ArchivesAlethia4India

25 फेब्रुवारी : तू परमप्रिय आहेस

Alethia4India
Alethia4India
25 फेब्रुवारी : तू परमप्रिय आहेस
Loading
/

त्या लोकांत आपणही सर्व पूर्वी आपल्या दैहिक वासनांना अनुरूप असे वागलो, आपल्या देहाच्या व मनाच्या इच्छांप्रमाणे करत होतो व स्वभावतः इतरांप्रमाणे क्रोधाची प्रजा होतो. तरी देव दयासंपन्न आहे म्हणून आपण आपल्या अपराधांमुळे मृत झालेलें असताही त्यानें आपल्यावरील स्वतःच्या अपरंपार प्रेमामुळे, ख्रिस्ताबरोबर आपल्याला जिवंत केले, कृपेने तुमचे तारण झालेलें आहे (इफिस 2:3-5).

गब्रीएल स्वर्गदूताने तुम्हाला असे म्हणतांना आवडणार नाही का कीं, “तू परमप्रिय आहेस?”

दानीएलासोबत हे तीनदा घडले.

  • “तुझ्या प्रार्थनांना आरंभ होताच आज्ञा झाली, ती तुला सांगण्यास मी आलो आहे; कारण तू परमप्रिय आहेस.” (दानीएल 9:23)
  • “हे दानिएला, परमप्रिय पुरुषा, मी तुला सांगतो ते शब्द समजून घे; नीट उभा राहा; कारण मला आता तुझ्याकडे पाठवले आहे;” (दानीएल 10:11)
  • तो म्हणाला, “परमप्रिय मानवा, भिऊ नकोस; तुला शांती असो, हिंमत धर, नेट धर.” (दानीएल 10:19)

मी हे कबूल करतो कीं दरवर्षी जेव्हां मी बायबल वाचतो आणि ही वचने पाहतो, तेव्हां मी ती घेऊन स्वतःस लागू करू इच्छितो. मला देवाला हे म्हणतांना ऐकावेसे वाटते कीं, “तू परमप्रिय आहेस.”

खरे म्हणजे, मी हे ऐकतो. आणि तुम्हीं देखील ते ऐकू शकता. जर तुमच्याठायी येशूवर विश्वास असेल, तर देव स्वतः त्याच्या वचनात तुम्हाला म्हणतो – जे देवाचा दूत म्हणतो त्यापेक्षा अधिक निश्चित आहे – “तू परमप्रिय आहेस.”

इफिस 2:3-5,8 मध्ये असे लिहिलेले आहे : आम्हीं ”इतरांप्रमाणे क्रोधाची प्रजा होतो. तरी देव दयासंपन्न आहे म्हणून आपण आपल्या अपराधांमुळे मृत झालेलें असताही त्यानें आपल्यावरील स्वतःच्या अपरंपार प्रेमामुळे, ख्रिस्ताबरोबर आपल्याला जिवंत केले, …कारण कृपेनेच विश्वासाच्या द्वारे तुमचे तारण झालेलें आहे.”

हेच एकमेव ठिकाण आहे जेथे पौल “अपरंपार प्रेम” या अद्भुत वाक्यांशाचा उपयोग करतो. आणि ते देवदूताच्या वाणीपेक्षा उत्तम आहे. जर तुम्हीं येशूकडे सत्य म्हणून पाहिले आहे आणि त्याला तुमचा श्रेष्ठ खजिना म्हणून स्वीकारले आहे, अर्थात जर तुम्हीं ”जिवंत” असाल, तर तुम्हीं परमप्रिय आहात. विश्वाच्या निर्माणकर्त्याने तुम्हांवर अपरंपार प्रीती केलीं. याचा विचार करा! परमप्रिय बंधुजन!

24 फरवरी : चुप्पी में से आशा

Alethia4India
Alethia4India
24 फरवरी : चुप्पी में से आशा
Loading
/

देखो, मैं अपने दूत को भेजता हूँ, और वह मार्ग को मेरे आगे सुधारेगा, और प्रभु, जिसे तुम ढूँढ़ते हो, वह अचानक अपने मन्दिर में आ जाएगा; हाँ, वाचा का वह दूत, जिसे तुम चाहते हो, सुनो, वह आता है, सेनाओं के यहोवा का यही वचन है।”  मलाकी 3:1

परमेश्वर के लोग प्रतीक्षा करने वाले लोग हैं।

बेबीलोन में अपनी बँधुआई से परमेश्वर के लोगों के लौटने के बाद “लघु भविष्यद्वक्ता” हाग्गै, जकर्याह और मलाकी उनके पास परमेश्वर का वचन लेकर आए। उनका सन्देश वैसा ही था, जैसा उनके पहले के भविष्यद्वक्ताओं ने लोगों के बन्दी बनाए जाने से पहले कहा था कि तुम इस्राएली लोग मूर्ख हो! तुम वाचा को तोड़ते रहते हो। और यदि तुम वाचा को तोड़ते रहोगे, तो परमेश्वर न्याय लेकर आएगा।

लेकिन लघु भविष्यद्वक्ताओं का सन्देश केवल  न्याय के बारे में नहीं था। उसमें आशा भी थी।

वे भले ही शारीरिक रूप से देश में लौट आए थे, किन्तु आत्मिक रूप से वे लोग अभी भी बँधुआई में थे। इस्राएल का जो कुछ बचा था, अर्थात् यहूदा, इस आशा को थामे रहा कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करेगा, जिससे कि उसके लोग उसकी आशिषों का आनन्द उठा सकें। परन्तु परमेश्वर का राज्य अभी भी उस तरह से नहीं आया था, जैसा कि पहले के भविष्यद्वक्ताओं ने घोषित किया था क्योंकि परमेश्वर का राजा अभी तक नहीं आया था। इसलिए लोग प्रभु के लौटने और उद्धार की सभी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

