चमत्कार हैं? चिह्न हैं? अद्‌भुत काम हैं? कदापि नहीं। यद्यपि परमेश्वर की विशेष कृपा किसी विशिष्ट क्षण पर हमारी सहायता कर सकती है, तौभी मूल मसीही सैद्धान्तिक शिक्षा की एक ठोस, अनुभवात्मक समझ ही वह बात है जो निस्सन्देह हमारे मार्ग के लिए उस समय पर उजियाला ठहरेगी जब बाकी सब अन्धकारमय लग रहा होगा (भजन संहिता 119:105)। वही समझ हमारे विश्वास की गहरी जड़ है और हमारी आत्माओं के लिए लंगर भी वही है (इब्रानियों 6:19)। जब परमेश्वर की सच्चाई हमारे हृदय और मन में बस जाती है, तब ही हम विश्वास के साथ कह सकते हैं, “हे प्रभु के संतो, उसके उत्तम वचन में तुम्हारे विश्वास की नींव कितनी दृढ़ है!”[1] क्या है वह जो आपको बनाए रखेगा? ऊपरी अनुभव ऐसा नहीं कर सकेंगे, परन्तु केवल आन्तरिक विश्वास ही यह कर सकेगा। आपके भीतर होने वाला आत्मा का काम सर्वदा परमेश्वर द्वारा आपके आस-पास किए जाने वाले किसी भी काम से बड़ा चमत्कार होगा। प्रभु करे कि जब लोग आपकी ओर देखें, तो वे केवल उन अद्‌भुत कामों को ही न देखें जो वह आपके में जीवन करता है, बल्कि परीक्षाओं के मध्य आपके सब प्रकार के धीरज को और उसके वचन के सत्य के प्रति आपके आज्ञापालन को भी देखने पाएँ।       

याकूब 5:7-11

12 मार्च : परिवर्तनकारी पछतावा

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“जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चाँदी के सिक्के प्रधान याजकों और पुरनियों के पास फेर लाया और कहा, ‘मैं ने निर्दोष को घात के लिए पकड़वाकर पाप किया है!’ उन्होंने कहा, ‘हमें क्या? तू ही जान।’ तब वह उन सिक्कों को मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को फाँसी दी।”  मत्ती 27:3-5

यीशु को पकड़वाने के बाद यहूदा का क्या हुआ? “उसने अपना मन बदल लिया।” इस वाक्यांश का अनुवाद भी कितनी सहायक रीति से किया गया है, “वह पछताया।” ऐसा लगता है कि उसी क्षण यहूदा का हृदय परिवर्तित हो गया, और इसके साथ ही उसका दृष्टिकोण भी बदल गया।

हम जिस यहूदा को गतसमनी के बगीचे में देखते हैं, जो हथियार लिए लोगों की एक बड़ी भीड़ का नेतृत्व करते हुए यीशु को धृष्टता और निर्लज्ज कटुता के साथ गिरफ्तार कराता है, वह यहूदा नहीं है जिसे हम यहाँ घण्टों बाद प्रधान याजकों और पुरनियों के सामने देखते हैं। उसके कठोर हृदय का स्थान अब पश्चाताप की भावना ने ले लिया है, जिसने उसकी आत्मा को जकड़ लिया है।

एक क्षण के लिए यहूदा के अनुभव के बारे में सोच कर देखें और इसे एक चेतावनी बन जाने दें कि पाप सर्वदा झूठी आशा प्रदान करता है। पाप करने से पहले के क्षण प्रायः उसके बाद के क्षणों से बिल्कुल अलग महसूस होते हैं। यह वही बड़ा बदलाव है, जो आदम और हव्वा ने अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अदन के बगीचे में महसूस किया था। उन्हें उस क्षण में, जब उन्होंने फल खाने का निर्णय लिया, जो कुछ भी पता था और जो कुछ भी उन्होंने उस विद्रोह के कार्य में आशा की थी, वह सब उनके मुँह में धूल बनकर रह गया। (उत्पत्ति 3:6-8)। इसी प्रकार, यीशु को उसके शत्रुओं के हाथों पकड़वाने में जो कुछ भी यहूदा को आकर्षक लग रहा था, वह जल्दी ही उसके लिए कुछ भी नहीं रह गया था।

