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6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान

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6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान
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मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्तुएँ तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्ध, ग्रहण करने योग्य बलिदान है, जो परमेश्‍वर को भाता है।” फिलिप्पियों 4:18

यह आपके सोचने के लिए एक अद्‌भुत विचार है: आप परमेश्वर को प्रसन्न करने में सक्षम हैं।

यह एक चौंकाने वाला विचार है: कि हमारा सृष्टिकर्ता हमारे कार्यों से प्रसन्न होगा। फिर भी पवित्रशास्त्र हमें इस वास्तविकता को देखने के लिए प्रोत्साहित करता है। मसीही होने के नाते, हम अपने स्वर्गिक पिता की मुस्कान के तहत जीने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के लिए एक बाइबल में दी गई यह प्रेरणा एक बड़ा प्रोत्साहन है, “जैसे तुमने . . . परमेश्वर को प्रसन्न करना सीखा है . . . वैसे ही और भी बढ़ते जाओ” (1 थिस्सलुनीकियों 4:1)—और इसे करने का एक तरीका हमारा उदारता से दिया जाने वाला दान है, जो परमेश्वर के समक्ष “ग्रहण करने योग्य बलिदान” है। पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया के दान को पुराने नियम के पशु बलिदान के अभ्यास की शब्दावली में व्यक्त किया। जब पुराने नियम में परमेश्वर के लोग अपने होमबलि लाते थे, तो उन बलिदानों के साथ धूप भी जलाया जाता था। इसलिए इस बलिदान से एक आकर्षक सुगन्ध आती थी। एक भाव में, यह परमेश्वर की दृष्टि में बलिदान की मिठास और स्वीकृति का प्रतीक था। उसी तरह, परमेश्वर पहली शताब्दी में और अब इक्कीसवीं शताब्दी में अपने लोगों कहता है, जब तुम्हारा दान मेरे साथ मेल खाते हुए दिल से आता है, तो यह एक मधुर सुगन्ध उत्पन्न करता है, और तुम्हारा बलिदान मुझे प्रसन्न करता है।”

जब हम इस प्रकार के दान पर विचार करते हैं, तो हमें “बलिदान” शब्द को जल्दी से अनदेखा नहीं कर देना चाहिए। बलिदानी दान हमेशा उदार दान के समान नहीं होता। हमारे लिए यह सम्भव है कि हम उदार हों—जैसा कि सच में कई विश्वासियों होते हैं—बिना इसके कि हमारे जीवन या परिस्थितियों पर इसका कोई वास्तविक प्रभाव पड़े।

इसी बिन्दु को स्पष्ट करते हुए, यीशु ने अपने शिष्यों का ध्यान एक गरीब विधवा की ओर आकर्षित किया, जो मन्दिर में अपनी दशमाँश राशि दे रही थी। जब उसने देखा कि यह महिला ताम्बे के दो सिक्के, जो कुछ भी मूल्य नहीं रखते थे, खजाने में डाल रही थी तो उसने उसके आस-पास खड़े अमीर लोगों के उपहारों से उसकी तुलना करते हुए कहा, “इस कंगाल विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है। क्योंकि उन सबने अपनी-अपनी बढ़ती में से दान में कुछ डाला है, परन्तु इसने अपनी घटी में से अपनी सारी जीविका डाल दी है” (लूका 21:2-4)। अमीर लोगों का दान उदार था; परन्तु विधवा का दान बलिदानी था। उसने दान देने के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। और उसके प्रभु ने देखा और जो उसने देखा उससे प्रसन्न हुआ।

हम स्वभाव से बलिदानी दाता नहीं हैं। लेकिन पूरी मसीही यात्रा—प्राप्ति और दान में, देखभाल और साझेदारी में—आरम्भ से लेकर अन्त तक कृपा से भरी हुई है। जब हम एक ऐसे दिल से बलिदानी रूप में देते हैं, जो परमेश्वर को प्रसन्न करने की इच्छा करता है, तो वह वचन देता है कि वह “अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है, तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा” (फिलिप्पियों 4:19)। इसका भाव यह है कि हम मनन करें कि परमेश्वर ने हमें क्या दिया है, और परमेश्वर हमें क्या दे रहा है, और परमेश्वर हमें क्या देगा। जब हम ऐसा करते हैं, तो इससे हमारे दिल खुल जाते हैं और हम बलिदानी रूप से और खुशी से देने की शक्ति पाते हैं। और जब हम ऐसा करते हैं, तो हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।

फिलिप्पियों का व्यवहार, और उनके खाते का विवरण, यह दिखाता है कि वे वास्तव में इस पर विश्वास करते थे। आपके विवरण कितने हद तक इस विश्वास को दर्शाते हैं?

1 थिस्सलुनीकियों 4:1-12

1 मार्च : हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़

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1 मार्च : हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। और अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिए पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों।”  इफिसियों 1:3-5

परमेश्वर ने आपको बहुत पहले से प्रेम किया है।

इफिसियों को लिखे अपने पत्र के आरम्भ में पौलुस द्वारा स्तुति का इस प्रकार उण्डेला जाना, हमें उन सभी कार्यों की महिमा के बारे में बताता है, जो परमेश्वर ने मसीह में हमारे लिए किए हैं। इस काम को इतना प्रभावशाली बनाने वाली एक विशेषता यह है कि इसका आरम्भ परमेश्वर से होता है, जो हमें याद दिलाता है कि हमारे अस्तित्व में आने से पहले ही उसने लोगों को अपने पास लाने की पहल की। हमारे सामने यह प्रलोभन आ सकते हैं कि हमें मानवीय प्रयासों के द्वारा परमेश्वर की खोज करने की आवश्यकता है; और निस्सन्देह, संसार के कई धर्म यही बात सिखाते भी हैं। परन्तु अपने आरम्भ से ही बाइबल यह सिखाती है कि वास्तव में परमेश्वर स्वयं हम तक पहुँचता है।

मसीह में हमारा चुनाव सृष्टि की रचना के बाद किसी समय में किया गया कोई विचार नहीं है; यह सृष्टि की रचना से पूर्व अनन्त काल का विचार है। यह बात सच है कि हम स्वयं मसीह के पीछे चलने का निर्णय लेते हैं, किन्तु यह जानना कितनी दीनता लाता है कि यदि परमेश्वर ने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले नहीं चुना होता तो हम कभी भी परमेश्वर को नहीं चुन सकते थे। यदि उसने पहले आपको अपनी सन्तान बना लेने का निर्णय नहीं लिया होता, तो आप उसके पीछे चलने का निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते।

