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7 August : निर्मितीचा उद्देश्य

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7 August : निर्मितीचा उद्देश्य
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देवानें आपल्या प्रतिरूपाचा मनुष्य निर्माण केला; देवाचे प्रतिरूप असा तो निर्माण केला. नर व नारी अशी ती निर्माण केलीं. (उत्पत्ति 1:27)

देवानें मनुष्यांना यासाठीं आपल्या प्रतिरूपाचे निर्माण केलें कीं हे संपूर्ण जग देवाचे प्रतिबिंब दाखविणाऱ्या परिवर्तकांनी भरून जावें. म्हणजें देवाच्या प्रतिरूपांनी भरून जावें. देवाच्या सात अब्ज प्रतिरूपांनी भरून जावें. हेतू हा कीं कोणीही निर्मितीचा उद्देश्य पूर्ण करण्यांस चुकू नये.

कोणीही मनुष्य (जोपर्यंत काहींना पाषाणरूपी अंतकरणामुळें आंधळे करून सोडून दिलें जात नाहीं) मानव-अस्तित्वाचा उद्देश्य समजण्यांस चुकू शकत नाहीं, म्हणजें देव — त्याला ओळखणें, त्याजवर प्रीति करणें, व तो कसा आहे हे त्याच्या प्रतिरूपावरून दाखवून देणें. यशया 6:3 मध्यें देवाचे दूत जल्लोष करतांत, “पवित्र, पवित्र, पवित्र, सेनाधीश परमेश्वर! त्याच्या गौरवाने सर्व पृथ्वी भरून गेली आहे!” पृथ्वी अशा कोट्यवधी मनुष्यांनी भरलेली आहे ज्यांना देवाच्या प्रतिरूपाचा निर्माण करण्यांत आलें होते. गौरवाने सुशोभित.

पण फक्त मानवच नाहीं, तर निसर्गहि! आपल्या वास्तव्यासाठीं असे चित्तथरारक जग अस्तित्वांत का आहे? हे इतके अफाट विश्व कशासाठीं?

एकदा माझ्या असें वाचण्यांत आलें कीं मानवांनी जितके शब्द आजवर बोललें असतील त्यापेक्षा असंख्य तारे व ग्रह या विश्वात आहेत. इतके का आहेत? हे विश्व इतके अफाट का आहे? इतके तेजस्वी का आहे? आणि ते एकमेकांपासून इतक्या अकल्पनीय अंतरावर का आहेंत? बायबल याविषयी निर्विवादपणें स्पष्ट उत्तर देते: “आकाश देवाचा महिमा वर्णिते” (स्तोत्र 19:1).

जर कोणी असा प्रश्न विचारला कीं, “पृथ्वी हाच जर एकमेव लोकवस्ती असलेला ग्रह आहे आणि ताऱ्यांमध्यें केवळ मनुष्य हाच एकमेव बुद्धिमान प्राणी आहे, तर एवढे मोठे आणि रिकामे विश्व का?” उत्तर आहे: विषयवस्तु आपण स्वतः नाहीं. देव मुख्य विषयवस्तु आहे. यावर अधिक जोर देऊन भाष्य केलें जाऊ शकत नाहीं. तो सर्वांत गौरवी आहे. महापराक्रमी आहे. तो सर्वत्र आहे. सर्व आकाशगंगा एकत्रित करण्यांत आल्या तरी त्याचे तेज अद्वितीय आहे. कोणी एका ज्ञानी मनुष्यानें असे म्हटलें, कीं विश्व हे शेंगदाणासारखे आहे जे देव खिशात घेऊन फिरतो.

देवानें आपल्याला यासाठीं निर्माण केलें कीं आपण त्याला ओळखावें, त्याच्यावर प्रीति करावीं व त्याचे वैभव दाखवून द्यावें. मग त्यानें आपल्याला तो कसा आहे याविषयीचा संकेत दिला : म्हणजें हे विश्व.

6 अगस्त : महान विभाजन

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6 अगस्त : महान विभाजन
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“क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ; नहीं, वरन् अलग कराने आया हूँ।” लूका 12:51

क्या यीशु पृथ्वी पर शान्ति लाने आया था, जैसा कि स्वर्गदूतों ने पहले क्रिसमस पर गाया था (लूका 2:14)? या फिर वह विभाजन लाने आया था, जैसा कि वह स्वयं यहाँ घोषित करता है?

हाँ।

सबसे पहले, हमें इस स्पष्ट विरोधाभास को स्वीकार करना चाहिए। यीशु अपने ही प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है, “क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ; नहीं . . .” यह कथन न केवल स्वर्गदूतों की घोषणा से असंगत लगता है, बल्कि उसके अपने शिष्यों को शान्तिदूत बनने की दी गई शिक्षा (मत्ती 5:9) से भी टकराता प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि यीशु अपने पूरे सांसारिक सेवाकाल के बल देने वाले उद्देश्य का खण्डन कर रहा है, क्योंकि वह स्वयं को विभाजन और असहमति से जोड़ता है। तो फिर, हम यीशु के इन दोनों दावों—कि वे शान्ति भी लाएगा और विभाजन भी—को कैसे समझें?

