ArchivesAlethia4India

2 फरवरी : प्रार्थना का विशेषाधिकार

Alethia4India
Alethia4India
2 फरवरी : प्रार्थना का विशेषाधिकार
Loading
/

“वह किसी जगह प्रार्थना कर रहा था। जब वह प्रार्थना कर चुका, तो उसके चेलों में से एक ने उससे कहा, ‘हे प्रभु, जैसे यूहन्ना ने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखाया वैसे ही हमें भी तू सिखा दे।’”  लूका 11:1

प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ हमारी सहभागिता मुख्य रूप से हमारी प्रार्थनाओं के माध्यम से व्यक्त होती है। वे उसके साथ हमारे सम्बन्ध का प्रमाण देती हैं। वह न केवल अपने वचन के माध्यम से हमसे बात करता है, अपितु उसने हमें प्रार्थना में उसके साथ बात करने का अद्‌भुत विशेषाधिकार भी सौंपा है।

पवित्रशास्त्र हमें स्वयं यीशु के प्रार्थना के जीवन के कई विवरण प्रदान करता है। इन अभिलेखों से हम जितना अधिक परिचित होंगे, उतना ही अधिक हम महसूस कर सकेंगे कि यीशु प्रार्थना को एक पवित्र आदत के रूप में लेता था। वह अपने पिता के समक्ष दिन की योजनाएँ रखने के लिए नियमित रूप से सुबह-सुबह प्रार्थना करता था। शान्त और एकान्त स्थान में की गई प्रार्थनाओं ने यीशु को सक्षम बनाया कि वह भीड़ के शोर और यहाँ तक कि अपने शिष्यों के अनुरोधों से बढ़कर अपने पिता की आवाज का अनुसरण करे। वह अपने सारे निर्णय प्रार्थना की सीमाओं में रहकर ही करता था।

यीशु के प्रार्थना के नियम ने उसके चेलों को यह निवेदन करने के लिए प्रेरित कर दिया, “हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।” स्पष्ट रूप से वे प्रार्थनाओं में उसकी गहनता और एकाग्रता से इतने प्रभावित हुए कि परमेश्वर पिता के साथ ऐसी ही घनिष्ठता के लिए उनके हृदयों में भी एक भूख उत्पन्न हो गई।

उनके अनुरोध के उत्तर स्वरूप यीशु ने अपने चेलों को निर्देश दिया कि वे “बक-बक न करें” या फिर “यह न सोचें कि उनके बहुत से शब्दों के कारण उनकी सुनी जाएगी” (मत्ती 6:7)। दूसरे शब्दों में, प्रार्थना करते समय हमें बड़बड़ाने या बहुत अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत यीशु द्वारा दिए गए उदाहरण में अर्थात् प्रभु की प्रार्थना में हम पाते हैं कि परमेश्वर की आत्मिक सन्तानें परमेश्वर को सीधे-सीधे और सहज रीति से अपने स्वर्गिक पिता के रूप में सम्बोधित करने के लिए स्वतन्त्र हैं।

हमें किस बात के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? सबसे पहले तो हमें यह माँगना है कि परमेश्वर के नाम का उचित आदर हो, कि वह हमारे भीतर और हमारे आस-पास अपना राज्य लेकर आए और वह हमारी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे। हमें पश्चाताप करने की अपनी दैनिक आवश्यकता, दूसरों को क्षमा करने की आवश्यकता और प्रलोभन से बचने के लिए परमेश्वर पर अपनी निर्भरता को स्वीकारना है। यीशु ने समझाया कि अपनी प्रार्थनाओं में हमें प्रतिदिन के जीवन में परमेश्वर की महिमा और अनुग्रह को देखने का प्रयास करना है और उसी की माँग करनी है।

हमारी मसीही यात्रा में एक अर्थपूर्ण प्रार्थना के जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण और कुछ भी नहीं है। प्रार्थना के ऐसे जीवन को बनाए रखने से अधिक कठिन भी और कुछ नहीं है। किन्तु हमारे लिए सहायता उपलब्ध है। यदि परमेश्वर के दिव्य पुत्र यीशु को प्रार्थना करने की आवश्यकता थी, तो आपको और मुझे भी है। हमें दीन करने वाला यह विचार ही हमें अपने घुटनों पर ले जाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। और जब हम अपने घुटनों पर हों, तो हम अपनी प्रार्थना में सहायता के रूप में प्रभु की प्रार्थना का मुक्त रूप से उपयोग कर सकते हैं। परमेश्वर ने आपको प्रार्थना में उसके पास जाने और उसे पिता कहकर सम्बोधित करने का एक विशेषाधिकार दिया है। वह सुनने और सहायता करने के लिए तत्पर रहता है। प्रार्थना को अपनी एक पवित्र आदत बना लें और इसे एक अतिरिक्त विकल्प के तौर पर कदापि न लें।

लूका 11:1-13

2 फेब्रुवारी: पापक्षेमेचें चक्र

Alethia4India
Alethia4India
2 फेब्रुवारी: पापक्षेमेचें चक्र
Loading
/

“आणि आम्हांला आमच्या पापांची क्षमा कर, कारण आम्हींहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो; आणि आम्हांला परीक्षेत आणू नकोस.” (लूक 11:4)

मुळांत कोण कोणाला आधी क्षमा करतो?

  • एकीकडे, येशू म्हणतो, “आम्हांला आमच्या पापांची क्षमा कर, कारण आम्हींहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो.” (लूक 11:4)
  • तर दुसरीकडे, पौल म्हणतो, “प्रभूने तुम्हांला क्षमा केलीं तशी तुम्हींहि करा.” (कलस्सैकर 3:13)

जेव्हां येशू आम्हांला अशी प्रार्थना करण्यास शिकवतो कीं देवानें आम्हांला आमच्या पापांची क्षमा करावी “कारण आम्हींहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो,” तेव्हां त्याच्या म्हणण्याचा अर्थ असा नाहीं कीं क्षमा करण्याचे पहिले पाऊल आम्हीं उचललें होतें. या उलट, अर्थ असा आहे: आम्हीं ख्रिस्तावर पहिल्यांदा विश्वास ठेवला त्यावेळीच देवानें आम्हांला क्षमा केलीं (प्रेषितांची कृत्ये 10:43). मग, या भग्न झालेल्यां, आनंदी, कृतज्ञ, आमचीहि क्षमा करण्यांत आली या आशादायक अनुभवातून, आपणहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो.