परमेश्वर की सम्प्रभुता के साथ मनुष्य के उत्तरदायित्व का सामंजस्य स्थापित करने में एक नाजुक तनाव व्याप्त होता है। बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें इन दोनों में से किसी एक को चुनना होगा, जबकि वास्तव में दोनों ही विचार बाइबल आधारित हैं और आपस में जुड़े हुए हैं। ये दो ऐसे सत्य हैं, जो एक दूसरे से जुड़े हुए और एक ही ओर उन्मुख हैं। ये हमारे सीमित मानवीय मनों को परस्पर-विरोधी लगते हैं, परन्तु फिर भी दोनों पूरी तरह से सत्य हैं। हमें इनको वास्तविकता से परे सिद्धान्तों के रूप में लेते हुए उनके बारे में बहुत अधिक चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की हमारे पक्ष में हुई दया से चकित होते हुए हम आदर के साथ प्रत्युत्तर दे सकते हैं।

चुनाव की सैद्धान्तिक शिक्षा कोई ऐसा ध्वज नहीं है जिसके तले हम चलते हैं, अपितु यह हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़ है।[1] यह बात हमारी सुरक्षा और हमारे आनन्द को महत्त्व प्रदान करती है। जैसे ही आप दीनता के साथ यह जान जाते हैं कि समय के आरम्भ से पहले ही मसीह में आपकी पहचान उस क्षण स्थापित हो गई थी, जब उसने पहली बार आप पर अपना स्नेह सुनिश्चित किया था, तभी से आप स्वतन्त्र हो जाते हैं और आप में हियाव आ जाता है। आपको अपने आप में कोई ऐसा कारण खोजने की आवश्यकता नहीं है, जिसके द्वारा आप यह समझ सकें कि आपको उसका अद्‌भुत अनुग्रह क्यों मिला है; आप केवल यह जानकर आनन्दित हो सकते हैं कि उसने आपको इसलिए चुना क्योंकि वह आपसे प्रेम करता है। क्योंकि आपको लगता है कि आप अपने मसीही जीवन में बहुत कम प्रगति कर रहे हैं, इस कारण आपको अपने पापों के कारण बोझिल रहने या कुचले रहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका प्रेम कभी भी आपके कार्यों या भले कार्य कर पाने की आपकी प्रतिज्ञा पर आधारित नहीं था। आप इस जीवन के उतार-चढ़ावों में से इस आश्वासन के साथ होकर जा सकते हैं कि जो आपको प्रेम करता है उसी ने सभी वस्तुओं को बनाया है तथा सभी वस्तुओं उसी के चलाए चलती हैं और यह भी कि क्योंकि आपको कभी भी उसका प्रेम प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, इसलिए आप इसे कभी खो भी नहीं सकते हैं।       
यूहन्ना 6:35-51

1 March : आपल्यांला सांत्वन कुठून प्राप्त होते

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1 March : आपल्यांला सांत्वन कुठून प्राप्त होते
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तो ( पिलात ) पुन्हां सरकारवाडयात जाऊन येशूला म्हणाला, “तू कुठला आहेस?” परंतु येशूनें त्याला उत्तर दिले नाहीं. पिलाताने त्याला म्हटलें, ” माझ्याबरोबर तू बोलत नाहींस काय ? तुला सोडण्याचा अधिकार मला आहे व तुला वधस्तंभावर खिळण्याचा अधिकार मला आहे हे तुला ठाऊक नाहीं काय ?” येशूनें उत्तर दिले, ” आपणाला वरुन अधिकार देण्यात आला नसता तर माझ्यावर तो मुळीच चालला नसता ; म्हणून ज्यानें मला आपल्यां स्वाधीन केलें त्याचें पाप अधिक आहे. ” – योहान 19 : 9-11.

पिलाताकडें येशूला वधस्तंभावर खिळण्याचा अधिकार होता, पण त्या गोष्टीचा येशूला धाक वाटली नाहीं.. असे का बरे?

असे नव्हते कीं पिलात खोटे बोलत होता किंवा येशूला वधस्तंभावरखिळण्याचा त्याला अधिकार नव्हता. त्याला तो अधिकार होता.

तर, येशूला त्याच्या अधिकाराचे भय वाटले नाहीं याचे कारण हें कीं त्याचा अधिकार हा दिलेला अधिकार होता, तो अधिकार त्याला “देवाकडून प्राप्त झाला होता.’  येशू म्हणाला कीं, “तुला वरून अधिकार प्राप्त झाला आहे.”  म्हणजेच त्याला अधिकार होता, निश्चितच जास्त प्रमाणात अधिकार होता. 

मग ह्या गोष्टीचा धाक वाटणे योग्य होते ना?  पिलाताला येशूला केवळ मारण्याचा अधिकार नव्हता तर, मारण्याचा तो अधिकार त्याला देवानें देऊ केलेला होता.

येशूला त्याच्या अधिकाराची भीती वाटली नाहीं कारण पिलाताचा येशुवरील अधिकार हा देवाच्या पिलातावरील अधिकाराच्या दुय्यम दर्जाचा होता.  येशूला त्या क्षणी सांत्वन प्राप्त झाले कारण पिलाताची इच्छा ही दुर्बळ नसून, त्याची इच्छा ही मार्गदर्शित होती. येशू हा पिलाताच्या हातात नसून, पिलात येशूच्या पिताच्या हातात होता.

याचा अर्थ आपल्यांला सांत्वन यातून प्राप्त होत नाहीं कीं आपला शत्रू दुर्बळ आहे,  तर आपल्यांला सांत्वन यातून प्राप्त होते कीं “आपल्यां शत्रूच्या बळावर देखील आपल्यां पित्याचा सार्वभौम अधिकार आहे.”

रोमकरास  पत्र 8:35-37, मध्यें हाच मुद्दा नमूद केला आहे, क्लेश, आपत्ती, छळवणूक, उपासमार, नग्नता, संकटे किंवा तलवार आपल्यांला ख्रिस्तापासून विभक्त करू शकत नाहींत, “कारण ज्यानें आपल्यांवर प्रीति केलीं त्याच्या योगे ह्या सर्व गोष्टीत आपण महाविजयी ठरतो.”

