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4 मई : यीशु राजा है

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4 मई : यीशु राजा है
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“फिर मैं ने स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे और समुद्र की सब सृजी हुई वस्तुओं को, और सब कुछ को जो उनमें हैं, यह कहते सुना, ‘जो सिंहासन पर बैठा है उसका और मेमने का धन्यवाद और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!’” प्रकाशितवाक्य 5:13

बाइबल बहुत स्पष्ट रीति से बताती है कि इतिहास एक निश्चित उद्देश्य के साथ एक निश्चित अन्त की ओर बढ़ रहा है। यही सच्चाई बाइबल के दृष्टिकोण की एक अनूठी विशेषता है। दूसरे शब्दों में, मसीही विश्वास इस बात में सबसे अलग है कि सभी चीज़ों का अन्त कैसे होगा।

कई बार जब हम पुरानी तस्वीरें देखते हैं, तो हम खुद से पूछते हैं, “मैं इस तस्वीर में कहाँ हूँ?” या, “क्या मैं इस तस्वीर में हूँ भी?” लेकिन जब बात परमेश्वर की योजना की आती है, तो प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में दिखाए गए इतिहास के चित्र में हर एक व्यक्ति शामिल है। कोई भी इस कहानी से बाहर नहीं है। और जब इतिहास अपने अन्तिम चरण में पहुँचेगा, तो यह विभाजन और अलगाव के साथ समाप्त होगा।

यीशु ने इस विभाजन के बारे में तब बात की जब उसने कहा कि भेड़ें और बकरियाँ अलग की जाएँगी (मत्ती 25:31-46): प्रकाश और अन्धकार अलग किए जाएँगे, और जो यीशु में विश्वास रखते हैं, वे उन लोगों से अलग किए जाएँगे जो उस पर विश्वास नहीं रखते। कोई भी इससे बाहर नहीं होगा, लेकिन दुखद रूप से, कुछ लोग स्वयं को इस आशीष से वंचित करने का चुनाव करेंगे। इसलिए इस बड़े चित्र में हमारी स्थिति महत्त्व रखती है।

इतिहास के उतार-चढ़ाव को इस दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए कि स्वर्ग में एक सिंहासन है, और वह खाली नहीं है; बल्कि उस पर परमेश्वर विराजमान है, जो सब कुछ पर सम्पूर्ण नियन्त्रण किए हुए है। यीशु राजा है, और वह परमेश्वर के दाएँ हाथ पर विराजमान है। भले ही बहुत से लोग अब तक उसके राज्य को न पहचानें, लेकिन इससे यह सच्चाई नहीं बदलती कि वह राज्य करते है।

चौथी शताब्दी के महान धर्मशास्त्री हिप्पोवासी ऑगस्टिन के शब्दों में, मानवजाति के पतन से लेकर समय के अन्त तक दो प्रतिद्वन्द्वी नगर हैं—दो अलग-अलग प्रेम। स्वाभाविक रूप से, हम मनुष्य के नगर में जी रहे हैं, और केवल परमेश्वर की कृपा से ही हम परमेश्वर के नगर में प्रवेश कर सकते हैं और उसके प्रति समर्पित हो सकते हैं।

पृथ्वी का नगर, मनुष्य का नगर, अन्ततः नष्ट हो जाएगा। लेकिन स्वर्गीय नगर, परमेश्वर का राज्य, हमेशा बना रहेगा। क्या हम यीशु को राजा के रूप में स्वीकार करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर अनन्तकाल के लिए महत्त्वपूर्ण है। और यह केवल भविष्य के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान जीवन के लिए भी मायने रखता है। यदि यीशु आपका राजा है, तो आप उसकी आज्ञाकारी प्रजा की तरह जीएँगे, भले ही उसकी आज्ञा आपकी इच्छाओं के विरुद्ध क्यों न हो। यदि यीशु आपका राजा है, तो आप सबसे बढ़कर उसके प्रति निष्ठावान रहेंगे, क्योंकि यह संसार आपका स्थाई घर नहीं है—आप तो यहाँ बस यात्री हैं। जैसा कि पौलुस ने लिखा, “हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं” (फिलिप्पियों 3:20)।

इसलिए सुनिश्चित कर लें कि आप एक उत्तम देश के नागरिक और एक महान राजा की प्रजा के रूप में जीवन जी रहे हैं। हम समस्त सृष्टि के साथ मिलकर उसे आदर देने में अनन्तकाल व्यतीत करेंगे। आज भी, हमारे शब्दों और आचरण से हम यही करें।

भजन 24

3 मई : मजबूत आधार पर सुरक्षित

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3 मई : मजबूत आधार पर सुरक्षित
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“हे मेरे परमेश्‍वर यहोवा, मेरी ओर ध्यान दे और मुझे उत्तर दे, मेरी आँखों में ज्योति आने दे, नहीं तो मुझे मृत्यु की नींद आ जाएगी; ऐसा न हो कि मेरा शत्रु कहे, ‘मैं उस पर प्रबल हो गया; और ऐसा न हो कि जब मैं डगमगाने लगूँ तो मेरे शत्रु मगन हों। परन्तु मैं ने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है; मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा।” भजन 13:3-5

जब आप कैम्पिंग ट्रिप पर जाते हैं, तो सबसे ज़रूरी चीज़ों में से एक यह सुनिश्चित करना होता है कि आपके तम्बू के खूँटे ठोस ज़मीन में मजबूती से गाड़े गए हों। यह कदम पूरा हो जाने के बाद, आप अन्य गतिविधियों में अधिक निश्चिन्त होकर लग सकते हैं, यह जानते हुए कि आपका आश्रय किसी भी तूफान का सामना कर सकेगा—जो निश्चित रूप से इस विकल्प से बेहतर है कि आप लौटकर देखें कि आपका तम्बू उखड़ कर उड़ गया है!

