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12 जानेवारी : अनुभवजन्य गुरुकिल्ली

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सर्व प्रकारची कृपा तुम्हांवर विपुल होऊं देण्यास देव समर्थ आहे; ह्यासाठीं कीं, तुम्हांला सर्व गोष्टींत सगळा पुरवठा नेहमी होऊन प्रत्येक चांगल्या कामासाठीं सर्वकांही तुमच्याजवळ विपुल व्हावें. (2 करिंथकरांस 9:8)

आम्हांला ठाऊक आहे कीं देवाच्या भावी कृपेवर विश्वास हा औदार्यपणाची अनुभवजन्य गुरुकिल्ली आहे, कारण करिंथकरांसच्या दुसऱ्यां पत्रांत पौल हें अद्भुत अभिवचन आपल्या पुढें सादर करतो: “सर्व प्रकारची कृपा  तुम्हांवर विपुल होऊं देण्यास देव समर्थ आहे; ह्यासाठीं कीं, तुम्हांला सर्व गोष्टींत सगळा पुरवठा नेहमी होऊन प्रत्येक चांगल्या कामासाठीं सर्वकांही तुमच्याजवळ विपुल व्हावें” (2 करिंथकरांस 9:8).

दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, जर तुम्हांला तुमचें धन साठवून ठेवण्याच्या दडपणांतून मुक्त व्हायचे असेल, आणि जर तुम्हांला प्रत्येक चांगल्या कामासाठीं (कृपेच्या) विपुल पुरवठ्यानें भरून जायचे असेल, तर मग तुमचा विश्वास भावी कृपेवर असूं द्या. हांच उद्देश्य तुमच्याठायीं साधून देण्यांस देव भविष्यांतहि क्षणोक्षणी “सर्व प्रकारची कृपा तुम्हांवर विपुल होऊं देण्यास समर्थ आहे” या अभिवचनावर विश्वास ठेवा.

मीं नुकतेंच भावी कृपेवरील आमच्या ह्या विश्वासाला औदार्यपणाची अनुभवजन्य गुरुकिल्ली  म्हटलें, म्हणजे जेणेंकरून माझ्यानें एक ऐतिहासिक गुरुकिल्ली सुद्धा आहे ही वस्तुस्थिती नाकारलीं जाऊं नये. एक गुरुकिल्ली अनुभवाची आहे, तर एक दुसरी गुरुकिल्ली इतिहासाची आहे. जेव्हां पौल करिंथ येथील मंडळींतील लोकांना त्यांच्यांवर झालेल्या कृपेबद्दल सांगतो तेव्हां तो त्यांना कृपेच्या ऐतिहासिक गुरुकिल्लीची आठवण करून देतो, “आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताची कृपा तुम्हांला माहीत आहे; तो धनवान असतां तुम्हांकरितां दरिद्री झाला, अशा हेतूनें कीं, त्याच्या दारिद्र्यानें तुम्हीं धनवान व्हावें” (2 करिंथ 8:9).

गतकाळांत झालेल्या कृपेच्या ह्या कार्यावांचून, ख्रिस्ताला उंचवणाऱ्या औदार्यपणाची कपाटे बंदच राहतील. गतकाळांत झालेली हीच कृपा औदार्ययुक्त प्रेम फुलविणारी स्वाभाविक गुरुकिल्ली आहे.

परंतु या वचनांत वर्णिलेली गतकाळांतील कृपा कशी कार्य करते त्यांकडे लक्ष द्या. ती कृपा (ख्रिस्त दरिद्री झाला) भावी काळांतील कृपेचा (कीं आपण धनवान व्हावें) पाया बनली आहे. अशा प्रकारे, ज्याद्वारें आपण सढळ हातानें देणारें बनतों ती ऐतिहासिक  (कृपेची) गुरुकिल्ली ही भावी कृपेवरील आमच्या विश्वासाच्या अनुभवजन्य गुरुकिल्लीचा पाया आहे.

अशाप्रकारे, प्रेम आणि औदार्यपणाची अनुभवजन्य गुरुकिल्ली ही आहे: भावी काळांत होणाऱ्या कृपेवर तुमचा विश्वास दृढ असूं द्या- म्हणजे असा कीं, “सर्व प्रकारची (भावी) कृपा तुम्हांवर विपुल होऊं देण्यास देव (भविष्यांतहि) समर्थ आहे” –कीं जेणेंकरून तुमच्या गरजा पूर्ण व्हाव्यांत, आणि जेणेंकरून तुम्हीं औदार्ययुक्त प्रेमानें विपुल होण्यांस समर्थ व्हावें.

लोभापांसून पूर्ण स्वातंत्र्य देवाच्या भावी कृपेवर खोलवर समाधान देणाऱ्या विश्वासाद्वारेंच मिळतें.

11 जनवरी : अन्धकार के समय में स्तुति

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11 जनवरी : अन्धकार के समय में स्तुति
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“तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत करके कहा, ‘मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।’ इन सब बातों में भी अय्यूब ने न तो पाप किया, और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।”  अय्यूब 1:20-22

कठिनाई में धीरज रखने का सम्भवतः सबसे बड़ा बाइबल का उदाहरण अय्यूब है। एक निष्कलंक और खरा व्यक्ति होने के बाद भी एक ही दिन में उसने अपने बच्चों की मृत्यु देखी और लगभग अपनी सारी सम्पत्ति खो दी। फिर भी, उसकी पहली प्रतिक्रियाओं में से एक यह थी कि बहुतायत और घटी में, आनन्द की परिस्थितियों को लाने में और दुखद परिस्थितियों को लेकर आने में, उसने परमेश्वर की सम्प्रभुता को स्वीकार किया। जब उथल-पुथल, निराशा और कष्ट उस पर छा गए तो उसने अपना सिर मुँड़ा लिया, अपना फटा हुआ बागा पहना और भूमि पर बैठ, न केवल पीड़ा में अपितु आराधना के भाव में उसने ऐसा किया।