जब हम पाप करते हैं तो वे सभी मोहक, मादक प्रभाव, जो हमें विद्रोह करने के लिए आकर्षित करते हैं, एक क्षण में ही खत्म हो जाते हैं। जो सोने के समान चमक रहा था वह व्यर्थ वस्तु बन जाती है। केवल यह स्पष्ट तथ्य रह जाता है कि मैंने एक पवित्र, प्रेमपूर्ण परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है।

इस तरह का परिवर्तनकारी पछतावा होने पर हमारे पास विकल्प यह होता है कि हम पश्चाताप करें और परमेश्वर से मेल कर लें या निराश होकर अपने आप को दोषी ठहराएँ। दुखद रूप से, यहूदा ने बाद वाला विकल्प चुना। उसका अपराध इतना बड़ा था कि निश्चय ही हर चेहरा उसे दोषी ठहरा रहा था, वह जो भी आवाज सुन रहा था वह उसे चुभ रही थी, उसकी आत्मा की हर प्रतिध्वनि उसे दोषी ठहरा रही थी। जो धन उसे दिया गया था, वह उसने प्रधान याजकों को लौटाकर अपने अपराध को कम करने का प्रयास किया, तौभी सिक्कों की थैली का भार अपने ऊपर से हटाकर वह अपने हृदय पर पड़े बोझ नहीं हटा पाया। अपने को अलगाव की इस स्थिति में और किसी प्रकार के सुधार की आशा से परे महसूस करते हुए वह एक भयानक मौत मारा गया। हो सकता है कि आज आप भी अपने पाप के बोझ तले दबा हुआ महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आपने अपने आप सब ठीक करने का प्रयास किया तो हो, किन्तु बोझ अभी भी बना हुआ है। यदि ऐसा है तो यह जान लें कि यहूदा की कहानी को आपकी बनने की आवश्यकता नहीं है। आप मसीह की ओर फिर सकते हैं। वह स्वतन्त्रता और क्षमा प्रदान करता है, एक ऐसा जूआ देता है जो सहज है और एक ऐसा बोझ देता है जो हल्का है (मत्ती 11:28-30)। इसी कारण मसीह मरा कि यहूदा जैसे पापी विश्वासघातियों को छुटकारा दे सके।

अगली बार जब पाप हमें अपनी ओर आने का संकेत करे तो यहूदा का उदाहरण हमारे लिए चेतावनी के रूप में मौजूद है। इस समय कौन से पाप आपको विशेष रूप से लुभा रहे हैं? याद रखें कि वे जैसे पहले दिखाई देते हैं, वे बाद में वैसे नहीं लगेंगे। प्रलोभन के क्षणों के लिए सहायता और अपराध-बोध के क्षणों के लिए आशा उपलब्ध है। परमेश्वर की क्षमा हमारे पछतावे और पश्चाताप की प्रतीक्षा कर रही है। आपको केवल इतना करना है कि उसकी ओर मुड़ें।       

भजन संहिता 51

11 मार्च : उसकी युक्ति के अनुसार

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“तेरे पास क्या है जो तू ने (दूसरे से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (दूसरे से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया?”  1 कुरिन्थियों 4:7