इस पद में, दाऊद अपने जीवन में भुलाए जाने और निराश होने की भावना के साथ-साथ दूसरों द्वारा अनुचित विरोध का सामना करने पर प्रतिक्रिया दे रहा है। दाऊद सबसे पहले अपने मन को अपनी स्थिति पर केन्द्रित करता है; वह जो पहले से जानता है उसे याद करता है और परमेश्वर के अटल प्रेम में अपना विश्वास प्रकट करता है।

यह विश्वास उसकी इच्छा से उत्पन्न हुआ था। भले ही दाऊद के हृदय की भावनाएँ वास्तविक थीं, तौभी उसने अपने मनोभावों को परमेश्वर के चरित्र और उद्देश्यों के अधीन करने का निर्णय लिया। उसने अपनी आशा को—अपने हृदय के तम्बू के खूँटों को—परमेश्वर के स्थिर प्रेम और अटूट दया की ठोस ज़मीन में गाड़ दिया। केवल तभी वह फिर से आनन्दित हो सका।

नए स्वर्ग और नई पृथ्वी में जीवन के तूफान सदा के लिए शान्त हो जाएँगे। लेकिन तब तक, हमें आंधियों और तेज़ बारिश से होकर गुजरना पड़ेगा। हम उतनी ही अधिक खुशी के साथ इन्हें सहन कर पाएँगे, जितना कि हम अपने परमेश्वर पिता की बुद्धि पर भरोसा करेंगे। जब वह हमें कुछ नहीं देता, तो यह इसलिए होता है क्योंकि वह जानता है कि वह चीज़ हमारे पास न होना ही बेहतर है। जब वह हमें कोई कठिन स्थिति सौंपता है, तो यह इसलिए होता है क्योंकि वह हमें उस परिस्थिति में अपने अनुग्रह की गवाही देने का विशेष अवसर देता है। जब वह हमें बारिश से होकर ले जाता है, तो यह इसलिए होता है ताकि हम उसके और अधिक निकट आ सकें और हमारा चरित्र उसके समान बन सके (याकूब 1:2-4)।

जब हम अपने जीवन के सबसे कठिन अनुभवों के बिखरे हुए टुकड़ों को देखते हैं, तो ऐसा लग सकता है कि सब कुछ टूटकर गिरने वाला है। लेकिन ऐसे समय में, हम याद कर सकते हैं कि परमेश्वर “राख दूर करके सुन्दर पगड़ी बाँधता है और विलाप दूर करके हर्ष का तेल लगाता है और उदासी हटाकर यश का ओढ़ना ओढ़ाता है” (यशायाह 61:3)। हमारे सामने आने वाली हर परीक्षा हमें यह याद दिलाने का अवसर है कि दाऊद के समान हमारे लिए भी परमेश्वर का अटल प्रेम ही है, जो हमारे प्राणों को सुरक्षित रखता है और हमें उसके उद्धार में आनन्दित होने का कारण देता है।

आज, हममें से हर एक को यह प्रार्थना करनी चाहिए, “प्रभु यीशु मसीह, मेरे जीवन के खूँटे तेरे स्थिर प्रेम में दृढ़ता से गाड़ दे, ताकि जीवन और मृत्यु में, आनन्द और शोक में, स्वास्थ्य और बीमारी में, मैं आनन्दित रह सकूँ।”

इब्रानियों 12:3-11

2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था

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2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था
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“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे? धोखा न खाओ; न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्‍कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करने वाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्‍वर के आत्मा से धोए गए और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।” 1 कुरिन्थियों 6:9-11

दुष्ट शैतान इसमें कोई रुचि नहीं रखता कि वह हमें हमारे कई मसीही कार्यों को छोड़ने के लिए मजबूर करे—लेकिन वह इसमें बहुत रुचि रखता है कि हम परमेश्वर के स्वभाव और चरित्र से सम्बन्धित परम सत्यों को और उसके राज्य की नैतिकता से सम्बन्धित परम सत्यों को छोड़ दें। इसे समझते हुए, पौलुस ने कुरिन्थुस के विश्वासियों को चेतावनी दी कि वे ईश्वरहीन आचरण के खतरनाक क्षेत्र में न चले जाएँ। पौलुस कहता है, “धोखा न खाना” क्योंकि अधर्मी लोग “परमेश्‍वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।”

पौलुस ऐसे कई बुरे आचरणों का विवरण देता है, जो कुरिन्थुस में कई सामाजिक तौर पर स्वीकार्य माने जाते थे। यह शहर व्यापार का एक बड़ा केन्द्र था, जहाँ विभिन्न जातियों, आस्थाओं और भाषाओं के लोग बसे थे। लेकिन संस्कृति के रूप में यह शहर दिशाहीन और उग्र था। वास्तव में, यह इतना भ्रष्ट था कि “कुरिन्थुस” शब्द ही अनैतिकता का प्रतीक बन गया था। तो पौलुस ने क्या किया? वह एक योजना के साथ वहाँ गया। वह “वचन सुनाने की धुन में यहूदियों को गवाही देने लगा कि यीशु ही मसीह है” (प्रेरितों 18:5)। उसका उद्देश्य कोई कानून लागू करना नहीं था, बल्कि सत्य का प्रचार करना था।

कोई भी कानूनी व्यवस्था संस्कृति में सुधार नहीं ला सकती। इसके बजाय, परमेश्वर ने एक सन्देश दिया है जो पुरुषों और महिलाओं को स्वतन्त्र करने वाला सन्देश है और वह सन्देश केवल इतना है: “यीशु मसीह वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़” और कोई है ही नहीं (1 कुरिन्थियों 2:2)। सुसमाचार ही इस संसार के लिए परमेश्वर की योजना है। वह अपने वचन की शक्ति और विश्वास से लोगों के जीवन में कार्य करता है और उन्हें पूरी तरह बदल देता है।

पौलुस ने जटिल तर्कों में विश्वास नहीं किया। उसके पास केवल एक सन्देश था, और वह बार-बार उसी को कहता रहा। वह जानता था कि केवल मसीह की क्रूस पर दी गई बलि ही पुरुषों और महिलाओं को उनके पापों से मुक्त कर सकती है, ताकि वे “नए जीवन की सी चाल” चलें (रोमियों 6:4)।

