ArchivesAlethia4India

5 मई : मन्दिर का शुद्धीकरण

Alethia4India
Alethia4India
5 मई : मन्दिर का शुद्धीकरण
Loading
/

“तब उसने रस्सियों का कोड़ा बनाकर, सब भेड़ों और बैलों को मन्दिर से निकाल दिया, और सर्राफों के पैसे बिखेर दिये और पीढ़ों को उलट दिया . . . तब उसके चेलों को स्मरण आया कि लिखा है, ‘तेरे घर की धुन मुझे खा जाएगी।’” यूहन्ना 2:15, 17

कोई भी पिता स्वाभाविक रूप से गुस्से से जल उठेगा यदि वह देखेगा कि नशा उसके बच्चे के जीवन को नष्ट कर रहा है। हम यह उम्मीद नहीं करेंगे कि वह इसे हल्के में लेगा। नहीं, बल्कि हम यह अपेक्षा करेंगे कि वह उस बुराई को मिटाने और अपने बच्चे को बचाने के लिए हर सम्भव प्रयास करेगा।

जब परमेश्वर-पुत्र यीशु पृथ्वी पर अपने पिता के घर में—यरूशलेम के मन्दिर—में आया और चारों ओर देखा, तो सारा दृश्य उसके लिए पीड़ादायक था। जो स्थान परमेश्वर की उपासना के लिए बनाया गया था, वह धन की पूजा का केन्द्र बन गया था। जो स्थान संसार को जीवित परमेश्वर से मिलने का बुलावा देने के लिए बनाया गया था, वह ऐसा स्थान बन गया था जो अन्यजातियों को दूर रखता था। उसे यह असहनीय लगा कि परमेश्वर के नाम और उसकी महिमा को अपमानित और कलंकित किया जा रहा था। हमें यीशु के कार्य के औचित्य पर प्रश्न उठाने की कोई आवश्यकता नहीं है। मसीह का पवित्र क्रोध लगन और पवित्रता से जल उठा। यह शिष्ट वार्ता का समय नहीं था।

यीशु को पता था कि मन्दिर का उद्देश्य क्या था। यह परमेश्वर से मिलने का स्थान था। यह पूरी पृथ्वी के लिए आनन्द का स्रोत था। लेकिन उसने वहाँ जो देखा, वह पूरी तरह इसके उद्देश्य के विपरीत था—और उसने अपने शब्दों और कार्यों से इसे पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया।

जब बाद में फरीसियों ने यीशु का सामना किया, तो उन्होंने उसके कामों को गलत नहीं ठहराया; बल्कि उन्होंने उसके अधिकार पर सवाल उठाया। जवाब में यीशु ने उलझन में डालने वाला यह कथन कहा, “इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा” (यूहन्ना 2:19)। यूहन्ना बताता है कि यीशु जिस मन्दिर की बात कर रहा था, वह उसका अपना शरीर था (पद 21)। एक दिन यीशु यरूशलेम में आने पर था, लेकिन इस बार उसका उद्देश्य मन्दिर में जाना नहीं था, बल्कि अपने शरीर और लहू को बलिदान के रूप में अर्पित करना और फिर मृतकों में जी उठना तथा सदा के लिए शासन करना था। इसी अधिकार के साथ उसने यह अन्तर स्पष्ट कर दिया कि परमेश्वर ने मन्दिर को क्या बनने के लिए निर्धारित किया था और लोगों ने उसे क्या बना दिया था।

यहाँ हमें एक ऐसा यीशु दिखता है जो समझौता नहीं करता—जो परमेश्वर की महिमा की रक्षा के लिए पूरी लगन के साथ प्रतिबद्ध है। यह यीशु कोई नम्र और दीन व्यक्ति या हर किसी को खुश करने वाला और चुनौती न देने वाला व्यक्ति नहीं है। यह महायाजक है, जो केवल मन्दिर को साफ करने नहीं, बल्कि हमारे दिलों को शुद्ध करने और उन्हें परमेश्वर से जोड़ने भी आया था। उसी के द्वारा परमेश्वर ने एक सच्चा मन्दिर, “सब देशों के लोगों के लिए प्रार्थना का घर” (यशायाह 56:7) स्थापित किया।

इसलिए यीशु को सही दृष्टि से देखें—जिसने परमेश्वर की महिमा के लिए कोई समझौता नहीं किया और सभी लोगों को सही रीति से उसकी आराधना करने में सक्षम बनाया। यीशु को सही दृष्टि से देखें—जिसने अपनी सिद्धता और अधिकार का उपयोग हमारे स्थान पर हमारे पापों की सजा सहने के लिए किया, ताकि हम बच सकें। यीशु को सही दृष्टि से देखें—जिसका अद्‌भुत अनुग्रह आपको प्राप्त हुआ है। और जैसे उसने परमेश्वर की महिमा के लिए जोश दिखाया, वैसे ही आपका दिल भी उसके लिए जोश से भरा रहे।

मत्ती 27:35-56

4 मई : यीशु राजा है

Alethia4India
Alethia4India
4 मई : यीशु राजा है
Loading
/

“फिर मैं ने स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे और समुद्र की सब सृजी हुई वस्तुओं को, और सब कुछ को जो उनमें हैं, यह कहते सुना, ‘जो सिंहासन पर बैठा है उसका और मेमने का धन्यवाद और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!’” प्रकाशितवाक्य 5:13

बाइबल बहुत स्पष्ट रीति से बताती है कि इतिहास एक निश्चित उद्देश्य के साथ एक निश्चित अन्त की ओर बढ़ रहा है। यही सच्चाई बाइबल के दृष्टिकोण की एक अनूठी विशेषता है। दूसरे शब्दों में, मसीही विश्वास इस बात में सबसे अलग है कि सभी चीज़ों का अन्त कैसे होगा।

