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10 फेब्रुवारी : तारणदायी विश्वास सहज समाधानी होत नाही

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10 फेब्रुवारी : तारणदायी विश्वास सहज समाधानी होत नाही
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ज्या देशातून ते निघाले होते त्या देशाला उद्देशून हे म्हणणे असते तर त्यांना परत जाण्याची संधी होती. पण आता ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजे स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात. (इब्री 11:15-16)

विश्वास हा देवानें प्रतिज्ञा केलेल्या भविष्याकडे पाहतो आणि त्याची “उत्कंठा” धरतो. “पण आता ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजे स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात.” यावर क्षणभर विचार करा.

असे बरेच लोक आहेत जे तारणदायी विश्वासाचे स्वरूप बदलून त्याचे कार्यकारी महत्व कमी करतांत, म्हणजे ते त्याची अशी व्याख्या करतांत कीं विश्वास हा जणू मनुष्याच्या स्वतंत्र इच्छेनें घेतलेला निर्णय आहे, ज्यांमध्यें तो कशाची उत्कंठा करतो किंवा कशाचा शोध घेतो यांत कांहीच बदल घडून येत नाहीं. परंतु बायबलमध्यें दिलेल्या महान विश्वासाचा अध्याय, इब्री 11, यांत असलेल्या या वचनाचा मुख्य मुद्दा हा आहे कीं विश्वासाने जगणे आणि मरणे याचा अर्थ नव्या उत्कंठा धरणे आणि नव्या तृप्तींचा शोध घेणे असा होतो.

वचन 14 म्हणते कीं प्राचीन काळातील पवित्र लोक (ज्यांची इब्री 11 मध्ये त्यांच्या विश्वासाबद्दल प्रशंसा केलीं जात आहे)   स्वतःच्या अशा देशाचा शोध करित होते जे ह्या जगापेक्षा वेगळे आहे. आणि वचन 16 म्हणते कीं ते वर्तमान पृथ्वीवरील जीवन जे कांही देऊं करते त्यापेक्षा अधिक चांगल्या गोष्टीची उत्कंठा करित होते : “ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजे स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात.”

त्यांना देवानें इतके घट्ट पकडले होते कीं, देवावांचून त्यांना इतर कोणत्याहि गोष्टींत समाधान नव्हते.

तर मग, खरा तारणदायी विश्वास हा आहे: देवाची अभिवचने दुरून पाहणे, आणि आपण जी मूल्ये धरतो त्यांत बदल घडवून आणणे जेणेकरुन आपण जगाने जे काही देऊं केले आहे त्यापेक्षा अधिक देवाच्या अभिवचनांची उत्कंठा धरतो आणि त्यांचा शोध घेतो आणि त्यांवर विश्वास ठेवतो.

9 फरवरी : हियाव के साथ प्रार्थना करना

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9 फरवरी : हियाव के साथ प्रार्थना करना
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“क्योंकि जो कोई माँगता है, उसे मिलता है; और जो ढूँढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाएगा … अतः: जब तुम बुरे होकर अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा!”  लूका 11:10, 13

जब कोई किशोरी, जिसको अभी-अभी अपना ड्राइविंग लाइसेंस मिला हो, अपनी माँ या पिता से गाड़ी की चाबियाँ माँगती है, तो सामान्यतः वह कोई अस्पष्ट, आधे-अधूरे मन से किया गया निवेदन नहीं होता। इसके विपरीत, उसका मन उसमें लगा हुआ होता है और उसकी इच्छा साफ दिखाई दे रही होती है, मानो वह कह रही हो, “कृपया मुझे गाड़ी की चाबियाँ दें। मुझे गाड़ी चाहिए। मैं गाड़ी ले जाना चाहती हूँ। मुझे यह आपसे अभी चाहिए।”

इसी प्रकार, यीशु अपने चेलों को प्रार्थना में परमेश्वर से निवेदन करने के तरीके सिखाने के लिए जिन क्रियाओं का उपयोग करता है, अर्थात् माँगना, ढूँढना, खटखटाना, वे तीव्र इच्छा, अनुरूपता और स्पष्टता को व्यक्त करते हैं। ऐसा लगता है, जैसे वह कह रहा हो कि मैं चाहता हूँ कि तुम इस प्रकार प्रार्थना करो जिसमें विनयपूर्ण, हठी संकल्प हो। मैं चाहता हूँ कि तुम ढूँढो और ढूँढते रहो, और मैं चाहता हूँ कि तुम आग्रहपूर्ण सत्यता के साथ खटखटाओ।

वह आपको और मुझे हमारे स्वर्गिक पिता के सामने आने और केवल अपनी माँग रखने के लिए आमन्त्रित कर रहा है।

हालाँकि हमें इस बारे में सावधान रहना चाहिए कि हम क्या  माँग रहे हैं। जब हम प्रभु के समक्ष अपने निवेदन प्रस्तुत कर रहे हों, तो उन्हें आत्मा द्वारा संयमित किया जाना चाहिए, जिसे जॉन कैल्विन “परमेश्वर के वचन की लगाम” कहते हैं।[1] दूसरे शब्दों में, बाइबल सिखाती है कि हम उन बातों को पूरे हियाव के साथ माँग सकते हैं जिन्हें परमेश्वर भली और उचित कहता है,  जैसे कि उसकी सहायता, जिससे कि हम अपने शरीरों को जीवित बलिदान के रूप में चढ़ा सकें, सुसमाचार के साक्षी के रूप में बढ़ सकें, या आराधना करने की अपनी अभिलाषा बढ़ा सकें। परन्तु हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम परमेश्वर से चालाकी से काम निकलवा सकते हैं, यह माँग करते हुए कि वह हमें वह सब कुछ दे, जो हमारे जीवन को सुगम या समृद्ध बनाए। यह भी सम्भव है, “माँगो और . . . पाओ नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग–विलास में उड़ा दो” (याकूब 4:3)।

