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6 फरवरी : क्षमा करने का स्वभाव

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6 फरवरी : क्षमा करने का स्वभाव
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और हमारे पापों को क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने हर एक अपराधी को क्षमा करते हैं।”  लूका 11:4

पहली बार देखने पर यह विनती एक आदान-प्रदान की तरह लग सकती है, मानो दूसरों को क्षमा करने से हमें क्षमा किए जाने का अधिकार प्राप्त हो जाता हो। तथापि, पवित्रशास्त्र इतना स्पष्ट है कि हम पहचान लेंगे कि सत्य वास्तव में इसके उलट है। परमेश्वर केवल प्रायश्चित करने वालों को क्षमा करता है, अर्थात् उनको जो ईश्वरीय पछतावा महसूस करते हैं और अपने पापों से पश्चाताप करते हैं। और प्रायश्चित करने का एक मुख्य प्रमाण कौन-सा है? क्षमा करने का स्वभाव! दूसरे शब्दों में, जब हम एक-दूसरे को क्षमा करते हैं, तो हम क्षमा किए जाने का अधिकार अर्जित नहीं करते हैं; इसके विपरीत हम यह दर्शाते हैं कि परमेश्वर के क्षमा करने वाले अनुग्रह के कारण हममें बदलाव हो चुका है।

यीशु ने सिखाया कि यह एक अकल्पनीय बात है कि हम, जिन्हें इतना अधिक क्षमा किया गया है, दूसरों द्वारा हमारे विरुद्ध किए गए अपराधों को क्षमा करने के लिए तैयार न हों (मत्ती 18:21-35)। फिर भी, हम अब भी द्वेष रखने, क्रोधित रहने और “क्षमा तो कर देंगे किन्तु भूलेंगे नहीं” जैसे स्वभाव के लिए प्रलोभित होते रहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि डी.एल. मूडी ने इस विचार की तुलना किसी ऐसे व्यक्ति से की, जो कुल्हाड़ी तो जमीन में गाड़ देता है किन्तु उसका हत्था बाहर ही छोड़ देता है।

सम्भवतः क्षमा न करने का स्वभाव सच्चे आत्मिक जीवन का सबसे बड़ा हत्यारा होता है। यदि हम अपने हृदय में अपने भाइयों और बहनों के विरुद्ध सक्रिय रूप से शत्रुता रखते हैं, तो हमें परमेश्वर के पीछे चलने का दावा नहीं करना चाहिए। यह मसीही आनन्द की लौ को बुझा देगा और बाइबल की शिक्षाओं से लाभान्वित हो पाना लगभग असम्भव बना देगा। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि यीशु यह कह रहा है कि क्षमा करने के स्वभाव के बारे में मैं जो कह रहा हूँ वह विश्वास के साथ की गई प्रार्थना का एक मौलिक तत्व है। इसके प्रति अपने जीवन को परखो।

क्या आप किसी से द्वेष रखते हैं या अपने मन में किसी के द्वारा आपके विरुद्ध किए गए अपराधों को दोहराते रहते हैं? क्या कोई ऐसा है जिसे क्षमा करने में आप विफल रहे हैं? आपको मिली क्षमा पर चिन्तन करें और परमेश्वर से आपको क्षमा करना सिखाने और ऐसा करने में सक्षम बनाने के लिए कहें, क्योंकि दूसरों के द्वारा आपके विरुद्ध किए गए पापों को क्षमा करके आप प्रकट करते हैं कि आप उसके अनुग्रह को समझते हैं और वास्तव में उसके द्वारा क्षमा किए गए हैं।

कैसे आपकी क्षमा उस व्यक्ति तक पहुँच सकती है,

और उसे आशीष दे सकती है, जो दूसरों को क्षमा नहीं करता,

जो अपराधों के विचारों को अपने में पनपने देता है

और पुरानी कड़वाहट को दूर नहीं होने देता?

चमकदार ज्योति में तुम्हारा क्रूस उस सत्य को प्रकट करता है,

जिसे हम धुंधले ढंग से जानते थे,

मनुष्यों का हम पर कितना छोटा सा ऋण है,

हम तुम्हारे प्रति कितने बड़े ऋणी हैं।

हे प्रभु, हमारी आत्माओं के भीतर की गहराइयों को साफ कर दो,

और आक्रोश का अन्त कर दो;

तब, परमेश्वर और मनुष्य के साथ हमारा मिलन हो जाने पर,

हमारा जीवन तुम्हारी शान्ति को फैलाएगा। [1]

मत्ती 18:21-35

6 फेब्रुवारी : येथें निंदा, तेथें प्रतिफळ

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जे झाड पाण्याच्या प्रवाहाजवळ लावलेले असते, जे आपल्या हंगामात फळ देते, ज्याची पाने कोमेजत नाहीत, अशा झाडासारखा तो आहे; आणि जे काही तो हाती घेतो ते सिद्धीस जाते. (स्तोत्र 1:3)

स्तोत्र 1:3 मधील हे अभिवचन कशा प्रकारे ख्रिस्ताकडे इशारा करते?

अभिवचन असें म्हणते, जे काही तो हाती घेतो ते सिद्धीस जाते.” नीतिमान लोक जे काही हाती घेतांत ते सर्व सिद्धीस जाते. हा अति भाबडेपणा आहे, कीं निर्विवाद सत्य?

आपल्याला ह्या जीवनांत दुष्टांची नक्कीच भरभराट होतांना दिसून येते कीं. “जो मनुष्य आपल्या मार्गाने उत्कर्ष पावतो, जो मनुष्य दुष्ट संकल्प सिद्धीस नेतो त्याच्यावर जळफळू नकोस!” (स्तोत्र 37:7). “….. दुराचारी संपन्न झालें आहेत; त्यांनी देवाची परीक्षा पाहिली तरी त्यांचा निभाव लागला आहे” (मलाकी 3:15).