कई बार जब हम पुरानी तस्वीरें देखते हैं, तो हम खुद से पूछते हैं, “मैं इस तस्वीर में कहाँ हूँ?” या, “क्या मैं इस तस्वीर में हूँ भी?” लेकिन जब बात परमेश्वर की योजना की आती है, तो प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में दिखाए गए इतिहास के चित्र में हर एक व्यक्ति शामिल है। कोई भी इस कहानी से बाहर नहीं है। और जब इतिहास अपने अन्तिम चरण में पहुँचेगा, तो यह विभाजन और अलगाव के साथ समाप्त होगा।

यीशु ने इस विभाजन के बारे में तब बात की जब उसने कहा कि भेड़ें और बकरियाँ अलग की जाएँगी (मत्ती 25:31-46): प्रकाश और अन्धकार अलग किए जाएँगे, और जो यीशु में विश्वास रखते हैं, वे उन लोगों से अलग किए जाएँगे जो उस पर विश्वास नहीं रखते। कोई भी इससे बाहर नहीं होगा, लेकिन दुखद रूप से, कुछ लोग स्वयं को इस आशीष से वंचित करने का चुनाव करेंगे। इसलिए इस बड़े चित्र में हमारी स्थिति महत्त्व रखती है।

इतिहास के उतार-चढ़ाव को इस दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए कि स्वर्ग में एक सिंहासन है, और वह खाली नहीं है; बल्कि उस पर परमेश्वर विराजमान है, जो सब कुछ पर सम्पूर्ण नियन्त्रण किए हुए है। यीशु राजा है, और वह परमेश्वर के दाएँ हाथ पर विराजमान है। भले ही बहुत से लोग अब तक उसके राज्य को न पहचानें, लेकिन इससे यह सच्चाई नहीं बदलती कि वह राज्य करते है।

चौथी शताब्दी के महान धर्मशास्त्री हिप्पोवासी ऑगस्टिन के शब्दों में, मानवजाति के पतन से लेकर समय के अन्त तक दो प्रतिद्वन्द्वी नगर हैं—दो अलग-अलग प्रेम। स्वाभाविक रूप से, हम मनुष्य के नगर में जी रहे हैं, और केवल परमेश्वर की कृपा से ही हम परमेश्वर के नगर में प्रवेश कर सकते हैं और उसके प्रति समर्पित हो सकते हैं।

पृथ्वी का नगर, मनुष्य का नगर, अन्ततः नष्ट हो जाएगा। लेकिन स्वर्गीय नगर, परमेश्वर का राज्य, हमेशा बना रहेगा। क्या हम यीशु को राजा के रूप में स्वीकार करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर अनन्तकाल के लिए महत्त्वपूर्ण है। और यह केवल भविष्य के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान जीवन के लिए भी मायने रखता है। यदि यीशु आपका राजा है, तो आप उसकी आज्ञाकारी प्रजा की तरह जीएँगे, भले ही उसकी आज्ञा आपकी इच्छाओं के विरुद्ध क्यों न हो। यदि यीशु आपका राजा है, तो आप सबसे बढ़कर उसके प्रति निष्ठावान रहेंगे, क्योंकि यह संसार आपका स्थाई घर नहीं है—आप तो यहाँ बस यात्री हैं। जैसा कि पौलुस ने लिखा, “हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं” (फिलिप्पियों 3:20)।

इसलिए सुनिश्चित कर लें कि आप एक उत्तम देश के नागरिक और एक महान राजा की प्रजा के रूप में जीवन जी रहे हैं। हम समस्त सृष्टि के साथ मिलकर उसे आदर देने में अनन्तकाल व्यतीत करेंगे। आज भी, हमारे शब्दों और आचरण से हम यही करें।

भजन 24

3 मई : मजबूत आधार पर सुरक्षित

Alethia4India
Alethia4India
3 मई : मजबूत आधार पर सुरक्षित
Loading
/

“हे मेरे परमेश्‍वर यहोवा, मेरी ओर ध्यान दे और मुझे उत्तर दे, मेरी आँखों में ज्योति आने दे, नहीं तो मुझे मृत्यु की नींद आ जाएगी; ऐसा न हो कि मेरा शत्रु कहे, ‘मैं उस पर प्रबल हो गया; और ऐसा न हो कि जब मैं डगमगाने लगूँ तो मेरे शत्रु मगन हों। परन्तु मैं ने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है; मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा।” भजन 13:3-5

जब आप कैम्पिंग ट्रिप पर जाते हैं, तो सबसे ज़रूरी चीज़ों में से एक यह सुनिश्चित करना होता है कि आपके तम्बू के खूँटे ठोस ज़मीन में मजबूती से गाड़े गए हों। यह कदम पूरा हो जाने के बाद, आप अन्य गतिविधियों में अधिक निश्चिन्त होकर लग सकते हैं, यह जानते हुए कि आपका आश्रय किसी भी तूफान का सामना कर सकेगा—जो निश्चित रूप से इस विकल्प से बेहतर है कि आप लौटकर देखें कि आपका तम्बू उखड़ कर उड़ गया है!