ही क्षमाशील भावना असें ठळकपणे प्रकट करते कीं आपल्याला क्षमा करण्यात आली आहे जिचे फळ तारण आहे. म्हणजे, जेव्हां आम्हीं एकमेकांना क्षमा करतो तेव्हां आपल्याठायीं विश्वास असल्याचे दिसून येते; आपण ख्रिस्ताबरोंबर एकरूप झालों आहों; आमच्याठायीं दया करणारा व आम्हांला दीन अंत:करण देणारा पवित्र आत्मा वसतो.

तरी आपण वेळोवेळी पाप करतो (1 योहान 1:8, 10). म्हणून आपण वेळोवेळी ख्रिस्तानें आमच्यासाठीं केलेल्यां प्रायश्चित्ताची नव्याने आठवण ठेऊन देवाकडे वळतो – म्हणजे पुन्हा एकदा पापांची क्षमा मागतो. जर आम्हांमध्यें एकमेकांना क्षमा करणारा आत्मा वस्ती करित नसेल तर आपणहि त्याच्याकडे क्षमायाचनेची मजल मारूं शकत नाही. (मत्तय18:23-35 मधील कृतघ्न (क्षमा न करणाऱ्या) चाकराचा दाखला लक्षात ठेवा. त्याला आपले एक कोटी रुपयाचे देणें माफ केलें गेलें, तरी देखील त्यानें मात्र आपल्या  सोबतीच्या दासाला पंचवीस रुपयाचे येणें माफ करण्यांस नकार दिला. त्यानें आपल्या कृतघ्न आत्म्याद्वारें दाखवून दिलें कीं राजानें त्याच्यावर केलेल्या दयेचा त्याच्यावर कांहीहि प्रभाव पडला नव्हता.)

या मूर्खपणापासून आम्हांला वाचविण्यासाठीं येशूनें आम्हांला अशी प्रार्थना करण्यास शिकविलें कीं, “आम्हांला आमच्या पापांची क्षमा कर, कारण आम्हींहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो” (लूक 11:4). म्हणून येशू म्हणतो कीं आम्हीं यासाठीं क्षमा मागतो कारण आम्हींहि क्षमाशील आहों. हे जणूं असे म्हणणें आहे कीं, ” हे पित्या, ख्रिस्तानें जी दया माझ्यासाठीं विकत घेतलीं आहे ती माझ्यावर कायमस्वरूपी असूं दें, कारण या दयेमुळेंच मला माझे अपराध क्षमा केलें गेलें आहेंत, आणि मी सूड घेणे सोडले आहे, आणि जशी तू माझ्यावर दया केलीं आहेस तशी मीहि इतरांना दया करीन.”

देव करो कीं, देवाची क्षमा काय आहे हें तुम्हीं आज पुन्हा नव्याने जाणून घ्यावें आणि देव करो कीं तुम्हीं एकमेकांना क्षमा करून तुमच्या अंत:करणांत असलेली दया ओसंडून वाहावी. आणि तुमच्या जीवनातील कृपेचा तो गोड अनुभव तुम्हाला तुमच्या तारणाची आणखी खात्री देवो, म्हणजे असें कीं जेव्हां तुम्हीं रक्तानें विकत घेतलेल्या क्षमेचा नव्याने अनुभव घेण्यासाठीं देवाकडे जाल, तेव्हां तुम्हीं जाणून घ्यावें कीं तो तुम्हांकडे स्वतःची एक अशी संतती म्हणून पाहतो जिच्या पापांची क्षमा झाली आहे व जी स्वतःहि इतरांना त्यांचे अपराध क्षमा करते.

1 फरवरी : आनन्दपूर्ण आराधना

Alethia4India
Alethia4India
1 फरवरी : आनन्दपूर्ण आराधना
Loading
/

“निश्चय जानो कि यहोवा ही परमेश्‍वर है! उसी ने हम को बनाया, और हम उसी के हैं; हम उसकी प्रजा, और उसकी चराई की भेड़ें हैं।”  भजन संहिता 100:3

भजन संहिता की पुस्तक को हमारी आत्माओं के लिए दवा का सन्दूक भी कहा जा सकता है। हम इसमें कुचले हुओं के लिए विलाप के गीत, परीक्षाओं के समय में परमेश्वर को पुकारने तथा स्तुति और धन्यवाद की भेंटों को देख सकते हैं। जो कुछ भी आपको सताता हो, उसके लिए भजन संहिता में आपको मरहम मिल जाएगा।

स्तुति के भजनों में विशेष रूप से यह मूलभूत सत्य गुथा हुआ है कि यहोवा ही परमेश्वर है और हम उसी के हैं। परमेश्वर के लोगों के रूप में हमारा अस्तित्व ही इस बात का संकेत है कि वह कौन है। एक समय हम कुछ भी नहीं थे, परन्तु अब हम परमेश्वर की प्रजा हैं। एक समय हम पर दया नहीं हुई थी, परन्तु अब हम पर प्रतिदिन दया होती है (1 पतरस 2:10)।

मूल बात यह है कि हम अपने नहीं हैं। न ही कभी थे। हम एक सामर्थी सृष्टिकर्ता द्वारा निर्मित उसके स्वरूप को धारण करने वाले प्राणी हैं। वह कुम्हार है, जिसने हमें बनाया है और “हम उसके हैं।” इसके अतिरिक्त, हम छुटकारा पाए हुए पापी हैं, जिन्हें एक प्रेमपूर्ण उद्धारकर्ता द्वारा “दाम देकर मोल लिया गया है” (1 कुरिन्थियों 6:20)। वह ऐसा चरवाहा है, जिसने हमारे लिए अपना प्राण दिया और अब हमारी रखवाली करता है (यूहन्ना 10:11-15) और “हम उसके हैं।” हमें दो बार दाम देकर मोल लिया गया, एक बार सृष्टि के सृजन में और दूसरी बार छुटकारे के काम में, और हम उसके हैं।

इस कारण प्रभु यीशु मसीह में हमारे पास अब जो अवसर है, वह गर्व करने का नहीं परन्तु स्तुति करने का अवसर है। यह जानना कि यहोवा ही परमेश्वर है और हम उसी के हैं, हमें उसकी स्तुति करने और उसको धन्यवाद देने के लिए प्रेरित करेगा (भजन संहिता 100:3)।

