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21 फेब्रुवारी : आमचा सेवक, येशू

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21 फेब्रुवारी : आमचा सेवक, येशू
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“कारण मनुष्याचा पुत्रही सेवा करून घेण्यास नाही, तर सेवा करण्यास व पुष्कळांच्या मुक्तीसाठीं आपला जीव खंडणी म्हणून अर्पण करण्यास आला आहे” (मार्क 10:45).

केवळ पृथ्वीवर राहत असतांना तो आपल्या लोकांचा सेवक नव्हता, तर तो जेव्हां परत येईल तेव्हां देखील आमचा सेवक असेल. “आणि धनी आल्यावर जे दास जागृत असलेले त्याला आढळतील ते धन्य; मी तुम्हांला खचीत सांगतो कीं, तो आपली कंबर बांधून त्यांना जेवायला बसवील आणि येऊन त्यांची सेवा करील” (लूक 12:37). तो परत आल्यानंतर काय करील याचे चित्र म्हणून येशूनें हे दिले.

एवढेच नव्हे, तर तो आताहि आमचा सेवक आहे. “मी तुला सोडून जाणार नाही व तुला टाकणार नाही.” म्हणून आपण धैर्याने म्हणतो ‘प्रभू मला साहाय्य करणारा आहे, मी भिणार नाही; मनुष्य माझे काय करणार?’ (इब्री 13:5,6).

तो आपल्या लोकांचा सेवक  होता आणि आहे आणि सदैव असेल असे म्हणणे हे पुनरूत्थित ख्रिस्ताचे महत्व कमी करते का? जर “सेवक” याचा अर्थ “आदेशाचे पालन करणारा” असा असेल किंवा आपण त्याचे मालक आहोत असा जर आपण विचार केला तर. होय, त्याद्वारे त्याचा अपमान होईल. पण आम्हीं दुर्बल आहोत आणि त्याच्या मदतीची आम्हांला गरज आहे असे म्हटल्याने त्याचा अनादर होत नाही.

असे म्हटल्याने कीं केवळ तोच आहे जो आम्हास ज्याची सर्वात जास्त गरज आहे ते पुरवू शकतो, त्याचा अनादर होत नाही.

असे म्हटल्याने त्याचा अनादर होत नाही कीं तो प्रीतीचा अनंत झरा आहे, आणि तो आपली जितकीं जास्त मदत करतो आणि जितके जास्त आपण त्याच्या सेवेवर अवलंबून राहतो, तितकी अद्भुत त्याची साधनसामुग्री दिसते. म्हणून, आपण पूर्ण विश्वासाने म्हणू शकतो, “येशू ख्रिस्त सेवा करावयास जिवंत आहे.” 

तो तारण करावयास जिवंत आहे. तो देण्यासाठीं जिवंत आहे. आणि आपल्या ह्या भूमिकेवर तो रोमांचित होतो. तो तुमच्या काळजीच्या ओझ्याने दबलेला नाही. तो ओझे वाहण्याद्वारे उंचावला, ओझे देण्याद्वारे नाही. “आशा धरून राहणाऱ्यांचे इष्ट काम” करणे त्याला आवडते (यशया 64:4). तो “जे त्याच्या दयेची प्रतीक्षा करतात त्यांच्यावर संतुष्ट होतो” (स्तोत्र 147:11). त्याचे “नेत्र अखिल पृथ्वीचे निरीक्षण करीत असतात, जे कोणी सात्त्विक चित्ताने त्याच्याशी वागतात“ (2 इतिहास 16:9). येशू ख्रिस्त त्याच्यावर विश्वास ठेवणाऱ्या सर्वांप्रीत्यर्थ सर्वसमर्थ सेवेने ओसंडत असतो.

20 फरवरी : चिन्ता का उपाय

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20 फरवरी : चिन्ता का उपाय
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“किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्‍वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्‍वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।”  फिलिप्पियों 4:6-7

यदि मैं आपसे कहूँ कि इस सप्ताह में या आज के दिन में ही आप जिन बातों को लेकर चिन्तित हैं उन्हें लिखें, तो मुझे लगता है कि आपकी यह सूची बहुत लम्बी होगी। मैं जानता हूँ कि मेरी सूची तो अवश्य ही लम्बी होगी। और फिर भी परमेश्वर का वचन हमसे कहता है, “किसी भी बात  की चिन्ता मत करो।” तो फिर, जब हम अपने आप को चिन्ता से जूझते हुए पाते हैं, तो हमें किस प्रकार प्रत्युत्तर देना चाहिए?

पौलुस कहता है कि घुटन भरी चिन्ता का उपाय है प्रार्थना करना और धन्यवाद देना। यह प्रत्युत्तर स्वाभाविक नहीं होता। वास्तव में, यह सीधे-सीधे हमारे पापी हृदयों की प्रवृत्ति के विरुद्ध होता है। हममें से अधिकांश लोगों को चिन्ता उत्पन्न करने वाली बातें प्रार्थना में परमेश्वर के सामने लाने के विपरीत एक कोने में जाकर कुड़कुड़ाना या उन्हें अपने नियन्त्रण में लाने के प्रयास में चिन्ताजनक परिस्थितियों के बारे में सोचते रहना अधिक सरल लगता है। अपने घुटनों पर आकर परमेश्वर को पुकारने के विपरीत, चिन्ता की स्थिति में बने रहकर चिन्ता को हम पर हावी होने देना जितना सरल है, उतना ही निरर्थक भी है।

