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2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना

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2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना
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“दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इससे लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ, और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने–अपने मन में प्रभु के सामने गाते और कीर्तन करते रहो।” इफिसियों 5:18-19

जीवन के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सब कुछ एक साथ होता हुआ प्रतीत होता है, जैसे किसी बच्चे का जन्म या किसी नए देश में स्थानान्तरण। मसीह में नया जीवन प्रारम्भ करना शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब हम यीशु पर विश्वास करते हैं, तो एक साथ कई परिवर्तन होते हैं: हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, हम परमेश्वर के परिवार में गोद लिए जाते हैं, हमें उसके पुत्र और पुत्रियों के रूप में एक नई पहचान दी जाती है, और—जैसा कि इस वचन में दर्शाया गया है—हमारे भीतर पवित्र आत्मा का वास होता है।

जब कोई यीशु पर विश्वास करता है, तो पवित्र आत्मा उसमें वास करने लगता है, उसे वह इच्छा और सामर्थ्य प्रदान करता है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए आवश्यक है। आत्मा की यह परिपूर्णता मसीही अनुभव का मूलभूत सत्य है। यह हर उस व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, जो मसीह पर विश्वास करता है। फिर भी, सच्चाई यह है कि विश्वासियों के रूप में हम हमेशा परमेश्वर के आत्मा की परिपूर्णता में नहीं जीते। यह सम्भव है कि हमारी अवज्ञा के कारण हम हमारे भीतर रहने वाले आत्मा को दुखी कर देते हैं (इफिसियों 4:30)। यह भी सम्भव है कि हम उससे अधिक किसी अन्य चीज़ के प्रभाव में अधिक आ जाएँ—यही कारण है कि पौलुस यहाँ यह स्पष्ट करता है कि हम एक साथ शराब और आत्मा दोनों के प्रभाव में नहीं रह सकते।

हमें यह समझना होगा कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो हम कभी भी उसके पितृत्व से बाहर नहीं आ सकते; लेकिन अवज्ञा में जीने से हम उसके पितृ-संरक्षण, उपस्थिति और आनन्द से वंचित हो सकते हैं। जो बच्चा अपने माता-पिता की पूरी तरह अवहेलना करता है, वह भले ही नाश्ते की मेज़ पर बैठा हो, तब भी वह जानता है कि वे अभी भी उसके माता-पिता हैं और वह अभी भी उनका बेटा है, लेकिन ऐसा होने पर भी उसके इस रिश्ते का आनन्द कम हो जाएगा। हमारे साथ भी यही होता है: हम अवज्ञा में नहीं जी सकते—ऐसा नहीं हो सकता कि एक ओर तो हम अपने जीवन में किसी अन्य प्राथमिकता, विचार या पदार्थ को अपना मार्गदर्शक बना लें और दूसरी ओर हम आत्मा की परिपूर्णता में भी जीएँ।

यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे हम स्वयं हल कर सकते हैं। हम खुद को पवित्र आत्मा से नहीं भर सकते। हम केवल परमेश्वर से पवित्र आत्मा की परिपूर्णता को ही प्राप्त नहीं करते, बल्कि उसका आनन्द भी उसी के द्वारा सम्भव होता है। हम स्वयं को नहीं भर सकते, लेकिन हमें स्वयं को भरे जाने के लिए तैयार और खुले अवश्य रखना चाहिए। हर मसीही जीवन की अपेक्षा यही है कि यह आत्मा से भरे होने का प्रमाण—जिसे पौलुस “आत्मा का फल” (गलातियों 5:22) कहता है—धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हो।

आपके जीवन की और हर एकत्रित कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम सब आत्मा से भरे जाएँ—कि हम किसी और चीज़ के बजाय उसके द्वारा निर्देशित हों। यही सच्चे रूपान्तरण, आनन्द, शान्ति और प्रेम को लाता है। यही हमें प्रेरित करता है कि हम न केवल अपने ओठों से, बल्कि अपने हृदय में भी मसीह की स्तुति के गीत गाएँ। इसलिए प्रार्थना करें कि वह आपको नए सिरे से भर दे:

हे पवित्र आत्मा, मेरे हृदय पर उतर,

इसे संसार से अलग कर, इसकी हर धड़कन में प्रवाहित हो;

मेरी निर्बलता के बावजूद, तू शक्तिशाली है,

मुझे वैसा प्रेम करना सिखा, जैसा मुझे करना चाहिए।[1]

  यहेजकेल 11:14-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 60– 62; प्रेरितों 22 ◊


[1] जॉर्ज क्रोली, “स्पिरिट ऑफ गॉड, डिसेण्ड अपोन माई हार्ट” (1854).

1 अगस्त : सच्चा धन

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1 अगस्त : सच्चा धन
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“परमेश्‍वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है!” मरकुस 10:25

धनवानों का जीवन अक्सर आसान होता है। पैसा कई दरवाजे खोलता है। शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, यात्रा और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में हमें अक्सर यह देखने को मिलता है कि अधिक धन होने से चीज़ें अधिक सुगम हो जाती हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि धन को अक्सर “सार्वभौमिक पासपोर्ट” कहा जाता है!

