“नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालेब, जो देश के भेद लेने वालों में से थे, अपने-अपने वस्त्र फाड़कर, इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे, “जिस देश का भेद लेने को हम इधर-उधर घूम कर आए हैं, वह अत्यन्त उत्तम देश है। यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, पहुँचाकर उसे हमें दे देगा।” गिनती 14:6-8
3 मई 1953 को सिंगापुर से लन्दन जा रहा एक विमान भारत के कोलकाता से 22 मील उत्तर-पश्चिम में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें कोई भी जीवित नहीं बचा। फ्रेड मिशेल, जो दस साल पहले चाइना इनलैंड मिशन के निदेशक बने थे, उस विमान में यात्रा कर रहे थे। उनकी जीवनी में फ्रेड को “एक साधारण व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया था, जो एक गाँव से थे और उनके माता-पिता श्रमिक वर्ग के थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन प्रान्तों में रहते हुए एक रसायनज्ञ के रूप में बिताया और वे परमेश्वर के साथ चलते थे।”[1]
जब तक यपुन्ने का पुत्र कालेब एक भेदी न बना था, जिसे मूसा ने उस देश का भेद लेने के लिए नियुक्त किया था, जिसे देने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अपने लोगों से की थी, तब तक ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह संकेत दे कि वह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण या प्रतिष्ठित था। परन्तु ऐसा लगता है कि निश्चित रूप से उन साधारण अनुभवों में उसकी नीरस जीवन-यात्रा में परमेश्वर ने उस चरित्र को गढ़ा और विकसित किया जो गिनती 14 में प्रकट होता है।
संकट हमारे चरित्र को उजागर कर देता है। जब इस्राएली भेदिए कनान देश का भेद लेकर वापस आए तो उन्होंने वर्णन करते हुए कहा कि उसके नगर गढ़ वाले हैं, और “उन लोगों पर चढ़ने की शक्ति हममें नहीं है; क्योंकि वे हमसे बलवान हैं . . . हम अपनी दृष्टि में उनके सामने टिड्डे के समान दिखाई पड़ते थे” (गिनती 13:31, 33)। और लोग परमेश्वर पर आरोप लगाने लगे कि उसने उन्हें ऐसे देश में भेजा है, जहाँ वे मर जाएँगे (गिनती 14:3)।
कालेब की परमेश्वर के लिए प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वह इतने लोगों की सामान्य राय के विरुद्ध खड़ा होने के लिए तैयार था। जब अन्य भेदियों ने प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश न करने का सुझाव दिया तो उसने उनका विरोध किया। जब सभी लोग परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर रहे थे तो उसने उनका साथ नहीं दिया। वह और उसका विश्वासयोग्य मित्र यहोशू ही थे, जिन्होंने परमेश्वर के प्रति साहसी आज्ञाकारिता का सुझाव दिया।
कालेब को निश्चय था कि परमेश्वर के सामर्थ्य से सब कुछ सम्भव है। उसने दूसरे भेदियों की कही गई बातों की सच्चाई को नकारा नहीं, परन्तु उसने केवल इसे एक अलग दृष्टिकोण से देखा। वह न तो अपनी क्षमता पर और न ही इस्राएलियों की क्षमता पर, किन्तु परमेश्वर के सामर्थ्य और उसके चरित्र की विश्वसनीयता पर भरोसा कर रहा था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जो भय के मध्य में भी विश्वास कर रहा था। वह जानता था कि जिस टिड्डे को परमेश्वर से सहायता प्राप्त हो, वह टिड्डा भी बड़े काम कर सकता है।
यद्यपि हमें लग सकता है कि हमारा जीवन नीरस है, फिर भी हम नीरसता में भी सदैव परमेश्वर को खोज सकते हैं। दैनिक जीवन के साधारण क्षणों में वह हमारे चरित्र को गढ़ेगा कि हम भी प्रत्येक परिस्थिति में साहसी व्यक्ति बन सकें। परमेश्वर अपनी योजनाओं को पूरी करने के लिए बहुत महान लोगों को नहीं ढूँढ रहा है। वह ऐसे साधारण लोगों को ढूँढ रहा है जो उस पर भरोसा करें, विश्वास में आगे कदम बढ़ाएँ और साहसपूर्वक आज्ञा मानने के लिए तैयार हों। आज आपको वैसा व्यक्ति बनने से कोई नहीं सकता।
गिनती 13:25 – 14:25