प्रार्थना हमारे ध्यान को हम पर से हटाकर परमेश्वर के प्रावधान पर लगाने के द्वारा इस प्रश्न को निगल जाती है, “मैं इसका सामना कैसे करूँगा?” प्रार्थना हमारा ध्यान परमेश्वर की ओर मोड़ देती है, जो पूरी तरह से सक्षम है, जो हमारी आवश्यकताओं को अच्छी तरह से जानता है, और जो हमें या तो वह दे देगा जो हम माँगते हैं या उससे भी कहीं अधिक अच्छा देगा, जिसकी हम कल्पना भी न कर सकते। और एक धन्यवादी हृदय हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को स्मरण कराने में सहायता करने के द्वारा बिना किसी कड़वाहट के इस प्रश्न का सामना करने में सहायता करता है, “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” वह सदैव एक उद्देश्य के साथ काम करता है, अपनी योजना को पूरा करता है, और पूरी तरह से जानता है कि वह क्या कर रहा है। हममें से कुछ के माता-पिता ऐसे थे जो हमारे घर पर रहने के समय हमारे लिए अलार्म घड़ी का काम करते थे। जब हमें सवेरे किसी निश्चित समय पर जागना आवश्यक होता था, तो हमें अपनी माता या अपने पिता को केवल यह बताना होता था और हमें पूरा भरोसा होता था कि वे हमें जगा देंगे। और फिर, हमें सोने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना होता था! चिन्ता से सामना होने पर पौलुस हमसे इसी तरह का प्रत्युत्तर चाहता है। हमें सीधे अपने स्वर्गिक पिता के पास जाना है और कहना है, “क्या आप मेरे लिए इस स्थिति को सम्भाल लेंगे?” और परमेश्वर सदा यही उत्तर देता है कि मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।

जब हम समझ जाते हैं कि परमेश्वर सभी बातों पर नियन्त्रण रखता है, तो हम अपने सभी संघर्षों और चुनौतियों को उसके पास ले जाएँगे। वह जो शान्ति प्रदान करता है, वह हमारे हृदयों के लिए एक दृढ़ गढ़ ठहरेगी।

यद्यपि परेशानियाँ आती हैं और संकट डराते हैं,

यद्यपि घनिष्ठ मित्र हमें निराश कर देते हैं

और शत्रु सभी एक हो जाते हैं, फिर भी एक बात है,

जो हमें सुरक्षित रखती है, चाहे कुछ भी हो,

वह प्रतिज्ञा हमें आश्वस्त करती है कि “प्रभु प्रावधान करेगा।” [1]

तो क्यों न उन बातों की सूची बनाएँ, जिन्हें लेकर आप इस सप्ताह चिन्तित रहे हैं? फिर उनके बारे में प्रार्थना करें, उन परिस्थितियों को स्वर्ग के सिंहासन के सामने ले जाएँ और उन्हें वहीं छोड़ दें। और फिर उसमें लिखी प्रत्येक बात के आगे आप वह लिख सकते हैं, जो परमेश्वर आपसे कहता है, अर्थात् मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।

 1 पतरस 5:6-11

20 फेब्रुवारी : पुनरुत्थानाद्वारें आश्चर्यचकित

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20 फेब्रुवारी : पुनरुत्थानाद्वारें आश्चर्यचकित
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प्रियजनहो, आता हे दुसरे पत्र मी तुम्हांला लिहीत आहे; ह्या दोन्हींमध्ये मी तुम्हांला आठवण देऊन तुमचे निर्मळ मन जागृत करत आहे. (2 पेत्र 3:1)

इस्टर जसजसा जवळ येत आहे, तसतसे आपण येशूच्या पुनरुत्थानाचा आपल्यासाठीं जो हेतू होता त्याविषयी कृतज्ञता आणि आनंद आणि कौतुक आणि अचंबा जागृत करूया. आपल्या पतित स्वभावाचा शाप असा आहे कीं जी गोष्ट आपल्याला कधी रोमांचित करायची ती सामान्य बनत जाते. सत्य परिस्थिती बदललेलीं नाही. आम्हीं बदललो आहों. 

बायबलचे अस्तित्व यासाठींच आहे. पेत्र त्याच्या दोन पत्रांविषयीं असें म्हणतो कीं ती “आठवण देऊन” “मन जागृत” करण्याच्या उद्देशाने लिहिलेली आहेत.

ह्यास्तव, आठवण देऊन आपण आपली प्रामाणिक मने जागृत करूया.

येशूला मेलेल्यांतून उठवून देवानें काय साध्य केले? येथें बायबलमधून कांही उत्तरे आहेत.

येशूच्या मृतांतून पुनरुत्थानाच्या द्वारे जिवंत आशा प्राप्त होण्यासाठीं आपल्याला पुन्हा जन्म दिला गेला.

1 पेत्र 1:3: “आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताचा देव व पिता धन्यवादित असो! जिवंत आशा प्राप्त होण्यासाठीं आणि अविनाशी, निर्मळ व अक्षय वतन मिळण्यासाठीं, त्यानें आपल्या महादयेनुसार येशू ख्रिस्ताच्या मृतांतून पुनरुत्थानाच्या द्वारे आपल्याला पुन्हा जन्म दिला .”

येशूच्या पुनरुत्थानामुळे, त्याला आता तो गौरव मिळाला आहे ज्यासाठीं आपल्याला निर्माण केले होते. तो जसा आहे त्याला तसेंच पाहणे हेच आपले अंतिम प्राक्तन (लक्ष्य) आहे.