उल्लेखनीय रूप से इस कष्ट के अन्धकार में “अय्यूब ने न तो पाप किया और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।” इसके विपरीत, अपने आँसुओं में उसने परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा किया। दूसरे शब्दों में, उसने इस बात को पहचाना कि परमेश्वर जानता है कि वह प्रत्येक परिस्थिति में क्या कर रहा है। सबसे कठिन परिस्थितियों में भी परमेश्वर हमारी स्तुति के योग्य है। अय्यूब जानता था कि उसके सब दिन परमेश्वर के हाथों में हैं (भजन संहिता 31:15)।

हममें से अधिकांश लोग व्यथा की चीखों और आँसुओं के कुण्डों से होकर गए हैं। हम जानते हैं कि तूफान के बीच में परमेश्वर की सम्प्रभुता और भलाई का अंगीकार करना कितना कठिन हो सकता है। हमें सन्देह होता है कि वह कहाँ है। कष्ट के प्रति हमारे मानवीय प्रत्युत्तर में हम में परमेश्वर के प्रावधान के बारे में कही गई बातों को नीरस या पुराने ज़माने की बातें समझने का झुकाव होता है, परन्तु ऐसा नहीं है। वास्तव में, समय बीतने या परिस्थितियों के बदलने के साथ हम पीछे मुड़कर देख सकते हैं और पहचान सकते हैं कि ऐसी कोई दुखद परिस्थिति नहीं है, जिसकी अनुमति परमेश्वर ने सम्प्रभुता में होकर न दी हो। वह सभी बातों को अपने हाथों से होकर जाने देता है और उनमें से कोई भी उसे आश्चर्यचकित नहीं करती।

हमें एक-दूसरे के कष्ट को कम नहीं आँकना चाहिए या उनको सहज उत्तर प्रदान नहीं करने चाहिए। इसके विपरीत, हमें कठिनाई के समय में एक-दूसरे को मसीह के समान बनने के लिए प्रेरित करने के लिए बुलाहट दी गई है, एक-दूसरे को स्मरण दिलाते हुए कि परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन और अटल प्रेम दिया है और उसकी चौकसी में हमारे प्राणों की रक्षा हुई है (अय्यूब 10:12)। और निश्चित रूप से हम इतिहास में पीछे देखकर जान सकते हैं कि हमारे परमेश्वर ने इस संसार के अन्धकार में प्रवेश किया है और उस पीड़ा को परख के पूरी तरह समझा है। वह एक ऐसा परमेश्वर है जो जानता है कि मनुष्य को अपने जीवन में कैसा महसूस होता है। वह एक ऐसा परमेश्वर है, जिसने हमारे सामने एक ऐसा भविष्य रखा है जहाँ कोई कष्ट या रोना नहीं है।

जीवन की कठिनाइयों और कष्ट की गहराइयों में भी परमेश्वर का पिता-सदृश प्रावधान हमारी भलाई और उसकी महिमा के लिए सब बातों के होने की अनुमति देता है। उसने यह प्रमाणित कर दिया है कि वह जानता है कि वह क्या कर रहा है। इस कारण हम अन्धकार में भी उसकी स्तुति कर सकते हैं।

भजन संहिता 22

11 जानेवारी: देवासाठीं व सत्यासाठीं आवेशी

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11 जानेवारी: देवासाठीं व सत्यासाठीं आवेशी
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कित्येकांनी विश्वास ठेवला नाहीं म्हणून काय झालें? त्यांचा अविश्वास देवाची विश्वासपात्रता व्यर्थ करील काय? कधींच नाहीं! देव खरा आणि प्रत्येक मनुष्य खोटा ठरो; शास्त्रांतहि लिहिलेलें आहे कीं, “तूं आपल्या वचनांत नीतिमान ठरावें, आणि तुझा न्याय होत असतां तुला जय मिळावा.” (रोमकरांस 3:3-4)

सत्याविषयीं आमचा आवेश देवाविषयींच्या आमच्या अवेशाविषयीचें स्वाभाविक प्रकटीकरण आहे. जर देव आहे, तर मग तोंच सर्व गोष्टींची परिभाषा करतो आणि सर्व गोष्टींविषयीं तो जो विचार करतो त्यांद्वारेंच आपलें विचार काय असावेंत हे ठरविलें जातें.

सत्याला न जुमानणें म्हणजेच देवाला न जुमानणें. देवावर प्रेम करण्याविषयीं आवेशी असणें म्हणजेंच सत्यावर प्रेम करण्याविषयीं आवेशी असणें होय. आपलें जीवन देव-केंद्रित असणें म्हणजेंच सेवाकार्यांत सत्य-चालित असणें होय. जें सत्य नाहीं तें देवापांसून नाहीं.

देव आणि सत्य यांबाबतींत पुढील चार शास्त्रलेखांवर चिंतन करा:

1) देव सत्य आहे

रोमकरांस 3:3-4 (देव जो पिता): “कित्येकांनी विश्वास ठेवला नाहीं म्हणून काय झालें? त्यांचा अविश्वास देवाची विश्वासपात्रता व्यर्थ करील काय? कधींच नाहीं! देव खरा  आणि प्रत्येक मनुष्य खोटा ठरो.”

योहान 14:6 (देव जो पुत्र): येशूनें त्याला म्हटलें, “मार्ग, सत्य  व जीवन मींच आहे; माझ्या द्वारें आल्यावांचून पित्याकडे कोणी येत नाहीं.”

योहान 15:26 (देव जो आत्मा): परंतु जो पित्यापासून निघतो, ज्याला मीं पित्यापासून तुम्हांकडे पाठवीन तो कैवारी म्हणजे सत्याचा आत्मा येईल तेव्हां तो माझ्याविषयीं साक्ष देईल.

