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23 June : विश्वास त्याचा आदर करतो ज्याच्यावर तो विश्वास ठेवतो

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23 June : विश्वास त्याचा आदर करतो ज्याच्यावर तो विश्वास ठेवतो
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परंतु देवाच्या अभिवचनाकडें पाहून तो अविश्वासामुळें डळमळला नाहीं, तर विश्वासानें सबळ होऊन त्यानें देवाचा गौरव केला. (रोम 4:20)

ओह, पवित्रता आणि प्रीतीचा आम्हीं पाठपुरावा करीत असतांना देवाचे गौरव व्हावे अशी माझी किती इच्छा आहे. पण जोवर आमचा पाठपुरावा देवाच्या अभिवचनांवरील विश्वासानें समर्थ होत नाहीं तोवर देवाचे गौरव होणें शक्य नाहीं.

आणि ज्या देवानें स्वतःला येशू ख्रिस्तामध्यें अत्यंत परिपूर्णपणें प्रकट केलें, जो आमच्यां पापांसाठीं वधस्तंभावर खिळला गेला आणि आम्हीं नीतिमान ठरावे म्हणून पुनरुत्थित झाला (रोम 4:25), त्याचे त्यावेळी अत्यंत गौरव होते जेव्हां आम्हीं अत्यंत आनंदानें त्याच्या अभिवचनांचा स्वीकार करतो कारण ती अभिवचनें त्याच्या पुत्राच्या रक्तानें विकत घेण्यात आली आहेत.

जेव्हां आपण आपला दुर्बळपणा आणि अपयश यांमुळें आपलें अंतकरण दीन करतो, आणि भविष्याच्या कृपेसाठीं त्याच्यावर विश्वास ठेवतो तेव्हां देवाचा आदर होतो. रोम 4:20 चा हाच मुद्दा आहे जेथे पौल अब्राहामाच्या विश्वासाचे वर्णन करतो. “परंतु देवाच्या अभिवचनाकडें पाहून तो अविश्वासामुळें डळमळला नाहीं, तर विश्वासानें सबळ होऊन त्यानें देवाचा गौरव केला.

तो त्याच्या विश्वासात सबळ झाला, आणि त्यांद्वारें त्यानें देवाचा गौरव केला. देवाच्या अभिवचनांत विश्वासाद्वारें त्याला अत्यंत बुद्धीमान आणि बलवान आणि चांगला आणि विश्वसनीय म्हणून गौरव प्राप्त होते. म्हणून, जोवर आपण देवाच्या भविष्यातील कृपेच्या अभिवचनांत विश्वासानें कसे जगावे हे शिकत नाहीं, तोवर आपण उल्लेखनीय धार्मिक तपस्या करीत असू, पण त्याद्वारें देवाचे गौरव होत नाहीं.

त्याचे गौरव तेव्हां होते जेव्हां पवित्र होण्याचे सामर्थ्य भविष्यातील कृपेतील विनम्र विश्वासाद्वारें येते.

मार्टिन लूथर यांनी म्हटलें, “विश्वास, त्याचा आदर करतो ज्याच्यावर तो अत्यंत निष्ठेनें आणि अतिशय आदरानें विश्वास ठेवतो, कारण तो त्याला सत्य आणि विश्वासार्ह मानतो.” अशा ह्या विश्वसनीय दात्याचे गौरव होते.

आपण देवाच्या आदरासाठीं कसे जगावे हे आपण शिकावे अशी माझी उत्कंठा आहे. आणि याचा अर्थ भविष्यातील कृपेत विश्वासानें जगणें, ज्याचा अर्थ, त्याच्या मोबदल्यात त्या सर्व बाबतीत अविश्वासाशी लढा देणें ज्यात तो आपलें डोके वर काढतो.

22 जून : उदासीनता के लिए कोई स्थान नहीं है

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22 जून : उदासीनता के लिए कोई स्थान नहीं है
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“बुराई से घृणा करो; भलाई में लगे रहो।” रोमियों 12:9

जिस मरीज ने हड्डियों के गुदे का ट्राँसप्लाण्ट कराया है, वह जानता है कि संक्रमण के किसी भी सम्भावित खतरे से खुद को अलग रखना कितना महत्त्वपूर्ण है। चूंकि उनका प्रतिरक्षा तन्त्र इतना कमजोर हो जाता है, इसलिए वे औसत व्यक्ति से कहीं अधिक बीमारियों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। यदि कोई आगंतुक खाँसते हुए आए और कहे कि यह “कोई बड़ी बात नहीं” है, तो वह मरीज के लिए और उसके डॉक्टर के लिए घृणास्पद होगा। किसी भी बीमारी की रोकथाम ऐसे की जानी चाहिए मानो यह कोई महामारी हो, क्योंकि इसके परिणाम सम्भावित रूप से जानलेवा हो सकते हैं।

मसीह प्रेम को बुराई के खिलाफ इसी प्रकार की कट्टर मानसिकता को दर्शाना चाहिए। हम यह नहीं कह सकते कि हम दूसरों से सच्चा प्रेम करते हैं, यदि हम अपने दिल में बुराई को संजोते हैं, या उसे सहन करते हैं, और अच्छाई से खुद को दूर रखते हैं। हम दुष्टता के साथ नहीं खेल सकते, और खासतौर पर कुछ पापों के प्रति लापरवाही वाला रवैया नहीं अपना सकते। “घृणा” वह शब्द है जिसे पौलुस सबसे सख्ती से इस्तेमाल करता है। शुद्धता के मामले में वह कोई समझौता नहीं करता।