लेकिन एक महत्त्वपूर्ण दरवाजा ऐसा भी है, जिसे धन अपने आप नहीं खोल सकता। धनवान युवा अगुवे ने पाया कि अनन्त जीवन की खोज में उसके धन ने कोई सहायता नहीं की बल्कि वह उसके लिए एक बाधा बन गया। अपनी सम्पत्ति को छोड़ने और यीशु का अनुसरण करने की अनिच्छा ने उद्धार के लिए उसके मार्ग को बन्द कर दिया, और इसलिए वह उदास हो गया तथा मसीह के साथ अपनी बातचीत को रोककर चला गया—उसके पास अब भी उसका धन था, लेकिन उसकी आत्मा खतरे में थी (मरकुस 10:22)।

इस युवक की उदासी से अधिक गहरी उदासी यीशु की थी। वह जानता था कि सांसारिक सम्पत्ति पर भरोसा करना कितना आसान है और वास्तव में महत्त्वपूर्ण चीजों से दृष्टि खो देना कितना खतरनाक है। और जिस दृष्टिकोण से यीशु ने धनवान युवा अगुवे को देखा, वह सुसमाचार में उसके अन्य उपदेशों के अनुरूप था। उदाहरण के लिए, एक बार उसने एक किसान की कहानी सुनाई जिसने अपने खलिहान तोड़कर और बड़े खलिहान बनाए (लूका 12:13-21)।

यह एक वैध निर्णय था, लेकिन वह मूर्ख था क्योंकि उसने अपने धन को अपनी आत्मा की सुरक्षा का मापदण्ड मान लिया। उसने अपने आप से कहा, “प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत सम्पत्ति रखी है; चैन कर, खा, पी, सुख से रह” (वचन 19)। लेकिन यीशु ने उसे मूर्ख कहा, क्योंकि वह मृत्यु के लिए तैयार नहीं था, और धन उसे मृत्यु से नहीं बचा सकता था (वचन 20)। आखिरकार, “यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?” (मत्ती 16:26)।

अक्सर हम भी सांसारिक सम्पत्ति में अपनी सुरक्षा खोजने की गलती करते हैं। हम या तो अधिक सम्पत्ति इकट्ठा करके या दूसरों को दान देकर अपने नाम और प्रतिष्ठा के लिए ऐसा करते हैं। लेकिन अन्ततः, यदि हम गलत चीजों को अधिक मूल्यवान समझते हैं और वास्तविक रूप से अनमोल चीजों को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो हम उसी मूर्खता में पड़ जाते हैं (“मिस्टर बिजनेसमैन” शीर्षक वाले गीत के शब्दों में)।[1]

हमारे पास जो कुछ भी है या हम जो कुछ भी करते हैं, वह हमें मृत्यु से बचाने और अनन्त जीवन में ले जाने के लिए हमारा मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकता। जब वह धनी युवक दुखी होकर चला गया, तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “मनुष्यों से यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से हो सकता है; क्योंकि परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है” (मरकुस 10:27)। धन का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह हमें गर्व और आत्मनिर्भरता में डाल सकता है, जिससे हम भूल सकते हैं कि केवल परमेश्वर ही हमारा उद्धारकर्ता है।

यदि यीशु आपसे कहे कि उसके सेवाकार्य के लिए आप अपने धन को छोड़ दें, तो क्या आप ऐसा करने के लिए तैयार होंगे? या फिर आप उदास होकर चले जाएँगे क्योंकि यह मांग आपके लिए बहुत बड़ी होगी और कीमत बहुत अधिक होगी? यदि आप अपने धन या संसाधनों पर भरोसा कर रहे हैं, तो उस सोच से पश्चाताप करें और परमेश्वर की दया से मिलने वाले उद्धार में आनन्दित हों। परमेश्वर जो कर सकता है, वह किसी रहस्य के समान छिपा नहीं है। जो कोई भी उसके पास आता है, उसे वह कभी अस्वीकार नहीं करेगा।

  लूका 12:13-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 57–59; प्रेरितों 21:18-40


[1] रेय स्टीवंस, “मिस्टर बिजनेसमैन” (1968).

19 जून : हम एक देह हैं

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19 जून : हम एक देह हैं
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“क्योंकि जैसे हमारी एक देह में बहुत से अंग हैं, और सब अंगों का एक ही सा काम नहीं; वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं।” रोमियों 12:4-5

आपने कभी-कभी लोगों को आपसे यह पूछते सुना होगा, “क्या आप यहाँ के सदस्य हैं?” यह सवाल आमतौर पर किसी कंट्री क्लब, जिम, या इसी तरह के किसी स्थान से सम्बन्धित होता है। वे जानना चाहते हैं, “क्या आप इस स्थान की सदस्य-सूची में शामिल हैं? क्या यहाँ के लोग आपको जानते हैं और स्वीकार करते हैं, और क्या वे आपको तब याद करेंगे जब आप मौजूद नहीं होंगे?”

कलीसिया का वर्णन करने के लिए पौलुस अक्सर शरीर के उदाहरण का उपयोग करता है। इसके अर्थ को समझने के लिए हमें अपनी कल्पना का विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है। हम सभी के पास एक शरीर है, जो विभिन्न हिस्सों से बना हुआ है, और प्रत्येक भाग का एक विशेष कार्य होता है। सभी भाग दिखाई नहीं देते, लेकिन सभी महत्त्वपूर्ण हैं। यदि कोई भाग काम नहीं कर रहा या मौजूद नहीं है, तो इसका असर बाकी सब पर पड़ता है। किसी के पूरे शरीर की प्रभावशीलता इस पर निर्भर करती है कि यह सिर द्वारा नियन्त्रित हो रहा है या नहीं। यह सत्य मसीह की देह अर्थात स्थानीय कलीसिया पर भी लागू होता है: आत्मिक शरीर तभी सही तरीके से काम करता है, जब वह यीशु के नेतृत्व में एकजुट होकर काम करता है। जब ऐसा होता है, तो हम . . .