2) सत्यावर प्रेम न करण्याचा परिणाम सार्वकालिक नाश आहे

दुसरें थेस्सलनीकाकरांस 2:10: ज्यांचा नाश होत चालला आहें त्यांनी आपलें तारण साधावें म्हणून सत्याची आवड धरायची ती धरली नाहीं.

3) सत्याचें ज्ञान ख्रिस्ती जीवनाचा पाया आहे

1 करिंथकरांस 6:15-16: “तुमचीं शरीरे ख्रिस्ताचे अवयव आहेत हें तुम्हांला ठाऊक नाहीं काय? तर मग मीं ख्रिस्ताचे अवयव नेऊन ते कसबिणीचे अवयव करावेत काय? कधींच नाहीं! जो कसबिणीशीं जडला तो व ती एकशरीर आहेत, हे तुम्हांला ठाऊक नाही काय?

4) ख्रिस्ताच्या शरीराचीं बांधणी सत्यावर प्रेमानें केलेलींहें

कलस्सैकरांस 1:28: “आम्हीं त्याची घोषणा करितों, सर्व प्रकारच्या ज्ञानानें प्रत्येक माणसाला बोध करितों व प्रत्येक माणसाला शिकवितों; अशासाठीं कीं, प्रत्येक माणसाला ख्रिस्त येशूच्या ठायीं पूर्ण असें उभें करावें.”

देव आपल्याला त्याच्यासाठीं आणि सत्यासाठीं आवेशानें भरून काढो.

10 जनवरी : सब कुछ साझे का

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10 जनवरी : सब कुछ साझे का
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और सब विश्वास करने वाले इकट्ठे रहते थे, और उनकी सब वस्तुएँ साझे में थीं।”  प्रेरितों के काम 2:44

आस-पास के मूर्तिपूजक संसार की नजर में आरम्भिक कलीसिया के प्रति सबसे बड़ा आकर्षण था उसकी सामुदायिक जीवनशैली। ऐसा क्या था जो इतने अलग-अलग लोगों, अर्थात यूनानी और यहूदी, खतना किए हुए और खतनारहित, जंगली और स्कूती, दास और स्वतन्त्र लोगों को एक साथ जोड़ता था (कुलुस्सियों 3:11)? वह था यीशु मसीह। इन मसीहियों के इकट्ठे रहने की समानता के लिए उसके अतिरिक्त कोई वास्तविक व्याख्या नहीं थी।

उन दिनों से लेकर अब तक, कलीसिया सदैव बहुत कुछ साझे का होने के कारण एक अनूठी संगति में एकजुट रही है। पहली साझा बात है इसका साझा विश्वास।  आरम्भिक कलीसिया जाति, शिक्षा, रुचियों या किसी और बात के आधार पर इकट्ठा नहीं होती थी; इसके विपरीत, वे अपने अलग-अलग जीवनों को अपने उद्धारकर्ता के रूप में यीशु मसीह को स्वीकारते हुए एक साझे विश्वास में लेकर आए। आज के समय में प्रभु भोज इसी एकता की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति है; हमारे लिए एक ही रोटी और एक ही प्याला है, जिसमें हम एक देह के रूप में सहभागिता करते हैं। यीशु वह जीवन की रोटी है, जो हमारा पोषण करना है और हमें जोड़ता है।

दूसरी साझा बात है हमारा एक साझा परिवार।  जब हम यीशु को अपना उद्धारकर्ता मान लेते हैं, तो हमें अन्य विश्वासियों के साथ उसके परिवार में सहर्ष स्वीकारा जाता है, जिसमें सब का एक ही स्वर्गिक पिता है। यह पारिवारिक बन्धन सांसारिक परिवारों से भी अधिक बढ़कर है, क्योंकि विश्वास का परिवार अनन्त परिवार है। इसी कारण, हमें अपने आत्मिक भाइयों और बहनों के हितों का ध्यान रखना चाहिए। हमारे लिए विश्वासियों के रूप में एक दूसरे से प्रेम न करना न केवल दुखद होगा, परन्तु विरोधाभासी भी होगा, क्योंकि “जो कोई परमेश्वर से प्रेम रखता है वह अपने भाई से भी प्रेम रखे” (1 यूहन्ना 4:21)।

तीसरी साझा बात है, परमेश्वर के अनुग्रह में होकर सच्ची कलीसिया एक साझी भावना  का अनुभव भी करती है। हम खेल के आयोजनों में इसका एक छोटा संस्करण देख सकते हैं। प्रत्येक प्रशंसक अलग होता है किन्तु एकसाथ मिलकर वे एक साझी भावना, विश्वास और लक्ष्य साझा करते हैं। कभी-कभी वे एक साथ उत्साहित होते हैं और कभी-कभी वे एक साथ निराश होते हैं। इसी प्रकार, एक ही परिवार के सदस्य के रूप में हम एक-दूसरे के आनन्द, शान्ति, दर्द और दुख में भागीदार होते हैं। जैसा कि पौलुस ने भी कहा है, “यदि एक अंग दुख पाता है, तो सब अंग उसके साथ दुख पाते हैं और यदि एक अंग की बड़ाई होती है, तो उसके साथ सब अंग आनन्द मनाते हैं” (1 कुरिन्थियों 12:26)। उस अध्याय में पौलुस द्वारा उपयोग किया गया रूपक कलीसिया को एक देह के रूप में दर्शाता है। विश्वासियों के रूप में हम अलग-अलग हैं और हमारे गुण और निर्बलताएँ अलग-अलग हैं, और इसलिए हम एक ऐसी देह निर्मित करते हैं, जो अलग-अलग होने की तुलना में एक साथ अधिक भली रीति से काम करती है। मेरी सीमाएँ और निर्बलताएँ आपके गुणों के द्वारा पूरित होती हैं, और इसके उलटे क्रम में भी ऐसा ही है।