पुराने नियम का अन्तिम भविष्यद्वक्ता, मलाकी, दृढ़ता से कहता रहा कि वह राजा आएगा, परन्तु उसके बाद भी 400 वर्षों तक चुप्पी बनी रही। लोग पैदा होते रहे, अपने सामान्य कार्यों को करते रहे, कारोबार करते रहे, मर गए, और यह चक्र इसी प्रकार चलता रहा। हो सकता है कि उन्होंने एक-दूसरे से पूछा हो, “उन शब्दों का क्या हुआ कि ‘मैं अपने दूत को भेजूँगा, और वह मार्ग को मेरे आगे सुधारेगा’? उस प्रतिज्ञा को तो सदियाँ बीत चुकी हैं।”

अन्ततः हो सकता है कि उनमें से कुछ लोग बाजार की ओर जा रहे होंगे जब विचित्र कपड़े पहने और विचित्र भोजन खाने वाला एक असामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति सड़कों पर दिखाई दिया होगा, जो पुराने नियम में लिखी बातें बोल रहा था, “देख, मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजता हूँ, जो तेरे लिए मार्ग सुधारेगा। जंगल में एक पुकारने वाले का शब्द सुनाई दे रहा है कि प्रभु का मार्ग तैयार करो, और उसकी सड़कें सीधी करो” (मरकुस 1:2-3)। इन शब्दों के साथ यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने पीढ़ियों की चुप्पी तोड़ दी। कई वर्षों की प्रतीक्षा के बाद परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में विश्वासयोग्य रहा, जैसा कि वह सदा से है। उसने अपने दूत और अपने राजा दोनों को भेजा कि सभी लोग उसकी आशीष का अनुभव कर सकें, अर्थात्, यीशु मसीह के द्वारा उद्धार की पूर्ति का अनुभव कर सकें।

हमारे दिनों में परमेश्वर के लोग अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम जानते हैं कि यीशु आ चुका; हम यह भी जानते हैं कि वह आने वाला है। परमेश्वर का राज्य अभी तक अपनी पूर्ण महिमा में नहीं आया है। इस कारण, तात्कालिक आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक इस संसार में हम धीरज के साथ प्रतीक्षा करने वाले लोग हैं और एक ऐसे संसार में जहाँ लोगों की आशा तीव्रता से भंग हो जाती है, हम धीरज के साथ आशा रखने वाले लोग हैं। जब ऐसा लगे कि परमेश्वर आपके जीवन में अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में बहुत अधिक समय ले रहा है, तब भी आशा मत खोइए। पीढ़ी से पीढ़ी तक वह विश्वासयोग्य रहा है और यीशु को भेजने के द्वारा उसने प्रत्येक प्रतिज्ञा को पूरा करने वाले का परिचय भी दे दिया है। आप उसकी समरूपता में विश्राम कर सकते हैं। “हाँ,” यीशु कहता है, “मैं शीघ्र आने वाला हूँ” (प्रकाशितवाक्य 22:20)। वह वही करेगा जो उसने कहा है।      2 पतरस 3:1-13

24 फेब्रुवारी : देव अंतःकरण उघडतो

Alethia4India
Alethia4India
24 फेब्रुवारी : देव अंतःकरण उघडतो
Loading
/

तेथें लुदिया नावाची कोणीएक स्त्री होती; ती थुवतीरा नगराची असून जांभळी वस्त्रे विकत असे; ती देवाची भक्ती करणारी होती. तिने आमचे भाषण ऐकले; तिचे अंतःकरण प्रभूने असे उघडलें कीं, पौलाच्या सांगण्याकडे तिने लक्ष दिले.(प्रेषितांची कृत्ये 16:14)

ज्यां ज्यां ठिकाणी पौलाने सुवार्ता गाजविली तेथें काहींनी विश्वास ठेवला आणि काहींनी नाही. आम्हीं हे कसे समजावे कीं अपराध आणि पातकांत मृत असलेल्या काही लोकांनी विश्वास ठेवला आणि काहींनी नाही (इफिस 2:1,5)?

काहींनी विश्वास का ठेवला नाही  याचे उत्तर हे आहे कीं “त्यांनी त्याचा अव्हेर केला” (प्रेषितांची कृत्ये 13:46) कारण सुवार्तेच्या गोष्टीं त्यांना “मूर्खपणाच्या वाटतात” आणि त्यांना “त्या समजू शकणार नाहीत” (1 करिंथ 2:14). देहस्वभाव “हे देवाबरोबर वैर आहे; ते देवाच्या नियमशास्त्राच्या अधीन नाही, आणि त्याला तसे होता येत नाही” (रोम 8:7).

प्रत्येक जण जो सुवार्ता ऐकतो आणि त्याचा अव्हेर करतो “तो प्रकाशाचा द्वेष करतो आणि आपली कृत्ये उघडकींस येऊ नयेत म्हणून प्रकाशाकडे येत नाही” (योहान 3:20). त्यांची “बुद्धी अंधकारमय झाली आहे… त्यांच्या अंतःकरणातील कठीणपणामुळे त्यांच्यात अज्ञान उत्पन्न होऊन” राहते (इफिस 4:18). हे सदोष अज्ञान आहे. सत्य तर प्रकट आहे, पण ते “अनीतिने सत्य दाबून ठेवतात” (रोम 1:18).

