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3 July : सुवार्ता : देव आनंदी झाला आहे

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3 July : सुवार्ता : देव आनंदी झाला आहे
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धन्यवादित देवाच्या गौरवाची जी सुवार्ता… (1 तीमथ्य 1:11)

1 तीमथ्यमधील हा एक सुंदर वाक्प्रचार आहे, जो पवित्र शास्त्राच्या काहीं शब्दांच्या अतिशय परिचित पृष्ठभागाखाली लपलेला आहे. पण तो शोधून काढल्यानंतर, तो असा वाटतो: “आनंदी देवाच्या गौरवाची सुवार्ता.” मूळांत, “धन्यवादित” या शब्दाचा अर्थ “प्रशंसा प्राप्त” असा नाहीं, तर “आनंदी” असा आहे.

देवाच्या गौरवाचा एक मोठा भाग त्याचा आनंद आहे.

देवाला असीम आनंद होऊं शकत नाहीं आणि तरीही तो पूर्णतः गौरवी असू शकतो ही गोष्ट प्रेषित पौलाला अकल्पनीय होती. अमर्यादपणें गौरवशाली असणें म्हणजें अमर्यादपणें आनंदी असणें. त्यानें “धन्यवादित देवाचा गौरव” या वाक्प्रचाराचा उपयोग केला कारण तो ज्यां प्रकारे आनंदी आहे तसा आनंदी असणें ही देवासाठीं गौरवशाली गोष्ट आहे.

देवाचे गौरव बहुतांशी या तथ्यात समाविष्ट आहे कीं तो आमच्या कल्पनेपलीकडें आनंदी आहे. जसे अठराव्या शतकातील महान सुवार्तिक, जोनाथन एडवर्ड्स यांनी म्हटले, “देवाच्या परिपूर्णतेचा भाग जो तो कळवितो तो आहे त्याचा आनंद. या आनंदात स्वतःमध्यें आनंद अनुभव करणें आणि आनंद साजरा करणें समाविष्ट आहे; जीवितांचा आनंद सुद्धा असाच असतो.”

आणि हा सुवार्तेचा मुख्य भाग आहे, पौल म्हणतो: “धन्यवादित देवाच्या गौरवाची जी सुवार्ता.” ही सुवार्ता किंवा आनंदाची बातमी आहे कीं देव गौरवीरित्या आनंदी आहे. कोणीही उदासवाण्या, दुःखी देवासोबत अनंतकाळ घालवू इच्छिणार नाहीं.

जर देव दुःखी असेल, तर सुवार्तेचे हे ध्येय – देवासोबत सदाकाळ राहणें – आनंदी ध्येय नाहीं, आणि याचा अर्थ असा आहे कीं ती सुवार्ता मुळीच असणार नाहीं. पण, वस्तुतः, येशू आम्हांला आनंदी देवासोबत अनंतकाळ घालवण्यास पाचारण करतो जेव्हा तो म्हणतो, “तू आपल्या धन्याच्या आनंदात सहभागी हो” (मत्तय 25:23).

येशूनें योहान 15:11 मध्यें म्हटले, “माझा आनंद तुमच्यामध्यें असावा व तुमचा आनंद परिपूर्ण व्हावा म्हणून मी तुम्हांला ह्या गोष्टी सांगितल्या आहेत.” येशू बोलला, आणि जगला, आणि मरण पावला यासाठीं कीं त्याचा आनंद – देवाचा आनंद – आमच्याठायीं असावा आणि आमचा आनंद परिपूर्ण व्हावा. म्हणून, सुवार्ता ही “धन्यवादित (आनंदी) देवाच्या गौरवाची सुवार्ता” आहे.

2 जुलाई : विश्वास की विरासत

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2 जुलाई : विश्वास की विरासत
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“अब विश्‍वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। क्योंकि इसी के विषय में प्राचीनों की अच्छी गवाही दी गई।” इब्रानियों 11:1-2

विश्वास कैसा दिखता है? इब्रानियों का लेखक अपनी पत्री के ग्यारहवें अध्याय में इस प्रश्न को सम्बोधित करते हुए हमें पुराने समय के संतों की एक सूची प्रस्तुत करता है—जो ऐसे पुरुष और महिलाएँ थे, जिन्हें उनके विश्वास के कारण सराहा गया। बाइबल में दर्ज प्रशंसा का यह विवरण इन व्यक्तियों को किसी महाशक्तिशाली स्तर पर उठाने के लिए नहीं है। इसके विपरीत, हमें नूह, मूसा और अन्य लोगों को सामान्य मनुष्यों के रूप में देखना चाहिए, जिनसे हम यह प्रेरणा और बल प्राप्त कर सकते हैं कि परमेश्वर ने उनकी सहायता कैसे की और उनके विश्वास का सम्मान कैसे किया।

यदि हम उनके जीवन्त और क्रियाशील विश्वास का अनुसरण करना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि उनका विश्वास क्या नहीं था। यह कोई भावनात्मक या परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाली गर्मजोशी भरी भावना नहीं थी, और न ही यह एक अस्पष्ट धारणा थी कि अन्त में सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। नहीं, इन पुरुषों और महिलाओं के लिए विश्वास का अर्थ था—परमेश्वर ने जो कहा है, उस पर विश्वास करना, उसके वचन को स्वीकार करना और फिर अपने जीवन को उसी के अनुसार संचालित करना। दूसरे शब्दों में, जैसा कि इन वचनों में लिखा है, उनका विश्वास यह सुनिश्चित करने वाली दृढ़ निष्ठा थी कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ निश्चित रूप से पूरी होंगी।