• एकता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं रहते।

• बहुलता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम विभिन्न प्रकार के हिस्सों से बने हैं।

• विविधता के साथ काम करते हैं, क्योंकि शरीर के कार्य स्वाभाविक रूप से विविध होते हैं।

• सुगमता के साथ काम करते हैं, जिसे हम तब महसूस करते हैं जब सब कुछ एकजुट होकर काम करता है।

• पहचान के साथ काम करते हैं, यह दर्शाते हुए कि हममें से प्रत्येक जन अकेला रहकर स्वयं को पूर्ण रूप से नहीं जान सकता।

दूसरे शब्दों में, जब आप एक व्यक्ति के रूप में मसीह की देह की प्रकृति को समझते हैं, तो आप बेहतर तरीके से समझ पाते हैं कि आप कौन हैं और आप कहाँ फिट बैठते हैं। मसीह की देह के एक सदस्य के रूप में आप कहीं न कहीं अवश्य शामिल हैं। जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें बदल दिया है, तो हमें यह एहसास होना चाहिए कि हमारे लिए यह ध्यान रखना अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हमें एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध में बुलाया गया है—एक समुदाय में बुलाया गया है। हम उन वरदानों में विविध हैं जो हमें दिए गए हैं; हममें से कोई भी अकेले रहकर शरीर नहीं बना सकता, बल्कि हम एकसाथ जुटकर ही शरीर बनते हैं। हममें से प्रत्येक एक-दूसरे के लिए हैं। इसलिए हम कलीसिया में इस उद्देश्य से एकत्रित होते हैं कि हम अपने आप को एक-दूसरे के लिए और अन्ततः हमारे प्रभु के लिए अर्पित कर सकें। हम मसीह की देह में हमारे उपस्थित रहने, हमारे गीतों, हमारे प्रार्थनाओं और हमारी संगति के माध्यम से योगदान देते हैं। जैसा कि आइसक वॉट्स ने लिखा:

मेरी जीभ अपनी प्रतिज्ञाएँ दोहराती है,

“इस पवित्र घर को शान्ति मिले!”

क्योंकि यहाँ मेरे मित्र और परिवारजन रहते हैं। [1]

कलीसिया सिर्फ एक ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ आप आकर बैठ जाते हैं। यह एक देह है। यह आपका परिवार है। आपको अपनी कलीसिया की आवश्यकता है; और आपकी कलीसिया को आपकी आवश्यकता है। जितना अधिक आप अपनी कलीसिया के प्रति प्रतिबद्ध होंगे, उतना ही अधिक आप इससे आशीषित होंगे; क्योंकि हमारे जीवन में इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि परमेश्वर अपने लोगों को एक साथ लाता है, क्योंकि एकजुटता ही वह स्थान है जहाँ हम सबको होना चाहिए।

  1 कुरिन्थियों 12:12-27

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 37–39; मत्ती 27:1-26 ◊


[1] आइसक वॉट्स, “हाओ प्लीज़्ड ऐण्ड ब्लेस्ट वाज़ आई” (1719).

11 मई : यह प्रभु का काम है

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11 मई : यह प्रभु का काम है
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“तब वह [नाओमी] मोआब के देश में यह सुनकर कि यहोवा ने अपनी प्रजा के लोगों की सुधि ले के उन्हें भोजन वस्तु दी है, उस देश से अपनी दोनों बहुओं समेत लौट जाने को चली।” रूत 1:6

बैतलहम बाइबल के इतिहास में एक प्रमुख नगर है। राजगद्दी सम्भालने से पहले दाऊद ने इसी नगर में अपनी भेड़ें चराईं थीं। एक हज़ार साल बाद, जब विभिन्न चरवाहे अपनी भेड़ों के झुण्डों की देखभाल कर रहे थे, तो इसी नगर में स्वर्गदूतों के एक दल ने यीशु मसीह के जन्म की घोषणा की।

हालाँकि इन दोनों महत्त्वपूर्ण घटनाओं से पहले न्यायाधीशों का काल था, जो हिंसा, सामाजिक और राजनीतिक अराजकता, और धार्मिक उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस उथल-पुथल के दौरान, बैतलहम में अकाल पड़ा, जिससे यह नगर, जिसका नाम इब्रानी भाषा में “रोटी का घर” है, भूख और निराशा का एक घर बन गया।

इन निराशाजनक परिस्थितियों में, एलीमेलेक नाम का एक व्यक्ति भोजन की तलाश में अपनी पत्नी नाओमी और अपने दो बेटों को मोआब देश में ले गया। जबकि एलीमेलेक नाम का अर्थ “मेरा परमेश्वर राजा है” है, लेकिन इस्राएल के शत्रुओं के देश मोआब में जाने का उसका निर्णय यह सवाल उठाता है कि क्या वह वास्तव में परमेश्वर के प्रावधान पर विश्वास कर भी रहा था या नहीं, या उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध था भी या नहीं।

मोआब भोजन की भूमि नहीं, बल्कि शोक का स्थान साबित हुआ। एलीमेलेक और उसके बेटों की मृत्यु हो गई, और नाओमी विधवा हो गई। हालाँकि, कुछ वर्षों बाद, नाओमी के दर्द के अंधकार में एक छोटी सी उम्मीद की किरण जागी; उसे यह समाचार मिला कि बैतलहम में भोजन लौट आया था। परमेश्वर ने अपने देश में अपनी प्रजा के लिए प्रावधान किया था।

हज़ारों साल बाद, हम इस सत्य को जल्दी से नजरअंदाज करने के लिए प्रलोभित हो सकते हैं: कि परमेश्वर अपनी प्रजा को वही प्रदान करता है, जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। शायद आप अपने उद्धार के बारे में यह तथ्य जानते हैं—लेकिन यह कितना आसान है कि हम उसके दैनिक प्रावधान के बारे में भूल जाएँ! क्या हमारे पास उन चीजों को देखने की दृष्टि है जो परमेश्वर हमारे दैनिक जीवन में हमें दे रहा है और हमारे लिए कर रहा है? क्या हर दिन के अन्त में उन कामों के लिए हमारे दिलों में धन्यवाद भरा हुआ होता है, जो उसने हमारे लिए किए हैं?

