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16 फेब्रुवारी : जेव्हां आज्ञापालन अशक्य जाणवते

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16 फेब्रुवारी : जेव्हां आज्ञापालन अशक्य जाणवते
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अब्राहामाने आपली परीक्षा होत असता विश्वासाने इसहाकाचे अर्पण केले. (इब्री 11:17)

सध्या तुमच्यापैकीं बऱ्याच जणांसाठीं – आणि तुमच्यापैकीं जें इतर कांही आहेंत त्यांच्यासाठींहि ती वेळ येत आहे – आज्ञापालन हे स्वप्न भंग झाल्यासारखे जाणवते. तुम्हाला असे वाटते कीं देवाचे वचन किंवा देवाचा आत्मा तुम्हाला जे करण्यास पाचारण करित आहे ते तुम्हीं केले तर ती गोष्ट तुम्हाला दळभद्र परिस्थितींत आणून ठेवील आणि देव हे सर्व तुम्हांसाठीं कल्याणकारक असे बनवेल  असा कोणताही मार्ग दिसत नाही.

कदाचित तुम्हीं नुकताच देवाकडून आज्ञा किंवा हाक ऐकलेली असूं शकते ती अशी कीं तुम्हीं वैवाहिक स्थितींत राहावे किंवा अविवाहित स्थितींत राहावे, जी नोकरी करित आहां तींत टिकून राहावे, किंवा ती नोकरी सोडावी, बाप्तिस्मा घ्यावा, जिथें तुम्हीं काम करता तिथें ख्रिस्ताची साक्ष द्या, प्रामाणिकपणाच्या मानकांशी तडजोड करण्यास नकार द्या, पाप करित असलेल्या व्यक्तीला त्याचा दोष दाखवा, नवीन व्यवसाय सुरू करा, सुवार्तिक बना. आणि ज्यां क्षणी तुम्हीं तुमच्या संकुचित अंत:करणांत पाहता, तेव्हां  ते साध्य करण्याची शक्यता भयंकर आहे – म्हणजे एकुलता एक पुत्र असा जो इसहाक वारस होऊ शकतो त्याला गमावल्यासारखे हे आहे.

तुम्हीं प्रत्येक मानवी शक्यता लक्ष्यांत घेऊन त्यावर विचार केला आहे, आणि ते कल्याणकारक ठरेल हें अगदी अशक्य दिसतयं.

अब्राहामसाठीं ती जाणीव किंवा भावना कशी होती हें आता तुम्हीं समजू शकता. तो घटनाक्रम तुम्हीं बायबलमध्ये वाचूं शकता.

तुम्हीं इतर सर्व गोष्टींपेक्षा देवाची आणि त्याच्या मार्गाची आणि त्याच्या वचनांची अधिक उत्कंठा धरता का, आणि तुमचा विश्वास आहे का कीं तो आपणाला तुमचा देव म्हणवून घेण्यास कोणतीही लाज न बाळगता तुमच्या विश्वासाचा आणि आज्ञापालनाचा आदर करू शकतो आणि करील, आणि तुमच्या आज्ञाधारकतेच्या मार्गाला जीवन आणि आनंदाचा मार्ग असा प्रकट करण्यासाठीं आपले सर्व शहाणपण आणि सामर्थ्य आणि प्रीती यांचा उपयोग करील?

आज  तुम्हीं ज्या संकटाला सामोरे जात आहांत हे तेच आहे: तुम्हीं त्याची उत्कंठा धरता का? तुम्हीं त्याच्यावर भरवसा ठेवाल का? तुमच्यासाठीं देवाचे वचन हें: देव करूं शकतो व देव समर्थ आहे.

15 फरवरी : प्रायश्चित्त का दिन

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15 फरवरी : प्रायश्चित्त का दिन
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“क्योंकि शरीर का प्राण लहू में रहता है; और उसको मैंने तुम लोगों को वेदी पर चढ़ाने के लिए दिया है कि तुम्हारे प्राणों के लिए प्रायश्चित्त किया जाए; क्योंकि प्राण के कारण लहू ही से प्रायश्चित्त होता है।”  लैव्यव्यवस्था 17:11

जब परमेश्वर ने इस्राएलियों को मिस्र से छुड़ाया, तो उनके छुटकारे ने परमेश्वर के साथ उनका एक सम्बन्ध स्थापित कर दिया। परमेश्वर की प्रभुता के अधीन रहते हुए लोगों ने मिलाप वाले तम्बू के माध्यम से उसकी उपस्थिति का आनन्द उठाया। परन्तु प्रारम्भ से ही इस्राएली लोग परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं कर सके थे। इससे एक दुविधा उत्पन्न हुई कि एक पवित्र परमेश्वर पापी मनुष्यों के साथ कैसे वास कर सकता था?