हमें साहसपूर्वक तो माँगना है, किन्तु हमें दीनता के साथ भी माँगना है। हमें परमेश्वर से महान कार्य करने के लिए कहना है, और फिर हमें उसका उत्तर स्वीकार करना है। यह पहले से ही प्रमाणित हो चुका है कि परमेश्वर सदैव हमें वह नहीं देगा जो हम माँगते हैं, तब भी जब हम जो माँगते हैं वह अपने आप में भला और ईश्वरीय हो। हमारी प्रार्थनाएँ सदैव उसकी भली और सम्प्रभु इच्छा के अनुसार नहीं होती हैं। हम सदैव यह निर्धारित नहीं कर सकते कि हमारे लिए क्या भला है, किन्तु परमेश्वर सदैव जानता है कि उसकी सन्तानों के लिए सर्वोत्तम क्या है। इसलिए जब हम परमेश्वर के सामने अपनी विनतियों को लाते हैं, तो हमें उसके वचन को अपने मार्गदर्शक के रूप में देखना चाहिए और स्मरण रखना चाहिए कि वह हमारे जीवन के लिए अपनी योजनाओं को पूरा करने और हमें अपने पुत्र के स्वरूप के अनुरूप बनाने के लिए काम कर रहा है।

इसलिए परमेश्वर के सामने आएँ और केवल अपनी माँग रखें। आपके निवेदन विशिष्ट होने चाहिएँ, साहसिक होने चाहिएँ और परमेश्वर के वचन के अनुकूल होने चाहिएँ और तब आप आशा कर सकते हैं और निस्सन्देह चाहत रख सकते हैं कि परमेश्वर उनका ठीक वैसा ही उत्तर देगा, जैसा उसे उचित जान पड़ता है।
कुलुस्सियों 1:9-12

9 फेब्रुवारी : धन, यौन-क्रीडा आणि सामर्थ्य,यांपेक्षाउत्तम

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9 फेब्रुवारी : धन, यौन-क्रीडा आणि सामर्थ्य,यांपेक्षाउत्तम
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म्हणून आपले धैर्य सोडू नका, त्याचे प्रतिफळ मोठे आहे. (इब्री 10:35)

आपण देवाचे श्रेष्ठत्व ह्या जगाने आपल्याला जें काही देऊ केलें आहे त्यापेक्षा मोठे प्रतिफळ मानावें. जर आपण देवाचे श्रेष्ठत्व मोठे प्रतिफळ मानले नाही तर मग आपणहि नाश होत असलेल्यां लोकांसारखे ह्या जगावर प्रीति करणारे व त्यांच्यासारखे जीवन जगणारे ठरू.

म्हणून, हें जग ज्यां गोष्टींकडे वेड्यासारखे धावते त्यां गोष्टी विचारात घ्या आणि तुलनेने देव किती चांगला आणि स्थिर आहे यावर विचार करा. धन किंवा यौन-क्रीडा किंवा कोणतेहि सामर्थ्य घ्या आणि मृत्यूच्या संबंधात त्यांवर विचार करा. मृत्यू या सर्वांना गिळून टाकील. जर तुम्हीं त्यासाठीं जगत आहां, तर तुम्हाला जास्त काही मिळणार नाही आणि जे थोडके मिळेल तेहि तुम्हीं गमावाल.

पण देवाचे धन कल्पनेपलीकडे उत्तम आहे आणि ते टिकून राहते. ते मृत्यूलाहि पार करते. हे पैशापेक्षा उत्तम आहे कारण देव सर्व पैशाचा स्वामी आहे आणि तो आपला पिता आहे. आम्हीं त्याचे वारस आहोत. “सर्वकाही तुमचे आहे; आणि तुम्हीं ख्रिस्ताचे आहात आणि ख्रिस्त देवाचा आहे” (1 करिंथकरांस 3:22-23). अहाहा!

हे यौन-क्रीडेपेक्षा उत्तम आहे. येशूनें कधीही लैंगिक संबंध ठेवले नाहीत, आणि तो मनुष्यांमध्यें सर्वात सिद्ध आणि पूर्ण मानव होता. यौन-क्रीडा ही छाया आहे — एक प्रतिमा — एका मोठ्या सत्याची, नातेसंबंधाची आणि आनंदाची छाया जिच्या तुलनेंत सर्वात रोमांचक यौन-क्रीडा देखील जांभई दिल्यासारखी वाटेल.

देवाचे प्रतिफळ अधिकार किंवा सामर्थ्य यांपेक्षा उत्तम आहे. सर्वसमर्थ देवाची संतती व्हावे यांपेक्षा कोणतीही मानवी-शक्ती मोठी नाही. “आपण देवदूतांचा न्यायनिवाडा करणार आहोत हे तुम्हांला ठाऊक आहे ना?” (1 करिंथकरांस 6:3). “मी जसा विजय मिळवून आपल्या पित्याबरोबर त्याच्या राजासनावर बसलो, तसा जो विजय मिळवतो त्याला मी आपल्या राजासनावर आपल्याबरोबर बसू देईन ” (प्रकटीकरण 3:21).