जब यीशु ने कहा कि वह विभाजन लाने आया है, तो इसका सीधा सम्बन्ध उस कार्य से है जो उसने शान्ति स्थापित करने के लिए किया। दूसरे शब्दों में, जब हम इस शुभ सन्देश को समझते हैं कि “[परमेश्वर] ने उसे, जो पाप से अज्ञात था, हमारे लिए पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ” (2 कुरिन्थियों 5:21), तो हम फिर कभी पहले जैसे नहीं रह सकते। यह इतना महान कार्य है कि यह उदासीनता का कारण नहीं बन सकता।

जब हमारे हृदय का नवीनीकरण होता है, तो हमारे बारे में सब कुछ बदल जाता है—हमारे मूल्य, हमारा ध्यान, हमारा उद्देश्य, हमारे सपने सब बदल जाते हैं। अब हम अपने सृष्टिकर्ता के साथ मेल में हैं, और हम अपने आप से भी शान्ति में रह सकते हैं। लेकिन एक न एक दिन यह रूपान्तरण विभाजनकारी साबित होगा। जब हम परमेश्वर के साथ अपनी शान्ति के इस अद्‌भुत कार्य को साझा करते हैं, इसके बारे में बोलते हैं, और इसे अपने जीवन में जीते हैं, तो हमें उपेक्षा, विरोध, और न्याय का सामना करना पड़ेगा—कभी-कभी अपने ही घर के लोगों से, जैसा कि यीशु ने चेतावनी दी थी (लूका 12:52-53)।

यीशु का पृथ्वी पर शान्ति लाना वास्तव में उस गहरे विभाजन और संघर्ष को उजागर करता है, जो आदम और हव्वा के विद्रोह के बाद से सृष्टिकर्ता और उसके स्वरूपधारी प्राणियों के बीच मौजूद रहा है। आपके वचन और कार्य, जो इस संसार के तरीकों से नहीं बल्कि स्वर्गिक आज्ञाओं से निर्देशित होते हैं, उसी विभाजन को प्रकट करेंगे। हममें से कई लोगों के लिए मसीह में विश्वास करने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ यह विभाजन जीवन का एक कठिन और पीड़ादायक सत्य है।

फिर भी, हम सबके लिए एक महान आशा है: यीशु का अन्तिम उद्देश्य विभाजन नहीं बल्कि शान्ति है। बाइबल पूरी तरह स्पष्ट करती है कि “शान्ति का राजकुमार” (यशायाह 9:6) एक दिन अनन्त काल में राज्य करेगा। इस बीच किसी भ्रम में न रहें: यीशु का अनुसरण करने की एक कीमत है—एक ऐसी कीमत जिसे आप उसके आत्मा की शक्ति से आनन्दपूर्वक चुका सकते हैं, जब आप विभाजन का जोखिम उठाते हुए परमेश्वर की शान्ति के इस दिव्य प्रस्ताव को दूसरों तक पहुँचाते हैं।

प्रेरितों 17:1-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 70–71; प्रेरितों 25 ◊

6 August : येशूनें तुमची विश्वासाची चिकाटी विकत घेतलीं

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6 August : येशूनें तुमची विश्वासाची चिकाटी विकत घेतलीं
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“हा प्याला माझ्या रक्तात नवा करार आहे, जो तुमच्यासाठीं ओतला जात आहे.” (लूक 22:20)

या शास्त्रपाठाचा अर्थ असा कीं, नवा करार, ज्याचे अभिवचन यिर्मया 31 आणि 32 मध्यें अगदी स्पष्टपणें देण्यांत आलेंलें आहे, हा येशूच्या रक्ताने साध्य केला गेला व शिक्कामोर्तब केला गेला. नवा करार देवाच्या त्यां लोकांसाठीं खरा ठरतो जे मशीहा, म्हणजें ख्रिस्त येशूवर विश्वास ठेवतांत, कारण तो करार स्थापित करण्यासाठीं येशू मरण पावला.

आणि जें ख्रिस्ताचे आहेत त्यां सर्वांसाठीं हा नवा करार काय साध्य करतो? शेवटपर्यंत विश्वासात टिकून ठेवणारी चिकाटी.

यिर्मया 32:40 मध्यें काय म्हणतों, ऐका,

“आणि मी त्यांच्याशी सर्वकाळचा करार करीन; तो असा कीं मी त्यांचे हित करण्यापासून माघार घेणार नाहीं; मी आपलें भय त्यांच्या मनात उत्पन्न करीन, म्हणजें ते माझ्यापासून माघार घेणार नाहींत.”

सार्वकालिक करार — नवा करार — ह्यामध्यें हे अनुल्लंघनीय व अविनाशी अभिवचन समाविष्ट आहे, “मी आपलें भय त्यांच्या मनात उत्पन्न करीन, म्हणजें ते माझ्यापासून माघार घेणार नाहींत.” ते माघार घेऊं शकणार नाहींत. ते माघार घेणारहि नाहींत. ख्रिस्तानें आपल्या रक्ताने या करारावर शिक्कामोर्तब केलें. जर तुम्हीं विश्वासाद्वारे येशू ख्रिस्तामध्यें आहांत तर त्यानें तुमची विश्वासाची चिकाटी विकत घेतली आहे.