1 पेत्र 1:21: “देवानेंच त्याला मेलेल्यांतून उठवून त्याचा गौरव केला.”

जॉन 17:5, 24: “तर आता हे माझ्या पित्या, जग होण्यापूर्वी जो माझा गौरव तुझ्याजवळ होता त्याच्या योगे तू आपणाजवळ माझा गौरव कर. . . . हे माझ्या पित्या, माझी अशी इच्छा आहे कीं, तू जे मला दिले आहेत त्यांनीही जेथे मी आहे तेथें माझ्याजवळ असावे; ह्यासाठीं कीं, जो माझा गौरव तू मला दिला आहेस तो त्यांनी पाहावा; कारण जगाच्या स्थापनेपूर्वी तू माझ्यावर प्रीती केलींस.” मृतांतून उठलेला प्रभु येशू स्वतः तुमची प्रामाणिक मनें नव्याने खोलवर त्याची उपासना करण्यासाठीं व त्याच्याशी एकनिष्ठ राहण्यासाठीं व आनंद करण्यासाठीं जागृत करो आणि चेतवो.

19 फरवरी : कुड़कुड़ाने की कीमत

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19 फरवरी : कुड़कुड़ाने की कीमत
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“फिर वे लोग बुड़बुड़ाने और यहोवा के सुनते बुरा कहने लगे; अतः यहोवा ने सुना, और उसका कोप भड़क उठा।”  गिनती 11:1

मसीही जीवन में कुड़कुड़ाने के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

यह एक ऐसी सीख थी जिसे इस्राएल ने कठिन रीति से सीखा (और धीरे-धीरे सीखा)। परमेश्वर द्वारा उन्हें मिस्र की बँधुआई से मुक्त कराए जाने के बाद इस्राएलियों को परमेश्वर का व्यवस्था-विधान मिला, उन्हें उसकी आज्ञाएँ दी गईं और उन्हें अपना गन्तव्य स्थान पता लगा। वे उत्सुकता से प्रतिज्ञा किए गए देश तक पहुँचने के लिए निकल पड़े, किन्तु अभी वे बहुत दूर भी नहीं जा पाए थे—शायद सड़क के पहले मोड़ के आस-पास ही पहुँचे थे—कि वे कुड़कुड़ाने लगे। वे मन्ना नहीं मांस खाना चाहते थे, और यहाँ तक कि वे चाहते थे कि वे वापस मिस्र लौट जाएँ (गिनती 11:4-6)। जबकि एक बार उन्होंने सोचा था कि परमेश्वर द्वारा मन्ना का दैनिक प्रावधान उनके लिए उसके प्रेम का एक अद्‌भुत संकेत था, परन्तु अब वे वही पुरानी वस्तु खाने के बारे में कुड़कुड़ाने लगे थे।

कुड़कुड़ाना एक छोटी सी बात लगती है, किन्तु यह आभार की कमी की ओर संकेत करती है। जब भी आभार की कमी और अविश्वास परमेश्वर की सन्तानों के जीवन में दिखाई देती है, तो निश्चित रूप से उसके परिणाम सामने आते हैं। हो सकता है कि हमारा अन्त उन इस्राएलियों की तरह न हो, जो 40 साल तक मरुभूमि में भटकते रहे, परन्तु हमें भी हमारे कुड़कुड़ाने की कीमत चुकानी पड़ती है।

क्या आपको स्मरण है कि आपने पहली बार अपने नए विश्वास की उत्तेजना कब महसूस की थी? हो सकता है कि आपने नए नियम की अपनी पहली प्रति मोल ली हो और सोचा हो कि जो कुछ भी आपको मिलता जा रहा है, वह बहुत अच्छा है। आप उसे हर जगह पढ़ा करते थे। फिर संयोग से, चलते-चलते कुछ ऐसा हुआ कि अब वह केवल “वही पुरानी बाइबल” लगती है और आप चाहते हैं कि परमेश्वर कुछ और प्रभावशाली, कुछ बड़ा करे? क्या आपको वह समय याद है, जब आपको अपने विश्वास के बारे में दूसरों को बताना एक रोमांचक विशेषाधिकार लगता था, परन्तु अब यह एक बोझ और दायित्व की तरह लगता है? क्या आपको वह समय याद है जब आप क्रूस के लिए आभार से भरे हुए थे, परन्तु अब आप सोचते रहते हैं कि परमेश्वर आपको उन मार्गों या स्थानों पर से क्यों नहीं लेकर गया, जहाँ से आप जाना चाहते थे?

जब प्रेरित पौलुस ने प्रारम्भिक कलीसिया को लिखा तब उसने उन्हें चेतावनी के रूप में इस्राएल की कहानी स्मरण कराते हुए कहा, “न हम प्रभु को परखें, जैसा उनमें से कितनों ने किया, और साँपों के द्वारा नष्ट किए गए। और न तुम कुड़कुड़ाओ, जिस रीति से उनमें से कितने कुड़कुड़ाए और नष्ट करने वाले के द्वारा नष्ट किए गए। परन्तु ये सब बातें, जो उन पर पड़ीं, दृष्टान्त की रीति पर थीं; और वे हमारी चेतावनी के लिए जो जगत के अन्तिम समय में रहते हैं लिखी गईं हैं” (1 कुरिन्थियों 10:9-11)।