पिलात व येशूच्या इतर शत्रूंनी जे वाईटासाठीं योजले (व आपले शत्रू जे आपल्यां वाइटासाठीं योजतात)  ते सर्व,  देव आपल्यां चांगल्यांसाठीं योजतो (उत्पत्ती 50:20).  येशूचे सर्व शत्रू एकत्र येऊन, त्यांना देवानें दिलेल्यां आधिकारानी, “जे काहीं घडावें म्हणून देवानें स्वहस्ते व देवाचा संकल्पानें पूर्वी योजलें होते ते त्यांनी केलें” (प्रेषित 4:28). त्यांनी पाप केलें, पण त्यांचा पापाद्वारें देवानें तारण घडवून आणिलें.

यासाठींच, आपले शत्रू जे केवळ आपल्यां शरीराचा नाश करू शकतात त्यांचे भय बाळगण्याचे कारण नाहीं (मत्तय 10:28) ते एवढेच करू शकतात म्हणून नाहीं तर (लुक 12:4), ते जे काहीं करतात ते आपल्यां दक्ष पिताच्या हाताखाली करतात.

पाच चिमण्या दोन दमड्यांना विकतात कीं नाहीं? तरी त्यांच्यापैकीं एकींचाही देवाला विसर पडत नाहीं. फार तर काय, तुमच्या डोक्याचे सर्व केसही मोजलेले आहेत. भिऊ नका; तुम्हीं अनेक चिमण्यांपेक्षा मूल्यवान आहात. (लूक 12:6-7)

पिलाताकडें अधिकार होता. हेरोदाकडें अधिकार होता. सैनिकांकडें अधिकार होता. सैतानाकडें अधिकार आहे. पण त्यांचा अधिकार स्वायत्त/स्वतंत्र नाहीं. त्या सर्वांचा अधिकार हा त्यांना देण्यांत आलेला अधिकार आहे, पण सर्व अधिकार देवाच्या  इच्छेच्या अधीन आहे, दुसऱ्या दर्जावर आहे. भय बाळगू नका. तुम्हीं तुमच्या सार्वभौम पित्यासाठीं मौल्यवान आहात. ज्या चिमण्यांचा देवाला विसर पडत नाहीं, तुम्हीं त्या चिमण्यांपेक्षा मूल्यवान आहात.  

28 फरवरी : समर्पित और अटल

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28 फरवरी : समर्पित और अटल
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“मैं ने अपने परमेश्‍वर यहोवा की पूरी रीति से बात मानी। तब उस दिन मूसा ने शपथ खाकर मुझसे कहा, ‘तू ने पूरी रीति से मेरे परमेश्‍वर यहोवा की बातों का अनुकरण किया है, इस कारण निस्सन्देह जिस भूमि पर तू अपने पाँव धर आया है वह सदा के लिए तेरा और तेरे वंश का भाग होगी।’”  यहोशू 14:8-9

बहुत से लोग जीवन में आरम्भ तो बहुत अच्छा करते हैं, परन्तु बाद में वे वह सब खो देते हैं जिसने उन्हें सफल बनाया था। हो सकता है कि युवावस्था में वे विख्यात रहे हों। 40 वर्ष की आयु में उनके जीवन में प्रसिद्धि, प्रभाव और प्रतिष्ठा थी। कलीसिया में, हम ऐसे व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए अत्यन्त उपयोगी व्यक्तियों के रूप में देख सकते हैं, निस्सन्देह हम अपने आप को  भी उसी प्रकार देख सकते हैं। परन्तु प्रायः हम बीते हुए कल के विजेता बन कर रह जाने के प्रलोभन में फँस जाते हैं, उन “अच्छे वर्षों” को पीछे मुड़कर देखते रहते हैं और जिस तरह से सारी बातें आज के समय में हो रही हैं, उसके बारे में कुड़कुड़ाते रहते हैं।

यद्यपि यह बात बहुत से लोगों के लिए सच होती है, परन्तु कालेब के लिए यह बात बिल्कुल भी सच नहीं थी, जो इस सम्भावित उदासीनता से दूर रहा और विश्वास में बना रहा। उसने अपनी वृद्धावस्था से पहले के वर्ष अधिक चाहने योग्य परिवेश में नहीं बिताए थे। 40 वर्ष की आयु से वह चार दशकों तक मरुभूमि में भटकता रहा, क्योंकि उसके आस-पास के लोग परमेश्वर में विश्वास करने में विफल रहे थे। फिर भी निराशा और भटकते रहने के इस समय में कालेब कड़वाहट और असन्तोष से मुक्त रहा।

वास्तव में, अन्त में बातें इतनी बिगड़ गईं कि लोगों ने एक ऐसे अगुवे को खोजना आरम्भ कर दिया जो उन्हें पुराने अच्छे दिनों में वापस ले जा सके (गिनती 14:4)। अब, किसी को पीछे जाने के लिए सच में किसी अगुवे की आवश्यकता नहीं होती; आप स्वयं ही पीछे जा सकते हैं! हमें आगे बढ़ाने के लिए अगुवों की आवश्यकता होती है। आगे एक आने वाला कल है। आगे आने वाली कई पीढ़ियाँ हैं। हमारे संसार के लिए परमेश्वर की योजना में अभी भी ऐसे उद्देश्य हैं जिनका हमारे सामने उजागर होना अभी शेष है।

कालेब इसी भावना को प्रकट करता है। उसके आरम्भिक जीवन के स्पष्ट समर्पण का उसके मध्य वर्षों में उसकी निरन्तरता के साथ मिलन हो गया। वह न केवल 40, बल्कि 50, 60 और 70 की आयु में भी समर्पित और अटल रहा। उन सारे दशकों में उसने “पूरी रीति से प्रभु की बातों का अनुसरण किया।”

कई लोगों के लिए विवाह, घर, गृहस्थी, व्यावसायिक चिन्ताएँ, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ, इत्यादि के क्षेत्र में प्रायः आत्मिक उत्साह और प्रभावशीलता में कमी आ जाती है। ऐसे लोग भी होते हैं जो बहुत सारे संसाधन, ऊर्जा और ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, परन्तु ऐसा करने के विपरीत वे सेवाकार्य के काम को अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर आराम करने का निर्णय ले लेते हैं। उन इस्राएलियों के समान जो मरुभूमि में थे, वे भी उदासीनता, आलोचना और निराशावाद में ही उलझे रह जाते हैं और अपने आत्मिक जीवन में होने वाली गिरावट को नहीं देख पाते।