इसके अतिरिक्त, पुराने समय के इन संतों ने अपने भविष्य की वास्तविकता को ऐसे देखा, मानो वह वर्तमान में ही घट रही हो, और जो अदृश्य था उसे उन्होंने ऐसे देखा, मानो वह सब अपनी आँखों से देख रहे हों। भले ही उन्होंने अपने जीवनकाल में परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा होते न देखा हो, फिर भी उन्होंने अनन्तकाल के दृष्टिकोण से उसके वचन की विश्वासयोग्यता पर भरोसा किया। उनका विश्वास उनकी वर्तमान परिस्थितियों पर आधारित नहीं था, बल्कि उस पर आधारित था जिसने उनके भविष्य के लिए प्रतिज्ञाएँ दी थीं।

अपने विश्वास को इतने स्पष्ट रूप से जीकर, इन संतों ने अपने समय में एक क्रान्तिकारी प्रभाव डाला—और हम भी अपने समय में ऐसा ही कर सकते हैं। जब कोई व्यक्ति, दम्पत्ति, परिवार, या कलीसिया परमेश्वर के वचन पर विश्वास करके उसके अनुसार कार्य करने के लिए तैयार होता है, तो जीवन बदल जाते हैं। यदि हम ऐसा करेंगे, तो हम परमेश्वर को और अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाएँगे, उसके कार्यों को पहचानेंगे और इस संसार में तथा अनन्तकाल के लिए प्रभाव डालने के लिए बेहतर रूप से तैयार होंगे।

इब्रानियों 11 में प्रस्तुत सभी संतों के जीवन की एक विशेष समानता थी, एक ऐसा गुण जो उन्हें इन विशिष्ट लोगों की सूची में ले आया, वह जीवित परमेश्वर पर उनका विश्वास था—ऐसा आश्वासन कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ उनकी आशाओं के बोझ को उठा सकती थीं और ऐसी कायलता कि परमेश्वर ने जो कहा था, वह इतना वास्तविक था कि मानो वे उसे अपनी आँखों से देख सकते थे। क्या आपका विश्वास भी ऐसा ही है? मसीह में परमेश्वर की उन सभी प्रतिज्ञाओं पर ध्यान करें जो आपकी हैं। इतिहास में परमेश्वर द्वारा पूरी की गई सभी प्रतिज्ञाओं पर मनन करें, विशेष रूप से उसके पुत्र की मृत्यु और पुनरुत्थान पर मनन करें। तब आप आनन्द और दृढ़ संकल्प के साथ अपने जीवन की प्राथमिकताएँ निर्धारित कर सकेंगे और अपने निर्णय अपनी परिस्थितियों के आधार पर लेने के बजाय उसकी प्रतिज्ञाओं के आधार पर लेंगे।

इब्रानियों 11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 16–18; प्रेरितों 4:23-37

2 July : तुम्हांला देवाची किती चांगल्याप्रकारे ओळख आहे?

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2 July : तुम्हांला देवाची किती चांगल्याप्रकारे ओळख आहे?
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“पाहा, देव थोर आहे, तो आम्हांला अगम्य आहे; त्याच्या वर्षांची संख्या अगण्य आहे.” (ईयोब 36:26)

देवाला अतिशय चांगल्याप्रकारे जाणणें किंवा ओळखणें अशक्य आहे.

तो अस्तित्वात असलेला सर्वात महत्वपूर्ण व्यक्ती आहे. आणि याचे कारण हे कीं त्यानें इतर सर्वांना घडविले, आणि त्यांना जर कुठले महत्व असेल तर ते त्याच्यामुळें आहे.

इतर जिवांस जे बळ अथवा बुद्धी अथवा कौशल्य अथवा सौंदर्य मिळाले आहे ते सर्व त्याच्याकडून येते. उत्तमतेच्या प्रत्येक पातळीवर, तो तुम्हीं ओळखत असलेल्या किंवा ज्याच्याविषयी तुम्हीं ऐकलें आहे अशा सर्वोत्तम व्यक्तीपेक्षा अमर्यादपणें श्रेष्ठ आहे.

अनंत, अपरंपार असल्याने, त्याच्यांत असलेली चित्तवेधकता अमर्याद आहे. म्हणून देव कंटाळवाणा असणें अशक्य आहे. अत्यंत बुद्धिमत्तापूर्ण आणि चित्तवेधक कृत्यांचे त्याचे सतत प्रदर्शन स्फोटक आहे.

प्रत्येक उत्तम आनंदाचा उगम म्हणून, तो स्वतःमध्यें पूर्णपणें आणि कायमचा प्रसन्न राहतो. जर आपण त्याला तशाप्रकारे ओळखत नाहीं, तर आपण एकतर मृत आहोत, अथवा आंधळे आहोत किंवा निद्रेत चालत आहोत.

म्हणून या जगात परमेश्वरास जाणून घेण्यासाठीं किती कमी कष्ट केलें जातांत ही बाब म्हणजें धक्कादायकच.

हे जणू काहीं असे आहे कीं देशाचे राष्ट्रपती तुमच्यासोबत महिनाभर राहाण्यासाठीं आलें आणि तुम्हीं दररोज येता जाता त्यांना फक्त सलाम म्हणतां. किंवा जणूकाहीं तुम्हीं प्रकाशाच्या गतीने काहीं तास सूर्य आणि सौरमंडलाभोवती उडत होता, आणि खिडकींतून बाहेर पाहण्याऐवजी तुम्हीं कंप्यूटर गेम खेळत बसला. किंवा जणूकाहीं तुम्हांला सर्वोत्कृष्ट अभिनेते, गायक, क्रीडापटू, संशोधक आणि विद्वान लोकांचे सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन पाहण्यासाठीं आमंत्रित करण्यात आलें होते, परंतु तुम्हीं जाण्यास नकार दिला, यासाठीं कीं तुम्हांला टीव्ही वरील तुमच्या आवडत्या मालिकेचा शेवटचा भाग पाहता यावा.