इस पद में, दाऊद अपने जीवन में भुलाए जाने और निराश होने की भावना के साथ-साथ दूसरों द्वारा अनुचित विरोध का सामना करने पर प्रतिक्रिया दे रहा है। दाऊद सबसे पहले अपने मन को अपनी स्थिति पर केन्द्रित करता है; वह जो पहले से जानता है उसे याद करता है और परमेश्वर के अटल प्रेम में अपना विश्वास प्रकट करता है।

यह विश्वास उसकी इच्छा से उत्पन्न हुआ था। भले ही दाऊद के हृदय की भावनाएँ वास्तविक थीं, तौभी उसने अपने मनोभावों को परमेश्वर के चरित्र और उद्देश्यों के अधीन करने का निर्णय लिया। उसने अपनी आशा को—अपने हृदय के तम्बू के खूँटों को—परमेश्वर के स्थिर प्रेम और अटूट दया की ठोस ज़मीन में गाड़ दिया। केवल तभी वह फिर से आनन्दित हो सका।

नए स्वर्ग और नई पृथ्वी में जीवन के तूफान सदा के लिए शान्त हो जाएँगे। लेकिन तब तक, हमें आंधियों और तेज़ बारिश से होकर गुजरना पड़ेगा। हम उतनी ही अधिक खुशी के साथ इन्हें सहन कर पाएँगे, जितना कि हम अपने परमेश्वर पिता की बुद्धि पर भरोसा करेंगे। जब वह हमें कुछ नहीं देता, तो यह इसलिए होता है क्योंकि वह जानता है कि वह चीज़ हमारे पास न होना ही बेहतर है। जब वह हमें कोई कठिन स्थिति सौंपता है, तो यह इसलिए होता है क्योंकि वह हमें उस परिस्थिति में अपने अनुग्रह की गवाही देने का विशेष अवसर देता है। जब वह हमें बारिश से होकर ले जाता है, तो यह इसलिए होता है ताकि हम उसके और अधिक निकट आ सकें और हमारा चरित्र उसके समान बन सके (याकूब 1:2-4)।

जब हम अपने जीवन के सबसे कठिन अनुभवों के बिखरे हुए टुकड़ों को देखते हैं, तो ऐसा लग सकता है कि सब कुछ टूटकर गिरने वाला है। लेकिन ऐसे समय में, हम याद कर सकते हैं कि परमेश्वर “राख दूर करके सुन्दर पगड़ी बाँधता है और विलाप दूर करके हर्ष का तेल लगाता है और उदासी हटाकर यश का ओढ़ना ओढ़ाता है” (यशायाह 61:3)। हमारे सामने आने वाली हर परीक्षा हमें यह याद दिलाने का अवसर है कि दाऊद के समान हमारे लिए भी परमेश्वर का अटल प्रेम ही है, जो हमारे प्राणों को सुरक्षित रखता है और हमें उसके उद्धार में आनन्दित होने का कारण देता है।

आज, हममें से हर एक को यह प्रार्थना करनी चाहिए, “प्रभु यीशु मसीह, मेरे जीवन के खूँटे तेरे स्थिर प्रेम में दृढ़ता से गाड़ दे, ताकि जीवन और मृत्यु में, आनन्द और शोक में, स्वास्थ्य और बीमारी में, मैं आनन्दित रह सकूँ।”

इब्रानियों 12:3-11

2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था

Alethia4India
Alethia4India
2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था
Loading
/

“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे? धोखा न खाओ; न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्‍कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करने वाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्‍वर के आत्मा से धोए गए और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।” 1 कुरिन्थियों 6:9-11

दुष्ट शैतान इसमें कोई रुचि नहीं रखता कि वह हमें हमारे कई मसीही कार्यों को छोड़ने के लिए मजबूर करे—लेकिन वह इसमें बहुत रुचि रखता है कि हम परमेश्वर के स्वभाव और चरित्र से सम्बन्धित परम सत्यों को और उसके राज्य की नैतिकता से सम्बन्धित परम सत्यों को छोड़ दें। इसे समझते हुए, पौलुस ने कुरिन्थुस के विश्वासियों को चेतावनी दी कि वे ईश्वरहीन आचरण के खतरनाक क्षेत्र में न चले जाएँ। पौलुस कहता है, “धोखा न खाना” क्योंकि अधर्मी लोग “परमेश्‍वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।”

पौलुस ऐसे कई बुरे आचरणों का विवरण देता है, जो कुरिन्थुस में कई सामाजिक तौर पर स्वीकार्य माने जाते थे। यह शहर व्यापार का एक बड़ा केन्द्र था, जहाँ विभिन्न जातियों, आस्थाओं और भाषाओं के लोग बसे थे। लेकिन संस्कृति के रूप में यह शहर दिशाहीन और उग्र था। वास्तव में, यह इतना भ्रष्ट था कि “कुरिन्थुस” शब्द ही अनैतिकता का प्रतीक बन गया था। तो पौलुस ने क्या किया? वह एक योजना के साथ वहाँ गया। वह “वचन सुनाने की धुन में यहूदियों को गवाही देने लगा कि यीशु ही मसीह है” (प्रेरितों 18:5)। उसका उद्देश्य कोई कानून लागू करना नहीं था, बल्कि सत्य का प्रचार करना था।

कोई भी कानूनी व्यवस्था संस्कृति में सुधार नहीं ला सकती। इसके बजाय, परमेश्वर ने एक सन्देश दिया है जो पुरुषों और महिलाओं को स्वतन्त्र करने वाला सन्देश है और वह सन्देश केवल इतना है: “यीशु मसीह वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़” और कोई है ही नहीं (1 कुरिन्थियों 2:2)। सुसमाचार ही इस संसार के लिए परमेश्वर की योजना है। वह अपने वचन की शक्ति और विश्वास से लोगों के जीवन में कार्य करता है और उन्हें पूरी तरह बदल देता है।

पौलुस ने जटिल तर्कों में विश्वास नहीं किया। उसके पास केवल एक सन्देश था, और वह बार-बार उसी को कहता रहा। वह जानता था कि केवल मसीह की क्रूस पर दी गई बलि ही पुरुषों और महिलाओं को उनके पापों से मुक्त कर सकती है, ताकि वे “नए जीवन की सी चाल” चलें (रोमियों 6:4)।