हम इसे कई तरीकों से छिपाते हुए अलग-अलग नाम देते हैं, किन्तु ईर्ष्या ऐसे इवेंजेलिकल पापों में से एक है जो प्रायः “सहनीय” माना जाता है। इसकी सम्भावना बहुत कम है कि यह आपको उन “दस सबसे अधिक किए जाने वाले” पापों की सूची में मिले जिसके विरुद्ध कोई पास्टर अपनी कलीसिया को चेतावनी देता हो या एक-दूसरे के साथ अपने संघर्षों के बारे में बात करते समय विश्वासी इसका उल्लेख प्रायः करते हों। तो भी, यह परमेश्वर की सूची में है और प्रायः पवित्रशास्त्र में इसका उल्लेख किया गया है। वास्तविकता यह है कि ईर्ष्या कुछ सबसे घिनौने पापपूर्ण व्यवहारों की सूची के बीच पाई जाती है, जिनका नए नियम की पत्रियों में उल्लेख किया गया है क्योंकि इसे बहुत गम्भीरता से लिया जाना चाहिए (उदाहरण के लिए, रोमियों 13:13 देखें)।

जब पौलुस ने कुरिन्थियों को पत्र लिखा था, उस समय से आज तक कुछ विशेष बदलाव नहीं आया है। सामान्य स्थानीय कलीसिया अभी भी ईर्ष्या के कारण बहुत अधिक अराजकता तथा विभाजन के कारण जूझ रही है और ईर्ष्या द्वारा उत्पन्न संकटों में से एक सम्भावना यह है कि हम सन्देह करने लगें कि क्या परमेश्वर जानता भी है कि वह वरदानों का वितरण किस प्रकार कर रहा है।

पौलुस कलीसिया के इन घमण्डी, विभाजित, ईर्ष्यालु सदस्यों से कहता है कि तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह तुमने किसी दूसरे से पाया है  और वरदानों का देने वाला वह जगत का सृष्टिकर्ता, गलतियाँ नहीं करता। तो फिर वे, और हम भी, इस प्रकार अहंकार पूर्वक कैसे रह सकते हैं, मानो सृष्टि का नियन्त्रण हम अधिक अच्छे ढंग से कर सकते हैं? अपनी ऊँचाई, परिधि, गति या अपनी किसी भी योग्यता को क्या हमने निर्धारित किया है? हमें किसने विशिष्ट बनाया है? परमेश्वर ने! हमारा डी.एन.ए. परमेश्वर की ओर से नियोजित है। हमारी परिस्थितियाँ ठीक वैसी ही हैं जैसी परमेश्वर ने युक्ति की है, और वह गलतियाँ नहीं करता। डाह एक पाप इसलिए है, क्योंकि यह एक ऐसा रवैया है जो कहता है कि परमेश्वर भला नहीं है या वह नहीं जानता कि हमारे लिए क्या भला है। डाह मूर्तिपूजा जैसी लगती है।

एक संगीत मण्डल के रूप में जीवन के मंच जब हम बाँसुरी जैसा एक यन्त्र बजा रहे हों और अपने से कुछ ही दूरी पर एक बड़ी तुरही को ऊँचे और शक्तिशाली स्वरों के साथ बजती हुई देखें, तब हो सकता है कि हम अपने आप से यह कहना चाहें, “कोई भी मुझे नहीं सुन पा रहा। मेरा स्वर पर्याप्त रूप से ऊँचा नहीं है।” वहीं से अपनी स्थिति के बारे में कड़वाहट की भावना और तुरही वादक के प्रति ईर्ष्या की भावना उत्पन्न होती है। परन्तु हमारी बाँसुरी जैसे वाद्य यन्त्र की ध्वनि का भी एक कारण है। यह वह वाद्य यन्त्र है जिसे हमें ही बजाना है। इसलिए इसे आनन्द से और उत्कृष्टता के साथ बजाएँ!

परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों का उपयोग करने के हमारे प्रयासों में हम एक-दूसरे से ईर्ष्या क्यों करते हैं? हम अपने उस आनन्द को असन्तोष के हाथों क्यों छिन जाने देते हैं, जो उसने हमें मुक्त रूप से प्रदान किया है? उसने किसी और के लिए जो किया है, उसके कारण हम क्यों उसके प्रति अन्धे हो जाते हैं कि उसने हमारे लिए क्या किया है, विशेषकर अपनी उपस्थिति में हमें अनन्त धरोहर देने में? इस एक सत्य को हम सभी को अभ्यास करने की आवश्यकता है, “परमेश्वर ने मुझे वही दिया है जो मुझे चाहिए, मैं बिल्कुल वैसा ही रचा गया हूँ जैसी उसकी इच्छा थी, और जो कुछ उसने मुझे दिया है और जो कुछ नहीं दिया है, वह मेरे भले और उसकी महिमा के लिए है।”

ईर्ष्या को अपने ऊपर हावी न होने दें। इसके विपरीत, जिस भूमिका के लिए आपको बनाया गया है, उसे आनन्द के साथ जीएँ। क्योंकि आप उसके बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिए तैयार किया है और आपको वरदान में दिया है (इफिसियों 2:10)। उसको ही आज अपने लिए पर्याप्त होने दें।       1 तीमुथियुस 6:6-12

10 मार्च : अकेले पड़ जाने का झूठ

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10 मार्च : अकेले पड़ जाने का झूठ
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“हे परमेश्‍वर, कब तक! क्या तू सदैव मुझे भूला रहेगा? तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रहेगा?”  भजन संहिता 13:1

लोग कहते हैं कि जब आप मौज-मस्ती कर रहे होते हैं, तो समय बहुत तेज़ी से बीतता हुआ प्रतीत होता है। किन्तु जब परिस्थितियाँ कम उत्साही हो जाती हैं, तो जीवन धीमी गति से चलता हुआ प्रतीत होता है। हम अपने आप को यह सोचते हुए पाते हैं, “मुझे नहीं पता कि मैं कभी इन परिस्थितियों से बाहर निकल पाऊँगा या नहीं। और मुझे नहीं पता कि मैं इन्हें कैसे सहन कर पाऊँगा।”

भजन संहिता 13 में बार-बार पूछा जाने वाला एक प्रश्न यह है, “कब तक? कब तक?” यहाँ पर दाऊद की परिस्थितियों का तो वर्णन नहीं किया गया है, किन्तु वह स्पष्ट रूप से भुला दिया गया और त्यागा हुआ महसूस कर रहा है, जो एक ऐसी भावना है जिसे हम सभी समझ सकते हैं। यह वैसा ही है, जैसा हम किसी प्रियजन को खो देने पर महसूस करते हैं या जब हमें लगता है कि हमें अकेले ही किसी परीक्षा की घाटी से होकर जाना होगा।

अकेला पड़ जाना निस्सन्देह कुचल देने वाला अनुभव होता है। परन्तु यहाँ दाऊद ने जो लिखा है, वह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह महसूस कर रहा है कि स्वयं परमेश्वर ने ही उसे अकेला छोड़ दिया है।

यही भावना सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के कई अन्य लोगों में भी दिखाई देती है। यशायाह की पुस्तक में निर्वासन में गए हुए परमेश्वर के लोग चिल्लाते हैं, “यहोवा ने मुझे त्याग दिया है, मेरा प्रभु मुझे भूल गया है” (यशायाह 49:14)। मसीही पथ पर चलने वाले यात्रियों का, अर्थात् यीशु के सच्चे अनुयायियों और सेवकों का भी कभी-कभी यह कहने का मन करता है, “मुझे लगता है कि प्रभु ने सच में हमें भुला दिया है। यदि उसने सच में हमें भुला न दिया होता, यदि वह अब भी हमारे साथ होता तो हम इस स्थिति में कैसे होते? यदि वह सच में हमारी रक्षा कर रहा होता तो निश्चित रूप से हमें इन परीक्षाओं को नहीं झेलना पड़ता।”