परमेश्वर के निरन्तर प्रावधान का एक व्यावहारिक उदाहरण वह भोजन है, जो हमें प्रतिदिन मिलता है। किराने की दुकान में यदि किसी को सबसे अधिक आभार और आश्चर्य के साथ देखना चाहिए, तो वह मसीही लोग हैं! आखिरकार, परमेश्वर ही तो है जो हमारी दुकानों और भण्डारगृहों को भोजन से भरता है। हम दुकान से अण्डे और दूध खरीदते हुए यह कह सकते हैं, “यह तो यहोवा की ओर से हुआ है, यह हमारी दृष्‍टि में अद्‌भुत है” (भजन 118:23)।

चाहे जीवन की घटनाएँ कितनी भी अंधकारमय और नाटकीय क्यों न दिखें, परमेश्वर अब भी अपनी प्रजा की चिन्ता करता है और अपनी योजनाओं को पूरा करता है, और वह अक्सर इसे अप्रत्याशित व्यक्तियों के माध्यम से और शान्त तरीकों से करता है। उसने नाओमी और उसके परिवार के माध्यम से महान कार्य करने का उद्देश्य रखा था—और यह बैतलहम में रोटी से शुरू हुआ। हमें भी अपनी आँखें खोलनी चाहिए ताकि हम देख सकें कि परमेश्वर द्वारा भोजन प्रदान करना हमारी सबसे बड़ी स्थाई आवश्यकता—हमारे उद्धारकर्ता, यीशु मसीह—के प्रावधान की ओर तथा हमारे उच्चतम बुलावे की ओर इशारा करता है: अर्थात हम उसकी महिमा के लिए “उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया” (इफिसियों 2:10)।

प्रेरितों 17:24-31

10 मई : नियम एवं शर्तें

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10 मई : नियम एवं शर्तें
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“उसने भीड़ को अपने चेलों समेत पास बुलाकर उनसे कहा, “जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इनकार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।” मरकुस 8:34-35

ऑनलाइन कुछ भी करने से पहले हमें अक्सर उपयोग की शर्तों और नीतियों को सहमति देनी होती है। और जब हम “मैं सहमत हूँ” बॉक्स पर टिक करते हैं, तो क्रेडिट कार्ड कम्पनियाँ, सोशल मीडिया प्लेटफार्म और वेबसाइटें समय-समय पर हमें सूचित करती हैं कि उनकी कानूनी नीतियाँ बदल गई हैं—और यह कि सेवा का उपयोग जारी रखने के लिए हमें नई नीतियों को स्वीकार करना होगा।

ऐसी बदलती नीतियाँ अक्सर बार-बार होती हैं और सूक्ष्म होती हैं। इन्हें पहचानना या इन पर नज़र रखना लगभग असम्भव होता है। फिर भी, यह सौभाग्य की बात है कि मसीह के अनुयायी बनने की “शर्तें और नीतियाँ” कभी नहीं बदलतीं, और कभी नहीं बदलेंगी। उन्हें न तो हटाया जा सकता है और न ही हमारी पसन्द के अनुसार बदला जा सकता है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर ने स्थापित किया है। इन पदों में, परमेश्वर के पुत्र ने अपने लोग बनने और अनन्त जीवन पाने के लिए “शर्तें और नीतियाँ” निर्धारित की हैं।

हम कभी-कभी ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हमें प्रभु की आज्ञा का पालन करने के लिए खुद को मजबूर करना होगा। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है! बाइबल कहती है कि जैसे हम यीशु की पहल और अनुग्रह के उत्तर स्वरूप उस पर विश्वास करते हैं (इफिसियों 2:8), वैसे ही वही अनुग्रह हमें बनाए रखता है और हमें उसके पीछे चलने में सक्षम बनाता है (फिलिप्पियों 1:6)। वह हमारे विचारों, हमारी नैतिकता, हमारे व्यवहार और हमारे संसाधनों को आकार देता है, ताकि हम उसके नियन्त्रण के अधीन आ सकें, जिसे हमने अपनी महिमा माना है।

मसीह का अनुसरण करने की एक “शर्त” यह है कि अब हमारे जीवन का केन्द्र हम स्वयं नहीं हैं। हमारी व्यक्तिगत पहचान और लक्ष्य प्राथमिकता नहीं हैं। इसके बजाय, हमारा रूपान्तरण हो जाता है, ताकि मसीह के साथ हमारी एकता के माध्यम से बाहर के संसार के सामने हम दृश्य रूप में फल ला सकें। वह हमें आत्म-उपासना का पूर्ण रूप से खण्डन करने का बुलावा देता है।

स्वयं को नकारने के द्वारा हम अपने क्रूस को उठाते हैं और मसीह का अनुसरण करते हैं। दुर्भाग्य से, “अपना क्रूस उठाने” का रूपक अक्सर हल्का कर दिया जाता है; हमें याद रखना चाहिए कि क्रूस की मृत्यु वास्तव में मानवता द्वारा आविष्कार की गई सबसे क्रूर और भयंकर मृत्यु की विधियों में से एक थी। क्रूस उठाने के इस रूपक का उपयोग करके यीशु यह स्पष्ट कर रहा है कि शिष्यता का एक बड़ा मूल्य है।

लेकिन मसीह हमें ऐसा कुछ करने के लिए नहीं कह रहा है, जो उसने पहले न किया हो। वही क्रूस था, जिस पर उसने हमें एक मूल्य चुकाकर खरीदा (1 कुरिन्थियों 6:20)। इसलिए उसकी शिष्यता में चलना हमारे पुराने मनुष्यत्व की मृत्यु की ओर तथा अनन्त जीवन की ओर ले जाने वाला एक अभियान है। यह एक सैर नहीं है, बल्कि एक जीवित बलिदान है, क्योंकि हम अपने नहीं हैं। लेकिन आशा रखें, क्योंकि इस अभियान में भी एक सुन्दरता है। एक दिन, मानव-पुत्र शक्ति और महिमा में वापस आएगा, और हरेक टूटे हुए को अपने राज्य में पुनः स्थापित करेगा। तब तक, परमेश्वर के राज्य के लिए अपने जीवन को खोना एक अच्छा निवेश है, चाहे मूल्य कुछ भी हो।