पण मग, जरी सर्व जण अंतःकरणाच्या या बंडखोर कठीणपणाच्या दशेत आहेत, व आपल्या अपराधांत मेलेले आहेत तरी काही लोक विश्वास का ठेवतात? प्रेषितांच्या कृत्यांचे पुस्तक कमीत कमी तीन वेगळ्या पद्धतीने याचे उत्तर देते. एक हे आहे कीं त्यांना विश्वास ठेवण्यासाठीं नेमण्यात आले आहे. जेव्हां पौलाने अंत्युखियातील पिसिदिया येथें सुवार्ता गाजविली, तेव्हां परराष्ट्रीय आंनदीत झालें आणि “जितके सार्वकालिक जीवनासाठीं नेमलेले होते तितक्यांनी विश्वास ठेवला” (प्रेषितांचे कृत्ये 13:48).

काही लोक विश्वास का ठेवतात याचे आणखी एक उत्तर असें कीं देवानें त्यांना पश्चातापबुद्धी दिली. जेव्हां यरूशलेमातील पवित्र जनांनी हे ऐकले कीं यहूदीच नव्हे तर परराष्ट्रीयदेखील सुवार्तेस प्रतिसाद देत होते, तेव्हां ते म्हणाले, “देवानें परराष्ट्रीयांसही जीवन मिळावे म्हणून पश्चातापबुद्धी दिली आहे” (प्रेषितांचे कृत्ये 11:18).

परंतु व्यक्ती सुवार्तेवर विश्वास का ठेवतो या प्रश्नाचे प्रेषितांच्या कृत्यामधील सर्वात स्पष्ट उत्तर हे आहे कीं देव अंतःकरण उघडतो. लुदिया याचे सर्वात उत्तम उदाहरण आहे. तिने का विश्वास ठेवला? प्रेषितांची कृत्ये 16:14 म्हणते, “तिचे अंतःकरण प्रभूने असे उघडलें कीं पौलाच्या सांगण्याकडे तिने लक्ष दिले.”

जर तुम्हीं येशूवर विश्वासणारे असाल, तर या सर्व गोष्टी तुमच्यासोबत घडल्या आहेत : तुम्हाला विश्वास ठेवण्यासाठीं नेमण्यात आले होते; तुम्हाला पश्चातापबुद्धी देण्यात आली होती; आणि देवानें तुमचे अंतःकरण उघडले होते. तुमचे उर्वरित जीवन तुम्हीं विश्वासणारे आहात या चमत्काराप्रत अद्भुत कृतज्ञतेने ओतप्रोत असले पाहिजे.

23 फरवरी : उसके स्वरूप में होना

Alethia4India
Alethia4India
23 फरवरी : उसके स्वरूप में होना
Loading
/

“जिन्हें उसने पहले से जान लिया है, उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे।”  रोमियों 8:29

जो दम्पति बहुत अधिक समय से विवाहित हैं, उनसे यह अक्सर ही पूछ लिया जाता है कि क्या वे भाई-बहन हैं, क्योंकि उन्होंने एक-दूसरे के कई गुण अपना लिए होते हैं।

आंशिक रूप से यह बात तर्कसंगत भी है, है न? हम जिस तरह की संगति में रहते हैं, हम वैसे ही बन जाते हैं। मसीह के साथ चलने में भी हमारे लिए यही बात सत्य ठहरनी चाहिए।

आपके जीवन के लिए परमेश्वर का उद्देश्य है आपको उसके पुत्र के स्वरूप की समानता में ढालना। इस बारे में सोचकर देखें। यीशु की मानवीय पूर्णताओं पर विचार करें और अनुभव करें कि आपको उसके जैसे बनने का अवसर मिल जाए! परमेश्वर इसके लिए गम्भीरतापूर्वक प्रतिबद्ध है; यह एक ऐसा कार्य है जिसे वह “यीशु मसीह के दिन तक पूरा करने” की प्रतिज्ञा करता है (फिलिप्पियों 1:6)। परमेश्वर आज के दिन क्या कर रहा है? हम सरल शब्दों में इसका सार इस तरह से प्रस्तुत सकते हैं कि वह हमें मसीह की समानता में और अधिक बना रहा है।

हममें से बहुत से लोग रोमियों 8:28 के आश्वासन से परिचित हैं, “जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।” परन्तु इसके बाद का पद हमें बताता है कि हमारा सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमारे जीवन के सभी पहलुओं में किस “भलाई” को उत्पन्न कर रहा है। वह यह है कि वह हमें “उसके पुत्र के स्वरूप में” ढाल रहा है।

परमेश्वर आपकी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक आपके मसीह-समान होने की चिन्ता करता है। सफलता और हँसी की तुलना में प्रायः निराशा और असफलता के द्वारा अधिक आत्मिक प्रगति होती है। ऐसा नहीं है कि हम कष्ट को ढूँढ-ढूँढ कर खोजने लगें, हम यह मान सकते हैं कि हमारा पिता बेहतर जानता है तथा कोई भी बात उसे आश्चर्यचकित नहीं करती है। जब हम किसी ऐसी प्रार्थना का अनुभव करते हैं, “जिसका उत्तर नहीं मिला” या जब हमारी चुनौतियाँ और पीड़ाएँ हमारी इच्छा से कहीं अधिक लम्बे समय तक बनी रहती हैं, उस समय हमें यह देखने में आशा मिलती है कि परमेश्वर का अनन्त उद्देश्य उसकी सन्तानों के जीवन में और उनके जीवनों के द्वारा पूरा हो रहा है।