तर नीतिमानांना मात्र ह्या जीवनात पुष्कळ संकटांतून जावें लागते आणि त्यांच्या चांगुलपणाचे प्रतिफळ त्यांच्याशी गैरवर्तन करून दिले जाते. “जर आम्हीं आपल्या देवाचे नाव विसरलो असतो….., तर देवानें हे शोधून काढले नसते काय?  तरी तुझ्यामुळे आमचा वध सतत होत आहे; कापायच्या मेंढरांसारखे आम्हांला गणतात” (स्तोत्र 44:20-22). स्वतः स्तोत्रकर्त्यांना याची जाणीव होती. आम्हीं एखाद्या अशा गोष्टी विरोधांत आरडाओरडा करित नाहींये ज्या विषयीं त्यांना पूर्वीपासून कल्पना नव्हती.

यास्तव, जेव्हां स्तोत्रकर्ता म्हणतो, “जे काही तो हाती घेतो ते सिद्धीस जाते,” तो त्याचा अति भाबडेपणा नाही. तर ज्यां गोष्टी त्याला ह्या जीवनांत अंधुक दिसून येतांत त्याद्वारे तो मृत्यूनंतरच्या जीवनाकडे इशारा करतो, जिथे आपण केलेल्या सर्व गोष्टींचे खरे प्रतिफळ – म्हणजे खरी समृद्धी प्रकट केलीं जाईल.

पौलाची विचारसरणी हींच होती.

प्रथम, तो मृत्यूवर ख्रिस्ताच्या विजयाचे स्तुतीगान करतो. “अरे मरणा, तुझी नांगी कोठे?’ . . जो देव आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे आपल्याला जय देतो त्याची स्तुती असो” (1 करिंथ 15:55, 57).

मग, तो असा अर्थ काढतो कीं, या विजयामुळेच, विश्वासनाऱ्यानी केलेले प्रत्येक श्रम सिद्धीस जाईल. “म्हणून माझ्या प्रिय बंधूंनो, प्रभूमध्ये तुमचे श्रम व्यर्थ नाहीत हे तुम्हीं जाणून आहात” (1 करिंथ 15:58). जेव्हां एखादी गोष्ट व्यर्थ जात नाहीं, म्हणजेच ती सिद्धीस जाते.

ज्यां अर्थी ख्रिस्त आमचा प्रतिस्थापक म्हणून मरण पावला म्हणून, त्यां अर्थी त्यानें या गोष्टीची खात्री दिली कीं शेवटी प्रत्येक सत्कृत्य सिद्धीस जाईल. “प्रत्येक जण…… जे काही चांगले करतो, तेच तो प्रभूकडून भरून पावेल” (इफिस 6:8). “जेव्हां लोक तुमची निंदा करतील तेव्हां तुम्हीं धन्य. . . . आनंद करा, उल्लास करा, कारण स्वर्गात तुमचे प्रतिफळ मोठे आहे” (मॅथ्यू 5:11-12). येथें निंदा केलीं. स्वर्गांत प्रतिफळ मिळेल.

जुन्या करारात जी गोष्ट अति भाबळेपणाची वाटते (“जे काही तो हाती घेतो ते सिद्धीस जाते”) ती ख्रिस्ताच्या कार्याकडे आणि पुनरुत्थानाच्या निर्विवाद सत्याकडे इशारा करते. कॅथरीना फॉन श्लेगेलच्या त्या महान भजनातील शब्दांप्रमाणे, “हें माझ्या जीवा, शांत बैस, हें माझ्या जीवा शांत बैस: तु तुझ्या येशूकडून भरून पावशील / तो सर्व आपल्या पूर्णत्वांतून देतो.”

5 फरवरी : आज के लिए पर्याप्त

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“हमारी दिन भर की रोटी हर दिन हमें दिया कर।”  लूका 11:3

यदि सम्पूर्ण इतिहास में रोटी ने किसी एक बात को दर्शाया है, तो वह है दिन भर का पोषण। अन्य भोजन वस्तुएँ निश्चित रूप से हमारे अस्तित्व में सुखद योगदान प्रदान करती हैं, किन्तु जब हम रोटी के बारे में सोचते हैं तो हममें से अधिकांश लोग जीवन की सबसे मौलिक आवश्यकताओं में से एक के पूरा होने के बारे में सोच रहे होते हैं।

इस तरह की सोच परमेश्वर द्वारा अपने लोगों के लिए किए गए अनोखे प्रावधान के समान है। पुराने नियम में इस्राएलियों के मरुभूमि में भटकने के समय उन्हें अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा किए जाने के लिए परमेश्वर पर पूरी तरह निर्भर रहना होता था। इस बात को सीखने का सबसे ठोस तरीका था, स्वर्ग से मिलने वाले मन्ना के रूप में परमेश्वर का प्रावधान।

परमेश्वर ने अपने लोगों को यह स्पष्ट कर दिया था कि प्रतिदिन वह केवल एक दिन के लिए ही पर्याप्त मन्ना देगा। उन्हें अगला दिन होने तक उसमें से कुछ भी बचाकर नहीं रखना था (निर्गमन 16:19)। एक बार में एक दिन की रोटी देने में उसका उद्देश्य था, अपने लोगों को उसके प्रावधान पर भरोसा करना सिखाना। दुख की बात है कि कुछ इस्राएलियों को सन्देह था कि वह जो प्रतिज्ञा कर रहा था, वह उसे पूरा करेगा भी या नहीं। उन्होंने उसकी अवज्ञा की और कुछ मन्ना अगले दिन के लिए रख छोड़ा (क्योंकि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर सन्देह करना सदैव परमेश्वर की आज्ञाओं की अवज्ञा करने की ओर ले जाता है)। जब वे सबेरे उठे तो बदबूदार, कीड़ों से भरा हुआ मन्ना उनके सामने था (पद 20)। परमेश्वर उन्हें सिखा रहा था कि वे अपने प्रावधान के लिए उस पर भरोसा करें। यह एक ऐसी सीख थी, जिसे सीखने में उन्हें बहुत समय लगने वाला था।