यदि हमें मसीह पर विश्वास है, तो हम पाप के दासत्व के मुक्त करा दिए गए हैं, यहाँ तक कि हमारी कुड़कुड़ाहट से भी! हम एक बलिदान द्वारा, अर्थात् क्रूस पर मसीह के लहू बहाए जाने के कारण मुक्त किए गए हैं। और हम भी एक यात्रा पर निकल पड़े हैं, जो कनान की ओर नहीं परन्तु स्वर्ग की है। उसे ध्यान में रखते हुए परमेश्वर ने हमें अद्‌भुत प्रतिज्ञाएँ और आवश्यक चेतावनियाँ दी हैं। उसके प्रावधान को कम महत्त्व का न समझें और न ही उस मार्ग के बारे में कुड़कुड़ाएँ जिस पर वह आपको ले जाता है, बल्कि उसके द्वारा भौतिक और आत्मिक रूप से प्रदान की गई सभी वस्तुओं के लिए आभार से भरे रहें। क्रूस आपके पीछे है, स्वर्ग आपके सामने है और पवित्र आत्मा आपके भीतर वास करता है। कुड़कुड़ाने की न तो कोई आवश्यकता है और न ही ऐसा करने के लिए कोई बहाना है।      भजन संहिता 95

19 फेब्रुवारी : जीवें मारणारी थंडी

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19 फेब्रुवारी : जीवें मारणारी थंडी
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तो आपली आज्ञा पृथ्वीवर पाठवतो; त्याचा शब्द फार वेगाने धावतो. (स्तोत्र 147:15)

आज रात्री आमच्या किचनच्या फ्रीझचे तापमान मिनियापोलिसच्या बाहेरील तापमानापेक्षा चाळीस अंश जास्त गरम असेल. उद्याचे उच्च तापमान शून्यापेक्षा (फॅरेनहाइट) पाच अंश खाली असेल. हे प्रभूकडून आहे.

तो आपली आज्ञा पृथ्वीवर पाठवतो; त्याचा शब्द फार वेगाने धावतो, तो लोकरीसारखे हिम पाडतो; राखेसारखे दवाचे कण पसरतो. तो आपल्या बर्फाचा चुर्‍याप्रमाणे वर्षाव करतो. त्याच्या गारठ्यापुढे कोण टिकेल? तो आपला हुकूम पाठवून ते वितळवतो; तो आपला वारा वाहवतो तेव्हां पाणी वाहू लागते. (स्तोत्र 147:15–18)

ती अशी थंडी आहे जिच्याशी तुम्हीं बालिश खेळ खेळत नाही. ती जीव घेणी थंडी आहे.

मी दक्षिण कॅरोलिनाहून मिनेसोटाला आलो तेव्हां मी स्वतःला थंडीपासून वाचविण्यासाठीं गरम कपडे घातले. परंतु माझी कार नादुरुस्त झाल्यांस मला ज्यां जीवन-रक्षक वस्तूंची गरज पडेल त्यां वस्तु मात्र मीं सोबत घेतल्या  नव्हत्या.

एका रविवारच्या रात्री मी चर्चमधून घरी परततांना अशाच थंडीत माझी गाडी नादुरुस्त झालीं. तेव्हां सेलफोन नव्हतें. गाडीत माझ्याबरोबर माझी पत्नी आणि दोन लहान मुलं होती.

पण तो रस्ता मात्र निर्जन होता. तेव्हां हा रस्ता धोकादायक असल्याचें माझ्या अचानक लक्षात आले.

आणि लवकरच तो रस्ता खूप धोकादायक असा ठरला, कारण त्या रस्त्याने कोणीहि ये-जा करित नव्हते.

मला दूरवर कुंपणातून एक घर दिसलें. शेवटी मी एक बाप आहे. कुटुंबाची काळजी घेणे हे माझं कर्तव्य. मी कुंपणावरून उडी मारून आंत शिरलो आणि धावत त्यां घराकडे गेलो आणि दरवाजा ठोठावला. तिथें राहणारे घरातंच होते. मी कारमध्ये माझी पत्नी आणि दोन लहान मुले असल्याचे त्यांना सांगितलें आणि ते आम्हांला आत घेतील का अशी मी त्यांना विचारणा केलीं. त्यांनी आम्हांला आंत घेतलें.

ही अशी थंडी आहे ज्यांत तुम्हीं धोका पत्करू शकत नाहीं.

हा असा मार्ग आहे ज्याविषयी देव म्हणतो, “मग गरम असो वा थंड, उंच असो वा खोल, तीक्ष्ण असो वा बोथट, किंचाळणारा असो वा शांत, प्रकाशमान असो वा अंधकारमय . . . माझ्याशी खेळू नकोस. मी देव आहे. या सर्व वस्तूं मी बनवल्या आहेत. जसा उन्हाळ्याचा उबदार वारा, आणि सौम्य पाऊस, आणि रात्रीच्या मंद चांदण्या, आणि तलावाचा काठ, आणि शेतातील फुलें आणि हवेतील पक्षी, तसें तीं मजविषयी साक्ष देतांत.

या थंडीतहि आमच्यासाठीं एक अभिवचन आहे. परमेश्वर आम्हांला स्पर्शजन्य त्वचा आणि ऐकणारे कान देऊ करो.