प्रत्येक वर्ष एक विशिष्ट दिन, जिसे प्रायश्चित्त का दिन कहा जाता था, इस्राएल के महायाजक को परमेश्वर द्वारा परम पवित्र स्थान में प्रवेश करने का निर्देश दिया गया था, अर्थात् मिलाप वाले तम्बू में वह स्थान जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति वास करती थी कि वह लोगों के पापों के लिए बलिदान चढ़ाए। महायाजक दो निष्कलंक बकरे लेता था। पहले बकरे को वह लोगों के लिए पापबलि के रूप में बलिदान करता था और फिर उसके लहू को प्रायश्चित्त के ढक्कन पर छिड़कता था, जिसे ‘दया आसन’ के नाम से भी जाना जाता है। इस्राएली अपने पाप के कारण मृत्यु के पात्र थे, किन्तु परमेश्वर ने अपने अनुग्रह में होकर उनके स्थान पर मरने के लिए एक विकल्प के रूप में यह बकरा रखा था। लोग अब जीवित रह सकते थे, क्योंकि वह पशु मारा गया था। और दूसरे बकरे के साथ जो होता था, उसमें इस प्रायश्चित्त का परिणाम देखा जा सकता था। याजक उसके सिर पर हाथ रखता, लोगों के पापों को उस पर लाद देता और फिर उसे मरुभूमि में दूर कहीं छोड़ आता। तब महायाजक लोगों के सामने आकर यह कह सकता था कि तुम्हारे पापों का प्रायश्चित्त हो चुका है। लहू बहाया गया है, और लहू के बहाए जाने से पापों की क्षमा होती है। दूसरे बकरे को मैं मरुभूमि में दूर छोड़ आया हूँ और उसी तरह तुम्हें भी अपने पापों के बारे में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है और न ही उन्हें अपनी पीठ पर बोझ की तरह ढोना है।  एक बहुत ही विशिष्ट तरीके से परमेश्वर इस महत्त्वपूर्ण सत्य को स्थापित कर रहा था कि वह पापी लोगों को अपनी उपस्थिति में लाने के लिए जो भी आवश्यक है, वह करने को तैयार है।  चूंकि उसके लोग उद्दण्ड थे (और आज भी हैं!), इसलिए उसे ही उनके पापों के लिए एक बलिदान प्रदान करना पड़ा, जिससे वे उसके द्वारा पूरे किए गए कार्य के आधार पर उसके पास आ सकें। और वह प्रत्येक बलिदान अपने आप से परे उस सिद्ध बलिदान की ओर इशारा करता था, जिसे मसीह क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा एक बार और सदा के लिए पाप के समाधान के रूप में चढ़ाने वाला था। परिणामस्वरूप हम परमेश्वर के समक्ष हियाव से आने का आनन्द उठा सकते हैं। परन्तु यह हियाव हमारे अपने कारण नहीं है; बल्कि “हमें यीशु के लहू के द्वारा उस नए और जीवते मार्ग से पवित्रस्थान में प्रवेश करने का हियाव हो गया है, जो उसने परदे अर्थात् अपने शरीर में से होकर हमारे लिए अभिषेक किया है” (इब्रानियों 10:19-20)।

जब भी आपको दुविधा और सन्देह हो, या अपने स्वयं के कार्यों को आश्वासन के आधार के रूप में देखने का प्रलोभन हो, तब उन दो बकरों को स्मरण करें, जो आपको क्रूस पर किए गए यीशु के कार्य की ओर दिखाते हैं। आपके पाप का दाम चुका दिया गया है और आपके पाप को हटा दिया गया है। आपका कोई भी कार्य हमारे पवित्र परमेश्वर के सामने आपकी अवस्था में न तो कुछ बढ़ाता है और न ही घटाता है। यह है वह स्थान, जहाँ पर आपको अपने लिए हियाव मिलता है:

एक ऐसे जीवन पर जो मैंने नहीं जिया,

एक ऐसी मृत्यु पर जो मुझे नहीं मिली,

दूसरे के जीवन पर, दूसरे की मृत्यु पर,

मैं अपना पूरा अनन्त काल दाव पर लगाता हूँ।
इब्रानियों 10:11-25

15 फेब्रुवारी : कॅलवरीकडे जाणारे प्रत्येक पाऊल केवळ प्रीती होती

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15 फेब्रुवारी : कॅलवरीकडे जाणारे प्रत्येक पाऊल केवळ प्रीती होती
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ख्रिस्तानें आपल्याकरता स्वतःचा प्राण अर्पण केला ह्यावरून आपल्याला देवाच्या प्रीतीची जाणीव झाली आहे. (1 योहान 3:16)

ख्रिस्त आम्हांसाठीं मेला यांत त्याचे दु:ख जितके हेतुपुरस्सर होते तितकींच आपल्यावरील त्याची प्रीती देखील जाणीवपूर्वक होती. आपलें जीवन देण्यामागे जर तो हेतुपुरस्सर होता तर ते बलिदान आम्हांसाठीं होते. ते त्याचे प्रेम होते.

“येशूनें आता ह्या जगातून पित्याकडे जाण्याची आपली वेळ आली आहे हे जाणून ह्या जगातील स्वकींयांवर त्याचे जे प्रेम होते ते त्यानें शेवटपर्यंत केले” (योहान 13:1).

कॅलवरीकडे जाणाऱ्या मार्गावरील त्याच्या प्रत्येक पावलाचा अर्थ हांच कीं “मीं तुझ्यावर प्रीती केलीं आहे.”

म्हणून, त्यानें आम्हांसाठीं स्वतःचे जीवन दिले यांत ख्रिस्ताची प्रीती अनुभवण्यासाठीं, त्याचे तें मरण कसें पूर्णपणे हेतुपुरस्सर होते हे समजणे सहज जातें.

जेव्हां पेत्राने आपली तलवार उपसली व प्रमुख याजकाच्या दासावर प्रहार करून त्याचे डोके उडविण्याचा प्रयत्न केला, मात्र केवळ  त्याचा कान छाटू शकला, तेव्हां त्या हिंसक प्रसंगानंतर येशूनें काय म्हटलें ते पहा.

तेव्हां येशू त्याला म्हणाला, “तुझी तलवार परत जागच्या जागी घाल, कारण तलवार धरणारे सर्व जण तलवारीने नाश पावतील. तुला असे वाटते काय कीं, मला माझ्या पित्याजवळ मागता येत नाही, आणि आताच्या आता तो मला देवदूतांच्या बारा सैन्यांपेक्षा अधिक पाठवून देणार नाही? पण असे झालें तर ह्याप्रमाणे घडले पाहिजे, हे म्हणणारे शास्त्रलेख कसे पूर्ण व्हावेत?” (मत्तय 26:52 54)

हे सांगणे एक गोष्ट आहे कीं जुन्या करारात येशूच्या मृत्यूची तपशीलवार भविष्यवाणी केलीं गेलीं होती, असें म्हणणे एक गोष्ट आहे. पण तें सर्व शास्त्रलेख पूर्ण व्हावेत ह्याची खात्री करून घेण्यासाठीं येशू स्वतः ते सर्व निर्णय अगदी अचूकपणे घेत होता असे म्हणणे पूर्णपणे वेगळी गोष्ट आहे.