इस वाक्य के आरम्भ में ही पौलुस ने अपने पाठकों को निर्देश दे दिया है कि उनका “प्रेम निष्कपट हो।” फिर, क्या यह दिलचस्प नहीं है कि पौलुस “प्रेम” के तुरन्त बाद “घृणा” जैसा कठोर शब्द इस्तेमाल करता है? हमें अक्सर लगता है कि यदि हम प्रेम करते हैं, तो हमें किसी व्यक्ति या वस्तु से घृणा नहीं करनी चाहिए—लेकिन यह सिर्फ भावुकता है। पौलुस यह स्पष्ट करता है कि प्रेम “कुकर्म से आनन्दित नहीं होता” (1 कुरिन्थियों 13:6)। यदि आप अपने जीवनसाथी से एक प्रचण्ड पवित्रता के साथ प्रेम करते हैं, तो आप उस सम्बन्ध को नुकसान पहुँचाने वाली हरेक बात से नफरत करते हैं; अन्यथा आपका प्रेम सच्चा प्रेम नहीं है। यही सिद्धान्त परमेश्वर की बातों के प्रति हमारे प्रेम पर भी लागू होता है। हम अपवित्रता से घृणा किए बिना पवित्रता से प्रेम नहीं कर सकते।

आगे बढ़ते हुए पौलुस नकारात्मक से सकारात्मक की ओर मुड़ता है, और उन्हीं शब्दों, अर्थात “लगे रहो,” का उपयोग करता है, जिनका उपयोग यीशु ने विवाह के रिश्ते को समझाने के लिए किया था (देखें मत्ती 19:5)। पौलुस इन शब्दों का उपयोग बिना उद्देश्य के नहीं करता। मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विवाह सम्भवतः सबसे करीबी मानव संघ है। इसलिए पौलुस यहाँ कह रहा है कि मसीह प्रेम में अच्छाई के प्रति “मजबूत गोंद” जैसे प्रतिबद्धता होनी चाहिए।

हमें सावधान रहना चाहिए कि हम संसार के उस जाल में न फँसे, जिसमें “बुराई को अच्छाई और अच्छाई को बुराई” कहा जाता है, या ऐसे लोग न बनें, “जो अँधियारे को उजियाला और उजियाले को अँधियारा ठहराते” हैं (यशायाह 5:20)। परमेश्वर के लोग यह समझते हैं कि प्रेम का एक समय होता है और घृणा का एक समय होता है (सभोपदेशक 3:8)।

तो फिर आप बुराई के प्रति अपने दृष्टिकोण को कैसे वर्णित करेंगे—विशेषकर उन पापों के बारे में जो आपके लिए सबसे आकर्षक हैं या आपके आस-पास रहने वाले लोग जिनमें खुशी मनाते हैं? यदि आप उनसे घृणा करने लगेंगे, तो क्या बदलाव आएगा? आज आप परमेश्वर के आत्मा पर निर्भर रहें, ताकि आप सही ढंग से प्रेम कर सकें और उन बातों से नफरत कर सकें जिनसे परमेश्वर नफरत करता है, और जॉन बेली की प्रार्थना को अपनी प्रार्थना बना लें: “हे परमेश्वर, मुझे अच्छाई के पीछे जाने की शक्ति दे। अब जब मैं प्रार्थना करता हूँ, तो हमारे मनों में कोई गुप्त बुरी भावना न हो, जो पूरी होने के अवसर का इंतजार कर रही हो।”[1]

  मरकुस 9:42-50

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 46–47; मत्ती 28


[1] ए डायरी ऑफ प्राइवेट प्रेयर  में “सिक्स्थ डे, इवनिंग,” (फायरसाईड, 1996), पृ. 31.

22 June : आपण पावित्रीकरणासाठीं कसे लढावे?

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22 June : आपण पावित्रीकरणासाठीं कसे लढावे?
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सर्वांबरोबर ‘शांततेनें राहण्याचा’ व ज्यावाचून कोणालाही प्रभूला पाहता येत नाहीं ते पवित्रीकरण मिळवण्याचा ‘झटून प्रयत्न करा.’. (इब्री 12:14)

एक व्यावहारिक पवित्रता आहे ज्यावाचून आम्हांला प्रभूला पाहता येत नाहीं. अनेक लोक असें जगतात जणू काहीं अशी काहीं गोष्ट नाहीं.

असें तथाकथित ख्रिस्ती आहेत जे असें अपवित्रतेचे जीवन जगतात कीं त्यांच्या कानी येशूचे हे भयानक शब्द पडतील, “मला तुमची कधीच ओळख नव्हती; अहो अनाचार करणार्यांनो, माझ्यापुढून निघून जा.” (मत्तय 7:23). पौल अशा तथाकथित विश्वासणार्यांस म्हणतो, “कारण जर तुम्हीं देहस्वभावाप्रमाणें जगलात तर तुम्हीं मरणार आहात” (रोम 8:13).

तर अशाप्रकारची पवित्रता आहे जिच्यावाचून कोणीही देवाला पाहू शकणार नाहीं. आणि भविष्यातील कृपेत विश्वासानें पवित्रतेसाठीं लढा देण्यास शिकणें हे अत्यंत महत्वाचे आहे.