आपण एकत्र मिळून प्रार्थना करू या कीं आपला अमर्यादितरित्या थोर परमेश्वर त्याला आम्हास शक्य तितके पूर्णपणें पाहता यावें आणि त्याला आणखी जाणून घेण्यासाठीं त्याचा शोध घ्यावा म्हणून त्यानेंच आमचे अंतःकरण वळवावे, आणि आमचे डोळे उघडावे.

1 जुलाई : हमारे लिए

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1 जुलाई : हमारे लिए
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“हाय, हाय, उन लोगों ने सोने का देवता बनवाकर बड़ा ही पाप किया है। तौभी अब तू उनका पाप क्षमा कर—नहीं तो अपनी लिखी हुई पुस्तक में से मेरे नाम को काट दे।” निर्गमन 32:31-32

जब इस्राएली बन्धन से छुड़ाए गए, तो परमेश्वर ने उन्हें निर्देश दिया कि वे अपने मिस्री स्वामियों और मकान मालिकों से सोना, चांदी और वस्त्र माँगें, ताकि वे इन सब वस्तुओं को अपने साथ वाचा के देश में ले जा सकें। यही सामग्री उस तम्बू के निर्माण के लिए उपयोग में लाई जाने वाली थी, जिसमें परमेश्वर अपने लोगों के बीच वास करने वाला था।

इस्राएली लोग अभी बहुत दूर नहीं गए थे कि मूसा को परमेश्वर से मिलने सीनै पर्वत पर बुलाया गया। लेकिन जब मूसा को अपेक्षा से अधिक समय लग गया, तो लोग अधीर हो गए और उसके भाई हारून से बोले, “अब हमारे लिए देवता बना” (निर्गमन 32:1)। तब हारून ने उनसे कहा, “तुम्हारी स्त्रियों और बेटे-बेटियों के कानों में जो सोने की बालियाँ हैं उन्हें उतारो, और मेरे पास ले आओ” (निर्गमन 32:2), और उसने उस सोने से एक सोने का बछड़ा बनाया: “तब लोग कहने लगे, हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर जो तुझे मिस्र देश से छुड़ा लाया है, वह यही है” (निर्गमन 32:2, 4)। परमेश्वर ने उन्हें वह सब दे दिया था, जो उसके कार्य के लिए अनिवार्य था, लेकिन उन्होंने अपने स्वार्थ एवं इच्छाओं को पूरा करने के लिए उसके उपहारों का दुरुपयोग किया और अपने हाथों से बनाए हुए एक झूठे देवता की उपासना करने लगे। हम शायद सोने का बछड़ा न बनाएँ, लेकिन हम भी वही गलती कर सकते हैं, जब हम परमेश्वर की दी हुई आशिषों का उपयोग अपने ही स्वार्थी उद्देश्यों के लिए करते हैं।

जब मूसा वापस आया, तो उसने जो कुछ देखा उससे बहुत दुखी हुआ। वह परमेश्वर के सामने दीन होकर झुका और इस्राएलियों के लिए प्रार्थना करते हुए कहा, तू वह परमेश्वर है जिसने अपनी प्रजा के साथ वाचा बाँधी है। कृपया अपनी वाचा को बनाए रख! यद्यपि हमने तेरी दी हुई वस्तुओं का उपयोग झूठे देवताओं की रचना के लिए किया है, फिर भी हमें अकेला मत छोड़। कृपया अपने हाथों के कार्य को मत त्याग (निर्गमन 32:11-13)।

यह आश्चर्यजनक है कि स्वयं निर्दोष होने के बावजूद मूसा ने स्वयं को प्रजा के साथ इतना अधिक जोड़ लिया। और यह तो और भी अद्‌भुत है कि वह स्वयं परमेश्वर की “पुस्तक” में से मिटाए जाने के लिए भी तैयार था, बजाय इसके कि वह लोगों को परमेश्वर द्वारा त्यागे जाते हुए देखे।

मूसा की इस प्रार्थना में हम उस सच्चाई की झलक पाते हैं, जो अन्ततः नए नियम में पूरी हुई। जब उसके बच्चों की बात आती है, तो परमेश्वर कोई काम अधूरा नहीं छोड़ता। मसीह हमारे लिए मध्यस्थी करता है, और “परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में ‘हाँ’ के साथ हैं” (2 कुरिन्थियों 1:20)। अर्थात, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ—कि वह अपनी प्रजा को थामे रखेगा और उस भले काम को पूरा करेगा जो उसने आरम्भ किया है—यीशु मसीह में पूरी होती हैं।

हम “स्वभाव से ही भटकने वाले हैं” और “अपने प्रेमी परमेश्वर को छोड़ने के लिए प्रवृत्त रहते हैं।”[1] हम वही लोग हैं जो परमेश्वर की दी हुई आशिषों का उपयोग अपनी मूर्तियों के पीछे चलने में करते हैं। हमें एक मध्यस्थ की आवश्यकता है—और हमारे पास एक है! प्रभु यीशु को त्याग दिया गया, ताकि हमें हमारे पापों की क्षमा मिल सके। जब हम अपने पापों को यीशु के सामने स्वीकार कर लेते हैं, तो हम उसी के पास आते हैं जो पहले ही हमारे लिए हस्तक्षेप कर चुका है। आपके लिए उसका जो अद्‌भुत प्रेम है, वह आपके हृदय को मूर्तियों के पीछे भागने से लौटा लाए, और जो कुछ आपके पास है, उसे उस परमेश्वर की सेवा में लगाएँ जिसने आपको सब कुछ दिया है।

  याकूब 4:4-10

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 13–15; प्रेरितों 4:1-22 ◊


[1] रॉबर्ट रॉबिंसन, “कम, दाओ फाउण्ट ऑफ एव्री ब्लेसिंग” (1758).