मत्तय 26:54 मध्ये येशू आम्हांला तेच करित असल्याचे सांगत आहे. “मी हे संकट टाळू शकतो. पण असे झालें तर ह्याप्रमाणे घडले पाहिजे, हे म्हणणारे शास्त्रलेख कसे पूर्ण व्हावेत?” दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, स्वतःची सुटका करून घेण्यासाठीं मी जे पाऊल उचलू शकलों असतो ते मी उचलत नाहीये, कारण मला शास्त्रलेख ठाऊक आहेत. माझ्या लोकांचे तारण होण्यासाठींजें जें होणे अवश्य आहे हे मला ठाऊक आहे. देवाच्या वचनात माझ्याबद्दल जे भाकींत केले आहे ते सर्व पूर्ण करणे हा माझा निर्णय आहे. स्वकींयांवर मोठी प्रीती करणे— त्यां मार्गावरील प्रत्येक पाऊल उचलणें—  हा माझा निर्णय आहे. आणि त्यांनी ही प्रीती अनुभवाने जाणून घ्यावीं अशी माझी इच्छा आहे. आणि त्यांनी पूर्णपणे सुरक्षित व स्वतंत्र, वा तसेंच ह्या जगापासून पूर्णपणे वेगळे केलेलें असें लोग व्हावें.

14 फरवरी : मसीह का एक चेला

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14 फरवरी : मसीह का एक चेला
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“दमिश्क में हनन्याह नामक एक चेला था, उससे प्रभु ने दर्शन में कहा, ‘हे हनन्याह!’ उसने कहा, ‘हाँ, प्रभु।’”  प्रेरितों के काम 9:10

आप प्रतिदिन अपने यश को आकार दे रहे हैं। और एक मसीही व्यक्ति के रूप में आप प्रतिदिन मसीह के यश को भी आकार दे रहे हैं। जब हम उसके चेलों के रूप में इधर-उधर चलते-फिरते हैं, तब हमारा जीवन मसीह के बारे में क्या कह रहा होता है?

सम्भवतः हनन्याह बाइबल का एक कम जाना-पहचाना पात्र हो, किन्तु पौलुस के जीवन पर और इस कारण कलीसिया के पूरे इतिहास पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। यह मसीह के एक चेले के रूप में उसकी दैनिक समर्पित विश्वासयोग्यता का परिणाम था। जबकि हम परमेश्वर के राज्य में उपयोग किए जाने का यत्न कर रहे हैं, तो उसकी शिष्यता के तीन ऐसे गुण हैं जो हमारे अपने चरित्र और मसीह के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को आकार देने में सहायता कर सकते हैं।

सबसे पहला, जैसा कि पवित्र बाइबल में कहा गया है कि हनन्याह “एक विशेष  चेला था” (तिरछे अक्षर में लिखा गया शब्द जोड़ा गया है)। वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसे विशेष रूप से चुना गया था। पौलुस (तब शाऊल के नाम से जाना जाता था) को दमिश्क में लाने या हनन्याह को बुलाने से भी पहले, परमेश्वर ने यरूशलेम में पिन्तेकुस्त के दिन के बाद कलीसिया के बढ़ने को सम्प्रभुता में होकर व्यवस्थित किया, ताकि कलीसिया कम से कम 200 मील उत्तर में दमिश्क तक पहुँच सके जहाँ हनन्याह सहित विश्वासियों का एक समूह स्थापित किया गया। फिर इस समूह में से परमेश्वर ने विशेष रूप से हनन्याह को चुना कि वह पौलुस का मन-परिवर्तन हो जाने के बाद उसके पास जाए। परमेश्वर की सम्प्रभुता के ऐसे प्रगाढ़ प्रदर्शन से हमें यह भरोसा करने के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलना चाहिए कि शायद परमेश्वर अपनी इच्छा को पूरा करने के उद्देश्य से हमें तैयार करने और उपयोग करने के लिए ऐसे तरीकों से काम कर रहा हो जो अभी तक दिखाई न दिए हों।

दूसरा, हनन्याह एक साहसिक  चेला था। उसने अपना परिचय प्रभु के अनुयायी के रूप में दिया, अर्थात् दमिश्क के उसी समूह का होने के रूप में जिसे पौलुस अपने मन-परिवर्तन से पहले घात करने जा रहा था (प्रेरितों 9:1)। हनन्याह की निष्ठा किसी स्थानीय कलीसिया, किसी एक पंथ या किसी एक धार्मिक दृष्टिकोण के प्रति नहीं थी, बल्कि प्रभु यीशु मसीह के प्रति थी। इसी प्रकार यदि यीशु ने हमारे जीवन को थाम लिया है और हमें बदल दिया है, तो हमें भी इस जीवन को बदल देने वाले तथ्य को अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। जैसे हम मसीह के उद्धार को प्राप्त करने पर पाप को न कहते हैं, वैसे ही हमें अपने विश्वास के बारे में गोपनीयता को भी न कहना है। या तो हमारी शिष्यता हमारी गोपनीयता को नष्ट कर देगी, या फिर हमारी गोपनीयता हमारी शिष्यता का अन्त कर देगी।