जब हम पुराने नियम के इस उदाहरण के प्रकाश में इन शब्दों पर विचार करते हैं कि “हमारी दिन भर की रोटी हर दिन हमें दिया कर,” तो हम महसूस करते हैं कि प्रभु की प्रार्थना की इस पंक्ति में यीशु एक अनन्त वास्तविकता पर जोर दे रहा है: हर युग में परमेश्वर अपने लोगों को सिखाता है कि वे केवल प्रावधान पर भरोसा न रखें, क्योंकि ऐसा होने पर वे अधिक से अधिक पाने की लालसा करते रहेंगे, इसके विपरीत वह चाहता है कि हम प्रावधान करने वाले  पर भरोसा रखें, जो हमारी प्रत्येक आवश्यकता को पूरा करता है।

परमेश्वर चाहता है कि हम जागें और उसके दैनिक प्रावधान को नए सिरे से प्राप्त करें। यही कारण है कि उसने इस्राएलियों को भावी पीढ़ी के लिए थोड़ा सा मन्ना रखने की आज्ञा दी और कहा कि “इसमें से ओमेर भर अपने वंश की पीढ़ी-पीढ़ी के लिए रख छोड़ो, जिससे वे जानें कि यहोवा हमको मिस्र देश से निकालकर जंगल में कैसी रोटी खिलाता था” (निर्गमन 16:32)। इस निर्देश का पालन करते हुए एक पीढ़ी अगली पीढ़ी से उसके निरन्तर मिलने वाले दैनिक प्रावधान की वास्तविकता और चमत्कार के बारे में बात कर सकती है।

वह पिता, जिसे हम यीशु के द्वारा जानते हैं, हमारी व्यक्तिगत, व्यावहारिक और भौतिक आवश्यकताओं की चिन्ता करता है। हो सकता है कि आज सबेरे जब आप उठे हों, तो अपने जीवन में चल रही समस्याओं से घिरे हुए या आने वाली घटनाओं के बारे में चिन्तित महसूस कर रहे हों। इस बात को याद रखें कि परमेश्वर आपसे व्यक्तिगत रीति से लगाव रखता है, और आप विश्वास के साथ उसके पास जा सकते हैं और उससे कह सकते हैं कि वह आपके आज के लिए सभी आवश्यक वस्तुएँ आपको दे। और फिर आप उस पर भरोसा कर सकते हैं कि वह आपको आज, और फिर कल, और सदा तक वह सब प्रदान करेगा जिसकी आपको आवश्यकता होगी। आप अपनी चिन्ताओं का पूरा भार उस पर डाल सकते हैं, क्योंकि वह आपकी चिन्ता करता है और आपके लिए प्रावधान करता है (1 पतरस 5:7)।

     निर्गमन 16

5 फेब्रुवारी : सेवेचा मुख्य हेतू

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5 फेब्रुवारी : सेवेचा मुख्य हेतू
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परंतु ज्यांचा नाश होईल अशा ‘माघार घेणार्‍यांपैकीं’ आपण नाहीं; तर जिवाच्या तारणासाठीं ‘विश्वास ठेवणार्‍यांपैकीं’ आहों. (इब्रीलोकांस 10:39)

प्रेमाची तत्कालीन किंमत काय आहे त्यांकडें पाहूं नका आणि देवानें जीं अढळ अशी श्रेष्ठ अभिवचनें दिलीं त्यांवर विश्वास ठेवण्यापासून माघार घेऊं नका. जर तुम्हीं माघार घेणारें झालांत, तर तुम्हीं केवळ अभिवचनांनाच मुकणार नाहीं तर तुमचा नाशहि होईल.

आपण माघार घेतो कीं विश्वासांत टिकून राहतो हा जीवन-मरणाचा विषय आहे. आपण जें गमावतो तें केवळ असें कांही प्रतिफळ नाहीं जें तारणाबरोंबर अतिरिक्त दिलें जातें. इब्री 10:39 म्हणते, “ज्यांचा नाश होईल अशा ‘माघार घेणार्‍यांपैकीं’ आपण नाहीं.” हा सर्वकाळासाठीं केला जाणारा शेवटचा न्याय आहे.

म्हणून, आम्हीं एकमेकांना बजावून सांगतो: माघार घेऊं नका. ह्या जगावर प्रीति करूं नका. इतका मोठा धोका नाहीं असा विचारहि करूं नका. आपल्या अंत:करणांत देवाच्या अभिवचनांना पापाच्या अभिवचनांपेक्षा मोठी गोष्ट न मानल्यांस जे भयंकर परिणाम भोगावें लागतील त्याची भीती बाळगा. इब्री लोकांस 3:13-14 म्हणते, “जोपर्यंत “आज” म्हटलेंला वेळ आहे तोपर्यंत तुम्हीं एकमेकांना प्रतिदिवशी बोध करा; हेतू हा कीं, पापाच्या फसवणुकींने तुमच्यातील कोणी ‘कठीण होऊ’ नये. कारण जर आपण आपला आरंभीचा भरवसा शेवटपर्यंत दृढ धरला तरच आपण ख्रिस्ताचे भागीदार झालो आहों.”

परंतु मुख्यतः आपण अभिवचनांचे मोल काय आहे यावर अधिक लक्ष केंद्रित करणें आणि ख्रिस्तानें आपल्यासाठीं विकत घेतलेलें प्रतिफळ किती मोठे आहे त्याचे मोल इतर सर्व गोष्टींपेक्षा अधिक समजणे व एकमेकांना देखील तसा बोध करणें अगत्याचे आहे. इब्री 10:35 काय सांगते हें आपण एकमेकांना सांगितलें पाहिजे: “म्हणून आपलें धैर्य सोडू नका, त्याचे प्रतिफळ मोठे आहे.” आणि मग तें प्रतिफळ किती मोठे आहे हें आपण  एकमेकांना दाखवून दिलें पाहिजे.  

उपदेशाची प्रमुख विषयवस्तु हींच आहे, आणि मंडळी लहान असों वां मोठी, सर्व प्रकारच्या सेवेचा मुख्य हेतू हांच आहे: ख्रिस्तानें जे विकत घेतलें आहे त्याचे प्रतिफळ किती मोठे हे त्या लोकांना जें त्या प्रतिफळाला जगापेक्षा अधिक महत्त्व देतील, दाखवून देणें. लोकांनी ते पाहावें आणि त्याची चव घ्यावी म्हणून त्यांची मदत करणें, ह्यासाठीं कीं त्यांना जी शांती मिळेल त्याद्वारे आणि त्यांच्या अंतःकरणातून उपकारस्तुतीचा जो यज्ञ सादर केला जाईल त्याद्वारे देवाचे श्रेष्ठत्व प्रकाशमान व्हावें.