1 July : तुमचे चांगले करण्यात देवाचा आनंद

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1 July : तुमचे चांगले करण्यात देवाचा आनंद
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हे लहान कळपा, भिऊ नकोस; कारण तुम्हांला ते राज्य द्यावे हे तुमच्या पित्याला बरे वाटले आहे. (लूक 12:32)

येशू बाजूला बसून लढा न देता आम्हांला अविश्वासांत सोडून देणार नाहीं. तो वचनरुपी शस्त्र हाती घेतो आणि जे विश्वास ठेवण्यास संघर्ष करतांत त्या सर्वांसाठीं ते तो आपल्या सामर्थ्याने बोलतो.

देव तशाप्रकारचा देव नाहीं जो खरोखर आमच्यासाठीं चांगला बनू इच्छितो ही भिती घालवून देणें हा त्याचा उद्देश्य आहे – म्हणजें ही भीती कीं तो खरोखर उदार आणि सहाय्यक आणि दयाळू आणि कोमल नाहीं, तर मुळांत आमच्यावर चिडलेला आहे – त्याची मनःस्थिती चांगली नाहीं आणि तो क्रोधाविष्ठ आहे.

कधी कधी, जरी आम्हीं आपल्या मनात हा विश्वास ठेवतो कीं देव आमच्यासाठीं चांगला आहे, तरीही आम्हांला आमच्या अंतःकरणात असे वाटू शकते कीं त्याचा चांगलुपणा बळजबरीने आहे किंवा चांगुलपणा दाखविण्यासाठीं त्याला भाग पाडण्यात आलें आहे, कदाचित एखाद्या न्यायाधिशाप्रमाणें ज्याला न्यायालयाच्या कार्यवाहीच्या कुठल्या तरी तांत्रिकतेविषयी सांगून एखादा चतुर वकींल युक्तीने कोपऱ्यांत नेतो, जेणेंकरून त्याला एखाद्या कैदाविरुद्ध असलेले आरोप खारीज करावे लागतांत ज्याला खरे पाहता त्यानें तुरुंगवास द्यावयास हवा होता.

पण परमेश्वराविषयी आम्हांला असे वाटता कामा नये म्हणून येशूला कळकळीने आमचे सहाय्य करायची आहे. तो लूक 12:32 मध्यें आपल्याला राज्य देण्यात त्याला जो पराकोटीचा आनंद होतो तो दाखविण्याद्वारे आपल्यासाठीं देवाच्या आत्म्याचे अवर्णनीय मूल्य आणि उत्कृष्टतेचे वर्णन करण्याचा तो प्रयत्न करत आहे.

“हे लहान कळपा, भिऊ नकोस; कारण तुम्हांला ते राज्य द्यावे हे तुमच्या पित्याला बरे वाटले आहे.” ह्या अद्भुत वाक्यातील प्रत्येक लहान शब्दाचा हेतू ती भिती काढून घेण्यास आपली मदत करणें आहे ज्याविषयी येशूला माहीत आहे कीं आपण त्याविषयी संघर्ष करित आहोंत, म्हणजें ही भीती कीं देव त्याचे लाभ आपल्याला देण्याच्या बाबतींत जळफळो; कीं त्याला भाग पडते म्हणून तो चांगल्या गोष्टी करतो आणि हे त्याच्या स्वभावानुसार नाहीं; कीं आतल्या आत तो रागावलेला आहे आणि आपल्या रागाला वाट करून देणें त्याला आवडते.

लूक 12:32 हे वाक्य देवाच्या स्वभावाविषयी आहे. ते अशाप्रकारच्या अंतःकरणाचे वर्णन आहे जे देवाजवळ आहे. देवाला कोणती गोष्ट आनंदित करते, त्याला काय करणें आवडते आणि त्याला काय करण्यात आनंद वाटतो याविषयी हे वाक्य आहे. प्रत्येक शब्द महत्वाचा आहे. “हे लहान कळपा, भिऊ नकोस; कारण तुम्हांला ते राज्य द्यावे हे तुमच्या पित्याला बरे वाटले आहे.” (लूक 12:32)

30 जून : बुराई को पराजित करना

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30 जून : बुराई को पराजित करना
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“बुराई से न हारो, परन्तु भलाई से बुराई को जीत लो।” रोमियों 12:21

1940 के दशक में केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए एक युवती कम्युनिस्ट पार्टी की सचिव बन गई। 1946-47 की सर्दी इतनी कठोर थी कि पानी की पाइपें आंशिक रूप से जम गईं और पानी की कमी हो गई। महिला छात्रों को सप्ताह में केवल एक ही स्नान का अवसर मिलता था, और वे लम्बी कतारों में खड़े होकर बड़बड़ाती और अपनी जगह के लिए जूझती रहती थीं—जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी की सचिव भी शामिल थी।

जो लड़की सबसे आसानी से स्नानघर तक पहुँच सकती थी, वह एक मसीही लड़की थी। समय बीतने के साथ कम्युनिस्ट छात्रा ने देखा कि वह लड़की कभी अपनी अधिकारों का दावा नहीं करती और दूसरों के स्वार्थ के प्रति नरम प्रतिक्रिया देती थी। मसीही लड़की वह कर रही थी जो वह कम्युनिस्ट युवती मानती तो थी, लेकिन करती नहीं थी। उस अवलोकन ने एक बातचीत, एक रूपान्तरण और अन्ततः, एक नए मिशनरी को पैदा किया, जो एक पूर्वी देश में सेवाकार्य के लिए चली गई।