जो कुछ अनमोल होता है, उसकी प्रशंसा किया जाना एक स्वाभाविक बात होती है। जिस वस्तु को लोग बहुमूल्य समझते हैं, वे स्वाभाविक रूप से उसकी प्रशंसा करते हैं। परमेश्वर हमारा रचयिता है और हमें छुटकारा दिलाने वाला है और इसलिए वह हमारी प्रशंसा पाने का अधिकारी और स्तुति के योग्य है। उससे अधिक कोई भी और कुछ भी आपकी स्तुति के योग्य नहीं है।

हमारी असामान्य परिस्थितियों में भी हमारे पास परमेश्वर की स्तुति करने के पर्याप्त कारण होते हैं, क्योंकि वह परमेश्वर है। अपने किसी प्रिय जन को खो देने पर या अपनी सांसारिक सुख-सुविधाएँ प्रदान करने वाली किसी नौकरी को खो देने पर भी हम उसकी स्तुति करने का चयन कर सकते हैं। जब हमारी आवाज़ आँसुओं के कारण रुकने लगे, जब हमारे दिल हमें निराश करने लगें, जब हमारी परिस्थितियाँ हमें निष्फल कर दें, जब जीवन हमें हतोत्साहित कर दे, तब भी उसकी “करुणा” जो “सदा के लिए” है (भजन संहिता 100:5), उसमें हम परमेश्वर में आनन्दपूर्ण आराधना और आभार से भरी स्तुति के लिए अन्तहीन कारण ढूँढ सकते हैं। वह सदैव आपका सामर्थी सृष्टिकर्ता और प्रेमी उद्धारकर्ता है।

एक मसीही व्यक्ति की विशिष्ट पहचान उसका आभार से भरा हृदय होता है। आज यह आपकी भी पहचान बन जाए।

भजन संहिता 148

1 फेब्रुवारी : करारांत सामावून घेतलेलें

Alethia4India
Alethia4India
1 फेब्रुवारी : करारांत सामावून घेतलेलें
Loading
/

तेथें दाविदाच्या शृंगास अंकुर फुटेल असे मी करीन; मी आपल्या अभिषिक्तासाठीं दीप मांडला आहे. मी त्याच्या वैर्‍यांस लज्जेने वेष्टित करीन; पण त्याच्या शिरीं त्याचा मुकुट झळकेल.” (स्तोत्र 132:17-18)

देवानें दाविदाला दिलेल्या अभिवचनांचा लाभ कोणाला होईल?

आपण स्तोत्र 132:17-18 पुन्हा वाचूं: “तेथें दाविदाच्या शृंगास अंकुर फुटेल असे मी करीन; मी आपल्या अभिषिक्तासाठीं दीप मांडला आहे. मी त्याच्या वैर्‍यांस लज्जेने वेष्टित करीन; पण त्याच्या शिरीं त्याचा मुकुट झळकेल.”

आता त्याची यशया 55:1,3 बरोंबर सांगड घाला, “अहो तान्हेल्यांनो, तुम्हीं सर्व जलाशयाकडे या, जवळ पैका नसलेले तुम्हीं या; सौदा करा, खा! . . . आणि मी तुम्हांबरोबर सर्वकाळचा करार करीन, म्हणजे दाविदाला देऊ केलेले अढळ प्रसाद तुम्हांला देईन.”

वधस्तंभाच्या या बाजूने, म्हणजे ख्रिस्ताचे मरण, पुरले जाणें, व पुनरुत्थानाच्या घटनांनंतर, मी त्या वचनाचा अर्थ असा घेईन: जो कोणी देवाकडे पुत्राच्या म्हणजे येशू ख्रिस्ता द्वारे येतो, आणि आपण कोण आहोत किंवा आपण काय करतो यावर विसंबून न राहता, ख्रिस्तामध्ये देवा बरोबर आपले जे नाते जुळले आहे ती तहान भागविण्यासाठीं येतो, देव त्याच्याशी एक करार करील.

प्रकटीकरण 22:17 मध्ये बायबलचा शेवट कसा होतो हे तुमच्या लक्षात आहे का? “तान्हेला येवो;’ ज्याला पाहिजे तो ‘जीवनाचे पाणी फुकट’ घेवो.” हे अभिवचन केवळ यशयाच्या काळातील यहुदी मनुष्यासाठीं नव्हतें. हे अभिवचन त्या प्रत्येकासाठीं आहे जो आपल्या आत्म्याची तहान भागवण्यासाठीं ख्रिस्ताकडे येतो. “मी [त्याच्याशी] सर्वकाळचा करार करीन!”

कोणता करार? हा तो करार आहे ज्याचे मूळ देवानें “दाविदाला देऊ केलेले अढळ प्रसाद” यां अभिवचनामध्ये आहे आणि जो सर्वकाळासाठीं स्थिर आहे. यशया 55: 3, “आणि मी तुमच्याबरोबर सर्वकाळचा करार करीन, म्हणजे दाविदाला देऊ केलेले अढळ प्रसाद तुम्हांला देईन.” मी याचा अर्थ असा घेतो कीं दाविदासोबत केलेल्या करारात माझाहि समावेश आहे. दाविदाला जे मिळेल ते मलाहि ख्रिस्त येशूमध्ये मिळेल.

आणि त्यात कोणत्या गोष्टींचा समावेश आहे?

माझ्यासाठीं शृंगातून अंकुर फुटेल. म्हणजेच, एक महासामर्थ्य माझ्यासाठीं लढा देईल आणि माझे रक्षण करेल. माझ्यासाठीं देवानें मांडलेला दीप उदयांस येईल. म्हणजेच माझ्या चोहींकडे प्रकाश असेल आणि यापुढे अंधकाराची सत्ता माझ्यावर चालणार नाही. माझ्या शिरीं एक मुकुट झळकेल. म्हणजे, मी दाविदाच्या पुत्रासोबत राज्य करीन आणि त्याच्यासोबत त्याच्या राजासनावर बसेन. “जो विजय मिळवतो त्याला मी आपल्या राजासनावर आपल्याबरोबर बसू देईन” (प्रकटीकरण 3:21).