या विषयावर आपण आणखी पुष्कळ बोलूं शकतो, कारण हा विषय वाढतच जाईल. जग आपल्याला जे काही देऊं पाहते, देव अधिक श्रेष्ठ आणि सनातन आहे.

कोणतीहि तुलना नाही. देव विजयी होतो – प्रत्येक वेळी. तर प्रश्न हा आहे: तो आमच्या जवळ आहे का? काय आपण या मती गुंग जगाच्या थडग्यांतून जागे होऊन बाहेर निघून जे खरोखर वास्तविक, असीम मौल्यवान आणि सार्वकालिक आहे त्याकडे पाहणार आणि त्यावर विश्वास ठेवणार आणि त्यांत आनंद मानणार आणि त्यावर प्रीति करणार का?

8 फरवरी : हमारा स्वर्गिक मित्र

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8 फरवरी : हमारा स्वर्गिक मित्र
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“तुम में से कौन है कि उसका एक मित्र हो, और वह आधी रात को उसके पास जाकर उससे कहे, ‘हे मित्र; मुझे तीन रोटियाँ दे। क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है, और उसके आगे रखने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।’ … मैं तुम से कहता हूँ, यदि उसका मित्र होने पर भी उसे उठकर न दे, तौभी उसके लज्जा छोड़कर माँगने के कारण उसे जितनी आवश्यकता हो उतनी उठकर देगा। और मैं तुम से कहता हूँ कि माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा।”  लूका 11:5-9

शायद हम सोचें कि परमेश्वर के बारे में बात करना उसके साथ हमारे सम्बन्ध की मुख्य अभिव्यक्ति होती है। तौभी हमारे लिए यह सम्भव है कि परमेश्वर को घनिष्ठता से जाने बिना भी, कि वह वास्तव में है कौन, हम उसके बारे में बात करते रह सकते हैं। परमेश्वर के साथ हमारे व्यक्तिगत सम्बन्ध का प्रमाण प्रायः हमारे सार्वजनिक शब्दों में नहीं, बल्कि हमारी निजी प्रार्थनाओं में पाया जाता है, अर्थात् इसमें नहीं कि हम उसके बारे में  क्या कहते हैं, अपितु इसमें कि हम उस से  क्या कहते हैं। निस्सन्देह, जैसा कि रॉबर्ट मुर्रे मैकाएन ने कहा था, “एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने घुटने टेकते समय जो होता है, वह वास्तव में वही होता है—उससे अधिक वह कुछ नहीं है।”

यहीं पर एक चुनौती भी है! क्योंकि यदि हम सच कहें, तो हमारी कई प्रार्थनाएँ एक गतिहीन या दूरस्थ सम्बन्ध को दर्शाती हैं, न कि उस गतिशीलता को जो एक स्नेह से भरी मित्रता की पहचान होनी चाहिए। परन्तु यदि यह हमारी सच्चाई है, तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि हम इस बात में अकेले नहीं हैं। यीशु के चेले भी अपने स्वर्गिक पिता के साथ घनिष्ठता बढ़ाना चाहते थे, किन्तु उन्हें पता था कि ऐसा कैसे करना सिखाने के लिए उन्हें प्रभु की आवश्यकता है (लूका 11:1)। और उत्तर के रूप में यीशु ने उन्हें वह प्रार्थना सिखाने के बाद, जिसे हम “प्रभु की प्रार्थना” कहते हैं, उन्हें एक मित्र के साहसिक निवेदन के बारे में एक दृष्टान्त सुनाया।

यीशु अपनी कहानी में दोनों व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध को स्थापित करते हुए अपना दृष्टान्त आरम्भ करता है। वह बताता है कि वे मित्र हैं। फिर वह आगे समझाता है कि कैसे पहला व्यक्ति, यात्रा करके आए एक अतिथि का आतिथ्य करने की इच्छा रखते हुए आधी रात को दूसरे के घर रोटी माँगने जाता है। यहाँ यह सम्भावना भी थी कि उसके निवेदन के कारण उसके मित्र का पूरा परिवार जाग जाता। यीशु कहता हैं कि उसके साहसिक हठ के कारण दूसरा व्यक्ति उठता है और पहले व्यक्ति को वह दे देता है, जिसकी उसे आवश्यकता होती है।

यीशु की कहानी से हमें यह समझने की आवश्यकता है कि यदि एक सच्ची मानवीय मित्रता ऐसी उदार प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि जब हम प्रार्थना में परमेश्वर के पास आते हैं, तो वह हमें कभी भी वह वस्तु देने से मना नहीं करेगा जिसकी हमें सच में आवश्यकता है। उस व्यक्ति का निवेदन साहसिक तो है, किन्तु बोझ डालने वाला भी है, तौभी उसका मित्र उसकी सुनता है और उसके हठ के कारण स्वीकार भी करता है। तो फिर हम कितना अधिक आश्वस्त हो सकते हैं कि जब हम सच्चे, दीन हृदय से अपने स्वर्गिक पिता के पास जाएँगे, तो वह उत्तर देने के लिए तत्पर होगा।

परमेश्वर के सामने आश्वासन रखने का अर्थ गुस्ताखी करना नहीं है। इसके विपरीत, यीशु के द्वारा उसने हमारे साथ जो मित्रता स्थापित की है, उसके कारण हम उसके सिंहासन के सामने हियाव रख सकते हैं। यीशु के कारण हम अपने सृष्टिकर्ता से एक घनिष्ठ मित्र के समान “लज्जा छोड़कर” बात कर सकते हैं। कितना अद्‌भुत विचार है यह! परमेश्वर के लिए कोई भी समय आधी रात का समय नहीं होता और न ही कभी ऐसा क्षण आएगा, जब हमारे मित्र के रूप में उसके पास जाने से उसे असुविधा होगी। हमें केवल खटखटाना है।

इफिसियों 1:15-23

8 फेब्रुवारी : तुम्हीं देव नाहीं याचा तुम्हांला आनंद वाटतो का?