1 पतरस 3:13 – 4:11

9 मई : पूरी सहानुभूति

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9 मई : पूरी सहानुभूति
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“इस कारण उसको चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिससे वह उन बातों में जो परमेश्‍वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिए प्रायश्चित करे। क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है जिनकी परीक्षा होती है।” इब्रानियों 2:17-18

हममें से कई लोग इस बात से हतोत्साहित होते हैं कि हमें कितनी बार प्रलोभन का सामना करना पड़ता है। हम अपने जीवन में प्रलोभन के अपार आकर्षण से शर्मिन्दा हो सकते हैं। यह हम पर पूरी तरह से हावी हो सकता है। ऐसे क्षणों में यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि प्रलोभन का अनुभव करना अपने आप में पाप नहीं है—क्योंकि मसीह ने भी, जो निष्पाप था, इसका सामना किया था। लेकिन क्योंकि उसने प्रलोभनों के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया, जैसा कि हम अक्सर करते हैं, इसलिए धार्मिकता का पालन करने में वह हमारे लिए परम आदर्श है।

जब मसीह ने मानव स्वभाव को अपनाया, तो वह इसकी सीमाओं और परीक्षणों के अधीन हो गया। इसलिए, हालाँकि यीशु परमेश्वर का दिव्य पुत्र और हमारा महान महायाजक है, केवल एक सामान्य इंसान नहीं है, हम यह जानकर हिम्मत पा सकते हैं कि वह हमारे संघर्षों के साथ पूरी तरह से सहानुभूति रख सकता है।

आपके और मेरे सामने आने वाली परीक्षाओं के मध्य में मसीह की सहानुभूति पाप के अनुभव पर निर्भर नहीं है, बल्कि पाप के प्रलोभन के अनुभव पर निर्भर है, जिसे केवल वही पूरी तरह जान सकता है जो वास्तव में निष्पाप है। यीशु दूर रहकर सहानुभूति नहीं दिखाता; वह प्रलोभन का सामना करने की पीड़ा और चुनौती को गहराई से जानता है। उसने हमारी पृथ्वी पर की राहों पर चलकर इसे अनुभव किया है।

तो फिर, जब आप प्रलोभन का सामना करने के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं और अपनी कमजोरियों के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं, तब आप इस स्थान पर जा सकते हैं। 21वीं सदी के “महान प्रधान याजकों” की सांसारिक बुद्धि पर भरोसा मत करें, जो आपको बताएँगे कि प्रलोभन इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही आते हैं, कि दोषी महसूस करना एक बीमारी है जिसे नकारा जाना चाहिए, और कि शर्म हमेशा अनावश्यक और हानिकारक होती है। इसके बजाय सच्चे महान महायाजक की ओर मुड़ें, जो आपको बताता है कि प्रलोभनों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए और जो आपको ऐसा करने की शक्ति भी प्रदान करता है (1 कुरिन्थियों 10:13), और जो आपको यह भी आश्वस्त करता है कि जब आप प्रलोभनों में आत्मसमर्पण कर देते हैं, तो आपका दोष और शर्म उसके शरीर में सहन कर लिया गया है और क्रूस पर मिटा दिया गया।

प्रभु यीशु मसीह के साथ सम्बन्ध में सबसे सुन्दर बात यह है कि आप पूरे आत्मविश्वास के साथ उसके पास जा सकते हैं, जिसने आपके लिए अपने प्राण दे दिए ताकि आप अपने विश्वास को दृढ़ता से पकड़ सकें। आप नियमित रूप से, विनम्रता से, विश्वास के साथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति में आ सकते हैं, जो आपको सहानुभूति देने वाले मसीह के माध्यम से आपका स्वागत करता है। और अन्ततः, अनन्त काल में ऐसा कुछ भी नहीं होगा जिसके लिए मसीह को आपके पक्ष में प्रार्थना करने की आवश्यकता होगी। आप बस परमेश्वर के सामने खड़े हो सकेंगे और इस बात के लिए उसकी वन्दना कर सकेंगे कि उसने अपनी सिद्ध उपस्थिति में प्रवेश करने का निमन्त्रण आपको दिया। तब तक, उससे प्रार्थना करें जो यह जानता है कि प्रलोभन का सामना करना और प्रतिरोध करना क्या होता है, ताकि वह प्रलोभनों से आपके युद्ध के समय और आज आपके द्वारा उसके आज्ञापालन के प्रयासों में वह आपके साथ हो।

इब्रानियों  2:5-18

8 मई :आत्मा का सामर्थ्य

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8 मई :आत्मा का सामर्थ्य
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“परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।”  प्रेरितों 1:8

पवित्र आत्मा हमें इसलिए दिया गया है ताकि परमेश्वर के लोग परमेश्वर के वचन को परमेश्वर के संसार में लाकर फैलाएँ।

पवित्र आत्मा के बिना प्रेरितों की पुस्तक की घटनाएँ कभी नहीं हो पाती—जिसमें सुसमाचार के विस्तार की कहानी बताई गई है, जिसमें यीशु के चेले यरूशलेम की सड़कों पर जाकर मृतकों में से जी उठे मसीह के सन्देश का प्रचार करते हैं। आखिरकार, कुछ हफ्ते पहले यही शिष्य अपने क्रूसित राजा के लिए शोक करते हुए एक डरे-सहमे छोटे से समूह के रूप में बन्द दरवाजों के पीछे छिपे बैठे थे। उनके अचानक बदलाव का कारण क्या था?