सभी परिवारों में कठिनाइयाँ और संघर्ष होते हैं, और हम सभी पापी हैं; इसलिए परमेश्वर के लोगों के साथ सम्बन्ध में होने के विशेषाधिकार को भूल जाना सरल होता है। अन्तिम बार ऐसा कब हुआ था कि आपने अपने पिता को अपनी कलीसिया के परिवार के लिए धन्यवाद दिया था? अन्तिम बार कब ऐसा हुआ था कि जब वे रविवार को एक साथ इकट्ठा थे, तो आप अपने भाइयों और बहनों की ओर देखकर यह जानते हुए उत्साहित हुए थे कि अनुग्रह के द्वारा आप भी इस परिवार का एक भाग हैं?

हमारा संसार, प्रेरितों के दिनों के समान ही, विभाजन और अकेलेपन से भरा है। लोग छिन्न-भिन्न, भयभीत और खोए हुए हैं। परन्तु हम, मसीह की संयुक्त देह, इस संसार को एक प्रगाढ़ संगति और अनन्तता का आशा से भरा भविष्य दे सकते हैं। जब आप लोगों को परमेश्वर के परिवार में लाते हैं, तो उनके जीवनों का हिस्सा बनने के द्वारा आपको अपने स्वर्गिक पिता के हाथ और पैर बनने का अवसर मिलता है। क्या आप इस अवसर को अपने अधिकार में लेंगे?

  कुलुस्सियों 3:5-17

10 जानेवारी : विश्वासणाऱ्यांचा न्यायनिवाडा कसा केला जाईल

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10 जानेवारी : विश्वासणाऱ्यांचा न्यायनिवाडा कसा केला जाईल
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मग मृत झालेल्या लहानथोरांना मीं [देवाच्या] राजासनापुढे उभें राहिलेलें पाहिलें. त्या वेळी ‘पुस्तकें उघडलीं गेलीं;’ तेव्हां दुसरे एक ‘पुस्तक’ उघडलें गेलें तें ‘जीवनाचें’ होतें; आणि त्या पुस्तकांमध्यें जें लिहिलें होतें त्यावरून मृतांचा न्याय ‘ज्यांच्या-त्यांच्या कृत्यांप्रमाणेंठरविण्यांत आला. (प्रकटीकरण 20:12)

शेवटचा न्यायनिवाडा कसा केला जाईल? आपल्या पापांचे स्मरण केलें जाईल का? तीं उघडकीस आणली जातील का? अँथनी होकेमा या प्रश्नाचें उत्तर पुढील शब्दांत सुज्ञपणे मांडतात: “न्यायाच्या दिवशी विश्वासणाऱ्यांची पापें आणि त्यांच्या उणीवां विचारांत घेतली जातील. परंतु — आणि हा महत्त्वाचा मुद्दा आहे — विश्वासणाऱ्यांची पापें आणि उणीवां न्यायाच्या वेळीं अशा पापांच्या स्वरूपांत प्रकट केलीं जातील ज्यांची क्षमा झालेलीं आहें, ज्यांचे अपराध येशू ख्रिस्ताच्या रक्तानें पूर्णपणें झाकलें गेलें आहेत.”

त्या घटनेचें तुमच्या डोळ्यांसमोर असें चित्र उभे करा. देवाकडे प्रत्येक व्यक्तीची एक फाइल, म्हणजे नोंदणीचे एक कायदेशीर दस्तऐवज आहे (प्रकटीकरण 20:12 मधील “पुस्तके”). तुम्हीं जे कांही केलें आहे किंवा जो जो व्यर्थ शब्द बोललांत (मत्तय 12:36) त्यां सर्वांची त्यांत (“A” पासून “F” पर्यंत) ज्यांच्या-त्यांच्याग्रेड, म्हणजे पातळीसह नोंद केलेलीं आहे. जेव्हां तुम्हीं “ख्रिस्ताच्या न्यायासनासमोर” उभे केलें जाल (२ करिंथ 5:10) “ह्यासाठीं कीं (तुम्हीं) देहानें केलेल्या गोष्टीचें फळ (तुम्हांला) मिळावे; मग ते बरे असो किंवा वाईट असो” तेव्हां देव ती फाइल उघडेल आणि तुम्हीं केलेल्या कर्मांची त्यांच्या (ग्रेड) पातळीसह चाचण्यांची मांडणी करेल. त्यांत असलेले सर्व “F” ग्रेड तो बाहेर काढेल आणि त्यांचा एक ढीग लावेल. मग तो सर्व “D” ग्रेड आणि सर्व “C” ग्रेड घेईल आणि ह्या चाचण्यांचे सर्व निकाल बाहेर काढून त्यांना “A” ग्रेड बरोबर ठेवेल, आणि जें जें निकाल वाईट असतील तें सर्व तो “F” ग्रेड मध्यें टाकेल. मग तो सर्व “B” ग्रेड आणि “A” ग्रेड घेईल आणि त्यांतील सर्व वाईट निकाल बाहेर काढेल आणि “F” च्या ढिगाऱ्यांत टाकून देईल आणि सर्व चांगले निकाल “A” ग्रेड च्या ढिगाऱ्यांत टाकून देईल.

मग तो दुसरी फाईल (“जीवनाचे पुस्तक”) उघडेल आणि त्यांत तुमचे नाव शोधेल, कारण तुम्हीं विश्वासाद्वारें ख्रिस्तामध्यें आहांत. तुमच्या नावामागें येशूच्या वधस्तंभापासून बनवलेलीं एक लाकडी आगकाडी असेल. तो ती आगकाडी घेऊन पेटवेल आणि तुमची सर्व पापें आणि उणीवांचा लावलेला “F” ग्रेड चा ढीग पेटवून तो जाळून टाकेल. त्यांचा दोषी तुमच्यांवर लावण्यांत येणार नाहीं आणि तुम्हांला त्यांचे प्रतिफळहि मिळणार नाहीं.