पाप में बने रहना न केवल खतरनाक है, बल्कि यह अनावश्यक भी है। आज भी सुसमाचार का सन्देश उतना ही स्पष्टता और प्रभावशाली रूप से गूंज रहा है जितना कि कुरिन्थुस की गलियों में गूंजा था। यह संसार के भ्रामक विचारों और इस धारणा को काटता है कि केवल कानून ही लोगों के हृदयों को बदल सकता है या उनमें विश्वास उत्पन्न कर सकता है। हमारे जीवन, हमारे शहरों और हमारे राष्ट्रों की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि पापियों को उद्धार मिले। इस धोखे में मत आना कि पाप कोई मायने नहीं रखता। इस धोखे में मत आना कि हमारे समाज को परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार से बढ़कर किसी और चीज़ की अधिक जरूरत है। हमें क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का सन्देश स्वीकार करने और प्रचार करने की आवश्यकता है:

वह मरा कि हम क्षमा पाएँ,

वह मरा कि हम धर्मी बनें,

कि हम अन्ततः स्वर्ग जा सकें,

उसके अनमोल लहू से बचाए जा सकें[1]

प्रेरितों 18:1-11

2  May : देवानें त्याच्या प्रीतिचे प्रमाण दिलें

Alethia4India
Alethia4India
2  May : देवानें त्याच्या प्रीतिचे प्रमाण दिलें
Loading
/

परंतु देव आपल्यावरच्या स्वत:च्या प्रीतिचे प्रमाण हे देतो कीं, आपण पापी असतानाच ख्रिस्त आपल्यासाठीं मरण पावला. ( रोम 5:8 )

ह्या वचनाकडे लक्ष्य द्या, ह्या मध्यें “प्रमाण देतो” हे वर्तमान काळात आहे आणि ख्रिस्त मरण पावला हे भूतकाळात आहे. “देव आपल्यावरच्या स्वत:च्या प्रीतिचे प्रमाण हे देतो  कीं, आपण पापी असतानाच ख्रिस्त आपल्यासाठीं मरण पावला.” ( रोम 5:8 )

वर्तमान काळ असें सुचवते कीं प्रमाण देणे हे एक सुरू असलेले कार्य आहे, जे आज देखील चालू आहे. आणि ते उद्या देखील सुरू राहणार.

 भूतकाळ “मरण पावला” असें दर्शवते कीं ख्रिस्ताचे मरण एकदाच झालें, आणि पुन्हा ते घडणार नाहीं. “कारण आपल्याला देवाजवळ नेण्यासाठीं ख्रिस्तानेही पापांबद्दल, म्हणजें नीतिमान पुरुषाने अनीतीमान लोकांकरीता, एकदाच मरण सोसले. ” (1 पेत्र 3:18)

मग पौलाने वर्तमान काळ (प्रमाण देतो) याचा वापर का केला ? मी अशी अपेक्षा केलीं असती कीं पौल असें म्हणेल कीं , “देवानें  आपल्यावरच्या स्वत:च्या प्रीतिचे प्रमाण हे दिलें (भूतकाळ), कीं आपण पापी असतानाच ख्रिस्त आपल्यासाठीं मरण पावला.” ख्रिस्ताचे मरण जेव्हां झालें, त्यावेळी ते देवाच्या प्रीतिचे दर्शक नव्हते का ? आणि त्याचे प्रमाण भूतकाळात दिलें गेले ना?

मला वाटते त्याचे उत्तर आधीच्या काही वचनात दिलें आहे. पौलाने नुकताच असें म्हंटले आहे कीं, “संकटाने धीर, धीराने शील व शीलाने आशा निर्माण होते ; आणि आशा लाजवत नाहीं.” ( रोम 5:3-5)

दुसर्‍या शब्दात सांगायचे झाल्यास, देवाचा आपल्याला सर्व गोष्टींतून घेऊन जाण्याचा उद्देश आशा देणे हा आहे. सर्व क्लेशामधून जात असताना देखील आपण आशावादी रहावे अशी त्याची उत्कंठा आहे.

पण आपण आशावादी कसे राहू शकतो ?

याचे उत्तर पौल पुढच्या वाक्यांत देतो, “कारण आपल्याला दिलेल्या पवित्र आत्म्याच्या द्वारें आपल्या अंत:करणात देवाच्या प्रीतिचा वर्षाव झाला आहे” (रोम 5:5). आपल्या अंत:करणात देवाच्या प्रीतिचा वर्षाव झाला आहे. याचा अर्थ, (आपल्या तारणाच्यावेळी) आपल्या अंत:करणात देवाच्या प्रीतिचा वर्षाव भूतकाळातच झाला आहे, आणि तो आज देखील होत आहे.

देवानें आपल्यावरील त्याच्या प्रीतिचे प्रमाण देण्याकरिता त्याचा पुत्र देऊ केला, जो आपल्या पापां करिता एकदाच मरण पावला (रोम 5:8). पण त्याला हे देखील ठाऊक आहे कीं, ह्या भूतकाळातील प्रीतिचा अनुभव आपल्याला वर्तमान वस्तुस्थिती (आज आणि उद्या) मध्यें देखील यायला हवा, जर आपल्यामध्यें धीर, शील आणि आशा हवी असेल तर. यासाठींच, त्यानें याचे प्रमाण केवळ क्रुसावरच दिलें नाहीं तर, तर तो आज देखीत त्याचा आत्म्या द्वारें आपल्या अंतकरणात याचे प्रमाण देत आहे. तो हे आपल्या अंतकरणाचे नेत्र उघडून करत आहे, ज्याच्या द्वारें आपण त्याच्या  कृसाचा गौरव आणि तो देत असलेली खात्री कीं ख्रिस्त येशू मध्यें आपल्याला देवाच्या प्रीति पासून काहीच विभक्त करू शकत नाहीं याचा आस्वाद घेऊ शकू आणि ते पाहू शकू.