आप और मैं अकेले नहीं हैं, जिन्होंने निःशब्द आशाहीनता का सामना किया है या जो अभी भी निराशा भरे समय में से होकर जा रहे हैं, जब हम यह पूछने के प्रलोभन में आ जाते हैं कि “परमेश्वर क्या कर रहा है? ” जब स्तिफनुस के सताने वालों ने अपने कपड़े उतारे और उस पर पथराव करने लगे तब वह क्या कर रहा था (प्रेरितों 7:58)? जब पौलुस को दमिश्क से बाहर निकलना पड़ा, उसे टोकरे में बैठाया गया और शहरपनाह पर से लटकाकर उतारा गया (9:25), तब वह क्या कर रहा था? जब पतरस को राजा हेरोदेस ने बन्दी बना लिया था (12:3), तब वह क्या कर रहा था? यह देखना भले ही कठिन हो, किन्तु परमेश्वर अपनी अनन्त योजना को पूरा कर रहा था, अर्थात् अपने अनुयायियों को यीशु के समान बना रहा था, जब वे यीशु के पास अपने घर जा रहे थे।

हर सवेरे जागते समय आपकी आशा का स्रोत यही होता है। चाहे बारिश हो या धूप, चाहे हर्ष हो या निराशा, परमेश्वर निश्चित रूप से दिन भर आपके जीवन में अपने उद्देश्यों को पूरा करेगा। आपके स्वर्गिक पिता के पास उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक योजना और उद्देश्य है, जिसे वह अपना कहता है। हो सकता है कि आप उसके द्वारा कार्य के होते समय देख सकें कि वह इसे कैसे कर रहा है, या कुछ महीनों बाद देखने पाएँ, या सम्भव है कि तब तक न देख पाएँ जब तक आप अनन्त काल में मसीह के साथ खड़े नहीं हो जाते। किन्तु यह बात जान लें कि आज एक और दिन है, जब आपका पिता आपको अपने पुत्र की समानता में बना रहा है।      

रोमियों 8:26-39

23 फेब्रुवारी : असामान्य धोक्याची घटका

Alethia4India
Alethia4India
23 फेब्रुवारी : असामान्य धोक्याची घटका
Loading
/

ख्रिस्ताच्या नावामुळें तुमची निंदा होत असल्यास तुम्हीं धन्य आहां; कारण गौरवाचा आत्मा म्हणजें ‘देवाचा आत्मा’ तुमच्यावर येऊन ‘राहिला आहें.’ त्यांच्याकडून त्याची निंदा होते, पण तुमच्याकडून तो गौरविला जातो. (1 पेत्र 4:14)

आज जगातील अनेक ख्रिस्ती लोकांस ख्रिस्तावर विश्वास ठेवल्यामुळे येणाऱ्या जीवघेण्या धोक्याची जाणीव नाही. आम्हांला छळमुक्त जीवन जगण्याची सवय झालेंली आहे. असे वाटते कीं सर्वकाही असेच असले पाहिजे.

म्हणून, परिस्थिती यापेक्षा वेगळी असू शकते या धोक्याला आमची पहिली प्रतिक्रिया बहुधा संतापाची असते. पण तो संताप या गोष्टीचे चिन्ह असू शकतो कीं आम्हीं प्रवासी व परदेशवासी आहोत ही जाणीवच आम्हीं गमावून बसलो आहोत (“प्रियजनहो, जे तुम्हीं ‘प्रवासी व परदेशवासी’ आहात…” 1 पेत्र 2:11).

कदाचित आम्हीं या जगात फारच मुळावलेले आहोत. आम्हांला ख्रिस्तासाठीं स्वर्गीय घराची आठवण येत नाही जशी पौलाला येत असे : “आपले नागरिकत्व तर स्वर्गात आहे; तेथून प्रभू येशू ख्रिस्त हा तारणारा येणार आहे, त्याची आपण वाट पाहत आहोत” (फिलिप्पै 3:20).

आमच्यापैकीं अनेकांस आठवण करून देण्याची गरज आहे, “प्रियजनहो, तुमची पारख होण्यासाठीं जी अग्निपरीक्षा तुमच्यावर आली आहे तिच्यामुळे आपणांस काही अपूर्व झालें असे वाटून त्याचे नवल मानू नका.” (1 पेत्र 4:12). हे विचित्र नाही.

तुम्हीं कधी विचार केला आहे कीं शेवटच्या परीक्षेच्या घटकेत तुमचे काय होईल? बंदूकधार्याने तुमच्यावर नजर ठेवली आहे आणि तो तुम्हाला विचारतो, ”तू ख्रिस्ती आहेस का?“ तुम्हाला ही आशा देण्यासाठीं एक कठोर शब्द आहे कीं तुम्हीं विचार करता त्यापेक्षा उत्तम करू शकता.

पेत्र म्हणतो, “ख्रिस्ताच्या नावामुळे तुमची निंदा होत असल्यास तुम्हीं धन्य आहात; कारण गौरवाचा आत्मा म्हणजे ‘देवाचा आत्मा’ तुमच्यावर येऊन ‘राहिला आहे.’ त्यांच्याकडून त्याची निंदा होते, पण तुमच्याकडून तो गौरविला जातो” (1 पेत्र 4:14). पेत्राकडून हे प्रोत्साहन म्हणते कीं असामान्य धमकींच्या घटकेत (अपमान असो व मृत्यू) “गौरवाचा आत्मा म्हणजे देवाचा आत्मा आमच्यावर येऊन राहतो.” याचा अर्थ हा नाही का कीं आपण ख्रिस्ती असल्यामुळे जे संकटसमयी दुःख सोसतांत देव त्यांना विशेष मदत पुरवितो?

माझ्या म्हणण्याचा अर्थ हा नाही कीं तो आमच्या इतर क्लेशांत तो गैरहजर राहतो. माझ्या म्हणण्याचा अर्थ केवळ हा आहे कीं पेत्र कल्पनेपलीकडे जाऊन असें म्हणतो कीं जे “ख्रिस्ताच्या नावामुळे” दुःख सोसतात त्यांना आपणांवर “गौरवाचा आत्मा म्हणजे देवाचा आत्मा” “येऊन राहण्याचा” विशेष अनुभव येईल. प्रार्थना करा कीं जेव्हां परीक्षा येतात तेव्हां तुम्हीं देखील हेंच अनुभवाने जाणून घ्यावें. त्या क्षणी धैर्याची साधनसामुग्री असेल जी इतर प्रसंगी आमच्याजवळ नसते. धैर्य धरा.