पवित्रतेचा पाठपुरावा करण्याचा आणखी एक मार्ग आहे ज्याचे परिणाम अप्रिय आहेत आणि तो मार्ग मृत्यूकडें घेऊन जातो. पौल आपल्यांला देवाच्या सामर्थ्य पुरविणाऱ्या कृपेवर विश्वास ठेवण्यावाचून दुसऱ्या कुठल्याही मार्गानें त्याची सेवा करण्याविरुद्ध ताकींद देतो. “माणसांच्या हातून त्याची सेवा घडावी असेंही नाहीं; कारण जीवन, प्राण व सर्वकाहीं तो स्वतः सर्वांना देतो.” (प्रेषितांची कृत्ये 17:25). देवाची सेवा करण्याचा कोणताही असा प्रयत्न जो आमच्यां अंतःकरणाचे प्रतिफळ व आमच्यां सेवेचे सामर्थ्य म्हणून त्याच्यावर अवलंबून राहत नाहीं, तो प्रयत्न एक गरजवंत अन्यधर्मीय देव म्हणून त्याचा अनादर करेल.

पेत्र देवाच्या अशा स्वावलंबी सेवेच्या पर्यायाचे वर्णन करतो, “सेवा करणाऱ्यानें, ती आपण देवानें दिलेंल्या शक्तीनें करत आहोत, अशी करावी; ह्यासाठीं कीं, सर्व गोष्टींत देवाचा गौरव येशू ख्रिस्ताच्या द्वारें व्हावा” (1 पेत्र 4:11). आणि पौल म्हणतो “ख्रिस्तानें माझ्या हातून न घडवलेलें काहीं सांगण्याचे धाडस मी करणार नाहीं” (रोम 15:18; 1 करिंथ 15:10 सुद्धा पहा).

क्षणोक्षणी, देवानें आमच्यांसाठीं ठरवलेलें, “प्रत्येक चांगलें काम” करण्यासाठीं आम्हांला सामर्थ्य पुरविण्याकरिता कृपा प्रगट होते. “सर्व प्रकारची कृपा तुमच्यांवर विपुल होऊ देण्यास देव समर्थ आहे; ह्यासाठीं कीं, तुम्हांला सर्व गोष्टींत सगळा पुरवठा नेंहमी होऊन प्रत्येक चांगल्या कामासाठीं सर्वकाहीं तुमच्यांजवळ विपुल व्हावे” (2 करिंथ 9:8).

चांगल्या कार्यांसाठीं लढा हा भविष्यातील कृपेच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवण्याचा लढा आहे.

21 जून : सच्चा मसीही प्रेम

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21 जून : सच्चा मसीही प्रेम
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प्रेम निष्कपट हो। रोमियों 12:9

फिल्म शानदार तरीके से यह दिखा सकती है कि एक पात्र जो कहता है और उसके दिमाग में जो सच में चल रहा होता है, उसके बीच कितना विरोधाभास हो सकता है। यह आमतौर पर उनकी आँखों के करीब से लिए गए शॉट में देखा जा सकता है: उसका मुँह कहता है, “वाह, मिस्टर जेनकिंस, आपको फिर से देखकर बहुत अच्छा लग रहा है!” लेकिन फिर उसकी अभिव्यक्ति से दर्शक यह समझ जाते हैं कि वह सच में ऐसा नहीं सोच रही है। वह सच में यह कहना चाहती है, “मिस्टर जेनकिंस, यदि मैं आपसे मुलाकात करने से बच सकती, तो मैं जरूर ऐसा करती—लेकिन अब मुझे यहाँ आपके साथ बात करनी पड़ रही है।”

जो मुँह कहता है, जरूरी नहीं कि वह सच हो। जब लोगों बिना सोचे-समझे किसी से कहा, “मैं तुमसे प्यार करता हूँ,” तो इससे बहुत से दिल टूटे हैं और जीवन बर्बाद हुए हैं। पवित्रशास्त्र के अनुसार सच्चा मसीही प्रेम हमेशा वास्तविक होता है। पौलुस सतहीपन और धोखे के खतरे का सामना करते हुए विश्वासियों को ईमानदारी से प्रेम करने के लिए प्रोत्साहित करता है—अर्थात ऐसे दिल से प्रेम, जो हमारे शब्दों से मेल खाता हो। हम इस ढोंग के दमन से मुक्त हो जाते हैं कि हमें हर किसी को पसन्द करना है और इस सोच से मुक्त हो जाते हैं कि हर कोई हमें पसन्द करे; और तब हम मसीह में पराक्रमी रूप से सक्षम हो जाते हैं कि हम उन लोगों से भी प्रेम करें जिनके हम पहले पास भी नहीं रहना चाहते थे।

डब्ल्यू. ई. वाईन कहते हैं कि वास्तव में मसीही प्रेम “हमेशा प्राकृतिक प्रवृत्तियों के साथ नहीं चलता, और न ही यह केवल उन्हीं पर खर्च होता है जिनके साथ कोई सम्बन्ध पाया जाता है।”[1] दूसरे शब्दों में, यह प्राकृतिक नहीं है। जो प्राकृतिक है वह यह है कि हम केवल उन्हीं से प्रेम करें जिन्हें हम प्रेम के योग्य समझते हैं—जो हमारे जैसे हों, हमारी सोच के दायरे में फिट बैठते हों, और हमारी अपेक्षाओं को पूरा करते हों। लेकिन वास्तविक प्रेम पारम्परिक नहीं होता। यह जाति, शिक्षा और सामाजिक स्थिति की सीमाओं को पार करता है। यह मनुष्यों द्वारा निर्धारित सभी सीमाओं को पार करता है।