मग तो तुमच्या “जीवनाच्या पुस्तकांतून” एक मोहरबंद लिफाफा घेईल ज्यांवर “विनामूल्य आणि कृपेचे लाभांश : जीवन!” असें चिन्ह असेल आणि तो लिफाफा घेऊन “A” ग्रेडच्या ढिगाऱ्यांवर ठेवेल (मार्क 4:24 आणि लूक 6:38 पहा). मग तो संपूर्ण ढीग उचलून धरेल आणि अशी घोषणा करेल, “यांद्वारें तुमचें जीवन माझ्या पित्याच्या कृपेची, माझ्या रक्ताच्या मोलाची आणि माझ्या आत्म्याच्या फळाची साक्ष देतें. ही साक्ष देतांत कीं तुमचें जीवन सार्वकालिक आहे. आणि यांनुसार तुम्हांला आप-आपली प्रतिफळें मिळतील. आपल्या धन्याच्या सार्वकालिक आनंदांत सहभागी व्हां.”

9 जनवरी : सभी निमन्त्रणों से बड़ा निमन्त्रण

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9 जनवरी : सभी निमन्त्रणों से बड़ा निमन्त्रण
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“हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।”  मत्ती 11:28

जब भी आपको कोई निमन्त्रण मिलता है, तो हो सकता है कि आप अपने आप से एक ही तरह के प्रश्न पूछते हों कि यह किसकी ओर से है? यह किसके लिए है? यह महत्त्वपूर्ण क्यों है? यह पद पूरे नए नियम में सबसे प्यारे निमन्त्रणों में से एक प्रस्तुत करता है, परन्तु इसे भली-भाँति समझने के लिए हमें वही प्रश्न पूछने होंगे।

सबसे पहले, यह एक व्यक्तिगत निमन्त्रण है। यह किसी कार्यक्रम के लिए निमन्त्रण नहीं है, न ही यह हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, कन्फ्यूशीवाद, न्यू एज-इज़म, मानवतावाद या किसी अन्य “वाद” के साथ जुड़ जाने के लिए किसी धर्म या दर्शन द्वारा दिया गया निमन्त्रण है, जो आज के समय के वैश्विक दृष्टिकोणों में पाया जाता है। यह स्वयं यीशु की ओर से एक निमन्त्रण है। वह हममें से प्रत्येक को यह निमन्त्रण दे रहा है कि “मेरे पास आओ।”

निमन्त्रण का महत्त्व इस बात में निहित है कि यह किसकी ओर से है। सुसमाचारों में यीशु यह घोषणा करता है कि वह कौन है, कि वह जगत का उद्धारकर्ता मसीह है, परमेश्वर का पुत्र है (यूहन्ना 4:25-26; 1 यूहन्ना 4:14 देखें)। इस पहचान के आधार पर यीशु इसके प्रति प्रत्युत्तर करने की माँग कर सकता था, परन्तु इसके विपरीत वह एक निमन्त्रण दे रहा है।

और वह किसे आने के लिए निमन्त्रण दे रहा है? “सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे हुए लोगों को।” यह निमन्त्रण सब लोगों के लिए है। यह किसी बड़े समूह में से किसी एक समूह को अलग नहीं कर रहा है, अपितु पूरी मानवता का वर्णन कर रहा है। हममें से प्रत्येक को ये शब्द सुनने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो चिन्ताओं, दायित्वों, डर और असफलताओं से भरे प्रतीकात्मक ठेले को धकेलता न हो, जो उसके जीवन की रचना करते हैं।

यह सब महत्त्व की बात क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि यीशु हमें “हमारी आत्माओं को विश्राम” देने के लिए निमन्त्रण दे रहा है। वह अनन्त के सन्दर्भ में एक ऐसे विश्राम के बारे में बोल रहा है, जो कभी विफल नहीं होगा। वह हमें भोज के लिए बुलाता है और वह हमसे भोज के अनुकूल परिधान लाने के लिए भी नहीं कह रहा। हम भोज में उसी प्रकार आते हैं जैसे हम हैं। परमेश्वर उन सभी “अच्छे कर्मों” रूपी परिधानों को लेता है, जिन्हें हममें से बहुत से लोग पहनना पसन्द करते हैं, और वह उनको चिथड़े कहता है और उन्हें एक ओर फेंक देता है। वह उन सभी “बुराइयों, गड़बड़ियों, और निराशाओं” रूपी परिधानों को भी लेता है और उन्हें भी एक ओर फेंक देता है। उनके स्थान पर वह हमें “धार्मिकता के वस्त्र” (यशायाह 61:10) पहनाता है, जो स्वयं यीशु मसीह के द्वारा प्रदान किए जाते हैं। जब हम यीशु के पास आते हैं और उससे हमको वह सब मिल जाता है जिसकी हमें आज आवश्यकता है और जिसकी हमें भविष्य में भी आवश्यकता पड़ सकती है, तो हम अपने आप को किसी प्रकार स्थापित कर लेने या अपने लिए स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करने के अपने प्रयास से विश्राम ले सकते हैं।

यह सभी निमन्त्रणों से बड़ा निमन्त्रण है। आज ही, पहली बार हो या फिर हजारवीं बार, अपने बोझ को उसके पास लेकर आएँ। उसका विश्राम ग्रहण करें।

जैसा मैं हूँ बगैर एक बात, पर तेरे लहू से हयात

और तेरे नाम से है नजात, मसीह, मसीह, मैं आता हूँ। [1]