आपके समर्पण, आपकी बातचीत और आपकी आत्मिक बढ़त का स्तर आज क्या है? क्या वे पहले जैसी ही हैं? इस्राएल की मरुभूमि वाली पीढ़ी की तरह आज की कलीसिया को भी विश्वास रखने वाले अनुभवी पुरुषों और स्त्रियों की बहुत आवश्यकता है, जो अच्छे और बुरे समय में, प्रत्येक मौसम में और प्रत्येक परिस्थिति में निरन्तर समर्पण के साथ जीवन जीते हों और वर्षों से वे उस मीरास की ओर बढ़ते जा रहे हैं जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने विश्वासयोग्य अनुयायियों से की है। आपके लिए आज उस मीरास की ओर चलना कैसा है और दस साल के बाद यह कैसा होगा?      न्यायियों 1:1-20

28 फेब्रुवारी : शेवटी आणि पूर्णपणे नीतिमान ठरलेलें

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28 फेब्रुवारी : शेवटी आणि पूर्णपणे नीतिमान ठरलेलें
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देवाच्या निवडलेल्यां लोकांवर दोषारोप कोण ठेवील? देवच नीतिमान ठरविणारा आहे. (रोम 8:33)

पौल येथें असेहि म्हणू शकला असता, “देवाच्या निवडलेल्या लोकांवर दोषारोप कोण ठेवील?” आणि मग त्यानें उत्तर दिले असते, “कोणीही नाही! आम्हीं नीतिमान ठरलो आहोत.” ते खरे आहे. पण त्यानें जे म्हटलें त्याचा तो शेवट नाही. त्याऐवजी त्याचे उत्तर आहे, “देवच नीतिमान ठरवणारा आहे.”

जोर कृतीवर नव्हे तर कृती करणाऱ्यावर आहे.

का? कारण न्यायालये आणि कायदे यांच्या जगात ही भाषा जिथून येते, त्यानुसार एखाद्या न्यायाधीशाद्वारें करण्यांत आलेली निर्दोष सुटका वरिष्ठ न्यायाधीशाद्वारे रद्द केलीं जाऊ शकते.

जर स्थानिक न्यायाधीश तुम्हीं दोषी असतांना, तुम्हाला दोषमुक्त करतो, पण जर उच्च न्यायालयाच्या न्यायाधीशाला तुमच्याविरूद्ध आरोप लावण्याचा अधिकार असेल, तर मग काय? जर उच्च न्यायालयाचा न्यायाधीश तुम्हीं दोषी असतांना, तुम्हाला दोषमुक्त करतो, पण जर सर्वोच्च न्यायालयाचा न्यायाधीश तुमच्याविरूद्ध आरोप लावू शकत असेल, तर मग काय?

मुद्दा हा आहे : देवाच्यावर, कुठलेही उच्च किंवा सर्वोच्च न्यायालय नाही. जर देवच तुम्हाला दोषमुक्त करणारा असेल – तुम्हाला त्याच्या दृष्टीत नीतिमान घोषित करीत असेल – तर कोणीही तुमच्या विरुद्ध नवी याचिका दाखल करू शकत नाही; कोणीही तांत्रिकतेत दोष असल्याचा दावा करू शकत नाही; कोणीही फिर्याद करू शकत नाही; कोणीही तुमच्याविरुद्ध अन्य दोषारोप आणू शकत नाही. देवाचा निर्णय अंतिम आणि परिपूर्ण आहे.

जे कोणी येशूवर विश्वास ठेवतात, आणि ख्रिस्ताशी एकरूप होतात, आणि स्वतःला निवडलेल्यांसोबत दाखवितात, त्यांनी हे ऐका : तुम्हाला नीतिमान ठरविणारा देव आहे. मानवी न्यायाधीश नाही. मोठा संदेष्टा नाही. स्वर्गातून येणारा आद्यदूतहि नाही. पण जगाचा निर्माता देव, आणि सर्व वस्तूंचा स्वामी आणि विश्वाचा आणि त्यातील प्रत्येक अणूरेणूंचा आणि व्यक्तीचा नियंता, देवच तो आहे जो तुम्हाला नीतिमान ठरवितो. मुद्दा हा आहे : भयंकर दुःख सहनातही अढळ सुरक्षितता. जर देव आमच्या पक्षास आहे, तर कोणीही आमच्याविरुद्ध यशस्वी दोषारोप घेऊन येऊ शकत नाही. जर देवानें आमच्यासाठीं त्याचा पुत्र दिला, तर तो जे काही चांगले आहे ते सर्व आमच्यासाठीं देईल. जर आम्हांला नीतिमान ठरविणारा देव आहे, तर आमच्याविरुद्ध कुठलाही दोषारोप टिकू शकत नाही.

27 फरवरी : सहायता करने वाले शब्द

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27 फरवरी : सहायता करने वाले शब्द
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“एक ही मुँह से धन्यवाद और शाप दोनों निकलते हैं। हे मेरे भाइयो, ऐसा नहीं होना चाहिए। क्या सोते के एक ही मुँह से मीठा और खारा जल दोनों निकलता है? क्या अंजीर के पेड़ में जैतून, या दाख की लता में अंजीर लग सकते हैं? वैसे ही खारे सोते से मीठा पानी नहीं निकल सकता।”  याकूब 3:10-12

हमारे जीवन में हम अन्याय, निर्दयता, अप्रिय परिस्थितियों और प्रायः अप्रिय लोगों का सामना करते हैं। इन परिस्थितियों में मौखिक रूप से प्रतिक्रिया देने से पहले हमें अपने प्रभु से सीखी गई इस सच्चाई को स्मरण करना चाहिए कि हमारे शब्द हमारे हृदयों को दर्शाते हैं (मत्ती 12:34)। यदि हमारे शब्द मसीह के समान नहीं हैं, तो हमें सबसे पहले अपने मुँह को नहीं परन्तु अपने हृदयों को देखना चाहिए। इसी प्रकार, जब हम संघर्ष और चुनौती का उत्तर ऐसे शब्दों से देते हैं जो हानि पहुँचाने के स्थान पर सहायता करते हैं, तो यह हमारे भीतर हमारे प्रभु के कार्य का संकेत देता है।