अन्त में, हनन्याह एक समर्पित  चेला था। आगे चलकर पौलुस हनन्याह के बारे में इस प्रकार से स्मरण करता है कि वह दमिश्क में रहने वाला एक ऐसा व्यक्ति था जो “व्यवस्था के अनुसार एक भक्त मनुष्य, जो वहाँ रहने वाले सब यहूदियों में सुनाम था” (प्रेरितों 22:12)। ऐसा यश पाँच मिनट या पाँच दिन में नहीं मिलता, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ावों में से होकर जाते हुए धीरे-धीरे मिलता है। हनन्याह ने अपना पूरा जीवन परमेश्वर और उसके वचन का पालन करने के लिए समर्पित करने के द्वारा ही ऐसा यश उन्नत किया था। उसने अपने इस समर्पण को निश्चित रूप से अपने दैनिक व्यवहार और दूसरों के साथ बातचीत के माध्यम से प्रदर्शित किया होगा।

हनन्याह का जीवन हमें साधारण दिनों में छोटे-छोटे तरीकों से विश्वासयोग्य बने रहने की चुनौती देता है। सम्भव है कि एक दिन हमें प्रभु के लिए कुछ असाधारण करने के लिए बुलाया जाए, किन्तु हमें उसके लिए पूरे मन से जीने के लिए उस समय के आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। चेले यही काम करते हैं कि साहसपूर्वक, समर्पित रूप से और दीनता के साथ वे परमेश्वर के पीछे चलते हैं और उस पर पूरी तरह से भरोसा करते हैं। चाहे आप पढ़ाई कर रहे हों, बच्चों की परवरिश कर रहे हों, अपना व्यावसायिक जीवन बनाने में लगे हों, या फिर अपना जीवन सेवानिवृत्ति और बुढ़ापे में क्यों न बिता रहे हों, परमेश्वर की महिमा के लिए यह सब विश्वासयोग्यता के साथ करने का प्रयास करें। अपना लक्ष्य बनाएँ कि आप हनन्याह के समान, अर्थात् यीशु मसीह के एक चेले के रूप में ही जाने जाएँगे।      

प्रेरितों के काम 9:1-19

14 फेब्रुवारी : ख्रिस्त हांच माध्यम व शेवट

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14 फेब्रुवारी : ख्रिस्त हांच माध्यम व शेवट
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मी ख्रिस्ताबरोबर वधस्तंभावर खिळलेला आहे; आणि ह्यापुढे मी जगतो असे नाही, तर ख्रिस्त माझ्या ठायी जगतो; आणि आता देहामध्ये जे माझे जीवित आहे ते देवाच्या पुत्रावरील विश्वासाच्या योगाने आहे; त्यानें माझ्यावर प्रीती केलीं व स्वत:ला माझ्याकरता दिले. (गलती 2:20)

देवानें हें विश्व का निर्माण केले? आणि ज्यां पद्धतीने तो त्यांवर सत्ता चालवित आहे ती त्यां पद्धतीने का? देव काय साध्य करित आहे? येशू ख्रिस्त हांच हे साध्य करण्याचे माध्यम किंवा हे साध्य करण्यामागे मुख्य शेवट आहे का?

येशू ख्रिस्त हा देवाच्या गौरवाचे तेज व त्याच्या तत्त्वाचे प्रतिरूप आहे. तो मानवरूपात असलेला देव आहे. यां दृष्टिने, तो माध्यम नसून शेवट आहे.

देवाच्या गौरवाचे प्रकटीकरण हेंच विश्वाच्या अस्तित्वाचा खरा अर्थ देतो. देव हेच साध्य करत आहे. आकाशें आणि जगाचा इतिहास, “देवाचा महिमा वर्णितांत.”

पण येशू ख्रिस्ताला ह्या जगांत असे काहीतरी पूर्ण करण्यासाठीं पाठवण्यात आले होते जें करणें अगत्याचे होते. तो पापाचा प्रश्न सोडविण्यासाठीं आला. तो पापी लोकांना त्यांच्या पापांमुळें त्यांच्यावर येणाऱ्या विनाशापासून वाचवण्यासाठीं आला. हे सोडविलेलें लोक देवाचा महिमा पाहतील आणि त्याची चव घेतील आणि सार्वकाळासाठीं आनंद करित त्याचा महिमा दर्शवतील.

इतर लोक देवाच्या महिमेचा तिरस्कार करित दुष्कर्माचा ढीग लावतील. अशाप्रकारे, देवाला आपल्या प्रजेच्या आनंदासाठीं आपल्या महिमेचे प्रकटीकरण करून जें साध्य करावयाचे होते, येशू ख्रिस्त हा त्याचे माध्यम आहे. ख्रिस्तानें तारणासाठीं जे कार्य केलें त्यां वाचून कोणीहि मनुष्य देवाचा महिमा पाहूं शकला नसता किंवा त्याची चव घेऊं शकला नसता. ह्या विश्वाच्या अस्तित्वाचा हेतूच रद्द होईल. तर मग, ख्रिस्त माध्यम आहे.

परंतु जें त्यानें वधस्तंभावर साध्य केलें, कारण तो पापी लोकांसाठीं मरण पावला, ख्रिस्तानें पित्याचे प्रेम व त्याचे नितीमत्व यांचे सर्वश्रेष्ठत्व प्रकट केलें. हा देवाच्या महिमेच्या प्रकटीकरणाचा शिखर होता – त्याच्या कृपेचा गौरव.

म्हणून, देवाच्या उद्देशाचे माध्यम म्हणून जेव्हां त्याच्या परिपूर्ण कृतीचा क्षण आला, अगदी त्यां क्षणी येशू त्या उद्देशाचा शेवट असा बनला. तो पापी लोकांसाठीं त्यांचा स्थानापन्न म्हणून मरण पावलं व त्यांना जीवन देण्यासाठीं मेलेल्यांतून पुन्हा उठला, त्यांत तो देवाच्या गौरवाचा केंद्रस्थान व सर्वोच्च प्रकटीकरण असा सिद्ध झाला.