जब भी हम बुराई को अपनी बुरी बातों और कर्मों से हराने की कोशिश करते हैं, तो हम खुद ही उसमें जलकर नष्ट हो जाते हैं। बुराई को समान रूप से बुरी शक्ति से हराया नहीं जा सकता। बुराई समाप्त होने के बजाय दोगुनी हो जाती है। यदि हम शत्रु का सामना करते समय खुद पर काबू नहीं रख पाते, तो हम उस व्यक्ति से नहीं, बल्कि बुराई से हार जाते हैं। हम हार जाते हैं और वह अवसर खो चुके होते हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में सही काम करने का अवसर था।

बुराई को हराना हमारे समाज में एक लोकप्रिय विचार है। हम इसे गीतों और प्रेरक नारों में सुनते हैं। अक्सर विचार यह होता है कि यदि हम बस “एकसाथ खड़े हो जाएँ,” तो हम उन बुराइयों को हराने में सफल हो जाएँगे जो हमें परेशान करती हैं। यह विचार तो अच्छा है, लेकिन इसमें आवश्यक शक्ति का अभाव है। हम अपने बल पर बुराई को हराने में सक्षम नहीं हैं; यह काम नहीं करेगा। हम “जयवन्त से भी बढ़कर” केवल उसी के माध्यम से हैं “जिसने हमसे प्रेम किया है” (रोमियों 8:37)। परमेश्वर के आत्मा और उसे वचन के द्वारा उसकी शक्ति हमें वह प्रेरणा और बल देती है, जो हमें विजय प्राप्त करने के लिए चाहिए।

यह वही मार्ग था जिसे यीशु ने अपनाया। उसने प्रतिशोध को अपने हाथों में नहीं लिया, बल्कि स्वयं को पिता के हाथों में सौंप दिया। मसीह ने क्रूस पर जाकर यह मार्ग अपनाया, जहाँ प्रेम ने बुराई पर विजय प्राप्त की। जब हम कोमल बनने, भलाई करने और क्रूस के मार्ग पर चलने का चयन करते हैं, तब हम परमेश्वर की शक्ति का अनुभव करते हैं, जो हमें उसके प्रेम की भलाई से बुराई को पराजित करने में मदद करती है।

भजनकार चार्ल्स टिण्डली ने अपने इस भजन के द्वारा हमें इस सत्य की याद दिलाई:

परमेश्वर के वचन को अपनी तलवार बनाकर,

मैं एक दिन विजय प्राप्त करूगा . . .

यदि यीशु मा अगुवा होग,

तो एक दिन मैं विजय अवश्य प्राप्त करूगा।”[1]

उसके अनुग्रह से आप एक दिन इस संसार की सभी चुनौतियों और अन्यायों को पराजित करेंगे। और जब आप गलत के सामने सही, अपमान के सामने दया और नकारात्मकता के सामने आशीर्वाद दिखाएँगे, तब आज आप उसके अनुग्रह से बुराई को भलाई से पराजित करेंगे।

  1 पतरस 3:8-14अ

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 10–12; प्रेरितों 3


[1] चार्ल्स ऐल्बर्ट टिण्डली, “आई विल ओवरकम सम डे” (1900).

30 June : येणाऱ्या क्रोधात स्वर्गाची विश्रांती

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30 June : येणाऱ्या क्रोधात स्वर्गाची विश्रांती
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तुमच्यांवर संकट आणणाऱ्या लोकांची परत संकटानें फेड करणें आणि संकट सोसणाऱ्या तुम्हांला आमच्यांबरोबर विश्रांती देणें, हे देवाच्या दृष्टीनें न्याय्य आहे, म्हणून प्रभू येशू प्रकट होण्याच्या समयीं ते होईल; तो आपल्यां सामर्थ्यवान दूतांसह स्वर्गातून अग्निज्वालेंसहित प्रकट होईल; तेव्हां जे देवाला ओळखत नाहींत व आपल्यां प्रभू येशू ख्रिस्ताची सुवार्ता मानत नाहींत त्यांचा तो सूड उगवील. (2 थिस्सल 1:6-8)

अशी वेळ येईल जेव्हां देवाचा धीर समाप्त होईल. जेव्हां देव ठरविलेंल्या समयापर्यन्त त्याच्या लोकांना दुःख सोसतांना पाहून चुकेल, आणि रक्तसाक्षींची ठरविलेंली संख्या पूर्ण होईल (प्रकटीकरण 6:11), तेव्हां न्याय व पवित्र सूड स्वर्गातून प्रकट होईल.

लक्ष द्या कीं जे लोग देवाच्या लोकांवर जुलूम करतांत त्यां लोकांवर जेव्हां देवाचा सूड येतो त्याला आपण “विश्रांती” म्हणून साजरा करूं. “तुमच्यांवर संकट आणणाऱ्या लोकांची परत संकटानें फेड करणें आणि संकट सोसणाऱ्या तुम्हांला आमच्यांबरोबर विश्रांती देणें, हे देवाच्या दृष्टीनें न्याय्य आहे.” दुसऱ्या शब्दांत, “आमच्यांवर संकट आणणाऱ्या लोकांवर” न्याय आमच्यांसाठीं कृपेचेच एक स्वरूप आहे.