हमारी जीभ में अपार शक्ति होती है, और हम उनका उपयोग सहायता करने, प्रोत्साहित करने, पुष्टि करने, समृद्ध करने, मेल-मिलाप करने, क्षमा करने, एक करने, शान्त करने और आशीष देने के लिए कर सकते हैं। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि पुराने नियम के बहुत सारे नीतिवचनों के पद हमारे द्वारा बोले गए शब्दों को सम्बोधित करते हैं। सुलैमान के अनुसार “धर्मी का मुँह तो जीवन का सोता है” (नीतिवचन 10:11)। वह शब्दों के इस प्रयोग की तुलना उन सुन्दर बालियों से करता है, जो उसे पहनने वाली की सुन्दरता को निखारती हैं और उन सुन्दर आभूषणों से करता है जो घर की सुन्दरता को बढ़ाते हैं (नीतिवचन 25:12)। सम्भवतः वाणी की शक्ति के बारे में उसका सबसे उत्कृष्ट कथन उसका यह अवलोकन है, “जैसे चाँदी की टोकरियों में सोने के सेब हों, वैसा ही ठीक समय पर कहा हुआ वचन होता है” (वचन 11)।

वह क्या है, जिससे ऐसी जीवनदायक भाषा प्राप्त होती है? हमारे मुँह कैसे दूसरों के लिए आशीष ला सकते हैं? आशीष के शब्द “प्रेम में सच्चाई से चलते हुए” सच्चरित्रता से भरे होते हैं (इफिसियों 4:15)। वे विचारशील होते हैं, जो उस व्यक्ति द्वारा बोले जाते हैं जो “मन में सोचता है कि क्या उत्तर दूँ” (नीतिवचन 15:28)। वे प्रायः कम होते हैं और तर्कों से भरे होते हैं: “जो सम्भलकर बोलता है, वह ज्ञानी ठहरता है, और जिसकी आत्मा शान्त रहती है, वही समझ वाला पुरुष ठहरता है” (नीतिवचन 17:27)। और, निस्सन्देह, सहायक शब्द कोमल शब्द होते हैं। यद्यपि कठिन परिस्थितियों में इसे स्मरण रखना कठिन हो सकता है, तौभी यह सच है कि “कोमल उत्तर सुनने से गुस्सा ठण्डा हो जाता है” (नीतिवचन 15:1)। निस्सन्देह, नैतिक क्षमता से कोमल प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है; निरंकुश धुन और क्रोध को स्थान देने की तुलना में कोमलता के साथ उत्तर देने के लिए कहीं अधिक आत्म-संयम की आवश्यकता होती है।

आपके शब्दों की पहचान क्या होगी? क्या आप अपनी जीभ का उपयोग, जो आपके शरीर का एक छोटा-सा किन्तु अति-शक्तिशाली अंग है, शाप देने के बदले आशीष देने के लिए, जीवन नष्ट करने के बदले जीवन देने के लिए और हानि पहुँचाने के बदले सहायता करने के लिए समर्पित करेंगे?

आज ही संकल्प लें कि अपने हृदय में मसीह का आदर करते हुए और अपनी वाणी में उसकी मीठी सुगन्ध को भरते हुए आप अपने शब्दों का उपयोग उन लोगों की भलाई के लिए करेंगे जिनके साथ आप बातचीत करते हैं। फिर दीनतापूर्वक स्वीकार करें कि आप स्वयं ऐसा नहीं कर सकते (याकूब 3:8) और उससे कहें कि वह आपको अपने आत्मा से भरे, उस आत्मा से जो आपके हृदय और आपकी वाणी दोनों में शान्ति, कोमलता और संयम को विकसित करता है (गलातियों 5:22-23)।      
गलातियों 5:16-25

27 फेब्रुवारी : पुनरुत्थानाचे मूलगामी परिणाम

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27 फेब्रुवारी : पुनरुत्थानाचे मूलगामी परिणाम
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आपण ह्या आयुष्यात ख्रिस्तावर केवळ आशा ठेवणारे असलो तर मग सर्व माणसांपेक्षा आपण लाचार आहोत. (1 करिंथ 15:19)

पौल त्याच्या दर तास अनुभवीत असलेल्या संकटावरून, आणि रोजच्या मरणावरून, आणि वन्यपशूंसोबत त्याच्या लढ्यावरून हा निष्कर्ष काढतो कीं जर त्याला मरणातून जिवंत करण्यात आले नाही, तर येशूच्या अनुसरण करण्यात ज्या जीवनाची त्यानें निवड केलीं आहे ती मूर्खपणाची आणि दयनीय ठरेल.

जर मृत्यू सर्व गोष्टींचा शेवट असता, तर तो म्हणतो, “चला, आपण खाऊ, पिऊ, कारण उद्या मरावयाचे आहे” (1 करिंथ 15:32). याचा अर्थ हा नाही कीं : जर पुनरुत्थान नसेल तर आपण सर्व खादाड आणि दारूडे बनू या. दारूडे सुद्धा दयनीय असतात – मग पुनरुत्थान असो अथवा नसो. त्याच्या म्हणण्याचा अर्थ आहे : जर पुनरुत्थान नाही, तर पृथ्वीवरील सुखांचा जास्तीत जास्त उपभोग घेण्यासाठीं मध्यमवर्गीय संयमाचा काय अर्थ.

पण पौल या गोष्टीची निवड करीत नाही. तो क्लेशाची निवड करतो, कारण तो आज्ञापालनाची निवड करतो. दमिश्काच्या मार्गावर ख्रिस्तासोबत झालेंल्या त्याच्या भेटीनंतर हनन्या पौलाकडे प्रभू येशूकडून हे शब्द घेऊन आला, “त्याला माझ्या नावासाठीं किती दुःख सोसावे लागेल हे मी त्याला दाखवीन” (प्रेषितांची कृत्ये 9:16). पौलाने त्याच्या पाचारणाचा भाग म्हणून या दुःखाचा स्वीकार केला.