 मत्ती 11:25-30

9 जानेवारी : फक्त थोडा वेळ

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9 जानेवारी : फक्त थोडा वेळ
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आपल्या सार्वकालिक गौरवांत यावें म्हणून ज्यानें ख्रिस्तामध्यें तुम्हांला पाचारण केलें तो सर्व कृपेचा देव तुम्हीं थोडा वेळ दु:ख सोसल्यावर, स्वतः तुम्हांला पूर्ण, दृढ व सबळ करील. (1 पेत्र 5:10)

आमच्या दैनंदिन जीवनांतील दु:ख आणि सर्वसामान्य ताणतणाव यांमुळें आपण कधीकधी आरोळी मारतो , “हे देवा, आणखी किती काळ? आज मला ज्यां वेदना होत आहेत, त्यांपलीकडें मीं पाहू शकत नाहीं. उद्याचा दिवस आपणाबरोंबर काय घेऊन येईल? त्यां दु:खांत सुद्धा तूं मजबरोंबर असशील का?”

हा प्रश्न अत्यंत महत्वाचा आहे, कारण येशूनें म्हटलें, “जो शेवटपर्यंत टिकाव धरून राहील तोच तारला जाईल” (मार्क 13:13). “ज्यांचा नाश होईल अशा ‘माघार घेणार्‍यांपैकीं” असणे हा विचारहि डोक्यांत येता आपण थरथरतो (इब्री 10:39). आम्हीं “तळ्यांत-मळ्यांत” चा बालिश खेळ खेळत नाहीये. देवाच्या भावी कृपेवर आमच्या विश्वासासाठीं दुःख हा एक भीतिजनक अडथळा आहे.

म्हणूनच, पेत्राला दु:खी व कष्टी झालेंल्या ख्रिस्ती विश्वासणाऱ्यांना पुढील अभिवचन देतांना ऐकणें मोठे सांत्वन देणारी गोष्ट आहे, आपल्या सार्वकालिक गौरवांत यावें म्हणून ज्यानें ख्रिस्तामध्यें तुम्हांला पाचारण केलें तो सर्व कृपेचा देव तुम्हीं थोडा वेळ दु:ख सोसल्यावर, स्वतः तुम्हांला पूर्ण, दृढ व सबळ करील.” (1 पेत्र 5:10).

आपल्याला दिलेलीं ही खात्री कीं तो आमच्या सहनशीलतेच्या पलीकडे विलंब करणार नाहीं, आणि ही कीं आपण आपल्यांत असलेल्या ज्या वैगुणांवर शोक करितो ते तो नाहींशी करील, आणि ही कीं प्रारंभापासून जे विस्कटलेले आहें ते सर्वकांही तो सर्वकाळासाठीं स्थापित करेल – ही खात्री “सर्व कृपेचा देव” ह्याच्याकडून देण्यांत आलेली आहें.

देव ‘थोडक्या कृपेचा देव’ नाहीं – म्हणजे गतकाळाच्या कृपेप्रमाणे. तर तो “सर्व कृपेचा देव” आहे — आणि त्यांत भावी कृपेचा सर्व अमर्याद व अक्षय साठा समाविष्ट आहे जिच्यांत आपल्याला शेवटपर्यंत टिकाव धरून राहणे अगत्याचें आहे.

भावीकाळांत होणाऱ्या त्या कृपेवरील विश्वास, जिला गतकाळांत झालेल्या कृपेचे स्मरण ठेऊन दृढ केलें जातें, जीवनाकडे जाणाऱ्या अरुंद आणि कठीण मार्गावर टिकाव धरून राहण्याची गुरुकिल्ली किंवा सूत्र आहे.

8 जनवरी: कड़वाहट से जूझना

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8 जनवरी: कड़वाहट से जूझना
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“अरामी लोग दल बाँधकर इस्राएल के देश में जाकर वहाँ से एक छोटी लड़की बन्दी बनाकर ले आए थे और वह नामान की पत्नी की सेवा करती थी। उसने अपनी स्वामिनी से कहा, ‘यदि मेरा स्वामी शोमरोन के भविष्यद्वक्ता के पास होता, तो क्या ही अच्छा होता! क्योंकि वह उसको कोढ़ से चंगा कर देता।’”  2 राजाओं 5:2-3

पीड़ा अपने आप में किसी व्यक्ति को परमेश्वर के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध में नहीं ले जाती। जो लोग परमेश्वर का वचन सुनते तो हैं परन्तु उस पर विश्वास के साथ प्रत्युत्तर नहीं देते, उनके समान हम भी जब विश्वास और आशा के बिना पीड़ा का सामना करते हैं, तो हम कड़वाहट से भर जाएँगे, क्योंकि हमारा हृदय परमेश्वर के प्रति नरम होने के विपरीत कठोर हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, पीड़ा हमें या तो परमेश्वर की ओर भागने पर बाध्य कर देगी या उससे दूर कर देगी। परखे जाने पर हमें अपने आप से यह पूछना चाहिए, “क्या यह परीक्षा मुझे कड़वा और कठोर बना रही है, या यह मुझे प्रेमपूर्ण और कोमल बना रही है?”

2 राजाओं की पुस्तक के मध्य में, राजाओं और भविष्यद्वाक्ताओं की कहानियों के बीच, एक छोटी इस्राएली लड़की के उदाहरण के माध्यम से हम बहुत बड़ी व्यथा से सामना होने पर कोमलता और दीनता का एक असाधारण चित्र देखने पाते हैं। अरामी लोग एक आक्रमण के समय इस छोटी लड़की को बन्दी बनाकर ले आए थे; वे उसे उसके परिवार और इस्राएल से दूर ले गए थे और उसे एक अरामी सेनाध्यक्ष नामान की सेवा करने के लिए बाध्य किया गया था। उस छोटी बच्ची और उसके परिवार के लिए यह एक अति-अकल्पनीय त्रासदी थी!