कदाचित कृपेच्या रूपात न्यायाचे अतिशय अप्रतीम चित्र प्रकटीकरण 18 मध्यें बाबेलच्या विनाशाचे चित्र आहे. तिच्या नाशाच्या वेळी, स्वर्गातून एक मोठी वाणी ऐकू येते, ‘हे स्वर्गा’, आणि अहो पवित्र प्रेषितांनो व संदेष्ट्यांनो, तिच्याविषयीं ‘आनंद करा;’ कारण देवानें तिला दंड करून तुम्हांला ‘न्याय दिला आहे”’ (प्रकटीकरण 18:20). ह्यानंतर स्वर्गातील मोठ्या जनसमुदायाची जशी काय एक मोठी वाणी मी ऐकली; ती म्हणाली, “‘हालेंलूया!’ तारण, गौरव, सन्मान व सामर्थ्य ही प्रभू जो आमचा देव ह्याची आहेत; कारण ‘त्याचे न्यायनिर्बंध सत्याचे’ व ‘नीतीचे’ आहेत; ज्या मोठ्या कलावंतिणीनें आपल्यां जारकर्मानें पृथ्वी भ्रष्ट केली तिचा न्यायनिवाडा त्यानें केला आहे, आणि आपल्यां ‘दासांच्या रक्ताबद्दल तिचा सूड घेतला आहे” (प्रकटीकरण 19:1-2).

जेव्हां देवाचा धीर व त्याची सहनशीलता संपुष्टात येईल, आणि हे युग समाप्त होईल, आणि देवाच्या लोकांच्या शत्रूंवर न्याय ओढवेल, तेव्हां पवित्र लोक देवाचा न्याय अमान्य करणार नाहींत.

याचा अर्थ हा आहे कीं पश्चात्ताप न करणाऱ्यांचा अंतिम नाश देवाच्या लोकांसाठीं दुखाचा अनुभव नसेल.

इतरांची पश्चात्ताप न करण्याची इच्छा संतांचे प्रेम ओलीस ठेवणार नाहीं. नरक स्वर्गाला धमकीं देऊन दुःखी करूं शकणार नाहीं. देवाचा न्याय मान्य केला जाईल आणि संतांना मोठी कृपा म्हणून सत्याचे प्रमाणीकरण अनुभवता येईल.

29 जून : क्रियाशील प्रेम

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29 जून : क्रियाशील प्रेम
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“हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्‍वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, ‘बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।’ परन्तु ‘यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे खाना खिला, यदि प्यासा हो तो उसे पानी पिला; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा।’” रोमियों 12:19-20

इन पदों में “आग के अंगारे” प्रतिशोध या पीड़ा का रूपक नहीं हैं। इसके बजाय, वे उस शर्म और पछतावे को दर्शाते हैं जो लोग तब महसूस करते हैं, जब हम उन्हें वह प्रतिशोध नहीं देते जो हमारी समझ के अनुसार उनके लायक लगता है, बल्कि हम उन्हें दया और उदारता दिखाते हैं। यह तब होता है जब मसीही लोग उन लोगों के साथ भलाई वाला व्यवहार करते हैं जिन्होंने उन्हें नुकसान पहुँचाया है, और वह व्यवहार पूरी तरह से द्वेष या बदला लेने से रहित होता है, और इस प्रकार यह मौलिक रूप से अलौकिक होता है। जब ऐसा होता है, तो जॉन कैल्विन का कहना है कि दुश्मन का मन “दो तरीकों से घायल हो सकता है। या तो हमारा दुश्मन दया के कारण नरम हो जाएगा, या . . .  उसे अपने विवेक की गवाही से कचोट और पीड़ा होगी।”[1]

इसलिए ये कोयले अन्ततः चोट नहीं बल्कि चंगाई लाने के लिए होते हैं। हमारे उदार कार्यों से मेल-मिलाप को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जिससे सामने वाला व्यक्ति हमारे पास आए, न कि हमसे दूर जाए। यह ठीक वैसा ही है जैसे हमें परमेश्वर से दया तब मिली जब हम अभी भी उसके दुश्मन थे (रोमियों 2:4; 5:8)।

हालाँकि, यदि हम ईमानदार हों, तो ये उस प्रकार के अंगारे नहीं हैं जो हम तब चाहते हैं जब हमारा नुकसान होता हैं और हम घायल होते हैं। हममें से कई लोग खुशी से यह जानना चाहेंगे कि असली अंगारे वास्तव में हमारे दुश्मनों के सिर पर गिरें, और उन्हें जलाकर घायल कर दें। आखिरकार, वे इसी के लायक हैं! लेकिन यह हमारे विश्वास के बजाय हमारे पतन को दर्शाता है। यह न तो यीशु जैसा दिखता है, न ही सुनाई देता है। यही कारण है कि ये पद इतने चुनौतीपूर्ण हैं।

ध्यान दें कि परमेश्वर का वचन हमें केवल बदला लेने से बचने के लिए ही नहीं कहता, बल्कि आशीर्वाद देने में सक्रिय रहने के लिए भी कहता है। जब हम प्रतिशोध लेने से मना कर देते हैं, तब हम आज्ञा का पूरा पालन नहीं करते। यीशु के शिष्य के रूप में हमें केवल यह नहीं करना है कि हम अपने दुश्मनों से बुराई न करें; बल्कि हमें वास्तव में उनके साथ भलाई करनी है। यह विश्वास करना आसान है कि अपने दुश्मनों को नजरअंदाज करने से हम अपनी समस्या को सुलझा सकते हैं या यही सबसे अधिक है जो हम वास्तविक रूप से कर सकते हैं; लेकिन यहाँ हम पाते हैं कि हमें वास्तव में उन्हें आतिथ्य दिखाना है! हमारी भूमिका यह है कि हम बुराई का उत्तर उदारता की भावना से दें, यह विश्वास करते हुए कि परमेश्वर हमेशा धार्मिकता से न्याय करेगा, और इसलिए हमें न्याय करने की आवश्यकता नहीं है, और हमें ऐसा करना भी नहीं है (1 पतरस 2:23)।