यह रोमियों 5:8 वाला प्रेम है: “परमेश्‍वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरा।” सच्चा प्रेम केवल परमेश्वर के अनुग्रह के परिणामस्वरूप ही आ सकता है। यह हमारे लिए यीशु के बलिदान का प्रतिबिम्ब है। जब परमेश्वर का प्रेम एक विश्वासी के जीवन को आकार देता है, तो हमारे शब्द और कर्म उस प्रेम से ओत-प्रोत हो जाते हैं।

पौलुस की आशा थी कि जब लोग रोम में आरम्भिक कलीसिया को देखेंगे, तो वे कहेंगे, “इन लोगों का आपस में प्रेम करने का तरीका कुछ अलग है।” अन्य मसीहियों के साथ आपके रिश्ते में परमेश्वर की पुकार आज भी वही है। सतही, कमजोर या नकली प्रेम से सन्तुष्ट न हों। अपने दिल को ठण्डा न होने दें, भले ही आप सभी सही बातें कह रहे हों। अपना प्रेम वास्तविक बनाएँ रखें—उस व्यक्ति पर अपनी दृष्टि लगाए रख कर जिसने आपसे मृत्यु तक प्रेम किया, इसके बावजूद कि आप पापी हैं। प्रार्थना करें कि आपका प्रेम अलग और गहरा हो, ताकि आप उस व्यक्ति की ओर इशारा कर सकें, जो सारे असली प्रेम का स्रोत है।

यूहन्ना 15:12-17 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 43–45; मत्ती 27:51- 66 ◊


[1] वाईनज़ एक्स्पोज़िटरी डिक्शनरी ऑफ ओल्ड ऐण्ड न्यू टेस्टामेण्ट वर्ड्स (थॉमस नेल्सन, 1997), एस.वी. “लव”

21 June : पापाचा पराजय करणारे समाधान

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21 June : पापाचा पराजय करणारे समाधान
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येशू त्यांना म्हणाला, “मीच जीवनाची भाकर आहे; जो माझ्याकडें येतो त्याला कधीही भूक लागणार नाहीं आणि जो माझ्यावर विश्वास ठेवतो त्याला कधीही तहान लागणार नाहीं. (योहान 6:35)

येथे आम्हास जे पाहण्याची गरज आहे ते हे कीं विश्वासाचा सार हाच कीं ख्रिस्ताठायी देव आमच्यांसाठीं जे काहीं आहे त्यांत संतुष्ट असणें.

अशाप्रकारे विश्वासाची व्याख्या केल्यांनें दोन गोष्टीं महत्वाच्या ठरतात. त्यांत पहिली गोष्ट ही कीं विश्वास हा देव-केंद्रित असतो. आम्हीं केवळ देवाच्या अभिवचनांत समाधानी राहत नाहीं, तर येशूमध्यें स्वतः देव आमच्यांसाठीं जो कोणी आहे त्यां सर्व गोष्टींत आम्हीं समाधानी राहतो. विश्वास मान्य करतो कीं ख्रिस्तामध्यें देवच आमचे वतन आहे – फक्त देवाची अभिवचन-दत्त कृपादानें नव्हे.

विश्वास आपली आशा फक्त येणाऱ्या युगाच्या स्थावर मालमत्तेवर ठेवत नाहीं, तर देव तेथे असेल या वस्तुस्थितीवर तो पोषण पावतो (प्रकटीकरण 21:3). “आणि मी राजासनातून आलेंली मोठी वाणी ऐकली, ती अशी : “‘पाहा,’ देवाचा मंडप मनुष्यांजवळ आहे, त्यांच्याबरोबर ‘देव आपली वस्ती करील; ते त्याचे लोक होतील, आणि’ देव स्वतः ‘त्याच्याबरोबर राहील.’”

आणि आता सुद्धा विश्वास अत्यंत आवर्जून जी गोष्ट स्वीकार करतो ती म्हणजें क्षमा झालेंल्या पापांची केवळ वास्तविकता नव्हे (ते कितीही मौल्यवान असलें तरीही), तर आमच्यां अंतःकरणांमध्यें जिवंत ख्रिस्ताचे सान्निध्य आणि स्वतः देवाची पूर्णता होय. इफिस 3:17-19 मध्यें पौल प्रार्थना करतो कीं “ख्रिस्तानें तुमच्यां अंतःकरणामध्यें तुमच्यां विश्वासाच्या द्वारें वस्ती करावी… असें कीं तुम्हीं देवाच्या सर्व पूर्णतेइतके परिपूर्ण व्हावे.”

विश्वासाची व्याख्या करतांना येशूठायी आमच्यांसाठीं देव जो काहीं आहे त्यात संतुष्ट म्हणून ज्या आणखी एका गोष्टीवर जोर दिला गेला आहे तो शब्द आहे “समाधान.” विश्वास म्हणजें देवाच्या झऱ्याजवळ येऊन आत्म्याची तहान भागवणें. योहान 6:35 मध्यें आपण पाहतो कीं “विश्वास ठेवण्याचा” अर्थ “जीवनाची भाकर” खाण्यासाठीं आणि “जिवंत पाणी” जो स्वतः येशू होय (योहान 4:10,14), पिण्यासाठीं येशूजवळ येणें होय.