1 मई : सोता हुआ उद्धारकर्ता

Alethia4India
Alethia4India
1 मई : सोता हुआ उद्धारकर्ता
Loading
/

“पर वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था। तब उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, ‘हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?’ तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, ‘शान्त रह, थम जा!’” मरकुस 4:38-39

शिष्यों की स्थिति में खुद को रखकर देखें, जब वे तूफानी समुद्र में नाव चला रहे थे और यीशु नाव के पिछले हिस्से में सो रहा था। उनमें से कई अनुभवी मछुआरे थे और जानते थे कि डूबने का खतरा बहुत वास्तविक था—फिर भी उनका गुरु गहरी नींद में था, मानो उसने उन्हें इस संकट में अकेला छोड़ दिया हो।

यह तथ्य, कि यीशु को नींद की जरूरत थी, दिखाता है कि उसके पास एक वास्तविक मानवीय शरीर था, जो थकान, प्यास और भूख को महसूस करता था। उसने शारीरिक दुर्बलताओं का स्वयं अनुभव किया। यहाँ तक कि वे सोने के लिए तकिया ढूँढने की परेशानी से भी गुजरा, जिससे यह पता चलता है कि वह जानता था कि असुविधा क्या होती है। जिसने सारी सृष्टि की रचना की, वह चाहते तो उस लकड़ी को एक आरामदायक बिस्तर में बदल सकता था, लेकिन इसके बजाय, महिमा के प्रभु ने हमारे जैसे ही एक तकिए पर सिर रखा।

यदि यीशु ने मानवीय दुर्बलताओं और प्रलोभनों को अनुभव न किया होता, तो वह एक करुणामय महायाजक न होता, जो हमें स्वर्गीय सिंहासन से दया और अनुग्रह प्रदान कर सकता (इब्रानियों 4:14-16)। लेकिन बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि उसने इन सब का अनुभव किया। उदाहरण के लिए, उसने अस्वीकृति का दर्द सहा: “वह अपने घर आया, और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया” (यूहन्ना 1:11)। यहाँ तक कि उसके कुछ वफादार शिष्यों ने—इसी नाव में मौजूद कुछ लोगों ने भी—आखिरकार उसे छोड़ दिया या उसका इनकार कर किया। उसने उस बदनामी को भी सहा, जिसने उसके अद्‌भुत और पवित्र स्वभाव को गलत तरीके से प्रस्तुत किया (उदाहरण के लिए, लूका 7:34 देखें)। उसने चालीस दिन और रातें शैतान के झूठ और प्रलोभनों से संघर्ष में बिताईं (मत्ती 4:1-11)। उसने क्रूस पर गहरी पीड़ा और क्लेश झेला, जब उसने पुकारकर कहा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। ऐसा कोई भी दर्द या अपमान नहीं है, जिससे हम गुजरते हैं, जो यीशु के हृदय को न चुभा हो—और क्योंकि वह इन संघर्षों को जानता है, इसलिए वह हमें आमन्त्रित करता है कि जब हम इनसे गुजरें, तो उसके पास आएँ।

मरकुस के सुसमाचार के आरम्भ में ही यह छोटी-सी घटना हमें जीवन बदलने वाली यह सच्चाई याद दिलाती है कि यीशु जीवित मसीह, एक दयालु उद्धारकर्ता और एक विश्वासयोग्य साथी हैं। उस गुरु से बढ़कर और कोई नहीं है जो हमारे जीवन की कठिन परिस्थितियों को बेहतर रीति से सम्भाल सके, जिसे शिष्यों ने नाव में गहरी नींद में सोते हुए पाया था। जैसे उन्होंने उसे पुकारा था, वैसे ही आप भी उसे पुकार सकते हैं और जान सकते हैं कि जो उस नाव में सो रहा था, वही तूफान को शान्त कर सकता है—वही प्रभु, जो स्वर्ग के सिंहासन पर शासन करता है, जो न कभी सोएगा, न ऊँघेगा, और जो आपके पाँव को फिसलने नहीं देगा (भजन 121:3-4)।

आज आपके मन में कौन सा डर है? निश्चिन्त रहें कि प्रभु यीशु इस जीवन की वास्तविकता को समझता है। अपने डर को उसके पास ले आओ और “अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पतरस 5:7)।

भजन 121

1  May : घाणेरडी वस्त्रे आता नाहीं

Alethia4India
Alethia4India
1  May : घाणेरडी वस्त्रे आता नाहीं
Loading
/

आम्हीं सगळे अशुद्ध मनुष्यासारखे झालो आहो ; आमची सर्व धर्मकृत्ये घाणेरड्या वस्त्रासारखी झाली आहेत. ( यशया 64:6 )

हे सत्य आहे कीं देवाचे नियमशास्त्र पाळण्यात झालेंली उणीव त्याच्या परिपूर्ण पावित्र्याला असंतुष्ट करते, व आपल्याला न्यायदंडास पात्र ठरवते कारण देव कोणत्याच पापाकडे कृपेने पाहू शकत नाहीं  ( हबक्कुक 1:13, याकोब 2:10 -11).

परंतु जुन्या करारामध्यें (व आज देखील हे असेंच आहे) व्यक्तिचा नाश ह्यामुळें होत नसे कीं तो पापविरहित परिपूर्णता प्राप्त करू शकत नसे. त्यांचा नाश यामुळें होत असें कीं, ते देवाच्या दयेच्या अभिवचनावर विश्वास ठेवण्यात अपयशी ठरत असत, विशेषत: ही आशा धरून राहण्यात कीं एक दिवशी देव त्यांना एक तारणकर्ता देईन जो त्याच्या लोकांकरिता सिद्ध असें नितीमत्व होईल “परमेश्वर आमची नीतिमत्ता” ( यिर्मया 23:6, 33:16). जुन्या करारातील पवित्र जनांना ठाऊक होते कीं त्यांचे तारण अशा प्रकारेच  होणार होते, आणि विश्वास हा आज्ञापालनाची गुरुकिल्ली होती, आणि आज्ञापालन हा त्यांच्याह्यांच विश्वासाचा पुरावा होता.