पाप में बने रहना न केवल खतरनाक है, बल्कि यह अनावश्यक भी है। आज भी सुसमाचार का सन्देश उतना ही स्पष्टता और प्रभावशाली रूप से गूंज रहा है जितना कि कुरिन्थुस की गलियों में गूंजा था। यह संसार के भ्रामक विचारों और इस धारणा को काटता है कि केवल कानून ही लोगों के हृदयों को बदल सकता है या उनमें विश्वास उत्पन्न कर सकता है। हमारे जीवन, हमारे शहरों और हमारे राष्ट्रों की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि पापियों को उद्धार मिले। इस धोखे में मत आना कि पाप कोई मायने नहीं रखता। इस धोखे में मत आना कि हमारे समाज को परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार से बढ़कर किसी और चीज़ की अधिक जरूरत है। हमें क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का सन्देश स्वीकार करने और प्रचार करने की आवश्यकता है:

वह मरा कि हम क्षमा पाएँ,

वह मरा कि हम धर्मी बनें,

कि हम अन्ततः स्वर्ग जा सकें,

उसके अनमोल लहू से बचाए जा सकें।[1]

प्रेरितों 18:1-11

2  May : देवानें त्याच्या प्रीतिचे प्रमाण दिलें

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2  May : देवानें त्याच्या प्रीतिचे प्रमाण दिलें
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परंतु देव आपल्यावरच्या स्वत:च्या प्रीतिचे प्रमाण हे देतो कीं, आपण पापी असतानाच ख्रिस्त आपल्यासाठीं मरण पावला. ( रोम 5:8 )

ह्या वचनाकडे लक्ष्य द्या, ह्या मध्यें “प्रमाण देतो” हे वर्तमान काळात आहे आणि ख्रिस्त मरण पावला हे भूतकाळात आहे. “देव आपल्यावरच्या स्वत:च्या प्रीतिचे प्रमाण हे देतो  कीं, आपण पापी असतानाच ख्रिस्त आपल्यासाठीं मरण पावला.” ( रोम 5:8 )

वर्तमान काळ असें सुचवते कीं प्रमाण देणे हे एक सुरू असलेले कार्य आहे, जे आज देखील चालू आहे. आणि ते उद्या देखील सुरू राहणार.

 भूतकाळ “मरण पावला” असें दर्शवते कीं ख्रिस्ताचे मरण एकदाच झालें, आणि पुन्हा ते घडणार नाहीं. “कारण आपल्याला देवाजवळ नेण्यासाठीं ख्रिस्तानेही पापांबद्दल, म्हणजें नीतिमान पुरुषाने अनीतीमान लोकांकरीता, एकदाच मरण सोसले. ” (1 पेत्र 3:18)

मग पौलाने वर्तमान काळ (प्रमाण देतो) याचा वापर का केला ? मी अशी अपेक्षा केलीं असती कीं पौल असें म्हणेल कीं , “देवानें  आपल्यावरच्या स्वत:च्या प्रीतिचे प्रमाण हे दिलें (भूतकाळ), कीं आपण पापी असतानाच ख्रिस्त आपल्यासाठीं मरण पावला.” ख्रिस्ताचे मरण जेव्हां झालें, त्यावेळी ते देवाच्या प्रीतिचे दर्शक नव्हते का ? आणि त्याचे प्रमाण भूतकाळात दिलें गेले ना?

मला वाटते त्याचे उत्तर आधीच्या काही वचनात दिलें आहे. पौलाने नुकताच असें म्हंटले आहे कीं, “संकटाने धीर, धीराने शील व शीलाने आशा निर्माण होते ; आणि आशा लाजवत नाहीं.” ( रोम 5:3-5)

दुसर्‍या शब्दात सांगायचे झाल्यास, देवाचा आपल्याला सर्व गोष्टींतून घेऊन जाण्याचा उद्देश आशा देणे हा आहे. सर्व क्लेशामधून जात असताना देखील आपण आशावादी रहावे अशी त्याची उत्कंठा आहे.

पण आपण आशावादी कसे राहू शकतो ?

याचे उत्तर पौल पुढच्या वाक्यांत देतो, “कारण आपल्याला दिलेल्या पवित्र आत्म्याच्या द्वारें आपल्या अंत:करणात देवाच्या प्रीतिचा वर्षाव झाला आहे” (रोम 5:5). आपल्या अंत:करणात देवाच्या प्रीतिचा वर्षाव झाला आहे. याचा अर्थ, (आपल्या तारणाच्यावेळी) आपल्या अंत:करणात देवाच्या प्रीतिचा वर्षाव भूतकाळातच झाला आहे, आणि तो आज देखील होत आहे.

देवानें आपल्यावरील त्याच्या प्रीतिचे प्रमाण देण्याकरिता त्याचा पुत्र देऊ केला, जो आपल्या पापां करिता एकदाच मरण पावला (रोम 5:8). पण त्याला हे देखील ठाऊक आहे कीं, ह्या भूतकाळातील प्रीतिचा अनुभव आपल्याला वर्तमान वस्तुस्थिती (आज आणि उद्या) मध्यें देखील यायला हवा, जर आपल्यामध्यें धीर, शील आणि आशा हवी असेल तर. यासाठींच, त्यानें याचे प्रमाण केवळ क्रुसावरच दिलें नाहीं तर, तर तो आज देखीत त्याचा आत्म्या द्वारें आपल्या अंतकरणात याचे प्रमाण देत आहे. तो हे आपल्या अंतकरणाचे नेत्र उघडून करत आहे, ज्याच्या द्वारें आपण त्याच्या  कृसाचा गौरव आणि तो देत असलेली खात्री कीं ख्रिस्त येशू मध्यें आपल्याला देवाच्या प्रीति पासून काहीच विभक्त करू शकत नाहीं याचा आस्वाद घेऊ शकू आणि ते पाहू शकू.