पापमय आकर्षणांचे गुलाम बनविणारे सामर्थ्य तोडणाऱ्या विश्वासाच्या सामर्थ्याचे रहस्य येथे आहे. जर अंतःकरण येशूमध्यें देव आपल्यांसाठीं जे काहीं आहे त्या सर्व गोष्टींत समाधानी असेल, तर आपल्यांला ख्रिस्ताच्या बुद्धीपासून दूर मोहित करणारे पापाचे सामर्थ्य निशस्त्र झालें आहे. 

20 जून : ऊपर से मिले वरदान

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20 जून : ऊपर से मिले वरदान
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“वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं। जबकि उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न–भिन्न वरदान मिले हैं, तो जिसको भविष्यद्वाणी का दान मिला हो, वह विश्‍वास के परिमाण के अनुसार भविष्यद्वाणी करे।” रोमियों 12:5-6

आत्मिक वरदान औजार हैं, खिलौने नहीं। इन्हें खेलने के लिए या दूसरों को हमारी ओर आकर्षित करने के लिए नहीं नहीं दिया गया है, बल्कि इन्हें परमेश्वर द्वारा हमारे माध्यम से उसके उद्देश्यों और उसकी महिमा के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए।

हमें जो भी वरदान मिले हैं—चाहे वह बोलने से सम्बन्धित क्षमताएँ हों या सेवा करने से—उन्हें कलीसिया की भलाई के लिए दिया गया है। परमेश्वर इन वरदानों को इस उद्देश्य से देता है कि जब हम उन्हें उसकी इच्छानुसार उपयोग करें, तो मसीह की देह समग्र रूप से मजबूत हो। ये वरदान किसी व्यक्ति के स्वार्थों को पूरा करने के लिए और महानता का प्रदर्शन करने के लिए नहीं दिए गए हैं, बल्कि इसलिए दिए गए हैं ताकि परमेश्वर के सभी लोगों की एकता, सामंजस्य, और प्रगति को सुदृढ़ किया जा सके। यही कारण है कि हमारे पास भिन्न-भिन्न वरदान होते हैं: ताकि हम एक-दूसरे की सेवा करना और एक-दूसरे पर निर्भर रहना सीख सकें।

फिर भी, परमेश्वर के वरदान केवल तब ही सामंजस्य और भलाई को बढ़ावा दे सकते हैं, जब उन्हें सच्ची विनम्रता के साथ प्रयोग किया जाता है। हर स्थानीय कलीसिया की देह उस सीमा तक ही बढ़ सकती है, जिस सीमा तक “हर एक अंग के ठीक–ठीक कार्य” करता है (इफिसियों 4:16)। अपने पाठकों को उनके वरदानों का उपयोग करने के लिए प्रेरित करने से पहले ही पौलुस ने अपने आत्मिक वरदानों पर प्रवचन का आरम्भ विनम्रता से किया था, और सबसे विनती की थी कि “जैसा समझना चाहिए उससे बढ़कर कोई भी अपने आप को न समझे; पर . . . सुबुद्धि के साथ अपने को समझे” (रोमियों 12:3)।

विनम्रता के बिना आत्मिक वरदान अराजकता की ओर ले जा सकते हैं। हम उचित निर्देश और निगरानी के बिना किशोरों को पावर टूल्स नहीं देंगे, न ही उन्हें तीव्र गति से चलने वाली आरी देने की सोचेंगे—अन्यथा इससे अराजकता फैल सकती है! इसी तरह, आत्मिक वरदानों का उपयोग उनके सही उद्देश्य और सही तरीके से किया जाना चाहिए ताकि हंगामा न हो। इसलिए पौलुस कुरिन्थियों की कलीसिया को—जो वरदानों से भरी हुई थी, लेकिन उन्हें उपयोग में लाने के लिए अनिवार्य बुद्धि की कमी से जूझ रही थी—बताता है कि जबकि आत्मिक वरदानों की इच्छा रखना और उन्हें लेकर खुश होना अच्छा है, तौभी उनका उपयोग करने का एक “उत्तम मार्ग” यह है कि हम उन्हें धैर्यपूर्वक, दयालुता से और विनम्रता—अर्थात प्रेम के साथ उपयोग किया जाए (1 कुरिन्थियों 12:31 – 13:7)।

हमें यह याद रखना चाहिए कि वरदान केवल वरदान ही होते हैं। उनका स्रोत परमेश्वर है; उन्हें अपनी सम्पत्ति मानकर घमण्ड करना मूर्खता है, इसलिए हमारे पास कोई बहाना नहीं है कि हम उन्हें अपने लाभ के लिए उपयोग करें। लेकिन यदि हम उन्हें उपयोग करते समय विनम्रता का अभ्यास करते हैं और एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में जीने की कोशिश करते हैं, तो हम परमेश्वर के कार्य का फल अपने और दूसरों के जीवन में देखेंगे। परमेश्वर ने आपको किस तरह के वरदान दिए हैं? उनमें आनन्दित हों। वह आपको इन वरदानों का उपयोग आपकी कलीसिया की भलाई और अपने पुत्र की महिमा के लिए किस प्रकार करने के लिए बुला रहा है? जाएँ और ऐसा ही करें।

इफिसियों  4:1-16

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 40–42; मत्ती 27:27-50

20 June : कृपा ही क्षमा आहे – आणि सामर्थ्य

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20 June : कृपा ही क्षमा आहे - आणि सामर्थ्य
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तरी जो काहीं मी आहे तो देवाच्या कृपेनें आहे आणि माझ्यावर त्याची जी कृपा झाली आहे ती व्यर्थ झाली नाहीं; परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असें नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्या देवाच्या कृपेनें केलें. (1 करिंथ 15:10)

कृपा ही आम्हीं पाप केल्यांनंतर मिळणारी केवळ दया नव्हे. कृपा पाप न करण्यासाठीं सामर्थ्य देणारे देवाचे कृपादान आणि सामर्थ्य आहे. कृपा ही सामर्थ्य आहे, केवळ पापक्षमा नव्हे.