इसका उत्तर यीशु की मृत्यु पर विजय और उस प्रतिज्ञा में पाया जाता है जो उसने अपने शिष्यों को दी थी—पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा, जो उन्हें सक्षम और सशक्त बनाने के लिए था। यह प्रतिज्ञा एक आदेश के साथ जुड़ी हुई थी: यीशु के अनुयायियों को पूरे संसार में जाकर खुशखबरी का प्रचार करना था।

इससे पहले कि शिष्य उत्साह से बाहर निकलते, यीशु ने उनके ध्यान को केन्द्रित किया। वे अभी तक यह नहीं समझ पाए थे कि उनकी चिन्ता सिर्फ इस्राएल तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सभी लोगों के लिए थी। (और इस सत्य को पूरी तरह से समझने में उन्हें और समय लगने वाला था: प्रेरितों 10:1 – 11:18 देखें।) इसलिए यीशु ने अपने अनुयायियों से कहा कि वे “यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।”

यीशु के स्वर्गारोहण के बाद पवित्र आत्मा उसके अनुयायियों पर उतरा, जैसा कि यीशु ने प्रतिज्ञा की थी—और तब कलीसिया के पूरे संसार में फैलने की महान कहानी शुरू हुई। यह ऐसी कहानी है जो अभी तक खत्म नहीं हुई है, और इसमें हर एक विश्वासी शामिल है, क्योंकि सुसमाचार का संसार में हर जगह प्रचार हो रहा है।

यदि आप मसीह में हैं, तो आपके पास वही पवित्र आत्मा है, और आप उसकी शक्ति से यीशु के सत्य को पूरे संसार में फैलाने के लिए सक्षम हैं। पवित्र आत्मा हमें इसलिए नहीं दिया गया था कि हम बस बैठकर अपने आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अन्य मसीहियों से बातें करते रहे। बल्कि हमें अपने उपहारों और क्षमताओं का उपयोग करके सुसमाचार को सभी जातियों तक पहुँचाने के लिए भेजा गया है। हममें से कुछ के लिए इसका मतलब है विदेशों में मिशन पर जाना। दूसरों के लिए इसका मतलब है इसी मिशन के हिस्से के रूप में अपने रास्ते या अपने शहर में सुसमाचार का प्रचार करना।

परमेश्वर आपको उन लोगों से भी प्रेम करने और सेवा करने के लिए बुलाता है, जिनके साथ आपकी कोई सामान्य सांसारिक नागरिकता नहीं है। वह आपको विभाजन रेखाओं को पार करने और उन लोगों के पास आने के लिए बुलाता है, जिनके प्रति आप स्वाभाविक रूप से उदासीन होते हैं, या यहाँ तक कि जिनसे साथ आपकी शत्रुता हो। लेकिन वह आपको वह प्रेम और साहस इकट्ठा करने के लिए नहीं कहता, जिसकी इसके लिए आवश्यकता है। नहीं—हमें एक ऐसी शक्ति से परिवर्तित होना होगा, जो हमारे भीतर से नहीं बल्कि बाहर से आती है, और यही वह प्रतिज्ञा है जो यीशु ने की थी और जो पवित्र आत्मा प्रदान करता है। इसलिए आज आप अपने जीवन में पवित्र आत्मा को ताजगी से उण्डेलने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करें, ताकि आप साहस और उत्साह के साथ खुशखबरी का प्रचार कर सकें।

प्रेरितों 1:1-11

7 मई : हम किसी न किसी की आराधना करते हैं

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7 मई : हम किसी न किसी की आराधना करते हैं
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“मैं अन्धों को एक मार्ग से ले चलूँगा जिसे वे नहीं जानते और उनको ऐसे पथों से चलाऊँगा जिन्हें वे नहीं जानते। उनके आगे मैं अन्धियारे को उजियाला करूँगा और टेढ़े मार्गों को सीधा करूँगा। मैं ऐसे-ऐसे काम करूँगा और उनको न त्यागूँगा। जो लोग खुदी हुई मूरतों पर भरोसा रखते और ढली हुई मूरतों से कहते हैं, ‘तुम हमारे परमेश्वर हो,’ उनको पीछे हटना और अत्यन्त लज्जित होना पड़ेगा।” यशायाह 42:16-17

बॉब डिलन के शब्दों में, आपको किसी न किसी की सेवा करनी होगी।[1] यह सच है—हम सभी किसी न किसी की उपासना करते हैं। सवाल सिर्फ यह है कि हम किसकी उपासना करते हैं।

हमारी मानवीय मूर्खता के कारण, हम अक्सर अपनी खुद की चालाकी से बनाई हुई छोटी-छोटी सृजनाओं पर निर्भर हो जाते हैं और अन्त में उनकी उपासना करने लगते हैं। पूरे इतिहास में, मनुष्यों की बुनियादी समस्या यह रही है कि हम हमेशा झूठे देवता बनाते रहते हैं, जिनकी पूजा करके हम झूठी मुक्ति ढूँढते रहते हैं। ये मूर्तियाँ सच्चे परमेश्वर का स्थान लेने के लिए लोगों द्वारा अपने दिलों से बनाई जाती हैं। प्रभु को अपनी श्रद्धा का केन्द्र और सन्तोष का स्रोत मानने की बजाय हम उन अच्छी वस्तुओं को, जो उसने हमारे आनन्द के लिए बनाई हैं, उसके स्थान पर व्यर्थ के विकल्पों में बदल देते हैं।