फिर भी दाऊद की इस उभरती हुई निराशा में हम पाते हैं कि उसका अनुभव (जैसा कि प्रायः हमारे साथ भी होता है) वास्तविकता को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा है। और दाऊद में इस बात को स्वीकारने की आत्मिक परिपक्वता और दीनता है कि जो उसे सच लग रहा है , वह उससे मेल नहीं खा रहा जो वह जानता है  कि वास्तव में सच है। इसलिए वह स्वयं को परमेश्वर की महाकरुणा, उसके उद्धार और उसकी उदारता की याद दिलाता है, और संघर्ष और पीड़ा में होते हुए भी उन बातों में आनन्दित रहने का संकल्प लेता है (भजन संहिता 13:5-6)।

मसीही जीवन का आशा से भरा तनाव यही है। हम पूछ रहे होते हैं, “हे प्रभु, कब तक? हे परमेश्वर, आप कहाँ हैं?” जबकि हम अपने हृदयों को याद दिला रहे होते हैं कि परमेश्वर ने हमसे प्रेम करना, हमें छुड़ाना या हमारे भीतर काम करना समाप्त नहीं किया है।

त्याग दिए जाने के झूठ पर विश्वास न करें, जिसे आपकी भावनाएँ आपके सामने परोसती रहती हैं। अपने भुलक्कड़ लोगों के प्रति परमेश्वर की शान्ति प्रदान करने वाले इस प्रत्युत्तर में विश्राम प्राप्त करें, “क्या यह हो सकता है कि कोई माता अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाए और अपने जन्माए हुए लड़के पर दया न करे? हाँ, वह तो भूल सकती है, परन्तु मैं तुझे नहीं भूल सकता। देख, मैं ने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोदकर बनाया है; तेरी शहरपनाह सदैव मेरी दृष्टि के सामने बनी रहती है” (यशायाह 49:15-16)। अपने बच्चों के लिए परमेश्वर का संरक्षण सूर्य के समान है, वह स्थाई है। यहाँ तक कि जब बादल इसे अवरुद्ध कर देते हैं, तब भी वह वहाँ होता है। यह सर्वदा वहाँ होता है।

क्या आप आज परमेश्वर की स्थिरता पर भरोसा करेंगे? जब आप अगली बार त्यागा हुआ महसूस करें तो यह जान लें कि परमेश्वर अपने हाथों को देखता है, जिन पर उसकी प्रत्येक सन्तान का नाम खुदा हुआ है और वह कहता है कि तुम यहीं हो। मैं तुम्हें नहीं भूला हूँ।       

भजन संहिता 13

9 मार्च : सीखने के लिए एक अवसर

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9 मार्च : सीखने के लिए एक अवसर
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“मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो।”  मत्ती 11:29

जब बच्चे स्कूल से घर पहुँचते हैं, तो उनके माता-पिता उनसे क्या पूछते हैं?

कुछ लोग पूछते होंगे कि “क्या तुमने आज कुछ सीखा?” किन्तु कई लोग कुछ ऐसा कहते होंगे कि “क्या तुमने आज मज़ा किया?”

स्कूली शिक्षा के सम्बन्ध में यह महत्त्व नहीं रखता कि कौन सा प्रश्न पूछा जाता है और उसके परिणामस्वरूप कौन सी प्राथमिकता उजागर होती है। किन्तु कलीसिया के बारे में भी प्रायः यही प्रश्न पूछा जाता है कि क्या हमने आज कलीसिया में मज़ा  किया? क्या हमने कलीसिया का आनन्द  लिया?

इसके विपरीत, हमें जो पूछना चाहिए वह यह है, “हम यीशु के बारे में और यीशु से क्या सीख  रहे हैं?”

यीशु हमें उससे सीखने का अवसर देने का महान विशेषाधिकार प्रदान करता है। चारों सुसमाचारों में उसकी शिक्षा जीवन के बड़े प्रश्नों को सम्बोधित करती है, अर्थात् मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ? मैं कहाँ जा रहा हूँ? क्या जीवन का कोई महत्त्व है भी?