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8 फेब्रुवारी : तुम्हीं देव नाहीं याचा तुम्हांला आनंद वाटतो का?
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अहो मानवकुलांनो, परमेश्वराचा गौरव करा; परमेश्वराचा गौरव करा व त्याचे सामर्थ्य वाखाणा! (स्तोत्र 96:7)

जेव्हां स्तोत्रकर्ता “परमेश्वराचे सामर्थ्य वाखाणा” असें म्हणतो तेव्हां तो येथें त्याला आलेल्या अनुभवाचे किमान कांही प्रमाणांत वर्णन करित आहे. आपण “परमेश्वराचे सामर्थ्य वाखाणतो” तेव्हां आपण नेमके काय करत असतो?

प्रथम, देवाच्या कृपेने, आपण देवाकडे चित्त लावतो आणि तो किती सामर्थ्यवान आहे हे पाहतो. आम्हीं त्याच्या सामर्थ्यकडे निरखून पाहतो. मग आम्हीं त्याचे सामर्थ्य किती महान आहे ह्याविषयी साक्ष देतो. आम्हीं त्याचे महत्व लक्षात घेऊन जसे कौतुक केले पाहिजे तसे ते करतो.

त्याचे सामर्थ्य अद्भूत असल्याची आपल्याला जाणीव होते. पण ती अद्भुत गोष्ट ज्यांमुळें आपण इतके आश्चर्यचकित होतों कीं आपल्या तोंडून “परमेश्वराचे सामर्थ्य वाखाणा” असें शब्द उसळून निघतांत- – ती गोष्ट म्हणजे ही कीं आपल्याला विशेषकरून याचा आनंद होतो कीं ही सामर्थ्याची पराकोटी देवाची आहे, आमची नाही.

तो अति सामर्थ्यवान आहे आणि आपण दुर्बळ आहों या वस्तुस्थितीत आम्हीं स्वतःला सामर्थ्यवान समजतो. हे सत्य अशाप्रकारे आहे हे आपल्याला आवडते. देवाच्या सामर्थ्याचा आपल्याला हेवा वाटत नाहीं. आम्हीं त्याच्या सामर्थ्याचा लोभ करित नाहीं. सर्व सामर्थ्य त्याचे आहे यांत आम्हीं आनंदाने भारावून जातो.

आपले संपूर्ण व्यक्तित्वमत्व, म्हणजे जे कांही मी आहे ते सर्व, स्वतःतून बाहेर निघून त्याच सामर्थ्याकडे निरखून पाहण्यात आनंदित होते – जणू काही आपण आपल्या बाजूच्या धावपट्टीवर धावत असलेल्या धावपटूचा विजयोत्सव साजरा करतो ज्याने आपल्याला शर्यतीत पराभूत केले होते आणि आपण आपल्या पराभवावर दांत खात बसण्याऐवजी त्याच्या सामर्थ्याचे कौतुक करण्यात आपला सर्वात मोठा आनंद मानतो.

जेव्हां आपली अंतःकरणे स्वतःच्या शक्तीवर अभिमान बाळगण्याऐवजी किंवा स्वतःची प्रौढी मिरविण्याऐवजी देवाच्या सामर्थ्याचे वाखाणे करण्यासाठीं स्वतःहून फुटून पडतात तेव्हां आपल्याला खऱ्या अर्थाने जीवन काय आहे तें समजते. आपल्याला  एका अद्भुत सत्याचा शोध लागतो: आपण देव नाहीं हे सत्य अत्यंत समाधान देणारे आहे, म्हणून देव बनण्याच्या सर्व व्यर्थ कल्पना किंवा इच्छा यांचा आम्हीं त्याग करतो.

देवाच्या सामर्थ्यावर चिंतन केल्यांमुळें आपल्यामध्ये एक अशी जाणीव निर्माण होते कीं देवानें हें विश्व पुढील हेतूनें निर्माण केलें आहे: ह्यासाठीं कीं, आपल्याला आपण देव नाहीं, तर देवाचे देवपण – म्हणजे देवाचे सामर्थ्य- याचे कौतुक करण्याचा अत्यंत समाधानकारक आनंद घेता यावा. ह्या सर्वसमर्थाचे वाखाणे हाच सर्व गोष्टींचा अंतिम व पूर्णानंद देणारा शेवट (निष्कर्ष) आहे याची अनुकूल जाणीव आपल्या अंत:करणांत कायम स्थिरावते.

कोणतेहि सामर्थ्य आपल्यापासून आलें आहे अशी फुशारकी मारण्याचा क्षुल्लकहि मोह झाल्यांस आपण थरथरतो. यापासून आपले रक्षण करण्यासाठीं देवानें आपल्याला दुर्बल असें भांडे बनविले आहे: “ही आमची संपत्ती मातीच्या भांड्यात आहे, अशा हेतूने कीं, सामर्थ्याची पराकोटी देवाची आहे, आमच्यापासून होत नाही, हे समजावे” (2 करिंथ 4:7).