1 मई : सोता हुआ उद्धारकर्ता

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1 मई : सोता हुआ उद्धारकर्ता
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“पर वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था। तब उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, ‘हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?’ तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, ‘शान्त रह, थम जा!’” मरकुस 4:38-39

शिष्यों की स्थिति में खुद को रखकर देखें, जब वे तूफानी समुद्र में नाव चला रहे थे और यीशु नाव के पिछले हिस्से में सो रहा था। उनमें से कई अनुभवी मछुआरे थे और जानते थे कि डूबने का खतरा बहुत वास्तविक था—फिर भी उनका गुरु गहरी नींद में था, मानो उसने उन्हें इस संकट में अकेला छोड़ दिया हो।

यह तथ्य, कि यीशु को नींद की जरूरत थी, दिखाता है कि उसके पास एक वास्तविक मानवीय शरीर था, जो थकान, प्यास और भूख को महसूस करता था। उसने शारीरिक दुर्बलताओं का स्वयं अनुभव किया। यहाँ तक कि वे सोने के लिए तकिया ढूँढने की परेशानी से भी गुजरा, जिससे यह पता चलता है कि वह जानता था कि असुविधा क्या होती है। जिसने सारी सृष्टि की रचना की, वह चाहते तो उस लकड़ी को एक आरामदायक बिस्तर में बदल सकता था, लेकिन इसके बजाय, महिमा के प्रभु ने हमारे जैसे ही एक तकिए पर सिर रखा।

यदि यीशु ने मानवीय दुर्बलताओं और प्रलोभनों को अनुभव न किया होता, तो वह एक करुणामय महायाजक न होता, जो हमें स्वर्गीय सिंहासन से दया और अनुग्रह प्रदान कर सकता (इब्रानियों 4:14-16)। लेकिन बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि उसने इन सब का अनुभव किया। उदाहरण के लिए, उसने अस्वीकृति का दर्द सहा: “वह अपने घर आया, और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया” (यूहन्ना 1:11)। यहाँ तक कि उसके कुछ वफादार शिष्यों ने—इसी नाव में मौजूद कुछ लोगों ने भी—आखिरकार उसे छोड़ दिया या उसका इनकार कर किया। उसने उस बदनामी को भी सहा, जिसने उसके अद्‌भुत और पवित्र स्वभाव को गलत तरीके से प्रस्तुत किया (उदाहरण के लिए, लूका 7:34 देखें)। उसने चालीस दिन और रातें शैतान के झूठ और प्रलोभनों से संघर्ष में बिताईं (मत्ती 4:1-11)। उसने क्रूस पर गहरी पीड़ा और क्लेश झेला, जब उसने पुकारकर कहा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। ऐसा कोई भी दर्द या अपमान नहीं है, जिससे हम गुजरते हैं, जो यीशु के हृदय को न चुभा हो—और क्योंकि वह इन संघर्षों को जानता है, इसलिए वह हमें आमन्त्रित करता है कि जब हम इनसे गुजरें, तो उसके पास आएँ।

मरकुस के सुसमाचार के आरम्भ में ही यह छोटी-सी घटना हमें जीवन बदलने वाली यह सच्चाई याद दिलाती है कि यीशु जीवित मसीह, एक दयालु उद्धारकर्ता और एक विश्वासयोग्य साथी हैं। उस गुरु से बढ़कर और कोई नहीं है जो हमारे जीवन की कठिन परिस्थितियों को बेहतर रीति से सम्भाल सके, जिसे शिष्यों ने नाव में गहरी नींद में सोते हुए पाया था। जैसे उन्होंने उसे पुकारा था, वैसे ही आप भी उसे पुकार सकते हैं और जान सकते हैं कि जो उस नाव में सो रहा था, वही तूफान को शान्त कर सकता है—वही प्रभु, जो स्वर्ग के सिंहासन पर शासन करता है, जो न कभी सोएगा, न ऊँघेगा, और जो आपके पाँव को फिसलने नहीं देगा (भजन 121:3-4)।

आज आपके मन में कौन सा डर है? निश्चिन्त रहें कि प्रभु यीशु इस जीवन की वास्तविकता को समझता है। अपने डर को उसके पास ले आओ और “अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पतरस 5:7)।

भजन 121

1  May : घाणेरडी वस्त्रे आता नाहीं

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1  May : घाणेरडी वस्त्रे आता नाहीं
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आम्हीं सगळे अशुद्ध मनुष्यासारखे झालो आहो ; आमची सर्व धर्मकृत्ये घाणेरड्या वस्त्रासारखी झाली आहेत. ( यशया 64:6 )

हे सत्य आहे कीं देवाचे नियमशास्त्र पाळण्यात झालेंली उणीव त्याच्या परिपूर्ण पावित्र्याला असंतुष्ट करते, व आपल्याला न्यायदंडास पात्र ठरवते कारण देव कोणत्याच पापाकडे कृपेने पाहू शकत नाहीं  ( हबक्कुक 1:13, याकोब 2:10 -11).

परंतु जुन्या करारामध्यें (व आज देखील हे असेंच आहे) व्यक्तिचा नाश ह्यामुळें होत नसे कीं तो पापविरहित परिपूर्णता प्राप्त करू शकत नसे. त्यांचा नाश यामुळें होत असें कीं, ते देवाच्या दयेच्या अभिवचनावर विश्वास ठेवण्यात अपयशी ठरत असत, विशेषत: ही आशा धरून राहण्यात कीं एक दिवशी देव त्यांना एक तारणकर्ता देईन जो त्याच्या लोकांकरिता सिद्ध असें नितीमत्व होईल “परमेश्वर आमची नीतिमत्ता” ( यिर्मया 23:6, 33:16). जुन्या करारातील पवित्र जनांना ठाऊक होते कीं त्यांचे तारण अशा प्रकारेच  होणार होते, आणि विश्वास हा आज्ञापालनाची गुरुकिल्ली होती, आणि आज्ञापालन हा त्यांच्याह्यांच विश्वासाचा पुरावा होता.