यीशु मसीह को व्यक्तिगत प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में जानना इन बड़े विषयों के बारे में लोगों के सोचने के तरीके को बदल देता है। यह समय के बारे में, संसाधनों के बारे में, आजीविका के बारे में, या फिर वे किस तरह के व्यक्ति से विवाह करना चाहेंगे या वे किस तरह का जीवनसाथी बनना चाहते हैं, इस बारे में उनके दृष्टिकोण को बदल देता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि यीशु को सच में जानने का अर्थ है उसे अपने जीवन पर अधिकारी बनने के लिए आमन्त्रित करना। जैसे-जैसे हम उससे सीखते हैं, सब कुछ बदल जाता है।

यीशु के पास आना इस बात को सीखने और उसके प्रति प्रत्युत्तर देने से आरम्भ होता है कि मसीह, अर्थात् अधर्मियों (जो कि हम हैं) के लिए धर्मी (जो कि वह है) ने पापों के कारण एक बार दुख उठाया ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए (1 पतरस 3:18)। केवल मस्तिष्क में इस बात की जानकारी का होना इस बात पर विश्वास करने, इस पर भरोसा करने और जिसने हमें यह सब दिया है उसका जूआ प्रसन्नता के साथ अपने ऊपर उठा लेने के बराबर नहीं है।

हम सभी ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने जीवन की पहेली को सुलझाने के प्रयास में लगे हैं और पहेली के टुकड़ों को जितना हो सके उतना एक साथ जोड़ने का यत्न कर रहे हैं, और हम सब भी कभी न कभी ऐसी परिस्थिति में रह चुके हैं। किन्तु जब तक हम परमेश्वर से सीखने के लिए तैयार नहीं होंगे तब तक वे टुकड़े एक साथ नहीं जुड़ सकेंगे। परन्तु अब हम वास्तव में परमेश्वर को जान सकते हैं, हमारी बौद्धिक क्षमता के कारण नहीं अपितु इसलिए क्योंकि परमेश्वर अपने वचन की सच्चाई के द्वारा यह चुनता है कि हम उसको जानें।

क्या आप अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यीशु से सीखने के लिए तैयार हैं? क्या आप उसकी शिक्षाओं का पालन करने और अपने आप को उसके अधिकार के अधीन रखने के काम को एक विशेषाधिकार के रूप में देखते हैं, न कि एक बोझ के रूप में? सुनिश्चित करें कि आप सुसमाचार के सत्य को सीखने के प्रत्येक अवसर का लाभ उठाएँगे, जो आपके हृदय की तृष्णा को तृप्त करेगा और दिन-प्रतिदिन आपके जीवन को परिवर्तित करता जाएगा।

      इफिसियों 4:17 – 5:2

8 मार्च : अब्राहम की आशा

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8 मार्च : अब्राहम की आशा
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“न अविश्वासी होकर परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा पर संदेह किया, पर विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्‍वर की महिमा की।”  रोमियों 4:20

अब्राहम के सन्तान पैदा होने से पहले ही परमेश्वर ने उससे प्रतिज्ञा की थी कि उसके वंशज संख्या में वृद्धि करके एक विशाल जनसमूह बन जाएँगे। समय बीतता गया और ऐसा लगने लगा कि अब्राहम और उसकी पत्नी सारा को कभी कोई सन्तान नहीं होगी। ऐसा लग रहा था कि प्रतिज्ञा पूरी न हो सकेगी, इसलिए अब्राहम और सारा ने प्रतीक्षा न करते हुए स्वयं ही इस विषय में कुछ करने का निर्णय लिया। सारा ने अपनी दासी हाजिरा को अब्राहम के लिए एक सन्तान उत्पन्न करने का प्रस्ताव दिया और हाजिरा ने एक बच्चे को जन्म दिया, जिसका नाम इश्माएल रखा गया। फिर भी परमेश्वर ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसने जो वंशज देने की प्रतिज्ञा की थी, वे इश्माएल की वंशावली से नहीं आने वाले थे। परमेश्वर अब्राहम और सारा को दिखा रहा था कि यदि उसकी प्रतिज्ञा को पूरा होना है, तो केवल वही इसे पूरा कर सकता है। अब्राहम को एक काम दिया गया और वह था परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा करना, एक ऐसी प्रतिज्ञा पर जिसके पूर्ण होने में भारी कठिनाइयाँ थीं और इसलिए उसे पूर्ण करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता थी।

