“प्रेरित के लक्षण भी तुम्हारे बीच सब प्रकार के धीरज सहित चिह्नों, और अद्भुत कामों, और सामर्थ्य के कामों से दिखाए गए।” 2 कुरिन्थियों 12:12
जब हम मसीह के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के तुरन्त बाद के समय के बारे में सोचते हैं, उस समय के बारे में जब प्रेरितों ने सेवाकार्य में उन्नति की और कलीसिया का जन्म हुआ, तो वे “चिह्न, अद्भुत काम, और सामर्थ्य के काम” जो किए गए थे, उनकी कल्पना करके यह आशा करना एक सामान्य बात है कि काश हम उन्हें देखने के लिए वहाँ होते तो हमारा विश्वास दृढ़ होता और उनके द्वारा हमारे सेवाकार्य में बढ़ोत्तरी होती।
निस्सन्देह, उस समय की अलौकिक घटनाओं की गुणवत्ता और मात्रा दोनों ही विशेष और अद्वितीय थीं। प्रेरितों को उस रीति से अलौकिक वरदान दिया गया था, जो आज के समय के मसीही लोगों को नहीं दिया गया है। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि तब भी आरम्भिक कलीसिया ने इन अनुभवों को अपने विश्वास का मापदण्ड नहीं बनाया। हम केवल उन चमत्कारों पर ध्यान केन्द्रित करके उनके सन्दर्भ को नहीं भूल सकते कि वे लोग जो परमेश्वर के आत्मा से भरे गए थे तुरन्त परमेश्वर के वचन को समझने और उद्घोषित करने में लौलीन हो गए थे, जिससे वे अपने पूरे जीवन भर “सब प्रकार का धीरज,” जिसे “बड़ा धीरज” भी कहा जा सकता है, रखने के लिए सशक्त बनाए गए थे। कलीसिया के निर्माण का श्रेय प्रेरितों के चमत्कारों का उतना नहीं दिया जाना चाहिए, जितना उन प्रेरितों की विश्वासयोग्य, साहसिक सहनशीलता को दिया जाना चाहिए।
पौलुस चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु न तो उन अनेक चमत्कारों पर हो, जो उसके द्वारा हुए थे और न ही उन बड़ी परीक्षाओं पर हो जो, जिनका उसने सामना किया था। बल्कि वह तो यह चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु उस दृढ़ विश्वास पर हो, जो परमेश्वर ने उसे दिया था और उस सत्य पर हो, जिसका उसने प्रचार किया था। पौलुस के सेवाकार्य को देखकर, उसके बोझ को देखकर और उसके हृदय की पुकार को सुनकर हमारे लिए यह देखना सरल हो जाता है कि परमेश्वर ने उसके माध्यम से जो चिह्न और चमत्कार किए थे, वे मसीही दिखावे के दिखावटी प्रदर्शन नहीं थे। अपितु वे पीड़ा और विपत्ति से उत्पन्न हुए थे, वे एक ऐसे जीवन में किए गए जो सहे जाने से परे था और उन्होंने उस सन्देश की सच्चाई को रेखांकित कर दिया जिसका प्रचार किया जा रहा था।
इस सन्दर्भ को जानने के बाद पौलुस के अनुयायियों ने यह नहीं पूछा होगा कि उसने ऐसे चमत्कार कैसे किए थे, बल्कि यह कि वह इतना दृढ़ विश्वास कैसे प्रदर्शित कर सका। वह कष्ट सहते हुए “सब प्रकार के धीरज” के साथ आगे कैसे बढ़ सका? केवल यीशु मसीह में उसके विश्वास और परमेश्वर के वचन के उसके ज्ञान से वह ऐसा करने में सक्षम हो सका था।
हमें मसीही जीवन में धैर्य-युक्त सहनशीलता के साथ परीक्षाओं का सामना करने और चुनौतियों का सामना करने में कौन सी बात सक्षम बनाती है? क्या वे चमत्कार हैं? चिह्न हैं? अद्भुत काम हैं? कदापि नहीं। यद्यपि परमेश्वर की विशेष कृपा किसी विशिष्ट क्षण पर हमारी सहायता कर सकती है, तौभी मूल मसीही सैद्धान्तिक शिक्षा की एक ठोस, अनुभवात्मक समझ ही वह बात है जो निस्सन्देह हमारे मार्ग के लिए उस समय पर उजियाला ठहरेगी जब बाकी सब अन्धकारमय लग रहा होगा (भजन संहिता 119:105)। वही समझ हमारे विश्वास की गहरी जड़ है और हमारी आत्माओं के लिए लंगर भी वही है (इब्रानियों 6:19)। जब परमेश्वर की सच्चाई हमारे हृदय और मन में बस जाती है, तब ही हम विश्वास के साथ कह सकते हैं, “हे प्रभु के संतो, उसके उत्तम वचन में तुम्हारे विश्वास की नींव कितनी दृढ़ है!”[1] क्या है वह जो आपको बनाए रखेगा? ऊपरी अनुभव ऐसा नहीं कर सकेंगे, परन्तु केवल आन्तरिक विश्वास ही यह कर सकेगा। आपके भीतर होने वाला आत्मा का काम सर्वदा परमेश्वर द्वारा आपके आस-पास किए जाने वाले किसी भी काम से बड़ा चमत्कार होगा। प्रभु करे कि जब लोग आपकी ओर देखें, तो वे केवल उन अद्भुत कामों को ही न देखें जो वह आपके में जीवन करता है, बल्कि परीक्षाओं के मध्य आपके सब प्रकार के धीरज को और उसके वचन के सत्य के प्रति आपके आज्ञापालन को भी देखने पाएँ।
याकूब 5:7-11