म्हणून वधस्तंभावर खिळलेला ख्रिस्त हा विश्वासाठीं देवाच्या उद्देशाचे माध्यम आणि शेवट असा दोन्ही आहे. त्याच्या ह्या कार्याशिवाय, तो शेवट — म्हणजे देवाच्या प्रजेच्या आनंदासाठीं देवाच्या गौरवाची पूर्णता प्रकट करणें — साध्य झाला नसता.

आणि ज्यां कार्याचा माध्यम बनला, त्यां कार्याचा शेवटहि तोच बनला – म्हणजे तो आपल्यासाठीं शाप बनला तेव्हां त्यानें देवाविषयी जे प्रकट केले त्याचा आपण अनंतकाळासाठीं अधिकाधिक आनंद घेऊं तेव्हां तोंच सदासर्वकाळासाठीं आपल्या उपासनेचा केंद्रबिंदू असेल.

हे विश्व ज्यां उद्देश्याने निर्माण केले गेले, येशू हा त्याचा शेवट आहे, आणि नीतिमान ठरविलेले लोग ज्याचा आनंद घेऊं शकतांत तो शेवट साध्य करणारा माध्यमहि तोंच आहे.

13 फरवरी : परम वास्तविकता

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13 फरवरी : परम वास्तविकता
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“परमेश्‍वर जो आकाश का सृजने और तानने वाला है, जो उपज सहित पृथ्वी का फैलाने वाला और उस पर के लोगों को साँस और उस पर के चलने वालों को आत्मा देने वाला यहोवा है, वह यों कहता है : ‘मुझ यहोवा ने तुझको धर्म से बुला लिया है, मैं तेरा हाथ थामकर तेरी रक्षा करूँगा।’”  यशायाह 42:5-6

1932 में ऐल्बर्ट आयनस्टाइन ने कहा था, “इस धरती पर हमारी परिस्थिति अजीब लगती है। हम में से हर कोई यहाँ अनजाने में और बिना बुलाए थोड़े समय के लिए आता है, बिना यह जाने कि ऐसा क्यों और किस उद्देश्य से होता है।”[1] निस्सन्देह आप यह बात आमतौर पर ही सुनते रहते होंगे कि हम संयोग से भरे संसार में जी रहे हैं, जहाँ इतिहास केवल अपने को दोहराता रहता है और ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में कोई व्यापक उद्देश्य नहीं है। यदि यह सच बात है, तो जीवन में अभिप्राय पाना कठिन है। फिर तो हमें जीने और मर जाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करना है।

वास्तविकता के इस दृष्टिकोण से उत्पन्न उद्देश्य की अनुपस्थिति में होकर परमेश्वर बात करता है। वह उस परम वास्तविकता की उद्‌घोषणा करता है, जो सब कुछ बदल देती है। वह अपने बारे में बतलाता है। परमेश्वर अपना परिचय देता है, अपनी पहचान प्रकट करता है। “मैं यहोवा हूँ।” यहाँ परमेश्वर का नाम (“यहोवा”) केवल वह नाम नहीं है, जिससे हम उसे पुकारते हैं; अपितु यह उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है। बाइबल में परमेश्वर के कई नाम इस बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं कि वह कौन है, जैसे कि अनन्तकालीन, आत्म-निर्भर, सम्प्रभु . . . और भी बहुत कुछ!

बोलते समय परमेश्वर अपनी सामर्थ्य भी प्रकट करता है। आकाश उसकी रचना है और वही है जिसने पृथ्वी को बनाया और उस पर के लोगों को आकार और जीवन दिया है। सृष्टि की स्थिरता और उत्पादकता उसी सृष्टिकर्ता में निहित है। हम अपने आप से घटित होने वाले किसी क्रम-विकास की लहर के उत्पाद नहीं हैं, बल्कि एक रचयिता के प्रत्यक्ष कार्य के फल हैं। परमेश्वर से हटकर हम अपने अस्तित्व को नहीं समझ सकते। न ही हमें कभी ऐसा करना था।

परमेश्वर ने जो कुछ भी रचा है, उसके पीछे उसका उद्देश्य क्या है? उद्धार के द्वारा पृथ्वी पर धार्मिकता स्थापित करना। “मुझ यहोवा ने तुझ को धर्म से बुला लिया है, मैं तेरा हाथ थामकर तेरी रक्षा करूँगा; मैं तुझे प्रजा के लिए वाचा और जातियों के लिए प्रकाश ठहराऊँगा।” वह यहाँ हमसे नहीं परन्तु अपने पुत्र, अर्थात् उस सेवक से बात कर रहा है, जिसका परिचय यशायाह ने दिया है। जब कभी हमें परामर्श की आवश्यकता होती है, मित्रता की आवश्यकता होती है, क्षमा की आवश्यकता होती है, उद्धार की आवश्यकता होती है, तो ऐसे सभी अवसरों के लिए परमेश्वर ने कहा है, “मेरे दास को देखो जिसे मैं सम्भाले हूँ” (यशायाह 42:1)।

हम जीवन में कभी भी उतने सन्तुष्ट नहीं होंगे जितना कि तब होंगे, जब हम मसीह में अपनी परम वास्तविकता को खोज लेंगे। उस वास्तविकता के धाराप्रवाह में हमें हमारा उद्देश्य मिल जाता है, अर्थात् “परमेश्वर की महिमा करना, और उसमें अपने परम आनन्द को समर्पित करना।”[2] यदि आप जीवन में उद्देश्य को जानना चाहते हैं और परिपूर्णता प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको केवल परमेश्वर की महिमा करते हुए प्रभु के दास को ग्रहण करना है और उसमें आनन्दित होना है, जैसा कि शमौन ने किया था जब उसने इस प्रकार कहा था, “मेरी आँखों ने तेरे उद्धार को देख लिया है, जिसे तू ने सब देशों के लोगों के सामने तैयार किया है कि वह अन्यजातियों को प्रकाश देने के लिए ज्योति और तेरे निज लोग इस्राएल की महिमा हो” (लूका 2:30-32)।  यशायाह 42:1-13