पौल हे कसे करू शकला? ह्या मूलभूत आणि दुःखदायक आज्ञापालनाचा उगम काय होता? याचे उत्तर 1 करिंथ 15:20 मध्ये दिलेले आहे : “तरीपण ख्रिस्त मेलेल्यांतून उठवला गेला आहेच; तो महानिद्रा घेणार्यांतले प्रथमफळ असा आहे.” दुसऱ्या शब्दांत, ख्रिस्त उठविला गेला, आणि मी त्याच्यासोबत उठविला जाईन. म्हणून, येशूसाठीं सहन केलेले कोणतेही दुःख व्यर्थ नाही (1 करिंथ 15:58).

पुनरुत्थानाच्या आशेने पौल ज्याप्रकारे जगत होता त्यात मूलभूत बदल घडवून आणला. या सत्यानें त्याला भौतिकतावाद आणि उपभोक्तावादापासून स्वतंत्र केले. या सत्यानें त्याला सुखसोई आणि सुखविलासावाचून जगण्याचे सामर्थ्य दिले ज्याविषयी अनेक लोकांस वाटते कीं या जीवनात त्यांस ते प्राप्त झालें पाहिजे. उदाहरणार्थ, जरी त्याला लग्न करण्याचा हक्क होता (1 करिंथ 9:5), तरीही त्यानें त्या सुखाचा त्याग केला कारण त्याला अतिशय दुःख सहन करावयास पाचारण करण्यात आले होते.

येशूनें म्हटलें कीं याच प्रकारे पुनरुत्थानाच्या आशेने आमच्या वर्तनात बदल घडवून आणला पाहिजे. उदाहरणार्थ, त्यानें आम्हास सांगितले कीं आम्हीं अशा लोकांना आपल्या घरी आमंत्रित करावे जे या जीवनात आमची परतफेड करू शकत नाहीत. हे करण्यासाठीं आम्हीं कसे प्रेरित झालें पाहिजे? “नीतिमानाच्या पुनरुत्थानसमयी तुमची फेड होईल” (लूक 14:14).

पुनरुत्थानाच्या आशेने त्यांस आकार मिळतो कीं नाही हे पाहण्यासाठीं आपल्या सांप्रत जीवनाकडे निक्षून पाहण्याचे हे एक मूलभूत पाचारण आहे. आपण या जगातील लाभाच्या आधारे निर्णय घेतो का, किंवा पुढील जीवनाच्या लाभावर? पुनरुत्थान असेल तरच आम्हीं प्रेमाखातर धोका पत्करतो का हे शहाणपणाचे म्हणून समजाविता येऊ शकते?

पुनरुत्थानाचे मूलभूत परिणाम व्हावेत म्हणून आयुष्यभरासाठीं आपले पुनर्समर्पण करण्यात देव आमची मदत करो.

26 फरवरी : चोट पहुँचाने वाले शब्द

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26 फरवरी : चोट पहुँचाने वाले शब्द
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“जीभ भी एक आग है; जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है, और सारी देह पर कलंक लगाती है, और जीवन–गति में आग लगा देती है, और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है . . . पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता।”  याकूब 3:6, 8

तीन वस्तुएँ कभी लौटकर नहीं आतीं: चला हुआ तीर, बोला हुआ शब्द और खोया हुआ अवसर। हम जो बोलते हैं, उसे वापस नहीं लिया जा सकता। इसके अतिरिक्त, हमें अपने द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का न्याय के दिन लेखा देना होगा, यहाँ तक कि हमारे लापरवाह शब्दों का भी (मत्ती 12:36 देखें)। जैसा कि राजा सुलैमान ने कहा, “जो अपने मुँह की चौकसी करता है, वह अपने प्राण की रक्षा करता है, परन्तु जो गाल बजाता है उसका विनाश हो जाता है” (नीतिवचन 13:3); और “जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं” (नीतिवचन 18:21)। हमारे शब्द प्रोत्साहित करने, पोषण करने और चंगा करने का काम कर सकते हैं। परन्तु वे झगड़े कराने, मतभेद उत्पन्न करने और हानि पहुँचाने का कारण भी बन सकते हैं। सुलैमान हमें ऐसे हानिकारक शब्दों का बहुआयामी चित्रण प्रदान करता है। वह हानि पहुँचाने वाले शब्दों को बिना सोचे-समझे बोले गए “तलवार के समान चुभने वाले” (नीतिवचन 12:18) शब्दों के रूप में वर्णित करता है। हमारे शब्द प्रायः बिना सोचे-समझे निकल जाते हैं और हम ऐसे व्यक्ति बन जाते हैं जो “बिना बात सुने उत्तर देते हैं” (नीतिवचन 18:13)। “जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहाँ अपराध भी होता है” (नीतिवचन 10:19)।

हो सकता है कि आपने यह कहावत सुनी होगी कि लाठी और पत्थर तो हमारी हड्डियाँ तोड़ सकते हैं, किन्तु शब्द हमें कभी हानि नहीं पहुँचा सकते, किन्तु यह बात पूरी तरह गलत है। खरोचें मिट सकती हैं और उनके निशान भुलाए जा सकते हैं, परन्तु हमसे कहे गए और हमारे लिए कहे गए चोट पहुँचाने वाले शब्द लम्बे समय तक हमारे साथ रहते हैं। ये पंक्तियाँ अधिक सच बोलती हैं:

बिना सोचे-समझे बोला गया एक शब्द झगड़े को भड़का सकता है,

एक क्रूर शब्द जीवन का नाश कर सकता है,

एक कड़वा शब्द घृणा उत्पन्न कर सकता है,

एक कठोर शब्द कष्ट दे सकता है और मार सकता है।

यह अनुमान लगाना कठिन होगा कि हानिकारक शब्दों के कारण कितनी दोस्तियाँ टूट जाती हैं, कितने लोगों की प्रतिष्ठा का नाश हो जाता है, और कितने घरों की शान्ति खण्डित हो जाती है। याकूब के अनुसार ऐसे सभी बैरभाव और अपमानजनक भाषा का स्रोत कोई और नहीं परन्तु नरक ही है। हाँ, हमारी जीभ “एक आग” है और परमेश्वर के पवित्र आत्मा के कार्य के बिना “मनुष्यों में से कोई भी जीभ को वश में नहीं कर सकता।”

रुकें और सोचें कि आपने पिछले 24 घण्टों में कितने शब्दों का प्रयोग किया होगा और उनका प्रयोग कैसे किया होगा। “मृत्यु और जीवन जीभ के वश में होते हैं,” तो क्या आपके किसी शब्द ने किसी दूसरे को किसी तरह से नीचा दिखाने के द्वारा उसको हानि पहुँचाई होगी? यह एक ऐसा पाप है, जिसका पश्चाताप किया जाना चाहिए और जिससे दूर हट जाना चाहिए। क्या परमेश्वर के सामने और उस व्यक्ति के सामने, जिससे वे शब्द कहे गए थे, आपको यह कार्य करने की आवश्यकता है?