दाविदाला जे अभिवचन देण्यांत आलें त्याचा लाभ आपल्याला देखील व्हावा ही गोष्ट आम्हांला आश्चर्याने भारावून टाकणारी आहे. आणि देव खरेंच आम्हांला थक्क करूं इच्छितो. देवाची इच्छा आहे कीं आजचे आपले हे मनन संपण्यापूर्वी आपण तें सामर्थ्य आणि अधिकार आणि खात्री पाहून ज्यां द्वारें त्यानें आपल्यावर प्रीति केलीं, चकित व्हावें.

26 जनवरी : जब कुछ भी आपके अनुसार न हो रहा हो

Alethia4India
Alethia4India
26 जनवरी : जब कुछ भी आपके अनुसार न हो रहा हो
Loading
/

सब प्रकार की कड़वाहट, और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा, सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए।”  इफिसियों 4:31

हममें से सब तो नहीं किन्तु अधिकांश लोग जानते हैं कि यह सोचते हुए सवेरे उठना कैसा होता है कि जीवन बिल्कुल भी वैसा नहीं है जैसा हम चाहते हैं। हो सकता है कि आज सवेरे उठने पर आपको भी ऐसा लगा हो। हो सकता है कि शारीरिक रूप से, भावनात्मक रूप से, सम्बन्धों में, आर्थिक और आत्मिक रूप से भी हम कठिन दिनों का सामना कर रहे हों और इसके परिणामस्वरूप हम निराश हो सकते हैं। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?

ऐसे में सबसे सहायक तरीकों में एक है सबसे पहले परमेश्वर से आत्मिक परेशानी के तीन शक्तिशाली स्रोतों से सुरक्षा के लिए प्रार्थना करना, जो कड़वाहट, आक्रोश और आत्म-दया नामक ऐसी स्थितियाँ हैं, जो कोई भी आरम्भिक चेतावनी दिखाए बिना मृत्यु का कारण बन सकती हैं। । ये तीनों धीरे-धीरे हमारे विश्वास का गला घोंट देंगी और उन लोगों के प्रति ईर्ष्या और द्वेष के रूप में बढ़ने लगेंगी जिनके पास वह सब है जो हम चाहते हैं। इसलिए हमारे सामने खड़ी परिस्थितियों में, जो प्रायः केवल हमें और परमेश्वर को ही पता होती हैं, निष्ठुर आत्माओं के विपरीत कोमल हृदय के साथ प्रत्युत्तर देने में हमें परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता होती है।

इफिसुस के विश्वासियों को लिखे अपने पत्र में पौलुस ने उन्हें प्रोत्साहित किया, अपितु यह आज्ञा दी कि वे सारी कड़वाहट, प्रकोप और क्रोध को अपने से दूर करें। यद्यपि यह कहना तो सरल है, किन्तु करना कठिन है, फिर भी पौलुस की यह आज्ञा अपने आप में बहुत स्पष्ट है। वास्तव में, परमेश्वर के वचन में कहीं भी ऐसी कोई आज्ञा नहीं है जिसका हम पालन न कर सकें, चाहे वह कितनी भी कठिन क्यों न लगे, क्योंकि परमेश्वर जो आज्ञा देता है, उसके लिए हमें सशक्त भी बनाता है। इसलिए यदि वह कहता है कि इस काम को करना छोड़ दो,  तो आप और मैं निश्चिन्त हो सकते हैं कि वह हमारे जीवनों में उसके निमित्त आत्मा का सामर्थ्य भी दे सकता है, जिससे हम वह कर सकें जो उसने आज्ञा दी है। जब हम अपने हृदयों में कड़वाहट, आक्रोश या आत्म-दया भरकर जीते हैं, तो उसका दोषी हमें केवल अपने आप को ही ठहराना चाहिए। मैं जितना भी चाहूँ, उसका दायित्व मैं परमेश्वर पर नहीं डाल सकता।

हन्ना एक ऐसी महिला थी, जो यह तर्क दे सकती थी कि उसकी परिस्थितियों के कारण इन तीनों विषैली भावनाओं का होना तर्कसंगत था। उसकी कहानी को हम 1 शमूएल के आरम्भ में पढ़ते हैं। वह इनमें से प्रत्येक भावना के साथ जूझती होगी, जब प्रत्येक माह के बीतने पर भी वह गर्भवती न हो सकी और जब वह प्रतिदिन अपने पति की दूसरी पत्नी के ताने सुनती होगी और परमेश्वर द्वारा उस स्त्री को दिए गए बच्चों को देखती होगी। परन्तु उसने अपनी निराशा और उदासी के साथ कुछ अच्छा किया, उसने प्रार्थना की। उसने परमेश्वर को अपने हृदय की सारी वेदना बताई। और यह जानते हुए कि उसकी बात सुन ली गई है, वह शान्ति के साथ चली गई। यद्यपि उस समय तक उसका शरीर अभी भी बाँझ था और उसकी परिस्थितियाँ बदली नहीं थीं, फिर भी उसकी आत्मा को उसके स्वर्गिक पिता ने उन्मुक्त कर दिया था।

परमेश्वर ने हन्ना को कड़वाहट, आक्रोश और आत्म-दया रूपी मूक हत्यारों से बचाया और वह हमारी भी उसी प्रकार रक्षा करेगा। तो फिर यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हुए, कि आपका जीवन वैसा ही चले जैसा आप चाहते हैं, आपको रात में जागते रहने की आवश्यकता नहीं है। और आपको अनचाही परिस्थितियों से भरे एक और दिन में जागने पर उस अप्रिय एहसास से प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, आप अपने हृदय के प्रश्नों को और अपनी समझ से बाहर की परिस्थितियों को परमेश्वर की देखभाल में दे देने के महत्त्व को सीखने के लिए इन अवसरों का उपयोग कर सकते हैं, क्योंकि यही वह स्थान हैं जहाँ इन्हें वास्तव में होना चाहिए।

1 शमूएल 1

25 जनवरी : अनुग्रह में बने रहें

Alethia4India
Alethia4India
25 जनवरी : अनुग्रह में बने रहें
Loading
/

“उनमें से कुछ . . . यूनानियों को भी प्रभु यीशु के सुसमाचार की बातें सुनाने लगे . . . बहुत लोग विश्वास करके प्रभु की ओर फिरे। जब उनकी चर्चा यरूशलेम की कलीसिया के सुनने में आई, तो उन्होंने बरनबास को अन्ताकिया भेजा। वह वहाँ पहुँचकर और परमेश्वर के अनुग्रह को देखकर आनन्दित हुआ, और सब को उपदेश दिया कि तन मन लगाकर प्रभु से लिपटे रहो।”  प्रेरितों के काम 11:20-23