13 फेब्रुवारी : परिपूर्ण असें नगर

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13 फेब्रुवारी : परिपूर्ण असें नगर
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त्यानें त्यांच्यासाठीं नगर तयार केलें आहे. (इब्री 11:16)

तिथें कोणतेहि प्रदूषण नाहीं, किंवा भित्तिचित्र नाहीं, वा कचरा नाहीं, रंगाचे पापुद्रे काढणें नाहीं किंवा निकामी वस्तूंची खोली नाहीं, वाळलेलें गवत किंवा तुटलेल्या बाटल्या नाहींत, चवाठ्यांवर तापलेल्या चर्चा नाहींत, सर्वांसमक्ष तोंडावर फटकारणें नाहीं, घरगुती भांडणे किंवा हिंसा नाहीं, रात्र-प्रहरी धोके नाहीं, जाळपोळ नाहीं किंवा खोटे बोलणे किंवा चोरी करणे किंवा जीवें मारणे नाहीं, वा तोडफोड नाहीं आणि कुरूपता तर नाहींच. 

देवाचे हें नगर परिपूर्ण असें असेल, कारण देव स्वतः तिथें आपली वस्ती करील. तो त्यां नगरांत वावरील, संभाषण करील आणि त्याचा प्रत्येक कानाकोपरा स्वतःच्या उपस्थितीने भरून टाकील. जे काही चांगले व मनोरम व पवित्र व अनुकूल व सत्य व हर्षाने भरलेले आहे ते सर्व तिथें असेल, कारण देव स्वतः तिथें आपली वस्ती करील.

तिथें परिपूर्ण न्याय केला जाईल आणि ज्यांनी या जगात ख्रिस्ताची आज्ञापालन करून जें जें दु:ख भोगले त्यां प्रत्येक दु:खाचे हजारपट प्रतिफळ दिलें जाईल. आणि ते कधीहि क्षय पावणार नाहीं. किंबहुना, अनंतकाळ जसजसा वाढत जाणाऱ्या आनंदासह सार्वकालिकतेंत विस्तारत जातो, तसतसा त्या प्रतिफळाचा उजळपणा अधिकच तेजस्वी होईल.

जेव्हां तुम्हीं ह्या नगराची पृथ्वीवरील इतर सर्व गोष्टींपेक्षा अधिक उत्कंठा धरतां, तेव्हां तुम्हीं देवाचा आदर करता, जो इब्री 11:10 नुसार, त्यां नगराचा योजक व उभारणारा आहे. आणि देवाचा आदर केला जातो तेव्हां तो प्रसन्न होतो व आपणाला तुमचा देव म्हणवून घ्यायला त्याला तुमची लाज वाटत नाहीं.

12 फरवरी : एकता की कुंजी

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12 फरवरी : एकता की कुंजी
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“जिस (यीशु मसीह) में तुम भी आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाए जाते हो।”  इफिसियों 2:22

जब कोई व्यक्ति विश्वास के द्वारा मसीह के पास आता है, तो उसकी पहचान में व्यापक रूप से परिवर्तन हो जाता है। इफिसियों 2 में पौलुस ने जिस भाषा का प्रयोग किया है, उसके अनुसार एक मरा हुआ पापी अब मसीह में जीवित है; कोप की सन्तान अब परमेश्वर की सन्तान है। परन्तु यह नई पहचान केवल व्यक्तिगत नहीं है। हम में से कोई भी मसीह में अकेला नहीं है; हम सभी परमेश्वर के लोगों के साथ  उसमें हैं। यही कारण है कि इफिसियों 2 में पौलुस अनुग्रह के हमारे व्यक्तिगत अनुभव से परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले सामूहिक कार्य की ओर आगे बढ़ता है। पौलुस हमें बताता है, “तुम अब विदेशी और मुसाफिर नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्‍वर के घराने के हो गए हो” (पद 19)। मसीह द्वारा निर्मित किया जा रहा यह “एक नया मनुष्य” (पद 15) अनुग्रह के संगी वारिसों की भीड़ के साथ महिमामय रीति से घिरा होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारी व्यक्तिगत मानवीय पहचान व्यर्थ हो जाती है। हमारी पृष्ठभूमि और हमारा स्वरूप, अर्थात हमारा लिंग, जाति और व्यक्तिगत इतिहास मसीह में विलुप्त नहीं हो जाते। हम वही रहते हैं जो हम हैं, अर्थात् परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए तथा उसके उद्देश्यों के अनुसार गढ़े गए हैं। परन्तु जो बात हमें मसीह में  एक करती है, अर्थात् मसीह के साथ  हमारी एकता, वह शेष सभी बातों से बढ़कर है।

हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं हम यह न भूल जाएँ कि हमारी यह एकता किस कारण से हमें मिली है। कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान के तत्वों को बाधाओं में—प्रतिष्ठा, वर्ण, वर्ग, व्यक्तित्व के प्रकार या व्यक्तिगत प्राथमिकताओं की बाधाओं में—बदल देने के प्रलोभन में गिर सकता है। मसीही होने के नाते हमें यह स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए कि ऐसी भूल हो जाना कितनी सरल बात है। यदि हम स्वयं को ऐसी गलती के लिए दोषी पाएँ, तो हमें पश्चाताप करने और उस बात के विषय में शोक करने के लिए तैयार रहना चाहिए जो परमेश्वर को पसन्द नहीं आती।