हे स्पष्ट आहे, उदाहरणार्थ, 1 करिंथ 15:10 मध्यें पौल कृपेचे वर्णन त्याच्या कार्याचे समर्थ बनविणारे सामर्थ्य म्हणून वर्णन करतो. त्याच्या पापांची ती केवळ क्षमा नाहीं; आज्ञाधारकपणांत पुढे वाढत जाण्याचे ते सामर्थ्य आहे. “परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असें नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणाऱ्या देवाच्या कृपेनें केलें.

म्हणून, देवाच्या आज्ञेचे पालन करण्यासाठीं जी धडपड आपण करतो ती आम्हीं आपल्यां स्वतःच्या शक्तीनें केलेंला प्रयत्न नसतो, “देवानें दिलेंल्या शक्तीनें – ह्यासाठीं कीं, सर्व गोष्टींत देवाचा गौरव येशू ख्रिस्ताच्या द्वारें व्हावा” (1 पेत्र 4:11). हे विश्वासाचे आज्ञापालन होय. आम्हीं जे केलें पाहिजे ते करण्यासाठीं आम्हांला सामर्थ्य पुरविणारी देवाची क्षणाक्षणाला प्रकट होणारी कृपापूर्ण शक्ती.

याची पुष्टी पौल 2 थेस्सल 1:11-12 मध्यें करतो आणि आमच्यां चांगुलपणाच्या सर्व कार्यांस तो “विश्वासाचे कार्य” म्हणतो, आणि तसे म्हणण्याद्वारें येशूला जे गौरव प्राप्त होते ते “आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेनें” आहे कारण हे त्याच्या “सामर्थ्यानें” घडते. खालील सर्व वाक्प्रचार ऐका :

ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यांसाठीं सर्वदा अशी प्रार्थना करतो कीं, आपल्यां देवानें तुम्हांला झालेंल्या ह्या पाचारणाला योग्य असें मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्यानें पूर्ण करावे; ह्यासाठीं कीं, आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेनें आपला प्रभू येशू ह्याच्या नावाला तुमच्यां ठायी व तुम्हांला त्याच्या ठायी गौरव मिळावा.

ज्या आज्ञाधारकपणामुळें देवाला आनंद होतो तो विश्वासाद्वारें देवाच्या कृपेच्या सामर्थ्यानें उत्पन्न होतो. ख्रिस्ती जीवनाच्या प्रत्येक पातळीवर हीच शक्ती कार्य करते. विश्वासाद्वारें तारणारे देवाच्या कृपेचे सामर्थ्य (इफिस 2:8) देवाच्या कृपेचे तेच सामर्थ्य आहे जे विश्वासाद्वारें पवित्रहि करते.

19 जून : हम एक देह हैं

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19 जून : हम एक देह हैं
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“क्योंकि जैसे हमारी एक देह में बहुत से अंग हैं, और सब अंगों का एक ही सा काम नहीं; वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं।” रोमियों 12:4-5

आपने कभी-कभी लोगों को आपसे यह पूछते सुना होगा, “क्या आप यहाँ के सदस्य हैं?” यह सवाल आमतौर पर किसी कंट्री क्लब, जिम, या इसी तरह के किसी स्थान से सम्बन्धित होता है। वे जानना चाहते हैं, “क्या आप इस स्थान की सदस्य-सूची में शामिल हैं? क्या यहाँ के लोग आपको जानते हैं और स्वीकार करते हैं, और क्या वे आपको तब याद करेंगे जब आप मौजूद नहीं होंगे?”

कलीसिया का वर्णन करने के लिए पौलुस अक्सर शरीर के उदाहरण का उपयोग करता है। इसके अर्थ को समझने के लिए हमें अपनी कल्पना का विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है। हम सभी के पास एक शरीर है, जो विभिन्न हिस्सों से बना हुआ है, और प्रत्येक भाग का एक विशेष कार्य होता है। सभी भाग दिखाई नहीं देते, लेकिन सभी महत्त्वपूर्ण हैं। यदि कोई भाग काम नहीं कर रहा या मौजूद नहीं है, तो इसका असर बाकी सब पर पड़ता है। किसी के पूरे शरीर की प्रभावशीलता इस पर निर्भर करती है कि यह सिर द्वारा नियन्त्रित हो रहा है या नहीं। यह सत्य मसीह की देह अर्थात स्थानीय कलीसिया पर भी लागू होता है: आत्मिक शरीर तभी सही तरीके से काम करता है, जब वह यीशु के नेतृत्व में एकजुट होकर काम करता है। जब ऐसा होता है, तो हम . . .