“अपने आश्चर्यकर्मों को करने के लिए परमेश्वर रहस्यमय तरीके से कार्य करता है।”[1] आरम्भिक कलीसिया के समय में यरूशलेम की मण्डली अथवा उस समय पृथ्वी पर की एकमात्र कलीसिया का सताव ही वह कारण था, जिसने सुसमाचार के सन्देश को अधिक दूर और तीव्रता से पहुँचाया। आरम्भिक मसीही लोगों को उनके नगर से भागने के लिए बाध्य किए जाने के बिना ऐसा नहीं हो सकता था। जब विश्वासी तितर-बितर होकर फिनीके, साइप्रस और अन्ताकिया के शहरों तक पहुँचे, तो सुसमाचार उस क्षेत्र में “यूनानी भाषा बोलने वालों” अर्थात यूनानियों तक पहुँच गया और कई लोग विश्वास करने लगे।

परन्तु जब इन गैर-यहूदी लोगों के हृदय परिवर्तन हो जाने का समाचार यरूशलेम में कलीसिया में पहुँचा, तो इस समाचार का तुरन्त स्वागत नहीं किया गया। उस समय तक सुसमाचार का विस्तार लगभग पूरी तरह से यहूदियों के मध्य ही हो सका था। अब यह समाचार मिल रहा था कि यूनानी लोग भी मसीही बन रहे थे। इससे कलीसिया को एक नए विस्तार का सामना करना पड़ा, जिसके लिए वे बिल्कुल तैयार नहीं थे। यह सब क्या हो रहा था? उन्हें इसके बारे में खुश होना चाहिए था या इस पर क्रोधित होना चाहिए था? इस तरह की परिस्थिति को सम्भालने के लिए वे किसको भेज सकते थे?

हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उन्होंने बरनबास को भेजने का निर्णय लिया। जबकि कलीसिया में प्रत्येक व्यक्ति नए और अलग-अलग अवसरों का उपयोग करने में सक्षम नहीं होता, वहीं बरनबास एक प्रोत्साहनकर्ता और एक ऐसा व्यक्ति था, जो दूसरों में परमेश्वर के छुटकारे के कार्य को पहचानता था, तब भी जब वे विचित्र या अनोखे लगते थे (प्रेरितों के काम 9:26-28 देखें)। निश्चित रूप से बरनबास इस बात को समझता था कि जो कुछ हुआ था वह प्रभु का कार्य था और वह परमेश्वर के अनुग्रह के इस प्रदर्शन से खुश था। नए विश्वासियों को वह ऐसे सम्बोधन के साथ प्रोत्साहित कर रहा था, जिसकी हम सभी को आवश्यकता है, अर्थात यह कि अनुग्रह में बने रहो और अपने पूरे हृदय से परमेश्वर के प्रति सच्चे रहो।

यदि हमने परमेश्वर के आत्मा को अपने स्वयं के संकरे मार्गों में प्रवाहित करने का प्रयास करते हुए अपना जीवन जीया है और यह सोचते आए हैं कि यह रास्ता या वह स्थान ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ परमेश्वर काम करेगा, तो हमें पुनर्विचार करना चाहिए। जैसे-जैसे परमेश्वर अपने राज्य का विस्तार करता जाता है और अपने आत्मा को उन लोगों पर उण्डेलने लगता है, जिनके होने की हम कम से कम अपेक्षा कर रहे होते हैं, तब हमारे पास उस उत्साह के साथ प्रत्युत्तर करने का अवसर होता है, जिसका उदाहरण बरनबास ने दिया। जबकि सुसमाचार का सन्देश तो अपरिवर्तनीय है, फिर भी, हमारा संसार और समय निरन्तर बदलते रहते हैं। उसके बाद भी परमेश्वर लोगों को “हर एक जाति और कुल और लोग और भाषा में से” अपने पास आने का बुलावा देता रहता है (प्रकाशितवाक्य 7:9)। हमारी उससे यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वह हमें आश्चर्यचकित कर देगा और वह ऐसे तरीकों से काम करेगा जिनके बारे में हमने सोचा भी नहीं था और वह भी एक ऐसी समय-सीमा में, जो हमारी समय-सीमा से अलग होगी। और जब वह ऐसा करे तो हमें बरनबास की तरह बनने के लिए तैयार रहना चाहिए जो “पवित्र आत्मा और विश्वास से परिपूर्ण था” (प्रेरितों के काम 11:24)। और जो परमेश्वर के नए कार्यों में आनन्दित होता, उनका हिस्सा बनने के लिए तैयार रहता और दूसरों को उसके अनुग्रह में बने रहने के लिए प्रोत्साहित करता था।

प्रेरितों के काम 10:1-48

24 जनवरी : दाता को लौटाना

Alethia4India
Alethia4India
24 जनवरी : दाता को लौटाना
Loading
/

मैं क्या हूँ और मेरी प्रजा क्या है कि हम को इस रीति से अपनी इच्छा से तुझे भेंट देने की शक्ति मिले? तुझी से तो सब कुछ मिलता है, और हम ने तेरे हाथ से पाकर तुझे दिया है।”  1 इतिहास 29:14

कुछ समय पहले हमारी कलीसिया के कुछ कर्मचारियों ने कलीसिया के भवन की प्रत्येक वस्तु पर एक स्टिकर लगाने का निर्णय लिया, जिसमें लिखा था, “यह पार्कसाइड चर्च की सम्पत्ति है।” पहले तो मैंने सोचा कि क्या हम यह आशा कर रहे हैं कि कोई व्यक्ति जो कचरे का डिब्बा चुराना चाहता होगा वह रुकेगा, स्टिकर पढ़ेगा और अनायास ही उसे वापस करने का निर्णय ले लेगा। यह बहुत ही बेकार का काम लग रहा था। तथापि मुझे जल्द ही पता चल गया कि मुझे सच में वस्तुओं पर इन छोटे स्टिकरों को देखकर आनन्द आने लगा था, जिन पर लिखा था, “यह कलीसिया की सम्पत्ति है”!