मसीही एकता की कुंजी सुसमाचार है। पौलुस जानता था कि केवल परमेश्वर ही कठोर हृदयों को नरम कर सकता है, केवल परमेश्वर ही अन्धी आँखें खोल सकता है और केवल परमेश्वर ही अलग-अलग लोगों को एक साथ लाकर उन्हें कुछ ऐसा बना सकता है, जो वास्तव में महिमामय रीति से एक हों। परमेश्वर “एक नया मनुष्य” निर्मित कर रहा है और वह उस नए मनुष्य को अपनी कलीसिया के रूप में निर्मित कर रहा है। मसीह में परमेश्वर एक “पवित्र मन्दिर” (इफिसियों 2:21) निर्मित कर रहा है, जो “आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाया जाता है।” जाति, वर्ग या प्रतिष्ठा के आधार पर पक्षपात के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है, जहाँ परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा वास करता है। एक दिन आप अनन्त काल के लिए मसीह और उसके लोगों के साथ अपने मिलन की पूर्णता का अनुभव करेंगे; परन्तु उस काम को अभी प्रारम्भ होना आवश्यक है और होना भी चाहिए। जिस तरह से आप अपने समय का उपयोग करते हैं और जिस तरह से आप अपनी कलीसिया में अपने भाइयों और बहनों के बारे में सोचते हैं, उनके लिए प्रार्थना करते हैं और उनसे बात करते हैं, इन सब बातों के द्वारा आज आपके पास उस एकता को पोषण देने का विशेषाधिकार है।

हम दिन-प्रतिदिन निर्मित होते जा रहे हैं,

जैसे-जैसे क्षण बीतते जा रहे हैं,

हमारा मन्दिर, जिसे शायद संसार न देख सके;

अनुग्रह से प्राप्त होने वाली प्रत्येक जीत

अनन्त काल के लिए किए जा रहे हमारे निर्माण में

अपना स्थान अवश्य पाएगी।

1 कुरिन्थियों 13

12 फेब्रुवारी : लिंकन व देवाची कृपा-योजना

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12 फेब्रुवारी : लिंकन व देवाची कृपा-योजना
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अहाहा, देवाच्या बुद्धीची व ज्ञानाची संपत्ती किती अगाध आहे! त्याचे निर्णय किती गहन आणि त्याचे मार्ग किती अगम्य आहेत (रोमकरांस  11:33)

अब्राहम लिंकन, ज्यांचा जन्म 1809 साली आजच्याच दिवशी झाला होता, तें त्यांच्या चाळीशीत धर्माबाबत संशयी व तर कधी कधी धर्माचा उपहास करणारे असें देखील होते. पण कश्याप्रकारे ते वैयक्तिकरित्या स्वतःवर व देशावर आलेले संकट यामुळें देवापासुन दूर  जाण्याऐवजी देवा जवळ आले हे पाहणे लक्षवेधी आहे. 

1862 साली जेव्हां लिंकन 53 वर्षाचे होते तेव्हां त्यांचा मुलगा विली याचे निधन झालें, त्या “दु:खातून बाहेर पडण्यासाठीं त्यांची पत्नी न्यू एज या गूढवादी शिक्षणाकडे वळाली”, तर लिंकन हे न्यूयॉर्क एव्हेन्यू, प्रेस्ब्यटेरियन चर्च वॉशिंग्टन येथील पाळक फिनेयास गर्ली यांचा शिक्षणाकडे वळाले.

आणि जसा कीं श्रीमान गरले उल्लेख करतांत, अनेक वैयक्तिक चर्चां नंतर लिंकन यांचा “ख्रिस्तामध्यें नवा जन्म झाला.” लिंकन यांनी अनेक वेळा उघड केलें कीं, “ख्रिस्ताला सोडून मी कुठेच जाऊ शकत नाही, या भावनेने मी अनेक वेळा माझ्या गुडघ्यांवर येऊन प्रार्थना केलीं.”

त्याच बरोबर, जखमी व मरण पावलेले सैनिक यांची यातना त्यांना रोज व्यथित करीत असें. वॉशिंग्टन येथें जखमी सैनिकांसाठीं पन्नास दवाखाने होते व कॅपीटॉलच्या इमारतीमध्ये जखमींसाठीं दोन हजार बेड उपलब्ध केले गेले होते.

या तात्पुरत्या स्वरुपाच्या दवाखान्यामध्ये रोज पन्नास सैनिकांचा मृत्यू होत असे. या सर्व गोष्टींमुळे लिंकन देवाच्या कृपेच्या अधिक जवळ येत गेलें. “ज्याने हे जग निर्माण केले, त्यावर आज देखील त्याचीच सत्ता आहे, यावर विश्वास ठेवण्याऐवजी आपण कांहीच करूं शकत नाहीं.

त्यांचा हत्येच्या एक महिना अगोदर, आपल्या दुसर्‍या कार्यकालाच्या भाषणाच्या वेळी त्यांनी गृहयुद्‌ध व देवाची कृपायोजना यांतील परस्पर संबंधावर आपलं सर्वात प्रसिद्ध वक्तव्य केलं. देव हा संयुक्त किंवा संघ राज्याच्या बाजूने नाही हे त्यांचे उदद्गार खूप उल्लेखणीय आहेत . देवाच्या स्वताच्या योजना असतात व तो दोन्ही बाजू कडील पापासाठीं कुठलीहि सबब (काही केले तरी अद्दल घडणार नाही अशी स्थिती) मानत नाही.

               आम्हीं  एकनिष्ठेने आशा करतो – आम्हीं तत्परतेने प्रार्थना करतो –कीं हे युद्धाचे मोठे अरिष्ट लवकरच संपुष्टात यावें.