18 फेब्रुवारी : तुम्हीं अमर असतां तेव्हां

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18 फेब्रुवारी : तुम्हीं अमर असतां तेव्हां
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मग दिवस उगवल्यावर, कित्येक यहूदी एकजूट करून शपथबद्ध होऊन म्हणाले, पौलाचा जीव घेईपर्यंत आम्हीं खाणारपिणार नाही.” (प्रेषितांची कृत्ये 23:12)

त्या भुकेल्या लोकांचे काय झालें, ज्यांनी पौलाचा जीव घेईपर्यंत आम्हीं खाणारपिणार नाही अशी शपथ घेतलीं होती?

आपण त्यांच्याविषयीं प्रेषितांची कृत्ये 23:12 मध्ये वाचतो, “मग दिवस उगवल्यावर, कित्येक यहूदी एकजूट करून शपथबद्ध होऊन म्हणाले, “पौलाचा जीव घेईपर्यंत आम्हीं खाणारपिणार नाही.” पण तसें झालें नाही. का? कारण अनपेक्षित घटना घडल्या.

  •  तें कट करित असतांना तिथें दबा धरून बसलेल्या एका तरुणाने तें ऐकलें.
  •  हा तरुण पौलाचा भाचा होता.
  • त्यां तरुणाने पौलाचे रक्षण करणाऱ्या रोमन शताधिपतीकडे जाण्याचे धाडस केले.
  •  त्यां शताधिपतीनें त्याचे वृत्त गांभीर्याने घेतले आणि त्याला सरदाराकडे आणले.
  •  सरदाराने त्याच्यावर विश्वास ठेवला आणि पौलाला सुरक्षित ठिकाणी नेण्यासाठीं “दोनशे शिपाई, सत्तर स्वार व दोनशे भालेकरी” तयार केले.

प्रत्येक घटना अत्यंत अशक्य अशी होती. आश्चर्यच. पण असच झालं.

कोणती गोष्ट घातपात करण्यासाठीं दबा धरून बसलेल्यां त्यां भुकेल्या माणसांच्या लक्ष्यांत आलीं नव्हतीं? त्यांनी कट रचण्याआधीच पौलाचे काय झालें याचे आकलन करण्यात ते अपयशी झालें. प्रभूने तुरुंगात पौलाला दर्शन देऊन म्हटलें, “धीर धर; जशी तू यरुशलेमेत माझ्याविषयी साक्ष दिलीस तशी रोम शहरातही तुला द्यावी लागेल.” (प्रेषितांची कृत्ये 23:11).

ख्रिस्तानें म्हटलें कीं पौल रोम शहरांत जात आहे. आणि तेच होणार होते. ख्रिस्ताच्या अभिवचनाविरुद्ध कोणताही घातपाताचा कट यशस्वी होऊ शकत नाही. रोम नगरांत येईपर्यंत पौल अमर होता. त्याची अंतिम साक्ष देणें बाकीं होते. आणि पौल ती देईल ह्याची खात्री स्वतः ख्रिस्त करणार होता.

तुमचीही अंतिम साक्ष आहे जी देणे तुम्हांला अगत्याचे आहे. आणि जोपर्यंत तुम्हीं ती देत नाही तोपर्यंत तुम्हीं अमर आहां.

18 फरवरी : परमेश्वर के लिए मोल लिए गए

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18 फरवरी : परमेश्वर के लिए मोल लिए गए
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“तूने अपने लहू से हर एक कुल और भाषा और लोग और जाति में से परमेश्‍वर के लिए लोगों को मोल लिया है, और उन्हें हमारे परमेश्‍वर के लिए एक राज्य और याजक बनाया; और वे पृथ्वी पर राज्य करते हैं।”  प्रकाशितवाक्य 5:9-10

मैं वेल्स की रहने वाली मैरी फिशर नामक एक स्त्री के साथ बाइबल कॉलेज में था, जो मिशनरी बनने आई थी। वह शौना भाषा का अध्ययन कर रही थी, ताकि वह ज़िम्बाब्वे में युवा लड़के और लड़कियों को पढ़ा सके। उसके वहाँ पहुँचने के कुछ ही समय बाद, जिस विद्यालय में वह पढ़ा रही थी, उस पर आतंकी हमला हुआ। कई अन्य शिक्षकों और बच्चों के साथ-साथ मैरी भी बच नहीं पाई; उस हमले में उसकी जान चली गई।[1] यद्यपि उसकी मृत्यु दुखद थी, किन्तु उसके जीवन ने न केवल यहाँ, बल्कि अनन्त काल तक परमेश्वर की सेवा करने के सर्वोच्च आनन्द की साक्षी दी।

प्रकाशितवाक्य में मेमने के चारों ओर एकत्रित प्राचीनों के गीत में हमें यह स्मरण कराया जाता है कि मसीह की मृत्यु का उद्देश्य यह था कि हम परमेश्वर द्वारा मोल लिए जा सकें। हमें उस पाप से मुक्त किया गया है, जिसने हमें अपनी पकड़ में रखा था कि उसके लहू द्वारा मोल लिए जाने के बाद हम उसके लिए जीएँ। हमारी स्तुति परमेश्वर के लिए है। मैरी फिशर के समान हमारी सेवा भी परमेश्वर के लिए है।

जब पहली सदी के विश्वासियों ने अपने आस-पास देखा और जाना कि उनके कुछ मित्रों को उनके विश्वास के कारण बन्दी बना लिया गया है, तो वे मृत्यु पर मसीह के जयवन्त होने, उसके स्वर्गारोहण की जीत और उसकी वापसी की वास्तविकता को समझने का प्रयास करने लगे। जिस क्लेश का वे सामना कर रहे थे, उसे ध्यान में रखते हुए ये मसीही इस बात की स्मृति में प्रोत्साहन पा सके कि जब यीशु हमारे पापों के लिए प्रायश्चित्त कर रहा था तब भी उसका ध्यान हर समय पिता पर केन्द्रित था। उसने हमें परमेश्वर के लिए  मोल लिया था।