परमेश्वर के स्वामित्व और अनुग्रहपूर्ण प्रावधान के स्मृति चिह्न पूरे पवित्रशास्त्र में गूंजते हैं। जब राजा दाऊद मन्दिर के लिए योजना बनाने में लगा था तब उसने परमेश्वर के प्रावधान के बारे में स्पष्टता और दीनता के साथ स्वीकारा; वह जानता था कि एक सृजित संसार में सृजित प्राणियों के रूप में हम अपने सृष्टिकर्ता को केवल वही दे सकते हैं, जो हमें हमारे सृष्टिकर्ता ने पहले से हमें दिया है। नए नियम में भी प्रेरित पौलुस यह लिखता है, “तेरे पास क्या है जो तू ने (दूसरे से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (दूसरे से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया?” (1 कुरिन्थियों 4:7)।

दाऊद के शब्द परमेश्वर के लोगों के लिए कोई नई अन्तर्दृष्टि प्रदान नहीं कर रहे थे। पीढ़ियों पहले जब इस्राएली परमेश्वर का निवास-स्थान बनाने की तैयारी कर रहे थे, तब मूसा ने इस्राएलियों को निर्देश दिया था, “तुम्हारे पास से यहोवा के लिए भेंट ली जाए” (निर्गमन 35:5)। और उनके पास था क्या? केवल वही तो था जो सृष्टिकर्ता द्वारा दिया गया था। केवल वही, जो उनको छुटकारा दिलाने वाले ने मिस्र से उनके निकलने के समय उन्हें दिया था (निर्गमन 12:35-36)। केवल वही था जो उनके जीवन के पालनहार ने उनके लिए सम्भव बनाया था (निर्गमन 35:30-35)।

कलीसिया की सम्पत्ति की तरह ही, जिस पर अब उसके नाम की परची लगी थी, हम कह सकते हैं कि हमारे पास जो कुछ भी है, निस्सन्देह सृष्टि की प्रत्येक वस्तु परमेश्वर के नाम की परची के साथ मुहरबन्द है। एक प्रभावशाली ईश्वर-विज्ञानी अब्राहम काइपर ने, जिन्होंने 20वीं सदी के आरम्भ में नीदरलैंड के प्रधानमंत्री के रूप में भी काम किया, कहा, “हमारे मानव अस्तित्व के पूरे शासन-क्षेत्र में एक भी इंच ऐसा नहीं है जिसके विषय में मसीह, जो सब  पर सम्प्रभु है, चीखकर यह न कहता हो कि यह ‘मेरा’ है।”[1]

यह दृष्टिकोण हमारी समकालीन संस्कृति से बहुत अलग है, जिसका झुकाव इन दो गलत धारणाओं की ओर जाता है कि या तो हम स्व-निर्मित लोग हैं या फिर पृथ्वी पर सब कुछ, जिसमें हम स्वयं भी हैं, ईश्वर है। बाइबल इसका विरोध करती है और कहती है, “पृथ्वी और जो कुछ उस में है यहोवा ही का है, जगत और उसमें निवास करने वाले भी” (भजन संहिता 24:1)।

जबकि हम यह स्मरण रखते हैं कि हमारे पास जो कुछ भी है वह सब उसी से आया है, इस कारण परमेश्वर हमें दीनता के साथ चलने का बुलावा दे रहा है। हमारे जीवनों से यह घोषणा होनी चाहिए, “मैं परमेश्वर का हूँ!” आपके पास परमेश्वर को देने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पहले से ही उसका नहीं है। इसलिए जैसे भी परमेश्वर आपको निर्देश देता है, उसके अनुग्रह के प्रत्युत्तर स्वरूप स्वेच्छा से और उदारता से दें,  चाहे वह आपका धन हो, आपका समय हो या आपके कौशल।

     2 कुरिन्थियों 8:1-15

23 जनवरी ;प्रभु का काम

Alethia4India
Alethia4India
23 जनवरी ;प्रभु का काम
Loading
/

“वचन में या काम में जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।”  कुलुस्सियों 3:17

आज आपको और मुझे करने के लिए एक काम दिया गया है।

कुरिन्थियों को लिखे अपने पहले पत्र में जब प्रेरित पौलुस ने कलीसिया को आदेश दिया कि वे तीमुथियुस का अपने बीच तन्मयता से स्वागत करें, तो ऐसा इसलिए नहीं था कि तीमुथियुस अपना नाम करने का प्रयास कर रहा था, या उसके पास कोई विशेष सम्मान या उपाधि थी, या वह उल्लेखनीय बनने का इच्छुक था। कदापि नहीं, यह केवल इसलिए था क्योंकि तीमुथियुस “प्रभु का काम करता था” (1 कुरिन्थियों 16:10)।

प्रभु के काम में वह सब शामिल है, जिसको करने के हम इच्छुक हैं या अपने मन को केन्द्रित करते हैं और जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है, और जो हम दूसरों को प्रभावित करने के बजाय प्रभु के लिए करते हैं (कुलुस्सियों 3:23)। यह मसीह की देह के भीतर या हमारे आस-पास के संसार की सेवा के रूप में किया जाने वाला कोई भी काम हो सकता है।

पौलुस ने एक उद्देश्य के साथ पद 17 में “जो कुछ भी करो” वाक्यांश को जोड़ा है। मसीही सेवा में “जो कुछ भी” का अर्थ है कि हमारे सभी प्रयासों में पवित्र आत्मा की सहायता से हमें सुसमाचार के सेवाकार्य में प्रभावी रूप से लगे होने के लिए अपने आप को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। भले ही हम किसी पड़ोसी की सहायता कर रहे हों, हमारी कलीसिया के दरवाजे से आने वाले आगंतुकों का अभिवादन कर रहे हों, या समुदाय में स्वयंसेवक के रूप में कार्य कर रहे हों, प्रत्येक सेवा दूसरों को हमारे उद्धारकर्ता के बारे में साक्षी देने का एक अवसर है। यह जानना कितने विशिष्ट आदर की बात है कि हमें यहाँ पृथ्वी पर अविश्वासी लोगों को यीशु मसीह के प्रतिबद्ध अनुयायी बनते देखने के लिए रखा गया है!