एकता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं रहते।

बहुलता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम विभिन्न प्रकार के हिस्सों से बने हैं।

विविधता के साथ काम करते हैं, क्योंकि शरीर के कार्य स्वाभाविक रूप से विविध होते हैं।

सुगमता के साथ काम करते हैं, जिसे हम तब महसूस करते हैं जब सब कुछ एकजुट होकर काम करता है।

पहचान के साथ काम करते हैं, यह दर्शाते हुए कि हममें से प्रत्येक जन अकेला रहकर स्वयं को पूर्ण रूप से नहीं जान सकता।

दूसरे शब्दों में, जब आप एक व्यक्ति के रूप में मसीह की देह की प्रकृति को समझते हैं, तो आप बेहतर तरीके से समझ पाते हैं कि आप कौन हैं और आप कहाँ फिट बैठते हैं। मसीह की देह के एक सदस्य के रूप में आप कहीं न कहीं अवश्य शामिल हैं। जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें बदल दिया है, तो हमें यह एहसास होना चाहिए कि हमारे लिए यह ध्यान रखना अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हमें एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध में बुलाया गया है—एक समुदाय में बुलाया गया है। हम उन वरदानों में विविध हैं जो हमें दिए गए हैं; हममें से कोई भी अकेले रहकर शरीर नहीं बना सकता, बल्कि हम एकसाथ जुटकर ही शरीर बनते हैं। हममें से प्रत्येक एक-दूसरे के लिए हैं। इसलिए हम कलीसिया में इस उद्देश्य से एकत्रित होते हैं कि हम अपने आप को एक-दूसरे के लिए और अन्ततः हमारे प्रभु के लिए अर्पित कर सकें। हम मसीह की देह में हमारे उपस्थित रहने, हमारे गीतों, हमारे प्रार्थनाओं और हमारी संगति के माध्यम से योगदान देते हैं। जैसा कि आइसक वॉट्स ने लिखा:

मेरी जीभ अपनी प्रतिज्ञाएँ दोहराती है,

इस पवित्र घर को शान्ति मिले!”

क्योंकि यहाँ मेरे मित्र और परिवारजन रहते हैं। [1]

कलीसिया सिर्फ एक ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ आप आकर बैठ जाते हैं। यह एक देह है। यह आपका परिवार है। आपको अपनी कलीसिया की आवश्यकता है; और आपकी कलीसिया को आपकी आवश्यकता है। जितना अधिक आप अपनी कलीसिया के प्रति प्रतिबद्ध होंगे, उतना ही अधिक आप इससे आशीषित होंगे; क्योंकि हमारे जीवन में इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि परमेश्वर अपने लोगों को एक साथ लाता है, क्योंकि एकजुटता ही वह स्थान है जहाँ हम सबको होना चाहिए।

  1 कुरिन्थियों 12:12-27

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 37–39; मत्ती 27:1-26 ◊


[1] आइसक वॉट्स, “हाओ प्लीज़्ड ऐण्ड ब्लेस्ट वाज़ आई” (1719).

19 June : मनुष्याचे भय धरण्याचा अपराध

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19 June : मनुष्याचे भय धरण्याचा अपराध
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तेव्हां शौल शमुवेलाला म्हणाला, “मी पाप केलें आहे; मी परमेश्वराच्या आज्ञेचे व आपल्यां शब्दाचे उल्लंघन केलें आहे; कारण मी लोकांना भिऊन त्यांचे म्हणणें ऐकलें. (1 शमुवेल 15:24)

शौलानें देवाचे म्हणणें ऐकण्याऐवजी लोकांचे म्हणणें का ऐकलें? कारण त्याला देवाऐवजी लोकांची भीती होती. त्याला अवज्ञेच्या दैवीय परिणामांची जितकीं भीती होती त्यापेक्षा अधिक भीती आज्ञापालनानें पुढे मानवीय परिणाम काय होतील याची होती. देवाच्या नाराजीपेक्षा त्याला लोकांच्या नाराजीचे अधिक भय होते. आणि हा देवाचा फार मोठा अपमान आहे.

वस्तुतः, यशया म्हणतो कीं देवाच्या अभिवचनांकडें दुर्लक्ष करून मनुष्य काय करूं शकतो याची भीती धरणें एक प्रकारचा अहंकार आहे. तो ह्या मर्मभेदी प्रश्नानें देवाचे शब्द उद्धृत करतो: “तुमचे सांत्वन करणारा मी, केवळ मीच आहे; तू मर्त्य मनुष्याला, तृणवत मानवपुत्राला भितेस अशी तू कोण? परमेश्वर तुझा कर्ता, ह्याला तू का विसरलीस?” (यशया 51:12-13).

मनुष्याचे भय गर्वासारखे वाटत नसेल, पण देव म्हणतो कीं ते आहे, “तू  मनुष्याला, मानवपुत्राला भितेस अशी तू कोण! परमेश्वर तुझा कर्ता, ह्याला तू का विसरलीस?”

मुद्दा हा आहे : जर तुम्हीं मनुष्याचे भय धरता, तर तुम्हीं देवाच्या आणि त्याचा पुत्र, येशू याच्या पवित्रतेचा, त्याच्या मूल्याचा नाकार करणें सुरू केलें आहे. देव मनुष्यापेक्षा अतिशय बलवान आहे. तो अत्यंत बुद्धीमान आणि प्रतिफळ आणि आनंद यांनी अमर्यादपणें परिपूर्ण आहे.