जर तुम्हीं आज विश्वासात टिकून आहांत तर त्याचे संपूर्ण श्रेय येशूच्या रक्ताला जाते. तुमचा विश्वास टिकवून ठेवण्यासाठीं तुमच्यामध्यें कार्यरत असलेला पवित्र आत्मा, येशूनें जे विकत घेतलें आहे त्याचा सर्वदा सन्मान करतो. देव जो पुत्र ह्याने आपल्यासाठीं जे साध्य केलें ते देव जो आत्मा हा आपल्यामध्यें तें घडवून आणतो. देव-पित्यानें ते योजिलें. येशूनें ते विकत घेतले. आत्मा ते लागू करतो – त्यांपैकीं प्रत्येक न चुकता.

देव रक्ताने विकत घेतलेल्या त्याच्या सर्व लेकरांची चिकाटी आणि सार्वकालिक सुरक्षा यांसाठीं पूर्णपणें वचनबद्ध आहे.

5 अगस्त : नष्ट और पुनः स्थापित

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5 अगस्त : नष्ट और पुनः स्थापित
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“तू ने यह क्या किया है?” उत्पत्ति 3:13

स्कॉटलैंड के हाइलैण्ड्स में कई ऐसे किले हैं, जो अब निर्जन और खण्डहर हो चुके हैं। शाम की सुनहरी रोशनी में यह पहचानना कठिन नहीं है कि कभी ये स्थान कितने भव्य महल रहे होंगे। भले ही अब उनमें न खिड़कियाँ बची हैं, न भव्य गलीचे, और न ही उनमें रहने वाले लोग, फिर भी इन प्राचीन संरचनाओं की भव्यता उनके पूर्व वैभव की गवाही देती है, भले ही अब वे नष्ट हो चुके हों।

यह संसार भी ऐसे ही नष्ट हुए वैभव से भरा है, क्योंकि यह संसार मनुष्यों से भरा है। आदम और हव्वा परमेश्वर की रचनात्मक कलाकृति की पराकाष्ठा थे, और परमेश्वर उनके साथ पूरी तरह सन्तुष्ट था। वे भलाई करने की प्रवृत्ति के साथ बनाए गए थे। लेकिन जब उन्होंने उस सिंहासन की लालसा की, जिस पर वे कभी बैठ ही नहीं सकते थे—परमेश्वर का सिंहासन—तो वे अपने स्थान और उन विशेषाधिकारों को खो बैठे जिनका आनन्द लेने के लिए वे सृजे गए थे।

सर्प ने हव्वा को बहकाने के लिए सबसे पहले परमेश्वर के वचन पर सन्देह उत्पन्न किया, बड़ी ही चतुराई से उसकी सत्यता को चुनौती दी—और वह फँस गई। उसने उस झूठ पर विश्वास कर लिया कि परमेश्वर भलाई करने के लिए भरोसेमन्द नहीं है। जब सन्देह का बीज बो दिया गया, तो सर्प ने उसे महत्वाकांक्षा से सींचा। एक बार जब हव्वा के मन में अनिश्चितता का सन्देह उत्पन्न हुआ, तो गर्व का आकर्षण उसके लिए असहनीय हो गया।

फल खाना केवल इस कारण गलत था, क्योंकि परमेश्वर ने उसे खाने से मना किया था। फिर भी, तत्काल सन्तुष्टि के अवसर ने आदम और हव्वा को ऐसा अंधा कर दिया कि वे अपने भविष्य के कार्यों के दर्दनाक परिणामों और उनके परिचित वैभव की बर्बादी को देख न सके। और, जैसे कि उनकी अवज्ञा ही पर्याप्त न थी, उन्होंने धोखे और अवज्ञा के बीच अपनी जिम्मेदारी को भी अस्वीकार कर दिया।

आदम और हव्वा की तरह हम भी यह मानने के लिए प्रवृत्त होते हैं कि अन्तिम सत्य का निर्णय करने वाले हम स्वयं हैं, न कि परमेश्वर। जब हम अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर को रास्ते से हटाने का निर्णय कर लेते हैं, जो एक सच्चा और अधिकारपूर्ण वचन बोलता है, तो हम उसे हमारी आज्ञाकारिता की माँग करने के अधिकार से वंचित कर देते हैं। लेकिन जब हम परमेश्वर के शासन को अस्वीकार कर देते हैं, तो हम अपने स्वयं के स्वामी नहीं बन जाते; बल्कि हम धोखे, अंधकार, निराशा और मृत्यु जैसे कई छोटे स्वामियों के अधीन हो जाते हैं।

“तू ने यह क्या किया?” (उत्पत्ति 3:13) हम सभी ने इस झूठ पर विश्वास किया है कि हमारी राह परमेश्वर की राह से बेहतर है। लेकिन परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजने की हद तक जाकर यह दिखाया कि हमारी कठोर विद्रोही प्रकृति उसकी उस करुणा से अभिभूत हो सकती है, जो “जीवन से भी उत्तम” है (भजन 63:3)। उसने अपने वचन का प्रकाश हमारे हृदयों में प्रकट किया है, जिससे हम उसकी महिमा को अब और अनन्त काल तक देख सकें और पुनः उसकी छवि में ढाले जाएँ तथा उस वैभव में पुनः स्थापित किए जाएँ, जिसे परमेश्वर ने सदा अपने स्वरूपधारी प्राणियों के लिए चाहा था। उसकी भलाई को देखना और उसके शासन के अधीन आना ही हमें धोखे, अंधकार, निराशा और यहाँ तक कि मृत्यु से भी स्वतन्त्र करता है।