मसीह की देह के भीतर हमें यह समझना चाहिए कि हमारा आत्मिक विकास प्रभु के प्रति दूसरों की सेवा का परिणाम है। पौलुस ने कुरिन्थियों को मसीह के नाम पर अपने श्रम के परिणाम के रूप में उचित रीति से देखा और यह लिखा कि “क्या तुम प्रभु में मेरे बनाए हुए नहीं?” (1 कुरिन्थियों 9:1)। कुरिन्थुस में कलीसिया का अस्तित्व इसी तथ्य के कारण था कि वह प्रभु का काम कर रहा था। पौलुस न तो निष्फल था और न ही विशेष; इसके विपरीत, वह उद्देश्यपूर्ण रूप से एक विशिष्ट जिम्मेदारी के लिए नियुक्त किया गया था।

मसीहियों के रूप में हमें केवल बैठकर सीखने का नहीं अपितु विकसित होने तथा जाने का, और मछली पकड़ने तथा खिलाने का बुलावा मिला है। परमेश्वर प्रत्येक विश्वासी को मसीही सेवाकार्य और सेवा के अन्तर्गत विशेष जिम्मेदारियाँ सौंपता है और उन जिम्मेदारियों में आज हमारे सामने आने वाली परिस्थितियों और अवसरों में उसके लिए काम करना शामिल है; क्योंकि वे संयोग मात्र से नहीं परन्तु ईश्वरीय योजना द्वारा प्राप्त होती हैं। पौलुस ने परमेश्वर की बुलाहट के प्रति अपनी आज्ञाकारिता के द्वारा इसे हमारे लिए सराहनीय रूप से प्रस्तुत किया है, यह पहचानते हुए कि वह “चुना हुआ पात्र” था, जो “अन्यजातियों और राजाओं और इस्राएलियों के सामने” परमेश्वर का नाम प्रकट करने वाला था (प्रेरितों के काम 9:15)।

प्रभु का काम वह काम था जिसे पौलुस ने गम्भीरता से लिया। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। हम सभी को, चाहे हम जहाँ कहीं भी हों, परमेश्वर का आदर करने का बुलावा दिया गया है। इस पर विचार करें कि आपके सोचने और काम करने के तरीके में क्या बदलाव आ सकता है, यदि आप प्रति क्षण अपने आप से पूछें कि “अब, यीशु मुझसे इस परिस्थिति में क्या करवाना चाहता है? मैं इस क्षण में उसके नाम की स्तुति कैसे कर सकता हूँ और उसे कैसे प्रसन्न कर सकता हूँ?” आज आपके पास उसके लिए काम करने का विशेषाधिकार है।

भजन संहिता 127

22 जनवरी : तूफानों के आने पर

Alethia4India
Alethia4India
22 जनवरी : तूफानों के आने पर
Loading
/

“तब बड़ी आँधी आई, और लहरें नाव पर यहाँ तक लगीं कि वह पानी से भरी जाती थी। पर वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था। तब उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, ‘हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?’ तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, ‘शान्त रह, थम जा!’ और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया।”  मरकुस 4:37-39

जो व्यक्ति काफी जीवन जी चुका है, वह जानता है कि जीवन में तूफान अवश्य आएँगे। कभी-कभी, पता नहीं कहाँ से, कभी अचानक हमें नौकरी छूट जाने, किसी भयानक बीमारी का पता लगने, किसी प्रियजन की दुखद मृत्यु का या किसी के चले जाने के दुख का सामना करना पड़ता है। गलील की झील पर तूफान में फँसे चेलों की तरह हम भी इन परीक्षाओं से पूरी तरह पराजित महसूस कर सकते हैं, मानो हमारी नाव डूब रही हो।

यीशु के पीछे चलने से हम जीवन के तूफानों से बच तो नहीं जाते, किन्तु हम यह जानते हुए विश्राम अवश्य पा सकते हैं कि परमेश्वर हमें इनमें स्थिर रखने की प्रतिज्ञा करता है। वह हमारे हृदयों को शान्त कर सकता है और वह तूफानों को भी शान्त कर सकता है।

जब तूफान आते हैं तो हम प्रायः परमेश्वर पर सन्देह करने के लिए प्रलोभित हो जाते हैं। चेलों ने भी यीशु से प्रश्न पुछा, भले ही उन्होंने उसके चमत्कारों को प्रत्यक्ष रूप से देखा था। उन्होंने यीशु को आमने-सामने देखा था और वे प्रतिदिन उनके साथ खाना खाते थे, किन्तु जब तूफान आया तो वे अविश्वास के आतंक में डूब गए, मानो वे भूल गए हों कि वह कौन था या वह क्या करने में सक्षम था। क्या हम प्रायः अपने आप को भी ऐसी ही परिस्थिति में नहीं पाते हैं? जैसे ही उतार-चढ़ाव आते हैं, जैसे ही जीवन की आँधियाँ और लहरें उठने लगती हैं, हमारे सन्देह और निर्बलताएँ फूट पड़ती हैं, हम भूल जाते हैं कि हमारे भीतर कौन रहता है और वह क्या करने में सक्षम है।

परमेश्वर तूफानों को आने से रोकता नहीं है। किन्तु वह एक ऐसा परमेश्वर है, जो उन तूफानों के मध्य में उपस्थित रहता है और उन पर सम्प्रभुता रखता है। यीशु न केवल बड़ी आँधी आने के समय चेलों के साथ रहा, अपितु उसने उसे शान्त करके अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन भी किया। परमेश्वर होने के नाते उसने स्वयं उस समुद्र को रचा था। वह समुद्र उसके लिए क्या ही समस्या ठहरेगा? हमारे लिए भी, यहाँ तक कि ऐसी परिस्थितियाँ भी जो निराशाजनक और दुर्गम लगती हैं, हमारे लिए वही सामने लेकर आती हैं जो उसकी योजना है। जब कठिनाइयाँ, डर और कष्ट बने रहें, उन समयों में भी हम उस पर भरोसा कर सकते हैं कि वह हमें ऐसी शान्ति देगा जो “सारी समझ से परे है” (फिलिप्पियों 4:7) और हमें शान्ति के स्थान पर ले आएगा, चाहे वह इस जीवन में आए या केवल मृत्यु के अन्तिम तूफान के बाद।