22 फरवरी : परमेश्वर को जानना

Alethia4India
Alethia4India
22 फरवरी : परमेश्वर को जानना
Loading
/

“तब उन्हें फिर एक दूसरे से यह न कहना पड़ेगा कि यहोवा को जानो, क्योंकि, यहोवा की यह वाणी है, छोटे से लेकर बड़े तक, सब के सब मेरा ज्ञान रखेंगे।”  यिर्मयाह 31:34

यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के दिनों में परमेश्वर ने अपने लोगों के साथ की गई वाचा को तोड़ने से इनकार कर दिया। यद्यपि उसकी महा करुणा के होने पर भी परमेश्वर के लोग पाप करते रहे। इससे एक समस्या उत्पन्न हो गई कि परमेश्वर अपने लोगों को आशीषित करने की अपनी प्रतिज्ञाओं को कैसे पूरा कर सकता था, जब कि वे लगातार उसके साथ विश्वासघात करते जा रहे थे?

अपनी महान योजना के एक भाग के रूप में परमेश्वर ने एक नई वाचा की प्रतिज्ञा की कि वह आन्तरिक पुनर्निर्माण का कार्य करेगा। जैसा कि थियोलॉजियन ऐलेक मौटियर लिखते हैं, “जब उसके लोग उसके मानकों की ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाते हैं, तो प्रभु उनकी क्षमता के अनुरूप अपने मानकों को कम नहीं कर देता, बल्कि वह अपने लोगों को ही पूरी तरह से बदल देता है।”[1]

यह नई वाचा प्रभु यीशु के लहू के द्वारा हृदयों को नया जीवन प्रदान करने की परमेश्वर की योजना और प्रतिज्ञा है। जैसे किसी पहेली में एक टुकड़ा बिठाना हो, वैसे ही वह हमारे हृदयों को लेता है और उन्हें ऐसा सिद्ध आकार देता है कि उसकी व्यवस्था हमारे लिए हर्ष की बात बन जाती है।

परमेश्वर द्वारा इस नई वाचा का वर्णन किए जाने में क्रिया शब्द “जानना” ही कुंजी है। मूल इब्रानी भाषा में उत्पत्ति की पुस्तक के आरम्भ में ही इसका अर्थ स्पष्ट है। यह स्पष्ट वक्तव्य कि आदम ने अपनी पत्नी को “जाना” और उनके बच्चे हुए (उत्पत्ति 4:1), यह दर्शाता है कि यह कितनी निकटता व्यक्त करता है। परमेश्वर कह रहा है कि जब उसके लोग उसके प्रेम को समझ जाएँगे, तो वे केवल दूर से बाइबल अध्ययन नहीं करेंगे; वे ऐसे लोग बन जाएँगे जो वास्तव में उसे जानते होंगे।

यिर्मयाह जिस बात को भविष्य काल में कह रहा था, हम वर्तमान में उसका आनन्द लेने में सक्षम हैं, क्योंकि उसकी भविष्यद्वाणी और हमारे समय के बीच प्रभु यीशु ने मरने से एक रात पहले कटोरा लिया और कहा, “यह कटोरा मेरे उस लहू में, जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है, नई वाचा है” (लूका 22:20)। परमेश्वर के अनुग्रह से आप और मैं राजाओं के राजा और प्रभुओं के प्रभु को जान सकते हैं। इतना ही नहीं, बल्कि वह हम में से प्रत्येक को व्यक्तिगत रूप से नाम से जानता है और हमारी आवश्यकताओं को भी जानता है तथा हमारी भलाई के लिए प्रतिबद्ध है। यीशु पिता के समक्ष हमारे नाम की साक्षी देता है, और वह जो कुछ भी है और उसने जो कुछ भी किया है उसके कारण हमारे नाम जीवन की पुस्तक में लिखे गए हैं।

यह किस तरह का राजा है? इसका उत्तर पूरी तरह से समझ पाना हमारी क्षमता से परे है। एक दिन हम उसे आमने-सामने देखेंगे और आज की तुलना में कहीं अधिक समझ सकेंगे। परन्तु फिर भी, आज आप उस हियाव के साथ आगे बढ़ सकते हैं, जो इस बात को जानने से आता है कि आप उस परमेश्वर को जानते हैं, जिसने आपको अपने पुत्र के द्वारा छुटकारा दिलाया है, जो अपने आत्मा के द्वारा आप में वास करता है और कार्य करता है, और जिसके सिंहासन के कक्ष में एक दिन आप खड़े होंगे।

यिर्मयाह 31:31-40

22 फेब्रुवारी : त्याच्या पूर्णतेचा आनंद घेणें

Alethia4India
Alethia4India
22 फेब्रुवारी : त्याच्या पूर्णतेचा आनंद घेणें
Loading
/

“त्याच्या पूर्णतेतून आपणा सर्वांना कृपेवर कृपा मिळाली आहे.” (योहान 1:16)

मागच्या रविवारी उपासना सभेच्या लगेच पूर्वी, प्रार्थना करणाऱ्या संताची लहान टोळी प्रार्थनेत आपल्या लोकांच्या विश्वासासाठीं, आणि दुहरे शहरांतील मंडळ्यांसाठीं, आणि राष्ट्रांसाठीं लढण्याकरिता परिश्रम करीत होती. एका क्षणी एका व्यक्तीने योहान 1:14,16 चे शब्द घेऊन प्रार्थना केलीं :

शब्द देही झाला व त्यानें आम्हांमध्ये वस्ती केलीं, आणि आम्हीं त्याचा गौरव पाहिला. तो पित्यापासून आलेल्या एकुलत्या एकाचा गौरव असावा असा अनुग्रह व सत्य ह्यांनी परिपूर्ण होता. त्याच्या पूर्णतेतून आपणा सर्वांना कृपेवर कृपा मिळाली आहे.