4 फरवरी : तेरा राज्य आए

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4 फरवरी : तेरा राज्य आए
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“तेरा राज्य आए।”  लूका 11:2

परमेश्वर का राज्य आज तक के या भविष्य के किसी भी सांसारिक साम्राज्य से बहुत अलग है। सांसारिक साम्राज्य उन हाकिमों के अधिकार में होते हैं, जिनकी शक्ति सीमित होती है और निस्सन्देह घटती जाती है। परन्तु परमेश्वर का राज्य किसी भू-राजनीतिक इकाई या इतिहास के किसी हिस्से से कहीं अधिक है। वह सदाकाल का है, सार्वभौमिक है और व्यक्तिगत है, और अपने इस राज्य पर उसका प्रभुत्व सब पीढ़ियों तक बना रहेगा (भजन 145:13)।

जब हम प्रार्थना करते हैं कि “तेरा राज्य आए” तो हमें इन सच्चाइयों को ध्यान में रखना चाहिए। जब ​​हम यीशु के उदाहरण का अनुसरण करते हुए इस प्रकार से प्रार्थना करते हैं, तो वास्तव में हम जो माँग रहे होते हैं उनमें से एक बात यह भी होती है कि परमेश्वर का सम्प्रभु प्रभुत्व हमारे हृदयों और जीवन में अधिकता से स्थापित होता जाए। हम यह प्रार्थना कर रहे होते हैं कि जो मसीह को जानते हैं वे उसके प्रभुत्व के प्रति बढ़ती हुई आनन्दमय अधीनता में रहने पाएँ।

जिन वैश्विक-दृष्टिकोणों का हम प्रतिदिन सामना करते हैं, यह उनसे बहुत अलग है। अधिकांशतः, आज की पश्चिमी संस्कृति व्यक्तिगत उपलब्धि और आत्मनिर्भरता की प्रशंसा करती है। हमें यह मानने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि सब कुछ हमारे नियन्त्रण में हैं। किन्तु जब परमेश्वर का राज्य हमारे जीवन में आ जाता है, अर्थात् जब हम यीशु से प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे हृदय के सिंहासन पर अपना यथोचित स्थान ग्रहण करे, तब एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन घटित होता है। हम अब पाप के दासत्व में नहीं रह जाते। सृष्टि का राजा हमारे जीवन में वास करने लगता है और वह हमें अपने पुत्र के स्वरूप के अनुरूप बनाना आरम्भ कर देता है (रोमियों 8:29)। जब हम इस प्रकार से प्रार्थना करते हैं, तो पवित्र आत्मा हमारे जीवन के प्रत्येक आयाम पर परमेश्वर के शाही प्रभुत्व की स्थापना करने के द्वारा हमारी सहायता करने लगता है।

इतना ही नहीं, जब हम प्रार्थना करते हैं कि “तेरा राज्य आए,” तब हम यह भी स्वीकार रहे होते हैं कि परमेश्वर देश-देश पर राजा है, अर्थात् वह वर्तमान समय की सभी बातों पर प्रभुत्व करता है। यशायाह इस प्रकार वर्णन करता है कि परमेश्वर दूर-दूर की जातियों को “सीटी बजाकर पृथ्वी के छोर से बुलाएगा; देखो वे फुर्ती करके वेग से आएँगे!” (यशायाह 5:26)। यह राजा दूर-दूर की जातियों को इस प्रकार बुलाता है, जैसे हम अपने पालतू कुत्ते को अन्दर आने के लिए बुलाते हैं। जब वह सीटी बजाता है, तो वे उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए दौड़ पड़ते हैं।

तो फिर हमें सांसारिक शक्तियों में होने वाले किसी भी फेरबदल से घबराने या सब कुछ अपने नियन्त्रण में रखने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, हम प्रभु में, अर्थात अपने राजा में आनन्दित रह सकते हैं, जो इन सभी बातों पर सम्प्रभु है।

उसका राज्य कभी विफल नहीं हो सकता,

वह पृथ्वी और स्वर्ग पर राज्य करता है;

मृत्यु और नरक की कुंजियाँ

हमारे यीशु को दी गई हैं: अपना भरोसा परमेश्वर में रखो,

अपनी आवाज़ उठाओ!

आनन्दित हो, मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित हो! [1]

 भजन संहिता 2

4 फेब्रुवारी : दुःखाचे पाच उपयुक्त उद्देश

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4 फेब्रुवारी : दुःखाचे पाच उपयुक्त उद्देश
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मी पीडित होण्यापूर्वी भटकत असें, पण आतां मी तुझें वचन पाळत आहे. (स्तोत्र 119:67)

हें वचन प्रकट करते कीं देव आपल्याला दुःख देतो ते हेतूनें कीं आपण त्याचे वचन पाळण्यांस शिकावे. हा हेतू कसा सिद्धीस जातो? दुःख आपल्याला देवाचे वचन शिकण्यास आणि त्याचे पालन करण्यास कसे उपयुक्त ठरते?

आम्हांवर होत असलेल्यां या महान दयेचे असंख्य अनुभव असल्या कारणानें या प्रश्नांची असंख्य उत्तरे आहेत. परंतु खाली पाच उत्तरं आहेत:

1. दु:ख आमच्यांत असलेली जीवनाविषयीची चंचल वृत्ती किंवा मानसिकता दूर करते आणि आपल्याला जीवनाविषयी अधिक गंभीर बनवते, म्हणजे आपल्या मनाचा कल देवाचे वचन जितके गंभीर आहे तितका त्यां गांभीर्याशी अधिक सुसंगत बनतो. आणि हें लक्ष्यांत ठेवा: देवाच्या पुस्तकात एकही पान चंचल वृत्तीचे नाहीं.