ही गोष्ट खूप गोंधळात टाकणारी आहे, जेव्हां लोक म्हणतात कीं केवळ ख्रिस्ताकडून प्राप्त होणार्‍या नीतीमत्त्वालाच मोल आहे. हे खरे आहे कीं. आपले नीतिमान ठरवले जाणे, आपल्या नीतीमत्वावर अवलंबून नसते – आत्म्याद्वारें देऊ केलेल्यां विश्वासाद्वारें नीतिमान बनणे देखील – नीतीमत्व केवळ ख्रिस्ताद्वारें आपल्याला प्राप्त होते. पण लोक काहीवेळा अविचाराने, मनुष्याच्या सर्व नीतीमत्वाला  तुच्छता पूर्वक पाहतात, जसे कीं आपल्यामध्यें कोणत्याच नीतीमत्वाचे कार्य झालें नाहीं ज्याच्यामुळें देवाला संतोष प्राप्त झाला नाहीं, परंतु असें म्हणने उपयोगाचे नाहीं.

ते नेहमी यशया 64:6 चा संदर्भ देतात ज्या मध्यें आपली धर्मकृत्ये “घाणेरड्या वस्त्रासारखी” आहेत असें संगितले आहे.

पण, यशया 64:6 चा संदर्भ पाहता, देवाच्या लोकांची सर्वच धर्मकृत्ये देव स्वीकारत नाहीं असें नाहीं. यशया अश्या लोकांबद्दल बोलत आहे ज्यांचे नीतीमत्व ढोंगीपणाचे आहे. ते खरे नीतीमत्व नाहीं. ह्या वचनाच्या आधीच्या वचनामध्यें यशया म्हणतो, “जे आवडीने धर्माचरण करतात त्यांना तू भेट देतोस ” (यशया 64:5).

हे निर्विवादपणे सत्य आहे कीं – येशूच्या क्रूसापूर्वी आणि नंतर, देवाच्या कोणत्याच लोकांचा स्वीकार  पवित्र देवाच्या पुढे झाला नसता जर त्यांच्याकडे ख्रिस्ताचे नीतीमत्व नसते ( रोम 5:19; 1 करिंथ. 1:30; 2 करिंथ 5:21). हे खरे आहे ! पण याचा अर्थ असा होत नाहीं कीं, देव त्या  नीतिमान” ठरलेल्यां लोकांमध्यें नीतीमत्वाचे कार्य करत नाहीं, जे परिपूर्ण नसले तरी “घाणेरड्या वस्त्रासारखी” नाहीं. खरें पाहता, तो त्यांच्या मध्यें नीतीमत्व निर्माण करतो, आणि हे नीतीमत्व देवासाठीं मौल्यवान आहे, आपल्याला नीतिमान ठरवण्याकरिता नाहीं (कारण आपण केवळ ख्रिस्ता द्वारेंच  नीतिमान ठरतो ), तर आपण विश्वासाने नीतिमान ठरवलेली देवाची लेकरे आहे याचा पुरावा म्हणून. आणि याच करिता पौल प्रार्थना करतो, आणि आपण देखील हीच प्रार्थना केलीं पाहिजे, जी त्यानें फिलिपै 1:10-11 मध्यें केलीं “असें कीं, जे श्रेष्ठ ते तुम्हीं पसंत करावे ; तुम्हीं ख्रिस्ताच्या दिवसासाठीं निर्मल व निर्दोष असावे ; आणि देवाचे गौरव व स्तुति व्हावी म्हणून येशू ख्रिस्ताच्या द्वारें जे नीतीमत्त्वाचे फळ त्यानें तुम्हीं भरून जावे.”

30 अप्रैल : किसी दूसरे की सफलता पर प्रतिक्रिया देना

Alethia4India
Alethia4India
30 अप्रैल : किसी दूसरे की सफलता पर प्रतिक्रिया देना
Loading
/

“फिर उसने एक और स्वप्न देखा, और अपने भाइयों से उसका भी यों वर्णन किया, ‘सुनो, मैं ने एक और स्वप्न देखा है, कि सूर्य और चन्द्रमा और ग्यारह तारे मुझे दण्डवत कर रहे हैं’ . . . उसके भाई उससे डाह करते थे।” उत्पत्ति 37:9, 11

ईर्ष्या एक ऐसा अहसास है, जो मनुष्यजाति में सामान्य है। यह एक राक्षस भी है—एक ऐसा दानव जो किसी को भी जिन्दा खा सकता है।

आप ईर्ष्या से किस तरह संघर्ष करते हैं? वे कौन लोग हैं जो आपके प्रभाव क्षेत्र में हैं या आपकी दृष्टि के क्षेत्र में हैं, जो सफलता या कृपा का अनुभव कर रहे हैं और जिनके बारे में आप सोचते हैं कि काश आप उनके स्थान पर होते? हमें सावधान रहना चाहिए। जॉर्ज लॉसन लिखते हैं, “ईर्ष्या का घृणित जुनून दूसरों की तबाही की चाहत रखते हुए स्वयं को ही पीड़ित करता रहता है और अन्ततः स्वयं को नष्ट कर देता है।”[1] ईर्ष्या अक्सर ईर्ष्यालु को नष्ट कर देती है।

यूसुफ के भाइयों को अभी तक यह नहीं पता था कि वे झूठ, द्वेष, और अपने ही भाई को गुलाम बनाने के पापों के मार्ग पर चल रहे थे—जो क्रूरता के सबसे घृणित रूप थे। उस मार्ग पर उनका पहला कदम यूसुफ से उनकी ईर्ष्या थी। लेकिन वे इसे नहीं देख पाए, और इसलिए वे ऐसे कार्यों की ओर बढ़ते गए जो शायद उन्होंने यूसुफ के भव्य स्वप्नों के बारे में बात करने के समय विचार नहीं किए थे।

हमें अपनी ईर्ष्या को पहचानने और इससे निपटने की कला सीखनी चाहिए। तो फिर हम बिना कड़वाहट और ईर्ष्या में डूबे हुए दूसरों की सफलता पर कैसे प्रतिक्रिया दें?