ही गोष्ट खूप गोंधळात टाकणारी आहे, जेव्हां लोक म्हणतात कीं केवळ ख्रिस्ताकडून प्राप्त होणार्‍या नीतीमत्त्वालाच मोल आहे. हे खरे आहे कीं. आपले नीतिमान ठरवले जाणे, आपल्या नीतीमत्वावर अवलंबून नसते – आत्म्याद्वारें देऊ केलेल्यां विश्वासाद्वारें नीतिमान बनणे देखील – नीतीमत्व केवळ ख्रिस्ताद्वारें आपल्याला प्राप्त होते. पण लोक काहीवेळा अविचाराने, मनुष्याच्या सर्व नीतीमत्वाला  तुच्छता पूर्वक पाहतात, जसे कीं आपल्यामध्यें कोणत्याच नीतीमत्वाचे कार्य झालें नाहीं ज्याच्यामुळें देवाला संतोष प्राप्त झाला नाहीं, परंतु असें म्हणने उपयोगाचे नाहीं.

ते नेहमी यशया 64:6 चा संदर्भ देतात ज्या मध्यें आपली धर्मकृत्ये “घाणेरड्या वस्त्रासारखी” आहेत असें संगितले आहे.

पण, यशया 64:6 चा संदर्भ पाहता, देवाच्या लोकांची सर्वच धर्मकृत्ये देव स्वीकारत नाहीं असें नाहीं. यशया अश्या लोकांबद्दल बोलत आहे ज्यांचे नीतीमत्व ढोंगीपणाचे आहे. ते खरे नीतीमत्व नाहीं. ह्या वचनाच्या आधीच्या वचनामध्यें यशया म्हणतो, “जे आवडीने धर्माचरण करतात त्यांना तू भेट देतोस ” (यशया 64:5).

हे निर्विवादपणे सत्य आहे कीं – येशूच्या क्रूसापूर्वी आणि नंतर, देवाच्या कोणत्याच लोकांचा स्वीकार  पवित्र देवाच्या पुढे झाला नसता जर त्यांच्याकडे ख्रिस्ताचे नीतीमत्व नसते ( रोम 5:19; 1 करिंथ. 1:30; 2 करिंथ 5:21). हे खरे आहे ! पण याचा अर्थ असा होत नाहीं कीं, देव त्या  नीतिमान” ठरलेल्यां लोकांमध्यें नीतीमत्वाचे कार्य करत नाहीं, जे परिपूर्ण नसले तरी “घाणेरड्या वस्त्रासारखी” नाहीं. खरें पाहता, तो त्यांच्या मध्यें नीतीमत्व निर्माण करतो, आणि हे नीतीमत्व देवासाठीं मौल्यवान आहे, आपल्याला नीतिमान ठरवण्याकरिता नाहीं (कारण आपण केवळ ख्रिस्ता द्वारेंच  नीतिमान ठरतो ), तर आपण विश्वासाने नीतिमान ठरवलेली देवाची लेकरे आहे याचा पुरावा म्हणून. आणि याच करिता पौल प्रार्थना करतो, आणि आपण देखील हीच प्रार्थना केलीं पाहिजे, जी त्यानें फिलिपै 1:10-11 मध्यें केलीं “असें कीं, जे श्रेष्ठ ते तुम्हीं पसंत करावे ; तुम्हीं ख्रिस्ताच्या दिवसासाठीं निर्मल व निर्दोष असावे ; आणि देवाचे गौरव व स्तुति व्हावी म्हणून येशू ख्रिस्ताच्या द्वारें जे नीतीमत्त्वाचे फळ त्यानें तुम्हीं भरून जावे.”

6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान

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6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान
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मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्तुएँ तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्ध, ग्रहण करने योग्य बलिदान है, जो परमेश्‍वर को भाता है।” फिलिप्पियों 4:18

यह आपके सोचने के लिए एक अद्‌भुत विचार है: आप परमेश्वर को प्रसन्न करने में सक्षम हैं।

यह एक चौंकाने वाला विचार है: कि हमारा सृष्टिकर्ता हमारे कार्यों से प्रसन्न होगा। फिर भी पवित्रशास्त्र हमें इस वास्तविकता को देखने के लिए प्रोत्साहित करता है। मसीही होने के नाते, हम अपने स्वर्गिक पिता की मुस्कान के तहत जीने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के लिए एक बाइबल में दी गई यह प्रेरणा एक बड़ा प्रोत्साहन है, “जैसे तुमने . . . परमेश्वर को प्रसन्न करना सीखा है . . . वैसे ही और भी बढ़ते जाओ” (1 थिस्सलुनीकियों 4:1)—और इसे करने का एक तरीका हमारा उदारता से दिया जाने वाला दान है, जो परमेश्वर के समक्ष “ग्रहण करने योग्य बलिदान” है। पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया के दान को पुराने नियम के पशु बलिदान के अभ्यास की शब्दावली में व्यक्त किया। जब पुराने नियम में परमेश्वर के लोग अपने होमबलि लाते थे, तो उन बलिदानों के साथ धूप भी जलाया जाता था। इसलिए इस बलिदान से एक आकर्षक सुगन्ध आती थी। एक भाव में, यह परमेश्वर की दृष्टि में बलिदान की मिठास और स्वीकृति का प्रतीक था। उसी तरह, परमेश्वर पहली शताब्दी में और अब इक्कीसवीं शताब्दी में अपने लोगों कहता है, “जब तुम्हारा दान मेरे साथ मेल खाते हुए दिल से आता है, तो यह एक मधुर सुगन्ध उत्पन्न करता है, और तुम्हारा बलिदान मुझे प्रसन्न करता है।”