2. दु:ख आपले सर्व जगिक आधार काढून टाकते व आपण देवावर अधिक आणि अधिक विसंबून राहावे यासाठीं भाग पाडते, ज्यामुळें आपण त्याच्या वचनाशी समरूप व्हावें हा त्याचा उद्देश सिद्धींस जातो. कारण आपण देवावर आशा ठेवणारे आणि त्याच्यावर विश्वास ठेवणारे असावे हांच त्याच्या वचनाचा उद्देश आहे. “जे काही शास्त्रात पूर्वी लिहिले ते सर्व आपणांस शिक्षण मिळण्याकरितां लिहिलें यासाठीं कीं शास्त्रापासून मिळणार्‍या सहनशीलतेच्या व समाधानाच्या योगे आपल्याला आशा प्राप्त व्हावीं” (रोमकरांस 15:4). “येशू हा देवाचा पुत्र ख्रिस्त आहे असा तुम्हीं विश्वास ठेवावा, आणि विश्वास ठेवून तुम्हांला त्याच्या नावाने जीवन प्राप्त व्हावे म्हणून ही लिहिली आहेत” (योहान 20:31).

3. दु:ख आपल्याला हाताशेवत पवित्र शास्त्रांत शोध घ्यावयांस अधिक उत्कंठीत करते कारण आपण दु:खाला जीवनाशी जुळलेली किरकोळ गोष्टीं मानण्याऐवजी त्याचे समाधान शोधतो. “तुम्हीं मला शरण याल आणि पूर्ण जिवेभावे माझ्या शोधास लागाल, तेव्हां मी तुम्हांला पावेन” (यिर्मया 29:13).

4. दु:ख आपल्याला ख्रिस्ताच्या दु:खाचे सहभागी बनविते, ज्यामुळें आपण त्याच्याशी अधिक घनिष्ठ सहभागी ठेवतो आणि या जगाची नश्वरता त्याच्या दृष्टिने अधिक सहजपणें पाहू शकतो. पौलाच्या मनाची उत्कंठा हीं होती कीं त्यानें “तो (ख्रिस्त) व त्याच्या पुनरुत्थानाचे सामर्थ्य व त्याच्या दुःखाची सहभागिता ह्यांची, त्याच्या मरणाला अनुरूप होऊन ओळख करून घ्यावी” (फिलिप्पैकरांस 3:10).

5. दु:ख फसव्या आणि विचलित करणाऱ्या देहाच्या वासनांना जिवे मारते व आपल्याला अधिकाधिक आध्यात्मिक मार्गनुसारी बनविते व आपल्याला देवाचे आध्यात्मिक वचन ग्रहण करणारें असें लोक बनवते. “ख्रिस्तानें देहाने दुःख सोसले तसेच तुम्हींही तेच मनोवृत्तिरूपी शस्त्र धारण करा; कारण ज्याने देहाने दुःख सोसले आहे तो पापापासून निवृत्त झाला आहे” (1 पेत्र 4:1). दुःखामध्यें पापाला जिवे मारण्याची शक्ती असते. आणि आपण जितके शुद्ध होत जातो तितकेच आपण देवाला अधिक स्पष्टपणे पाहण्यांस समर्थ होत जातो (मत्तय 5:8).

दु:खाद्वारें देव आम्हांला जें शिक्षण देऊं पाहतो त्याचा आपण द्वेष करूं नये अशी पवित्र आत्मा आम्हांस कृपा पुरवो.

3 फरवरी : हम उसे पिता कहते हैं

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3 फरवरी : हम उसे पिता कहते हैं
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“जब तुम प्रार्थना करो तो कहो: ‘हे पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाए।’”  लूका 11:2

जब किसी बच्ची को गोद लिया जाता है, तो उसका पूरा जीवन बदल जाता है। उसे एक नया नाम, एक नया परिवार और प्रायः एक बिल्कुल अलग जीवनशैली मिल जाती है। परन्तु उस बच्ची में शायद उस परिवार से जुड़े होने की सच्ची भावना न हो, तौभी कानूनी वास्तविकता कायम रहती है। किसी बच्चे का एक घर में आकर रहना एक बात है, परन्तु उस परिवार के साथ जुड़ने का पूरी तरह से अनुभव करना और उसे व्यक्त करना, अर्थात् अपने नए माता-पिता को “मम्मी-डैडी” कहना, एक पूरी तरह से अलग ही गहन वास्तविकता होती है।

जब हम यीशु मसीह में विश्वास का अंगीकार करते हैं, तो हमें आत्मिक तौर पर गोद लिए जाने के बारे में भी यही बात लागू होती है। हमें गोद लिया जाना हमारी अवस्था को पूर्ण रीति से, सदा के लिए और निर्विवाद रूप से बदल देता है। परन्तु परमेश्वर केवल नाम परिवर्तन से सन्तुष्ट नहीं होता। वह चाहता है कि हम जानें कि उसके बेटे और बेटियाँ होने का क्या अर्थ है। वह चाहता है कि हम उसे अपने स्वर्गिक पिता के रूप में मानने का आश्चर्यजनक अनुभव प्राप्त करें। ऐसा करने के लिए वह अपना आत्मा प्रदान करता है, ताकि हमारे चरित्र को आकार मिले और उसके साथ अपने सम्बन्ध को बच्चे और पिता के रूप में देखने में हमें सहायता मिले। पौलुस ने गलातियों की कलीसिया से कहा, “और तुम जो पुत्र हो, इसलिए परमेश्‍वर ने अपने पुत्र के आत्मा को, जो ‘हे अब्बा, हे पिता’ कहकर पुकारता है, हमारे हृदयों में भेजा है” (गलातियों 4:6)।

मसीही अनुभव केवल एक कानूनी काम की तरह नहीं होना चाहिए। यह किसी नीति या सिद्धान्त से कहीं बढ़कर है। उद्धार केवल पापों की क्षमा नहीं है; यह तो आत्मा द्वारा सशक्त परिवर्तन का स्वागत करना भी है। मसीहियत कोई मशीनी काम नहीं है, बल्कि एक सम्बन्ध है। यीशु ने क्रूस पर जो काम सबके लिए निष्पक्ष रूप से और कानूनी तौर से पूरा किया है, उसे पवित्र आत्मा हमारे हृदय में व्यक्तिगत रीति से और अनुभव के द्वारा जारी रखता है। हमें बचा लिया गया है, स्वीकार कर लिया गया है और हमसे प्रेम किया गया है। इस परिवर्तन के साथ अब हम भक्ति, सरगर्मी, आँसू, ज्ञानोदय, सहभागिता और अन्ततः स्तुति की आशा कर सकते हैं।