अब उन शब्दों के बारे में सोचें जो आप अगले 24 घण्टों में बोल सकते हैं। उनका उपयोग जीवन पहुँचाने के लिए कैसे किया जा सकता है? आप ऐसा व्यक्ति कैसे बन सकते हैं, जिसने “न तो पाप किया और न उसके मुँह से छल की कोई बात निकली”? इसके विपरीत, “वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दुख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था . . . वह आप ही हमारे पापों को लिए हुए चढ़ गया . . . जिससे हम पापों के लिए मरकर धार्मिकता के लिए जीवन बिताएँ” (1 पतरस 2:22-24)।   याकूब 3:2-12

26 फेब्रुवारी : जेव्हां देव 100 टक्के आमच्या पक्षाचा बनतो

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26 फेब्रुवारी : जेव्हां देव 100 टक्के आमच्या पक्षाचा बनतो
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त्या लोकांत आपणही सर्व पूर्वी आपल्या दैहिक वासनांना अनुरूप असे वागलो, आपल्या देहाच्या व मनाच्या इच्छांप्रमाणे करत होतो व स्वभावतः इतरांप्रमाणे क्रोधाची प्रजा होतो. (इफिस 2:3)

देवाचा सर्व क्रोध, सर्व दंडाज्ञा ज्यांस आम्हीं पात्र आहोत, त्या सर्व येशूवर ओतण्यात आल्या. सिद्ध नीतिमत्वासाठीं देवाच्या सर्व मागण्या ख्रिस्ताद्वारे पूर्ण करण्यात आल्या. ज्या क्षणी आपण (कृपेद्वारे!) हा खजिना पाहतो, आणि त्याचा या प्रकारे स्वीकार करतो, त्या क्षणी त्याचा मृत्यू हा आपला मृत्यू आणि त्याची दंडाज्ञा ही आपली दंडाज्ञा आणि त्याचे नीतिमत्व हे आपले नीतिमत्व असें गणले जाते आणि त्या क्षणी देव अपरिवर्तनीयपणे 100 टक्के आपल्या पक्षाचा बनतो.

याने हा प्रश्न अनुत्तरित राहतो कीं, ”पवित्र शास्त्र हे शिकवीत नाही का कीं अनंतकाळात देवानें निवडीमध्ये आमच्यावर आपली कृपा प्रकट केलीं?“

दुसऱ्या शब्दांत, विचारशील लोक विचारतील, “देव केवळ विश्वास आणि ख्रिस्तासोबत ऐक्य व नीतिमान ठरविल्या जाण्याच्या क्षणी 100टक्के आपल्या पक्षाचा बनतो का? जगाच्या स्थापनेच्या आधी निवडीच्या कार्यात तो 100 टक्के आपल्या पक्षाचा बनला नव्हता का?“ इफिस 1:4-5 मध्ये पौल म्हणतो, “त्याचप्रमाणे आपण त्याच्या समक्षतेत पवित्र व निर्दोष असावे, म्हणून त्यानें (देवानें) जगाच्या स्थापनेपूर्वी आपल्याला ख्रिस्ताच्या ठायी निवडून घेतले. त्यानें आपल्या मनाच्या सत्संकल्पाप्रमाणे आपल्याला येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे स्वतःचे दत्तक होण्याकरता प्रेमाने पूर्वीच नेमले होते.”

मग देव अनंतकाळापासूनच 100 टक्के निवडलेल्यांच्या पक्षाचा बनत नाही का? उत्तर “100 टक्के”च्या अर्थावर आधारित आहे.

“100 टक्के” या संज्ञेद्वारे, मी पवित्रशास्त्राच्या कित्येक अनुच्छेदात आढळणारे बायबलचे सत्य राखून ठेवण्याचा प्रयत्न करीत आहे. उदाहरणार्थ, इफिस 2:3 मध्ये पौल म्हणतो कीं ख्रिस्ती विश्वासणारे ख्रिस्त येशूमध्ये जिवंत करण्यापूर्वी “क्रोधाची प्रजा” होते : त्या लोकांत आपणही सर्व पूर्वी आपल्या दैहिक वासनांना अनुरूप असे वागलो, आपल्या देहाच्या व मनाच्या इच्छांप्रमाणे करत होतो व स्वभावतः इतरांप्रमाणे क्रोधाची प्रजा होतो.

पौल म्हणतो कीं, आपल्या नव्या जन्मापूर्वी – म्हणजे आपल्याला ख्रिस्तासोबत जिवंत करण्यापूर्वी – आपल्यावर देवाचा क्रोध होता. निवडलेले क्रोधाच्या अधीन होते. जेव्हां देवानें आम्हांला ख्रिस्त येशूठायी जिवंत केले आणि ख्रिस्ताचे सत्य आणि सौंदर्य पाहण्यासाठीं आम्हांला जागृत केले तेव्हां हे बदलून गेले यासाठीं कीं आम्हीं त्याला आमच्यासाठीं मृत्यू पावलेला म्हणून आणि ज्याचे नीतिमत्व आमच्या येशूबरोबरच्या ऐक्यामुळे गणले गेले आहे अशा व्यक्तीच्या रूपात ग्रहण करावे. आमच्यासोबत असे घडण्यापूर्वी आम्हीं देवाच्या क्रोधाच्या अधीन होतो. मग, ख्रिस्तामधील विश्वासामुळे आणि त्याच्याशी एकजुट झाल्या कारणास्तव, देवाचा सर्व क्रोध दूर झाला आणि त्या अर्थाने, तो 100टक्के आपल्या पक्षाचा झाला.

