2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना

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2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना
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“दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इससे लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ, और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने–अपने मन में प्रभु के सामने गाते और कीर्तन करते रहो।” इफिसियों 5:18-19

जीवन के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सब कुछ एक साथ होता हुआ प्रतीत होता है, जैसे किसी बच्चे का जन्म या किसी नए देश में स्थानान्तरण। मसीह में नया जीवन प्रारम्भ करना शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब हम यीशु पर विश्वास करते हैं, तो एक साथ कई परिवर्तन होते हैं: हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, हम परमेश्वर के परिवार में गोद लिए जाते हैं, हमें उसके पुत्र और पुत्रियों के रूप में एक नई पहचान दी जाती है, और—जैसा कि इस वचन में दर्शाया गया है—हमारे भीतर पवित्र आत्मा का वास होता है।

जब कोई यीशु पर विश्वास करता है, तो पवित्र आत्मा उसमें वास करने लगता है, उसे वह इच्छा और सामर्थ्य प्रदान करता है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए आवश्यक है। आत्मा की यह परिपूर्णता मसीही अनुभव का मूलभूत सत्य है। यह हर उस व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, जो मसीह पर विश्वास करता है। फिर भी, सच्चाई यह है कि विश्वासियों के रूप में हम हमेशा परमेश्वर के आत्मा की परिपूर्णता में नहीं जीते। यह सम्भव है कि हमारी अवज्ञा के कारण हम हमारे भीतर रहने वाले आत्मा को दुखी कर देते हैं (इफिसियों 4:30)। यह भी सम्भव है कि हम उससे अधिक किसी अन्य चीज़ के प्रभाव में अधिक आ जाएँ—यही कारण है कि पौलुस यहाँ यह स्पष्ट करता है कि हम एक साथ शराब और आत्मा दोनों के प्रभाव में नहीं रह सकते।

हमें यह समझना होगा कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो हम कभी भी उसके पितृत्व से बाहर नहीं आ सकते; लेकिन अवज्ञा में जीने से हम उसके पितृ-संरक्षण, उपस्थिति और आनन्द से वंचित हो सकते हैं। जो बच्चा अपने माता-पिता की पूरी तरह अवहेलना करता है, वह भले ही नाश्ते की मेज़ पर बैठा हो, तब भी वह जानता है कि वे अभी भी उसके माता-पिता हैं और वह अभी भी उनका बेटा है, लेकिन ऐसा होने पर भी उसके इस रिश्ते का आनन्द कम हो जाएगा। हमारे साथ भी यही होता है: हम अवज्ञा में नहीं जी सकते—ऐसा नहीं हो सकता कि एक ओर तो हम अपने जीवन में किसी अन्य प्राथमिकता, विचार या पदार्थ को अपना मार्गदर्शक बना लें और दूसरी ओर हम आत्मा की परिपूर्णता में भी जीएँ।

यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे हम स्वयं हल कर सकते हैं। हम खुद को पवित्र आत्मा से नहीं भर सकते। हम केवल परमेश्वर से पवित्र आत्मा की परिपूर्णता को ही प्राप्त नहीं करते, बल्कि उसका आनन्द भी उसी के द्वारा सम्भव होता है। हम स्वयं को नहीं भर सकते, लेकिन हमें स्वयं को भरे जाने के लिए तैयार और खुले अवश्य रखना चाहिए। हर मसीही जीवन की अपेक्षा यही है कि यह आत्मा से भरे होने का प्रमाण—जिसे पौलुस “आत्मा का फल” (गलातियों 5:22) कहता है—धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हो।

आपके जीवन की और हर एकत्रित कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम सब आत्मा से भरे जाएँ—कि हम किसी और चीज़ के बजाय उसके द्वारा निर्देशित हों। यही सच्चे रूपान्तरण, आनन्द, शान्ति और प्रेम को लाता है। यही हमें प्रेरित करता है कि हम न केवल अपने ओठों से, बल्कि अपने हृदय में भी मसीह की स्तुति के गीत गाएँ। इसलिए प्रार्थना करें कि वह आपको नए सिरे से भर दे:

हे पवित्र आत्मा, मेरे हृदय पर उतर,

इसे संसार से अलग कर, इसकी हर धड़कन में प्रवाहित हो;

मेरी निर्बलता के बावजूद, तू शक्तिशाली है,

मुझे वैसा प्रेम करना सिखा, जैसा मुझे करना चाहिए।[1]

  यहेजकेल 11:14-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 60– 62; प्रेरितों 22 ◊


[1] जॉर्ज क्रोली, “स्पिरिट ऑफ गॉड, डिसेण्ड अपोन माई हार्ट” (1854).

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