जब परमेश्वर की सन्तानों के रूप में अपनी नई अवस्था को भूल जाने प्रलोभन हमारे सामने आता है, तो आत्मा यह साक्षी देने के लिए प्रतीक्षा कर रहा होता है कि नहीं, तुम सचमुच उसके हो! तुम्हें सबसे बड़ा दाम देकर मोल लिया गया है। तुमसे प्रेम किया गया है और तुम बहुत दुलारे हो।  जब हम वैसा नहीं करते जैसा परमेश्वर चाहता है और जब हम चोटिल, टूटे हुए और निराश महसूस करते हैं, तो आत्मा हमें इस प्रकार पुकारने में सहायता करता है, “हे पिता, पिता, क्या आप कृपया मेरी मदद कर सकते हैं?” ऐसी विनतियाँ हमें याद दिलाती हैं कि यीशु ने कैसा अचम्भे भरा काम किया है, अर्थात् उसके बलिदान से हमें छुटकारा मिला है और उसका आत्मा हमारे हृदयों में वास करने के लिए आ गया है। इनके बिना हमारे सृष्टिकर्ता और हमारे न्यायी होने के अतिरिक्त परमेश्वर के साथ हमारा कोई अन्य सम्बन्ध नहीं होगा और फिर हमारे दिलों को “हे अब्बा! हे पिता!” कह कर पुकारने का कोई अवसर नहीं मिलेगा।

परमेश्वर किसी विशेष चिह्न या वरदान से नहीं, परन्तु अपने आत्मा की प्रेरक साक्षी के द्वारा पुत्र और पुत्रियों के रूप में हमें गोद लिए जाने पर मुहर करता है। जैसे-जैसे हम प्रार्थना में उससे बात करते जाते हैं, उसके वचन के द्वारा उससे सुनते हैं, और उसके साथ चलते जाते हैं, वैसे-वैसे हम उसके सामर्थ्य और हमारे भीतर उसके कार्य के बारे में जागरूकता में बढ़ते जाते हैं। क्योंकि हम पाप के शाप से मुक्त हो चुके हैं और हमें गोद लिए जाने की आशीष दे दी गई है, इस कारण हम परमेश्वर को पिता कहकर पुकार सकते हैं, उससे प्रेम रख सकते हैं और आत्मा तथा सच्चाई से उसकी आराधना कर सकते हैं। इसलिए मसीहियो, आज आपसे सम्बन्धित सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि आप परमेश्वर की गोद ली गई सन्तान हैं। कोई भी व्यक्ति या कोई भी ताकत इस सच्चाई को बदल नहीं सकती। इसलिए आज चाहे आप कैसा भी महसूस क्यों न कर रहे हों, इस सच्चाई को सबसे अधिक ढाढ़स देने वाली, आधार प्रदान करने वाली, आश्वस्त करने वाली और प्रेरित करने वाली बात बना लें कि आप परमेश्वर की सन्तान हैं।

 रोमियों 8:12-25

3 फेब्रुवारी : सर्वात मोठी प्रीति

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3 फेब्रुवारी : सर्वात मोठी प्रीति
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मुलांनो, मी तुम्हां लिहितो, कारण त्याच्या नावामुळें तुमच्या पापांची तुम्हां क्षमा झाली आहे. (1 योहान 2:12)

देव “त्याच्या नावामुळें” म्हणजे त्याच्या स्वतःच्या गौरवासाठीं आम्हांवर प्रेम करतो, आम्हांला क्षमा करतो आणि तारतो यावर भर देणे का महत्वाचे आहे? त्याची कारणे आहेत, त्यांपैकीं दोन येथें सांगितले आहें.

1) आपण यावर भर देणे कीं देव त्याच्या स्वतःच्या गौरवासाठीं प्रीति करतो आणि क्षमा करतो यामुळें महत्वाचे आहे कारण बायबल यावर भर देते.

मी आपल्याकरितां  तुझे अपराध पुसून टाकितो; मीच तो, तुझी पातकें स्मरत नाहीं (यशया 43:25)

हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं  माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर; कारण ती फार झाली आहे. (स्तोत्र 25:11)

हे आमच्या उद्धारक देवा, तू आपल्या नावाच्या महिम्यासाठीं आम्हांला साहाय्य कर; आपल्या नावासाठीं आम्हांला सोडव व आमची पातके धुऊन टाक! (स्तोत्र 79:9)

हे परमेश्वरा, आमचे अपराध जरी आमच्याविरुद्ध साक्ष देतात तरी तू आपल्या नामास्तव कार्य कर. (यिर्मया 14:7)

हे परमेश्वरा, आमची दुष्टता, आमच्या पूर्वजांचे दुष्कर्म, आम्हीं जाणतो; आम्हीं तुझ्याविरुद्ध पाप केले आहे. तू आपल्या नामास्तव आमचा वीट मानू नकोस; तुझ्या वैभवाच्या गादीची अप्रतिष्ठा करू नकोस. (यिर्मया 14:20-21)

त्याच्या रक्ताने विश्वासाच्या द्वारे प्रायश्‍चित्त होण्यास देवानें त्याला [ख्रिस्ताला]  पुढे ठेवले. ह्यासाठीं कीं, पूर्वी झालेल्यां पापांची देवाच्या सहनशीलतेनें उपेक्षा झाल्यामुळे त्यानें आपले नीतिमत्त्व व्यक्त करावे; म्हणजे आपले नीतिमत्त्व सांप्रतकाळी असे व्यक्त करावे कीं, आपण नीतिमान असावे आणि येशूवर विश्वास ठेवणार्‍याला नीतिमान ठरवणारे असावे. (रोमकरांस 3:25-26)

त्याच्या नावामुळे तुमच्या पापांची तुम्हांला क्षमा झाली आहे. (1 योहान 2:12)

2) आपण यावर भर देणे कीं देव त्याच्या स्वतःच्या गौरवासाठीं प्रीति करतो आणि क्षमा करतो यामुळें महत्वाचे आहे कारण त्यामुळें हे स्पष्ट होते कीं  देव आपल्यावर मोठे प्रेम करतो.