सी.एस. लुईस इसे इस तरह से कहते हैं: “हम आधे-अधूरे दिल से चलने वाले प्राणी हैं, जो शराब, सेक्स और महत्वाकांक्षाओं में फँसे रहते हैं, जबकि हमें अनन्त आनन्द दिया जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाला एक अनजान बच्चा कीचड़ में खेलता रहता है, क्योंकि वह नहीं जानता कि समुद्र के किनारे छुट्टियाँ मनाने का क्या अर्थ होता है। हम बहुत आसानी से खुश हो जाते हैं।”[2]

हम चाहे दिल से बनाए गए किसी भी विकल्प पर अपनी जिन्दगी को आश्रित रखें, हम यह भूल जाते हैं कि ये मूर्तियाँ शक्तिहीन होती हैं। ये हमारी मदद नहीं कर सकतीं। जैसा कि यशायाह ने स्पष्ट किया है, इन मूर्तियों ने न तो कभी भविष्य बताया है और न ही कभी अतीत पर विचार करने में हमारी मदद की है; न ही ये हमें मार्गदर्शन दे सकती हैं। ये हमारे सवालों का जवाब केवल चुप्पी और निराशाजनक अपेक्षाओं के साथ देती हैं (यशायाह 41:22-23, 28-29)।

केवल सच्चा और जीवित परमेश्वर ही आरम्भ से अन्त तक सब कुछ जानता है। उसने चुप्पी को तोड़ा और आने वाली घटनाओं के बारे में बताया। वह अंधकार को अपनी रोशनी से हराता है। वह अधर्म के “कठिन स्थानों” को धार्मिकता की “समतल भूमि” में बदल देता है। हालाँकि हमने एक बार उससे मुँह मोड़ लिया था, तौभी उसने अपने सेवक, हमारे अद्‌भुत मार्गदर्शक, यीशु को भेजा।

आप और मैं लगातार उन मूर्तियों से घिरे होते हैं जो हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए हमें पुकारती रहती हैं और हमें परमेश्वर को छोड़कर उनके भीतर सन्तोष खोजने के लिए ललचाती हैं। कौन सी मूर्तियाँ आपको सबसे अधिक ऊँची आवाज़ में पुकारती हैं? जान लें कि वे झूठ बोल रही हैं (हालाँकि वे आपको यह नहीं बतातीं)। परमेश्वर का वचन हमें इनकी उपासना करने से आने वाली शर्म की चेतावनी देता है और हमें एक बेहतर रास्ता दिखाता है: उसकी उपासना करने और उससे सेवा प्राप्त करने में सन्तोष पाना।

आज आपको किसी न किसी की सेवा करनी होगी। सुनिश्चित कर लें कि वह जीवित, प्रेम करने वाला परमेश्वर हो।

 रोमियों 1:16-32

6 मई : सेंतमेंत दिया गया

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6 मई : सेंतमेंत दिया गया
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“तौभी तुम ने भला किया कि मेरे क्लेश में मेरे सहभागी हुए। हे फिलिप्पियो, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में, जब मैं मकिदुनिया से विदा हुआ, तब तुम्हें छोड़ और किसी मण्डली ने लेने देने के विषय में मेरी सहायता नहीं की।”  फिलिप्पियों 4:14-15

मसीही होने का अर्थ प्राप्त करने वाला और देने वाला होना है।

हममें से बहुतों को यह सिखाया गया है कि अपने रिटायरमेण्ट अकाउण्ट में नियमित रूप से निवेश करना कितना जरूरी है। लेकिन जहाँ समझदारी से आर्थिक फैसले लेना गलत नहीं है, वहीं एक विश्वासी के रूप में हमें अपनी उदारता और निवेश को अनन्तकाल के नजरिए से भी देखना चाहिए।

फिलिप्पी की कलीसिया को लिखे अपने पत्र में, प्रेरित पौलुस ने मसीह में अपने भाइयों और बहनों की इस बात के लिए सराहना की कि उन्होंने उसके संघर्ष में साझेदारी की—ऐसी साझेदारी जिसमें भौतिक उपहारों को साझा करना और देना भी शामिल था। फिलिप्पियों की उदारता अद्वितीय थी क्योंकि अन्य कलीसियाओं से उसे ऐसा कोई सहयोग नहीं मिला था। हालाँकि यह कलीसिया नई-नई स्थापित हुई थी, फिर भी उन्होंने शुरू से ही ठान लिया था कि वे सुसमाचार के कार्य में पौलुस का समर्थन करेंगे।

पौलुस के लिए उनका सहयोग सिर्फ विशिष्ट नहीं बल्कि स्थाई भी था। फिलिप्पियों की कलीसिया कभी-कभार देने वाली नहीं थी, बल्कि वे लगातार और निरन्तर पौलुस की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करते रहे। हालाँकि पौलुस द्वारा पहली बार उन्हें सुसमाचार सुनाए एक दशक बीत चुका था, लेकिन वे अब भी उसके साथ खड़े थे।

उनका दान भावनाओं के किसी क्षणिक उभार का या किसी बाहरी दबाव या प्रलोभन का परिणाम नहीं था। नहीं, यह आरम्भिक कलीसिया इस सच्चाई को समझती थी कि जो कुछ उनके पास था, वह सब परमेश्वर की देन थी। जब यीशु ने अपने चेलों को भेजा था, तो उसने उन्हें याद दिलाया था कि “तुमने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो।” (मत्ती 10:8)। दूसरे शब्दों में, बलिदानी, उदार और संसाधन साझा करने वाली सहभागिता की नींव परमेश्वर का अनुग्रह है। यह नींव तब स्थापित होती है जब हम समझ जाते हैं कि हम जो कुछ हैं और हमारे पास जो कुछ है—हमारे सारे संसाधन, हमारे वरदान, और हमारी क्षमताएँ—सब उसी से आए हैं।