अहाहा, काय ही प्रीति, कीं देव त्याच्या सामर्थ्याचे वाखाण करण्याचा जो सार्वकालिक शिखर आहे त्या जागी आपण आपल्या स्वतःचा अभिमान बाळगण्याचा व्यर्थ प्रयत्न करूं नये म्हणून आपले संरक्षण करतो! देव असण्या ऐवजी देवाकडे पाहणे यापेक्षा मोठा आनंद नाहीं!

7 फरवरी : प्रलोभन पर विजय

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7 फरवरी : प्रलोभन पर विजय
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“हमें परीक्षा में न ला।”  लूका 11:4

बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि परमेश्वर पाप और प्रलोभन का स्रोत नहीं है। वह आप किसी की परीक्षा नहीं करता है (याकूब 1:13)। जबकि ऐसा है तो हम क्यों प्रार्थना करके परमेश्वर से कहें कि वह हमें परीक्षा में न ले जाए? वास्तव में ऐसा करने के द्वारा हम परमेश्वर से क्या करने या न करने के लिए कह रहे हैं?

इसके लिए हमें परखे जाने और प्रलोभन में पड़ने के बीच के सूक्ष्म अन्तर को समझना होगा। जब हम प्रार्थना करते हैं, “हे प्रभु, हमें परीक्षा में न ला,” तो हम वास्तव में यह कह रहे होते हैं, “हे परमेश्वर, हमारी सहायता कर कि हम आपके द्वारा आने वाली परीक्षा को शैतान की ओर से बुराई करने का प्रलोभन न बनने दें।” उसी प्रकार हम उससे यह भी कह रहे होते हैं कि उसकी उपस्थिति और सामर्थ्य के बिना हमें परखा न जाए, जिनके द्वारा हमें उन परखे जाने के समयों में निराशा या अविश्वास में डूब जाने के विपरीत विश्वास और आनन्द में चलने में सहायता मिलेगी।

इसलिए प्रभु की प्रार्थना का यह वाक्यांश महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें प्रलोभन की वास्तविकता और निकटता स्मरण कराता है और ऐसा होना आवश्यक भी है। उत्पत्ति 4 में परमेश्वर कैन को चेतावनी देता है, “पाप द्वार पर छिपा रहता है; और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और”—यहीं पर उपदेश है—“तुझे उस पर प्रभुता करनी है” (उत्पत्ति 4:7)। दुख की बात यह है कि कैन ने परमेश्वर से यह नहीं माँगा कि वह उसे पाप पर प्रभुता करने के लिए वह सब दे जिसकी उसे आवश्यकता थी, बजाय इसके कि पाप उस पर प्रभुता करता और उसका विनाश कर देता। प्रभु की प्रार्थना में यीशु हमें वही भूल न दोहराने की शिक्षा देता है।

हमें नष्ट करने के पाप के प्रयासों को ध्यान में रखते हुए हम केवल इतना नहीं कर सकते कि हम परमेश्वर से कहें कि हमें परीक्षा में न ला और फिर मान लें कि इस समस्या का समाधान हो गया है। कदापि नहीं, हमारे कार्यों को हमारी प्रार्थनाओं के अनुरूप होना चाहिए। यदि हम वास्तव में प्रभु से उसकी पवित्र आज्ञाओं का उल्लंघन न करने के लिए सहायता माँग रहे हैं, तो हमें अपने आप को लापरवाही से, अनावश्यक रूप से, या जानबूझकर पाप की पहुँच में नहीं डालना चाहिए।

परमेश्वर प्रलोभन से लड़ने में हमारी सहायता करने के लिए इच्छुक है और पूरी तरह से सक्षम भी है। वह अपने प्रेम की वाचा में यह सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है कि उसकी सन्तानों में से कोई भी पाप के चंगुल में न फँस जाए। हमारे जीवन में ऐसा कभी नहीं होगा, जब पाप का प्रलोभन इतना प्रबल हो कि परमेश्वर का अनुग्रह और सामर्थ्य हमें इसे सहन करने में सक्षम न कर सके; जैसा कि पवित्रशास्त्र हमें स्मरण दिलाता है, “परमेश्‍वर सच्चा है और वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको” (1 कुरिन्थियों 10:13)। न ही प्रलोभन का विरोध करने में कभी कोई ऐसी विफलता होगी, जिसे मसीह के लहू से ढका न जा सके। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में और प्रत्येक प्रलोभन का सामना करते हुए यह स्मरण रखें कि मसीह में हम “विजयी पक्ष में हैं।”[1] आप सामना कर सकते हैं क्योंकि आपके पास आपका मार्गदर्शन करने और आपकी रक्षा करने के लिए आत्मा स्वयं उपस्थित है। इस समय आप अवज्ञा के लिए कौन से नियमित प्रलोभनों का सामना कर रहे हैं? किन क्षेत्रों में या किन क्षणों में आपकी परीक्षाएँ प्रलोभनों में बदल जाती हैं? इसी क्षण परमेश्वर से उसकी सहायता माँगें, क्योंकि आपको इसकी आवश्यकता है और वह इसे प्रदान करने के लिए तैयार है।      लूका 4:1-13

7 फेब्रुवारी : शेवटच्या घटकेचेपुनरुज्जीवन

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7 फेब्रुवारी : शेवटच्या घटकेचेपुनरुज्जीवन
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“अहों येशू, आपण आपल्यां राजाधिकारानें याल तेव्हां माझी आठवण करा.” (लूक 23:42)

आपल्या आशेला जिवे मारणाऱ्या सर्वात मोठ्या शत्रुंपैकीं एक म्हणजे ही निराशा कीं आपण स्वतःला बदलण्यासाठीं इतके दिवस प्रयत्न केलें, तरी यशस्वी होऊं शकलों नाहीं.