हे माझ्या पित्या, माझी अशी इच्छा आहे कीं, तू जे मला दिले आहेत त्यांनीही जेथे मी आहे तेथें माझ्याजवळ असावे; ह्यासाठीं कीं, जो माझा गौरव तू मला दिला आहेस तो त्यांनी पाहावा. (योहान 17:24)

देवाची आपल्यावरील प्रीति अशी प्रीति नाहीं कीं जी आपल्याला मोठे बनविते, तर ती अशी प्रीति आहे ज्याद्वारें तो स्वतःचा मोठेपणा दाखवून देतो. स्वर्ग हा आरशांचा प्रेक्षागृह नसून त्याच्या अविनाशी महानतेचा असा दृष्टीक्षेप असेल जिला तुम्हीं जितके अधिक दूरवर पाहाल तितकी दूरवर दिसून येईल. आपण अद्वितीय किंवा मोठे आहों या भावनेनें स्वर्गात जाणें निव्वळ फजिती ठरेल.

सर्वात मोठी प्रीति ह्या गोष्टीची खात्री करून घेते कीं देवच सर्व कांही अशा प्रकारे करतो कीं ज्यामुळें केवळ त्याच्या स्वतःच्या प्रभुत्वाचे सामर्थ्य व गौरवाची स्तुति होते, ह्यासाठीं कीं जेव्हां आपण स्वर्गात जाऊं तेव्हां आपला आनंद बहुगुणीत करणारी एक गोष्ट तेथें असेल: देवाचा गौरव. देवानें आपल्या स्वतःच्या पुत्रास राखून न ठेवता त्याला आपल्या सर्वांकरिता समर्पण केलें ही त्याची सर्वांत मोठी प्रीति होय (रोमकरांस 8:32). जेव्हां तो म्हणतो कीं तो आपल्यावर प्रीति करितो व आपल्या नावासाठीं   आमच्या अपराधांची क्षमा करितो तेव्हां त्याला हेंच म्हणायचे आहे.

2 फरवरी : प्रार्थना का विशेषाधिकार

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2 फरवरी : प्रार्थना का विशेषाधिकार
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“वह किसी जगह प्रार्थना कर रहा था। जब वह प्रार्थना कर चुका, तो उसके चेलों में से एक ने उससे कहा, ‘हे प्रभु, जैसे यूहन्ना ने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखाया वैसे ही हमें भी तू सिखा दे।’”  लूका 11:1

प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ हमारी सहभागिता मुख्य रूप से हमारी प्रार्थनाओं के माध्यम से व्यक्त होती है। वे उसके साथ हमारे सम्बन्ध का प्रमाण देती हैं। वह न केवल अपने वचन के माध्यम से हमसे बात करता है, अपितु उसने हमें प्रार्थना में उसके साथ बात करने का अद्‌भुत विशेषाधिकार भी सौंपा है।

पवित्रशास्त्र हमें स्वयं यीशु के प्रार्थना के जीवन के कई विवरण प्रदान करता है। इन अभिलेखों से हम जितना अधिक परिचित होंगे, उतना ही अधिक हम महसूस कर सकेंगे कि यीशु प्रार्थना को एक पवित्र आदत के रूप में लेता था। वह अपने पिता के समक्ष दिन की योजनाएँ रखने के लिए नियमित रूप से सुबह-सुबह प्रार्थना करता था। शान्त और एकान्त स्थान में की गई प्रार्थनाओं ने यीशु को सक्षम बनाया कि वह भीड़ के शोर और यहाँ तक कि अपने शिष्यों के अनुरोधों से बढ़कर अपने पिता की आवाज का अनुसरण करे। वह अपने सारे निर्णय प्रार्थना की सीमाओं में रहकर ही करता था।

यीशु के प्रार्थना के नियम ने उसके चेलों को यह निवेदन करने के लिए प्रेरित कर दिया, “हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।” स्पष्ट रूप से वे प्रार्थनाओं में उसकी गहनता और एकाग्रता से इतने प्रभावित हुए कि परमेश्वर पिता के साथ ऐसी ही घनिष्ठता के लिए उनके हृदयों में भी एक भूख उत्पन्न हो गई।

उनके अनुरोध के उत्तर स्वरूप यीशु ने अपने चेलों को निर्देश दिया कि वे “बक-बक न करें” या फिर “यह न सोचें कि उनके बहुत से शब्दों के कारण उनकी सुनी जाएगी” (मत्ती 6:7)। दूसरे शब्दों में, प्रार्थना करते समय हमें बड़बड़ाने या बहुत अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत यीशु द्वारा दिए गए उदाहरण में अर्थात् प्रभु की प्रार्थना में हम पाते हैं कि परमेश्वर की आत्मिक सन्तानें परमेश्वर को सीधे-सीधे और सहज रीति से अपने स्वर्गिक पिता के रूप में सम्बोधित करने के लिए स्वतन्त्र हैं।

हमें किस बात के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? सबसे पहले तो हमें यह माँगना है कि परमेश्वर के नाम का उचित आदर हो, कि वह हमारे भीतर और हमारे आस-पास अपना राज्य लेकर आए और वह हमारी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे। हमें पश्चाताप करने की अपनी दैनिक आवश्यकता, दूसरों को क्षमा करने की आवश्यकता और प्रलोभन से बचने के लिए परमेश्वर पर अपनी निर्भरता को स्वीकारना है। यीशु ने समझाया कि अपनी प्रार्थनाओं में हमें प्रतिदिन के जीवन में परमेश्वर की महिमा और अनुग्रह को देखने का प्रयास करना है और उसी की माँग करनी है।