फिर भी, उसकी इतनी अधिक पीड़ा में भी हम उसके कोमल हृदय की एक झलक पाते हैं। यह जानने पर कि उसके स्वामी को कुष्ठ रोग है, इस बच्ची ने नामान की पत्नी को बताया कि वह कैसे ठीक हो सकता है। यदि उसने अपने आप को कड़वाहट से भरने दिया होता, तो जिस समय घर में यह बात फैली थी कि उसका स्वामी बीमार है, वह कहती कि अच्छा हुआ, यह इसी के लायक था।  परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। वह अपने शत्रु के लिए सबसे उत्तम बात चाह रही थी, न कि सबसे बुरे होने की आशा कर रही थी। यह एक उल्लेखनीय बात है। वह ऐसा कैसे कर पाई थी? क्योंकि सम्भवतः अपने खालीपन और अपने परिवार से अलग हो जाने के दुख से सामना होने पर वह बार-बार अपने प्रेममय परमेश्वर और उसकी प्रतिज्ञाओं की ओर देखती होगी।

जब हम पीड़ा से होकर जा रहे हों और जब हम उन लोगों की सेवा करना चाहते हों जो गम्भीर यातनाओं में हैं, तो हमें एक कोमल और खुले हृदय को विकसित करना नहीं भूलना चाहिए। क्या ऐसा करना सरल होगा? कदापि नहीं! किन्तु परमेश्वर की विश्वासयोग्यता इतनी विस्तृत, इतनी व्यापक है, कि वह हमें हमारी सबसे तीव्र पीड़ा में भी सहारा दे सकती है। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में परमेश्वर की ओर मुड़ें और उसकी विश्वासयोग्यता और प्रावधान द्वारा शान्ति प्राप्त करें। ऐसा करने पर आप “उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें जो किसी प्रकार के क्लेश में हों” (2 कुरिन्थियों 1:4)।

2 कुरिन्थियों 5:6-21

8 जानेवारी: जे तुम्हीं हरवूं शकत नाहीं ते मिळवां

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8 जानेवारी: जे तुम्हीं हरवूं शकत नाहीं ते मिळवां
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येशूनें त्यांच्याकडे निरखून पाहून म्हटलें, “मनुष्यांना हें अशक्य आहे, परंतु देवाला नाहीं; ‘देवाला सर्व कांहीं शक्य आहे.”

(मार्क 10:27)

येथें जागतिक दर्जाचें ख्रिस्ती होण्यासाठीं आणि आंतरराष्ट्रीय पातळीवर सुवार्ता प्रसाराच्या कामासाठीं स्वतःला समर्पित करण्यासाठीं येशूपासून दोन मोठ-मोठे उत्तेजनं आहेत. एक तर पाठवलेलें किंवा पाठवणारे म्हणून.

1. मनुष्यांना अशक्य असणारी प्रत्येक गोष्ट देवाला शक्य आहे (मार्क 10:27). मनानें कठोर असलेल्या पापीजनांचे मन-परिवर्तन हे देवाचे कार्य आहे आणि ते त्याच्या सार्वभौम योजनेनुसार होईलच. आपल्या दुर्बळपणामुळें आपल्याला घाबरण्याची किंवा खचून जाण्याची गरज नाहीं. युद्ध परमेश्वराचे आहे आणि तोंच विजय देईल.

2. ख्रिस्त आमच्या वतीनें काम करेल असें अभिवचन तो देतो, आणि तो आपल्यासाठीं अशा रीतीनें सर्वकांही असेल कीं, जेव्हां सुवार्तिक म्हणून आपलें जीवन संपेल, तेव्हां आपण खूप कांही त्याग केला आहें असें आपण म्हणूं शकणार नाहीं (मार्क 10:29-30).

जेव्हां आपण सुवर्तेचे मिशनरी या नात्यानें त्याचे नियम पाळतो तेव्हां आपल्याला समजून येतें कीं या कार्यामुळें उद्भवणारें वेदनादायक दुष्परिणाम हें सुद्धा आमच्या कल्याणासाठींच कार्य करतात. आपले आध्यात्मिक आरोग्य आणि आपला आनंद शंभरपटीने वाढतो. आणि जेव्हां आपण मरतो त्यावेळीं आपण खरें मरण मरत नाहीं. आपल्याला सार्वकालिक जीवन प्राप्त होतें.

मीं तुम्हांला असें विनवित नाहीं कीं तुम्हीं ख्रिस्तासाठीं तुमचें धैर्य आणि बलिदान व्यर्थ लेखावें. मीं तुम्हांला इतकेंच विनवितों कीं तुम्हांकडे असलेल्या सर्व गोष्टींचा त्याग करा, म्हणजे तुम्हांला तुमच्या खोलवर असलेल्या आंतरिक इच्छांना तृप्त करणारे जीवन मिळेल. मीं तुम्हांला विनवितों कीं राजांचा जो राजा त्याच्या सेवेंसाठीं उभे राहण्याच्या श्रेष्ठत्वामुळें तुम्हीं सर्व गोष्टीं केरकचरा अशा लेखा. मीं तुम्हांला विनवितों कीं तुम्हीं दुकानांतून विकत घेतलेल्या तुमच्या चिंध्या काढून टाका आणि देवाच्या राजदूतांचे वस्त्र धारण करा.

तुमचा छळ आणि उपासमार होईल याची मीं तुम्हांला खात्री देतो- परंतु त्यानंतर येणारा आनंद लक्षात ठेवा! “नीतिमत्त्वाकरितां ज्यांचा छळ झाला आहें ते धन्य, कारण स्वर्गाचें राज्य त्यांचे आहे” (मत्तय 5:10).