हम मिशनरी आत्मकथाओं में बताई गई त्रासदियों को कैसे समझ सकते हैं या शहीदों की मृत्यु में दिखने वाली स्पष्ट आक्रामक अराजकता को कैसे समझा सकते हैं? मैरी फिशर की अन्तिम रिकॉर्डिंग इस बात में स्पष्टता प्रदान करती है। एक गायिका और गिटार वादक के रूप में वह अपनी कक्षा में बच्चों को फिलिप्पियों की कलीसिया को लिखे पौलुस के शब्दों पर आधारित एक गीत के बोल सिखा रही थी: “मेरे लिए जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है” (फिलिप्पियों 1:21)।[2] यह गीत आगे कहता है कि उसके मार्ग पर चलना और उसका हाथ थाम लेना ही शान्ति और आनन्द का मार्ग है।

17 फरवरी : बच्चों के लिए एक बात

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17 फरवरी : बच्चों के लिए एक बात
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“हे बालको, प्रभु में अपने माता–पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि यह उचित है। ‘अपनी माता और पिता का आदर कर (यह पहली आज्ञा है जिसके साथ प्रतिज्ञा भी है) कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे।’”  इफिसियों 6:1-3

दो अवसरों पर जब पौलुस अपने पाठकों को भक्तिहीनता के कुरूप फलों की एक लम्बी सूची प्रदान करता है, तो उसके बीच में हमें “माता-पिता की आज्ञा न मानने वाले” (रोमियों 1:30; 2 तीमुथियुस 3:2) के रूप में एक छोटा वाक्यांश मिलता है। इसके विपरीत, जब आप कलीसिया का इतिहास पढ़ते हैं तो आप पाते हैं कि जब-जब आत्मिक जागृति आती थी, तब-तब व्यावहारिक रूप से भक्ति में भी बढ़त होती थी, जिसमें बच्चों का अपने माता-पिता के भक्तिपूर्ण अधिकार की अधीनता में आना भी शामिल होता था।

बच्चों का अपने माता-पिता की आज्ञा मानना केवल एक सुझाव नहीं है; यह एक दायित्व है। पवित्रशास्त्र सिखाता है कि ऐसी आज्ञाकारिता परमेश्वर की सृष्टि के प्राकृतिक क्रम के अनुसार है, उसकी व्यवस्था के अनुरूप है और सुसमाचार के प्रति प्रत्युत्तर के रूप में भी सही है। माता-पिता को आज्ञाकारिता की माँग करने और उसकी प्रशंसा करने से डरना नहीं चाहिए। किन्तु पौलुस केवल यह नहीं कहता कि आज्ञाकारिता एक उचित बात है; वह यह भी कहता है कि इसका प्रतिफल भी मिलता है। प्रभु यीशु में परमेश्वर की आज्ञाओं और प्रतिज्ञाओं पर ध्यान देने के साथ एक आशीष भी मिलती है। और जब माता-पिता और बच्चों के सम्बन्ध में प्रेम, भरोसा और आज्ञाकारिता दिखाई देते हैं, तो हम केवल स्वस्थ लोगों का ही निर्माण नहीं करते, अपितु हम एक स्वस्थ समाज का भी निर्माण करते हैं। माता-पिता के लिए भला होगा कि वे इन पाँच महत्त्वपूर्ण सच्चाइयों को स्मरण रखें, जो बाइबल हमारे बच्चों के बारे में सिखाती है:

1. “लड़के यहोवा के दिए हुए भाग हैं” (भजन 127:3)। वे एक वरदान और एक आशीष हैं। अपने बच्चों के बारे में सोचते हुए हममें उन बच्चों को प्रदान करने वाले के प्रति आभार का भाव उत्पन्न होना चाहिए।

2. हम अपने बच्चों के स्वामी नहीं हैं; वे परमेश्वर के हैं। वे हमें सीमित समय के लिए उधार पर दिए गए हैं।

3. बच्चे जन्म से ही दोषपूर्ण होते हैं, पाप के दोषी होते हैं और अनन्त जीवन के योग्य नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे हम सभी हैं (भजन 58:3; रोमियों 3:23)।

4. क्योंकि बच्चे पापी हैं, इसलिए उन्हें परमेश्वर की आज्ञाओं की आवश्यकता है। माता-पिता के रूप में हम उन्हें आरम्भिक दिनों से ही परमेश्वर की व्यवस्था के बारे में बताने के लिए उत्तरदायी हैं।

5. हमारे बच्चे केवल अनुग्रह से ही बचाए जा सकते हैं। इसलिए उद्धार के लिए हमें उन्हें केवल यीशु की ओर देखना सिखाना चाहिए।