तो क्षण माझ्यासाठीं जणूकाही एपिफनी अर्थात देवाच्या प्रकटीकरणाचा क्षण होता.  देवानें त्या क्षणी – त्याच्या पूर्णतेतून  “पूर्णता” या शब्दाने पूर्णता वाहून न्यावी असे केले जे माझ्यावरील त्याच्या प्रभावासाठीं असामान्य गोष्ट होती. त्या शब्दाचा खरोखर जो अर्थ आहे त्याचा काही अंश मला जाणावला – ख्रिस्ताची पूर्णता.

मला त्यां शब्दांची काही चमत्कृति जाणवली, होय, मला खरोखर त्याच्या पूर्णतेतून कृपेवर कृपा मिळाली आहे. आणि त्या क्षणी मी कृपेवर कृपा प्राप्त करीत होतो. त्याचवेळी मला जाणवले कीं सर्व दुपार त्याच्या चरणावर बसून – किंवा माझे पवित्र शास्त्र वाचत राहण्यावाचून – दुसरी कुठलीच गोष्ट इतकीं मधूर नाही आणि मला त्याची परिपूर्णता ओसंडून वाहतांना जाणवली.

ह्या परिपूर्णतेचा मजवर इतका प्रभाव का पडला – आणि या क्षणापर्यंत तिचा मजवर असामान्य परिणाम का घडत आहे? त्याची कांही कारणें अशी कीं…

  • ज्याच्या परिपूर्णतेद्वारे मी कृपेने चिंब भिजत आहे तो आहे शब्द जो देवासोबत होता आणि तो शब्द देव होता (योहान 1:1-2), म्हणून त्याची परिपूर्णता देवाची परिपूर्णता आहे – दैवीय पूर्णता, अमर्याद पूर्णता;
  • हा शब्द देही झाला, आणि म्हणून आम्हांपैकीं एक होता, आणि त्याच्या परिपूर्णतेने आमचा पाठपुरावा करीत होता – ही पूर्णता सुगम आहे;
  • जेव्हां हा शब्द मानव रूपात प्रगट झाला, तेव्हां त्याचे गौरव दिसून आले – त्याची पूर्णता गौरवी आहे;
  • हा शब्द “पित्यापासून एकुलता एक पुत्र” होता (योहान 1:14) यासाठीं कीं दैवीय पूर्णता केवळ देवाकडूनच नव्हे, तर देवाद्वारे मजपर्यंत पोहोचविली जावी – देवानें त्याची पूर्णता पूरविण्यासाठीं देवदूतास पाठविले नाही तर त्याच्या एकुलत्या एका पुत्रास पाठविले;
  • पुत्राची पूर्णता कृपेची परिपूर्णता आहे – मी ह्या परिपूर्णतेत बुडणार नाही पण या परिपूर्णतेद्वारे सर्व प्रकारे आशीर्वादित  होणार आहे;
  • ही पूर्णता केवळ कृपेची परिपूर्णता नाही, तर सत्याची परिपूर्णता देखील आहे – सत्याकडे दुर्लक्ष करून खुशामत करण्यासाठीं मला ही कृपा देण्यात येत नाही; तर ही कृपा खडकासारख्या मजबूत वास्तविकतेत मुळावलेली आहे.

तर मग, ख्रिस्ताच्या परिपूर्णतेद्वारे मला आश्चर्य वाटेल आणि मी आनंदाने परिपूर्ण होईन यात काही आश्चर्य आहे का!

21 फरवरी : तुम में ऐसा नहीं है

Alethia4India
Alethia4India
21 फरवरी : तुम में ऐसा नहीं है
Loading
/

“यीशु ने उनको पास बुलाकर उनसे कहा, ‘तुम जानते हो कि जो अन्यजातियों के हाकिम समझे जाते हैं, वे उन पर प्रभुता करते हैं; और उनमें जो बड़े हैं, उन पर अधिकार जताते हैं। पर तुम में ऐसा नहीं है।’”  मरकुस 10:42-43

लगभग प्रत्येक पीढ़ी में पाया जाने वाला एक बड़ा झूठ यह है कि परमेश्वर के लोग अपने अविश्वासी पड़ोसियों तक सुसमाचार पहुँचाने में अधिक सफल तब होंगे, जब वे अधिक से अधिक उनके जैसे दिखेंगे, बोलेंगे, काम करेंगे और जीएँगे। न तो नया नियम इसका समर्थन करता है, और न ही कलीसिया का इतिहास। इसके विपरीत, इतिहास उस बात का समर्थन करता है जो बाइबल सिखाती है, अर्थात्, परमेश्वर के लोग सदैव किसी भिन्न संस्कृति में सबसे अधिक प्रभावी तब होते हैं, जब उनके जीवन और जीवनशैली दोनों स्पष्ट रूप से स्थानीय संस्कृति के विपरीत होते हैं (1 पतरस 2:11-12)।