म्हणून, या सत्यामध्ये आनंदित व्हा कीं देव तुमचा सांभाळ करेल. तो तुम्हाला शेवटपर्यंत टिकवून ठेवील कारण ख्रिस्ताठायी तो तुमच्यासाठीं 100 टक्के आहे. आणि म्हणूनच, शेवटपर्यंत पोहोचणे हे देवाला आपल्यासाठीं 100 टक्के बनवत नाही. तो तुमच्यासाठीं आधीच 100 टक्के आहे या तथ्याचा तो परिणाम आहे.

25 फरवरी : तेज दौड़ें

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25 फरवरी : तेज दौड़ें
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“क्या तुम नहीं जानते कि दौड़ में तो दौड़ते सब ही हैं, परन्तु इनाम एक ही ले जाता है? तुम वैसे ही दौड़ो कि जीतो। हर एक पहलवान सब प्रकार का संयम करता है; वे तो एक मुरझाने वाले मुकुट को पाने के लिए यह सब करते हैं, परन्तु हम तो उस मुकुट के लिए करते हैं जो मुरझाने का नहीं। इसलिए मैं तो इसी रीति से दौड़ता हूँ, परन्तु लक्ष्यहीन नहीं।”  1 कुरिन्थियों 9:24-26

नए नियम के समय पूर्वी रोमी साम्राज्य में व्याप्त यूनानी संस्कृति में खेलों की प्रतियोगिताएँ महत्त्वपूर्ण हुआ करती थीं। एक टीकाकार ने कुरिन्थुस को एक ऐसे शहर के रूप में वर्णित किया है, जहाँ लोग केवल दो वस्तुओं की माँग करते थे, रोटी और खेल।[1]

छोटे स्तर की स्थानीय प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार दिए जाते थे, परन्तु प्रमुख आयोजनों में केवल एक ही पुरस्कार होता था जो कि प्रायः लॉरेल (कल्पवृक्ष) या पाइन (देवदार) के मुकुट होते थे। प्रतियोगी अपने जीवन के कई महीने उन सभी बातों से दूर रहते थे, जिनका वे अन्यथा आनन्द लिया करते थे, जिनमें सम्बन्ध, भोजन वस्तुएँ और खाली समय में की जाने वाली वे सभी गतिविधियाँ शामिल होती थीं, जो उनकी जीतने की क्षमता को कम कर सकती थीं, जिससे उनकी दृष्टि कल्पवृक्ष के मुकुट पर टिकी रहे। पौलुस इस चित्रण का उपयोग करके विश्वासियों को मसीह की महिमा करने और उसके साथ एक होने के अनन्त पुरस्कार पर दृष्टि बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।

विद्यालय के खुले मैदानों में होने वाली दौड़ें, जिनका आरम्भ तो एक बड़े झुण्ड के रूप में होता है, प्रायः शीघ्र ही तीन छोटे समूहों में बँट जाती हैं। इनमें से एक छोटे समूह का लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना होता है, उसके बाद वाले धावकों का बड़ा समूह “केवल दौड़ने” के लिए दौड़ रहा होता है, और जो पीछे रह जाते हैं वे सामान्यतः दोष ढूँढने वाली, अशान्त, आशा-रहित, दुखी आत्माएँ होती हैं। इस पद में पौलुस द्वारा प्रयुक्त शब्द “दौड़ना” का आशय न तो पीछे रह जाने वाले के रूप में दौड़ने से है, न ही बिना लक्ष्य के दौड़ने से और न ही आधे-अधूरे मन से दौड़ने से है, बल्कि पुरस्कार विजेता के रूप में दौड़ने से है। मसीहियों के रूप में हमें लक्ष्यहीन नहीं दौड़ना चाहिए। हमें स्वर्ण पदक प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए। पुरस्कार पर ध्यान देते हुए जीने के लिए बलिदान की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से, ऐसी किसी भी इच्छा का बलिदान, जो परमेश्वर की इच्छा के विपरीत हो। पद 25 में “पहलवान” शब्द का अनुवाद यूनानी शब्द एगोनिज़ोमेनोस  से किया गया है, जिससे हमें हिन्दी का “पीड़ा” शब्द मिलता है। खिलाड़ी होने का आशय है सुविधाजनक रीति से न रहने के विकल्प को चुनना। मसीही होना भी ऐसे ही विकल्प को चुनना है। क्या हम मसीह के लिए पीड़ा सहने और बलिदान देने के लिए तैयार हैं, यह जानते हुए कि तभी हम उसके लिए अच्छी तरह से जीए गए जीवन का पुरस्कार जीतने के आनन्द का अनुभव कर सकेंगे।

परन्तु हम इस तरह का बलिदान कैसे दें या इस तरह के ध्यान के साथ कैसे दौड़ें? ऐसा हम अपनी स्वयं की क्षमता या आत्म-धार्मिकता के बल पर नहीं कर पाएँगे। यह तो झूठे धर्म की आत्मा और सार है। कदापि नहीं, केवल मसीह के साथ हमारा मिलन ही हमें इस परिवर्तन के लिए सामर्थ्य और क्षमता प्रदान करता है। यीशु ने अनन्त पुरस्कार को ध्यान में रखते हुए स्वेच्छा से बलिदान हो जाने का उदाहरण प्रस्तुत किया है (इब्रानियों 12:2)। जब वह हमारे हृदय और जीवन को नया आधार प्रदान करता है, तो हम उसके लिए दौड़ते हुए और उसके पीछे चलते हुए जितनी दूर तक आनन्दपूर्वक जा सकते हैं, उसकी कोई सीमा नहीं है।

जब स्कॉटलैण्ड के रहने वाले प्रसिद्ध ओलम्पिक खिलाड़ी और मिशनरी एरिक लिडेल से उस दौड़ की योजना के बारे में पूछा गया जिसमें उन्होंने 1924 के ओलम्पिक में 400 मीटर में स्वर्ण पदक जीता था, तो उन्होंने यह उत्तर दिया था, “मैं पहले 200 मीटर जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हूँ। फिर शेष 200 मीटर के लिए परमेश्वर की सहायता से मैं और भी तेज दौड़ता हूँ।” तो फिर आज लक्ष्यहीन या धीरे-धीरे न दौड़ें, बल्कि परमेश्वर की सहायता से उसके लिए और उसकी महिमा के लिए स्वर्ण पदक पाने के लिए और भी तेज दौड़ें।

 इब्रानियों 12:1-3