8 जानेवारी 1956 रोजी, जिम इलियट आणि त्यांच्याबरोंबर काम करणारे चार मिशनरी सहकारी जेव्हां साठ लोकसंख्या असलेल्या इक्वाडोरच्या वाओरानी आदिवासी जमातीपर्यंत सुवार्ता पोहोचवण्याचा प्रयत्न करित होतें तेव्हां त्या जमातीच्या पाच जणांनी त्या सर्वांना जिवें मारलें.

चार तरुण स्त्रियांनी आप-आपलें नवरें गमावलें आणि नऊ मुलांनी आप-आपलें वडील गमावलें. एलिझाबेथ इलियटने तिच्या पुस्तकांत लिहिलें कीं जगानें या घटनेला भयावह शोकांतिका म्हटलें. नंतर ती पुढें लिहिते , “जगानें जिम इलियटच्या सैद्धांतिक विश्वास कथनाच्या दुसर्‍या खंडाचें सत्य ओळखलेलें नाहीं: ‘जो मनुष्य अशी गोष्ट  मिळविण्यासाठीं जी तो कधीच हरवूं शकत नाहीं अशा गोष्टीचा त्याग करतो जी तो सांभाळू शकत नाहीं, तो मूर्ख असूच शकत नाहीं.'”

7 जनवरी: सुसमाचार की अभिव्यक्ति

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7 जनवरी: सुसमाचार की अभिव्यक्ति
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“केवल इतना करो कि तुम्हारा चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो।”  फिलिप्पियों 1:27

प्रति दिन . . . जिस तरह से हम कपड़े पहनते हैं, जिस तरह से हम मुस्कुराते हैं या गुस्सा करते हैं, जिस तरह से हमारा चाल-चलन होता है, हम जो बोलते हैं और हमारे बोलने का लहजा, उसके द्वारा हम सदैव अपने आस-पास के लोगों को बताते रहते हैं कि कौन सी बात वास्तव में महत्त्व रखती है और जीवन वास्तव में क्या है।

मसीहियों के लिए ऐसी अभिव्यक्तियाँ सुसमाचार के अनुरूप होनी चाहिए। इसलिए पौलुस ने फिलिप्पियों को उनके विश्वास और उनके व्यवहार, अर्थात उनके द्वारा अपनाए गए विश्वास वचन और उनके द्वारा प्रदर्शित आचरण के बीच की खाई को पाटने का बुलावा दिया। आज के समय में हमारे लिए मसीह की बुलाहट इससे भिन्न नहीं है। फिर भी, चाहे हम अपने विश्वास में कितने भी परिपक्व क्यों न हों और हम इस खाई को कितना भी क्यों न पाट लें, कुछ न कुछ उससे बढ़कर करने की आवश्यकता सदा बनी रहती है।

पौलुस का वाक्यांश “तुम्हारा चाल-चलन” यूनानी भाषा के क्रिया शब्द politeuesthe से आया है, जिसका अनुवाद अंग्रेजी की NIV बाइबल “तुम्हारा आचरण” के रूप में करती है। इस शब्द का उद्‌गम polis शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ है “नगर,” और यही हमें पुलिस (police) और राजनीति (politics) जैसे अन्य शब्द प्रदान करता है। बहुत वास्तविक अर्थों में, पौलुस मसीही नागरिकता और आचरण को सम्बोधित कर रहा है। जबकि हम अपने आप को परमेश्वर के नगर के वासी समझते हैं, तब हम यह सीखने पाते हैं कि उस दूसरे नगर, अर्थात मनुष्य के नगर में परदेसी और राजदूत के रूप में रहने का क्या अर्थ है। जब हम विश्वास और व्यवहार के बीच की खाई को पाटते हैं, तभी अन्य लोगों को उनके साथ किए गए हमारे व्यवहार के द्वारा स्वर्ग का पूर्वाभास मिल सकेगा।

तो हमारे कार्यों से किस तरह की अभिव्यक्ति होनी चाहिए? केवल इतनी कि मसीह का सुसमाचार प्रेम का सुसमाचार है। हम इसे यूहन्ना के शब्दों में इस प्रकार देखते हैं, “प्रेम इसमें नहीं कि हमने परमेश्वर से प्रेम किया, पर इसमें है कि उसने हमसे प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा। हे प्रियो, जब परमेश्वर ने हमसे ऐसा प्रेम किया, तो हमको भी आपस में प्रेम रखना चाहिए” (1 यूहन्ना 4:10-11)। दूसरे शब्दों में, जैसे परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, वैसे ही हमें अपने आस-पास के लोगों से भी प्रेम करना चाहिए। यहाँ तक कि उन लोगों से भी जिन्हें हम या दूसरे लोग अनाकर्षित या अप्रिय मानते हैं, और हमें यह प्रेम आशा और आनन्द के साथ करना चाहिए! प्रेम का यह सन्देश वह चुनौती है जो पौलुस हमें देता है।

केवल तुम्हारे कहे गए शब्दों में ही नहीं,

केवल तुम्हारे द्वारा अंगीकार किए गए कामों में ही नहीं,

परन्तु सबसे अनजानी रीतियों से मसीह प्रकट होता है। [1]

तो आज आप कैसे कपड़े पहनेंगे, आज जब आप मुसकुराएँगे और जब क्रोधित होंगे, आज आपका चाल-चलन कैसा होगा, और आज आपके बोलचाल और उसका लहजा क्या होगा, इन सबके बारे में थोड़ा रुककर सोचें। आप संसार के सामने किस तरह की अभिव्यक्तियाँ प्रदान कर रहे हैं? उन्हें ऐसी होने दें जो प्रेम के सुसमाचार के अनुरूप हों।

1 यूहन्ना 4:7-21