यीशु के इन शब्दों से ठीक पहले याकूब और यूहन्ना, जो “गर्जन के पुत्र” कहलाते हैं, यीशु से एक सहायता माँगने के लिए गए। वे उसके राज्य में आदर के स्थान चाहते थे (मरकुस 10:35-45)। यद्यपि उस समय के रोमी शासकों के समान, जो अपने आप को दूसरों से अत्यधिक सक्षम दिखाना चाहते थे, उनकी यह इच्छा निष्ठा से नहीं, बल्कि अपरिपक्व महत्वाकांक्षा से उत्पन्न हुई थी।

यीशु अपने उत्तर में बहुत ही सीधे-सीधे बोला। उसकी भाषा कठोर थी। उसके चेले उसके अनुयायी थे और उन्हें दूसरों से अलग होना था। उन्हें यह समझने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर के राज्य में ऊपर जाने का मार्ग वास्तव में नीचे से होकर जाता है। आदर देने वालों को आदर मिलता है, आदर माँगने वालों को नहीं। महानता सेवा करने में दिखाई देती है, सेवा करवाने में नहीं। इस सिद्धान्त का सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं यीशु है, जिसने “जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:6-8)।

यह बात चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि हम एक ऐसी संस्कृति में रहते हैं, जो अपनी क्षमताओं में विश्वास करने में, अपने आप को अधिक मूल्यवान दिखाने में और अपने प्रयासों से सफल बनने में व्यस्त है। फिर भी, यदि हम यीशु के अनुयायी होने का दावा करते हैं, तो यहाँ कहे गए उसके शब्द हमें याद दिलाते हैं कि हममें हमारी प्रचलित संस्कृति के नहीं, बल्कि यीशु के गुण दिखने चाहिएँ।

हम महत्त्वपूर्ण माने जाने, बौद्धिक रूप से समझदार और सामाजिक रूप से स्वीकार्य माने जाने के बारे में अस्वस्थ रीति से व्यस्त हैं। सुसमाचार का कार्य करने के लिए यह कब एक प्रभावी रणनीति रही है? विकल्प स्पष्ट है, या तो हम वही करेंगे जो यीशु कहता है या हम वही करेंगे जो संस्कृति कहती है।

हमें न तो यीशु के शब्दों के प्रभाव को और न ही उसकी चुनौती के स्तर को कम करना चाहिए। परन्तु हमें निराश होने की भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम इस तथ्य से प्रोत्साहन प्राप्त कर सकते हैं कि यूहन्ना अन्ततः इसे उचित रीति से समझ गया था। अपने जीवन के अन्त के निकट उसने लिखा, “हम ने प्रेम इसी से जाना कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिए प्राण देना चाहिए” (1 यूहन्ना 3:16)। असुविधाजनक अनुग्रह के इस वचन को सुनें, “तुम में ऐसा नहीं है,” और सेवा तथा प्रेम में अपने अधिकारों और अपनी प्रतिष्ठा को त्यागने के लिए तैयार रहते हुए यीशु के स्वरूप के अनुरूप बनते जाएँ। फिलिप्पियों 2:1-11

21 फेब्रुवारी : आमचा सेवक, येशू

Alethia4India
Alethia4India
21 फेब्रुवारी : आमचा सेवक, येशू
Loading
/

“कारण मनुष्याचा पुत्रही सेवा करून घेण्यास नाही, तर सेवा करण्यास व पुष्कळांच्या मुक्तीसाठीं आपला जीव खंडणी म्हणून अर्पण करण्यास आला आहे” (मार्क 10:45).

केवळ पृथ्वीवर राहत असतांना तो आपल्या लोकांचा सेवक नव्हता, तर तो जेव्हां परत येईल तेव्हां देखील आमचा सेवक असेल. “आणि धनी आल्यावर जे दास जागृत असलेले त्याला आढळतील ते धन्य; मी तुम्हांला खचीत सांगतो कीं, तो आपली कंबर बांधून त्यांना जेवायला बसवील आणि येऊन त्यांची सेवा करील” (लूक 12:37). तो परत आल्यानंतर काय करील याचे चित्र म्हणून येशूनें हे दिले.

एवढेच नव्हे, तर तो आताहि आमचा सेवक आहे. “मी तुला सोडून जाणार नाही व तुला टाकणार नाही.” म्हणून आपण धैर्याने म्हणतो ‘प्रभू मला साहाय्य करणारा आहे, मी भिणार नाही; मनुष्य माझे काय करणार?’ (इब्री 13:5,6).

तो आपल्या लोकांचा सेवक  होता आणि आहे आणि सदैव असेल असे म्हणणे हे पुनरूत्थित ख्रिस्ताचे महत्व कमी करते का? जर “सेवक” याचा अर्थ “आदेशाचे पालन करणारा” असा असेल किंवा आपण त्याचे मालक आहोत असा जर आपण विचार केला तर. होय, त्याद्वारे त्याचा अपमान होईल. पण आम्हीं दुर्बल आहोत आणि त्याच्या मदतीची आम्हांला गरज आहे असे म्हटल्याने त्याचा अनादर होत नाही.

असे म्हटल्याने कीं केवळ तोच आहे जो आम्हास ज्याची सर्वात जास्त गरज आहे ते पुरवू शकतो, त्याचा अनादर होत नाही.

असे म्हटल्याने त्याचा अनादर होत नाही कीं तो प्रीतीचा अनंत झरा आहे, आणि तो आपली जितकीं जास्त मदत करतो आणि जितके जास्त आपण त्याच्या सेवेवर अवलंबून राहतो, तितकी अद्भुत त्याची साधनसामुग्री दिसते. म्हणून, आपण पूर्ण विश्वासाने म्हणू शकतो, “येशू ख्रिस्त सेवा करावयास जिवंत आहे.” 