तुम्हीं मागे वळून पाहता आणि विचार करतां : माझ्यां यां सर्व धावपळीचा काय उपयोग? जीवनाच्या शेवटल्या घटकेला जरी माझे पुनरुज्जीवन झालें, तरी नवी उत्पत्ती म्हणून नव्यां मार्गाने जीवन जगण्यासाठीं माझ्याकडे इतका अल्प काळ असेल कीं इतक्या वर्षांच्या अपयशाच्या तुलनेत यां अल्पकालिक नव्या जीवनाचा फारसा फरक पडणार नाही.

एकेकाळचा दरोडेखोर (म्हणजे येशूच्या बाजूला वधस्तंभावरील चोर) त्याच्या आत्म-परिवर्तनानंतर पुढील कांही तास जगला. त्यानंतर त्याचा मृत्यू झाला. तो बदलला होता. तो त्यां वधस्तंभावर असतांना त्यानें एक नवी वृत्ती व पश्चातापांस शोभेल असें नवें सत्कृत्य म्हणून एक नवा मनुष्य म्हणून जगला (आता तो ख्रिस्ताची निंदा करित नव्हता). पण त्याचे 99.99% आयुष्य वाया गेले. नव्यां जीवनाचे ते शेवटचे दोन तास महत्त्वाचे होते का?

होय, त्यांचं प्रचंड महत्त्व होते. एकेकाळी दरोडेखोर असलेल्या ह्या लुटारूला, आपणां सर्वांप्रमाणेच ख्रिस्ताच्या न्यायासनासमोर खर्‍या स्वरूपाने प्रकट व्हावें लागेल ह्यासाठीं कीं त्यानें आपल्या जीवनांत केलेल्या प्रत्येक गोष्टीचा हिशोब द्यावा. “कारण आपणा सर्वांना ख्रिस्ताच्या न्यायासनासमोर खर्‍या स्वरूपाने प्रकट झालें पाहिजे, ह्यासाठीं कीं, प्रत्येकाला, त्यानें देहाने केलेल्या गोष्टीचे फळ मिळावे; मग ते बरे असो किंवा वाईट असो” (2 करिंथ 5:10). त्या दिवशी त्याचे जीवन त्याच्या नवीन जन्माची आणि ख्रिस्तासोबतच्या त्याच्या एकतेची साक्ष कशी देईल? ख्रिस्तामध्ये त्याचे जीवन नवे झालें होते याची खात्री कशी केलीं जाईल?

शेवटचे तास तो वृत्तांत कथन करतील. हा मनुष्य नवा होता. त्याचा विश्वास खरा होता. तो खऱ्या अर्थाने ख्रिस्ताशी एकरूप झाला आहे. तो ख्रिस्ताचे नीतिमत्व असा झाला आहे. त्याच्या पापांची क्षमा झालीं आहे.

शेवटचा न्याय होईल त्यांवेळी त्याच्या तारणाची ती शेवटची घटका ह्यांच गोष्टीची साक्ष देईल. तो बदलला आहे! आणि त्याचा बदल महत्त्वाचा ठरला. देवाच्या कृपेच्या सामर्थ्याची आणि त्याच्या विश्वासाची आणि ख्रिस्तासोबतच्या त्याच्या एकात्मतेची ती एक सुंदर साक्ष होती आणि कायम असणार.

आता आपण बदललेल्या जीवनाच्या आपल्यां मूळ संघर्षाकडे परत येऊ. मी असे म्हणत नाही कीं जे विश्वासणारे परिवर्तनाच्या बाबंतीत संघर्ष करतांत तें त्यां दरोडेखोरा प्रमाणें तारलेलें नाहींत. मी फक्त असे म्हणत आहे कीं जीवनाच्या शेवटच्या वर्षांचे व शेवटच्या तासांचे महत्त्व आहे.

जर आपण आपल्या जीवनाच्या शेवटच्या अगदी एक टक्के शिल्लक असलेल्या घटकेतहि, आपण आपल्या पापी प्रवृत्तीवर किंवा अधर्मावर विजय मिळविला जें आपल्या व्यक्तिमत्त्वात खोलवर होते किंवा दीर्घकाळापासून होते, तर ही गोष्ट वर्तमान समयी आम्हांवर झालेंल्या कृपेच्या सामर्थ्याची एक सुंदर साक्ष ठरेल; आणि ख्रिस्तावर आपण विश्वास ठेविला आहे आणि त्याच्याबरोबर एकरूप झालो आहोंत ही वास्तविकता शेवटचा न्याय केला जाईल त्यावेळी साक्षीदार ठरेल.

ह्यास्तव, तुम्हीं जे संघर्ष करित आहां तें तुम्हीं धीर धरा. विनंत्या करित रहा, शोध करित रहा, दार ठोकत रहा. ख्रिस्ताकडे पाहत असा. अगदी शेवटच्या घटकेंत दरोडेखोरांचे तारण करून जर देवाला गौरव मिळत असेल, तर तुम्हीं जे वर्षानुवर्षे पुनरुज्जीवन मिळविण्यासाठीं झटत होता ते देण्यासाठीं तो आत्तापर्यंत का थांबून होता ह्यामागे निश्चितच त्याचे कांही हेतू आहेत.

Episode #1: तुमचे आयुष्य वाया घालवू नका!