जब हम इस प्रकार के दान पर विचार करते हैं, तो हमें “बलिदान” शब्द को जल्दी से अनदेखा नहीं कर देना चाहिए। बलिदानी दान हमेशा उदार दान के समान नहीं होता। हमारे लिए यह सम्भव है कि हम उदार हों—जैसा कि सच में कई विश्वासियों होते हैं—बिना इसके कि हमारे जीवन या परिस्थितियों पर इसका कोई वास्तविक प्रभाव पड़े।

इसी बिन्दु को स्पष्ट करते हुए, यीशु ने अपने शिष्यों का ध्यान एक गरीब विधवा की ओर आकर्षित किया, जो मन्दिर में अपनी दशमाँश राशि दे रही थी। जब उसने देखा कि यह महिला ताम्बे के दो सिक्के, जो कुछ भी मूल्य नहीं रखते थे, खजाने में डाल रही थी तो उसने उसके आस-पास खड़े अमीर लोगों के उपहारों से उसकी तुलना करते हुए कहा, “इस कंगाल विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है। क्योंकि उन सबने अपनी-अपनी बढ़ती में से दान में कुछ डाला है, परन्तु इसने अपनी घटी में से अपनी सारी जीविका डाल दी है” (लूका 21:2-4)। अमीर लोगों का दान उदार था; परन्तु विधवा का दान बलिदानी था। उसने दान देने के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। और उसके प्रभु ने देखा और जो उसने देखा उससे प्रसन्न हुआ।

हम स्वभाव से बलिदानी दाता नहीं हैं। लेकिन पूरी मसीही यात्रा—प्राप्ति और दान में, देखभाल और साझेदारी में—आरम्भ से लेकर अन्त तक कृपा से भरी हुई है। जब हम एक ऐसे दिल से बलिदानी रूप में देते हैं, जो परमेश्वर को प्रसन्न करने की इच्छा करता है, तो वह वचन देता है कि वह “अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है, तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा” (फिलिप्पियों 4:19)। इसका भाव यह है कि हम मनन करें कि परमेश्वर ने हमें क्या दिया है, और परमेश्वर हमें क्या दे रहा है, और परमेश्वर हमें क्या देगा। जब हम ऐसा करते हैं, तो इससे हमारे दिल खुल जाते हैं और हम बलिदानी रूप से और खुशी से देने की शक्ति पाते हैं। और जब हम ऐसा करते हैं, तो हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।

फिलिप्पियों का व्यवहार, और उनके खाते का विवरण, यह दिखाता है कि वे वास्तव में इस पर विश्वास करते थे। आपके विवरण कितने हद तक इस विश्वास को दर्शाते हैं?

1 थिस्सलुनीकियों 4:1-12

1 मार्च : हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़

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1 मार्च : हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। और अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिए पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों।”  इफिसियों 1:3-5

परमेश्वर ने आपको बहुत पहले से प्रेम किया है।

इफिसियों को लिखे अपने पत्र के आरम्भ में पौलुस द्वारा स्तुति का इस प्रकार उण्डेला जाना, हमें उन सभी कार्यों की महिमा के बारे में बताता है, जो परमेश्वर ने मसीह में हमारे लिए किए हैं। इस काम को इतना प्रभावशाली बनाने वाली एक विशेषता यह है कि इसका आरम्भ परमेश्वर से होता है, जो हमें याद दिलाता है कि हमारे अस्तित्व में आने से पहले ही उसने लोगों को अपने पास लाने की पहल की। हमारे सामने यह प्रलोभन आ सकते हैं कि हमें मानवीय प्रयासों के द्वारा परमेश्वर की खोज करने की आवश्यकता है; और निस्सन्देह, संसार के कई धर्म यही बात सिखाते भी हैं। परन्तु अपने आरम्भ से ही बाइबल यह सिखाती है कि वास्तव में परमेश्वर स्वयं हम तक पहुँचता है।

मसीह में हमारा चुनाव सृष्टि की रचना के बाद किसी समय में किया गया कोई विचार नहीं है; यह सृष्टि की रचना से पूर्व अनन्त काल का विचार है। यह बात सच है कि हम स्वयं मसीह के पीछे चलने का निर्णय लेते हैं, किन्तु यह जानना कितनी दीनता लाता है कि यदि परमेश्वर ने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले नहीं चुना होता तो हम कभी भी परमेश्वर को नहीं चुन सकते थे। यदि उसने पहले आपको अपनी सन्तान बना लेने का निर्णय नहीं लिया होता, तो आप उसके पीछे चलने का निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते।

परमेश्वर की सम्प्रभुता के साथ मनुष्य के उत्तरदायित्व का सामंजस्य स्थापित करने में एक नाजुक तनाव व्याप्त होता है। बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें इन दोनों में से किसी एक को चुनना होगा, जबकि वास्तव में दोनों ही विचार बाइबल आधारित हैं और आपस में जुड़े हुए हैं। ये दो ऐसे सत्य हैं, जो एक दूसरे से जुड़े हुए और एक ही ओर उन्मुख हैं। ये हमारे सीमित मानवीय मनों को परस्पर-विरोधी लगते हैं, परन्तु फिर भी दोनों पूरी तरह से सत्य हैं। हमें इनको वास्तविकता से परे सिद्धान्तों के रूप में लेते हुए उनके बारे में बहुत अधिक चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की हमारे पक्ष में हुई दया से चकित होते हुए हम आदर के साथ प्रत्युत्तर दे सकते हैं।