यीशु की देह के सदस्य होने के नाते, हममें से कई लोग अभी भी अपनी अवज्ञा, प्रतिशोधी क्रियाओं या विचारों को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। फिर भी, जबकि हमारे दुश्मनों के मन हमारे तर्कों से निपट सकते हैं और उनका साहस हमारी धमकियों का सामना करने के लिए मजबूत हो सकता है, लेकिन यह क्रियाशील प्रेम ही है जो उन्हें पश्चाताप तक ला सकता है।

इन पदों से आपके हृदय को कैसे बदलने की या आपके कार्यों को कैसे प्रभावित होने की आवश्यकता है? इनकी चुनौती से बचने की कोशिश न करें। मसीह के स्वरूप में बढ़ने का एक भाग यह भी है कि आप अपने दुश्मनों के लिए भलाई करने के तरीकों की तलाश करें, और यह परमेश्वर की क्रान्तिकारी दया और उदारता के बहाव से उत्पन्न हो।

  लूका 22:47-53

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 7–9; प्रेरितों 2:22-47 ◊


[1] दि एपिस्ट्ल ऑफ पॉल दि अपोस्ट्ल टू द रोमंस ऐण्ड टू द थिस्सोलोनियंस, कैल्विनज़ कॉमैण्ट्री, सम्पादक डेविड एफ. टोरेंस ऐण्ड थॉमस एफ. टोरेंस, अनुवादक रोस मैकेंज़ी (अर्डमंस, 1995), पृ. 279.

29 June : व्यावहारिक प्रीतीचे सामर्थ्यवान मूळ

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29 June : व्यावहारिक प्रीतीचे सामर्थ्यवान मूळ
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आपण बंधुजनांवर प्रीती करतो ह्यावरून आपल्यांला कळून येते कीं, आपण मरणातून निघून जीवनात आलो आहोत. (1 योहान 3:14).

म्हणून, प्रीती या गोष्टीचा पुरावा आहे कीं आमचा नवा जन्म झाला आहे – कीं आम्हीं ख्रिस्ती आहोत, कीं आमचे तारण झालें आहे.

कधी कधी पवित्र शास्त्र आमच्यां पावित्र्यास आणि लोकांसाठीं आमच्यां प्रीतीस आमच्यां अंतिम तारणाची अट ठरविते. दुसऱ्या शब्दात, जर आपण पवित्र नाहीं आणि प्रेमळ नाहीं, तर आपण न्यायाच्या दिवशी बचावणार नाहीं (उदाहरण, इब्री 12:14; गलती 5:21; 1 करिंथ 6:10). याचा अर्थ असा होत नाहीं कीं आपण प्रीतीच्या कर्मांनी देवासमोर नीतिमान ठरविलें जातो. नाहीं, बायबल पुन्हा पुन्हा स्पष्टपणें सांगते, जसे इफिस 2:8-9 मध्यें म्हटलें आहे, “कारण कृपेनेंच विश्वासाच्या द्वारें तुमचे तारण झालेलें आहे आणि हे तुमच्यां हातून झालें असें नाहीं, तर हे देवाचे दान आहे; कोणी आढ्यता बाळगू नये म्हणून कर्मे केल्यांनें हे झालें नाहीं.” नाहीं, जेव्हां बायबल म्हणते कीं विश्वासाच्याद्वारें आमचे तारण झालेलें आहे, पण हे कीं शेवटी तारण प्राप्त करण्यासाठीं आपण लोकांवर प्रीती केली पाहिजे, तेव्हां त्याचा अर्थ हा आहे कीं देवाच्या अभिवचनांत विश्वास इतका वास्तविक असला पाहिजे कीं त्याद्वारें जी प्रीती उत्पन्न होते ती विश्वासाची वास्तविकता सिद्ध करते.

म्हणून, इतरांसाठीं प्रीती ही भविष्यातील कृपेची या अर्थानें अट आहे कीं ती या गोष्टीची पुष्टी करते कीं मूळ अट, विश्वास, अस्सल आहे. आपण इतरांसाठीं असलेंल्या प्रीतीला दुसऱ्या स्थानी असलेंली अट म्हणू शकतो, जी विश्वासाच्या मूळ आणि आवश्यक अटीच्या यथार्थतेची पुष्टी करते, असा विश्वास केवळ जो आम्हांला ख्रिस्ताशी जोडतो आणि त्याचे सामर्थ्य प्राप्त करतो.

विश्वास भविष्यातील कृपेच्या अभिवचनांत देवाचे कसे गौरव होते तें ओळखतो आणि येशूमध्यें देव आमच्यांसाठीं जो आहे हे जे काहीं अभिवचनांद्वारें प्रकट होते त्या सर्व गोष्टी स्वीकारतो. देवाच्या गौरवाची ती आत्मिक दृष्टी आणि त्यात आमचा आनंद, स्वतःस प्रमाणित करणारा पुरावा आहे कीं देवानें आम्हास त्याच्या कृपेचे लाभार्थी होण्यासाठीं पाचारण केलें आहे.  हा पुरावा आम्हास स्वतंत्र करतो कीं आम्हीं आपलें स्वतःचे म्हणून देवाच्या अभिवचनावर अवलंबून राहावे. आणि अभिवचनावर हे अवलंबून राहणें आम्हांला प्रेम करण्याचे सामर्थ्य देते. जे बदल्यात या गोष्टीची पुष्टी करते कीं आमचा विश्वास खरा आहे.