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Episode #1: तुमचे आयुष्य वाया घालवू नका!
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“ख्रिस्तात सर्वाना सलाम, आपल्या Don’t Waste Your Life (तुमचे आयुष्य वाया घालवू नका!) या पुस्तकावर आधारित आपल्या पहिल्या पोडकास्टमध्ये आपलं स्वागत आहे. या पोडकास्टमध्ये आपण एक महत्वाचा संदेश घेऊन येत आहोत – जीवनाचा खरा उद्देश काय आहे आणि आपण त्याचा उपयोग योग्य रीतीने कसा करू शकतो. जॉन पायपर यांच्या या पुस्तकामध्ये जीवनाच्या मूल्याच्या, परमेश्वराच्या महिम्याच्या आणि आपल्याला दिलेल्या वेळेचा कसा सदुपयोग करावा यावर विचारमंथन केले आहे. चला तर, आपल्या जीवनाला काहीतरी अर्थपूर्ण बनवूया आणि त्याचा खरा उपयोग कसा करावा हे जाणून घेऊया.

आपल्या विचारांना आकार देण्यासाठी आणि आपल्या जीवनाचे खरे उद्दिष्ट शोधण्यासाठी हा पोडकास्ट आपल्याला मार्गदर्शन करेल. आपली आणि आपल्यासोबत असलेल्या या आध्यात्मिक प्रवासाची सुरुवात आपल्या पहिल्या एपिसोडसह होईल.

आणखी एक आनंदाची गोष्ट! Don’t Waste Your Life हे पुस्तक आता मराठीत उपलब्ध आहे. आपली प्रत खरेदी करण्यासाठी कृपया www.alethiabooks.com या वेबसाईटला भेट द्या.”

6 फरवरी : क्षमा करने का स्वभाव

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6 फरवरी : क्षमा करने का स्वभाव
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और हमारे पापों को क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने हर एक अपराधी को क्षमा करते हैं।”  लूका 11:4

पहली बार देखने पर यह विनती एक आदान-प्रदान की तरह लग सकती है, मानो दूसरों को क्षमा करने से हमें क्षमा किए जाने का अधिकार प्राप्त हो जाता हो। तथापि, पवित्रशास्त्र इतना स्पष्ट है कि हम पहचान लेंगे कि सत्य वास्तव में इसके उलट है। परमेश्वर केवल प्रायश्चित करने वालों को क्षमा करता है, अर्थात् उनको जो ईश्वरीय पछतावा महसूस करते हैं और अपने पापों से पश्चाताप करते हैं। और प्रायश्चित करने का एक मुख्य प्रमाण कौन-सा है? क्षमा करने का स्वभाव! दूसरे शब्दों में, जब हम एक-दूसरे को क्षमा करते हैं, तो हम क्षमा किए जाने का अधिकार अर्जित नहीं करते हैं; इसके विपरीत हम यह दर्शाते हैं कि परमेश्वर के क्षमा करने वाले अनुग्रह के कारण हममें बदलाव हो चुका है।

यीशु ने सिखाया कि यह एक अकल्पनीय बात है कि हम, जिन्हें इतना अधिक क्षमा किया गया है, दूसरों द्वारा हमारे विरुद्ध किए गए अपराधों को क्षमा करने के लिए तैयार न हों (मत्ती 18:21-35)। फिर भी, हम अब भी द्वेष रखने, क्रोधित रहने और “क्षमा तो कर देंगे किन्तु भूलेंगे नहीं” जैसे स्वभाव के लिए प्रलोभित होते रहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि डी.एल. मूडी ने इस विचार की तुलना किसी ऐसे व्यक्ति से की, जो कुल्हाड़ी तो जमीन में गाड़ देता है किन्तु उसका हत्था बाहर ही छोड़ देता है।

सम्भवतः क्षमा न करने का स्वभाव सच्चे आत्मिक जीवन का सबसे बड़ा हत्यारा होता है। यदि हम अपने हृदय में अपने भाइयों और बहनों के विरुद्ध सक्रिय रूप से शत्रुता रखते हैं, तो हमें परमेश्वर के पीछे चलने का दावा नहीं करना चाहिए। यह मसीही आनन्द की लौ को बुझा देगा और बाइबल की शिक्षाओं से लाभान्वित हो पाना लगभग असम्भव बना देगा। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि यीशु यह कह रहा है कि क्षमा करने के स्वभाव के बारे में मैं जो कह रहा हूँ वह विश्वास के साथ की गई प्रार्थना का एक मौलिक तत्व है। इसके प्रति अपने जीवन को परखो।

क्या आप किसी से द्वेष रखते हैं या अपने मन में किसी के द्वारा आपके विरुद्ध किए गए अपराधों को दोहराते रहते हैं? क्या कोई ऐसा है जिसे क्षमा करने में आप विफल रहे हैं? आपको मिली क्षमा पर चिन्तन करें और परमेश्वर से आपको क्षमा करना सिखाने और ऐसा करने में सक्षम बनाने के लिए कहें, क्योंकि दूसरों के द्वारा आपके विरुद्ध किए गए पापों को क्षमा करके आप प्रकट करते हैं कि आप उसके अनुग्रह को समझते हैं और वास्तव में उसके द्वारा क्षमा किए गए हैं।

कैसे आपकी क्षमा उस व्यक्ति तक पहुँच सकती है,

और उसे आशीष दे सकती है, जो दूसरों को क्षमा नहीं करता,

जो अपराधों के विचारों को अपने में पनपने देता है

और पुरानी कड़वाहट को दूर नहीं होने देता?