उत्पत्ति 3

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 68– 69; प्रेरितों 24

5 August : “याव्हे” ला परिभाषित करणाऱ्या 10 गोष्टी

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5 August : “याव्हे” ला परिभाषित करणाऱ्या 10 गोष्टी
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आणखी देवानें मोशेला सांगितले, “तू इस्राएल लोकांना सांग, तुमच्या पूर्वजांचा देव, अब्राहामाचा देव, इसहाकाचा देव व याकोबाचा देव परमेश्वर ह्याने मला तुमच्याकडें पाठवले आहे; हेच माझे सनातन नाव आहे व ह्याच नावाने पिढ्यानपिढ्या माझे स्मरण होईल..” (निर्गम 3:15)

इंग्रजी बायबलमध्यें देवाचे हिब्रू मधील नाव जवळजवळ नेहमीच लॉर्ड (LORD) असे भाषांतरित केलें जाते. पण हिब्रूचा उच्चार “याव्हे” असा आहे आणि त्याचे मूळ “मी आहे” ही अभिव्यक्ती आहे.

म्हणून जेव्हां जेव्हां आपण यहोवा किंवा याव्हे हा शब्द ऐकतो किंवा इंग्रजी बायबलमध्यें जेव्हां जेव्हां आपण LORD हा शब्द पाहतो त्यां प्रत्येक वेळी आपण हे लक्षांत ठेवावें : हे एक विशेषनाम आहे (जसे कीं पेत्रस किंवा योहान) जो “मी आहे” या अभिव्यक्तीपासून बनलेला आहे आणि हे विशेषनाम (संज्ञा) प्रत्येक वेळी आपल्याला याची आठवण करून देते कीं देव हांच अंतीम व परम आहे.

“मी आहे” हे विशेषनाम (संज्ञा) देवाविषयी किमान 10 गोष्टींची अभिव्यक्ती करते :

1. त्याला कधीही प्रारंभ नव्हता. जवळजवळ सर्वच मुले आपल्या आई-वडिलांना हा प्रश्न विचारतांत, “देवाला कोणी बनवले?” आणि प्रत्येक सुजाण आई-वडील उत्तर देतांत, “देवाला कोणीहि बनवले नाहीं. देव फक्त आहे, तो सर्वदा होता, त्याचा कधीही आरंभ झाला नव्हता.”

2. देवाचा कधीही अंत होणार नाहीं. त्याला जर आरंभ नव्हताच तर त्याला अंत देखील नसणार, कारण तो आहे.

3. देव हे अद्वितीय वास्तव आहे. त्याच्याबरोबरीचा दुसरा असा वास्तव कोणी नाहीं. त्याच्या बाहेर कोणतेही वास्तव अस्तित्वात नाहीं जोपर्यंत तो स्वतः ते अस्तित्वांत आणू इच्छित नाहीं व त्याची निर्मिती करित नाहीं. सनातन काळापासून तोच आहे. अंतरीक्ष नव्हते, विश्व नव्हते, शून्यता नव्हती. फक्त देव.

4. देव पूर्णपणें स्वतंत्र आहे. त्याला अस्तित्वात आणण्यासाठीं किंवा त्याला पाठिंबा देण्यासाठीं किंवा त्याला सल्ला-मसलत देण्यासाठीं किंवा तो जो आहे असे त्याला बनवण्यासाठीं तो कशावरही अवलंबून नाहीं.

5. जे काहीं देव नाहीं ते सर्व पूर्णपणें देवावर अवलंबून आहे. संपूर्ण विश्व हे पूर्णपणें निर्माण केलेंलें असे दुय्यम दर्जाचे अस्तित्व आहे. ते देवानें अस्तित्वात आणलें व आपलें अस्तित्व कायम ठेवण्यासाठीं ते क्षणोक्षणी देवाच्या निर्णयावर अवलंबून राहते.

6. देवाबरोबर जर तुलना केलीं तर संपूर्ण विश्व हे काहींच नाहीं. ज्याप्रमाणें सावली ही वस्तूमुळें अस्तित्वात येते त्याप्रमाणें प्रत्येक संभाव्य व अवलंबून असलेलें वास्तव हे परम व स्वतंत्र वास्तवामुळें अस्तित्वांत येते. ज्याप्रमाणें प्रतिध्वनी ही गडगडाटामुळें आहे अगदी त्याप्रमाणें. जगात आणि आकाशगंगांमध्यें जे काहीं आहे व जें पाहून आपण आश्चर्यचकित होतो, ते सर्व देवाच्या तुलनेत काहींच नाहीं.

7. देव स्थिर आहे. तो काल, आज आणि सर्वकाळ सारखाच आहे. त्याचा विकास होत नाहीं. तो पुढे वाढत जाऊन वेगळं काहीं बनत नाहीं. तो जो आहे तो आहे.

8. देव सत्य आणि चांगुलपणा आणि सौंदर्य यांचा परिपूर्ण मानक व परिभाषक आहे. असे कोणतेही कायद्याचे पुस्तक नाहीं जें वाचून तो योग्य काय आहे हे जाणून घेतो. सत्याची स्थापना करण्यासाठीं त्याजकडें कोणतीही गुरुकिल्ली नाहीं. उत्तम काय होईल किंवा योग्य काय होईल हे ठरवण्यासाठीं त्याच्याकडें कोणतीही समिती नाहीं. काय बरोबर आहे, काय सत्य आहे, काय सुंदर आहे हे सर्व तो स्वतः ठरवतो, आणि तोच त्यां सर्वांचा परिभाषक आहे.