हमारी मसीही यात्रा में एक अर्थपूर्ण प्रार्थना के जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण और कुछ भी नहीं है। प्रार्थना के ऐसे जीवन को बनाए रखने से अधिक कठिन भी और कुछ नहीं है। किन्तु हमारे लिए सहायता उपलब्ध है। यदि परमेश्वर के दिव्य पुत्र यीशु को प्रार्थना करने की आवश्यकता थी, तो आपको और मुझे भी है। हमें दीन करने वाला यह विचार ही हमें अपने घुटनों पर ले जाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। और जब हम अपने घुटनों पर हों, तो हम अपनी प्रार्थना में सहायता के रूप में प्रभु की प्रार्थना का मुक्त रूप से उपयोग कर सकते हैं। परमेश्वर ने आपको प्रार्थना में उसके पास जाने और उसे पिता कहकर सम्बोधित करने का एक विशेषाधिकार दिया है। वह सुनने और सहायता करने के लिए तत्पर रहता है। प्रार्थना को अपनी एक पवित्र आदत बना लें और इसे एक अतिरिक्त विकल्प के तौर पर कदापि न लें।

लूका 11:1-13

2 फेब्रुवारी: पापक्षेमेचें चक्र

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2 फेब्रुवारी: पापक्षेमेचें चक्र
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“आणि आम्हांला आमच्या पापांची क्षमा कर, कारण आम्हींहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो; आणि आम्हांला परीक्षेत आणू नकोस.” (लूक 11:4)

मुळांत कोण कोणाला आधी क्षमा करतो?

  • एकीकडे, येशू म्हणतो, “आम्हांला आमच्या पापांची क्षमा कर, कारण आम्हींहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो.” (लूक 11:4)
  • तर दुसरीकडे, पौल म्हणतो, “प्रभूने तुम्हांला क्षमा केलीं तशी तुम्हींहि करा.” (कलस्सैकर 3:13)

जेव्हां येशू आम्हांला अशी प्रार्थना करण्यास शिकवतो कीं देवानें आम्हांला आमच्या पापांची क्षमा करावी “कारण आम्हींहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो,” तेव्हां त्याच्या म्हणण्याचा अर्थ असा नाहीं कीं क्षमा करण्याचे पहिले पाऊल आम्हीं उचललें होतें. या उलट, अर्थ असा आहे: आम्हीं ख्रिस्तावर पहिल्यांदा विश्वास ठेवला त्यावेळीच देवानें आम्हांला क्षमा केलीं (प्रेषितांची कृत्ये 10:43). मग, या भग्न झालेल्यां, आनंदी, कृतज्ञ, आमचीहि क्षमा करण्यांत आली या आशादायक अनुभवातून, आपणहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो.

ही क्षमाशील भावना असें ठळकपणे प्रकट करते कीं आपल्याला क्षमा करण्यात आली आहे जिचे फळ तारण आहे. म्हणजे, जेव्हां आम्हीं एकमेकांना क्षमा करतो तेव्हां आपल्याठायीं विश्वास असल्याचे दिसून येते; आपण ख्रिस्ताबरोंबर एकरूप झालों आहों; आमच्याठायीं दया करणारा व आम्हांला दीन अंत:करण देणारा पवित्र आत्मा वसतो.

तरी आपण वेळोवेळी पाप करतो (1 योहान 1:8, 10). म्हणून आपण वेळोवेळी ख्रिस्तानें आमच्यासाठीं केलेल्यां प्रायश्चित्ताची नव्याने आठवण ठेऊन देवाकडे वळतो – म्हणजे पुन्हा एकदा पापांची क्षमा मागतो. जर आम्हांमध्यें एकमेकांना क्षमा करणारा आत्मा वस्ती करित नसेल तर आपणहि त्याच्याकडे क्षमायाचनेची मजल मारूं शकत नाही. (मत्तय18:23-35 मधील कृतघ्न (क्षमा न करणाऱ्या) चाकराचा दाखला लक्षात ठेवा. त्याला आपले एक कोटी रुपयाचे देणें माफ केलें गेलें, तरी देखील त्यानें मात्र आपल्या  सोबतीच्या दासाला पंचवीस रुपयाचे येणें माफ करण्यांस नकार दिला. त्यानें आपल्या कृतघ्न आत्म्याद्वारें दाखवून दिलें कीं राजानें त्याच्यावर केलेल्या दयेचा त्याच्यावर कांहीहि प्रभाव पडला नव्हता.)

या मूर्खपणापासून आम्हांला वाचविण्यासाठीं येशूनें आम्हांला अशी प्रार्थना करण्यास शिकविलें कीं, “आम्हांला आमच्या पापांची क्षमा कर, कारण आम्हींहि आपल्या प्रत्येक ऋण्याला क्षमा करतो” (लूक 11:4). म्हणून येशू म्हणतो कीं आम्हीं यासाठीं क्षमा मागतो कारण आम्हींहि क्षमाशील आहों. हे जणूं असे म्हणणें आहे कीं, ” हे पित्या, ख्रिस्तानें जी दया माझ्यासाठीं विकत घेतलीं आहे ती माझ्यावर कायमस्वरूपी असूं दें, कारण या दयेमुळेंच मला माझे अपराध क्षमा केलें गेलें आहेंत, आणि मी सूड घेणे सोडले आहे, आणि जशी तू माझ्यावर दया केलीं आहेस तशी मीहि इतरांना दया करीन.”

देव करो कीं, देवाची क्षमा काय आहे हें तुम्हीं आज पुन्हा नव्याने जाणून घ्यावें आणि देव करो कीं तुम्हीं एकमेकांना क्षमा करून तुमच्या अंत:करणांत असलेली दया ओसंडून वाहावी. आणि तुमच्या जीवनातील कृपेचा तो गोड अनुभव तुम्हाला तुमच्या तारणाची आणखी खात्री देवो, म्हणजे असें कीं जेव्हां तुम्हीं रक्तानें विकत घेतलेल्या क्षमेचा नव्याने अनुभव घेण्यासाठीं देवाकडे जाल, तेव्हां तुम्हीं जाणून घ्यावें कीं तो तुम्हांकडे स्वतःची एक अशी संतती म्हणून पाहतो जिच्या पापांची क्षमा झाली आहे व जी स्वतःहि इतरांना त्यांचे अपराध क्षमा करते.