मनुष्य काय करूं शकतो या भीतीनें त्याजकडें पाठमोरे होण्याचा अर्थ देव जे त्याचे भय बाळगतात त्यांच्यासाठीं जे अभिवचन देतो ते सर्व फेटाळून लावणें होय. हा मोठा अपमान आहे. आणि अशा अपमानामुळें देव प्रसन्न होऊ शकत नाहीं.

दुसरीकडें, जेव्हां आपण देवाची अभिवचनें ऐकतो आणि आमच्यां अविश्वासामुळें देवाची निंदा होईल या भीतीनें त्याच्यावर धैर्यानें विश्वास ठेवतो, तेव्हां त्याला खूप आदर मिळतो. आणि त्यात त्याला खूप खूप आनंद होतो.

18 जून : स्वयं के प्रति सही दृष्टिकोण रखना

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18 जून : स्वयं के प्रति सही दृष्टिकोण रखना
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“क्योंकि मैं उस अनुग्रह के कारण जो मुझ को मिला है, तुम में से हर एक से कहता हूँ कि जैसा समझना चाहिए उससे बढ़कर कोई भी अपने आप को न समझे; पर जैसा परमेश्‍वर ने हर एक को विश्‍वास परिमाण के अनुसार बाँट दिया है, वैसा ही सुबुद्धि के साथ अपने को समझे।” रोमियों 12:3

कोई भी व्यक्ति आत्म-प्रशंसा के पाप से बचा हुआ नहीं है। इसके प्रमाण के लिए बस किसी भी किंडरगार्टन क्लासरूम में चले जाइए। इस छोटे से समूह में, जल्दी ही कोई न कोई अपने सबसे ऊँचे ब्लॉक टावर बनाने या सबसे बेहतरीन पारिवारिक चित्र बनाने की बातें करने लगेगा—दूसरे शब्दों में, अपने आप को उससे अधिक समझना जितना वह वास्तव में है।

हमेशा दूसरों से अपनी तुलना करना एक सांसारिक सोच का तरीका है। अपने आप का अतिरंजित मूल्यांकन एक भयंकर समस्या है—यह दूसरों को नीचा दिखाता है और परमेश्वर के सामने हमारे स्थान को नजरअंदाज करता है। हालाँकि इसका उत्तर आत्म-अपमान में नहीं है, जो आत्म-प्रशंसा के विपरीत है और उसी के समान गलत भी है। यह आत्म-हीनता भी अहंकार का ही उत्पाद है, क्योंकि यह तुलना से उत्पन्न होती है। यह भी आत्म-केन्द्रित ही होती है।

मसीही लोगों का आत्म का दृष्टिकोण परमेश्वर द्वारा नवीनीकरण किए गए मन में आधारित होना चाहिए (रोमियों 12:2)। इस दृष्टिकोण के साथ, हम अपने मूल्य और पहचान को परमेश्वर की कृपा और अनुग्रह में पाते हैं। हमारा महत्त्व, पहचान, मूल्य, और भूमिका इस पर आधारित होते हैं कि परमेश्वर कौन है और उसने हमारे लिए क्या किया है, न कि इस पर कि हम कौन हैं या हमने उसके लिए क्या किया है।

हम इस सही दृष्टिकोण को उस समय याद करते हैं, जब हम इस गीत की ये पंक्तियाँ गाते हैं, “जब मैं अद्‌भुत क्रूस को देखता हूँ, जिस पर महिमा का राजकुमार मरा।”[1] क्रूस को देखने का अर्थ सुसमाचार पर ध्यान केन्द्रित करना है—इस सत्य पर कि कोई और हमारे स्थान पर मरा और हमारे दण्ड को सहा। ऐसा करते हुए हम समझ जाते हैं कि “मेरे सबसे बड़े लाभ को मैं हानि मानता हूँ, और अपने सारे घमण्ड का तिरस्कार करता हूँ।” क्रूस हमें एक साथ ऊँचा और नीचा करता है, और यह हमें जीवन में आगे बढ़ने के प्रयास करने की जरूरत से मुक्त करता है और हमें यह पहचानने में सक्षम बनाता है कि परमेश्वर ने हमें किस प्रकार के वरदान दिए हैं। हम “सुबुद्धि के साथ” अपना आत्म-मूल्यांकन करें।

इसलिए कलीसिया का दृष्टिकोण संसार से स्पष्ट रूप से अलग होना चाहिए कि हम अपने आप को और एक-दूसरे को कैसे देखते हैं। जब हम सुसमाचार से एकजुट होकर एक साथ आते हैं, तो हमारे अस्तित्व से सम्बन्धित बाकी सब कुछ, हालाँकि वह अप्रासंगिक नहीं है, अपने प्राथमिक महत्त्व को खो देता है, और हम अपने वरदानों का उपयोग अपनी प्रशंसा के लिए नहीं बल्कि दूसरों की सेवा के लिए करते हैं।

क्रूस को देखिए, जहाँ आपका उद्धारक आपके पापों के लिए लहूलुहान हुआ और मरा, क्योंकि वह आपसे प्रेम करता है। आपके पास गर्व करने के लिए कोई स्थान नहीं है। दूसरों से अपनी तुलना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, जो कुछ उसने आपको दिया है, उसका उपयोग आप दूसरों की निस्वार्थ, आनन्दमयी सेवा में कर सकते हैं।

  1 कुरिन्थियों 4:1-7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 34–36; मत्ती 26:47-75


[1] आइसक वॉट्स, “वैन आई सर्वे द वण्ड्रस क्रॉस” (1707).