9. देवाच्या इच्छेस जे येते तेच तो करतो आणि ते नेहमीच बरोबर, नेहमीच सुंदर व नेहमी सत्यनुरूप असते. त्याच्या बाहेर असलेली सर्व वास्तविकता त्यानें तयार केलीं आणि घडवली, आणि परम व अंतीम सत्य म्हणून तोच त्यावर सार्वभौम आहे. म्हणून तो आपल्या सुइच्छेच्या संकल्पानुसार नसलेली कोणतीही गोष्ट अस्तित्वांत आणण्याच्या प्रत्येक बंधनांपासून पूर्णपणें मुक्त आहे.

10. देव हा विश्वातील सर्वात महत्वाचे आणि सर्वात मौल्यवान सत्य आणि व्यक्ती आहे. तो इतर सर्व वास्तविकतेच्या तुलनेंत आपल्या स्वारस्य आणि केंद्र आणि प्रशंसा आणि आनंद यांस अधिक पात्र आहे, संपूर्ण विश्वाच्या तुलनेंत देखील.

4 अगस्त : कोई आदर्श स्थान नहीं

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4 अगस्त : कोई आदर्श स्थान नहीं
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“मैं मकिदुनिया होकर तुम्हारे पास आऊँगा, क्योंकि मुझे मकिदुनिया होकर जाना ही है। परन्तु सम्भव है कि तुम्हारे यहाँ ही ठहर जाऊँ और शरद ऋतु तुम्हारे यहाँ काटूँ, तब जिस ओर मेरा जाना हो उस ओर तुम मुझे पहुँचा देना . . . परन्तु मैं पिन्तेकुस्त तक इफिसुस में रहूँगा, क्योंकि मेरे लिए वहाँ एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है, और विरोधी बहुत से हैं।” 1 कुरिन्थियों 16:5-6, 8-9

प्रेरित पौलुस की प्रशंसा करने के कई कारण हैं, लेकिन यहाँ एक ऐसा कारण है जिसे कम ही उल्लेख किया जाता है: वह हमेशा आगे की योजना बनाता था। वह किसी भी क्षेत्र में निष्क्रिय नहीं रहता था। वह एक सेनापति की तरह था, जो युद्ध मुख्यालय में मानचित्र का अध्ययन करते हुए कहता, “अब हम आगे कहाँ बढ़ सकते हैं? अगली टुकड़ी को कहाँ भेजा जा सकता है? शत्रु को कहाँ खोजा जा सकता है?” अपने धर्मी उद्देश्य के कारण वह कहीं भी अधिक समय तक आराम से नहीं रहा।

पौलुस से हम यह सीख सकते हैं कि परमेश्वर की सेवा के लिए कोई आदर्श स्थान नहीं है, लेकिन हम जहाँ भी हों, वहीं उसकी सेवा कर सकते हैं। उसने अपने पत्रों में इफिसुस, मकिदुनिया और कुरिन्थुस जैसे विभिन्न स्थानों में सेवा करने का उल्लेख किया है—लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति चाहे जो भी रही हो, उसने यह समझ लिया था कि उसे बस अविश्वासियों को सुसमाचार सुनाना था और विश्वासियों को प्रोत्साहित करना था। वह अपने बुलावे को जानता था कि जब एक स्थान पर उसकी सेवा पूरी हो जाती, तो उसे अगले स्थान पर आगे बढ़ जाना था।

पौलुस आराम या सुविधा की चिन्ता नहीं करता था। उसने कभी नहीं चाहा की कि व एड्रियाटिक सागर के किनारे एक छोटे से कुटीर में शान्तिपूर्वक सेवानिवृत्त हो जाए। यहाँ तक कि जब वह कह सकता था कि “मेरे लिए वहाँ एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है,” तब भी उसने स्वीकार किया कि उसके “विरोधी बहुत से हैं।” उसने चुनौतियों को स्वीकार किया और विरोध को एक बाधा के बजाय एक महान विशेषाधिकार माना।

हम में से बहुत से लोग यह मानने के लिए प्रेरित किए गए हैं कि यदि हम परमेश्वर के साथ संगति में हैं और यदि हम वास्तव में वहीं हैं जहाँ हमें होना चाहिए, तो जीवन सुचारू रूप से चलेगा। यह विचार भले ही लोकप्रिय हो, लेकिन बाइबल के अनुसार यह सही नहीं है। क्या हम वास्तव में सोचते हैं कि हम शैतान का सामना कर पाएँगे और उसके जलते हुए तीर हम तक नहीं पहुँचेंगे? क्या हम सोचते हैं कि हम शत्रु के क्षेत्र में प्रवेश करेंगे और हमारा कोई विरोध नहीं होगा? हमें ऐसे लोग बनने के लिए नहीं बुलाया गया है, जो आरामदायक और सुविधाजनक मसीही समुदायों में सन्तोषपूर्वक रहते हैं, जहाँ कोई विरोध न हो। यह सम्भव है कि हमारी गवाही इतनी कमजोर हो जाए कि हम मसीह के लिए प्रभावहीन हो जाएँ, लेकिन ऐसा होना आवश्यक नहीं है, और न ही ऐसा होना चाहिए।