हममें से बहुत से लोग ऐसी संस्कृति में रहते हैं, जहाँ इन सच्चाइयों का विरोध किया जाता है। एक ओर बच्चों को स्वाभाविक रूप से भला माना जाता है और उनकी शिक्षा या स्वास्थ्य या खुशी को सर्वोच्च भलाई के रूप में देखा जाता है। दूसरी ओर वे प्रायः मज़ाक का पात्र या कुड़कुड़ाने का विषय होते हैं। कभी-कभी कलीसिया के भीतर भी पालन-पोषण के बारे में स्पष्ट, बाइबल आधारित बातों का अभाव होता है। किन्तु इस विषय में परमेश्वर यह कहता है कि एक परिवार के सभी बच्चों को अपने माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए; माता-पिता को अपने बच्चों का पालन-पोषण इस प्रकार करना चाहिए कि वे परमेश्वर की व्यवस्था और परमेश्वर के अनुग्रह को जानें। यदि हम अपने घरों और अपनी कलीसियाओं में एक ऐसी पीढ़ी को देखना चाहते हैं, जो हमसे अधिक भक्तिमय और सरगर्म हो, तो हमें अपने बच्चों का पालन-पोषण परमेश्वर के सत्यों के साथ करना होगा। हममें से बहुत से माता-पिता ऐसे हैं, जिनके बच्चे अभी भी उनके साथ उनके घरों में रहते हैं। हम सभी ऐसी कलीसियाओं के सदस्य हैं, जहाँ हमारे बीच बच्चे हैं। तो फिर अगली पीढ़ी के आत्मिक स्वास्थ्य में आपका योगदान कैसा होना चाहिए?      नीतिवचन 2

17 फेब्रुवारी : देवाचे गोड सत्संकल्प

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17 फेब्रुवारी : देवाचे गोड सत्संकल्प
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तरी ज्या देवानें मला माझ्या मातेच्या उदरांतून जन्मल्यापासून वेगळें केलें व आपल्या कृपेनें बोलावलें…… (गलती 1:15)

पौलाचे आत्म-परिवर्तन, ख्रिस्ताचे सार्वभौमत्व आणि पौलाची पापें या सर्वांचा तुमच्या तारणाशी असलेला संबंध काय आहे यांवर विचार करा.

पौल म्हणाला कीं देवानें “मला…..जन्मल्यापासून वेगळे केले” आणि नंतर, अनेक वर्षांनी, दिमिष्कास जात असतांना, “आपल्या कृपेने बोलावले” (गलती 1:15). याचा अर्थ असा कीं पौलाचा जन्म आणि दिमिष्कास जात असतांना त्याला करण्यांत आलेले पाचरण यां दरम्यान तो पूर्वीच-निवडलेलें, परंतु अद्याप पाचारण न झालेंला, असा देवाचे पात्र होता (प्रेषितांची कृत्ये 9:15; 22:14).

याचा अर्थ असा कीं पौल हा देवाचे निवडलेला पात्र, ज्याला लवकरच ख्रिस्ती सुवार्तिक बनविण्यांत येणार होते, असा मनुष्य म्हणूनच तो ख्रिस्ती लोकांना मारत असे, त्यांना तुरुंगात टाकत असे आणि त्यांची हत्या करत असे.

मग असे झालें कीं, जाता जाता मी दिमिष्काजवळ पोहचलो, तेव्हां सुमारे दुपारच्या वेळेस आकाशातून माझ्याभोवती एकाएकीं मोठा प्रकाश चमकला. तेव्हां मी जमिनीवर पडलो, आणि ‘शौला, शौला, माझा छळ का करतोस?’ अशी वाणी माझ्याबरोबर बोलताना मी ऐकली?” (प्रेषित 22:6-7)

ही घटना टळणार नव्हती किंवा पौल त्यांतून सुटणार नव्हता. देवानें त्याला मातेच्या उदरातून जन्मल्यापासून यासाठींच निवडून वेगळे केले होते. आणि आता तो त्याच्यावर मात करून त्याला पकडणार होता. ख्रिस्ताची ती वाणी सार्वभौम होती. वाटाघाटी किंवा तरतूद करण्याची कांही शक्यता नव्हती.

‘उठून दिमिष्कात जा; मग तू जे काही करावे म्हणून ठरवण्यात आले आहे, त्या सर्वांविषयी तुला तेथें सांगण्यात येईल. (प्रेषित 22:10)

दिमिष्कच्या मार्गावर झालेंली घटना ही देवानें पौलाच्या तारणासाठीं केलेल्या अनेक दशकांच्या निरर्थक प्रयत्नांनंतर पौलानें स्वत:च  ख्रिस्ताला शरण जाण्यासाठीं स्वेच्छेने घेतलेला अंतिम व मुक्त निर्णय नव्हता. नाहीं. देवानें त्याला आपल्या ठरविलेल्या काळी (त्याच्या जन्मापूर्वी) आधीच निवडले होते, आणि त्याला तो केव्हां पाचारण करील ती नेमकीं घटका (दिमिष्कच्या मार्गावर) ठरवली होती. देवानें त्याला हाक मारली, आणि त्यां हाकेनें त्याच्या आत्म्यांत शरणागती उत्पन्न केलीं.

याप्रमाणे, पौलाचा जन्म आणि त्याचे पाचारण यादरम्यान देवानें त्याच्याकडून जी कांही पापे होऊं दिलीं ती सर्व त्याच्या योजनेचा भाग होती, कारण देव त्याला या आधी केव्हांच पाचारण करूं शकला असता.