तो तारण करावयास जिवंत आहे. तो देण्यासाठीं जिवंत आहे. आणि आपल्या ह्या भूमिकेवर तो रोमांचित होतो. तो तुमच्या काळजीच्या ओझ्याने दबलेला नाही. तो ओझे वाहण्याद्वारे उंचावला, ओझे देण्याद्वारे नाही. “आशा धरून राहणाऱ्यांचे इष्ट काम” करणे त्याला आवडते (यशया 64:4). तो “जे त्याच्या दयेची प्रतीक्षा करतात त्यांच्यावर संतुष्ट होतो” (स्तोत्र 147:11). त्याचे “नेत्र अखिल पृथ्वीचे निरीक्षण करीत असतात, जे कोणी सात्त्विक चित्ताने त्याच्याशी वागतात“ (2 इतिहास 16:9). येशू ख्रिस्त त्याच्यावर विश्वास ठेवणाऱ्या सर्वांप्रीत्यर्थ सर्वसमर्थ सेवेने ओसंडत असतो.

20 फरवरी : चिन्ता का उपाय

Alethia4India
Alethia4India
20 फरवरी : चिन्ता का उपाय
Loading
/

“किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्‍वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्‍वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।”  फिलिप्पियों 4:6-7

यदि मैं आपसे कहूँ कि इस सप्ताह में या आज के दिन में ही आप जिन बातों को लेकर चिन्तित हैं उन्हें लिखें, तो मुझे लगता है कि आपकी यह सूची बहुत लम्बी होगी। मैं जानता हूँ कि मेरी सूची तो अवश्य ही लम्बी होगी। और फिर भी परमेश्वर का वचन हमसे कहता है, “किसी भी बात  की चिन्ता मत करो।” तो फिर, जब हम अपने आप को चिन्ता से जूझते हुए पाते हैं, तो हमें किस प्रकार प्रत्युत्तर देना चाहिए?

पौलुस कहता है कि घुटन भरी चिन्ता का उपाय है प्रार्थना करना और धन्यवाद देना। यह प्रत्युत्तर स्वाभाविक नहीं होता। वास्तव में, यह सीधे-सीधे हमारे पापी हृदयों की प्रवृत्ति के विरुद्ध होता है। हममें से अधिकांश लोगों को चिन्ता उत्पन्न करने वाली बातें प्रार्थना में परमेश्वर के सामने लाने के विपरीत एक कोने में जाकर कुड़कुड़ाना या उन्हें अपने नियन्त्रण में लाने के प्रयास में चिन्ताजनक परिस्थितियों के बारे में सोचते रहना अधिक सरल लगता है। अपने घुटनों पर आकर परमेश्वर को पुकारने के विपरीत, चिन्ता की स्थिति में बने रहकर चिन्ता को हम पर हावी होने देना जितना सरल है, उतना ही निरर्थक भी है।

प्रार्थना हमारे ध्यान को हम पर से हटाकर परमेश्वर के प्रावधान पर लगाने के द्वारा इस प्रश्न को निगल जाती है, “मैं इसका सामना कैसे करूँगा?” प्रार्थना हमारा ध्यान परमेश्वर की ओर मोड़ देती है, जो पूरी तरह से सक्षम है, जो हमारी आवश्यकताओं को अच्छी तरह से जानता है, और जो हमें या तो वह दे देगा जो हम माँगते हैं या उससे भी कहीं अधिक अच्छा देगा, जिसकी हम कल्पना भी न कर सकते। और एक धन्यवादी हृदय हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को स्मरण कराने में सहायता करने के द्वारा बिना किसी कड़वाहट के इस प्रश्न का सामना करने में सहायता करता है, “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” वह सदैव एक उद्देश्य के साथ काम करता है, अपनी योजना को पूरा करता है, और पूरी तरह से जानता है कि वह क्या कर रहा है। हममें से कुछ के माता-पिता ऐसे थे जो हमारे घर पर रहने के समय हमारे लिए अलार्म घड़ी का काम करते थे। जब हमें सवेरे किसी निश्चित समय पर जागना आवश्यक होता था, तो हमें अपनी माता या अपने पिता को केवल यह बताना होता था और हमें पूरा भरोसा होता था कि वे हमें जगा देंगे। और फिर, हमें सोने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना होता था! चिन्ता से सामना होने पर पौलुस हमसे इसी तरह का प्रत्युत्तर चाहता है। हमें सीधे अपने स्वर्गिक पिता के पास जाना है और कहना है, “क्या आप मेरे लिए इस स्थिति को सम्भाल लेंगे?” और परमेश्वर सदा यही उत्तर देता है कि मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।

जब हम समझ जाते हैं कि परमेश्वर सभी बातों पर नियन्त्रण रखता है, तो हम अपने सभी संघर्षों और चुनौतियों को उसके पास ले जाएँगे। वह जो शान्ति प्रदान करता है, वह हमारे हृदयों के लिए एक दृढ़ गढ़ ठहरेगी।

यद्यपि परेशानियाँ आती हैं और संकट डराते हैं,

यद्यपि घनिष्ठ मित्र हमें निराश कर देते हैं

और शत्रु सभी एक हो जाते हैं, फिर भी एक बात है,

जो हमें सुरक्षित रखती है, चाहे कुछ भी हो,

वह प्रतिज्ञा हमें आश्वस्त करती है कि “प्रभु प्रावधान करेगा।” [1]

तो क्यों न उन बातों की सूची बनाएँ, जिन्हें लेकर आप इस सप्ताह चिन्तित रहे हैं? फिर उनके बारे में प्रार्थना करें, उन परिस्थितियों को स्वर्ग के सिंहासन के सामने ले जाएँ और उन्हें वहीं छोड़ दें। और फिर उसमें लिखी प्रत्येक बात के आगे आप वह लिख सकते हैं, जो परमेश्वर आपसे कहता है, अर्थात् मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।

 1 पतरस 5:6-11