पहला, हम यह स्वीकार करें कि परमेश्वर मनुष्यों के कार्यों पर सर्वोच्च अधिकार रखता है। परमेश्वर ने ही निर्धारित किया था कि यूसुफ के पास क्या होगा और वह क्या बनेगा—और उसने यूसुफ के भाइयों के लिए कम महत्त्वपूर्ण स्थिति निर्धारित की थी। यदि वे इस सत्य को मानने के लिए तैयार होते, हालाँकि यह कठिन हो सकता था, तो वे स्वयं को अपनी ईर्ष्यालु घृणा के आत्म-पीड़ित दर्द से बचा सकते थे। दूसरा, हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। 19वीं सदी के महान प्रचारक, एफ.बी. मेयर ने एक बार बताया कि कैसे एक अन्य प्रचारक उसी क्षेत्र में सेवा करने के लिए आया, जहाँ वह पहले से सेवा कर रहे थे, और अचानक उनकी मण्डली से लोग खिसकने लगे। ईर्ष्या ने उनके दिल को पकड़ लिया, और उन्होंने जो स्वतन्त्रता पाई, वह इस अन्य प्रचारक के लिए प्रार्थना करने में थी—कि परमेश्वर उस दूसरे प्रचारक की सेवा को आशीर्वाद दे। प्रार्थना हमारे दिलों से ईर्ष्या की पकड़ को ढीला करती है।

परमेश्वर ही वह हैं लोगों को स्थापित करता है और नीचे ले आता है। यदि यूसुफ के भाइयों ने इस सत्य को समझ लिया होता, तो उनके पास ईर्ष्या करने का कोई कारण नहीं होता। परमेश्वर ही है जो हमें हर साँस एक उपहार के रूप में देता है। यदि उन्होंने यह समझ लिया होता, तो उनके मन में कड़वाहट बढ़ने के बजाय आभार और धन्यवाद का भाव होता। आज अपने दिल को जाँचें, किसी भी ईर्ष्या को पहचानें जो जड़ पकड़ चुकी है, और अपने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने विनम्रता और आभार के साथ सिर झुका लें।

1 शमूएल 2:1-10

30 April : आनंदासाठीं पंधरा युक्त्या

Alethia4India
Alethia4India
30 April : आनंदासाठीं पंधरा युक्त्या
Loading
/

“जीवनाचा मार्ग तू मला दाखवशील; तुझ्या सान्निध्यात पूर्णानंद आहे; तुझ्या उजव्या हातात सौख्ये सदोदित आहेत.” (स्तोत्र 16:11)

पाप आणि वेदना यांनी ग्रस्त असलेल्या या जीवनात आनंद मिळविणें म्हणजें एक संघर्ष. अगदी विश्वासाप्रमाणे. आणि पौल सुद्धा तीमथ्याला म्हणतो, ”विश्वासासंबंधीचे जे सुयुद्ध ते कर“ (1 तीमथ्य 6:12). तीच गोष्ट आनंदाची आहे. त्यासाठीं आपण काम केलें पाहिजे आणि त्यासाठीं संघर्ष केला पाहिजे. पौल करिंथकरांना म्हणाला, “आम्हीं तुमच्या आनंदात साहाय्यकारी आहोत” (2 करिंथ 1:24)

तर मग आपण आनंदासाठीं कसे लढणार? येथे 15 निर्देशक आहेत.

1. हे समजून घ्या कीं देवाठायीं खरा आनंद हें दान आहे.

2. समजून घ्या कीं आनंदासाठीं अथक संघर्ष करणें अगत्याचे आहे. आणि या पहिल्या दोन निर्देशकांच्या विरोधाभासामुळे निराश होऊ नका!

3. पवित्र आत्म्याच्या सामर्थ्याद्वारे, तुमच्या जीवनातील सर्व प्रगट पापांवर विजय मिळविण्याचा संकल्प करा.

4. धीट अपराधीपणाचे रहस्य जाणण्यास शिका – नीतिमान ठरलेल्या पापी मनुष्यासारखे कसे लढायचे.

5. हे समजून घ्या कीं लढा हा मुख्यतः पाहण्याचा लढा आहे – देव जो आहे हे पाहण्याचा.

6. देवाच्या वचनावर रात्रंदिवस मनन करा.

7. मोकळ्या अंतःकरणाने, डोळे उघडे ठेवून आणि देवाकडें ओढा ठेवून आग्रहाने आणि सतत प्रार्थना करा.

8. स्वतःचे ऐकण्यापेक्षा स्वतःला उपदेश करण्यास शिका.

9. देवामध्ये आनंद करणाऱ्या लोकांसोबत वेळ घालवा जे तुम्हांला देवाकडें पाहण्यास आणि लढा लढण्यास मदत करतात.

10. देवाच्या वरकरणी अनुपस्थितीच्या रात्री धीर धरा.

11. विश्रांती घ्या, व्यायाम करा आणि योग्य आहार घ्या जे देवानें तुमच्या शरीरासाठीं ठरविले आहे.