त्या पापांमागे देवाची योजना काय असावी याची आपल्याला कांही कल्पना आहे का? होय, आहे. देवानें ती पापें तुमच्यासाठीं आणि माझ्यासाठीं होऊं दिलीं – म्हणजे त्यां सर्वांसाठीं ज्यांना यात काही शंका आहे कीं त्यांनी ती पापे स्वतःहून कृपेने केलीं असावी. पाहा, पौल कसा त्याच्या पापांचा संबंध तुमच्या आशेबरोंबर जोडतो :

कारण मी जो पूर्वी निंदक, छळ करणारा व जुलमी होतो. . . . तरी जे युगानुयुगाच्या जीवनासाठीं त्याच्यावर विश्वास ठेवणार आहेत, त्यांना उदाहरण व्हावे म्हणून येशू ख्रिस्तानें, मी जो मुख्य त्या माझ्याविषयी आपली सर्व सहनशीलता दाखवावी म्हणून माझ्यावर दया झाली. (1 तीमथ्य 1:13, 16)

अहाहा, अंत:कारणाने कठोर, व कोणतीहि आशा  नसलेल्यां पापी लोकांच्या यां सार्वभौम तारणांत देवाचे सत्संकल्प किती गोड आहेत!

16 फरवरी : तुम मुझे क्या कहते हो

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“शमौन पतरस ने उत्तर दिया, ‘तू जीवते परमेश्‍वर का पुत्र मसीह है।’ यीशु ने उसको उत्तर दिया, ‘हे शमौन, योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है।’”  मत्ती 16:16-17

जब हम सुसमाचारों को पढ़ते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जब लोग नासरत के यीशु के सम्पर्क में आते थे, तो शायद ही कभी वे सभ्य उदासीनता के साथ प्रतिक्रिया दे पाते थे। उसके शब्द और कार्य गूढ़ प्रेम और भक्ति को, परन्तु साथ ही भय और घृणा को भी प्रेरित करते थे। प्रतिक्रियाओं की ऐसी विविधता के लिए सम्भवतः क्या कारण हो सकता है?

कैसरिया फिलिप्पी के मार्ग पर, जैसा कि अक्सर ही होता था, इस बातचीत में उत्तर देते हुए पतरस बोल पड़ा, “तू मसीह है।” और यह उत्तर उसने केवल अपने लिए नहीं परन्तु दूसरों के लिए भी दिया था। यीशु की पहचान के लिए उसने जिस शब्द का प्रयोग किया, वह था ख्रीस्तोस,  जिसका यूनानी में अर्थ था “मसीह” या “अभिषिक्त।” पुराने नियम में परमेश्वर ने राजाओं, न्यायियों और भविष्यद्वक्ताओं का अभिषेक किया था, किन्तु वे सभी भविष्य में आने वाले मसीह, या उद्धारकर्ता, अर्थात् परमेश्वर के अभिषिक्त की ओर संकेत करने वाले प्रतिनिधि और प्रवक्ता थे। इस कारण पतरस ने जो घोषणा की वह विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। वह यीशु से कह रहा था कि तू ही वह है। तू वही है जिसके बारे में भविष्यद्वक्ताओं ने बात की है।  

पतरस की इस बात पर यीशु का स्पष्टीकरण और भी अधिक आश्चर्यजनक है। पतरस अपने इस निष्कर्ष पर इसलिए नहीं पहुँचा था, क्योंकि वह बुद्धिमान था या उसके पास तार्किक और तर्कसंगत सोच की उन्नत क्षमता थी या क्योंकि किसी प्रेरक प्रचारक ने उसे यह बताया था। उसका यह उत्तर इसलिए सम्भव हुआ था, क्योंकि परमेश्वर पिता ने ही सचमुच उस पर यह प्रगट किया था।

हमारे विश्वास के अंगीकार के समान ही पतरस के विश्वास का अंगीकार भी उसकी अपनी क्षमता में कभी नहीं हो सकता था। विश्वास एक वरदान है, जो हमें दिया जाता है। पतरस और यीशु के बीच का यह वार्तालाप परमेश्वर के आत्मा द्वारा परमेश्वर के वचन को लेने और उसे किसी के मन और हृदय में इस प्रकार लेकर आने का एक ठोस उदाहरण है, जिससे वह यीशु के मसीह होने की घोषणा कर पाता है।

पतरस के समान यीशु को प्रभु और मसीह के रूप में घोषित करने की हमारी क्षमता हमारा अपना काम नहीं है; यह तो “परमेश्‍वर का दान है, और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे” (इफिसियों 2:8-9)। यदि हमारा विश्वास हमारी अपनी बौद्धिक क्षमता या भावनात्मक बुद्धिमत्ता या नैतिक भलाई का परिणाम होता, तो हम अपने में ही भरोसा रख सकते थे और इस कारण हम अपने पर घमण्ड कर सकते थे। परन्तु ऐसा होने पर अपने अच्छे दिनों में यह हमें घमण्डी बना देगा और बुरे दिनों में यह हमें निर्बल बना देगा। कदापि नहीं, हमारा विश्वास पूरी तरह से परमेश्वर के वरदान पर आधारित है और इसलिए हम अपना भरोसा उस पर रखते हैं और इस प्रकार हम अपने सबसे उत्कृष्ट दिनों में दीन रहते हैं और अपने सबसे बुरे दिनों में भरोसा रख पाते हैं। तो फिर आज कृतज्ञता के साथ आनन्दित हों, क्योंकि परमेश्वर अपने वचन की सच्चाई के द्वारा हृदयों और मनों को बदलने से प्रसन्न होता है, जिससे कि हम पतरस के साथ मिलकर यह घोषणा कर सकें, “तू ही मसीह है।”      

इफिसियों 2:1-10