वर्ष बीतते गए और सारा अभी भी गर्भवती न हुई। परमेश्वर फिर से अब्राहम के पास आया और उसे आश्वस्त किया कि इतनी आयु हो जाने के बाद भी सारा एक बेटे को जन्म देगी। अन्ततः, नब्बे साल की आयु में उसने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम इसहाक रखा गया, जिसका अर्थ है “वह हँसता है।” अब्राहम, जो एक बार इसहाक के जन्म की सम्भावना पर सन्देह करते हुए हँसा था (उत्पत्ति 17:17), वह अब निश्चित रूप से विस्मय से अभिभूत था।

परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करता है। नब्बे साल की स्त्री के लिए सन्तान को जन्म देना असम्भव बात है, परन्तु परमेश्वर ऐसा करने में सक्षम है। इस वृद्ध दम्पति को दी गई एक वारिस की प्रतिज्ञा को पूरा होने के लिए अन्य किसी भी बात से बढ़कर जीवन के अलौकिक वरदान की आवश्यकता थी। परमेश्वर के दिव्य हस्तक्षेप के बिना कोई सन्तान नहीं हो सकती थी, अर्थात् कोई जन्म हो ही नहीं सकता था। इसी प्रकार, परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना कोई आत्मिक जीवन नहीं हो सकता। किन्तु उसके सामर्थ्य से एक नया जीवन मिल सकता है, एक सच्चा जीवन! आदि से ही परमेश्वर अपने लोगों को सिखा रहा था कि किसी भी जीवन में सुसमाचार को जड़ पकड़ने के लिए आश्चर्यकर्म की आवश्यकता पड़ती है।

परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाएँ पूरी करता है। और अपने लोगों से की गई उसकी प्रतिज्ञाएँ बहुत सारी हैं, वे सभी शोभायमान हैं और वे सब मसीह में “हाँ” के साथ हैं (2 कुरिन्थियों 1:20)। हमारा काम बसी यही है कि हम वही करें जो अब्राहम ने करना सीखा था, अर्थात् परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना, भले ही उनका पूरा होना बहुत दूर की बात या असम्भव क्यों न लगता हो। और फिर, एक ऐसी प्रतिज्ञा जिसके पूरे होने में भारी कठिनाइयाँ हों, उसे पूरा करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता होती है, और वही तो वह परमेश्वर है, जिसे आप और मैं पिता कहकर पुकारते हैं।

क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसे यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि परमेश्वर आज भी अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है? यदि सच कहें तो हम सभी को यह बात याद दिलाए जाने की आवश्यकता है। अब्राहम के समान केवल परमेश्वर पर ही अपनी आशा रखें। वह अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सक्षम है और केवल उसके सामर्थ्य से ही वे पूरी हो सकेंगी। किन्तु आप तो जानते हैं कि परमेश्वर आश्चर्यकर्म करता है, केवल इतना करें कि आईने में देखें और याद करें कि सितारों को उनके स्थान पर रखने और संसार को बनाए रखने में जिस दिव्य सामर्थ्य की आवश्यकता है, उसी सामर्थ्य ने आपके हृदय को जागृत किया है, आप में विश्वास पैदा किया है और आपको अनन्त जीवन दिया है।       उत्पत्ति 15:1-21