12. निसर्गातील देवाच्या प्रकटीकरणाचा योग्य उपयोग करा – रानात फेरफटका मारा.

13. देवविषयक उत्तम पुस्तके आणि थोर संतांची जीवनचरित्रे वाचा.

14. इतरांच्या फायद्यासाठीं कठीण आणि प्रेमळ गोष्टीं करा (तुमची मौखिक साक्ष आणि दयेची कृत्ये).

15. ख्रिस्तासाठीं जागतिक दर्शन (दृष्टांत) प्राप्त करा आणि अपरिचित लोकांसाठीं स्वतःस ओतून द्या.

29 अप्रैल : उपयुक्त रीति से ऊँचा उठाया गया

Alethia4India
Alethia4India
29 अप्रैल : उपयुक्त रीति से ऊँचा उठाया गया
Loading
/

“इस कारण परमेश्‍वर ने उसको अति महान भी किया।” फिलिप्पियों 2:9

फिलिप्पियों 2:5-8 मसीह की मानवता, दिव्यता, सेवा, और दीनता के बारे में एक सुन्दर वक्तव्य है। परमेश्वर के देहधारी पुत्र की विनम्रता को क्रूस पर उसकी मृत्यु तक देखने के बाद आपके मन में अगली क्या बात आती है? स्वाभाविक रूप से हम पुनरुत्थान के बारे में सोचते हैं। लेकिन पौलुस ऐसा नहीं करता। वह हमें मसीह को ऊँचा उठाए जाने की ओर ले जाता है।

पौलुस कहता है कि यीशु की विनम्रता और उसे ऊँचा उठाए जाने के बीच एक तार्किक सम्बन्ध है: “इस कारण  परमेश्‍वर ने उसको अति महान भी किया।” (पद 8, बल दिया गया)। महिमा में ऊँचा उठाए जाने का क्या अर्थ है? वह यह है कि पिता ने अपने पुत्र को सिंहासन दिया है और इस संसार को इस प्रकार व्यवस्थित किया है कि एक दिन “जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हैं, वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें; और परमेश्‍वर पिता की महिमा के लिए हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है” (पद 10-11)।

लेकिन उसे ऊँचा उठाया जाना उपयुक्त क्यों है? पवित्रशास्त्र हमें कई उत्तर देता है। पहला, मसीह को ऊँचा उठाया जाना उपयुक्त है क्योंकि यह पुराने नियम की भविष्यवाणी को पूरा करता है और दिखाता है कि परमेश्वर अपने वचन को निभाता है। सारा संसार यीशु को प्रभु स्वीकारेगा क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा करने की प्रतिज्ञा की थी। यीशु के मानव इतिहास के मंच पर आने से छः सौ साल पहले यशायाह ने परमेश्वर के ये शब्द दर्ज किए: “देखो, मेरा दास बुद्धि से काम करेगा, वह ऊँचा, महान और अति महान हो जाएगा” (यशायाह 52:13)। अतः मसीह इस संसार के दर्द और पाप को अपने ऊपर उठाने आया, दुखी सेवक के रूप में कार्य किया, क्रूस पर मरा और फिर महिमा में अपने सिंहासन पर विराजमान होने के लिए ऊँचा उठाया गया। जैसा अन्य स्थान पर पौलुस ने लिखा, “परमेश्‍वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में ‘हाँ’ के साथ हैं” (2 कुरिन्थियों 1:20)।

दूसरा, मसीह को ऊँचा उठाया जाना उपयुक्त है, क्योंकि वह परमेश्वर है। बाइबल हमें सिखाती है कि पुत्र और पिता एक हैं। उसकी दिव्यता के कारण उसे ऊँचा उठाया जाना अनिवार्य है; परमेश्वर के बैठने के लिए कोई अन्य स्थान उपयुक्त नहीं है! पुत्र के बैठने के लिए अपने पिता के दाहिने हाथ के अतिरिक्त कोई अन्य स्थान उपयुक्त नहीं है।

अन्त में, मसीह को ऊँचा उठाया जाना उपयुक्त है, क्योंकि वह अपने पिता का प्रिय पुत्र है। परमेश्वर पिता ने अपने पुत्र को छुटकारे की वाचा को पूरा करने के लिए क्रूस पर जाते हुए देखा और उसे दर्द में यह पुकारते हुए सुना, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। पिता जानता था कि पुत्र ने वह पीड़ा अपने पिता के प्रति प्रेम और अपनी प्रजा के प्रति प्रेम के कारण सहन की। पिता ने अपने सिद्ध पुत्र को उस भयानक स्थिति में नहीं छोड़ा। पिता का प्रेम कैसे कुछ और कर सकता था सिवाय इसके कि वह पुत्र को उसकी निम्न स्थिति से ऊँचा करे?

हमारे लिए मसीह की दीनता और हमारे ऊपर उसे ऊँचा उठाया जाना निस्सन्देह हमें उस बिन्दु तक लाते हैं, जहाँ हम उनके प्रति हर्षित समर्पण में सिर झुकाते हैं। ये हमें दिखाते हैं कि एक ऐसा है जिसके पास हमारी अधीनता की माँग करने का दर्जा है और हमारी आराधना का पात्र होने का चरित्र है। ये हमें याद दिलाते हैं कि स्वर्ग का सबसे अच्छा हिस्सा स्वर्ग में सबसे महिमामय व्यक्ति होगा:

मैं महिमा को नहीं देखूँगा, बल्कि अपने अनुग्रह के राजा को निहारूँगा;

उस मुकुट को नहीं जो वह हमें देता है, बल्कि उसके छिद्रित हाथों को देखूँगा;

मेमना ही इम्मानुएल की भूमि की सारी महिमा है।[1]

 प्रेरितों 13:16-43