आज भी हमारे चारों ओर वही परिस्थितियाँ हैं, जिनका सामना पौलुस ने किया था: मूर्तिपूजा, यौन अनैतिकता, नस्लवाद, धार्मिक कट्टरता, और अन्य अनेक बुराइयाँ। परमेश्वर ने चाहे आपको जहाँ भी रखा हो, वहीं आपके पास उसके राज्य की सेवा करने का अवसर है, भले ही आपको विरोध का सामना क्यों न करना पड़े। मेरे प्रिय मित्र एरिक अलेक्ज़ेण्डर ने एक बार मुझसे कहा था, “परमेश्वर की सेवा करने के लिए कोई आदर्श स्थान नहीं है—सिवाय वहाँ के जहाँ उसने तुम्हें रखा है!”

रोमियों 15:17-33

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 66– 67; प्रेरितों 23:16-35 ◊

4 August : देवाच्या विश्वासूपणा इतकेंच सुरक्षित

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4 August : देवाच्या विश्वासूपणा इतकेंच सुरक्षित
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ज्यांना त्यानें आगाऊ नेमून ठेवले त्यांना त्यानें पाचारणही केलें. ज्यांना त्यानें पाचारण केलें त्यांना त्यानें नीतिमानही ठरवले; आणि ज्यांना त्यानें नीतिमान ठरवले त्यांचा त्यानें गौरवही केला. (रोमकरांस 8:30)

देवानें ज्यांना सनातनकाळांत आगाऊ नेमून ठेवले आणि जेव्हां देव येणाऱ्या अनंतकाळांत ज्यांचे गौरव करील या दरम्यान कोणीही गमावला जाणार नाहीं.

जो कोणी देवाची संतती होण्यासाठीं आगाऊ नेमून ठेवण्यांत आलेंला आहे तो त्यासाठींच्या पाचारणांस मुकणार नाहीं. आणि ज्या कोणाला पाचारण केलें जाते तो नीतिमान ठरविल्यावांचून राहणार नाहीं, आणि जो कोणी नीतिमान ठरविला जातो त्याचे गौरव झाल्यावांचून राहणार नाहीं. ही देवाचा आपल्या कराराशी असलेल्या विश्वासूपणाची अतूट पोलादी साखळी आहे.

यास्तव पौल म्हणतो,

ज्याने तुमच्या ठायीं चांगले काम आरंभले तो ते येशू ख्रिस्ताच्या दिवसापर्यंत सिद्धीस नेईल हा मला भरवसा आहे. (फिलिप्पै 1:6)

आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या दिवशी तुम्हीं निर्दोष ठरावे म्हणून तोच शेवटपर्यंत तुम्हांला दृढ राखील. ज्याने स्वपुत्र येशू ख्रिस्त आपला प्रभू ह्याच्या सहभागीपणात तुम्हांला बोलावले तो देव विश्वसनीय आहे. (1 करिंथ 1:8-9)

ही आपल्या देवाची अभिवचने आहेत ज्याला खोटे बोलणें अशक्य आहे. ज्यांचा नव्याने जन्म होतो ते सर्व तितकेंच सुरक्षित आहेंत जितका कीं देवाचा विश्वासूपणा.

3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य

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3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य
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“जो सिंहासन पर बैठा था, उसने कहा, ‘देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूँ!’” प्रकाशितवाक्य 21:5

हर कोई हमेशा जानना चाहता है कि कहानी का अन्त कैसे होता है। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक हमें अन्तिम पृष्ठ पर झाँकने का अवसर देती है, ताकि हम इतिहास के अन्त की ओर अधिक विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द के साथ बढ़ सकें।

पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट रूप से दिखाता है कि पूरा मानव इतिहास एक अन्तिम लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है; परमेश्वर ने मनुष्य को यह जानने के लिए बनाया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ अस्तित्व में है। वास्तव में, उसने हमारे मन में अनादि-अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है (सभोपदेशक 3:11)।

हर धर्म और विचारधारा इतिहास को समझने का प्रयास करती है। उदाहरण के लिए, हिन्दू धर्म सिखाता है कि हम जिस वास्तविकता में हैं, वह किसी गन्तव्य की ओर नहीं बढ़ रही है, बल्कि वास्तव में चक्रों में घूम रही है—अर्थात इतिहास चक्रीय है। नास्तिक प्रकृतिवाद तर्क देता है कि इतिहास की कोई पद्धति नहीं है, कोई उद्देश्य या अन्तिम लक्ष्य नहीं है; इतिहास केवल परमाणुओं के पुनः संयोजन की कहानी है (और हम भी उसी का हिस्सा हैं)। लेकिन मसीही लोग मानते हैं कि बाइबल इतिहास को रैखिक रूप में प्रस्तुत करती है: इसका एक प्रारम्भिक बिन्दु था, इसका एक समापन बिन्दु होगा, और यह एक उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। मसीह का जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और वापसी पूरे मानव इतिहास की केन्द्रीय विषयवस्तु है। इसलिए पूरी मानवजाति की कहानी को इसी ढांचे के भीतर देखा जाना चाहिए। यीशु वापिस आएगा; वह परमेश्वर की अनन्त उद्धार योजना को पूरा करेगा और उसके सिद्ध राज्य को स्थापित करेगा। वह सब कुछ नया और सिद्ध बना देगा।