चमकदार ज्योति में तुम्हारा क्रूस उस सत्य को प्रकट करता है,

जिसे हम धुंधले ढंग से जानते थे,

मनुष्यों का हम पर कितना छोटा सा ऋण है,

हम तुम्हारे प्रति कितने बड़े ऋणी हैं।

हे प्रभु, हमारी आत्माओं के भीतर की गहराइयों को साफ कर दो,

और आक्रोश का अन्त कर दो;

तब, परमेश्वर और मनुष्य के साथ हमारा मिलन हो जाने पर,

हमारा जीवन तुम्हारी शान्ति को फैलाएगा। [1]

मत्ती 18:21-35

6 फेब्रुवारी : येथें निंदा, तेथें प्रतिफळ

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6 फेब्रुवारी : येथें निंदा, तेथें प्रतिफळ
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जे झाड पाण्याच्या प्रवाहाजवळ लावलेले असते, जे आपल्या हंगामात फळ देते, ज्याची पाने कोमेजत नाहीत, अशा झाडासारखा तो आहे; आणि जे काही तो हाती घेतो ते सिद्धीस जाते. (स्तोत्र 1:3)

स्तोत्र 1:3 मधील हे अभिवचन कशा प्रकारे ख्रिस्ताकडे इशारा करते?

अभिवचन असें म्हणते, जे काही तो हाती घेतो ते सिद्धीस जाते.” नीतिमान लोक जे काही हाती घेतांत ते सर्व सिद्धीस जाते. हा अति भाबडेपणा आहे, कीं निर्विवाद सत्य?

आपल्याला ह्या जीवनांत दुष्टांची नक्कीच भरभराट होतांना दिसून येते कीं. “जो मनुष्य आपल्या मार्गाने उत्कर्ष पावतो, जो मनुष्य दुष्ट संकल्प सिद्धीस नेतो त्याच्यावर जळफळू नकोस!” (स्तोत्र 37:7). “….. दुराचारी संपन्न झालें आहेत; त्यांनी देवाची परीक्षा पाहिली तरी त्यांचा निभाव लागला आहे” (मलाकी 3:15).

तर नीतिमानांना मात्र ह्या जीवनात पुष्कळ संकटांतून जावें लागते आणि त्यांच्या चांगुलपणाचे प्रतिफळ त्यांच्याशी गैरवर्तन करून दिले जाते. “जर आम्हीं आपल्या देवाचे नाव विसरलो असतो….., तर देवानें हे शोधून काढले नसते काय?  तरी तुझ्यामुळे आमचा वध सतत होत आहे; कापायच्या मेंढरांसारखे आम्हांला गणतात” (स्तोत्र 44:20-22). स्वतः स्तोत्रकर्त्यांना याची जाणीव होती. आम्हीं एखाद्या अशा गोष्टी विरोधांत आरडाओरडा करित नाहींये ज्या विषयीं त्यांना पूर्वीपासून कल्पना नव्हती.

यास्तव, जेव्हां स्तोत्रकर्ता म्हणतो, “जे काही तो हाती घेतो ते सिद्धीस जाते,” तो त्याचा अति भाबडेपणा नाही. तर ज्यां गोष्टी त्याला ह्या जीवनांत अंधुक दिसून येतांत त्याद्वारे तो मृत्यूनंतरच्या जीवनाकडे इशारा करतो, जिथे आपण केलेल्या सर्व गोष्टींचे खरे प्रतिफळ – म्हणजे खरी समृद्धी प्रकट केलीं जाईल.

पौलाची विचारसरणी हींच होती.

प्रथम, तो मृत्यूवर ख्रिस्ताच्या विजयाचे स्तुतीगान करतो. “अरे मरणा, तुझी नांगी कोठे?’ . . जो देव आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे आपल्याला जय देतो त्याची स्तुती असो” (1 करिंथ 15:55, 57).

मग, तो असा अर्थ काढतो कीं, या विजयामुळेच, विश्वासनाऱ्यानी केलेले प्रत्येक श्रम सिद्धीस जाईल. “म्हणून माझ्या प्रिय बंधूंनो, प्रभूमध्ये तुमचे श्रम व्यर्थ नाहीत हे तुम्हीं जाणून आहात” (1 करिंथ 15:58). जेव्हां एखादी गोष्ट व्यर्थ जात नाहीं, म्हणजेच ती सिद्धीस जाते.

ज्यां अर्थी ख्रिस्त आमचा प्रतिस्थापक म्हणून मरण पावला म्हणून, त्यां अर्थी त्यानें या गोष्टीची खात्री दिली कीं शेवटी प्रत्येक सत्कृत्य सिद्धीस जाईल. “प्रत्येक जण…… जे काही चांगले करतो, तेच तो प्रभूकडून भरून पावेल” (इफिस 6:8). “जेव्हां लोक तुमची निंदा करतील तेव्हां तुम्हीं धन्य. . . . आनंद करा, उल्लास करा, कारण स्वर्गात तुमचे प्रतिफळ मोठे आहे” (मॅथ्यू 5:11-12). येथें निंदा केलीं. स्वर्गांत प्रतिफळ मिळेल.

जुन्या करारात जी गोष्ट अति भाबळेपणाची वाटते (“जे काही तो हाती घेतो ते सिद्धीस जाते”) ती ख्रिस्ताच्या कार्याकडे आणि पुनरुत्थानाच्या निर्विवाद सत्याकडे इशारा करते. कॅथरीना फॉन श्लेगेलच्या त्या महान भजनातील शब्दांप्रमाणे, “हें माझ्या जीवा, शांत बैस, हें माझ्या जीवा शांत बैस: तु तुझ्या येशूकडून भरून पावशील / तो सर्व आपल्या पूर्णत्वांतून देतो.”