चुनाव की सैद्धान्तिक शिक्षा कोई ऐसा ध्वज नहीं है जिसके तले हम चलते हैं, अपितु यह हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़ है।[1] यह बात हमारी सुरक्षा और हमारे आनन्द को महत्त्व प्रदान करती है। जैसे ही आप दीनता के साथ यह जान जाते हैं कि समय के आरम्भ से पहले ही मसीह में आपकी पहचान उस क्षण स्थापित हो गई थी, जब उसने पहली बार आप पर अपना स्नेह सुनिश्चित किया था, तभी से आप स्वतन्त्र हो जाते हैं और आप में हियाव आ जाता है। आपको अपने आप में कोई ऐसा कारण खोजने की आवश्यकता नहीं है, जिसके द्वारा आप यह समझ सकें कि आपको उसका अद्‌भुत अनुग्रह क्यों मिला है; आप केवल यह जानकर आनन्दित हो सकते हैं कि उसने आपको इसलिए चुना क्योंकि वह आपसे प्रेम करता है। क्योंकि आपको लगता है कि आप अपने मसीही जीवन में बहुत कम प्रगति कर रहे हैं, इस कारण आपको अपने पापों के कारण बोझिल रहने या कुचले रहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका प्रेम कभी भी आपके कार्यों या भले कार्य कर पाने की आपकी प्रतिज्ञा पर आधारित नहीं था। आप इस जीवन के उतार-चढ़ावों में से इस आश्वासन के साथ होकर जा सकते हैं कि जो आपको प्रेम करता है उसी ने सभी वस्तुओं को बनाया है तथा सभी वस्तुओं उसी के चलाए चलती हैं और यह भी कि क्योंकि आपको कभी भी उसका प्रेम प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, इसलिए आप इसे कभी खो भी नहीं सकते हैं।       
यूहन्ना 6:35-51

1 March : आपल्यांला सांत्वन कुठून प्राप्त होते

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1 March : आपल्यांला सांत्वन कुठून प्राप्त होते
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तो ( पिलात ) पुन्हां सरकारवाडयात जाऊन येशूला म्हणाला, “तू कुठला आहेस?” परंतु येशूनें त्याला उत्तर दिले नाहीं. पिलाताने त्याला म्हटलें, ” माझ्याबरोबर तू बोलत नाहींस काय ? तुला सोडण्याचा अधिकार मला आहे व तुला वधस्तंभावर खिळण्याचा अधिकार मला आहे हे तुला ठाऊक नाहीं काय ?” येशूनें उत्तर दिले, ” आपणाला वरुन अधिकार देण्यात आला नसता तर माझ्यावर तो मुळीच चालला नसता ; म्हणून ज्यानें मला आपल्यां स्वाधीन केलें त्याचें पाप अधिक आहे. ” – योहान 19 : 9-11.

पिलाताकडें येशूला वधस्तंभावर खिळण्याचा अधिकार होता, पण त्या गोष्टीचा येशूला धाक वाटली नाहीं.. असे का बरे?

असे नव्हते कीं पिलात खोटे बोलत होता किंवा येशूला वधस्तंभावरखिळण्याचा त्याला अधिकार नव्हता. त्याला तो अधिकार होता.

तर, येशूला त्याच्या अधिकाराचे भय वाटले नाहीं याचे कारण हें कीं त्याचा अधिकार हा दिलेला अधिकार होता, तो अधिकार त्याला “देवाकडून प्राप्त झाला होता.’  येशू म्हणाला कीं, “तुला वरून अधिकार प्राप्त झाला आहे.”  म्हणजेच त्याला अधिकार होता, निश्चितच जास्त प्रमाणात अधिकार होता. 

मग ह्या गोष्टीचा धाक वाटणे योग्य होते ना?  पिलाताला येशूला केवळ मारण्याचा अधिकार नव्हता तर, मारण्याचा तो अधिकार त्याला देवानें देऊ केलेला होता.

येशूला त्याच्या अधिकाराची भीती वाटली नाहीं कारण पिलाताचा येशुवरील अधिकार हा देवाच्या पिलातावरील अधिकाराच्या दुय्यम दर्जाचा होता.  येशूला त्या क्षणी सांत्वन प्राप्त झाले कारण पिलाताची इच्छा ही दुर्बळ नसून, त्याची इच्छा ही मार्गदर्शित होती. येशू हा पिलाताच्या हातात नसून, पिलात येशूच्या पिताच्या हातात होता.

याचा अर्थ आपल्यांला सांत्वन यातून प्राप्त होत नाहीं कीं आपला शत्रू दुर्बळ आहे,  तर आपल्यांला सांत्वन यातून प्राप्त होते कीं “आपल्यां शत्रूच्या बळावर देखील आपल्यां पित्याचा सार्वभौम अधिकार आहे.”

रोमकरास  पत्र 8:35-37, मध्यें हाच मुद्दा नमूद केला आहे, क्लेश, आपत्ती, छळवणूक, उपासमार, नग्नता, संकटे किंवा तलवार आपल्यांला ख्रिस्तापासून विभक्त करू शकत नाहींत, “कारण ज्यानें आपल्यांवर प्रीति केलीं त्याच्या योगे ह्या सर्व गोष्टीत आपण महाविजयी ठरतो.”

पिलात व येशूच्या इतर शत्रूंनी जे वाईटासाठीं योजले (व आपले शत्रू जे आपल्यां वाइटासाठीं योजतात)  ते सर्व,  देव आपल्यां चांगल्यांसाठीं योजतो (उत्पत्ती 50:20).  येशूचे सर्व शत्रू एकत्र येऊन, त्यांना देवानें दिलेल्यां आधिकारानी, “जे काहीं घडावें म्हणून देवानें स्वहस्ते व देवाचा संकल्पानें पूर्वी योजलें होते ते त्यांनी केलें” (प्रेषित 4:28). त्यांनी पाप केलें, पण त्यांचा पापाद्वारें देवानें तारण घडवून आणिलें.

यासाठींच, आपले शत्रू जे केवळ आपल्यां शरीराचा नाश करू शकतात त्यांचे भय बाळगण्याचे कारण नाहीं (मत्तय 10:28) ते एवढेच करू शकतात म्हणून नाहीं तर (लुक 12:4), ते जे काहीं करतात ते आपल्यां दक्ष पिताच्या हाताखाली करतात.