हम सबके पास देने के लिए समान साधन या सामर्थ्य नहीं है, और आर्थिक सहायता ही दान देने का एकमात्र तरीका नहीं है! लेकिन क्योंकि हम सब परमेश्वर के अनुग्रह के प्राप्तकर्ता हैं, इसलिए हमें दूसरों को देने की लालसा भी रखनी चाहिए। परमेश्वर ने अपने लोगों को इस प्रकार एक साथ रखा है कि हर कोई “उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है,” दे (रोमियों 12:6)। हमें न तो इसलिए देना चाहिए क्योंकि हमें मजबूर किया गया है, न इसलिए कि कोई भावनात्मक गीत सुनकर हमारी आँखों में आँसू आ गए, और न ही इसलिए कि हमारा नाम किसी इमारत या बेंच पर लिखा जाएगा। हमें सिर्फ एक ही कारण से देना चाहिए—क्योंकि परमेश्वर ने हमें स्वतन्त्र रूप से और उदारता से दिया है।

2 कुरिन्थियों 9:1-15

5 मई : मन्दिर का शुद्धीकरण

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5 मई : मन्दिर का शुद्धीकरण
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“तब उसने रस्सियों का कोड़ा बनाकर, सब भेड़ों और बैलों को मन्दिर से निकाल दिया, और सर्राफों के पैसे बिखेर दिये और पीढ़ों को उलट दिया . . . तब उसके चेलों को स्मरण आया कि लिखा है, ‘तेरे घर की धुन मुझे खा जाएगी।’” यूहन्ना 2:15, 17

कोई भी पिता स्वाभाविक रूप से गुस्से से जल उठेगा यदि वह देखेगा कि नशा उसके बच्चे के जीवन को नष्ट कर रहा है। हम यह उम्मीद नहीं करेंगे कि वह इसे हल्के में लेगा। नहीं, बल्कि हम यह अपेक्षा करेंगे कि वह उस बुराई को मिटाने और अपने बच्चे को बचाने के लिए हर सम्भव प्रयास करेगा।

जब परमेश्वर-पुत्र यीशु पृथ्वी पर अपने पिता के घर में—यरूशलेम के मन्दिर—में आया और चारों ओर देखा, तो सारा दृश्य उसके लिए पीड़ादायक था। जो स्थान परमेश्वर की उपासना के लिए बनाया गया था, वह धन की पूजा का केन्द्र बन गया था। जो स्थान संसार को जीवित परमेश्वर से मिलने का बुलावा देने के लिए बनाया गया था, वह ऐसा स्थान बन गया था जो अन्यजातियों को दूर रखता था। उसे यह असहनीय लगा कि परमेश्वर के नाम और उसकी महिमा को अपमानित और कलंकित किया जा रहा था। हमें यीशु के कार्य के औचित्य पर प्रश्न उठाने की कोई आवश्यकता नहीं है। मसीह का पवित्र क्रोध लगन और पवित्रता से जल उठा। यह शिष्ट वार्ता का समय नहीं था।

यीशु को पता था कि मन्दिर का उद्देश्य क्या था। यह परमेश्वर से मिलने का स्थान था। यह पूरी पृथ्वी के लिए आनन्द का स्रोत था। लेकिन उसने वहाँ जो देखा, वह पूरी तरह इसके उद्देश्य के विपरीत था—और उसने अपने शब्दों और कार्यों से इसे पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया।

जब बाद में फरीसियों ने यीशु का सामना किया, तो उन्होंने उसके कामों को गलत नहीं ठहराया; बल्कि उन्होंने उसके अधिकार पर सवाल उठाया। जवाब में यीशु ने उलझन में डालने वाला यह कथन कहा, “इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा” (यूहन्ना 2:19)। यूहन्ना बताता है कि यीशु जिस मन्दिर की बात कर रहा था, वह उसका अपना शरीर था (पद 21)। एक दिन यीशु यरूशलेम में आने पर था, लेकिन इस बार उसका उद्देश्य मन्दिर में जाना नहीं था, बल्कि अपने शरीर और लहू को बलिदान के रूप में अर्पित करना और फिर मृतकों में जी उठना तथा सदा के लिए शासन करना था। इसी अधिकार के साथ उसने यह अन्तर स्पष्ट कर दिया कि परमेश्वर ने मन्दिर को क्या बनने के लिए निर्धारित किया था और लोगों ने उसे क्या बना दिया था।

यहाँ हमें एक ऐसा यीशु दिखता है जो समझौता नहीं करता—जो परमेश्वर की महिमा की रक्षा के लिए पूरी लगन के साथ प्रतिबद्ध है। यह यीशु कोई नम्र और दीन व्यक्ति या हर किसी को खुश करने वाला और चुनौती न देने वाला व्यक्ति नहीं है। यह महायाजक है, जो केवल मन्दिर को साफ करने नहीं, बल्कि हमारे दिलों को शुद्ध करने और उन्हें परमेश्वर से जोड़ने भी आया था। उसी के द्वारा परमेश्वर ने एक सच्चा मन्दिर, “सब देशों के लोगों के लिए प्रार्थना का घर” (यशायाह 56:7) स्थापित किया।

इसलिए यीशु को सही दृष्टि से देखें—जिसने परमेश्वर की महिमा के लिए कोई समझौता नहीं किया और सभी लोगों को सही रीति से उसकी आराधना करने में सक्षम बनाया। यीशु को सही दृष्टि से देखें—जिसने अपनी सिद्धता और अधिकार का उपयोग हमारे स्थान पर हमारे पापों की सजा सहने के लिए किया, ताकि हम बच सकें। यीशु को सही दृष्टि से देखें—जिसका अद्‌भुत अनुग्रह आपको प्राप्त हुआ है। और जैसे उसने परमेश्वर की महिमा के लिए जोश दिखाया, वैसे ही आपका दिल भी उसके लिए जोश से भरा रहे।

मत्ती 27:35-56