यीशु जो सिद्ध राज्य लेकर आएगा, वह क्या है? यह एक ऐसा राज्य है, जिसका केन्द्र उसका क्रूस है। यह एक ऐसा राज्य है, जो हृदयों और जीवनों को बदलता है, और इसके नागरिक यीशु को राजा मानकर उसे दण्डवत करते हैं। यह प्रेम और न्याय, करुणा और शान्ति का राज्य है। यह राज्य बढ़ रहा है और पृथ्वी के छोर तक फैल रहा है—और निर्धारित समय पर, जो हमारे लिए अज्ञात है, परमेश्वर पिता अपने पुत्र को राष्ट्रों को उसकी विरासत के रूप में देगा (भजन 2:8)।

यहाँ तक कि अभी भी, परमेश्वर अपनी सम्प्रभु योजना और अपनी इच्छा के रहस्य को पूरा कर रहा है। जब यूहन्ना अन्त समय के बारे में लिखता है, तो वह हमें याद दिलाता है कि “उद्धार के लिए हमारे परमेश्वर का . . . जय–जयकार हो” (प्रकाशितवाक्य 7:10)। यदि उद्धार किसी और के हाथ में होता या इसे भाग्य पर छोड़ दिया जाता, तो परमेश्वर की योजना पूरी नहीं हो सकती थी। लेकिन वह इतिहास का रचयिता और भविष्य का शासक है। उसने अपनी प्रजा को बचाने का निश्चय किया है, और वह इसे पूरा करेगा। एक दिन हम उसे यह कहते हुए सुनेंगे, “ये बातें पूरी हो गई हैं” (प्रकाशितवाक्य 21:6)।

परमेश्वर ने यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा हमारे उद्धार का कार्य प्रारम्भ कर दिया है, और एक दिन वह सभी चीज़ों को एक ही प्रधान—यीशु—के अधीन कर देगा। इसलिए यदि हम मसीह के साथ जुड़े हुए हैं, तो हम “जयवन्त से भी बढ़कर हैं” (रोमियों 8:37) और पुत्र के साथ अनन्तकाल तक राज्य करने के लिए सक्षम हैं। हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द! क्योंकि भले ही हम नहीं जानते कि हमारे जीवन में आगे क्या होगा, लेकिन हम यह अवश्य जानते हैं कि कहानी का अन्त कैसा होगा—और हमारी अनन्तता कैसे प्रारम्भ होगी। इसलिए हम उत्सुकता से यह प्रार्थना करते हैं, “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है . . . तेरा राज्य आए” (मत्ती 6:9-10)।

यशायाह 60

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 63– 65; प्रेरितों 23:1-15

3 August : तुमच्या शरीराचा हेतू

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3 August : तुमच्या शरीराचा हेतू
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कारण तुम्हीं मोलाने विकत घेतलेले आहात; म्हणून तुम्हीं आपलें शरीर [व आत्मा] जी देवाची आहेत त्याद्वारे देवाचा गौरव करा. (1 करिंथ 6:20)

देवानें या भौतिक विश्वाची निर्मिती अविचाराने केलीं नाहीं. त्यामागे त्याचा उद्देश होता, तो म्हणजें, असे निरनिराळे निमित्त उदयांस आणणें जेणेंकरून त्याचा महिमा वाढावा आणि तो अधिक तेजस्वीपणें प्रकट केला जावा. “आकाश देवाचा महिमा वर्णिते; अंतरिक्ष त्याची हस्तकृती दर्शवते” (स्तोत्र 19:1).

देवानें याच कारणासाठीं निर्माण केलेंल्या इतर सर्व भौतिक गोष्टींच्या त्याच श्रेणीत आपली शरीरे देखील सुसंगतपणें बसतांत. मानव प्राणी व मानव शरीर यांद्वारे स्वतःचा गौरव करून घेण्याच्या मूळ आपल्या उद्देशापासून तो माघार घेणार नाहीं.

देव आपल्या कुजलेल्या, पापाने डागाळलेल्या शरीराला पुनरुत्थान पावलेले शरीर बनविण्यासाठीं, जेणेंकरून त्या शरीराने गौरव आणि अमरत्व धारण करावे, तो त्याचे हात घाण करणारे कष्ट का घेतो? उत्तर : कारण त्याच्या पुत्राने मृत्यूची खंडणी दिली जेणेंकरून या भौतिक विश्वासाठीं त्याच्या पित्याचा उद्देश पूर्णतेस जावा, तो म्हणजें, त्यां भौतिक वस्तूंमध्यें ज्यांत आपली शरीरेही आहेत, अनंतकाळासाठीं त्याचा महिमा व्हावा.