पाच चिमण्या दोन दमड्यांना विकतात कीं नाहीं? तरी त्यांच्यापैकीं एकींचाही देवाला विसर पडत नाहीं. फार तर काय, तुमच्या डोक्याचे सर्व केसही मोजलेले आहेत. भिऊ नका; तुम्हीं अनेक चिमण्यांपेक्षा मूल्यवान आहात. (लूक 12:6-7)

पिलाताकडें अधिकार होता. हेरोदाकडें अधिकार होता. सैनिकांकडें अधिकार होता. सैतानाकडें अधिकार आहे. पण त्यांचा अधिकार स्वायत्त/स्वतंत्र नाहीं. त्या सर्वांचा अधिकार हा त्यांना देण्यांत आलेला अधिकार आहे, पण सर्व अधिकार देवाच्या  इच्छेच्या अधीन आहे, दुसऱ्या दर्जावर आहे. भय बाळगू नका. तुम्हीं तुमच्या सार्वभौम पित्यासाठीं मौल्यवान आहात. ज्या चिमण्यांचा देवाला विसर पडत नाहीं, तुम्हीं त्या चिमण्यांपेक्षा मूल्यवान आहात.  

28 फरवरी : समर्पित और अटल

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28 फरवरी : समर्पित और अटल
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“मैं ने अपने परमेश्‍वर यहोवा की पूरी रीति से बात मानी। तब उस दिन मूसा ने शपथ खाकर मुझसे कहा, ‘तू ने पूरी रीति से मेरे परमेश्‍वर यहोवा की बातों का अनुकरण किया है, इस कारण निस्सन्देह जिस भूमि पर तू अपने पाँव धर आया है वह सदा के लिए तेरा और तेरे वंश का भाग होगी।’”  यहोशू 14:8-9

बहुत से लोग जीवन में आरम्भ तो बहुत अच्छा करते हैं, परन्तु बाद में वे वह सब खो देते हैं जिसने उन्हें सफल बनाया था। हो सकता है कि युवावस्था में वे विख्यात रहे हों। 40 वर्ष की आयु में उनके जीवन में प्रसिद्धि, प्रभाव और प्रतिष्ठा थी। कलीसिया में, हम ऐसे व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए अत्यन्त उपयोगी व्यक्तियों के रूप में देख सकते हैं, निस्सन्देह हम अपने आप को  भी उसी प्रकार देख सकते हैं। परन्तु प्रायः हम बीते हुए कल के विजेता बन कर रह जाने के प्रलोभन में फँस जाते हैं, उन “अच्छे वर्षों” को पीछे मुड़कर देखते रहते हैं और जिस तरह से सारी बातें आज के समय में हो रही हैं, उसके बारे में कुड़कुड़ाते रहते हैं।

यद्यपि यह बात बहुत से लोगों के लिए सच होती है, परन्तु कालेब के लिए यह बात बिल्कुल भी सच नहीं थी, जो इस सम्भावित उदासीनता से दूर रहा और विश्वास में बना रहा। उसने अपनी वृद्धावस्था से पहले के वर्ष अधिक चाहने योग्य परिवेश में नहीं बिताए थे। 40 वर्ष की आयु से वह चार दशकों तक मरुभूमि में भटकता रहा, क्योंकि उसके आस-पास के लोग परमेश्वर में विश्वास करने में विफल रहे थे। फिर भी निराशा और भटकते रहने के इस समय में कालेब कड़वाहट और असन्तोष से मुक्त रहा।

वास्तव में, अन्त में बातें इतनी बिगड़ गईं कि लोगों ने एक ऐसे अगुवे को खोजना आरम्भ कर दिया जो उन्हें पुराने अच्छे दिनों में वापस ले जा सके (गिनती 14:4)। अब, किसी को पीछे जाने के लिए सच में किसी अगुवे की आवश्यकता नहीं होती; आप स्वयं ही पीछे जा सकते हैं! हमें आगे बढ़ाने के लिए अगुवों की आवश्यकता होती है। आगे एक आने वाला कल है। आगे आने वाली कई पीढ़ियाँ हैं। हमारे संसार के लिए परमेश्वर की योजना में अभी भी ऐसे उद्देश्य हैं जिनका हमारे सामने उजागर होना अभी शेष है।

कालेब इसी भावना को प्रकट करता है। उसके आरम्भिक जीवन के स्पष्ट समर्पण का उसके मध्य वर्षों में उसकी निरन्तरता के साथ मिलन हो गया। वह न केवल 40, बल्कि 50, 60 और 70 की आयु में भी समर्पित और अटल रहा। उन सारे दशकों में उसने “पूरी रीति से प्रभु की बातों का अनुसरण किया।”

कई लोगों के लिए विवाह, घर, गृहस्थी, व्यावसायिक चिन्ताएँ, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ, इत्यादि के क्षेत्र में प्रायः आत्मिक उत्साह और प्रभावशीलता में कमी आ जाती है। ऐसे लोग भी होते हैं जो बहुत सारे संसाधन, ऊर्जा और ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, परन्तु ऐसा करने के विपरीत वे सेवाकार्य के काम को अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर आराम करने का निर्णय ले लेते हैं। उन इस्राएलियों के समान जो मरुभूमि में थे, वे भी उदासीनता, आलोचना और निराशावाद में ही उलझे रह जाते हैं और अपने आत्मिक जीवन में होने वाली गिरावट को नहीं देख पाते।

आपके समर्पण, आपकी बातचीत और आपकी आत्मिक बढ़त का स्तर आज क्या है? क्या वे पहले जैसी ही हैं? इस्राएल की मरुभूमि वाली पीढ़ी की तरह आज की कलीसिया को भी विश्वास रखने वाले अनुभवी पुरुषों और स्त्रियों की बहुत आवश्यकता है, जो अच्छे और बुरे समय में, प्रत्येक मौसम में और प्रत्येक परिस्थिति में निरन्तर समर्पण के साथ जीवन जीते हों और वर्षों से वे उस मीरास की ओर बढ़ते जा रहे हैं जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने विश्वासयोग्य अनुयायियों से की है। आपके लिए आज उस मीरास की ओर चलना कैसा है और दस साल के बाद यह कैसा होगा?      न्यायियों 1:1-20