तरी सुद्धा, देवाची इच्छा असेल कीं ते सुरू रहावे, दासांनी दोनशे वर्ष कष्ट करून मिळवलेल्या संपतीचा पूर्ण -हास झाला तरी, जो पर्येंत चाबकाच्या फट्कयांनी सांडलेल्या रक्ताच्या प्रत्येक थेंबाची परतफेड तलवारीने होत नाही तो पर्येंत जरी युद्धं सुरू राहिले तरी देखील, आणि तीन हजार वर्षापूर्वी जसें नमूद केले होते, तें आजहि ओरड करून सांगितले गेलें पाहिजें कीं, “देवाचे सर्व न्याय योग्य व नीतिमान आहेत, हेच सत्य आहे.”

मी तुम्हां सर्वांकरिता, ज्यांनी काही तरी गमावले आहे, जे अतोनात दु:खात आहेत व जे वेदनेत आहेत, अशी प्रार्थना करितो,  कीं जशी लिंकन यांना आली तशी तुम्हाला देखील या गोष्टीची प्रचिती यावी, कीं आपण हताश होऊन सर्व दोष नियतीवर न देता, देवाचे अगाध ज्ञान व त्याच्या कृपा-योजनांवर आपण गाढ भरवंसा ठेवावा.

11 फरवरी : राज्य के वारिस होना

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11 फरवरी : राज्य के वारिस होना
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“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे?”  1 कुरिन्थियों 6:9

विश्वासियों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यीशु मसीह के राज्य में हमें सदस्यता मिल चुकी है। यही वह बात है जो मसीहियों को अद्वितीय बनाती है। अब हम एक बिलकुल नए राज्य के सदस्य हैं। हो सकता है कि हम काले या गोरे, अमीर या गरीब, पुरुष या स्त्री हों, किन्तु जो बात हमें एक करती है, वह है एक ही राजा, अर्थात् यीशु के प्रति हमारी निष्ठा। हम उसके निर्देशों पर चलते हैं, हम उसके दल के साथ आनन्दित होते हैं और हम उसकी आज्ञा का पालन करने में प्रसन्न होते हैं।

परमेश्वर का राज्य एक धर्मी राज्य है। उसका चरित्र सिद्ध है, उसके मानक उत्कृष्ट हैं और वह पाप को नहीं देख सकता। इसलिए पौलुस चेतावनी देता है कि जो लोग उसके चरित्र को नकारते हैं और उसके मानकों को अस्वीकार करते हैं “वे परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।” दुष्टता, विद्रोह और आत्मनिर्भरता से चिह्नित जीवनशैली मसीह की प्रभुता के साथ मेल नहीं खाती और इस कारण इस तरह से जीवन बिताने का निर्णय उसके राज्य की सीमाओं से बाहर रहने का निर्णय है।

हमें ध्यान देना है कि पौलुस यहाँ अधर्म के छोटे-मोटे कामों का उल्लेख नहीं कर रहा है। मसीह के राज्य का कोई भी सदस्य अनन्त महिमा के इस पार पाप रहित जीवन नहीं जीता। इसके विपरीत, पौलुस किसी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख कर रहा है, जो निरन्तर पाप में लगा रहता है या उससे घृणा नहीं करता। वह ऐसे जीवन की बात कर रहा है जो घोषित करता हो कि “मैं नहीं चाहता कि परमेश्वर मेरी इच्छाओं में हस्तक्षेप करे, फिर भी मैं इस धारणा के साथ जीना चाहता हूँ कि मैं उसके राज्य का हूँ और उसके सभी लाभ भी चाहता हूँ।”

परमेश्वर अपने राज्य की सीमाओं का निर्धारण करता है। यह बात पूर्णतः सत्य है कि सारे मनुष्य उसके राज्य के नागरिक नहीं होगे, फिर चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उनका विश्वास चाहे कुछ भी क्यों न हो, या वे चाहे कुछ भी क्यों न चाहते हों! यह धारणा बहुत ही स्वीकार्य लग सकती है, परन्तु परमेश्वर का वचन ऐसा कदापि नहीं सिखाता। केवल परमेश्वर यह निर्धारित करता है और उसके अतिरिक्त कोई अन्य यह तय नहीं कर सकता कि उसके राज्य में कौन होगा।

परमेश्वर कहता है कि न्याय का एक दिन आएगा। निस्सन्देह, यीशु अपनी महिमा में वापस आएगा और “सब जातियाँ उसके सामने इकट्ठा की जाएँगी; और वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा” कि वे या तो परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करें या अनन्त विनाश में भेजे जाएँ (मत्ती 25:32)। परमेश्वर का राज्य ऐसा कुछ नहीं है, जिसे यीशु पुरातन से चली आ रही प्रणाली में मौजूद किसी दोष को ठीक करने के लिए लेकर आया हो। इसकी योजना अनन्तकाल से थी।

आने वाले न्याय के कारण सुसमाचार प्रचार में तत्परता की भावना उत्पन्न होनी चाहिए और इससे हममें हमारे पाप के प्रति सच्चरित्रता और निर्दयता उत्पन्न होनी चाहिए। हमें संसार के सामने यीशु के रूप में एक ऐसा जीवित उद्धारकर्ता प्रस्तुत करना चाहिए, जो ठीक वही करेगा जिसे करने के बारे में उसने कहा था और हमें स्वयं को भी यही प्रचार करना चाहिए। केवल अपने पाप को पहचानने और उद्धारकर्ता की हमारी आवश्यकता को पहचानने के द्वारा ही यह सम्भव है कि हम परमेश्वर के इस अनन्त राज्य के वारिस बन सकेंगे।      लूका 13:22-30