जग त्या विश्वासासाठीं आतुर आहे जो दोन गोष्टींना परस्पर जोडते: अढळ ईश्वरीय सत्याचे विस्मयकारक दर्शन आणि झालेंल्या तारणा द्वारें जीवनात परिवर्तन घडवून आणण्यासाठीं अत्यंत व्यावहारिक, चोवीस तास सामर्थ्य.. मलाही तेच हवे आहे. याच कारणास्तव मी ख्रिस्ती आहे.

एक कृपाळू महान परमेश्वर आहे जो त्याच्यावर विश्वास ठेवणाऱ्या असहाय लोकांना दिलेंली आपली अभिवचनें पूर्ण करून स्वतःचे असीम सौंदर्य आणि आत्मनिर्भरता यांचे गौरव करतो. आणि या देवाला मौल्यवान समजण्यापासून एक सामर्थ्य येते जे आमच्यां जीवनाच्या प्रत्येक क्षेत्राला स्पर्श करते. ते आम्हांला अत्यंत व्यावहारिक पद्धतीनें प्रेम करण्यास समर्थ करते.

28 जून : शान्ति जो सम्भव है

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28 जून : शान्ति जो सम्भव है
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“जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो।” रोमियों 12:18-19

बाइबल अद्‌भुत रूप से एक व्यावहारिक पुस्तक है। इसकी बुद्धि न केवल समृद्ध है, बल्कि वास्तविक भी है, और जैसे-जैसे हम इसके अनुसार जीते हैं, यह हर परिस्थिति में गहरे अर्थ के साथ हमसे बात करती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हममें से कई लोग महसूस करते हैं कि हमारे माता-पिता की चेतावनियाँ और बुद्धिमता अक्सर सही थी; और जैसे-जैसे हम परमेश्वर के वचन की रोशनी में चलते हैं, वैसे-वैसे यह समय के साथ हर बार सही साबित होती है। पौलुस यहाँ पर इस कालातीत, वास्तविक बुद्धि का प्रदर्शन करता है। एक ओर, यह सरल लगता है: बस सभी के साथ शान्ति बनाए रखने की कोशिश करो। यह समझने में मुश्किल नहीं है। लेकिन वह केवल इतना ही नहीं कह रहा है। यह निर्देश दो योग्यताओं के साथ आता है: “यदि सम्भव हो” और “जहाँ तक हो सके।” इसका अर्थ है कि हमेशा यह सम्भव नहीं होगा!

पौलुस यहाँ बचने का कोई बहाना नहीं दे रहा है। वह हमें यह नहीं कह रहा है कि तब तक शान्ति बनाए रखो, जब तक हम अपने गुस्से या भावनाओं को नियन्त्रित कर सकते हैं, लेकिन अन्यथा हम अपने दिलों में कड़वाहट पालने के लिए स्वतन्त्र हैं। वह हमें यह सुनिश्चित करने का बुलावा दे रहा है कि हमारे जीवन में कोई भी मौजूदा संघर्ष हमारे शान्त रहने के बावजूद है तो ठीक है, लेकिन यह हमारे कारण नहीं होना चाहिए। मौजूदा दुश्मनी की जिम्मेदारी कभी भी हमारी ओर से पुनः मेल-जोल की अनिच्छा की वजह से नहीं होनी चाहिए।

लेकिन भले ही हम अपनी ओर से अपना कर्तव्य पूरा कर लें, तौभी कुछ स्थितियाँ ऐसी हैं जिनमें शान्ति सम्भव नहीं हो सकती। एक स्थिति तब होती है जब सामने वाला व्यक्ति हमारे साथ शान्ति बनाने के लिए तैयार नहीं है। हो सकता है कि हमारा सामना ऐसे किसी व्यक्ति से है जो हमें नुकसान पहुँचाने की कोशिश में है और संघर्ष को हल करने में कोई रुचि नहीं रखता। ऐसी स्थिति में, उस व्यक्ति को बदलना या उसकी क्रूरता को रोकना सम्भव नहीं हो सकता—लेकिन हमारे लिए यह सम्भव होगा कि हम पलटकर न लड़ें। जब हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हम संघर्ष में योगदान नहीं दे रहे हैं, तो हम “जहाँ तक हो सके” शान्ति का पालन कर रहे होते हैं।

दूसरी रुकावट तब आती है जब शान्ति की शर्तें पवित्रता, सत्य और धार्मिकता के सिद्धान्तों के साथ मेल नहीं खातीं। इब्रानियों की पुस्तक के लेखक ने ऐसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपने पाठकों से कहा था, “सबसे मेल मिलाप रखो, और उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14)। ये दो अलग-अलग निर्देश नहीं हैं; शान्ति और पवित्रता के लिए हमारा प्रयास हमें अलग-अलग दिशाओं में नहीं ले जाना चाहिए। शान्ति की खोज यह नहीं होनी चाहिए कि हम किसी भी कीमत पर शान्ति चाहते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि संघर्ष और टकराव से नफरत करते हुए हम शान्ति की खोज में धार्मिकता को दाव पर न लगा दे।

आप किसी के हृदय को नहीं बदल सकते; यह प्रभु का काम है। आपको अपनी ईमानदारी से समझौता नहीं करना है; यह प्रभु की प्रमुख चिन्ता है। लेकिन परमेश्वर आपको एक आदेश दे रहा है, जहाँ तक हो सके आप शान्ति का पालन करें। क्या यह आदेश आज आपको अपनी बातों को नर्म करने, अपने व्यवहार को बदलने, या किसी संघर्ष को सुधारने की दिशा में पहला कदम उठाने के लिए प्रेरित कर रहा है?

दानिय्येल 6

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 4–6; प्रेरितों 2:1-21