यास्तव आपला शास्त्रलेख असे म्हणतो : “कारण तुम्हीं मोलाने विकत घेतलेले आहात [म्हणजें, त्याच्या पुत्राच्या मरणाद्वारे]. म्हणून तुम्हीं आपलें शरीर [व आत्मा] जी देवाची आहेत त्याद्वारे देवाचा गौरव करा.” देव त्याच्या पुत्राने जें केलें त्याकडें दुर्लक्ष करणार नाहीं वा अनादर करणार नाहीं. आपली शरीरे मेलेल्यांतून उठवून देव त्याच्या पुत्राच्या कार्याचा गौरव करेल आणि आपण आपल्या शरीराचा उपयोग सर्वकाळ त्याचे गौरव करण्यासाठीं करू.

म्हणूनच आता तुम्हांला शरीर आहे. आणि म्हणूनच ते ख्रिस्ताच्या गौरवी शरीराचे स्वरूप धारण करण्यासाठीं पुन्हा उठविले जाईल.

2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना

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2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना
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“दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इससे लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ, और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने–अपने मन में प्रभु के सामने गाते और कीर्तन करते रहो।” इफिसियों 5:18-19

जीवन के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सब कुछ एक साथ होता हुआ प्रतीत होता है, जैसे किसी बच्चे का जन्म या किसी नए देश में स्थानान्तरण। मसीह में नया जीवन प्रारम्भ करना शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब हम यीशु पर विश्वास करते हैं, तो एक साथ कई परिवर्तन होते हैं: हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, हम परमेश्वर के परिवार में गोद लिए जाते हैं, हमें उसके पुत्र और पुत्रियों के रूप में एक नई पहचान दी जाती है, और—जैसा कि इस वचन में दर्शाया गया है—हमारे भीतर पवित्र आत्मा का वास होता है।

जब कोई यीशु पर विश्वास करता है, तो पवित्र आत्मा उसमें वास करने लगता है, उसे वह इच्छा और सामर्थ्य प्रदान करता है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए आवश्यक है। आत्मा की यह परिपूर्णता मसीही अनुभव का मूलभूत सत्य है। यह हर उस व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, जो मसीह पर विश्वास करता है। फिर भी, सच्चाई यह है कि विश्वासियों के रूप में हम हमेशा परमेश्वर के आत्मा की परिपूर्णता में नहीं जीते। यह सम्भव है कि हमारी अवज्ञा के कारण हम हमारे भीतर रहने वाले आत्मा को दुखी कर देते हैं (इफिसियों 4:30)। यह भी सम्भव है कि हम उससे अधिक किसी अन्य चीज़ के प्रभाव में अधिक आ जाएँ—यही कारण है कि पौलुस यहाँ यह स्पष्ट करता है कि हम एक साथ शराब और आत्मा दोनों के प्रभाव में नहीं रह सकते।

हमें यह समझना होगा कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो हम कभी भी उसके पितृत्व से बाहर नहीं आ सकते; लेकिन अवज्ञा में जीने से हम उसके पितृ-संरक्षण, उपस्थिति और आनन्द से वंचित हो सकते हैं। जो बच्चा अपने माता-पिता की पूरी तरह अवहेलना करता है, वह भले ही नाश्ते की मेज़ पर बैठा हो, तब भी वह जानता है कि वे अभी भी उसके माता-पिता हैं और वह अभी भी उनका बेटा है, लेकिन ऐसा होने पर भी उसके इस रिश्ते का आनन्द कम हो जाएगा। हमारे साथ भी यही होता है: हम अवज्ञा में नहीं जी सकते—ऐसा नहीं हो सकता कि एक ओर तो हम अपने जीवन में किसी अन्य प्राथमिकता, विचार या पदार्थ को अपना मार्गदर्शक बना लें और दूसरी ओर हम आत्मा की परिपूर्णता में भी जीएँ।

यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे हम स्वयं हल कर सकते हैं। हम खुद को पवित्र आत्मा से नहीं भर सकते। हम केवल परमेश्वर से पवित्र आत्मा की परिपूर्णता को ही प्राप्त नहीं करते, बल्कि उसका आनन्द भी उसी के द्वारा सम्भव होता है। हम स्वयं को नहीं भर सकते, लेकिन हमें स्वयं को भरे जाने के लिए तैयार और खुले अवश्य रखना चाहिए। हर मसीही जीवन की अपेक्षा यही है कि यह आत्मा से भरे होने का प्रमाण—जिसे पौलुस “आत्मा का फल” (गलातियों 5:22) कहता है—धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हो।

आपके जीवन की और हर एकत्रित कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम सब आत्मा से भरे जाएँ—कि हम किसी और चीज़ के बजाय उसके द्वारा निर्देशित हों। यही सच्चे रूपान्तरण, आनन्द, शान्ति और प्रेम को लाता है। यही हमें प्रेरित करता है कि हम न केवल अपने ओठों से, बल्कि अपने हृदय में भी मसीह की स्तुति के गीत गाएँ। इसलिए प्रार्थना करें कि वह आपको नए सिरे से भर दे:

हे पवित्र आत्मा, मेरे हृदय पर उतर,

इसे संसार से अलग कर, इसकी हर धड़कन में प्रवाहित हो;

मेरी निर्बलता के बावजूद, तू शक्तिशाली है,

मुझे वैसा प्रेम करना सिखा, जैसा मुझे करना चाहिए।[1]

  यहेजकेल 11:14-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 60– 62; प्रेरितों 22 ◊


[1] जॉर्ज क्रोली, “स्पिरिट ऑफ गॉड, डिसेण्ड अपोन माई हार्ट” (1854).