तो फिर, प्रश्न यह नहीं है कि “क्या मेरे जीवन में तूफान आएँगे?” यह तो निश्चित है कि वे आएँगे। इसके विपरीत, हमें यह पूछना चाहिए कि “जब तूफान आएँगे तो क्या मैं विश्वास करूँगा कि यीशु मसीह उनसे निपटने में सक्षम है, और क्या मैं उसे ऐसा करने दूँगा?” वह हमारे मनों में छाए सन्देह के बादलों को हटा सकता है। वह टूटे हुए दिलों को जोड़ सकता है। वह प्रेम के लिए हमारी लालसा को शान्त कर सकता है। वह थकी हुई आत्माओं को सजीव कर सकता है। वह व्याकुल आत्माओं को शान्ति प्रदान कर सकता है।

यीशु को जगत के सृष्टिकर्ता के रूप में देखने पर, जिसने समुद्र को शान्त किया, और जिसमें सब कुछ स्थिर बना रहता है, आप भी तूफान के शान्त हो जाने का अनुभव कर सकते हैं।

 मरकुस 4:35-41

21 जनवरी : किसी अन्य देश के नागरिक

Alethia4India
Alethia4India
21 जनवरी : किसी अन्य देश के नागरिक
Loading
/

“क्योंकि बहुत से ऐसी चाल चलते हैं, जिनकी चर्चा मैंने तुम से बार-बार की है, और अब भी रो रोकर कहता हूँ कि वे अपनी चाल–चलन से मसीह के क्रूस के बैरी हैं। उनका अन्त विनाश है, उनका ईश्वर पेट है, वे अपनी लज्जा की बातों पर घमण्ड करते हैं और पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाए रहते हैं। पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं। वह अपनी शक्ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन–हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा।  फिलिप्पियों 3:18-21

“हम यहाँ के नहीं हैं।” पहली सदी के यूनानी शहर फिलिप्पी के निवासियों ने भी, यहाँ तक कि वहाँ पैदा हुए लोगों ने भी यही कहा होगा, क्योंकि वे रोमी कानून के अनुसार रहते थे, रोमी वस्त्र पहनते थे और अपने दस्तावेज प्राचीन रोमी भाषा में लिखते थे। वे रोमी नागरिक थे। वह पूरी जगह रोम के जैसी दिखती थी किन्तु वह रोम था नहीं। फिलिप्पी के नागरिक यूनान में थे परन्तु रोम के नागरिक के रूप में रह रहे थे।

पौलुस ने उनसे कहा कि मसीही होना ठीक ऐसा ही है। हम मसीही राजधानी से दूर रहते हुए भी मसीही जीवन जी रहे हैं। आपको यह जानकर राहत मिलेगी कि वाशिंगटन डीसी या लन्दन नहीं है! वास्तविक “सदन की सीढ़ियाँ” इससे कहीं अधिक ऊँची और कहीं अधिक भव्य हैं। हमारी नागरिकता स्वर्ग की है और जब हम यहाँ पर परदेशी होकर रहते हैं, ऐसे लोगों के रूप में जो यहाँ के नहीं हैं, तो हम अपने आस-पास के संसार में परिवर्तन लेकर आएँगे।

मसीहियों के रूप में हमें प्रतिदिन यह महान अवसर मिलता है कि हम एक और दिन अलग दिखाई दें, अर्थात वैसे जीएँ जैसे हम वास्तव में हैं, अर्थात स्वर्ग के नागरिक, ऐसे लोग जो यहाँ के नहीं हैं। हम लोगों को हमारे बारे में ऐसे कहते हुए पाएँ, “अरे, मैं तुम्हारे जीवन जीने के तरीके और बात करने के तरीके से बता सकता हूँ कि तुममें कुछ अलग है।” इसका अर्थ यह है कि जब आप अपने जीवन के बारे में सोचते हैं, तो आपको अपने आप से कुछ प्रश्न पूछने की आवश्यकता है, जैसे कि, मेरी भक्ति का उद्देश्य क्या है, वह कौन सी बात है जो मुझे प्रेरित करती है और मेरे अस्तित्व को निर्मित करती है? क्या यह मेरा रूप है? क्या यह मेरा पद है? क्या यह मेरी इच्छाएँ और खुशियाँ है? मैं किस लिए जी रहा हूँ?

बाइबल चेतावनी देती है कि यदि हम “पाप में थोड़े दिन के सुख” के लिए जीते हैं (इब्रानियों 11:25), तो अन्ततः वे हमें खा जाएँगे और हमारे जीवन का अन्त कर देंगे। इसके विपरीत हमें भविष्य की महिमा की आशा में जीना चाहिए। वह समय आ रहा है, जब हमारा रूपान्तर होगा; हमारे पास “उसकी महिमामय देह के समान” नए शरीर होंगे। हमारे स्वर्गिक शरीर पाप, स्वार्थ-पूर्ण अभिलाषाओं के कारण या शक्ति के क्षीण होने के द्वारा फिर दुर्बल नहीं होंगे। हम एक दिन घर पहुँच जाएँगे, और यह बहुत अद्‌भुत होने वाला है!

यदि लोगों को आपके जीवन से ऐसा लगता है और आपकी बातचीत से पता चलता है कि आपके पास स्वर्ग की नागरिकता है, कि आप एक जीवित परमेश्वर की सेवा करते हैं, और आप अपने घर जाने की आतुरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं जहाँ आपका जीवन पूरी तरह से बदल जाएगा, तो आज नहीं तो कल उनमें से कुछ लोग आप से अवश्य पूछेंगे कि आप उन्हें “अपनी आशा का कारण” बताएँ (1 पतरस 3:15)।

इसलिए इस बात को स्मरण रखें कि आप कहाँ से हैं। परमेश्वर की अधीनता में सुसमाचार का प्रभाव सीधे-सीधे मसीह के समान जीने की आपकी इच्छा से सम्बन्ध रखता है। अपनी स्वर्गिक नागरिकता के कौतूहल से भावुक और करुणामय होते रहें, जब आप उन लोगों के बीच चलते-फिरते हैं जो “क्रूस के बैरी” हैं (फिलिप्पियों 3:18)। यह निश्चित है कि मसीह वापस आएगा, और जब वह आएगा तो वह दिन आ जाएगा जब आप अपने निवासस्थान पहुँचेंगे। यदि आज के दिन ऐसा नहीं होता है, तो आज फिर आपके लिए अलग दिखने का एक अवसर उपलब्ध है। आप उस अवसर का लाभ किस प्रकार उठाने वाले हैं?

     1 पतरस 2:9-17